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  • फादर्स डे पर ब्रिटेन, यूएई, केन्या और जिम्बाब्वे के नेताओं ने पिता के महत्व पर साझा किए भावनात्मक संदेश

    फादर्स डे पर ब्रिटेन, यूएई, केन्या और जिम्बाब्वे के नेताओं ने पिता के महत्व पर साझा किए भावनात्मक संदेश


    नई दिल्ली । फादर्स डे के अवसर पर दुनिया भर के नेताओं ने अपने-अपने तरीके से पिता के महत्व को याद किया और उनके प्रति आभार व्यक्त किया। इस खास मौके पर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा कि पिता बनना उनके जीवन की सबसे बड़ी खुशी है और वह आज अपने पिता को याद कर रहे हैं, जिनकी वजह से वह आज अपने बच्चों के पिता हैं। उनका संदेश सरल लेकिन भावनात्मक था, जिसमें उन्होंने पारिवारिक रिश्तों और पिता की भूमिका को जीवन की नींव बताया।

    इसी तरह संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने पिता को परिवार की स्थिरता और खुशी का आधार बताया। उन्होंने अपने संदेश में देश के संस्थापक शेख जायद को याद करते हुए उन्हें एक आदर्श पिता और नेता के रूप में श्रद्धांजलि दी, जिन्होंने अपने जीवन में दया, समझदारी और नेतृत्व के मूल्यों को स्थापित किया।

    यूएई के उप प्रधानमंत्री हमदान बिन मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम ने भी पिता के योगदान को प्रेरणा का स्रोत बताया। उन्होंने कहा कि सच्ची सफलता केवल उपलब्धियों से नहीं बल्कि इस बात से मापी जाती है कि हम दूसरों पर क्या प्रभाव छोड़ते हैं और देश की सेवा को सम्मान कैसे मानते हैं। उनके अनुसार पिता न केवल मार्गदर्शक होते हैं बल्कि जीवन के मूल्यों को आकार देने वाले शिक्षक भी होते हैं।

    यूएई के उपराष्ट्रपति शेख मंसूर बिन जायद अल नाहयान ने भी अपने संदेश में पिता को ज्ञान, उदारता और मानवता का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि एक पिता परिवार की नींव होता है और उसकी सीख आने वाली पीढ़ियों को दिशा देती है।

    अफ्रीकी देशों में भी फादर्स डे पर भावनात्मक संदेश देखने को मिले। केन्या की फर्स्ट लेडी राहेल चेबेट रूटो ने राष्ट्रपति विलियम रूटो को देश के पिता के रूप में सम्मान देते हुए उनके समर्पण और सेवा भावना की सराहना की। वहीं जिम्बाब्वे के नेता नेल्सन चामिसा ने कहा कि एक देश को आगे बढ़ाने के लिए जिम्मेदार और दूरदर्शी नेतृत्व की आवश्यकता होती है, जिसे उन्होंने पिता के रूप में प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त किया।

    इन सभी संदेशों से स्पष्ट है कि पिता केवल एक पारिवारिक भूमिका नहीं बल्कि समाज, नेतृत्व और मूल्यों के निर्माण का आधार माने जाते हैं। फादर्स डे ने एक बार फिर इस बात को दुनिया के सामने रखा कि पिता का योगदान केवल परिवार तक सीमित नहीं होता बल्कि वह समाज और राष्ट्र के भविष्य को भी आकार देता है।

  • राहुल गांधी 56 के हुए, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी; उत्तर भारत में संगठन मजबूत करना और भाजपा की बढ़ती ताकत को रोकना सबसे बड़ी चुनौती

    राहुल गांधी 56 के हुए, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी; उत्तर भारत में संगठन मजबूत करना और भाजपा की बढ़ती ताकत को रोकना सबसे बड़ी चुनौती

    नई दिल्ली । कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 56 वर्ष की आयु पूरी कर ली है। उनके जन्मदिन के अवसर पर कांग्रेस मुख्यालय सहित देशभर में कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस मौके पर राजनीतिक गलियारों में केवल उनके जन्मदिन की चर्चा ही नहीं, बल्कि उनके नेतृत्व में कांग्रेस की वर्तमान स्थिति और भविष्य की चुनौतियों पर भी व्यापक विमर्श देखने को मिला।

    पिछले कुछ वर्षों में राहुल गांधी की राजनीतिक यात्रा में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला है। भारत जोड़ो यात्रा और उसके बाद विभिन्न जनसंपर्क अभियानों ने उनकी राजनीतिक छवि को नया आयाम दिया। लंबे समय तक आलोचनाओं का सामना करने वाले राहुल गांधी ने विपक्षी राजनीति में अपनी भूमिका को अधिक सक्रिय और प्रभावशाली बनाया है। लोकसभा में कांग्रेस के प्रदर्शन में सुधार और विपक्ष के प्रमुख चेहरे के रूप में उनकी स्वीकार्यता को इसी बदलाव का परिणाम माना जा रहा है।

    हाल के महीनों में राहुल गांधी ने युवाओं, छात्रों और रोजगार जैसे मुद्दों को लगातार प्रमुखता दी है। शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं और युवाओं की समस्याओं को लेकर उनकी सक्रियता ने उन्हें नए वर्गों तक पहुंचने का अवसर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस भविष्य की राजनीति में युवा मतदाताओं को केंद्र में रखकर अपनी रणनीति तैयार कर रही है।

