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  • दुबलेपन को न समझें अच्छी सेहत की निशानी, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया असली फिटनेस का वास्तविक पैमाना

    दुबलेपन को न समझें अच्छी सेहत की निशानी, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया असली फिटनेस का वास्तविक पैमाना

    नई दिल्ली :आधुनिक दौर में सोशल मीडिया के प्रभाव के कारण अधिकांश लोग पतले दिखने को ही अच्छी फिटनेस का पर्याय मानने लगे हैं। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि केवल वजन कम होना या दुबला दिखना किसी व्यक्ति के पूर्ण स्वस्थ होने का प्रमाण नहीं है। वास्तविक फिटनेस का सीधा संबंध इस बात से है कि आपका शरीर दैनिक जीवन के कार्यों को कितनी सहजता और ऊर्जा के साथ पूरा करता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, केवल बाहरी शारीरिक बनावट के आधार पर किसी के स्वास्थ्य का सही आकलन नहीं किया जा सकता। यदि कोई व्यक्ति दिखने में सामान्य या पतला है, लेकिन दिनभर सुस्ती महसूस करता है, सीढ़ियां चढ़ने में हांफने लगता है या उसकी नींद पूरी नहीं होती, तो उसे पूर्णतः स्वस्थ नहीं माना जा सकता। असली फिटनेस शरीर को क्रियाशील, ऊर्जावान और बीमारियों से मुक्त बनाए रखने में निहित है।

    शारीरिक क्षमता का परीक्षण दैनिक गतिविधियों से होता है। थोड़ा सा चलने, वजन उठाने या सामान्य मेहनत के काम करने पर अत्यधिक थकान या सांस फूलना खराब कार्डियोवैस्कुलर फिटनेस का संकेत हो सकता है। यदि पहले की तुलना में सामान्य काम करने में भी परेशानी होने लगे, तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय अपनी जीवनशैली और आहार में आवश्यक सुधार करना चाहिए।

    एक स्वस्थ शरीर के लिए लचीलापन और शारीरिक संतुलन भी बेहद महत्वपूर्ण घटक हैं। बिना किसी कठिनाई के झुकना, मुड़ना और दैनिक गतिविधियों के दौरान संतुलन बनाए रखना अच्छी शारीरिक स्थिति को दर्शाता है। बढ़ती उम्र के साथ शरीर की स्थिरता बनाए रखने के लिए नियमित रूप से हल्का व्यायाम और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करना बेहद लाभकारी सिद्ध होता है।

    शारीरिक संकेतकों की बात करें तो रेस्टिंग हार्ट रेट और ब्लड प्रेशर स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण पैमाना हैं। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार, सामान्य स्थिति में नियंत्रित ब्लड प्रेशर और स्थिर हृदय गति अंदरूनी रूप से मजबूत शरीर का संकेत देती है। बाहर से फिट दिखने वाले व्यक्ति भी उच्च रक्तचाप या अन्य आंतरिक स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त हो सकते हैं, इसलिए नियमित जांच आवश्यक है।

    शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य का संतुलन भी उतना ही अनिवार्य है। अत्यधिक तनाव, चिड़चिड़ापन या उदासी व्यक्ति की कार्यक्षमता को प्रभावित करती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित शारीरिक गतिविधि न केवल मांसपेशियों को मजबूत करती है, बल्कि मानसिक तनाव को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करती है।

    मध्य प्रदेश सहित देशभर के स्वास्थ्य विशेषज्ञों का सुझाव है कि लोग केवल वजन घटाने वाले भ्रामक पैमानों के पीछे न भागें। संतुलित पोषण, पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम और तनावमुक्त दिनचर्या को अपनाकर ही वास्तविक फिटनेस हासिल की जा सकती है। अपने शरीर के संकेतों को समझना और आंतरिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना ही लंबे समय तक स्वस्थ रहने का सबसे कारगर तरीका है।

  • ऑफिस ड्रेस कोड के साथ चुनें सही जूते, जानिए फॉर्मल शूज़ और स्नीकर्स में कौन है बेहतर विकल्प

    ऑफिस ड्रेस कोड के साथ चुनें सही जूते, जानिए फॉर्मल शूज़ और स्नीकर्स में कौन है बेहतर विकल्प

    नई दिल्ली। बदलते कॉर्पोरेट माहौल के साथ ऑफिस संस्कृति में भी तेजी से बदलाव आया है। पहले जहां अधिकांश संस्थानों में सख्त फॉर्मल ड्रेस कोड लागू होता था, वहीं अब कई कंपनियां बिजनेस कैजुअल और स्मार्ट कैजुअल पहनावे को बढ़ावा दे रही हैं। ऐसे में कर्मचारियों के सामने यह सवाल अक्सर रहता है कि ऑफिस के लिए फॉर्मल शूज़ पहनना बेहतर रहेगा या स्नीकर्स। विशेषज्ञों का मानना है कि सही फुटवियर का चुनाव केवल आपके व्यक्तित्व को निखारता ही नहीं, बल्कि पूरे दिन की कार्यक्षमता और आराम पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है।

