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  • समुद्र का बढ़ता जलस्तर बना खतरा, मुंबई-कोलकाता में लाखों लोगों के घर डूबने का संकट

    समुद्र का बढ़ता जलस्तर बना खतरा, मुंबई-कोलकाता में लाखों लोगों के घर डूबने का संकट


    संयुक्त राष्ट्र।
    समुद्र के बढ़ते जलस्तर का खतरा अब भविष्य की आशंका भर नहीं रह गया है। संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि भारत के मुंबई और कोलकाता जैसे तटीय शहरों में लाखों लोगों के सामने विस्थापन का तत्काल खतरा पैदा हो गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, समुद्र का जलस्तर बढ़ने और जमीन के स्थायी रूप से पानी में डूबने के कारण बड़ी आबादी को आने वाले समय में अपने घर गंवाने पड़ सकते हैं।

    संयुक्त राष्ट्र महासचिव की रिपोर्ट ‘समुद्र के जलस्तर में वृद्धि से जुड़ी चुनौतियां तथा उनसे निपटने के तरीके और उपाय’ में कहा गया है कि समुद्र का बढ़ता जलस्तर अब दूर का या भविष्य का खतरा नहीं है। यह प्रक्रिया पहले से जारी है और दर्ज इतिहास में किसी भी दौर की तुलना में तेज गति से हो रही है।

    सिर्फ तटीय इलाकों का नहीं, पूरे शहरों का संकट

    रिपोर्ट के मुताबिक, समुद्र के जलस्तर में बढ़ोतरी का असर पहले से ही शहरी बुनियादी ढांचे पर दिखाई देने लगा है। जल आपूर्ति व्यवस्था, परिवहन नेटवर्क, ऊर्जा ग्रिड, इमारतों और भूजल संसाधनों को नुकसान पहुंच रहा है।

    इसका असर सिर्फ संपत्ति तक सीमित नहीं है। संयुक्त राष्ट्र ने चेताया है कि समुद्र का बढ़ता स्तर मानवाधिकारों के प्रभावी इस्तेमाल, दीर्घकालिक विकास और वित्तीय स्थिरता के लिए भी गंभीर चुनौती बन रहा है।

    मुंबई-कोलकाता समेत इन शहरों पर ज्यादा असर

    संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में जोखिम का स्वरूप अलग-अलग क्षेत्रों में अलग बताया गया है। अमेरिका के मियामी और न्यूयॉर्क तथा चीन के ग्वांगझू जैसे उच्च आय वाले शहरों में सबसे बड़ा खतरा तटीय बुनियादी ढांचे और संपत्तियों को होने वाले भारी वित्तीय नुकसान का है।

    अनुमान के मुताबिक इन शहरों में करीब 2,000 अरब से 3,500 अरब अमेरिकी डॉलर की संपत्ति जोखिम में है।

    इसके उलट दक्षिण एशिया के निचले डेल्टा क्षेत्रों और मुंबई, कोलकाता तथा ढाका जैसे शहरों में सबसे बड़ा खतरा लोगों के विस्थापन का है। रिपोर्ट के अनुसार यहां 1.4 करोड़ से अधिक लोगों के घरों के स्थायी रूप से पानी में डूबने का तत्काल खतरा है।

    सिर्फ पैसों में नहीं मापा जा सकता नुकसान

    रिपोर्ट ने इस बात पर जोर दिया है कि तटीय क्षेत्रों के जोखिम का आकलन केवल आर्थिक नुकसान के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। इसमें मानवीय जिंदगी, विस्थापन और सामाजिक प्रभाव को भी वित्तीय जोखिमों के बराबर महत्व देने की जरूरत है।

    संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, समुद्र का बढ़ता जलस्तर तटीय समुदायों की कमजोरियों को और बढ़ा रहा है। इसलिए जोखिम का आकलन करने के मौजूदा तरीकों को ज्यादा व्यापक बनाने की जरूरत है।

    स्वास्थ्य पर भी पड़ेगा गंभीर असर

    समुद्र के बढ़ते जलस्तर का असर जनस्वास्थ्य पर भी पड़ने की आशंका है। तटीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़े बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है। इसके अलावा जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ने, स्वच्छता व्यवस्था बाधित होने, चोट और मौत के जोखिम में वृद्धि की आशंका जताई गई है।

    रिपोर्ट में मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को भी रेखांकित किया गया है। लगातार बाढ़, घर और आजीविका खोने का डर तथा संभावित विस्थापन लोगों में मानसिक तनाव बढ़ा सकता है।

    समुद्र का बढ़ता स्तर और जमीन का धंसना, दोहरी मार

    संयुक्त राष्ट्र ने यह भी चेताया है कि समुद्र के जलस्तर में बढ़ोतरी और जमीन के धंसने का संयुक्त प्रभाव तटीय बाढ़ के खतरे को और गंभीर बना रहा है।

    इससे तटीय पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचने के साथ-साथ जान-माल, आजीविका और महत्वपूर्ण जलीय पारिस्थितिकी तंत्र से मिलने वाली सेवाओं एवं आवासों का नुकसान बढ़ सकता है।

