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  • जब किशोर कुमार ने अपनी मोरिस माइनर को जमीन में दफना दिया, वजह थी जिंदगी का सबसे भावुक दौर

    जब किशोर कुमार ने अपनी मोरिस माइनर को जमीन में दफना दिया, वजह थी जिंदगी का सबसे भावुक दौर


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के महान गायक और अभिनेता किशोर कुमार अपनी आवाज और अभिनय के लिए जितने मशहूर थे उतने ही अपने अनोखे और अलग मिजाज के लिए भी जाने जाते थे। उनकी जिंदगी से जुड़े कई किस्से आज भी लोगों को हैरान करते हैं। किशोर कुमार कब क्या कर दें इसका अंदाजा उनके करीब रहने वाले लोग भी नहीं लगा पाते थे। उनकी जिंदगी का एक ऐसा ही किस्सा उनकी पहली कार से जुड़ा है जिसे उन्होंने किसी गैराज में खड़ा करने या बेचने के बजाय अपने ही बंगले के अंदर दफना दिया था। इस घटना के पीछे की वजह जानेंगे तो शायद किशोर कुमार के भावुक व्यक्तित्व का एक अलग पहलू सामने आएगा।

    इस किस्से का खुलासा किशोर कुमार के बेटे अमित कुमार ने किया था। अमित कुमार किशोर कुमार और उनकी पहली पत्नी रूमा गुहा ठाकुरता के बेटे हैं। रूमा खुद भी गायिका और अभिनेत्री थीं। किशोर कुमार और रूमा ने साल 1950 में शादी की थी। दोनों का रिश्ता करीब आठ साल चला और 1958 में उनका तलाक हो गया। इसी रिश्ते से जुड़ी एक भावुक याद किशोर कुमार की मोरिस माइनर कार थी।

    अमित कुमार के मुताबिक जब उनके माता पिता का तलाक हो रहा था उस समय किशोर कुमार ने अपनी मोरिस माइनर कार को अपने बंगले में ही दफन करवा दिया था। यह कोई साधारण कार नहीं थी बल्कि किशोर कुमार की जिंदगी के एक खास दौर की निशानी थी। उन्होंने यह गाड़ी अपनी पहली फिल्म आंदोलन के समय खरीदी थी। उस वक्त वह बतौर हीरो अपने फिल्मी करियर की शुरुआत कर रहे थे और इस कार का संबंध उनकी पत्नी रूमा से भी जुड़ा हुआ था।

    यही वजह थी कि तलाक के दौर में किशोर कुमार ने उस कार को अपने पास रखने के बजाय जमीन के अंदर दफन करवा दिया। यह फैसला उनके व्यक्तित्व और बीती यादों से खुद को अलग करने के उनके अनोखे तरीके को दिखाता है। जिस कार के साथ उनके जीवन के शुरुआती संघर्ष और परिवार की यादें जुड़ी थीं उसे उन्होंने अपने ही बंगले में हमेशा के लिए दफन कर दिया।

    किशोर कुमार की निजी जिंदगी की बात करें तो उन्होंने चार शादियां की थीं। उनकी पहली शादी रूमा गुहा ठाकुरता से हुई थी। इसके बाद उनका नाम मधुबाला सहित कई चर्चित अभिनेत्रियों से जुड़ा। हालांकि उनके बेटे अमित कुमार ने हमेशा अपने पिता की निजी जिंदगी को उनका व्यक्तिगत मामला बताया। उन्होंने कहा था कि किशोर कुमार परिवार को बेहद महत्व देते थे और वह एक फैमिली मैन थे लेकिन लोगों ने उन्हें कई बार गलत समझा।

    रूमा गुहा ठाकुरता भी अपने दौर की जानी मानी कलाकार थीं। उन्होंने कई फिल्मों में काम किया था। दोनों के रिश्ते में समय के साथ मतभेद बढ़ते गए और आखिरकार दोनों अलग हो गए। बताया जाता है कि किशोर कुमार चाहते थे कि रूमा अपना करियर छोड़कर परिवार पर ध्यान दें जबकि रूमा अपने अभिनय और गायन के करियर को जारी रखना चाहती थीं। यही मतभेद उनके रिश्ते में तनाव की एक वजह माना जाता है।

    किशोर कुमार और रूमा के रिश्ते से जुड़ा एक और चर्चित दावा फिल्म अभिमान को लेकर भी किया जाता है। कहा जाता है कि अमिताभ बच्चन और जया बच्चन की इस फिल्म की कहानी किशोर कुमार और रूमा के रिश्ते से प्रेरित थी। हालांकि इस तरह के दावों को लेकर अलग अलग बातें सामने आती रही हैं।

    रूमा ने किशोर कुमार से अलग होने के बाद दूसरी शादी की और उनके दो बच्चे हुए। साल 2019 में उनका निधन हो गया। वहीं किशोर कुमार की आवाज और उनकी जिंदगी से जुड़े अनगिनत किस्से आज भी उनके प्रशंसकों के बीच उन्हें एक बेहद अनोखा और यादगार कलाकार बनाए हुए हैं। अपनी पहली कार को दफन करने का यह किस्सा भी उनकी जिंदगी की उन घटनाओं में शामिल है जो बताते हैं कि किशोर कुमार सिर्फ एक महान कलाकार ही नहीं बल्कि बेहद भावुक और अपने ही अंदाज में जिंदगी जीने वाले इंसान भी थे।

