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  • खंडवा में दरिंदगी पर कड़ा प्रहार, दुष्कर्म और हत्या के आरोपी को तिहरा आजीवन कारावास, मौत तक जेल में रहेगा बंद

    खंडवा में दरिंदगी पर कड़ा प्रहार, दुष्कर्म और हत्या के आरोपी को तिहरा आजीवन कारावास, मौत तक जेल में रहेगा बंद


    खंडवा /मध्यप्रदेश के खंडवा जिले से न्याय व्यवस्था का एक बड़ा और सख्त संदेश सामने आया है। हरसूद न्यायालय ने महिला से दुष्कर्म और उसके बाद की गई निर्मम हत्या के मामले में आरोपी हरिराम उर्फ हरि को दोषी ठहराते हुए तिहरा आजीवन कारावास और 30 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। अदालत ने अपराध की क्रूरता और अमानवीयता को देखते हुए स्पष्ट किया कि आरोपी को मृत्यु तक जेल में ही रहना होगा।

    यह फैसला देर शाम सुनाया गया और कोर्ट कक्ष में सन्नाटा छा गया। न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि यदि ऐसे जघन्य अपराध में दोषी को कम दंड दिया जाता है तो समाज में गलत संदेश जाएगा और अपराधियों के हौसले बुलंद होंगे। इसलिए आरोपी को भारतीय न्याय संहिता की धारा 66, 70(1) और 103(1) के तहत दोषी पाते हुए प्रत्येक धारा में आजीवन कारावास तथा 10-10 हजार रुपये जुर्माने की सजा दी गई। इस प्रकार तीनों सजाएं मिलाकर आरोपी को तिहरा आजीवन कारावास अर्थात मृत्यु तक कारावास भुगतना होगा।

    अभियोजन पक्ष के वकील जाहिद अहमद के अनुसार घटना 23 मई 2025 की है। खालवा थाना क्षेत्र की रोशनी पुलिस चौकी को सूचना मिली थी कि शादी समारोह में गई एक महिला रात भर घर नहीं लौटी। अगली सुबह गांव की एक वृद्ध महिला ने उसे एक घर के पीछे खून से सने कपड़ों में जमीन पर पड़ा देखा। घर लाए जाने पर पीड़िता ने बताया कि गांव के ही हरिराम ने उसके साथ गलत काम किया है।

    घटना की भयावहता यहीं समाप्त नहीं हुई। घर की अन्य महिलाओं ने देखा कि पीड़िता गंभीर रूप से घायल थी और उसके शरीर पर गहरे घाव थे। कुछ ही देर बाद उसकी हालत बिगड़ गई और उसने दम तोड़ दिया। पुलिस ने तत्काल मामला दर्ज कर जांच शुरू की। जांच के दौरान डीएनए रिपोर्ट पॉजिटिव पाई गई, जिससे आरोपी के खिलाफ मजबूत साक्ष्य मिले।

    मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने वैज्ञानिक और तकनीकी साक्ष्यों को एकत्रित कर अदालत में प्रस्तुत किया। अभियोजन पक्ष ने ठोस तर्कों और प्रमाणों के आधार पर आरोपी के अपराध को सिद्ध किया। न्यायालय ने भी अपने फैसले में कहा कि यह अपराध न केवल पीड़िता के प्रति बल्कि पूरे समाज के प्रति अत्यंत क्रूर कृत्य है।

    इस फैसले को जिले में न्याय की मिसाल के रूप में देखा जा रहा है। सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों ने अदालत के निर्णय का स्वागत किया है। लोगों का कहना है कि ऐसे कठोर निर्णय ही समाज में कानून के प्रति विश्वास को मजबूत करते हैं और अपराधियों में भय पैदा करते हैं।

    खंडवा में आए इस फैसले ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि न्यायालय गंभीर अपराधों में किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरतेगा। यह निर्णय न केवल पीड़िता को न्याय दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण है बल्कि समाज को यह संदेश भी देता है कि कानून से बड़ा कोई नहीं।