    रिपोर्ट का संदेश स्पष्ट है कि समुद्र का बढ़ता जलस्तर अब आने वाले दशकों की समस्या नहीं, बल्कि वर्तमान समय में सामने आ रही ऐसी चुनौती है, जिसके सामाजिक, आर्थिक और मानवीय प्रभावों से निपटने के लिए तत्काल तैयारी जरूरी है।

  • पश्चिम बंगाल TMC विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, 20 सांसदों की सदस्यता पर दल-बदल कानून के तहत बढ़ी कानूनी कार्रवाई

    पश्चिम बंगाल TMC विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, 20 सांसदों की सदस्यता पर दल-बदल कानून के तहत बढ़ी कानूनी कार्रवाई

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों से जवाब मांगा है। यह नोटिस पार्टी के महासचिव और लोकसभा में दल के नेता अभिषेक बनर्जी की ओर से दायर याचिका पर जारी किया गया है। याचिका में इन सांसदों के खिलाफ दल-बदल कानून के तहत शुरू की गई अयोग्यता प्रक्रिया पर जल्द फैसला कराने की मांग की गई है।

    मामला उन 20 लोकसभा सांसदों से जुड़ा है, जिन्होंने तृणमूल कांग्रेस से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया यानी एनसीपीआई के साथ जुड़ने का कदम उठाया है। बागी सांसदों की ओर से अलग समूह के रूप में पहचान बनाने की कोशिश की गई है और संसद में उनके राजनीतिक रुख को लेकर भी विवाद सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि ये सांसद पार्टी के चुनाव चिह्न पर निर्वाचित हुए थे और बाद में पार्टी से अलग होने के कारण उनके खिलाफ संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।

    अभिषेक बनर्जी ने अपनी याचिका में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के समक्ष लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर समयबद्ध तरीके से फैसला लेने की मांग की है। उनका कहना है कि सांसदों के खिलाफ दल-बदल संबंधी शिकायतों पर प्रक्रिया को अनिश्चित समय तक लंबित नहीं रखा जा सकता। पार्टी की ओर से इस मामले में पहले भी लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष शिकायतें दाखिल की जा चुकी हैं।

    सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान लोकसभा अध्यक्ष की ओर से सॉलिसिटर जनरल पेश हुए। अदालत को बताया गया कि अध्यक्ष की ओर से संबंधित 20 सांसदों को पहले ही नोटिस जारी किए जा चुके हैं और उनसे जवाब मांगा गया है। इस जानकारी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अध्यक्ष को अलग से नोटिस जारी करने की आवश्यकता नहीं मानी। हालांकि अदालत ने मामले में शामिल बागी सांसदों से जवाब मांगा है।

    इस घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि विवाद का अगला महत्वपूर्ण चरण अब सांसदों के जवाब और लोकसभा स्तर पर चल रही अयोग्यता प्रक्रिया से जुड़ा होगा। अंतिम निर्णय आने तक इन सांसदों की संसदीय सदस्यता की स्थिति को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस जारी रहने की संभावना है।

    तृणमूल कांग्रेस के भीतर यह संकट पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तेज हुआ। पार्टी में नेतृत्व और राजनीतिक रणनीति को लेकर मतभेदों के बीच 20 सांसदों के अलग रुख अपनाने से लोकसभा में भी संगठनात्मक विभाजन की स्थिति बनी। बागी गुट और तृणमूल नेतृत्व इस घटनाक्रम की अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं।

    दल-बदल कानून के तहत किसी सांसद की सदस्यता समाप्त करने का निर्णय केवल राजनीतिक विवाद के आधार पर नहीं होता, बल्कि संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया और तथ्यों के आधार पर लिया जाता है। इसलिए इस मामले में सांसदों के जवाब, उनके अलग समूह के दावे और पार्टी से उनके संबंधों की स्थिति महत्वपूर्ण होगी।

    सुप्रीम कोर्ट का नोटिस फिलहाल सदस्यता समाप्त होने का फैसला नहीं है, बल्कि संबंधित सांसदों से मामले पर उनका पक्ष जानने की न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है। अब इस मामले में अदालत के समक्ष जवाब आने और लोकसभा अध्यक्ष के स्तर पर चल रही प्रक्रिया पर आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।

  • राजनाथ सिंह ने कोलकाता में 3500 करोड़ की लागत की पोत निर्माण फैक्ट्री की रखी आधारशिला

    राजनाथ सिंह ने कोलकाता में 3500 करोड़ की लागत की पोत निर्माण फैक्ट्री की रखी आधारशिला


    कोलकाता।
    रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह (Defence Minister Rajnath Singh) ने रविवार को कोलकाता (Kolkata) में पोत निर्माण (Shipbuilding) से जुड़ी पांच विस्तार परियोजनाओं की आधारशिला रखी। इन परियोजनाओं को 3500 करोड़ रुपये की लागत से विकसित किया जाएगा। रक्षा मंत्री ने इसे देश के लिए बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहा कि भारत में पोत निर्माण का वैश्विक केंद्र बनने की क्षमता है।