  • किशोर कुमार केवल गायक नहीं, सम्पूर्ण कला संस्थान थे : राज्य मंत्री लोधी

    किशोर कुमार केवल गायक नहीं, सम्पूर्ण कला संस्थान थे : राज्य मंत्री लोधी


    भोपाल।
    मध्य प्रदेश की यह पुण्यधरा अनेक महान विभूतियों की जन्म एवं कर्मस्थली रही है। हमें गर्व है कि इसी माटी ने भारतीय सिनेमा को एक ऐसा अनुपम कलाकार दिया, जिसकी प्रतिभा का कोई एक परिचय पर्याप्त नहीं हो सकता। किशोर कुमार केवल एक पार्श्वगायक नहीं थे, वे अपने आप में एक संपूर्ण कला संस्थान थे। उनकी आवाज में भावों की ऐसी अद्भुत विविधता थी, जो प्रेम, विरह, हास्य, करुणा, उत्साह और जीवन-दर्शन को सहजता से अभिव्यक्त कर देती थी।

    यह विचार मध्य प्रदेश के संस्कृति एवं पर्यटन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) धर्मेन्द्र भाव सिंह लोधी ने व्यक्त किए। राज्य मंत्री लोधी मंगलवार की शाम भोपाल के रवीन्द्र भवन मे हरफनमौला कलाकार स्वर्गीय किशोर कुमार की स्मृति में आयोजित संगीत संध्या ‘ये शाम मस्तानी’ को संबोधित कर रहे थे।

    उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की सांस्कृतिक चेतना तभी जीवंत रहती है, जब वह अपने महापुरुषों और महान कलाकारों के अतुलनीय योगदान को नई पीढ़ी तक निरंतर पहुँचाए। इसी विचार को आत्मसात करते हुए संस्कृति विभाग द्वारा भारतीय सिनेमा के शिखर पुरुष स्वर्गीय किशोर कुमार की जन्मस्मृति में लगातार दस वर्षों से संगीत संध्या का गरिमामय आयोजन किया जा रहा है।

    राज्य मंत्री लोधी ने कहा कि यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारतीय फिल्म संगीत की उस अमूल्य विरासत को नमन है, जिसने दशकों से करोड़ों श्रोताओं को स्वर और संवेदना से बांधे रखा है।

    राज्य मंत्री लोधी के साथ संस्कृति संचालक एन.पी. नामदेव और उप संचालक डॉ. पूजा शुक्ला ने दीप प्रज्ज्वलित कर संगीत संध्या का शुभारंभ किया। इस अवसर पर राज्य मंत्री लोधी ने अंतर-महाविद्यालयीन संगीत प्रतियोगिता के विजेता एलएनसीटी ग्रुप के ‘आगाज़ बैंड’ और सेज यूनिवर्सिटी के बैंड के प्रतिभावान युवाओं को प्रमाण-पत्र प्रदान कर सम्मानित भी किया गया।

    सुविख्यात संगीत निर्देशक व गायक अनु मलिक तथा ‘के फॉर किशोर’ के विजेता सुप्रसिद्ध गायक अनिल श्रीवास्तव का श्रोताओं ने आत्मीय स्वागत किया। गीत-संगीत की इस सुरमयी शाम की शुरुआत विख्यात संगीतकार अनु मलिक ने की। उन्होंने भोपाल को तहज़ीब का शहर बताते हुए संस्कृति विभाग का आभार जताया और किशोर दा को स्मरण करते हुए अपने लोकप्रिय गीत “ये काली-काली आँखें…” से गायन की शुरुआत की। उन्होंने “एक गरम चाय की प्याली हो”, “जवानी फिर न आए” और “ऊंची है बिल्डिंग” जैसे उत्साही गीतों से दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया।

    इसके पश्चात् गायक अनिल श्रीवास्तव ने मंच संभालते हुए कार्यक्रम के शीर्षक गीत “ये शाम मस्तानी…” से समां बांधा। उन्होंने “रिमझिम गिरे सावन”, “एक अजनबी हसीना से”, “मेरे सामने वाली खिड़की में”, “ये जो मोहब्बत है” और “सलाम-ए-इश्क़” जैसे सदाबहार नगमे प्रस्तुत कर भोपाल के संगीत प्रेमियों को भावविभोर कर दिया।