  • खंडवा के 7 गांवों में ज़हरीला पानी बना अभिशाप, फ्लोराइड संकट पर कांग्रेस हमलावर; बीजेपी विधायक मीडिया सवालों से बचते नजर आए

    खंडवा के 7 गांवों में ज़हरीला पानी बना अभिशाप, फ्लोराइड संकट पर कांग्रेस हमलावर; बीजेपी विधायक मीडिया सवालों से बचते नजर आए


    खंडवा । मध्यप्रदेश के खंडवा जिले में पीने के पानी को लेकर एक गंभीर स्वास्थ्य संकट सामने आया है। किल्लौद ब्लॉक के सात गांवों में लोग लंबे समय से फ्लोराइड युक्त पानी पीने को मजबूर हैं। पानी में फ्लोराइड की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंचने के बावजूद न तो प्रशासन ने ठोस कदम उठाए और न ही जनप्रतिनिधियों की ओर से कोई स्पष्ट जवाब सामने आया है। इस मुद्दे को लेकर अब सियासत भी तेज हो गई है।

    कांग्रेस ने खंडवा में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर प्रशासन और सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि किल्लौद ब्लॉक के ग्रामीण कई दिनों से दूषित और फ्लोराइड युक्त पानी पी रहे हैं जिससे उन्हें गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारी केवल औपचारिकता निभाते हुए हैंडपंप और ट्यूबवेल पर लाल निशान लगाकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं। न तो स्वास्थ्य विभाग की ओर से ग्रामीणों की मेडिकल जांच कराई गई और न ही पीने के सुरक्षित पानी की कोई वैकल्पिक व्यवस्था की गई।कांग्रेस ने सवाल उठाया कि क्या प्रशासन किसी बड़ी त्रासदी का इंतजार कर रहा है जैसा कि हाल ही में इंदौर में देखने को मिला। नेताओं ने कहा कि हादसे के बाद नेता और अधिकारी पीड़ित परिवारों के यहां पहुंचकर संवेदनाएं जताते हैं लेकिन समय रहते अगर व्यवस्था सुधारी जाए तो ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है। कांग्रेस का आरोप है कि ग्रामीणों की सेहत के साथ खुला खिलवाड़ किया जा रहा है।

    इस पूरे मामले पर जब स्थानीय बीजेपी विधायक नारायण पटेल से मीडिया ने सवाल पूछे तो उनका रवैया और भी विवादों में आ गया। पहले अन्य मुद्दों पर मीडिया से बातचीत करने वाले विधायक जैसे ही किल्लौद ब्लॉक में फ्लोराइड युक्त पानी का सवाल सामने आया बिना कोई जवाब दिए वहां से चले गए। मीडियाकर्मी लगातार सवाल पूछते रहे लेकिन विधायक ने चुप्पी साधे रखी। उनके इस रवैये ने न केवल विपक्ष बल्कि आम लोगों में भी नाराजगी बढ़ा दी है।ग्रामीणों का कहना है कि फ्लोराइड की अधिक मात्रा ने उनकी जिंदगी मुश्किल कर दी है। कई गांवों में पानी में फ्लोराइड की मात्रा 2.0 से 5.0 पीपीएम तक पाई गई है जबकि सुरक्षित सीमा इससे कहीं कम मानी जाती है। इसके चलते लोग फ्लोरोसिस दांत गिरने आंखों की रोशनी कमजोर होने बाल सफेद होने और जोड़ों में असहनीय दर्द जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। कई परिवारों में बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।

    ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला। साफ पानी की मांग और स्वास्थ्य जांच की अपील सिर्फ आश्वासनों तक सीमित रह गई है।यह मामला केवल पानी की गुणवत्ता का नहीं बल्कि शासन-प्रशासन की जवाबदेही और संवेदनशीलता का भी है। सवाल यह है कि क्या किसी बड़ी जनहानि के बाद ही कार्रवाई होगी या फिर समय रहते ग्रामीणों को इस धीमे जहर से बचाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे। फिलहाल किल्लौद के गांवों में रहने वाले लोग उम्मीद और चिंता के बीच अपनी जिंदगी जीने को मजबूर हैं।

