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  • PoK में विरोध के बीच तीसरे चरण का मतदान टला, PML-N ने 24 सीटें जीतीं और सरकार बनाने की स्थिति में पहुंची.

    PoK में विरोध के बीच तीसरे चरण का मतदान टला, PML-N ने 24 सीटें जीतीं और सरकार बनाने की स्थिति में पहुंची.

    नई दिल्ली । पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK में लगातार जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच 10 अगस्त को होने वाले विधानसभा चुनाव के तीसरे चरण का मतदान अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया गया है। तीसरे चरण में 11 सीटों पर मतदान होना था। चुनाव टलने से पहले दो चरणों में पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज यानी PML-N ने कुल 24 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इन नतीजों के बाद पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गई थी, लेकिन तीसरे चरण की प्रक्रिया रुकने से चुनावी घटनाक्रम फिलहाल प्रभावित हुआ है।

    PoK विधानसभा में कुल 45 सीटें हैं। पहले दो चरणों में PML-N के पक्ष में आए नतीजों ने पार्टी को मजबूत स्थिति में पहुंचा दिया। हालांकि, तीसरे चरण के मतदान से पहले क्षेत्र में लगातार विरोध प्रदर्शन और तनाव की स्थिति बनी हुई थी। इसी कारण सोमवार को होने वाला मतदान टालने का फैसला लिया गया।

    चुनावी प्रक्रिया के दौरान हिंसा की घटनाएं भी सामने आई थीं। पहले चरण के चुनाव के दौरान अलग-अलग घटनाओं में कम से कम 19 लोगों की मौत होने की जानकारी सामने आई। कई स्थानों पर मतदान केंद्रों के आसपास झड़पों और विरोध प्रदर्शन की खबरें आईं। प्रदर्शनकारियों की ओर से चुनावी प्रक्रिया में धांधली के आरोप भी लगाए गए।

    जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी यानी JAAC इस आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभा रहा है। संगठन के समर्थकों ने सरकार की नीतियों और चुनावी व्यवस्था को लेकर विरोध दर्ज कराया है। संगठन की ओर से यह आरोप भी लगाया गया कि रावलकोट में प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की गोलीबारी में लोगों की मौत हुई। हालांकि, इन आरोपों को संबंधित घटनाक्रम के संदर्भ में जांच और स्वतंत्र पुष्टि की जरूरत है।

    JAAC की मांगें केवल महंगाई और स्थानीय सुविधाओं से जुड़े मुद्दों तक सीमित नहीं हैं। संगठन अब PoK को अधिक स्वायत्तता और राजनीतिक अधिकार देने की मांग भी उठा रहा है। उसकी प्रमुख मांग विधानसभा की 45 सीटों में से 12 आरक्षित सीटों को समाप्त करने की है।

    ये 12 सीटें उन कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं, जो पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में रहते हैं। JAAC का तर्क है कि PoK से बाहर रहने वाले लोगों को क्षेत्र की सरकार चुनने की प्रक्रिया में इस तरह की भूमिका नहीं मिलनी चाहिए। संगठन का मानना है कि आरक्षित सीटों के कारण स्थानीय मतदाताओं के राजनीतिक प्रभाव में कमी आती है।

    भारत ने PoK में चल रही चुनावी प्रक्रिया को मान्यता देने से इनकार किया है। भारत का आधिकारिक रुख है कि पाकिस्तान के पास उस क्षेत्र में राजनीतिक प्रक्रिया संचालित करने का अधिकार नहीं है, जिसे भारत अपना अभिन्न हिस्सा मानता है। भारत ने PoK में होने वाले चुनावों को पाकिस्तान के कब्जे को वैध दिखाने की कोशिश के तौर पर खारिज किया है।

    इस बीच पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और PML-N अध्यक्ष नवाज शरीफ का बयान भी चर्चा में रहा। उन्होंने कहा था कि यदि उनकी पार्टी PoK में जीत हासिल करती है तो वह शहबाज शरीफ से उन्हें PoK का प्रधानमंत्री बनाने के लिए कहेंगे। हालांकि, PoK के मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार प्रधानमंत्री का चुनाव विधानसभा के मुस्लिम सदस्यों में से होता है।

    PoK विधानसभा का सदस्य बनने के लिए संबंधित व्यक्ति का स्थायी निवासी होना और मतदाता सूची में नाम होना आवश्यक है। नवाज शरीफ इस चुनाव में किसी विधानसभा सीट से उम्मीदवार नहीं हैं। ऐसे में केवल PML-N अध्यक्ष होने या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सहमति से वह सीधे PoK के प्रधानमंत्री नहीं बन सकते।

    फिलहाल तीसरे चरण के मतदान के स्थगित होने से चुनावी प्रक्रिया की अगली तारीख स्पष्ट नहीं है। विरोध प्रदर्शनों, सुरक्षा स्थिति और राजनीतिक मांगों के बीच चुनाव आयोग तथा संबंधित प्रशासन के सामने मतदान प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की चुनौती बनी हुई है। वहीं PML-N पहले दो चरणों के परिणामों के आधार पर मजबूत स्थिति में है, लेकिन अंतिम चुनावी तस्वीर तीसरे चरण की 11 सीटों पर मतदान के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगी।