    हालांकि उपलब्धियों के बावजूद चुनौतियों का दायरा कम नहीं हुआ है। कांग्रेस आज भी कई राज्यों में आंतरिक गुटबाजी से जूझ रही है। मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, छत्तीसगढ़, बिहार और अन्य राज्यों में संगठनात्मक असंतुलन पार्टी के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। कई अवसरों पर स्थानीय नेताओं के बीच मतभेद चुनावी प्रदर्शन को प्रभावित करते दिखाई दिए हैं। यही कारण है कि संगठन को एकजुट रखना राहुल गांधी की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल माना जा रहा है।

    राजनीतिक स्तर पर कांग्रेस को अपने सहयोगी दलों के साथ संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी लगातार बनी हुई है। विभिन्न राज्यों में गठबंधन की राजनीति बदलते समीकरणों के साथ आगे बढ़ रही है। ऐसे में कांग्रेस को अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान और गठबंधन धर्म के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। यह कार्य आगामी चुनावी वर्षों में और अधिक महत्वपूर्ण होने वाला है।

    राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती भाजपा और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के विस्तार को रोकना भी है। कई राज्यों में भाजपा लगातार अपनी संगठनात्मक शक्ति बढ़ा रही है और नए क्षेत्रों में राजनीतिक प्रभाव स्थापित कर रही है। ऐसे माहौल में कांग्रेस को केवल विपक्षी दल की भूमिका निभाने के बजाय वैकल्पिक राष्ट्रीय नेतृत्व प्रस्तुत करना होगा।

    विशेष रूप से उत्तर भारत के राज्य राहुल गांधी के लिए सबसे कठिन राजनीतिक क्षेत्र बने हुए हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में कांग्रेस की स्थिति को मजबूत करना आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी रणनीतिक आवश्यकता मानी जा रही है। इन राज्यों में संगठन को पुनर्गठित करना और स्थानीय नेतृत्व को मजबूत बनाना पार्टी के भविष्य के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।

    आने वाले दो वर्षों में कई महत्वपूर्ण विधानसभा चुनाव होने हैं। इन चुनावों के नतीजे न केवल कांग्रेस की राजनीतिक दिशा तय करेंगे, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव की आधारभूमि भी तैयार करेंगे। ऐसे में राहुल गांधी के नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा अब शुरू होती दिखाई दे रही है। यदि कांग्रेस संगठनात्मक चुनौतियों से पार पाती है और राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत करती है, तो राष्ट्रीय राजनीति में उसकी भूमिका और प्रभाव दोनों बढ़ सकते हैं। वहीं असफलता की स्थिति में विपक्षी राजनीति के समीकरण भी बदल सकते हैं। फिलहाल राहुल गांधी के सामने अवसर और चुनौती दोनों समान रूप से मौजूद हैं, और आने वाले चुनाव ही उनके नेतृत्व की अगली दिशा तय करेंगे।

  • छोटे स्टार्टअप को बनाया टेक दिग्गज, भारतीय मूल की जयश्री अमेरिका की शीर्ष सेल्फ-मेड महिलाओं में शामिल

    छोटे स्टार्टअप को बनाया टेक दिग्गज, भारतीय मूल की जयश्री अमेरिका की शीर्ष सेल्फ-मेड महिलाओं में शामिल

    नई दिल्ली । भारतीय मूल की कारोबारी नेता जयश्री उल्लाल ने वैश्विक तकनीकी जगत में एक ऐसी सफलता की कहानी लिखी है, जो दूरदर्शिता, नेतृत्व क्षमता और निरंतर मेहनत का प्रेरणादायक उदाहरण बन चुकी है। एक समय बेहद छोटे स्तर पर काम करने वाली कंपनी की कमान संभालने वाली जयश्री आज अमेरिका की सबसे सफल सेल्फ-मेड महिलाओं में शामिल हैं। उनकी उपलब्धि न केवल भारतीय समुदाय के लिए गर्व का विषय है, बल्कि दुनिया भर की महिला उद्यमियों और पेशेवरों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

    जयश्री उल्लाल का शुरुआती जीवन भारत से गहराई से जुड़ा रहा। तकनीक और इंजीनियरिंग के प्रति उनकी रुचि ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका पहुंचाया, जहां उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग और इंजीनियरिंग मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी की। तकनीकी क्षेत्र में मजबूत शैक्षणिक आधार ने उनके करियर की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत उन्होंने सेमीकंडक्टर और तकनीकी कंपनियों में विभिन्न जिम्मेदारियों के साथ की। इसके बाद नेटवर्किंग उद्योग की अग्रणी कंपनियों में काम करते हुए उन्होंने तकनीकी नवाचार, उत्पाद विकास और वैश्विक व्यवसाय संचालन की गहरी समझ विकसित की। यही अनुभव आगे चलकर उनके लिए नेतृत्व की मजबूत नींव साबित हुआ।

    करियर का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्होंने एक उभरती हुई नेटवर्किंग कंपनी की कमान संभाली। उस समय कंपनी सीमित संसाधनों और बेहद कम बाजार हिस्सेदारी के साथ संघर्ष कर रही थी। अधिकांश विशेषज्ञों को उसके भविष्य पर संदेह था, लेकिन जयश्री ने बदलती तकनीकी दुनिया में नए अवसरों को समय रहते पहचान लिया। उन्होंने अनुमान लगाया कि क्लाउड कंप्यूटिंग और बड़े डेटा सेंटर आने वाले वर्षों में पूरी डिजिटल अर्थव्यवस्था की दिशा बदल देंगे।