  • बांध से अचानक छोड़ा गया पानी, खेड़ी घाट में नदी के बीच फंसे 10 से ज्यादा मजदूर, टली बड़ी त्रासदी

    बांध से अचानक छोड़ा गया पानी, खेड़ी घाट में नदी के बीच फंसे 10 से ज्यादा मजदूर, टली बड़ी त्रासदी


    खंडवा जिले के खेड़ी घाट क्षेत्र में उस समय हड़कंप मच गयाजब ओंकारेश्वर बांध से अचानक बड़ी मात्रा में पानी छोड़े जाने के कारण नर्मदा नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ गया। इस दौरान रेलवे स्टेशन ओंकारेश्वर रोड से बड़वाह के बीच मोरटक्का-खेड़ी घाट पर चल रहे पुल निर्माण कार्य में लगे 10 से अधिक मजदूर और इंजीनियर नदी के बीच फंस गए। हालात कुछ ही पलों में गंभीर हो गएलेकिन स्थानीय नाविकों और गोताखोरों की सूझबूझ और तत्परता से सभी को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। यदि पानी का बहाव कुछ और बढ़ जातातो यह घटना एक बड़ी जनहानि में बदल सकती थी।

    पुल निर्माण स्थल पर मची अफरातफरी


    खेड़ी घाट पर नर्मदा नदी पर पुराने पुल को तोड़कर मंगलम कंपनी द्वारा नए पुल का निर्माण किया जा रहा है। इसके लिए नदी के दोनों किनारों को जोड़ने वाली एप्रोच रोड बनाई गई हैपिलर खड़े किए जा रहे हैं और भारी मशीनें नदी के अंदर काम कर रही हैं। शनिवार को भी मजदूर रोज़ की तरह निर्माण कार्य में जुटे थे। इसी दौरान ओंकारेश्वर बांध से अचानक पानी छोड़े जाने से नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ने लगा और देखते ही देखते मजदूरों का रास्ता कट गया।पानी बढ़ते ही मौके पर अफरातफरी मच गई। कुछ मजदूर ऊंचे पिलरों और चट्टानों पर चढ़ गएजबकि कुछ लोग बहाव के बीच फंस गए। गनीमत यह रही कि आसपास मौजूद नाविकों को स्थिति की जानकारी मिल गई और उन्होंने तुरंत राहत कार्य शुरू किया।

    नाविकों ने दिखाया साहस


    स्थानीय नाविकों और गोताखोरों ने बिना देर किए अपनी जान जोखिम में डालकर सभी मजदूरों और इंजीनियरों को सुरक्षित बाहर निकाला। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसारअगर कुछ मिनट की भी देरी हो जातीतो पानी का बहाव इतना तेज हो सकता था कि किसी को बचाना मुश्किल हो जाता। इस त्वरित कार्रवाई से एक बड़ा हादसा टल गया।

    कंपनी प्रबंधन ने जताई नाराजगी


    मंगलम कंपनी के मैनेजर पंकज पटेल ने ओंकारेश्वर बांध प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि बांध प्रबंधन जितना पानी छोड़े जाने की सूचना देता हैअसल में उससे कहीं ज्यादा पानी छोड़ा जाता है। इससे पहले भी कंपनी को इस कारण करोड़ों रुपये का नुकसान हो चुका है और इस बार तो मजदूरों की जान पर बन आई थी।उन्होंने बताया कि कंपनी की ओर से कई बार शासन-प्रशासन और बांध प्रबंधन को लिखित और मौखिक रूप से सूचित किया गया है कि यदि अधिक मात्रा में पानी छोड़ा जाना होतो कम से कम दो दिन पहले स्पष्ट और सही जानकारी दी जाए। लेकिन अब तक कोई प्रभावी सूचना प्रणाली लागू नहीं की गई है।