  • श्रीनगर स्थित पुश्तैनी घर पहुंचीं कुणाल खेमू की बहन, बदली हवेली और बीते दिनों की कहानी की साझा

    श्रीनगर स्थित पुश्तैनी घर पहुंचीं कुणाल खेमू की बहन, बदली हवेली और बीते दिनों की कहानी की साझा

    नई दिल्ली ।अभिनेता कुणाल खेमू के परिवार का श्रीनगर स्थित पुश्तैनी घर एक बार फिर चर्चा में है। वर्षों बाद उनकी बहन करिश्मा खेमू अपने परिवार के साथ इस घर पहुंचीं और वहां बिताए गए बचपन के दिनों से जुड़ी यादों को साझा किया। इस यात्रा का एक भावनात्मक वीडियो सामने आया है, जिसमें परिवार अपने पुराने घर के हर हिस्से को देखते हुए अतीत की स्मृतियों को दोबारा जीता नजर आता है। यह दौरा केवल एक मकान तक लौटने का नहीं, बल्कि उन यादों और भावनाओं से दोबारा जुड़ने का अवसर बन गया, जो समय के साथ पीछे छूट गई थीं।

    वीडियो में करिश्मा खेमू अपने पुश्तैनी घर के अलग-अलग हिस्सों को दिखाते हुए बताती हैं कि कभी यह पूरा भवन उनके परिवार का था, लेकिन अब समय के साथ इसकी संरचना और उपयोग दोनों बदल चुके हैं। उन्होंने बताया कि वर्षों पहले जिन कमरों में परिवार के सदस्य साथ रहते थे, वे अब अलग-अलग हिस्सों में विभाजित हो चुके हैं और उनमें अन्य लोग निवास करते हैं। इसके बावजूद घर का हर कोना उनके बचपन की किसी न किसी याद को आज भी संजोए हुए है।

    करिश्मा की मां ने भी इस यात्रा के दौरान घर से जुड़ी कई पुरानी स्मृतियों को साझा किया। उन्होंने बताया कि विवाह के बाद परिवार की शुरुआती जिंदगी इसी घर की ऊपरी मंजिल पर बीती थी। उन्होंने उन कमरों की ओर इशारा करते हुए पुराने दिनों को याद किया, जहां परिवार एक साथ समय बिताता था। घर की सीढ़ियां, आंगन और कमरे आज भी उन्हें बीते वर्षों की घटनाओं की याद दिलाते हैं। परिवार ने बताया कि इस मकान का हर हिस्सा किसी न किसी व्यक्तिगत अनुभव और पारिवारिक रिश्ते से जुड़ा हुआ है।

    समय के प्रभाव की छाप भी इस पुश्तैनी भवन पर स्पष्ट दिखाई देती है। हवेली की दीवारों का रंग फीका पड़ चुका है, लकड़ी की संरचनाओं पर उम्र के निशान साफ नजर आते हैं और कई हिस्सों में मरम्मत की आवश्यकता महसूस होती है। पारंपरिक कश्मीरी स्थापत्य शैली में बने इस मकान की लकड़ी की बालकनी, नक्काशीदार खंभे और पुराने दरवाजे आज भी इसकी ऐतिहासिक पहचान को जीवित रखते हैं। हालांकि लंबे समय के दौरान भवन की स्थिति में काफी परिवर्तन आया है, लेकिन इसकी मूल संरचना अब भी अतीत की कहानी बयान करती है।

    करिश्मा ने बताया कि कभी पूरा परिवार जिस विशाल घर में एक साथ रहता था, आज वह कई छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित हो चुका है। उन्होंने यह भी बताया कि कई कमरे अब बंद रहते हैं और कुछ हिस्सों में किरायेदार निवास करते हैं। घर की सीढ़ियों और गलियारों में पहले जैसी रौनक नहीं रही, लेकिन वहां पहुंचते ही बचपन की अनेक यादें स्वतः ताजा हो गईं। परिवार के लिए यह यात्रा भावनात्मक अनुभव साबित हुई, क्योंकि वर्षों बाद वे अपने उस घर की दहलीज पर लौटे, जहां उनके जीवन की शुरुआती स्मृतियां जुड़ी हुई हैं।

    कुणाल खेमू का जन्म श्रीनगर में हुआ था और बचपन में ही उनका परिवार घाटी छोड़कर मुंबई आ गया था। इसके बाद उन्होंने फिल्म जगत में अपनी अलग पहचान बनाई। हालांकि जीवन की नई यात्रा शुरू होने के बावजूद श्रीनगर स्थित पुश्तैनी घर उनके परिवार की पहचान और विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहा। करिश्मा खेमू की इस यात्रा ने एक बार फिर उन भावनात्मक संबंधों को सामने लाया है, जो किसी व्यक्ति और उसके पैतृक घर के बीच वर्षों बाद भी कायम रहते हैं। यह कहानी केवल एक भवन की नहीं, बल्कि स्मृतियों, पारिवारिक विरासत और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की भावना को भी दर्शाती है।

  • PoK में चुनावी विवाद बना खूनी संघर्ष: प्रदर्शनकारियों पर चली गोलियां, रक्षा मंत्री के बयान से और गरमाया मामला

    PoK में चुनावी विवाद बना खूनी संघर्ष: प्रदर्शनकारियों पर चली गोलियां, रक्षा मंत्री के बयान से और गरमाया मामला