    इस सोच के आधार पर कंपनी ने अपने उत्पादों और सेवाओं को आधुनिक क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरतों के अनुरूप विकसित करना शुरू किया। जैसे-जैसे दुनिया डिजिटल प्लेटफॉर्म, क्लाउड सेवाओं और बाद में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ओर बढ़ी, कंपनी के समाधान तेजी से लोकप्रिय होते गए। परिणामस्वरूप कंपनी ने वैश्विक तकनीकी बाजार में मजबूत पहचान बनाई और निवेशकों का भरोसा भी हासिल किया।

    जयश्री के नेतृत्व में कंपनी ने न केवल कारोबार का विस्तार किया बल्कि नवाचार और गुणवत्ता के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान स्थापित की। आज उसके उत्पाद दुनिया भर के बड़े डेटा सेंटरों, क्लाउड सेवा प्रदाताओं और तकनीकी संस्थानों में उपयोग किए जाते हैं। कंपनी की यह सफलता सीधे तौर पर जयश्री की रणनीतिक सोच और नेतृत्व क्षमता से जुड़ी मानी जाती है।

    जयश्री उल्लाल की उपलब्धि का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि उन्होंने यह मुकाम किसी पारिवारिक कारोबारी विरासत के सहारे नहीं बल्कि अपनी योग्यता, तकनीकी समझ और पेशेवर अनुभव के दम पर हासिल किया है। उनकी सफलता इस बात का उदाहरण है कि सही दृष्टिकोण, जोखिम उठाने का साहस और लगातार सीखते रहने की क्षमता किसी भी व्यक्ति को वैश्विक स्तर पर पहचान दिला सकती है।

    वैश्विक मंच पर भारतीय मूल की कई महिलाएं आज तकनीक, वित्त, स्वास्थ्य सेवा, मनोरंजन और कॉरपोरेट नेतृत्व के क्षेत्र में प्रभावशाली भूमिका निभा रही हैं। जयश्री उल्लाल की कहानी इसी नई पीढ़ी की सफलता का प्रतीक है, जिसने अपनी प्रतिभा और नेतृत्व के बल पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा को और मजबूत किया है।

  • पश्चिम बंगाल में टीएमसी की अंदरूनी लड़ाई तेज, रिजू दत्ता बोले- अब भी नहीं चेतीं ममता तो संगठन का अस्तित्व खतरे में

    पश्चिम बंगाल में टीएमसी की अंदरूनी लड़ाई तेज, रिजू दत्ता बोले- अब भी नहीं चेतीं ममता तो संगठन का अस्तित्व खतरे में

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है। पार्टी से निष्कासित नेताओं द्वारा लगातार किए जा रहे दावों और बयानों ने राज्य की सियासत को नई दिशा दे दी है। इसी कड़ी में निष्कासित नेता रिजू दत्ता ने पार्टी नेतृत्व पर तीखा हमला बोलते हुए दावा किया है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर बड़ा राजनीतिक बदलाव आकार ले रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि पार्टी नेतृत्व ने समय रहते हालात को नहीं समझा तो संगठन केवल नाममात्र का ढांचा बनकर रह जाएगा।

    रिजू दत्ता का यह बयान ऐसे समय आया है जब पार्टी के एक अन्य निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि उन्हें तृणमूल कांग्रेस के 80 में से 58 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। बागी खेमे का कहना है कि इन विधायकों ने उन्हें अपना नेता चुना है और इस संबंध में विधानसभा अध्यक्ष को भी समर्थन पत्र सौंपा जा चुका है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन इससे राज्य की राजनीति में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।

    रिजू दत्ता ने कहा कि बागी गुट की ओर से उठाया गया कदम पूरी तरह संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं के तहत किया गया है। उनके अनुसार, समय के साथ ऋतब्रत बनर्जी को समर्थन देने वाले विधायकों की संख्या बढ़ रही है। उन्होंने यह भी दावा किया कि अधिकांश विधायक अब भी ममता बनर्जी का सम्मान करते हैं और उन्हें पार्टी का प्रमुख चेहरा मानते हैं, लेकिन संगठन में दूसरे नेतृत्व को लेकर असंतोष मौजूद है।

    बागी नेताओं ने विशेष रूप से अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व शैली पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि पार्टी के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया सीमित होती जा रही है और कई वरिष्ठ नेताओं तथा विधायकों को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा। इसी असंतोष ने वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को जन्म दिया है।

    तृणमूल कांग्रेस के लिए यह संकट ऐसे समय सामने आया है जब हालिया विधानसभा चुनावों में पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। कभी राज्य विधानसभा में भारी बहुमत रखने वाली पार्टी की संख्या अब काफी कम हो चुकी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी झटकों के बाद संगठन के भीतर उभर रहे मतभेद नेतृत्व के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकते हैं।

    इस बीच, पार्टी नेतृत्व की ओर से स्थिति को नियंत्रित करने के प्रयास भी जारी हैं। हालांकि बागी नेताओं के लगातार बयान यह संकेत दे रहे हैं कि असंतोष केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठनात्मक ढांचे और नेतृत्व शैली को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आने वाले दिनों में विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका और कानूनी प्रक्रियाएं इस पूरे विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं।

    फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में नजरें इस बात पर टिकी हैं कि तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व इस चुनौती का सामना किस तरह करता है। एक ओर बागी गुट अपने समर्थन का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर पार्टी नेतृत्व संगठनात्मक एकता बनाए रखने की कोशिश में जुटा हुआ है। आने वाले दिनों में यह संघर्ष राज्य की राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में से एक बन सकता है।

  • बंगाल में नंबर गेम बनाम कानूनी लड़ाई: 58 विधायकों के दावे के बावजूद टीएमसी पर नियंत्रण आसान नहीं, स्पीकर की भूमिका होगी सबसे अहम

    बंगाल में नंबर गेम बनाम कानूनी लड़ाई: 58 विधायकों के दावे के बावजूद टीएमसी पर नियंत्रण आसान नहीं, स्पीकर की भूमिका होगी सबसे अहम

    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय अपने इतिहास के सबसे गंभीर आंतरिक राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रही है। पार्टी के भीतर पनपे एक बड़े बागी गुट ने विधानसभा के कुल 80 विधायकों में से 58 विधायकों के अपने साथ होने का दावा ठोक दिया है। इस संख्या बल ने देश को कुछ समय पहले हुए महाराष्ट्र के शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) विवाद की याद दिला दी है। हालांकि, देश के संवैधानिक कानून और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के फैसलों के आलोक में देखा जाए, तो बागी गुट के लिए केवल 58 विधायकों के समर्थन के दम पर पूरी पार्टी पर नियंत्रण हासिल कर लेना इतना आसान नहीं होने वाला है। इस पूरे सियासी घमासान को सुलझाने और यह तय करने में कि वास्तविक तृणमूल कांग्रेस कौन सी है, पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष (स्पीकर) की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और कानूनी कसौटियों से बंधी होगी।

    इस पूरे मामले के कानूनी पहलुओं को समझें तो साल 2003 में संसद द्वारा किए गए एक महत्वपूर्ण संशोधन के बाद संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) से पैराग्राफ 3 को पूरी तरह हटा दिया गया था। इस पैराग्राफ के हटने से पहले तक यदि किसी पार्टी के एक-तिहाई विधायक अलग होते थे, तो वे पार्टी में ‘विभाजन’ या स्प्लिट का तर्क देकर अयोग्यता की कार्रवाई से बच जाते थे। परंतु अब कानूनी स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। वर्तमान नियमों के तहत यदि किसी राजनीतिक दल या उसके विधायी विंग में कोई फूट होती है और दोनों प्रतिद्वंद्वी गुट एक-दूसरे के विधायकों को अयोग्य ठहराने के लिए विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष याचिका दायर करते हैं, तो कोई भी गुट स्वतः ही खुद को मूल या असली पार्टी होने का वैधानिक दावा नहीं कर सकता।

    सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना विवाद की लंबी सुनवाई के बाद अपने ऐतिहासिक फैसले में यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया था कि दलबदल के मामलों में केवल विधानसभा के भीतर का नंबर गेम असली पार्टी का निर्धारण नहीं कर सकता। देश की शीर्ष अदालत के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, जब किसी दल में दो स्पष्ट फाड़ हो जाते हैं, तो विधायकों की अयोग्यता याचिकाओं पर विचार करते समय स्पीकर को अंधमूल्यांकन या केवल सिरों की गिनती करने से बचना होगा। अध्यक्ष को यह जांचना अनिवार्य है कि विधानसभा के बाहर, यानी मूल राजनीतिक संगठन में पार्टी का नेतृत्व ढांचा कैसा है और आम कार्यकर्ताओं तथा संगठन के पदाधिकारियों का झुकाव किस तरफ है। कोर्ट ने साफ कहा था कि यह महज आंकड़ों की बाजीगरी नहीं है, बल्कि संगठन की मूल आत्मा को पहचानना अनिवार्य है।

    अदालत के आदेशानुसार, असली पार्टी की पहचान करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष को उस दल के मूल संविधान, नियमों और विनियमों को सर्वोपरि मानना होगा जो पार्टी के आंतरिक नेतृत्व के ढांचे को परिभाषित करते हैं। यदि विवाद के दौरान दोनों गुट अपने-अपने फायदे के हिसाब से पार्टी संविधान के अलग-अलग रूप या दस्तावेज पेश करते हैं, तो अध्यक्ष को केवल उसी दस्तावेज को वैध और प्रामाणिक मानना होगा जो राजनीतिक विवाद शुरू होने से ठीक पहले भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के पास आधिकारिक तौर पर जमा था। यह नियम इसलिए बनाया गया है ताकि कोई भी बागी गुट रातों-रात बहुमत के प्रभाव में आकर पार्टी के मूल नियमों और लोकतांत्रिक ढांचे में मनमाना संशोधन न कर सके।

    इस संवैधानिक स्थिति को देखते हुए साफ है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली मूल तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ खड़ा हुआ बागी गुट यदि सिर्फ 58 विधायकों के हस्ताक्षर दिखाकर खुद को असली टीएमसी घोषित करने की मांग करता है, तो विधानसभा अध्यक्ष उसे सीधे मान्यता नहीं दे सकते। पश्चिम बंगाल के स्पीकर को कानूनन बाध्य होकर विधायकों की संख्या के अतिरिक्त, चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में दर्ज टीएमसी के सांगठनिक ढांचे, पार्टी अध्यक्ष की शक्तियों और मुख्य संगठन की जमीनी स्थिति को भी अपनी जांच के दायरे में लाना होगा। ऐसे में जब तक संगठन पर पकड़ साबित नहीं होती, तब तक बागी विधायकों पर अयोग्यता की तलवार लटकती रहेगी और टीएमसी पर पूर्ण नियंत्रण का उनका सपना कानूनी दांवपेंच में उलझा रहेगा।