    स्थानीय लोगों और व्यापारियों को भी नुकसान


    अचानक जलस्तर बढ़ने का असर सिर्फ निर्माण स्थल तक सीमित नहीं रहा। खेड़ी घाट क्षेत्र में नर्मदा तट पर स्थित कई छोटी दुकानें पानी में डूब गईंजिससे स्थानीय व्यापारियों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। स्थानीय निवासी दशरथ केवटमुकेश शुक्ला और सत्यदेव जोशी ने बताया कि कई बार दिन या रात किसी भी समय अचानक पानी छोड़ दिया जाता हैजिसकी कोई पूर्व जानकारी नहीं मिलती। उनका कहना है कि श्रद्धालुमजदूर और पर्यटक अक्सर नदी किनारे या चट्टानों पर फंस जाते हैं। समय पर नाविक न पहुंचेंतो बड़ी दुर्घटना हो सकती है।

    सूचना व्यवस्था पर सवाल


    स्थानीय लोगों का आरोप है कि बांध प्रबंधन केवल यह कहकर जिम्मेदारी से बच जाता है कि प्रशासन को सूचना दे दी गई है। लेकिन कितना पानी छोड़ा जाएगाजलस्तर कितनी तेजी से बढ़ेगा और निचले इलाकों पर इसका क्या असर पड़ेगाइसकी स्पष्ट जानकारी न तो निर्माण कंपनियों को मिलती है और न ही आम जनता को।इस मामले में ओंकारेश्वर बांध परियोजना के प्रमुख एवं महाप्रबंधक धीरेंद्र दीक्षित से संपर्क करने की कोशिश की गईलेकिन उनका फोन रिसीव नहीं हुआ। इससे बांध प्रबंधन की जवाबदेही पर और सवाल खड़े हो गए हैं। यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी ओंकारेश्वर क्षेत्र में श्रद्धालु और स्थानीय लोग चट्टानों पर फंस चुके हैंजिन्हें नाविकों ने बचाया था। बावजूद इसकेव्यवस्था में कोई ठोस सुधार नजर नहीं आ रहा है। यदि समय रहते प्रभावी सूचना प्रणाली लागू नहीं की गईतो भविष्य में किसी बड़ी त्रासदी से इनकार नहीं किया जा सकता।

  • कलेक्टर–CEO के दावों की परतें खुलीं: राष्ट्रपति अवॉर्ड के पीछे का सच, जांच टीम के सामने बेनकाब हुआ ‘जल संरक्षण’ का फर्जीवाड़ा

    कलेक्टर–CEO के दावों की परतें खुलीं: राष्ट्रपति अवॉर्ड के पीछे का सच, जांच टीम के सामने बेनकाब हुआ ‘जल संरक्षण’ का फर्जीवाड़ा



    खंडवा। खंडवा जिले को जल संरक्षण के नाम पर मिले राष्ट्रपति पुरस्कार को लेकर बड़ा खुलासा सामने आया है। जहां एक चर्चित अखबार के पड़ताल के बाद भोपाल से सीनियर आईएएस दिनेश कुमार जैन के नेतृत्व में दो सदस्यीय जांच दल मंगलवार को खंडवा पहुंचा और मौके पर जाकर तथाकथित जल संरचनाओं का ‘रियलिटी चेक’ किया। जांच के दौरान जो सामने आया, उसने प्रशासन के दावों की पोल खोल दी।

    जांच दल चर्चित अखबार के रिपोर्ट के आधार परहरसूद जनपद समेत कई गांवों में पहुंचा।

    कहीं कागजों में तालाब मिले, तो जमीन पर सिर्फ मिट्टी का ढेर। कहीं 6 फीट गहरे सोख्ता गड्ढों का दावा था, लेकिन हकीकत में 1 फीट से भी कम गहराई निकली। टीम ने किसानों और ग्रामीणों से बात की, खुद गड्ढे खुदवाकर देखे और कई जगह देखकर चौंक गई।