    नई दिल्ली । पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी पीओके में चुनावी व्यवस्था को लेकर शुरू हुआ विरोध अब गंभीर राजनीतिक और सुरक्षा संकट में बदल गया है। सरकार विरोधी प्रदर्शनों के बीच पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कड़ा बयान देते हुए कहा कि प्रदर्शन कर रहे लोगों को वह भारत की तरह पाकिस्तान का दुश्मन मानते हैं और ऐसे लोगों से किसी भी प्रकार की बातचीत नहीं की जाएगी। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई हिंसक झड़प में 30 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि 50 से अधिक लोग घायल बताए जा रहे हैं।

    पीओके में यह प्रदर्शन विधानसभा की 12 शरणार्थी सीटों को समाप्त करने की मांग को लेकर किया जा रहा है। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के बैनर तले हजारों लोग रावलाकोट से मुजफ्फराबाद की ओर मार्च निकाल रहे थे। संगठन का आरोप है कि सुरक्षा बलों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान बिना किसी उकसावे के गोलीबारी कर दी जिससे बड़ी संख्या में लोग हताहत हुए। दूसरी ओर पाकिस्तान सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए दावा किया कि प्रदर्शनकारी आधुनिक हथियारों से लैस थे और उन्होंने पहले सुरक्षाबलों पर हमला किया जिसके बाद जवाबी कार्रवाई की गई।

    हिंसा के बाद पूरे पीओके में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। अतिरिक्त सेना पैरामिलिट्री बल और आर्म्ड कॉन्स्टेबुलरी की तैनाती की गई है। प्रशासन ने पूरे क्षेत्र में धारा 144 लागू कर दी है और इंटरनेट सेवाएं भी अस्थायी रूप से बंद कर दी गई हैं ताकि स्थिति को नियंत्रित किया जा सके।

    दरअसल पीओके विधानसभा में कुल 53 सीटें हैं जिनमें 45 सीटों पर सीधे चुनाव होते हैं जबकि 12 सीटें उन कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं जो 1947 और उसके बाद जम्मू कश्मीर से पाकिस्तान चले गए थे। इन सीटों के मतदाता पीओके में नहीं बल्कि पाकिस्तान के विभिन्न प्रांतों में रहते हैं। प्रदर्शनकारी संगठनों का आरोप है कि इन सीटों के जरिए इस्लामाबाद की राजनीतिक पार्टियां पीओके की सरकार के गठन में हस्तक्षेप करती हैं और कई बार इन्हीं सीटों के कारण विधानसभा का बहुमत बदल जाता है।

    जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी की मांग है कि पीओके की विधानसभा चुनने का अधिकार केवल वहां रहने वाले लोगों के पास होना चाहिए और शरणार्थी सीटों की मौजूदा व्यवस्था समाप्त की जाए। विपक्षी दलों का भी आरोप है कि इन सीटों का इस्तेमाल चुनावी नतीजों को प्रभावित करने के लिए किया जाता है। पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ सहित कई दल पहले भी चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठा चुके हैं।

    रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के बयान ने पहले से तनावपूर्ण माहौल को और अधिक गरमा दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच संवाद स्थापित नहीं हुआ तो हालात और बिगड़ सकते हैं। फिलहाल पूरे क्षेत्र में सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट पर हैं और हालात पर लगातार नजर रखी जा रही है।

  • हिजबुल कमांडर के बयान से पाकिस्तान की भूमिका पर फिर उठे सवाल, कश्मीर में पाकिस्तानी आतंकियों की मौजूदगी का किया सार्वजनिक दावा

    हिजबुल कमांडर के बयान से पाकिस्तान की भूमिका पर फिर उठे सवाल, कश्मीर में पाकिस्तानी आतंकियों की मौजूदगी का किया सार्वजनिक दावा

    नई दिल्ली । प्रतिबंधित आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के डिप्टी सुप्रीम कमांडर शमशेर खान का एक कथित वीडियो सामने आने के बाद सीमा पार आतंकवाद को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। वीडियो में उसने दावा किया है कि पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों से आए आतंकी कश्मीर में सक्रिय रहे और उनकी कब्रें घाटी के अलग-अलग क्षेत्रों में मौजूद हैं। इस बयान को सुरक्षा मामलों के जानकार महत्वपूर्ण मान रहे हैं क्योंकि इसमें सीमा पार से आतंकवाद को लेकर सार्वजनिक रूप से दावा किया गया है।

    वीडियो में शमशेर खान कथित तौर पर कहता दिखाई देता है कि कुपवाड़ा, लोलाब और कठुआ सहित कश्मीर के अनेक इलाकों में ऐसे कब्रिस्तान हैं, जहां पाकिस्तान से आए आतंकियों को दफनाया गया है। उसने अपने संबोधन में इन लोगों को कश्मीर में लड़ाई के दौरान मारे जाने का दावा करते हुए उनके प्रति समर्थन भी व्यक्त किया। साथ ही उसने पाकिस्तान और कश्मीर के संबंधों को लेकर भी टिप्पणी की और कहा कि इस रिश्ते को कोई समाप्त नहीं कर सकता।