  • कर्नाटक में 'शिवकुमार युग' की शुरुआत: डीके शिवकुमार ने ली मुख्यमंत्री पद की शपथ, कैबिनेट में दिखा सिद्धारमैया का दबदबा

    कर्नाटक में 'शिवकुमार युग' की शुरुआत: डीके शिवकुमार ने ली मुख्यमंत्री पद की शपथ, कैबिनेट में दिखा सिद्धारमैया का दबदबा

    नई दिल्ली। कर्नाटक के राजनीतिक परिदृश्य में लंबे समय से चल रहा नेतृत्व का इंतजार आखिरकार समाप्त हो गया, जब वरिष्ठ कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार ने बेंगलुरु के लोक भवन में आयोजित एक भव्य और गरिमामय समारोह में राज्य के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ ली। इस ऐतिहासिक राजनीतिक घटनाक्रम के साथ ही राज्य में एक नए अध्याय की शुरुआत हो गई है। शपथ ग्रहण समारोह के दौरान मुख्यमंत्री शिवकुमार ने तुमकुरु जिले के श्रद्धेय शैव संत वीरा गंगाधर अज्जैया के नाम पर और हाथ में भारत के संविधान की प्रति लेकर मुख्यमंत्री पद की कसम खाई। इस समारोह में कांग्रेस आलाकमान के वरिष्ठ नेताओं सहित कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने शिरकत की, जिससे यह आयोजन पार्टी के लिए एक बड़े शक्ति प्रदर्शन में तब्दील हो गया।

    हालांकि, सत्ता की शीर्ष कमान डीके शिवकुमार के हाथों में सौंपे जाने के बावजूद, नवगठित मंत्रिपरिषद के स्वरूप को देखकर यह साफ हो गया है कि संगठन के भीतर पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का राजनीतिक सिक्का और प्रभाव अभी भी मजबूती से कायम है। नई सरकार की शुरुआती कैबिनेट में सिद्धारमैया के वफादारों और करीबियों का दबदबा स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। राज्य के एक प्रमुख दलित चेहरे जी. परमेश्वर को उपमुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जबकि शुरुआती चरण में कैबिनेट रैंक के मंत्री के रूप में 12 अन्य विधायकों को भी शामिल किया गया है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की सबसे ज्यादा चर्चा है कि पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया न केवल अपने गुट के वरिष्ठ विधायकों को मंत्रिपरिषद में तरजीह दिलाने में सफल रहे, बल्कि उन्होंने अपने बेटे यतींद्र सिद्धारमैया को भी नई कैबिनेट में सुरक्षित स्थान दिलाकर राजनीतिक रूप से पूरी तरह स्थापित कर दिया है। इसके साथ ही, एमएलसी बीके हरिप्रसाद को कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (केपीसीसी) का नया अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, जिसकी आधिकारिक घोषणा शपथ ग्रहण के कुछ घंटों बाद ही कर दी गई।

    मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभालते ही डीके शिवकुमार पूरी तरह से प्रशासनिक एक्शन में नजर आए। उन्होंने तुरंत अपनी पहली कैबिनेट बैठक की अध्यक्षता की और अपनी सरकार की प्राथमिकताओं को रेखांकित करते हुए इसे ‘युवा युग’ के आगाज़ का नाम दिया। इस बैठक में युवाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने के लिए कई बड़े और दूरगामी फैसलों पर मुहर लगाई गई। सरकार ने राज्य के सभी स्कूली छात्रों से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन तक के विद्यार्थियों के लिए मुफ्त बस पास की सुविधा देने का बड़ा निर्णय लिया है। इसके साथ ही बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए निजी क्षेत्र की नौकरियों को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से एक विशेष डिजिटल रोजगार एक्सचेंज पोर्टल स्थापित करने की घोषणा की गई है। युवाओं को सरकारी तंत्र में पारदर्शी अवसर देने के लिए समयबद्ध भर्ती कैलेंडर जारी करने और राज्य भर में 10,000 ‘भारत जोड़ो युवा क्लब’ बनाने का फैसला भी लिया गया है। इसके अतिरिक्त, शहरी विकास को गति देने के लिए सड़कों की मरम्मत हेतु 2,000 करोड़ रुपये का विशेष बजट स्वीकृत किया गया है और आवासीय निर्माण को बढ़ावा देने के लिए बिल्डिंग नियमों में रियायत दी गई है।