    यदि आपका कार्यक्षेत्र बैंकिंग, सरकारी कार्यालय, वित्तीय संस्थान, कानूनी सेवाओं या पारंपरिक कॉर्पोरेट सेक्टर से जुड़ा है, जहां प्रोफेशनल ड्रेस कोड का पालन अनिवार्य होता है, तो फॉर्मल शूज़ सबसे उपयुक्त विकल्प माने जाते हैं। क्लाइंट मीटिंग, इंटरव्यू, बिजनेस प्रेजेंटेशन या किसी आधिकारिक कार्यक्रम में फॉर्मल शूज़ आपकी पेशेवर छवि को मजबूत बनाते हैं और आत्मविश्वास भी बढ़ाते हैं। साफ-सुथरे और अच्छी गुणवत्ता वाले फॉर्मल शूज़ आज भी प्रोफेशनल लुक का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं।

    दूसरी ओर, यदि आप सूचना प्रौद्योगिकी, स्टार्टअप, मीडिया, डिजिटल मार्केटिंग, डिजाइन या किसी रचनात्मक क्षेत्र में कार्यरत हैं, तो स्नीकर्स भी एक बेहतर विकल्प हो सकते हैं। कई आधुनिक कंपनियां कर्मचारियों को आरामदायक और स्मार्ट कैजुअल फुटवियर पहनने की अनुमति देती हैं। साधारण और सादे डिजाइन वाले स्नीकर्स स्टाइलिश दिखने के साथ-साथ लंबे समय तक आराम भी प्रदान करते हैं। ऐसे जूते उन लोगों के लिए अधिक उपयोगी साबित होते हैं जिन्हें दिनभर ऑफिस परिसर में अधिक चलना-फिरना पड़ता है।

    आराम के लिहाज से स्नीकर्स को अक्सर बेहतर माना जाता है क्योंकि इनमें बेहतर कुशनिंग, हल्का वजन और पैरों को पर्याप्त सपोर्ट मिलता है। लंबे समय तक खड़े रहने या लगातार चलने वाले कर्मचारियों के लिए यह थकान कम करने में मददगार हो सकते हैं। हालांकि अब बाजार में ऐसे आधुनिक फॉर्मल शूज़ भी उपलब्ध हैं जिनमें मेमोरी फोम, कुशन सोल और सॉफ्ट इनसोल जैसी सुविधाएं दी जा रही हैं। इससे पारंपरिक फॉर्मल शूज़ भी पहले की तुलना में अधिक आरामदायक हो गए हैं।

    विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि जूते खरीदते समय केवल ब्रांड या डिजाइन पर ध्यान न दें। सही आकार, मजबूत सोल, अच्छी ग्रिप, टिकाऊ सामग्री और आरामदायक फिटिंग को प्राथमिकता देना अधिक जरूरी है। गलत आकार के जूते पैरों में दर्द, छाले और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकते हैं। इसलिए फुटवियर का चयन हमेशा अपनी जरूरत, कार्यस्थल के वातावरण और दैनिक गतिविधियों को ध्यान में रखकर करना चाहिए।

    यदि संभव हो तो अलमारी में फॉर्मल शूज़ और स्नीकर्स दोनों रखना सबसे व्यावहारिक विकल्प माना जाता है। महत्वपूर्ण बैठकों, आधिकारिक कार्यक्रमों और औपचारिक अवसरों पर फॉर्मल शूज़ पहने जा सकते हैं, जबकि सामान्य कार्यदिवस, कैजुअल ऑफिस माहौल या अधिक गतिविधि वाले दिनों में स्नीकर्स बेहतर साबित हो सकते हैं। सही अवसर के अनुसार फुटवियर का चुनाव न केवल आपकी पेशेवर छवि को मजबूत करता है, बल्कि पूरे दिन आराम और आत्मविश्वास भी बनाए रखता है।

  • आईसीएमआर के अध्ययन में खुलासा, आदतों में समय रहते सुधार से टल सकता है हार्ट अटैक का खतरा

    आईसीएमआर के अध्ययन में खुलासा, आदतों में समय रहते सुधार से टल सकता है हार्ट अटैक का खतरा