    इसी भाषण के दौरान उसने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में सक्रिय जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी पर भी तीखा हमला बोला। उसने संगठन पर गंभीर आरोप लगाते हुए उसे अपने विचारों के विपरीत बताया और कश्मीर से जुड़े मुद्दों पर किसी भी प्रकार के समझौते का विरोध किया। उसके बयान में संगठन के प्रति कड़ी आलोचना और राजनीतिक मतभेद स्पष्ट रूप से दिखाई दिए।

    मिली जानकारी के अनुसार यह भाषण आठ जुलाई को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मुजफ्फराबाद में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान दिया गया था। यह कार्यक्रम हिजबुल मुजाहिदीन के पूर्व कमांडर बुरहान वानी की बरसी के अवसर पर आयोजित किया गया था। कार्यक्रम स्थल पर बुरहान वानी और अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी के पोस्टर भी लगाए गए थे। इस आयोजन में मौजूद लोगों के बीच शमशेर खान ने अपना संबोधन दिया, जिसका वीडियो बाद में सामने आया।

    सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे बयान भारत की लंबे समय से व्यक्त उस चिंता के संदर्भ में चर्चा का विषय बनते हैं जिसमें सीमा पार से आतंकवाद को समर्थन मिलने की बात कही जाती रही है। हालांकि किसी भी वीडियो या दावे की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित जांच एजेंसियों द्वारा ही की जा सकती है। ऐसे मामलों में आधिकारिक जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही अंतिम निष्कर्ष निकाला जाता है।

    जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा एजेंसियां लगातार आतंकवाद विरोधी अभियान चला रही हैं और सीमा पार से घुसपैठ रोकने के लिए निगरानी भी बढ़ाई गई है। पिछले कुछ वर्षों में कई आतंकी नेटवर्क को ध्वस्त करने और घुसपैठ की कोशिशों को विफल करने के लिए व्यापक अभियान चलाए गए हैं। सुरक्षा बलों का कहना है कि क्षेत्र में शांति और सामान्य स्थिति बनाए रखना उनकी प्राथमिकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे वीडियो और सार्वजनिक बयान सुरक्षा एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण सूचना स्रोत भी बन सकते हैं। यदि इनमें किए गए दावों की पुष्टि होती है तो यह सीमा पार आतंकवाद से जुड़े नेटवर्क और गतिविधियों को समझने में मदद कर सकते हैं। फिलहाल इस वीडियो और उसमें किए गए दावों को लेकर संबंधित एजेंसियां उपलब्ध तथ्यों और सूचनाओं के आधार पर स्थिति का आकलन कर रही हैं।

  • अमरनाथ यात्रा शुरू होते ही पिघला प्राकृतिक हिमलिंग, पांचवें दिन बाबा बर्फानी के अंतर्ध्यान होने से उठे पर्यावरण और व्यवस्थाओं पर सवाल

    अमरनाथ यात्रा शुरू होते ही पिघला प्राकृतिक हिमलिंग, पांचवें दिन बाबा बर्फानी के अंतर्ध्यान होने से उठे पर्यावरण और व्यवस्थाओं पर सवाल

    नई दिल्ली । इस वर्ष की अमरनाथ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। यात्रा शुरू होने के महज पांच दिन बाद ही अमरनाथ गुफा में बनने वाला प्राकृतिक हिमलिंग पूरी तरह पिघल जाने की जानकारी सामने आई है। इस घटनाक्रम ने जहां श्रद्धालुओं में निराशा पैदा की है, वहीं पर्यावरणीय परिस्थितियों और यात्रा प्रबंधन को लेकर नई चर्चा भी शुरू हो गई है। अमरनाथ यात्रा इस वर्ष 3 जुलाई से आरंभ हुई थी और निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार इसका समापन रक्षाबंधन के अवसर पर होना है।

    प्राकृतिक रूप से बनने वाला हिमलिंग हर वर्ष मौसम, तापमान और गुफा के भीतर मौजूद प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुसार आकार लेता है। सामान्य तौर पर यात्रा के दौरान इसका आकार धीरे-धीरे बदलता रहता है, लेकिन इस बार शुरुआती दिनों में ही इसके पूरी तरह पिघल जाने की सूचना ने सभी का ध्यान आकर्षित किया है। यात्रा के पहले चरण में बड़ी संख्या में श्रद्धालु गुफा तक पहुंचकर दर्शन कर चुके हैं, जबकि आने वाले दिनों में भी हजारों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है।

    यात्रा प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि हिमलिंग का बनना और पिघलना पूरी तरह प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिस पर मानव का प्रत्यक्ष नियंत्रण संभव नहीं है। उनका मानना है कि ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में तापमान, आर्द्रता और मौसम में होने वाले बदलाव का सीधा प्रभाव हिमलिंग के स्वरूप पर पड़ता है। हालांकि इस घटनाक्रम के बाद यात्रा की व्यवस्थाओं और संरक्षण संबंधी उपायों को लेकर भी कई सवाल उठाए जा रहे हैं।

    पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और लगातार बढ़ते तापमान का असर हिमालयी क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। उनके अनुसार पिछले कुछ वर्षों में गर्मी का प्रभाव बढ़ने से ग्लेशियरों और प्राकृतिक बर्फ संरचनाओं के पिघलने की गति तेज हुई है। कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की एक साथ मौजूदगी से स्थानीय तापमान और वातावरण पर सीमित स्तर पर प्रभाव पड़ सकता है, हालांकि इस विषय पर वैज्ञानिक अध्ययन और विस्तृत विश्लेषण की आवश्यकता बनी हुई है।