    रक्षा मंत्री ने रविवार को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी (Chief Minister Suvendu Adhikari) की मौजूदगी में ऑनलाइन माध्यम से ‘गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स’ (जीआरएसई) की तीन और ‘यंत्र इंडिया लिमिटेड’ की दो परियोजनाओं की आधारशिला रखी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि वैश्विक पोत निर्माण उद्योग में एक शून्यता आ रही है। भारत इस स्थिति का लाभ उठा सकता है।

    उन्होंने पश्चिम बंगाल के लिए इन परियोजनाओं के महत्व को उजागर करते हुए कहा कि यह राज्य के विकास के लिए नए दौर की शुरुआत है। रक्षा मंत्री ने कहा, ‘पश्चिम बंगाल में कारखानों के बंद होने और तालाबंदी की खबरों की जगह अब नयी परियोजनाओं की शुरुआत ने ले ली है।’ मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि इन परियोजनाओं के विकास से राज्य में रोजगार के अवसर बढ़ने के साथ कोलकाता को पोत निर्माण क्षेत्र में वैश्विक पहचान भी मिलेगी। उन्होंने कहा, ‘ये परियोजनाएं सहायक उद्योगों, खासकर एमएसएमई के XXलिए अधिक अवसर पैदा करके पश्चिम बंगाल की औद्योगिक पारिस्थितिकी को फिर से खड़ा करने में मदद करेंगे।’


    युद्धपोत निर्माण और मरम्मत की क्षमता बढ़ेगी

    जीआरएसई के एक अधिकारी ने बताया कि कंपनी ने युद्धपोत बनाने और उनकी मरम्मत करने की अपनी क्षमता को बेहतर बनाने के उद्देश्य से श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंदरगाह, कोलकाता (एसएमपीके) के साथ पट्टा समझौते किए हैं। इस समझौते के तहत हुगली नदी के दोनों किनारों पर दो छोटे शिपयार्ड और रायचक में नदी के किनारे 32 एकड़ जमीन ली गई है।

  • तृणमूल छात्र परिषद के स्थापना दिवस पर आमने-सामने आए दोनों गुट, कार्यक्रम की अनुमति को लेकर हाईकोर्ट पहुंचा मामला

    तृणमूल छात्र परिषद के स्थापना दिवस पर आमने-सामने आए दोनों गुट, कार्यक्रम की अनुमति को लेकर हाईकोर्ट पहुंचा मामला

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस से जुड़े छात्र संगठन के भीतर चल रहा विवाद अब 28 अगस्त को होने वाले स्थापना दिवस कार्यक्रम को लेकर खुलकर सामने आ गया है। तृणमूल छात्र परिषद के दो गुटों ने मध्य कोलकाता के मेयो रोड स्थित महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति मांगी है। एक ही स्थान और एक ही दिन कार्यक्रम की मांग किए जाने से दोनों पक्षों के बीच टकराव की स्थिति बन गई है।

    तृणमूल छात्र परिषद का स्थापना दिवस हर वर्ष 28 अगस्त को मनाया जाता है। इस अवसर पर मेयो रोड पर रैली और सभा का आयोजन किया जाता रहा है। इस बार पार्टी से जुड़े दो छात्र गुटों की अलग-अलग गतिविधियों के कारण स्थापना दिवस का कार्यक्रम राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गया है।

    ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट की ओर से कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति के लिए अदालत का रुख किया जा चुका है। संबंधित याचिका पर सुनवाई के लिए मामला सूचीबद्ध भी किया गया। इसके बाद दूसरे गुट ने भी इसी स्थान पर कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति नहीं मिलने का हवाला देते हुए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की है।

    विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट भी 28 अगस्त को मेयो रोड पर कार्यक्रम आयोजित करना चाहता है। इस गुट की ओर से कोलकाता पुलिस से रैली की अनुमति मांगी गई थी, लेकिन अनुमति नहीं मिलने के बाद मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया।

    अदालत ने ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट की याचिका को तत्काल सुनवाई के लिए स्वीकार नहीं किया और इसे अगले शुक्रवार के लिए सूचीबद्ध किया है। दूसरी ओर, ममता बनर्जी समर्थक गुट की याचिका पर पहले ही सुनवाई की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इस वजह से अब दोनों पक्षों की नजर अदालत के अगले रुख पर टिकी हुई है।

    मामले का मुख्य प्रश्न यह है कि क्या दोनों गुटों को एक ही स्थान पर अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति दी जा सकती है या फिर प्रशासन और अदालत की ओर से कोई वैकल्पिक व्यवस्था तय की जाएगी। एक ही दिन और एक ही स्थान पर दो कार्यक्रम होने की स्थिति में कानून-व्यवस्था से जुड़े पहलुओं पर भी विचार करना होगा।

    मेयो रोड का स्थान तृणमूल छात्र परिषद के स्थापना दिवस कार्यक्रम के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में स्थान को लेकर दोनों पक्षों की दावेदारी ने संगठन के भीतर चल रहे मतभेद को और स्पष्ट कर दिया है। पहले से मौजूद राजनीतिक खींचतान के बीच छात्र संगठन का यह विवाद अब न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बन गया है।