    नई कैबिनेट के गठन में कांग्रेस आलाकमान ने राज्य के जटिल सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को संतुलित करने का पूरा प्रयास किया है। जातीय गणित के लिहाज से कर्नाटक के तीन सबसे प्रभावशाली समुदायों यानी वोक्कालिगा, लिंगायत और अनुसूचित जाति (SC) को प्रतिनिधित्व देते हुए प्रत्येक वर्ग से 3-3 मंत्री बनाए गए हैं। इसके अलावा सिद्धारमैया के अपने कुरुबा समुदाय से 2 मंत्रियों को जगह मिली है, जबकि अनुसूचित जनजाति (ST), मुस्लिम और ईसाई समुदायों से एक-एक चेहरे को मंत्रिमंडल में स्थान दिया गया है। हालांकि, शुरुआती सूची में किसी भी महिला विधायक को जगह न मिलने पर राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं। राज्य में कुल स्वीकृत मंत्रियों की संख्या 34 है, जिसे देखते हुए माना जा रहा है कि आगामी 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव के ठीक बाद कैबिनेट का दूसरा विस्तार किया जाएगा, जिसमें शेष खाली पदों को भरा जाएगा और क्षेत्रीय असंतुलन को दूर किया जाएगा। फिलहाल, बेंगलुरु के इस भव्य समारोह में एआईसीसी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों की उपस्थिति ने यह संदेश दे दिया है कि कांग्रेस दक्षिण के इस महत्वपूर्ण राज्य में अपनी पकड़ को और मजबूत करने के लिए पूरी रणनीति के साथ आगे बढ़ रही है।

  • जगदंबिका पाल, निशिकांत दुबे और एकनाथ शिंदे समेत 12 सांसदों को मिलेगा संसद रत्न पुरस्कार, कई दिग्गज नाम सूची में शामिल

    जगदंबिका पाल, निशिकांत दुबे और एकनाथ शिंदे समेत 12 सांसदों को मिलेगा संसद रत्न पुरस्कार, कई दिग्गज नाम सूची में शामिल


    नई दिल्ली। लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनावी जीत तक सीमित नहीं होती, बल्कि संसद के भीतर जनहित के मुद्दों पर सक्रिय भागीदारी, गंभीर चर्चा और प्रभावी कार्यशैली भी इसकी महत्वपूर्ण पहचान मानी जाती है। इसी उद्देश्य को प्रोत्साहित करने के लिए हर वर्ष उन जनप्रतिनिधियों को विशेष सम्मान दिया जाता है जिन्होंने संसद में अपनी सक्रियता और प्रभावशाली योगदान के जरिए अलग पहचान बनाई हो। इस वर्ष भी देश के विभिन्न राज्यों से आने वाले कई सांसदों और संसदीय समितियों को उनके उल्लेखनीय प्रदर्शन के लिए चयनित किया गया है। इस सूची में कई अनुभवी और चर्चित नेताओं के नाम शामिल होने से राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है।

    इस बार सम्मान के लिए चुने गए सांसदों में कई ऐसे चेहरे शामिल हैं जिन्होंने संसद के भीतर अपनी सक्रिय मौजूदगी, बहसों में भागीदारी और विभिन्न जनहित विषयों को उठाने के कारण पहचान बनाई है। चयनित नामों में वरिष्ठ और प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तित्वों की उपस्थिति यह संकेत देती है कि संसदीय कार्यों में निरंतर भागीदारी और जिम्मेदार भूमिका को गंभीरता से देखा जा रहा है। इन नेताओं ने अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों को सदन में प्रभावी ढंग से उठाकर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।

    संसद केवल कानून बनाने की संस्था नहीं बल्कि देश की नीतियों, जनसमस्याओं और विकास योजनाओं पर गहन चर्चा का सबसे बड़ा मंच माना जाता है। ऐसे में किसी सांसद की सक्रियता केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहती बल्कि प्रश्न पूछना, समितियों में योगदान देना, चर्चाओं में हिस्सा लेना और जनहित के विषयों पर गंभीर हस्तक्षेप करना भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी आधार पर ऐसे जनप्रतिनिधियों की पहचान की जाती है जिन्होंने संसदीय जिम्मेदारियों को प्रभावी तरीके से निभाया हो।

    इस वर्ष केवल सांसद ही नहीं बल्कि चार संसदीय समितियों को भी विशेष सम्मान के लिए चुना गया है। संसदीय समितियां शासन और नीतिगत फैसलों की गहराई से समीक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। विभिन्न मंत्रालयों, योजनाओं और प्रशासनिक कार्यों की जांच और सुझाव देने के कारण इन समितियों को संसद की कार्यप्रणाली का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इसलिए इनके उत्कृष्ट प्रदर्शन को भी विशेष महत्व दिया जा रहा है।

    इस बार चयनित चेहरों में कुछ ऐसे नाम भी शामिल हैं जिनका राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव काफी व्यापक रहा है। लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहने वाले कई नेताओं ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न जिम्मेदारियां निभाई हैं। यही अनुभव संसदीय कार्यों में उनकी प्रभावशीलता को और मजबूत बनाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे सम्मान जनप्रतिनिधियों को केवल प्रोत्साहित ही नहीं करते बल्कि संसदीय कार्यों के प्रति जिम्मेदारी और जवाबदेही को भी बढ़ावा देते हैं।

    लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद की गुणवत्ता काफी हद तक उसके सदस्यों की सक्रियता और कार्यशैली पर निर्भर करती है। ऐसे सम्मान यह संदेश देते हैं कि केवल राजनीतिक पहचान ही नहीं बल्कि जनहित और संसदीय योगदान भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। यही कारण है कि संसद के भीतर प्रभावशाली और सक्रिय भागीदारी को लोकतंत्र की मजबूती का आधार माना जाता है।