    उपलब्ध जानकारी के अनुसार मई के अंतिम सप्ताह में हिमलिंग का आकार लगभग सात फीट बताया गया था, जो जून के अंतिम दिनों तक घटकर लगभग पांच फीट रह गया। जुलाई के पहले सप्ताह तक इसके पूरी तरह पिघल जाने की स्थिति सामने आई। इससे पहले भी वर्ष 2013 और 2016 में यात्रा समाप्त होने से पहले हिमलिंग के शीघ्र पिघलने जैसी घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी घटनाएं अब पहले की तुलना में अधिक बार देखने को मिल रही हैं, जो बदलती जलवायु परिस्थितियों की ओर संकेत करती हैं।

    अमरनाथ यात्रा हिंदू धर्म की सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ यात्राओं में शामिल मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इसी पवित्र गुफा में भगवान शिव ने माता पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था। इसी कारण हर वर्ष देश और विदेश से लाखों श्रद्धालु कठिन पर्वतीय मार्ग पार कर यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इस बार भी यात्रा निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार जारी रहेगी। प्रशासन और संबंधित प्रबंधन संस्थाएं श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुविधाओं और यात्रा संचालन को सुचारु बनाए रखने के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं जारी रखे हुए हैं, जबकि पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण पर भी व्यापक चर्चा तेज हो गई है।

  • अजय देवगन की आगामी फिल्म 'चौहान' के टीज़र पर बढ़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद, श्रीनगर के सांसद और क्षत्रिय संगठन ने जताई कड़ी आपत्ति

    अजय देवगन की आगामी फिल्म 'चौहान' के टीज़र पर बढ़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद, श्रीनगर के सांसद और क्षत्रिय संगठन ने जताई कड़ी आपत्ति

    नई दिल्ली । बॉलीवुड अभिनेता अजय देवगन की आगामी एक्शन फिल्म ‘चौहान’ अपने आधिकारिक घोषणा वीडियो के रिलीज होते ही बड़े विवादों के केंद्र में आ गई है। फिल्म के शुरुआती टीज़र में अजय देवगन को एक सैन्य अधिकारी के रूप में दिखाया गया है, जो कश्मीर में कानून-व्यवस्था और पत्थरबाजी की घटनाओं से निपटता नजर आ रहा है। इस वीडियो में दिखाए गए कुछ दृश्यों और संवादों ने राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ सामाजिक संगठनों में भी एक नई बहस को जन्म दे दिया है। विशेष रूप से कश्मीर की संवेदनशीलता और राजपूत समुदाय की ऐतिहासिक विरासत को लेकर फिल्म के निर्माताओं पर सवाल उठाए जा रहे हैं। मुख्यधारा के सिनेमा में संवेदनशील मुद्दों के प्रस्तुतीकरण को लेकर यह विवाद अब गहराता जा रहा है।

    फिल्म के टीज़र में कश्मीरी युवाओं द्वारा की जाने वाली पत्थरबाजी और उसके जवाब में सुरक्षा बलों की कार्रवाई को जिस अंदाज में प्रस्तुत किया गया है, उसने स्थानीय जनप्रतिनिधियों को नाराज कर दिया है। श्रीनगर के सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि फिल्म में दिखाए गए पैलेट गन और सैन्य बल के दृश्य कश्मीर के लोगों के पुराने जख्मों और दर्दनाक अतीत को हरा करने वाले हैं। उन्होंने मुख्यधारा के सिनेमा की आलोचना करते हुए कहा कि कश्मीर के दर्द और वहां की त्रासदी का इस्तेमाल केवल व्यावसायिक और मनोरंजन के उद्देश्यों के लिए एक एक्शन बैकग्राउंड के रूप में नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इसके लिए संवेदनशीलता और गरिमा की आवश्यकता है।

    इस फिल्म को लेकर विवाद केवल कश्मीर की छवि तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी इसका कड़ा विरोध शुरू हो गया है। ‘क्षत्रिय परिषद’ नामक एक प्रमुख संगठन ने फिल्म के शीर्षक और उसमें क्षत्रिय पहचान के इस्तेमाल पर आधिकारिक तौर पर आपत्ति दर्ज कराई है। संगठन का आरोप है कि फिल्म निर्माता नीरज यादव और अभिनेता अजय देवगन राजनीतिक व वैचारिक हितों के लिए चौहान वंश के ऐतिहासिक गौरव का अनुचित उपयोग कर रहे हैं। क्षत्रिय परिषद ने अपने बयान में स्पष्ट किया है कि राजपूत इतिहास संपूर्ण देश की धरोहर है और इसे किसी सांप्रदायिक विमर्श, चुनावी लाभ या व्यावसायिक फिल्म का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए।

    यह विवाद इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसने अजय देवगन की ही पूर्व में आई फिल्म ‘सिंघम अगेन’ की यादें ताजा कर दी हैं, जिसमें कश्मीर की एक बिलकुल अलग और सकारात्मक तस्वीर पेश की थी। उस फिल्म में कश्मीर के युवाओं को विकास, शांति और देश के साथ चलते हुए दिखाया गया था, जिसकी दर्शकों और समीक्षकों ने काफी सराहना की थी। वहीं, दूसरी ओर ‘चौहान’ में फिर से उसी पुरानी और नकारात्मक छवि को उभारा गया है, जिसे लेकर कश्मीरी समाज लंबे समय से असहज रहा है। एक ही अभिनेता द्वारा कश्मीर की दो विपरीत छवियों को पर्दे पर उतारने के इस विरोधाभास ने भी विश्लेषकों का ध्यान खींचा है।