    इस संगीत संध्या की विशेष उपलब्धि युवा प्रतिभाओं की ऊर्जावान सहभागिता रही। संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित अंतर-महाविद्यालयीन संगीत प्रतियोगिता के माध्यम से भोपाल की युवा प्रतिभाओं को यह प्रतिष्ठित मंच प्रदान किया गया। सेज यूनिवर्सिटी बैंड ने “हाल क्या है दिलों का”, “हमें तुमसे प्यार कितना”, “ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे” और “ओम शांति ओम” को नवीन अंदाज़ में पेश किया। वहीं एलएनसीटी के ‘आगाज़ बैंड’ ने “बचना ए हसीनों”, “नीले-नीले अंबर पर”, “मेरे सपनों की रानी” और “ओ मेरे दिल के चैन” जैसे कालजयी गीतों की धमाकेदार प्रस्तुतियां देकर खूब तालियां बटोरीं। देर रात तक चले इस सांस्कृतिक उत्सव में बड़ी संख्या में उपस्थित संगीत रसिकों ने किशोर दा के गीतों का भरपूर रसास्वादन किया।

  • आवाज के जादूगर ही नहीं बड़े दिल वाले इंसान भी थे किशोर कुमार फीस लेने के बाद जो किया उसने जीत लिया हर किसी का दिल

    आवाज के जादूगर ही नहीं बड़े दिल वाले इंसान भी थे किशोर कुमार फीस लेने के बाद जो किया उसने जीत लिया हर किसी का दिल


    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के महान गायक और अभिनेता किशोर कुमार अपनी अनोखी गायकी बेहतरीन अभिनय और मस्तमौला स्वभाव के लिए हमेशा याद किए जाते हैं। उनकी जिंदगी से जुड़े कई ऐसे किस्से हैं जो आज भी लोगों को हैरान कर देते हैं। ऐसा ही एक किस्सा उनकी दरियादिली और बड़े दिल का है जिसने यह साबित कर दिया कि उनके लिए रिश्ते और इंसानियत पैसों से कहीं ज्यादा मायने रखते थे।

    यह घटना उस समय की है जब निर्देशक सुधाकर शर्मा अपनी फिल्म का निर्माण कर रहे थे। वह चाहते थे कि फिल्म का एक खास गीत किशोर कुमार अपनी आवाज में गाएं। सुधाकर शर्मा पहले कई वर्षों तक किशोर कुमार के साथ सहायक के रूप में काम कर चुके थे इसलिए उन्हें उम्मीद थी कि पुराने संबंधों को देखते हुए किशोर कुमार आसानी से तैयार हो जाएंगे।

    जब उन्होंने किशोर कुमार से फिल्म में गाना गाने का अनुरोध किया तो किशोर कुमार ने मुस्कुराते हुए कहा कि वह गीत जरूर गाएंगे लेकिन इसके लिए उन्हें पूरे 17 हजार रुपये फीस चाहिए और एक रुपया भी कम स्वीकार नहीं करेंगे। उस दौर में यह रकम काफी बड़ी मानी जाती थी। यह सुनकर सुधाकर शर्मा हैरान रह गए क्योंकि उन्हें लगा था कि वर्षों पुराने रिश्ते की वजह से फीस में रियायत मिल सकती है।

    इसके बावजूद उन्होंने किसी तरह रकम की व्यवस्था की और रिकॉर्डिंग की तैयारी पूरी की। तय समय पर किशोर कुमार स्टूडियो पहुंचे और पूरे मन से गीत रिकॉर्ड किया। बताया जाता है कि गीत की रिकॉर्डिंग पूरी होने के बाद उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि जब इतने पैसे लिए हैं तो एक अंतरा और रिकॉर्ड करवा लो। स्टूडियो में मौजूद सभी लोग उनकी बात सुनकर मुस्कुरा उठे।

    रिकॉर्डिंग खत्म होने के बाद सुधाकर शर्मा ने 17 हजार रुपये किशोर कुमार को सौंप दिए। किशोर कुमार ने पैसे अपने पास रख लिए लेकिन जैसे ही वह स्टूडियो से निकलने लगे उन्होंने चुपचाप पूरी रकम वापस सुधाकर शर्मा को लौटा दी। इतना ही नहीं उन्होंने उनसे कहा कि किसी को भी यह मत बताना कि मैंने पैसे वापस कर दिए हैं। घर जाकर यह रकम अपनी पत्नी को दे देना क्योंकि फिल्म बनाना आसान काम नहीं होता और परिवार की जिम्मेदारियां भी साथ चलती हैं।

    किशोर कुमार का यह व्यवहार देखकर सुधाकर शर्मा भावुक हो गए। उन्हें समझ आ गया कि फीस मांगना शायद केवल उनकी आर्थिक स्थिति को समझने और उनकी मदद करने का एक तरीका था। बिना किसी दिखावे के सहायता करना किशोर कुमार की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक थी।

    किशोर कुमार ने अपने करियर में हजारों गीत गाए और राजेश खन्ना अमिताभ बच्चन देव आनंद ऋषि कपूर जैसे कई बड़े सितारों की आवाज बने। उन्हें आठ फिल्मफेयर पुरस्कार मिले और आज भी उनके गीत हर पीढ़ी के लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। लेकिन उनकी महानता केवल उनकी गायकी तक सीमित नहीं थी बल्कि उनके व्यक्तित्व में छिपी संवेदनशीलता और उदारता भी उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बनाती है।