    डोटखेड़ा गांव में खेत के बीच कागजों में तालाब दिखाया गया था, लेकिन मौके पर कोई जल संरचना नहीं मिली। सिर्फ मिट्टी फैलाकर तालाब का रूप देने की कोशिश की गई थी।

    पलानी माल गांव में ग्रामीणों ने खुद अधिकारियों को उन जगहों पर ले जाकर दिखाया, जहां सरकारी रिकॉर्ड और जमीन की सच्चाई बिल्कुल अलग थी। आंगनवाड़ी भवन में रूफ वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम अधूरा मिला, पाइप ही गायब था। आरोग्य केंद्र में सोख्ता गड्ढा नाममात्र का निकला, जिसे बारिश में ओवरफ्लो के बाद तोड़ दिया गया था।

    सबसे चौंकाने वाला मामला शाहपुरा माल गांव में सामने आया, जहां जांच दल के आने की सूचना मिलते ही पंचायत सचिव ने सुबह-सुबह जेसीबी से नया गड्ढा खुदवा दिया।

    जबकि रिकॉर्ड में उसका भुगतान पहले ही हो चुका था। तय साइज 10×10 फीट था, लेकिन मौके पर सिर्फ 1 फीट गहरा गड्ढा मिला, वो भी खेत के ऐसे कोने में जहां उसका कोई मतलब नहीं था।

    पूरा मामला तब उजागर हुआ जब 11 नवंबर को केंद्र सरकार ने खंडवा जिले को जल संरक्षण के लिए नेशनल वाटर अवॉर्ड और 2 करोड़ रुपये देने की घोषणा की। प्रशासन ने 1.29 लाख जल संरचनाओं के निर्माण का दावा किया था। लेकिन जांच में सामने आया कि कई तालाब, डक वैल और स्टॉप डैम सिर्फ कागजों में थे। कुछ तस्वीरें तो एआई द्वारा जनरेटेड पाई गईं। कहीं 150 सोख्ता गड्ढे दिखाए गए, तो जमीन पर 1–2 फीट के गड्ढे या सिर्फ पाइप नजर आए। कहीं 11 तालाबों का दावा था, लेकिन एक भी मौजूद नहीं था।

    अखबार के खुलासे के बाद अब भोपाल की टीम इन फर्जीवाड़ों की आधिकारिक तस्दीक कर रही है।

    साफ है कि खंडवा को मिला यह पुरस्कार जल संरक्षण की सफलता नहीं, बल्कि कागजी आंकड़ों और झूठे दावों पर खड़ा किया गया अब तक का सबसे बड़ा सरकारी भ्रम साबित हो रहा है।

    खंडवा के नारायण नगर इलाके में सामने आया मामला जल संरक्षण के नाम पर किए गए फर्जीवाड़े की एक और बानगी बन गया है।

    यहां रहने वाली शिक्षिका संध्या राजपूत को उच्च अधिकारियों की ओर से निर्देश दिया गया था कि वह अपने घर पर वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगवाएं। लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली।

    जांच में सामने आया कि संध्या राजपूत के घर पर कोई वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम मौजूद नहीं था। इसके बजाय उनके घर से कुछ मकान दूर स्थित एक अन्य घर की छत से लगी पाइप को ही वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बताकर पेश कर दिया गया। यह पाइप दरअसल छत का पानी सीधे नाली में पहुंचाने के लिए लगाई गई थी, जिसका जल संरक्षण या रिचार्ज से कोई लेना-देना नहीं था।

    इसके बावजूद उसी मकान की फोटो खींचकर प्रशासन को सौंप दी गई और कागजों में इसे वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के रूप में दर्ज कर दिया गया। यह मामला साफ तौर पर दिखाता है कि कैसे जमीनी हकीकत को दरकिनार कर सिर्फ फोटो और फाइलों के सहारे योजनाओं की सफलता दिखाई गई, जबकि वास्तविकता में जल संरक्षण का कोई काम नहीं हुआ।