    वर्तमान में फिल्म ‘चौहान’ का केवल शुरुआती प्रचार वीडियो ही सामने आया है और इसकी पूरी शूटिंग तथा निर्माण कार्य होना अभी बाकी है। ऐसे में फिल्म उद्योग के जानकारों का मानना है कि निर्माताओं को व्यावसायिक सफलता और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच एक बारीक संतुलन बनाने की आवश्यकता होगी। राष्ट्रवाद और वीरता के नाम पर बनने वाली फिल्मों में ऐतिहासिक तथ्यों और क्षेत्रीय भावनाओं का सम्मान करना बेहद जरूरी माना जाता है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस बढ़ते देशव्यापी विवाद के बाद फिल्म के निर्माता-निर्देशक अपनी कहानी और दृश्यों की प्रस्तुतीकरण शैली में किसी प्रकार का बदलाव करते हैं या नहीं।

  • जम्मू कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग भारत ने वैश्विक मंच पर पाकिस्तान के प्रचार को किया खारिज

    जम्मू कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग भारत ने वैश्विक मंच पर पाकिस्तान के प्रचार को किया खारिज


    नई द‍िल्‍ली । जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के बासठवें सत्र में भारत ने पाकिस्तान और इस्लामी सहयोग संगठन की ओर से जम्मू कश्मीर को लेकर की गई टिप्पणियों को पूरी तरह खारिज कर दिया। भारत ने स्पष्ट कहा कि जम्मू कश्मीर देश का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है और इस विषय पर किसी भी प्रकार का भ्रम या गलत व्याख्या स्वीकार नहीं की जा सकती। भारतीय प्रतिनिधि ने मंच पर कहा कि पाकिस्तान द्वारा लगाए गए आरोप पूरी तरह बेबुनियाद और गलत इरादों पर आधारित हैं तथा इनका उद्देश्य केवल अंतरराष्ट्रीय समुदाय को गुमराह करना है।

    भारत ने कहा कि पाकिस्तान लंबे समय से अपने घरेलू संकट और आतंकवाद को दिए जा रहे समर्थन से ध्यान भटकाने के लिए ऐसे प्रचार का सहारा लेता रहा है। भारतीय पक्ष ने यह भी कहा कि इस्लामी सहयोग संगठन द्वारा की गई टिप्पणियां तथ्यों पर आधारित नहीं हैं और यह एकतरफा दृष्टिकोण को दर्शाती हैं। भारत ने यह दोहराया कि जम्मू कश्मीर भारत का हिस्सा था और है तथा हमेशा रहेगा और इस वास्तविकता को कोई भी बयान बदल नहीं सकता।

    भारतीय प्रतिनिधि ने यह भी कहा कि असली मुद्दा वह क्षेत्र है जो पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है और जिसे पाकिस्तान अधिकृत जम्मू कश्मीर के रूप में जाना जाता है। भारत ने आरोप लगाया कि वहां दशकों से लोगों के अधिकारों का हनन हो रहा है और सैन्य दबाव के कारण जनता की मूलभूत स्वतंत्रताओं को सीमित किया गया है। भारत ने कहा कि यह स्थिति किसी भी प्रकार से लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है और लगातार असंतोष और अशांति का कारण बनी हुई है।

    भारत ने आगे कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद को अपनी नीति के रूप में इस्तेमाल करता है और फिर खुद को आतंकवाद का शिकार बताने की कोशिश करता है। भारतीय प्रतिनिधि ने इस विरोधाभास को उजागर करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस तरह की दोहरी नीति लंबे समय से देखी जा रही है। भारत ने यह भी कहा कि पाकिस्तान की ओर से किए जा रहे दावे वास्तविकता को नहीं बदल सकते और न ही तथ्यों को छिपा सकते हैं।

    सिंधु जल संधि पर टिप्पणी करते हुए भारत ने कहा कि यह समझौता उस समय की परिस्थितियों में हुआ था जब क्षेत्रीय स्थिति अलग थी लेकिन अब समय बदल चुका है और जल संसाधनों के प्रबंधन को आधुनिक आवश्यकताओं के अनुसार देखना होगा। भारत ने संकेत दिया कि आतंकवाद और सहयोग एक साथ नहीं चल सकते और किसी भी प्रकार की साझेदारी तभी संभव है जब पारस्परिक विश्वास और जिम्मेदारी सुनिश्चित हो।

    भारत ने अपने वक्तव्य में यह भी स्पष्ट किया कि वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर शांति और स्थिरता के पक्ष में है लेकिन किसी भी प्रकार के झूठे प्रचार और राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित बयानों को स्वीकार नहीं करेगा। भारत ने दोहराया कि उसकी प्राथमिकता अपने नागरिकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखना है तथा वह इस दिशा में हर आवश्यक कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध है।

  • पीओके में बढ़ा असंतोष: पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई पर उठे सवाल, स्वतंत्र जांच की मांग तेज

