बंगाल में नंबर गेम बनाम कानूनी लड़ाई: 58 विधायकों के दावे के बावजूद टीएमसी पर नियंत्रण आसान नहीं, स्पीकर की भूमिका होगी सबसे अहम

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय अपने इतिहास के सबसे गंभीर आंतरिक राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रही है। पार्टी के भीतर पनपे एक बड़े बागी गुट ने विधानसभा के कुल 80 विधायकों में से 58 विधायकों के अपने साथ होने का दावा ठोक दिया है। इस संख्या बल ने देश को कुछ समय पहले हुए महाराष्ट्र के शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) विवाद की याद दिला दी है। हालांकि, देश के संवैधानिक कानून और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के फैसलों के आलोक में देखा जाए, तो बागी गुट के लिए केवल 58 विधायकों के समर्थन के दम पर पूरी पार्टी पर नियंत्रण हासिल कर लेना इतना आसान नहीं होने वाला है। इस पूरे सियासी घमासान को सुलझाने और यह तय करने में कि वास्तविक तृणमूल कांग्रेस कौन सी है, पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष (स्पीकर) की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और कानूनी कसौटियों से बंधी होगी।

इस पूरे मामले के कानूनी पहलुओं को समझें तो साल 2003 में संसद द्वारा किए गए एक महत्वपूर्ण संशोधन के बाद संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) से पैराग्राफ 3 को पूरी तरह हटा दिया गया था। इस पैराग्राफ के हटने से पहले तक यदि किसी पार्टी के एक-तिहाई विधायक अलग होते थे, तो वे पार्टी में ‘विभाजन’ या स्प्लिट का तर्क देकर अयोग्यता की कार्रवाई से बच जाते थे। परंतु अब कानूनी स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। वर्तमान नियमों के तहत यदि किसी राजनीतिक दल या उसके विधायी विंग में कोई फूट होती है और दोनों प्रतिद्वंद्वी गुट एक-दूसरे के विधायकों को अयोग्य ठहराने के लिए विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष याचिका दायर करते हैं, तो कोई भी गुट स्वतः ही खुद को मूल या असली पार्टी होने का वैधानिक दावा नहीं कर सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना विवाद की लंबी सुनवाई के बाद अपने ऐतिहासिक फैसले में यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया था कि दलबदल के मामलों में केवल विधानसभा के भीतर का नंबर गेम असली पार्टी का निर्धारण नहीं कर सकता। देश की शीर्ष अदालत के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, जब किसी दल में दो स्पष्ट फाड़ हो जाते हैं, तो विधायकों की अयोग्यता याचिकाओं पर विचार करते समय स्पीकर को अंधमूल्यांकन या केवल सिरों की गिनती करने से बचना होगा। अध्यक्ष को यह जांचना अनिवार्य है कि विधानसभा के बाहर, यानी मूल राजनीतिक संगठन में पार्टी का नेतृत्व ढांचा कैसा है और आम कार्यकर्ताओं तथा संगठन के पदाधिकारियों का झुकाव किस तरफ है। कोर्ट ने साफ कहा था कि यह महज आंकड़ों की बाजीगरी नहीं है, बल्कि संगठन की मूल आत्मा को पहचानना अनिवार्य है।

अदालत के आदेशानुसार, असली पार्टी की पहचान करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष को उस दल के मूल संविधान, नियमों और विनियमों को सर्वोपरि मानना होगा जो पार्टी के आंतरिक नेतृत्व के ढांचे को परिभाषित करते हैं। यदि विवाद के दौरान दोनों गुट अपने-अपने फायदे के हिसाब से पार्टी संविधान के अलग-अलग रूप या दस्तावेज पेश करते हैं, तो अध्यक्ष को केवल उसी दस्तावेज को वैध और प्रामाणिक मानना होगा जो राजनीतिक विवाद शुरू होने से ठीक पहले भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के पास आधिकारिक तौर पर जमा था। यह नियम इसलिए बनाया गया है ताकि कोई भी बागी गुट रातों-रात बहुमत के प्रभाव में आकर पार्टी के मूल नियमों और लोकतांत्रिक ढांचे में मनमाना संशोधन न कर सके।

इस संवैधानिक स्थिति को देखते हुए साफ है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली मूल तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ खड़ा हुआ बागी गुट यदि सिर्फ 58 विधायकों के हस्ताक्षर दिखाकर खुद को असली टीएमसी घोषित करने की मांग करता है, तो विधानसभा अध्यक्ष उसे सीधे मान्यता नहीं दे सकते। पश्चिम बंगाल के स्पीकर को कानूनन बाध्य होकर विधायकों की संख्या के अतिरिक्त, चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में दर्ज टीएमसी के सांगठनिक ढांचे, पार्टी अध्यक्ष की शक्तियों और मुख्य संगठन की जमीनी स्थिति को भी अपनी जांच के दायरे में लाना होगा। ऐसे में जब तक संगठन पर पकड़ साबित नहीं होती, तब तक बागी विधायकों पर अयोग्यता की तलवार लटकती रहेगी और टीएमसी पर पूर्ण नियंत्रण का उनका सपना कानूनी दांवपेंच में उलझा रहेगा।