    आज भी जब किशोर कुमार का नाम लिया जाता है तो उनकी अमर आवाज के साथ ऐसे प्रेरणादायक किस्से भी याद आते हैं जो बताते हैं कि असली महानता केवल सफलता से नहीं बल्कि बड़े दिल और नेक इंसानियत से हासिल होती है।

  • जब अपनी ही फिल्म के फ्लॉप होने की दुआ मांगने लगे थे किशोर कुमार किस्मत ने बना दिया सुपरहिट

    जब अपनी ही फिल्म के फ्लॉप होने की दुआ मांगने लगे थे किशोर कुमार किस्मत ने बना दिया सुपरहिट


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के महान गायक अभिनेता और निर्माता किशोर कुमार अपनी शानदार गायकी के साथ साथ अपने अनोखे स्वभाव और मजेदार किस्सों के लिए भी जाने जाते थे। उनके जीवन से जुड़ी कई घटनाएं आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी रहती हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प किस्सा उनकी सुपरहिट फिल्म चलती का नाम गाड़ी से जुड़ा है। कहा जाता है कि इस फिल्म के निर्माण के दौरान किशोर कुमार चाहते थे कि उनकी अपनी ही फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो जाए। हालांकि किस्मत को कुछ और ही मंजूर था और यही फिल्म बाद में उनकी सबसे बड़ी सफलताओं में शामिल हो गई।

    बताया जाता है कि वर्ष 1958 के दौरान किशोर कुमार आयकर से जुड़े मामलों में उलझे हुए थे। उन पर टैक्स का बड़ा बकाया था और इसी परेशानी से निकलने के लिए उन्होंने एक अलग ही योजना बनाई। उनका विचार था कि यदि वह एक ऐसी फिल्म बनाएंगे जो बॉक्स ऑफिस पर असफल हो जाएगी तो उन्हें भारी आर्थिक नुकसान होगा। इस नुकसान को आय में समायोजित करके टैक्स का बोझ कम किया जा सकेगा।

    इसी सोच के साथ उन्होंने निर्देशक सत्येन बोस के साथ मिलकर चलती का नाम गाड़ी का निर्माण शुरू किया। फिल्म में मधुबाला को मुख्य भूमिका दी गई जबकि किशोर कुमार अपने भाइयों के साथ पर्दे पर नजर आए। इस फिल्म का निर्माण हिंदी के साथ साथ बंगाली भाषा में भी किया गया जहां इसे लुकचुरी नाम से रिलीज किया गया।

    कहा जाता है कि किशोर कुमार मन ही मन यही चाहते थे कि फिल्म दर्शकों को पसंद न आए और उनकी योजना सफल हो जाए। लेकिन रिलीज के बाद कहानी पूरी तरह बदल गई। फिल्म को दर्शकों का जबरदस्त प्यार मिला और यह उस दौर की सबसे बड़ी सफल फिल्मों में शामिल हो गई। अपनी शानदार कॉमेडी दमदार अभिनय और यादगार गीतों की वजह से फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार कमाई की और लंबे समय तक सिनेमाघरों में चलती रही।

    करीब 35 लाख रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने भारतीय बॉक्स ऑफिस पर लगभग एक करोड़ पच्चीस लाख रुपये का कारोबार किया जबकि दुनिया भर में इसकी कमाई करीब ढाई करोड़ रुपये तक पहुंच गई। उस समय के हिसाब से यह बेहद बड़ी सफलता मानी गई। फिल्म की अप्रत्याशित कामयाबी ने किशोर कुमार की टैक्स बचाने की पूरी योजना पर पानी फेर दिया क्योंकि नुकसान दिखाने की जगह उन्हें बड़ा मुनाफा हो गया।

    बताया जाता है कि आयकर से जुड़ा उनका मामला लंबे समय तक अदालतों में चलता रहा। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम का सकारात्मक पहलू यह रहा कि भारतीय सिनेमा को एक ऐसी क्लासिक कॉमेडी फिल्म मिली जिसे आज भी दर्शक पूरे परिवार के साथ देखना पसंद करते हैं। चलती का नाम गाड़ी समय के साथ एक यादगार फिल्म बन गई और इसके गीत तथा किरदार आज भी लोगों की यादों में ताजा हैं। यही वजह है कि किशोर कुमार का यह अनोखा किस्सा आज भी फिल्म प्रेमियों के बीच मुस्कान बिखेर देता है।

  • किशोर कुमार का सबसे विवादित गाना: 8 महिला गायिकाओं के बीच अकेले गाया गीत, अश्लीलता के आरोप में हुआ था बैन

    किशोर कुमार का सबसे विवादित गाना: 8 महिला गायिकाओं के बीच अकेले गाया गीत, अश्लीलता के आरोप में हुआ था बैन