    फिलहाल अदालत के फैसले और प्रशासन की अनुमति पर आगे की तस्वीर निर्भर करेगी। दोनों गुट अपने-अपने कार्यक्रम को लेकर सक्रिय हैं, जबकि 28 अगस्त की तारीख नजदीक आने के साथ विवाद के समाधान को लेकर भी दबाव बढ़ रहा है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि स्थापना दिवस का आयोजन किस व्यवस्था के तहत होगा और क्या दोनों पक्षों को अलग-अलग कार्यक्रम के लिए स्थान उपलब्ध कराया जाएगा।

  • Independence Day 2026: आजादी का इतिहास जानना है तो इन ऐतिहासिक संग्रहालयों और स्थलों पर जरूर जाएं

    Independence Day 2026: आजादी का इतिहास जानना है तो इन ऐतिहासिक संग्रहालयों और स्थलों पर जरूर जाएं

    नई दिल्ली । 15 अगस्त 1947 को भारत को ब्रिटिश शासन से आजादी मिली थी। देश की स्वतंत्रता के पीछे लंबे समय तक चला संघर्ष, आंदोलनों और अनगिनत लोगों का त्याग जुड़ा हुआ है। स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने परिवार, सुख-सुविधाओं और निजी जीवन की परवाह किए बिना देश के लिए संघर्ष किया। कई लोगों ने जेल की यातनाएं सहीं और अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने देश के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया।

    आजादी के इस इतिहास को केवल किताबों में पढ़ने के बजाय ऐतिहासिक स्थलों और संग्रहालयों में जाकर भी समझा जा सकता है। यहां स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी तस्वीरें, दस्तावेज, चिट्ठियां, वस्तुएं और अन्य ऐतिहासिक सामग्री सुरक्षित रखी गई है। स्वतंत्रता दिवस के आसपास परिवार के साथ इन जगहों की यात्रा बच्चों के लिए भी इतिहास को करीब से समझने का अच्छा अवसर हो सकती है।

    दिल्ली में क्रांति मंदिर स्वतंत्रता आंदोलन और नेताजी सुभाष चंद्र बोस तथा आजाद हिंद फौज से जुड़े इतिहास को समझने के लिए महत्वपूर्ण स्थान है। यहां नेताजी से जुड़ी तस्वीरें, दस्तावेज और विभिन्न ऐतिहासिक सामग्री प्रदर्शित की गई है। कुछ घटनाओं और प्रसंगों को आधुनिक तकनीक के माध्यम से भी प्रस्तुत किया गया है, जिससे आगंतुकों को उस दौर को समझने में मदद मिलती है।

    दिल्ली की गांधी स्मृति भी स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल है। महात्मा गांधी ने अपने जीवन के अंतिम 144 दिन यहां बिताए थे। परिसर में उनसे जुड़ी तस्वीरें, पत्र और उनके इस्तेमाल की गई वस्तुएं सुरक्षित हैं। 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या से जुड़ी स्मृतियों को भी यहां संरक्षित किया गया है।

    अमृतसर का जलियांवाला बाग भी भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जगह है। 13 अप्रैल 1919 को यहां एकत्रित लोगों पर गोलीबारी की गई थी। इस घटना ने देश के स्वतंत्रता आंदोलन पर गहरा प्रभाव डाला। आज यहां उस घटना से संबंधित जानकारी के साथ शहीद कुआं और दीवारों पर गोलीबारी के निशान देखे जा सकते हैं। यह स्थान उस दौर की कठिन परिस्थितियों और स्वतंत्रता संघर्ष की गंभीरता को समझने का अवसर देता है।

    कोलकाता का नेताजी भवन भी सुभाष चंद्र बोस के जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े इतिहास को जानने के लिए महत्वपूर्ण है। यहां नेताजी की कार, निजी वस्तुएं, चिट्ठियां और आजाद हिंद फौज से संबंधित दस्तावेज सुरक्षित रखे गए हैं। संग्रहित सामग्री के माध्यम से उनके जीवन, विचारों और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका को समझा जा सकता है।

    अंडमान निकोबार द्वीपसमूह की सेल्युलर जेल को भी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों में गिना जाता है। इसे आमतौर पर काला पानी के नाम से भी जाना जाता है। ब्रिटिश शासन के दौरान कई स्वतंत्रता सेनानियों को यहां कैद रखा गया था। जेल की पुरानी कोठरियां आज भी उस दौर की कठिन परिस्थितियों की याद दिलाती हैं।

    सेल्युलर जेल में आयोजित होने वाला लाइट एंड साउंड शो भी यहां के इतिहास और स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष को दर्शाता है। इस तरह स्वतंत्रता दिवस पर इन स्थानों की यात्रा केवल घूमने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि देश के इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम को करीब से समझने का अवसर भी बन सकती है।

  • अस्पताल में मिथुन चक्रवर्ती से मिले सुवेंदु अधिकारी, बोले- छोटा ऑपरेशन हुआ, अब पूरी तरह ठीक हैं अभिनेता

    अस्पताल में मिथुन चक्रवर्ती से मिले सुवेंदु अधिकारी, बोले- छोटा ऑपरेशन हुआ, अब पूरी तरह ठीक हैं अभिनेता