  • प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में पूरे देश में हुआ है खादी पुनर्जागरण का सूत्रपात : मुख्यमंत्री डॉ. यादव

    प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में पूरे देश में हुआ है खादी पुनर्जागरण का सूत्रपात : मुख्यमंत्री डॉ. यादव


    भोपाल।
    मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि खादी केवल वस्त्र नहीं, बल्कि राष्ट्र की गौरवशाली पहचान है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में खादी को “नए भारत की नई खादी” के रूप में नई पहचान मिली है, जिससे पूरे देश में खादी पुनर्जागरण का सूत्रपात हुआ है।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने रविवार को एक बयान में कहा कि आत्मनिर्भर मध्य प्रदेश, युवाओं का सशक्तिकरण और ग्रामीण विकास उनकी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है। मप्र खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड के माध्यम से खादी और ग्रामोद्योग राज्य की प्रगति का सशक्त स्तंभ बन रहे हैं। बुनकर मुद्रा योजना के तहत पिछले तीन वर्षों 2023-24 से 2025-26 में कुल 194 बुनकरों को 268.50 लाख रुपये का ऋण वितरित किया गया है। वर्ष 2023-24 में 44 बुनकरों को 21.40 लाख, 2024-25 में 147 बुनकरों को 231.80 लाख और 2025-26 में 3 बुनकरों को 15.30 लाख रुपये का ऋण दिया गया।

    उन्होंने कहा कि गांधीजी के ‘ग्राम स्वराज’ और ‘गाँव की ओर जाओ’ संदेश को साकार करते हुए बोर्ड ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन, परंपरागत कारीगरी को आधुनिक नवाचार से जोड़ने और सांस्कृतिक गौरव को बढ़ाने का कार्य कर रहा है।

    प्रदेश के कुटीर एवं ग्रामोद्योग राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिलीप जायसवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के “आत्मनिर्भर भारत, भारत में बनाओ, स्वदेशी के लिए मुखर, स्टार्टअप इंडिया” जैसे अभियानों और “सबका साथ, सबका विकास” मंत्र ने खादी एवं ग्रामोद्योग को वैश्विक पहचान दिलाई है। “स्थानीय से वैश्विक” का दृष्टिकोण कारीगरों और ग्रामीण उद्यमियों को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ रहा है।

    राज्यमंत्री जायसवाल ने कहा कि भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय द्वारा 50 हजार से 5 लाख तक की ऋण सुविधा व्यक्तिगत बुनकर, उद्यमी, स्व-सहायता समूह, हथकरघा संगठन और सहकारी समितियों को दी जा रही है। बुनकरों की सामाजिक सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री जीवन बीमा योजना में तीन वर्षों में 616 बुनकर और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना में 840 बुनकर बीमित किए गए। प्रधानमंत्री जीवन बीमा योजना में 436 रुपये वार्षिक शुल्क पर 2 लाख का जीवन बीमा और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना में मात्र 20 रुपये वार्षिक शुल्क पर 2 लाख का दुर्घटना बीमा मिल रहा है।

    राज्यमंत्री जायसवाल ने कहा कि म.प्र. खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड सूती, ऊनी, रेशमी एवं पॉलीवस्त्र खादी के साथ मसाले, साबुन, जड़ी-बूटी उत्पाद एवं हस्तनिर्मित वस्तुओं को बढ़ावा दे रहा है। विपणन के लिए “विन्ध्या वैली” और “कबीरा” जैसे नाम स्थापित किए गए हैं जो गुणवत्ता और परंपरा के प्रतीक हैं। “अपना हाथ – अपना साथ” के मार्गदर्शन में महिला स्व-सहायता समूहों, कारीगरों और उद्यमियों को तकनीकी एवं वित्तीय सहयोग दिया जा रहा है।

    प्रबंध संचालक माल सिंह भयड़िया ने बताया कि महात्मा गांधी जी के “गाँव की ओर चलो” आह्वान से प्रेरित होकर मंडल ने ग्रामोद्योग को आर्थिक एवं सामाजिक परिवर्तन का सशक्त साधन बनाया है। सुव्यवस्थित योजनाओं से ग्रामीण कारीगरों के उत्पादों को उचित बाजार मिल रहा है। बोर्ड की नई अंतरजाल साइट कारीगरों, उद्यमियों एवं समाज के बीच मजबूत सेतु का कार्य करेगी। प्रशिक्षण कार्यक्रम और प्रदर्शनियाँ प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर को भी संरक्षित कर रही हैं।

    तीन वर्षों की प्रगति एक नजर में

    – बुनकर मुद्रा योजना: 194 बुनकरों को 268.50 लाख रुपये का ऋण वितरित
    – प्रधानमंत्री जीवन बीमा योजना: 616 बुनकर बीमित
    – प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना: 840 बुनकर बीमित

  • नए उपाध्यक्ष के तौर पर सक्रिय हुए अशोक लाहिड़ी, पीएम से मुलाकात में विकास एजेंडे पर चर्चा..

    नए उपाध्यक्ष के तौर पर सक्रिय हुए अशोक लाहिड़ी, पीएम से मुलाकात में विकास एजेंडे पर चर्चा..