    नई दिल्ली। हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में कई ऐसे गीत हैं, जिन्होंने अपनी लोकप्रियता के साथ-साथ विवादों के कारण भी खास पहचान बनाई। ऐसा ही एक गीत था फिल्म ‘विधाता’ का ‘सात सहेलियां खड़ी-खड़ी, फरियाद सुनाए घड़ी-घड़ी’, जिसे महान गायक किशोर कुमार ने आठ महिला गायिकाओं के साथ मिलकर गाया था। यह गीत अपने समय में इतना चर्चित हुआ कि इसके कुछ बोलों को लेकर विवाद खड़ा हो गया और बाद में इसे दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारित करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

    वर्ष 1982 में रिलीज हुई फिल्म ‘विधाता’ उस दौर की सबसे सफल फिल्मों में गिनी जाती है। फिल्म में दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार, संजीव कुमार, शम्मी कपूर, संजय दत्त और अभिनेत्री पद्मिनी कोल्हापुरे जैसे सितारे नजर आए थे। प्रसिद्ध फिल्मकार सुभाष घई द्वारा निर्देशित इस फिल्म का संगीत भी दर्शकों को खूब पसंद आया। फिल्म के सभी गीत सुपरहिट रहे, लेकिन ‘सात सहेलियां खड़ी-खड़ी’ ने सबसे अधिक सुर्खियां बटोरीं।

    इस गीत की खास बात यह थी कि इसमें किशोर कुमार अकेले पुरुष गायक थे, जबकि उनके साथ आठ महिला गायिकाओं ने अपनी आवाज दी थी। इनमें हेमलता, कंचन, अनुराधा पौडवाल, साधना सरगम, अलका याज्ञनिक, पद्मिनी कोल्हापुरे, उनकी बहन शिवांगी कोल्हापुरे और शक्ति कपूर की पत्नी शिवांगी कपूर शामिल थीं। बताया जाता है कि जब किशोर कुमार रिकॉर्डिंग स्टूडियो पहुंचे और वहां एक साथ इतनी महिला गायिकाओं को देखा तो वे चौंक गए। मजाकिया अंदाज में उन्होंने कहा कि वे तो फंस गए हैं। हालांकि संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी और अभिनेता शम्मी कपूर के समझाने पर उन्होंने यह गीत रिकॉर्ड किया।

    गीत के बोल प्रसिद्ध गीतकार आनंद बक्शी ने लिखे थे। रिकॉर्डिंग के बाद इसे फिल्माया गया और दर्शकों के सामने पेश किया गया। लेकिन रिलीज के बाद गीत के कुछ अंतरों को लेकर आपत्ति जताई गई। आलोचकों ने इसे अश्लील बताया और इसके प्रसारण पर सवाल उठाए। विवाद इतना बढ़ा कि ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन ने इस गीत के प्रसारण पर रोक लगा दी। हालांकि फिल्म की लोकप्रियता पर इसका कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा।

    दिलचस्प बात यह रही कि जिस गीत को कभी अश्लील बताकर बैन किया गया था, वही समय के साथ हिंदी फिल्म संगीत की चर्चित धरोहर बन गया। आज भी संगीत प्रेमी इस गीत को याद करते हैं और इसे किशोर कुमार के सबसे अनोखे और दुर्लभ गीतों में गिना जाता है। यह गीत न केवल अपनी धुन और प्रस्तुति के लिए बल्कि एक साथ इतनी महिला गायिकाओं के साथ रिकॉर्ड होने के कारण भी संगीत इतिहास में विशेष स्थान रखता है।

  • जब रिकॉर्डिंग स्टूडियो में लेट गए थे किशोर कुमार, और बन गया सदाबहार सुपरहिट गाना

    जब रिकॉर्डिंग स्टूडियो में लेट गए थे किशोर कुमार, और बन गया सदाबहार सुपरहिट गाना


    नई दिल्ली । हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में कई ऐसे किस्से दर्ज हैं, जो कलाकारों की प्रतिभा और उनके जुनून को नई पहचान देते हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प किस्सा महान गायक किशोर कुमार और फिल्म ‘शराबी’ के मशहूर गीत ‘इंतहा हो गई इंतजार की’ से जुड़ा हुआ है। यह गीत आज भी संगीत प्रेमियों की पसंदीदा सूची में शामिल है, लेकिन इसके पीछे की कहानी बहुत कम लोग जानते हैं।

    साल 1984 में निर्देशक प्रकाश मेहरा अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म ‘शराबी’ का निर्माण कर रहे थे। फिल्म में अमिताभ बच्चन मुख्य भूमिका में थे और उनके किरदार की भावनाओं को दर्शाने के लिए गीतकार अंजान ने एक बेहतरीन गीत लिखा था। संगीतकार बप्पी लहरी ने इस गीत को मधुर धुन से सजाया। अब जरूरत थी ऐसी आवाज की, जो इस गीत की आत्मा को जीवंत कर सके, और इसके लिए चुना गया नाम था किशोर कुमार।

    जब किशोर कुमार के सामने यह गीत रिकॉर्डिंग के लिए रखा गया, तो उन्होंने शुरुआत में इसे गाने से इनकार कर दिया। रिकॉर्डिंग स्टूडियो में मौजूद लोग हैरान रह गए। कुछ देर बाद उन्होंने गीत की स्थिति और उसके भाव को गहराई से समझा। उन्हें बताया गया कि पर्दे पर अमिताभ बच्चन एक ऐसे व्यक्ति की भूमिका निभा रहे हैं, जो शराब के नशे में है और अपनी भावनाओं को व्यक्त कर रहा है।