    नई दिल्ली । भारत सहित वैश्विक स्तर पर कम उम्र के युवाओं में हृदय संबंधी बीमारियों और अचानक कार्डियक अरेस्ट के मामलों में हो रही अप्रत्याशित वृद्धि ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों को गहरी चिंता में डाल दिया है। बीस वर्ष से कम आयु के युवाओं में हाई ब्लड प्रेशर, धमनियों में ब्लॉकेज और दिल के दौरों की बढ़ती संख्या इस बात का संकेत है कि यह समस्या केवल आनुवंशिक कारणों तक सीमित नहीं रह गई है। चिकित्सा विज्ञानियों के अनुसार, दैनिक दिनचर्या में शामिल गलत आदतें और अस्वस्थ जीवनशैली इस गंभीर स्वास्थ्य संकट का सबसे मुख्य कारण बनकर सामने आई हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्टों में भी यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि गैर-संक्रामक रोगों में हृदय रोग दुनिया भर में होने वाली सर्वाधिक मौतों के लिए जिम्मेदार हैं।

    भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद द्वारा किए गए हालिया शोध में एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है। इस अध्ययन के अनुसार, देश के लगभग नब्बे प्रतिशत वयस्कों के रक्त नमूनों में कोलेस्ट्रॉल या वसा का कम से कम एक स्तर सामान्य मापदंडों से असंतुलित पाया गया है। शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स का बढ़ना धमनियों में रुकावट पैदा करता है, जिससे दिल पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। कई बार ये स्वास्थ्य समस्याएं बिना किसी स्पष्ट शारीरिक लक्षण के लंबे समय तक शरीर के भीतर विकसित होती रहती हैं, जिससे स्थिति अचानक गंभीर रूप ले लेती है और व्यक्ति को संभलने का अवसर नहीं मिलता।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक जीवनशैली से जुड़ी कई आदतें दिल की सेहत को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचा रही हैं। लगातार कई घंटों तक एक ही स्थान पर बैठकर काम करना, शारीरिक व्यायाम की कमी, जंक फूड और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का अत्यधिक सेवन धमनियों को सख्त और संकीर्ण बना देता है। इसके अलावा, धूम्रपान और तंबाकू के सेवन से रक्त में ऑक्सीजन का स्तर घटता है तथा रक्त धमनियों की अंदरूनी दीवारों को क्षति पहुंचती है। अत्यधिक मानसिक तनाव, अनिद्रा और खानपान में अत्यधिक नमक व शर्करा की मात्रा भी उच्च रक्तचाप को बढ़ावा देकर हृदय के कार्यकलापों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।

    चिकित्सकों का स्पष्ट कहना है कि यदि शुरुआती दौर में ही दैनिक आदतों में सकारात्मक परिवर्तन किए जाएं, तो हृदय रोगों, स्ट्रोक और अकाल मृत्यु के जोखिम को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। इसके लिए संतुलित आहार का सेवन, नियमित रूप से योग या व्यायाम, पर्याप्त नींद और तनाव प्रबंधन जैसी स्वास्थवर्धक आदतों को अपनाना अनिवार्य है। साथ ही, पारिवारिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए नियमित अंतराल पर ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल की निवारक जांच कराना आवश्यक है। समय पर की गई यह सतर्कता बेजुबान दिल को सुरक्षित रखने और गंभीर चिकित्सा आपात्काल से बचाने में अत्यंत कारगर सिद्ध हो सकती है।

  • हार्ट को रखना है हमेशा हेल्दी? आज ही छोड़ दें ये 5 खराब आदतें, कम होगा दिल की बीमारियों का खतरा

    हार्ट को रखना है हमेशा हेल्दी? आज ही छोड़ दें ये 5 खराब आदतें, कम होगा दिल की बीमारियों का खतरा


    नई दिल्ली।
    स्वस्थ और लंबी जिंदगी के लिए दिल का स्वस्थ रहना बेहद जरूरी है। आधुनिक जीवनशैली, अनियमित खानपान और बढ़ते तनाव के कारण हृदय संबंधी बीमारियों के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल उम्र या आनुवंशिक कारण ही नहीं, बल्कि हमारी रोजमर्रा की कई आदतें भी हार्ट हेल्थ को प्रभावित करती हैं। यदि समय रहते इन आदतों में सुधार कर लिया जाए तो हृदय रोगों के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    लंबे समय तक लगातार बैठे रहना दिल के लिए नुकसानदायक माना जाता है। ऑफिस में घंटों कुर्सी पर काम करना या घर पर लंबे समय तक मोबाइल और टीवी के सामने बैठे रहना ब्लड सर्कुलेशन को प्रभावित करता है। इससे वजन बढ़ने, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और हृदय रोग का जोखिम बढ़ सकता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि हर 45 से 60 मिनट के बाद कुछ मिनट टहलें या हल्की स्ट्रेचिंग जरूर करें।