    नई दिल्ली। नीति आयोग के नए उपाध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी संभालने के बाद वरिष्ठ अर्थशास्त्री अशोक लाहिड़ी ने राजधानी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। यह मुलाकात पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद हुई एक महत्वपूर्ण औपचारिक बैठक मानी जा रही है, जिसमें देश की आर्थिक नीतियों और विकास योजनाओं से जुड़े व्यापक मुद्दों पर विचार-विमर्श की संभावना रही।

    अशोक लाहिड़ी लंबे समय से भारत की आर्थिक नीति निर्माण प्रक्रिया से जुड़े रहे हैं और उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। उनके अनुभव को देखते हुए नीति आयोग में उनकी नियुक्ति को सरकार के आर्थिक दृष्टिकोण को और मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

    इस नई जिम्मेदारी के साथ नीति आयोग में कार्यशैली और प्राथमिकताओं में भी बदलाव की उम्मीद की जा रही है। सरकार का फोकस इस समय विकास, निवेश और आर्थिक सुधारों को गति देने पर है, ऐसे में लाहिड़ी की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    लाहिड़ी का करियर चार दशकों से अधिक का रहा है, जिसमें उन्होंने मुख्य आर्थिक सलाहकार और विभिन्न वैश्विक वित्तीय संस्थानों के साथ काम किया है। उनकी विशेषज्ञता खास तौर पर वित्तीय नीति और मैक्रो-इकोनॉमिक प्लानिंग में मानी जाती है।

    उनकी नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब देश तेजी से बदलते वैश्विक आर्थिक माहौल के बीच अपनी विकास रणनीतियों को मजबूत करने पर ध्यान दे रहा है। इस संदर्भ में नीति आयोग में उनकी भूमिका नीति निर्माण को और अधिक व्यावहारिक और डेटा आधारित बनाने में मदद कर सकती है।

    प्रधानमंत्री से उनकी यह मुलाकात केवल औपचारिकता नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे आने वाले समय की नीति दिशा और प्राथमिकताओं के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।

  • चंद्रशेखर जयंती के विशेष संयोग ने इस राजनीतिक घटनाक्रम को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया..

    चंद्रशेखर जयंती के विशेष संयोग ने इस राजनीतिक घटनाक्रम को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया..

    नई दिल्ली:चंद्रशेखर जयंती पर हरिवंश नारायण सिंह का राज्यसभा उपसभापति के रूप में तीसरी बार चयन, प्रधानमंत्री ने अनुभव और संतुलन की भूमिका को बताया लोकतांत्रिक मजबूती का आधार
    राज्यसभा में शुक्रवार का दिन संसदीय कार्यवाही के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा, जब हरिवंश नारायण सिंह को लगातार तीसरी बार उपसभापति के रूप में चुना गया। सदन में इस निर्णय को व्यापक समर्थन मिला और उनके चयन को अनुभव, संतुलन और संसदीय परंपराओं के प्रति भरोसे की निरंतरता के रूप में देखा गया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने उन्हें बधाई देते हुए कहा कि यह उपलब्धि केवल एक पद का दोहराव नहीं है, बल्कि सदन के प्रति उनके लंबे अनुभव और प्रभावी कार्यशैली की स्वीकृति है।

    प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि हरिवंश नारायण सिंह ने बीते वर्षों में राज्यसभा की कार्यवाही को सुचारु और संतुलित बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के बीच संतुलन स्थापित करना और सदन की गरिमा को बनाए रखना एक कठिन कार्य है, जिसे उन्होंने अपने धैर्य और समझदारी से निभाया है। उनके अनुसार, उनकी कार्यशैली ने सदन में संवाद और अनुशासन दोनों को मजबूत किया है।

    प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि हरिवंश नारायण सिंह का जीवन अनुभव और सामाजिक जुड़ाव सदन की कार्यवाही को अधिक समृद्ध बनाता है। उन्होंने ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर शिक्षा और पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य किया और बाद में संसदीय जिम्मेदारी संभालते हुए लोकतांत्रिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका अनुभव सदन की चर्चाओं को अधिक गहराई और संतुलन प्रदान करता है।

    इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने एक विशेष संयोग का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस दिन हरिवंश नारायण सिंह को तीसरी बार यह जिम्मेदारी मिली, उसी दिन देश के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की जयंती भी है। उन्होंने बताया कि हरिवंश का चंद्रशेखर के साथ गहरा संबंध रहा है और वे उनके विचारों और कार्यों से जुड़े रहे हैं। यह संयोग इस अवसर को और भी महत्वपूर्ण बना देता है।

    प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि हरिवंश नारायण सिंह का जीवन सामाजिक चेतना और जनसेवा से प्रेरित रहा है। शिक्षा के दौरान काशी में उनका अध्ययन उनके व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण रहा। ग्रामीण परिवेश से आने के कारण उन्होंने समाज की वास्तविकताओं को करीब से समझा, जिसका प्रभाव उनके सार्वजनिक जीवन में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

    उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पिछले कुछ वर्षों में हरिवंश ने देशभर के शैक्षणिक संस्थानों में संवाद कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी निभाई है। यह प्रयास युवाओं और नीति निर्माण की दुनिया के बीच एक सेतु का कार्य करता है और लोकतांत्रिक संवाद को और मजबूत बनाता है।

    राज्यसभा में उनके पुनर्निर्वाचन को लेकर विभिन्न सदस्यों ने भी सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की। सदन में यह माना गया कि अनुभवी नेतृत्व संसदीय कार्यवाही को अधिक प्रभावी और संतुलित बनाता है। उनके चयन को निरंतरता और स्थिरता के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है।