    यहीं से किशोर कुमार की रचनात्मकता सामने आई। उन्होंने कहा कि यदि इस गीत में एक शराबी का वास्तविक एहसास पैदा करना है, तो वह इसे सामान्य तरीके से खड़े होकर नहीं गाएंगे। उनकी शर्त थी कि रिकॉर्डिंग के दौरान उन्हें लेटने दिया जाए ताकि वे उस मानसिक और शारीरिक स्थिति को महसूस कर सकें, जिसमें फिल्म का पात्र दिखाई देगा।

    स्टूडियो में मौजूद सभी लोग उनकी यह बात सुनकर चौंक गए। हालांकि, किशोर कुमार अपनी बात पर अड़े रहे। आखिरकार उनकी इच्छा पूरी करने के लिए रिकॉर्डिंग रूम में एक बड़ी टेबल मंगवाई गई। किशोर कुमार उस पर लेट गए, माइक को उसी हिसाब से सेट किया गया और फिर रिकॉर्डिंग शुरू हुई।

    इसके बाद जो हुआ, वह इतिहास बन गया। आशा भोसले के साथ किशोर कुमार ने ‘इंतहा हो गई इंतजार की’ को अपनी आवाज दी और गीत में ऐसा जादू भर दिया कि वह रिलीज होते ही लोगों की जुबान पर चढ़ गया। कहा जाता है कि रिकॉर्डिंग के दौरान आशा भोसले भी किशोर कुमार के इस अनोखे अंदाज को देखकर हैरान रह गई थीं।

    यह गीत न केवल फिल्म ‘शराबी’ की पहचान बना, बल्कि हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय युगल गीतों में भी शामिल हो गया। दशकों बाद भी जब यह गाना बजता है, तो श्रोता उसी उत्साह और भावनाओं के साथ इसे सुनते हैं। किशोर कुमार की यही विशेषता थी कि वह केवल गीत नहीं गाते थे, बल्कि उसे जीते थे। शायद यही कारण है कि उनकी आवाज और उनके गाए गीत आज भी करोड़ों दिलों में जीवित हैं।

  • गाने ने बदल दिया इतिहास, किशोर कुमार की बात आखिरकार साबित हुई सही

    गाने ने बदल दिया इतिहास, किशोर कुमार की बात आखिरकार साबित हुई सही


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के दिग्गज पार्श्वगायक किशोर कुमार अपनी बेहतरीन आवाज और बहुआयामी प्रतिभा के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने करियर में हजारों गीत गाए, जो आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसे हुए हैं। उनके एक खास गाने “मेरे ये गीत याद रखना” को लेकर एक बेहद भावुक किस्सा जुड़ा है, जिसे फिल्म चलते-चलते के लिए रिकॉर्ड किया गया था।

    गाते-गाते भावुक हो उठे थे किशोर कुमार
    कहा जाता है कि जब किशोर कुमार इस गाने को रिकॉर्ड कर रहे थे, तब वह बार-बार भावुक हो जाते थे। गीत के बोल और संगीत ने उनकी निजी यादों को ताजा कर दिया, जिससे उनकी आंखें नम हो जाती थीं। रिकॉर्डिंग के दौरान कई बार ऐसा हुआ कि उन्हें खुद को संभालना पड़ा, क्योंकि गाने की भावनात्मक गहराई उन्हें भीतर तक छू रही थी।

    ‘ये गाना हिट होगा’ किशोर कुमार की भविष्यवाणी
    इस गाने को लेकर एक दिलचस्प बात यह भी कही जाती है कि किशोर कुमार ने इसके रिकॉर्डिंग के दौरान ही कह दिया था कि यह गीत दर्शकों के दिलों में जगह बनाएगा। उनकी यह बात आगे चलकर सही साबित हुई और यह गीत आज भी संगीत प्रेमियों के बीच बेहद लोकप्रिय माना जाता है।

    संगीत और फिल्म की यादगार टीम
    यह गीत फिल्म चलते-चलते का हिस्सा था, जिसमें कलाकारों की भूमिका भी बेहद यादगार रही। इसके बोल लेखक अमित खन्ना ने लिखे थे, जबकि संगीत निर्देशन बप्पी लाहिड़ी ने किया था। बप्पी लाहिड़ी ने इस गीत के लिए ऐसी धुन तैयार की थी जो सीधे दिल को छू जाए, और यही इसकी सफलता का बड़ा कारण बनी।

    किशोर कुमार की विरासत
    किशोर कुमार सिर्फ गायक ही नहीं, बल्कि अभिनेता, निर्देशक और निर्माता भी थे। उन्होंने अपने करियर में हजारों गाने गाए और कई सुपरस्टार्स के लिए अपनी आवाज दी। उनकी गायकी की खासियत यह थी कि वह हर तरह के गीत रोमांटिक, दर्दभरे, भजन या मस्तीभरे सबमें समान रूप से जान डाल देते थे।