    नई दिल्ली । अभिनेता और भारतीय जनता पार्टी के नेता मिथुन चक्रवर्ती के स्वास्थ्य को लेकर सामने आई खबर के बाद उनके प्रशंसकों और फिल्म जगत में चिंता का माहौल बन गया था। इसी बीच पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने कोलकाता के एक निजी अस्पताल पहुंचकर मिथुन चक्रवर्ती से मुलाकात की और उनके स्वास्थ्य का हाल जाना। मुलाकात के बाद सुवेंदु अधिकारी ने बताया कि मिथुन चक्रवर्ती का पिछली रात एक छोटा ऑपरेशन हुआ था। उन्होंने कहा कि अभिनेता ने खुद उन्हें और पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष एवं सांसद सामिक भट्टाचार्य को ऑपरेशन के बारे में जानकारी दी थी। हालांकि, मिथुन चक्रवर्ती नहीं चाहते थे कि उनके स्वास्थ्य से जुड़ी यह जानकारी सार्वजनिक की जाए।

    सुवेंदु अधिकारी के मुताबिक मिथुन चक्रवर्ती अब पूरी तरह ठीक हैं और उनकी हालत सामान्य है। उन्होंने अभिनेता के जल्द स्वस्थ होने की कामना भी की। मिथुन चक्रवर्ती के अस्पताल में भर्ती होने की खबर सामने आने के बाद उनके प्रशंसकों के बीच चिंता बढ़ गई थी। हालांकि, अब सामने आई जानकारी के बाद उन्हें राहत मिली है। बताया गया है कि ऑपरेशन छोटा था और इसके बाद उनकी स्थिति स्थिर बनी हुई है। अस्पताल में डॉक्टर उनकी लगातार निगरानी कर रहे हैं।

    मिथुन चक्रवर्ती भारतीय सिनेमा के उन अभिनेताओं में शामिल हैं जिन्होंने हिंदी और बंगाली फिल्मों में लंबे समय तक अपनी अलग पहचान बनाए रखी है। उन्होंने वर्ष 1976 में मशहूर निर्देशक मृणाल सेन की फिल्म ‘मृगया’ से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी। पहली ही फिल्म में उनके अभिनय को व्यापक सराहना मिली और उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसके बाद उन्होंने बंगाली और हिंदी सिनेमा में लगातार काम किया और अलग-अलग तरह के किरदारों के जरिए दर्शकों के बीच अपनी मजबूत पहचान बनाई।

    वर्ष 1978 में आई बंगाली फिल्म ‘नदी थेके सागरे’ से उन्हें लोकप्रियता मिली। इसके बाद ‘सुरक्षा’, ‘तराना’, ‘हम पांच’ और ‘हम से बढ़कर कौन’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अभिनय किया। हालांकि वर्ष 1982 में रिलीज हुई ‘डिस्को डांसर’ उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुई। फिल्म की सफलता ने मिथुन को देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी लोकप्रिय बना दिया। उनके डांस और अभिनय की अलग शैली ने उन्हें दर्शकों के बीच खास पहचान दिलाई।

    इसके बाद मिथुन चक्रवर्ती ने ‘शौकीन’, ‘अशांति’, ‘कसम पैदा करने वाले की’, ‘प्यार झुकता नहीं’, ‘गुलामी’, ‘स्वर्ग से सुंदर’, ‘डांस डांस’, ‘प्यार का मंदिर’, ‘स्वामी विवेकानंद’, ‘गुरु’, ‘गोलमाल 3’, ‘हाउसफुल 2’, ‘ओएमजी-ओह माय गॉड!’, ‘किक’, ‘द ताशकंद फाइल्स’ और ‘द कश्मीर फाइल्स’ समेत कई फिल्मों में काम किया। अपने लंबे फिल्मी करियर के दौरान उन्हें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले। उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। वर्ष 2024 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। फिलहाल उनके छोटे ऑपरेशन के बाद स्वास्थ्य सामान्य बताए जाने से प्रशंसकों को राहत मिली है और सभी उनके जल्द पूरी तरह स्वस्थ होने की कामना कर रहे हैं।

  • तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी पर शुभेंदु अधिकारी बोले, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ राज्य आने के लिए हमेशा स्वागत

    तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी पर शुभेंदु अधिकारी बोले, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ राज्य आने के लिए हमेशा स्वागत

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल में लंबे अंतराल के बाद निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता तस्लीमा नसरीन की सार्वजनिक मौजूदगी एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है। करीब 19 वर्ष बाद कोलकाता में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति के दौरान राज्य के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने उनका स्वागत करते हुए भरोसा दिलाया कि जब भी वह पश्चिम बंगाल आना चाहेंगी, उन्हें पूरी सुरक्षा उपलब्ध कराई जाएगी। इस अवसर को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

    कोलकाता के रवींद्र सदन में आयोजित धार्मिक कट्टरवाद के विरोध पर केंद्रित साहित्यिक कार्यक्रम में तस्लीमा नसरीन ने हिस्सा लिया। लंबे समय बाद शहर में उनकी सार्वजनिक उपस्थिति ने साहित्य, समाज और राजनीति से जुड़े लोगों का ध्यान आकर्षित किया। कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि राज्य सरकार प्रत्येक लेखक और विचारक के अभिव्यक्ति के अधिकार का सम्मान करती है। उन्होंने तस्लीमा नसरीन को आश्वस्त किया कि वह अपनी इच्छा के अनुसार जितनी बार चाहें पश्चिम बंगाल आ सकती हैं और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।

    मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि तस्लीमा नसरीन की रचनाओं को बड़ी संख्या में पाठक पढ़ते हैं और साहित्य के क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने कहा कि एक लोकतांत्रिक समाज में लेखकों और बुद्धिजीवियों को अपने विचार रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। इसी भावना के तहत राज्य सरकार उनकी यात्रा और सुरक्षा से जुड़े सभी आवश्यक इंतजाम करने के लिए प्रतिबद्ध रहेगी।

    कार्यक्रम को संबोधित करते हुए तस्लीमा नसरीन ने अपनी वापसी को प्रतीकात्मक बताया। उन्होंने कहा कि लंबे समय बाद कोलकाता लौटना इस बात का संकेत है कि अन्याय हमेशा कायम नहीं रहता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका संघर्ष किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध का नहीं, बल्कि धार्मिक कट्टरता, असहिष्णुता और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर आधारित रहा है। उनके अनुसार समाज में स्वतंत्र सोच और अभिव्यक्ति के लिए सुरक्षित वातावरण आवश्यक है।

    तस्लीमा नसरीन वर्ष 1994 से निर्वासन का जीवन जी रही हैं। अपनी लेखनी और विचारों के कारण उन्हें कट्टरपंथी संगठनों की ओर से लगातार धमकियां मिलने के बाद बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था। बाद के वर्षों में वह भारत सहित विभिन्न देशों में रहीं। वर्ष 2007 में कोलकाता में उनके लेखन को लेकर हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद उन्हें शहर छोड़ना पड़ा था। इसके बाद उनकी सार्वजनिक रूप से कोलकाता वापसी नहीं हो सकी थी।

    करीब दो दशक बाद उनकी यह यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि उन्होंने भविष्य के लिए ऐसी दुनिया की उम्मीद जताई, जहां किसी लेखक को अपने विचार व्यक्त करने के कारण अपना घर या देश छोड़ने के लिए मजबूर न होना पड़े। उन्होंने कहा कि साहित्य का उद्देश्य समाज में संवाद और विचारों का विस्तार करना है, न कि भय का वातावरण बनाना।

    तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी और राज्य सरकार की ओर से दिए गए सुरक्षा आश्वासन ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लेखकों की सुरक्षा और लोकतांत्रिक अधिकारों पर नई चर्चा को जन्म दिया है। आने वाले समय में यह मुद्दा साहित्यिक और सामाजिक विमर्श के साथ-साथ सार्वजनिक बहस का भी महत्वपूर्ण विषय बना रह सकता है।

  • 19 साल बाद कोलकाता लौटीं तसलीमा नसरीन, बोलीं- अन्याय लंबा चल सकता है, लेकिन हमेशा नहीं रहता

    19 साल बाद कोलकाता लौटीं तसलीमा नसरीन, बोलीं- अन्याय लंबा चल सकता है, लेकिन हमेशा नहीं रहता


    कोलकाता। करीब 19 वर्ष बाद पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता पहुंचीं निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने कहा कि उनकी वापसी इस बात का प्रतीक है कि अन्याय लंबे समय तक चल सकता है, लेकिन हमेशा के लिए नहीं रहता। उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में किसी लेखक को अपने विचारों के कारण अपना देश छोड़ने के लिए मजबूर नहीं होना पड़े।

    रवींद्र सदन में आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में तसलीमा ने कहा कि कोलकाता लौटकर उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है, जैसे वह अपने जीवन के उसी हिस्से में वापस आ गई हैं, जिसे वर्षों पहले यहीं छोड़ना पड़ा था। कार्यक्रम के दौरान मंच पर पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी से जुड़े एक नेता को आमंत्रित किए जाने को लेकर कुछ देर विवाद और हंगामे की स्थिति भी बनी।

    ‘मैं राजनीति नहीं, महिलाओं के अधिकारों की बात करने आई हूं’
    तसलीमा नसरीन ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध में बोलना नहीं है। उन्होंने कहा कि वह केवल महिलाओं के अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में अपनी बात रखने आई हैं।

    उन्होंने कहा कि यूरोप ने उन्हें नागरिकता और रहने का स्थान दिया, लेकिन बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल में उन्हें स्थायी ठिकाना नहीं मिल सका। तसलीमा ने यह भी कहा कि किसी अदालत ने उन्हें कभी दोषी नहीं ठहराया, लेकिन कट्टरपंथी ताकतों के विरोध के कारण उन्हें निर्वासन का जीवन जीना पड़ा।

    सुरक्षा का मिला आश्वासन
    कार्यक्रम में मौजूद पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने तसलीमा नसरीन का स्वागत करते हुए कहा कि जब भी वह राज्य आएंगी, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल आने पर उन्हें किसी तरह की असुरक्षा महसूस नहीं होने दी जाएगी।