    पीओके में बढ़ा असंतोष: पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई पर उठे सवाल, स्वतंत्र जांच की मांग तेज


    नई दिल्ली । पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में जारी अशांति और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बनते जा रहे हैं। हाल के दिनों में वहां प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई कार्रवाई, गिरफ्तारियों और कथित मौतों को लेकर पाकिस्तान सरकार और उसकी सुरक्षा एजेंसियां आलोचनाओं के घेरे में हैं। खास बात यह है कि इस बार आवाज केवल स्थानीय स्तर से नहीं, बल्कि उन कश्मीरी समूहों की ओर से भी उठ रही है जो लंबे समय से कश्मीर मुद्दे पर अलग रुख रखते आए हैं।

    कश्मीर डायस्पोरा कोएलिशन के अध्यक्ष डॉ. मुबीन शाह ने पीओके की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक है। उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान प्रशासन ने लोगों की आवाज सुनने के बजाय दमन का रास्ता अपनाया है, जिससे क्षेत्र में असंतोष और बढ़ा है। उनका कहना है कि पीओके में हो रही घटनाओं ने नियंत्रण रेखा के दोनों ओर रहने वाले कश्मीरियों को झकझोर दिया है।

    डॉ. शाह ने कहा कि कश्मीरी समाज के लिए यह क्षेत्र केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक महत्व रखता है। ऐसे में वहां आम नागरिकों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई ने लोगों के मन में गहरी नाराजगी पैदा की है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि स्थानीय लोगों की समस्याओं और मांगों को गंभीरता से नहीं लिया गया तो स्थिति और अधिक जटिल हो सकती है।

    पीओके में चल रहे आंदोलन को जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी का समर्थन प्राप्त है। इस आंदोलन के समर्थन में कई प्रवासी कश्मीरी संगठनों ने पाकिस्तान सरकार के सामने 12 सूत्रीय मांग पत्र भी रखा है। इसमें प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग रोकने, गिरफ्तार लोगों की जानकारी सार्वजनिक करने और हिंसा तथा मौतों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग शामिल है। संगठनों का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता जरूरी है तथा नागरिकों की आवाज को दबाने के बजाय संवाद के माध्यम से समाधान तलाशा जाना चाहिए।

    कश्मीर डायस्पोरा कोएलिशन, जो दुनिया के कई देशों में सक्रिय कश्मीरी संगठनों का संयुक्त मंच है, ने भी इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की बात कही है। संगठन का मानना है कि पीओके में मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं से जुड़े सवालों की अनदेखी नहीं की जा सकती। उन्होंने मांग की है कि घटनाओं की स्वतंत्र और विश्वसनीय जांच कराई जाए ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके और यदि किसी स्तर पर अधिकारों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जा सके।

    विश्लेषकों का मानना है कि पीओके में उभर रहा यह असंतोष केवल स्थानीय आर्थिक समस्याओं तक सीमित नहीं रह गया है। यह प्रशासनिक नीतियों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और नागरिक अधिकारों से जुड़े व्यापक मुद्दों का रूप लेता दिखाई दे रहा है। आने वाले समय में पाकिस्तान सरकार इस स्थिति से कैसे निपटती है, इस पर क्षेत्र की राजनीतिक दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।

  • पीओजेके में प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई को लेकर चिंता गहराई, मानवाधिकार और नागरिक सुरक्षा पर फिर छिड़ी बहस

    पीओजेके में प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई को लेकर चिंता गहराई, मानवाधिकार और नागरिक सुरक्षा पर फिर छिड़ी बहस

    नई दिल्ली । पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में हाल के दिनों में सामने आई हिंसक घटनाओं और विरोध प्रदर्शनों के बाद वहां की स्थिति को लेकर नई चिंताएं सामने आई हैं। जम्मू-कश्मीर के विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक वर्गों ने इन घटनाओं को गंभीर मानते हुए नागरिकों की सुरक्षा, मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक अधिकारों के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया है। क्षेत्र में हुई जनहानि और बड़ी संख्या में लोगों के घायल होने की खबरों ने इस मुद्दे को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

    श्रीनगर में राजनीतिक विश्लेषकों और जनप्रतिनिधियों ने पीओजेके की मौजूदा परिस्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वहां लंबे समय से स्थानीय लोगों को विभिन्न प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना है कि क्षेत्र में आम नागरिकों की आवाज को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा और कई बार लोगों की मांगों तथा समस्याओं को बलपूर्वक दबाने के आरोप सामने आते रहे हैं।

    विश्लेषकों के अनुसार हालिया विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से नागरिक सुविधाओं, आर्थिक राहत और बुनियादी अधिकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर किए जा रहे थे। लेकिन प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा और टकराव ने स्थिति को और अधिक संवेदनशील बना दिया। इस घटनाक्रम ने क्षेत्र में प्रशासनिक व्यवस्था और नागरिक अधिकारों को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं।

    कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि पीओजेके का मुद्दा केवल राजनीतिक दृष्टिकोण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मानवीय पहलू भी बेहद महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि किसी भी क्षेत्र में नागरिकों को अपनी बात रखने, शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराने और सुरक्षित वातावरण में जीवन जीने का अधिकार होना चाहिए। यदि इन मूलभूत अधिकारों पर प्रभाव पड़ता है तो उसका व्यापक सामाजिक असर दिखाई देता है।