    एक अमर कलाकार की अमर कहानी
    किशोर कुमार का नाम भारतीय संगीत इतिहास में हमेशा स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। उनकी आवाज, उनका अंदाज और उनके गीत आज भी लोगों को भावनाओं से जोड़ते हैं। यह किस्सा उनके उसी जादू को याद दिलाता है, जो उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बनाता है।

  • फिल्म से निकलने के लिए किशोर कुमार की अनोखी चाल, गंजे होकर ऑफिस पहुंचे और बदल गई पूरी कहानी

    फिल्म से निकलने के लिए किशोर कुमार की अनोखी चाल, गंजे होकर ऑफिस पहुंचे और बदल गई पूरी कहानी

    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के दिग्गज गायक और अभिनेता Kishore Kumar अपने शानदार गीतों के साथ-साथ अपनी अनोखी आदतों और मजाकिया स्वभाव के लिए भी खूब पहचाने जाते थे। उनके जीवन से जुड़े कई ऐसे किस्से हैं जो आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बने रहते हैं। उनके साथ काम करने वाले कलाकार और फिल्मकार अक्सर उनके अलग अंदाज और अप्रत्याशित व्यवहार के बारे में बातें करते रहे हैं। ऐसा ही एक किस्सा एक बड़ी फिल्म से जुड़ा है, जिसने बाद में हिंदी सिनेमा के इतिहास में खास जगह बनाई।

    दोस्ती और दुविधा के बीच फंसे थे किशोर कुमार

    उस दौर में मशहूर फिल्म निर्देशक Hrishikesh Mukherjee और किशोर कुमार के बीच गहरी दोस्ती थी। निर्देशक अपनी नई फिल्म के लिए ऐसे कलाकार की तलाश में थे जो मुख्य किरदार को जीवंत बना सके। उनकी पसंद किशोर कुमार थे और वे चाहते थे कि वही फिल्म के नायक बनें। लेकिन दूसरी तरफ किशोर कुमार इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बनने के इच्छुक नहीं थे। परेशानी यह थी कि गहरी दोस्ती के कारण वह सीधे तौर पर मना भी नहीं कर पा रहे थे।

    फिल्म से बचने के लिए अपनाया अनोखा तरीका
    काफी सोच-विचार के बाद किशोर कुमार ने एक अलग रास्ता चुना। फिल्म शुरू होने से पहले जब उन्हें लुक और कॉस्ट्यूम को लेकर चर्चा के लिए बुलाया गया तो वहां मौजूद लोग उन्हें देखकर चौंक गए। वह पूरी तरह गंजे होकर पहुंचे थे। इतना ही नहीं, वह पूरे ऑफिस में घूमते हुए मजाकिया अंदाज में नाचते और गाते रहे। उनका यह रूप देखकर सभी हैरान रह गए।

    एक फैसले ने बदल दी पूरी कहानी
    निर्देशक के लिए यह दृश्य अप्रत्याशित था। फिल्म के मुख्य किरदार के लिए जिस छवि की कल्पना की गई थी, उसके विपरीत किशोर कुमार का यह अंदाज था। आखिरकार बात इतनी आगे बढ़ी कि उन्हें फिल्म से अलग कर दिया गया। बाद में उसी किरदार के लिए दूसरे कलाकार को चुना गया और फिल्म ने आगे चलकर बड़ी सफलता हासिल की।

    फिल्म इतिहास का यादगार अध्याय
    बाद में यह फिल्म बनी Anand, जिसमें मुख्य भूमिका Rajesh Khanna ने निभाई और उनके साथ Amitabh Bachchan भी नजर आए। फिल्म की कहानी और अभिनय को दर्शकों ने खूब पसंद किया। यह फिल्म आज भी हिंदी सिनेमा की सबसे यादगार फिल्मों में गिनी जाती है।

    इस घटना ने यह भी साबित किया कि किशोर कुमार केवल एक महान कलाकार ही नहीं थे, बल्कि उनका जीवन अनोखे और दिलचस्प किस्सों से भी भरा हुआ था, जिनकी चर्चा आज भी उतनी ही दिलचस्पी से होती है।

  • बॉलीवुड का ऐतिहासिक डुएट: किशोर कुमार बनाम मोहम्मद रफी की जादुई जुगलबंदी

    बॉलीवुड का ऐतिहासिक डुएट: किशोर कुमार बनाम मोहम्मद रफी की जादुई जुगलबंदी


    नई दिल्ली । बॉलीवुड के सुनहरे दौर में जब मोहम्मद रफी और किशोर कुमार जैसे दिग्गज गायक एक साथ किसी गाने में अपनी आवाज देते थे, तो वह सिर्फ एक गीत नहीं बल्कि इतिहास बन जाता था। ऐसा ही एक यादगार किस्सा फिल्म दोस्ताना (1980) से जुड़ा है, जिसमें अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा मुख्य भूमिकाओं में थे।