    2007 में छोड़ना पड़ा था कोलकाता
    तसलीमा नसरीन वर्ष 2004 से 2007 के बीच कोलकाता में रही थीं। उनकी आत्मकथा ‘द्विखंडितो’ के कुछ अंशों को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए थे, जिसके बाद तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया था। कानून-व्यवस्था की स्थिति का हवाला देते हुए नवंबर 2007 में उन्हें कोलकाता छोड़ना पड़ा।

    इससे पहले वर्ष 1994 में बांग्लादेश में अपनी लेखनी को लेकर इस्लामी कट्टरपंथियों की धमकियों के बाद उन्होंने अपना देश छोड़ दिया था। तब से वह निर्वासन का जीवन जी रही हैं।

  • अभिनेता से अंतरराष्ट्रीय रग्बी खिलाड़ी और समाजसेवी तक, राहुल बोस का बहुआयामी जीवन प्रेरणा का उदाहरण

    अभिनेता से अंतरराष्ट्रीय रग्बी खिलाड़ी और समाजसेवी तक, राहुल बोस का बहुआयामी जीवन प्रेरणा का उदाहरण

    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा में अपनी गंभीर और प्रभावशाली अभिनय शैली के लिए पहचाने जाने वाले राहुल बोस का व्यक्तित्व केवल फिल्मों तक सीमित नहीं है। अभिनेता, फिल्म निर्माता, अंतरराष्ट्रीय रग्बी खिलाड़ी और समाजसेवी के रूप में उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देकर एक बहुआयामी पहचान बनाई है। 27 जुलाई 1967 को कोलकाता में जन्मे राहुल बोस ने अपने जीवन की दिशा केवल मनोरंजन जगत तक सीमित नहीं रखी, बल्कि खेल और सामाजिक सरोकारों को भी बराबर महत्व दिया।

    राहुल बोस की शुरुआती शिक्षा कोलकाता के प्रतिष्ठित स्कूल में हुई, जिसके बाद उन्होंने मुंबई के सिडेनहैम कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त की। बचपन में उनकी मां ने उन्हें बॉक्सिंग और रग्बी जैसे खेलों से परिचित कराया। इसी दौरान उन्होंने क्रिकेट का प्रशिक्षण भी लिया और बॉक्सिंग प्रतियोगिता में रजत पदक हासिल किया। हालांकि आगे चलकर रग्बी उनका सबसे बड़ा जुनून बन गया और उन्होंने इसी खेल में देश का प्रतिनिधित्व करने का निर्णय लिया।

    वर्ष 1998 से 2009 तक राहुल बोस भारतीय राष्ट्रीय रग्बी टीम का हिस्सा रहे और लगभग 11 वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। अभिनय के व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद उन्होंने अपने फिल्मी काम और खेल के बीच संतुलन बनाए रखा। बताया जाता है कि इस दौरान उन्होंने अपनी फिल्मों की शूटिंग भी रग्बी प्रतियोगिताओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के अनुसार तय की, जिससे दोनों क्षेत्रों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता स्पष्ट होती है।

    रग्बी से उनका जुड़ाव खिलाड़ी के रूप में ही समाप्त नहीं हुआ। बाद के वर्षों में उन्होंने खेल के विकास के लिए प्रशासनिक जिम्मेदारी भी संभाली। भारतीय महिला रग्बी टीम की उपलब्धियों और देश में खेल को नई पहचान मिलने के दौर में उन्होंने रग्बी इंडिया के अध्यक्ष के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई। इस भूमिका में उन्होंने खेल के विस्तार और युवा खिलाड़ियों को बेहतर अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में सक्रिय योगदान दिया।

    अभिनय की दुनिया में राहुल बोस ने बचपन में स्कूल के एक नाटक से शुरुआत की थी। बाद में विज्ञापन क्षेत्र में कॉपीराइटर के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने फिल्मों की ओर कदम बढ़ाया। पहली ही प्रमुख फिल्म की सफलता के बाद उन्होंने अभिनय को पूर्णकालिक पेशा बना लिया। उन्होंने हमेशा ऐसी फिल्मों को प्राथमिकता दी जिनमें मजबूत कहानी, सामाजिक संदेश और सशक्त अभिनय की गुंजाइश हो। यही कारण रहा कि उन्होंने समानांतर सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई और कई चर्चित फिल्मों में अपने अभिनय से दर्शकों और समीक्षकों की सराहना हासिल की।

    राहुल बोस ने निर्देशन के क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा दिखाई। उनकी पहली निर्देशित फिल्म को सीमित संसाधनों के बावजूद पूरा किया गया और बाद में उन्होंने एक ऐसी प्रेरणादायक जीवनी पर आधारित फिल्म बनाई, जिसमें कम उम्र में माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली भारतीय बालिका की उपलब्धि को पर्दे पर प्रस्तुत किया गया। उनके निर्देशन में भी सामाजिक संवेदनशीलता और प्रेरक विषयों की स्पष्ट झलक दिखाई देती है।