    इस पूरे मामले पर जम्मू-कश्मीर के कुछ राजनीतिक नेताओं ने भी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि किसी भी परिस्थिति में निहत्थे नागरिकों के खिलाफ हिंसा स्वीकार्य नहीं हो सकती। उन्होंने क्षेत्र में शांति, संवाद और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही यह भी कहा गया कि मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन किया जाना चाहिए।

    विशेषज्ञों का मानना है कि पीओजेके की स्थिति पर लगातार नजर बनाए रखने की जरूरत है। वहां के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हालात को लेकर समय-समय पर विभिन्न रिपोर्टें और प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं। हालिया घटनाओं ने एक बार फिर इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों की समस्याओं और उनकी सुरक्षा को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया है।

    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार किसी भी क्षेत्र में स्थिरता और विकास तभी संभव है जब नागरिकों को न्यायपूर्ण वातावरण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सुरक्षा का भरोसा मिले। इसलिए मौजूदा परिस्थितियों में सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता शांति बहाली, संवाद को बढ़ावा देने और प्रभावित लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मानी जा रही है।

    पीओजेके में हुई हालिया घटनाओं ने यह संकेत दिया है कि क्षेत्र से जुड़े मानवीय और प्रशासनिक मुद्दे अभी भी गंभीर बने हुए हैं। आने वाले समय में वहां की परिस्थितियों और संबंधित पक्षों की प्रतिक्रियाओं पर व्यापक नजर बनी रहने की संभावना है, क्योंकि यह मुद्दा क्षेत्रीय स्थिरता और नागरिक अधिकारों दोनों से जुड़ा हुआ है।

  • अमरनाथ यात्रा को लेकर बड़ा अपडेट, रजिस्ट्रेशन ने पकड़ी रफ्तार; सुरक्षा और सुविधाओं पर जोर

    अमरनाथ यात्रा को लेकर बड़ा अपडेट, रजिस्ट्रेशन ने पकड़ी रफ्तार; सुरक्षा और सुविधाओं पर जोर


    नई दिल्ली । अमरनाथ यात्रा 2026 को लेकर श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखने को मिल रहा है और इसका असर रजिस्ट्रेशन के आंकड़ों में साफ दिखाई दे रहा है। अब तक 3.5 लाख से अधिक भक्त बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए अपना पंजीकरण करा चुके हैं, जिससे यह स्पष्ट है कि इस वर्ष यात्रा को लेकर आस्था और उत्साह दोनों चरम पर हैं। यात्रा 3 जुलाई से शुरू होकर 28 अगस्त तक चलेगी और यह 57 दिनों तक चलेगी, जिसमें देशभर से लाखों श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है।

    प्रशासन और श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड की ओर से यात्रा को सुरक्षित और सुचारू बनाने के लिए तैयारियां तेज कर दी गई हैं। यात्रा मार्गों पर बर्फ हटाने और ट्रैक बहाली का कार्य तेजी से चल रहा है, जिसमें बालटाल और पहलगाम दोनों प्रमुख मार्गों पर कई किलोमीटर तक बर्फ हटाई जा चुकी है। हालांकि अभी भी कुछ ऊंचाई वाले हिस्सों में भारी बर्फ जमा है, जिसे हटाने का काम जारी है। अधिकारियों का मानना है कि जून के मध्य तक दोनों मार्ग पूरी तरह से यात्रा के लिए तैयार कर दिए जाएंगे।

    श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए इस बार कई नए यात्री निवास तैयार किए गए हैं, जहां हजारों यात्रियों के ठहरने और भोजन की व्यवस्था की जा रही है। पहलगाम, बालटाल, सोनमर्ग और बिजबेहड़ा जैसे प्रमुख स्थानों पर सुविधाओं को बेहतर बनाया गया है ताकि यात्रा के दौरान किसी भी तरह की असुविधा न हो। इसके साथ ही मेडिकल सुविधा, पेयजल, बिजली और संचार व्यवस्था को भी मजबूत किया जा रहा है।

    सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी प्रशासन पूरी तरह सतर्क है। यात्रा मार्गों के संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की योजना बनाई गई है और निगरानी व्यवस्था को भी और मजबूत किया जा रहा है। अधिकारियों ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि जो लोग अब तक रजिस्ट्रेशन नहीं करा पाए हैं, वे जल्द से जल्द प्रक्रिया पूरी करें ताकि अंतिम समय में किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।

    इसके साथ ही यात्रियों को मौसम और स्वास्थ्य से जुड़ी सभी आवश्यक सावधानियों का पालन करने की सलाह दी गई है, क्योंकि यह यात्रा कठिन भौगोलिक परिस्थितियों से होकर गुजरती है। बदलते मौसम और ऊंचाई वाले क्षेत्रों को देखते हुए प्रशासन ने सभी तैयारियों को अंतिम रूप देने की दिशा में काम तेज कर दिया है।

    कुल मिलाकर, इस बार अमरनाथ यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं का उत्साह और प्रशासन की तैयारियां दोनों ही उच्च स्तर पर हैं, जिससे उम्मीद की जा रही है कि यह यात्रा अब तक की सबसे व्यवस्थित और सुरक्षित यात्राओं में से एक होगी।