    इस फिल्म के मशहूर डुएट गीत “सलामत रहे दोस्ताना हमारा” की रिकॉर्डिंग के दौरान स्टूडियो में एक दिलचस्प माहौल देखने को मिला। बताया जाता है कि मोहम्मद रफी समय पर स्टूडियो पहुंच गए थे और उन्होंने गाने की रिहर्सल भी पूरी तैयारी के साथ की थी। उनकी क्लासिकल और मधुर आवाज ने वहां मौजूद सभी लोगों को प्रभावित कर दिया था।

    लेकिन जब किशोर कुमार स्टूडियो पहुंचे तो उन्होंने माहौल को गंभीर बनाने के बजाय हल्का-फुल्का कर दिया। वे रफी साहब के साथ मजाक-मस्ती करने लगे, जिससे कई लोगों को लगा कि वह गाने को लेकर गंभीर नहीं हैं। उस समय कई लोगों को लगा कि रफी साहब अपनी परफॉर्मेंस से बाजी मार लेंगे।

    हालांकि, जैसे ही रिकॉर्डिंग शुरू हुई, पूरा माहौल बदल गया। पहले मोहम्मद रफी ने अपने हिस्से को बेहद खूबसूरती और गहराई के साथ गाया। लेकिन जब किशोर कुमार की बारी आई, तो उनकी आवाज ने स्टूडियो में मौजूद हर शख्स को हैरान कर दिया। उनकी गायकी में जो ऊर्जा, भाव और सहजता थी, उसने गाने को एक अलग ही ऊंचाई पर पहुंचा दिया।

    संगीतकार पंडित रोनू मजुमदार के अनुसार, उस दिन दोनों ही दिग्गजों ने शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन किशोर कुमार की आवाज में एक अलग तरह का जादू था, जिसने माहौल को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी परफॉर्मेंस को कई लोग उस दौर की सबसे यादगार रिकॉर्डिंग्स में से एक मानते हैं।

    फिल्म दोस्ताना के अन्य गीत भी सुपरहिट साबित हुए और फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया। लेकिन यह डुएट गाना आज भी इसलिए याद किया जाता है क्योंकि इसमें दो महान गायकों की अद्भुत टक्कर और संगीत की असली ताकत देखने को मिली।

  • ऋषि कपूर की ‘कर्ज’: फ्लॉप फिल्म, लेकिन सुपरहिट म्यूजिक और मानसिक तनाव की सच्ची कहानी

    ऋषि कपूर की ‘कर्ज’: फ्लॉप फिल्म, लेकिन सुपरहिट म्यूजिक और मानसिक तनाव की सच्ची कहानी



    नई दिल्ली। बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता ऋषि कपूर की 1980 में आई फिल्म कर्ज आज भले ही एक कल्ट क्लासिक मानी जाती है, लेकिन रिलीज के समय यह बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई थी। दिलचस्प बात यह है कि फिल्म की असफलता नहीं, बल्कि उसके गानों की भारी सफलता ने उस दौर में ऋषि कपूर को भावनात्मक रूप से प्रभावित किया था।

    क्या थी फिल्म की खासियत?
    फिल्म का निर्देशन सुभाष घई ने किया था और यह एक म्यूजिकल थ्रिलर के रूप में बनाई गई थी। कहानी के साथ-साथ इसके संगीत पर खास फोकस किया गया था।इस फिल्म के संगीत को तैयार किया था लक्ष्मीकांत–प्यारेलाल की जोड़ी ने, और गानों को आवाज दी थी किशोर कुमार और मोहम्मद रफ़ी जैसे महान गायकों ने।

    सुपरहिट हुए गाने
    फिल्म के गाने जैसे
    ओम शांति ओम
    एक हसीना थी
    पैसा ये पैसा
    दर्द-ए-दिलइतने लोकप्रिय हुए कि वे आज भी याद किए जाते हैं।

    बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप
    जहां फिल्म का संगीत सुपरहिट रहा, वहीं सिनेमाघरों में फिल्म दर्शकों को आकर्षित नहीं कर पाई और फ्लॉप हो गई। शुरुआती हफ्तों के बाद इसकी कमाई तेजी से गिर गई।इसके कुछ समय बाद रिलीज हुई कुर्बानी ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया और कर्ज पीछे छूट गई।

    क्यों परेशान हुए ऋषि कपूर?
    रिपोर्ट्स और ऋषि कपूर की आत्मकथा के अनुसार, उन्हें इस बात का मानसिक दबाव महसूस हुआ कि उनकी फिल्म भले ही असफल रही, लेकिन उसके गाने हर जगह लोकप्रिय हो रहे थे। इस वजह से वे भावनात्मक तनाव में आ गए थे।कई रिपोर्ट्स में यह भी उल्लेख मिलता है कि वे उस समय काफी परेशान रहे और यह दौर उनके लिए चुनौतीपूर्ण था।

    आज क्या है स्थिति?
    समय के साथ कर्ज को दर्शकों ने एक आइकॉनिक फिल्म के रूप में स्वीकार किया और आज इसे बॉलीवुड की सबसे यादगार म्यूजिकल फिल्मों में गिना जाता है।