    सिनेमा और खेल के साथ-साथ समाज सेवा राहुल बोस के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। वर्ष 2004 की सुनामी के दौरान राहत कार्यों में भाग लेने के बाद उन्होंने समाज के वंचित वर्गों के लिए स्थायी रूप से काम करने का संकल्प लिया। इसी उद्देश्य से उन्होंने एक सामाजिक संस्था की स्थापना की, जिसके माध्यम से दूरदराज और संसाधनों से वंचित क्षेत्रों के प्रतिभाशाली बच्चों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। साथ ही बाल यौन शोषण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए हजारों शिक्षकों, अभिभावकों और विद्यार्थियों को प्रशिक्षित करने जैसे अभियान भी संचालित किए गए हैं। अभिनय, खेल और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाकर राहुल बोस ने यह साबित किया है कि सफलता केवल उपलब्धियों से नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने से भी मापी जाती है।

  • कोलकाता एयरपोर्ट परिसर की मस्जिद में जुमे की नमाज पर रोक से बढ़ा विवाद, सुरक्षा व्यवस्था कड़ी, प्रशासन और धार्मिक संगठनों के बीच बढ़ी तनातनी

    कोलकाता एयरपोर्ट परिसर की मस्जिद में जुमे की नमाज पर रोक से बढ़ा विवाद, सुरक्षा व्यवस्था कड़ी, प्रशासन और धार्मिक संगठनों के बीच बढ़ी तनातनी

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में एयरपोर्ट परिसर स्थित गौरीपुर मस्जिद को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए प्रशासन ने मस्जिद में जुमे की नमाज पर अस्थायी रोक लगा दी है, जिसके बाद इलाके में तनावपूर्ण स्थिति बन गई है। एहतियात के तौर पर बड़ी संख्या में पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है तथा पूरे क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत कर दिया गया है।

    प्रशासन के अनुसार, एयरपोर्ट परिसर में स्थित इस मस्जिद के आसपास अगले कुछ दिनों तक निर्माण और सुरक्षा संबंधी कार्य किए जाने हैं। अधिकारियों का कहना है कि मस्जिद दो रनवे के बीच स्थित होने के कारण यहां लोगों की आवाजाही से सुरक्षा संबंधी जोखिम पैदा हो सकता है। इसी वजह से सीमित अवधि के लिए नमाज के लिए लोगों के प्रवेश पर रोक लगाने का निर्णय लिया गया है। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यह फैसला पूरी तरह सुरक्षा और संचालन संबंधी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

    मस्जिद को स्थानांतरित किए जाने का प्रस्ताव भी चर्चा में है। बताया जा रहा है कि मस्जिद प्रबंधन के कुछ सदस्य इस विषय पर प्रशासन के साथ बातचीत के पक्ष में हैं और किसी सहमति वाले समाधान की संभावना तलाश रहे हैं। हालांकि, दूसरे पक्ष ने इस प्रस्ताव का विरोध जताया है और मस्जिद को उसके वर्तमान स्थान पर बनाए रखने की मांग की है। इसी मतभेद के कारण विवाद और अधिक बढ़ गया है।

    इस बीच जमीयत उलेमा-ए-हिंद से जुड़े नेता सिद्दिकुल्लाह चौधरी ने पहले मस्जिद में जुमे की नमाज अदा करने की बात कही थी। उन्होंने यह भी कहा कि जब इस विषय पर प्रशासन के साथ बातचीत जारी है, तब नमाज पर रोक लगाने की आवश्यकता नहीं थी। बाद में उन्होंने पुलिस अधिकारियों से मुलाकात के लिए जाने की जानकारी दी। उनके बयान के बाद प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था और अधिक सख्त कर दी तथा पूरे इलाके में निगरानी बढ़ा दी।

    स्थानीय पुलिस ने मस्जिद से जुड़े धार्मिक प्रतिनिधियों को सूचित किया कि क्षेत्र में भारतीय न्याय संहिता की धारा 163 लागू है और फिलहाल मस्जिद में सामूहिक नमाज की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसके बाद कुछ स्थानीय धार्मिक प्रतिनिधियों ने वैकल्पिक स्थान पर नमाज अदा करने की बात कही। इसके बावजूद प्रशासन किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए पूरी तरह सतर्क बना हुआ है।

    एयरपोर्ट परिसर की ओर जाने वाले सभी प्रमुख मार्गों, गलियों और प्रवेश बिंदुओं पर सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है। पुरुष और महिला पुलिसकर्मियों के अलावा केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के जवान भी लगातार निगरानी कर रहे हैं। आने-जाने वाले लोगों पर नजर रखी जा रही है ताकि कानून-व्यवस्था प्रभावित न हो और एयरपोर्ट का संचालन सामान्य रूप से जारी रह सके।

    फिलहाल प्रशासन का कहना है कि उसकी प्राथमिकता सार्वजनिक सुरक्षा, कानून-व्यवस्था बनाए रखना और एयरपोर्ट संचालन में किसी भी प्रकार की बाधा को रोकना है। दूसरी ओर, मस्जिद से जुड़े पक्षों और प्रशासन के बीच बातचीत की संभावनाएं भी बनी हुई हैं। ऐसे में सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संवाद के जरिए इस विवाद का शांतिपूर्ण और सर्वसम्मत समाधान किस प्रकार निकाला जाता है।