    जरूरत से ज्यादा नमक और प्रोसेस्ड फूड का सेवन भी हार्ट हेल्थ के लिए हानिकारक हो सकता है। पैकेज्ड स्नैक्स, चिप्स, इंस्टेंट फूड और प्रोसेस्ड मीट में सोडियम की मात्रा अधिक होती है, जिससे रक्तचाप बढ़ सकता है और दिल पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इसके बजाय ताजे फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज और घर का संतुलित भोजन अधिक लाभकारी माना जाता है।

    पर्याप्त नींद न लेना भी दिल की सेहत पर नकारात्मक असर डाल सकता है। लगातार कम नींद लेने से तनाव हार्मोन बढ़ सकते हैं, जिससे ब्लड प्रेशर और शरीर का मेटाबॉलिज्म प्रभावित होता है। अधिकांश वयस्कों के लिए प्रतिदिन 7 से 9 घंटे की अच्छी गुणवत्ता वाली नींद जरूरी मानी जाती है।

    लगातार तनाव में रहना भी हृदय रोगों का बड़ा कारण बन सकता है। काम का दबाव, आर्थिक समस्याएं या निजी जीवन की परेशानियां लंबे समय तक बनी रहने पर रक्तचाप बढ़ सकता है। तनाव के कारण कई लोग धूम्रपान, अधिक भोजन या अन्य अस्वस्थ आदतों की ओर भी आकर्षित हो जाते हैं। नियमित योग, ध्यान, गहरी सांस लेने के अभ्यास और व्यायाम तनाव कम करने में मदद कर सकते हैं।

    धूम्रपान और अत्यधिक शराब का सेवन भी हृदय के लिए बेहद नुकसानदायक है। धूम्रपान रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ा सकता है। वहीं अधिक मात्रा में शराब का सेवन ब्लड प्रेशर बढ़ाने के साथ हृदय की कार्यक्षमता पर भी असर डाल सकता है। इन आदतों से दूरी बनाना दिल की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कदम है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, रोज कम से कम 30 मिनट शारीरिक गतिविधि करना, संतुलित आहार लेना, वजन और ब्लड प्रेशर की नियमित जांच कराना, तनाव को नियंत्रित रखना और किसी भी असामान्य लक्षण जैसे सीने में दर्द, सांस फूलना या अत्यधिक थकान महसूस होने पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना हृदय को लंबे समय तक स्वस्थ रखने में मददगार साबित हो सकता है।

  • सुप्रीम व्याख्या में नया दृष्टिकोण, हिंदुत्व को बताया जीवन जीने का तरीका..

    सुप्रीम व्याख्या में नया दृष्टिकोण, हिंदुत्व को बताया जीवन जीने का तरीका..

    नई दिल्ली । धर्म और आस्था से जुड़े मुद्दों पर चल रही एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान न्यायिक दृष्टिकोण से एक ऐसा विचार सामने आया है, जिसने धार्मिक पहचान और उसके स्वरूप को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है। इस दौरान यह स्पष्ट किया गया कि किसी भी धर्म को केवल बाहरी क्रियाओं या अनुष्ठानों के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता, बल्कि यह व्यक्ति के जीवन जीने के तरीके और उसकी आंतरिक आस्था से भी जुड़ा होता है।

    सुनवाई के दौरान यह कहा गया कि
    Hinduism
    को केवल पूजा-पद्धति या धार्मिक स्थलों पर जाने तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसे एक जीवनशैली के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें व्यक्ति अपने विश्वास को विभिन्न तरीकों से व्यक्त करता है। आस्था किसी एक निश्चित ढांचे में बंधी हुई नहीं होती, बल्कि यह व्यक्ति के व्यवहार, सोच और दैनिक जीवन में भी झलकती है।

    इस विचार के अनुसार किसी व्यक्ति को अपने धर्म को साबित करने के लिए मंदिर जाना या किसी विशेष धार्मिक अनुष्ठान का पालन करना अनिवार्य नहीं है। धार्मिक पहचान को बाहरी प्रदर्शन से नहीं बल्कि आंतरिक विश्वास से समझा जाना चाहिए। यहां तक कि घर में दीपक जलाना भी आस्था की अभिव्यक्ति का एक सरल और व्यक्तिगत रूप माना जा सकता है।

    सुनवाई के दौरान यह भी चर्चा हुई कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार हर व्यक्ति को अपने तरीके से आस्था व्यक्त करने की अनुमति देता है। किसी भी व्यक्ति पर यह दबाव नहीं डाला जा सकता कि वह केवल एक ही तरीके से अपने धर्म का पालन करे। यह विचार धार्मिक विविधता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मजबूत आधार देता है।

    यह मामला उन कई याचिकाओं से जुड़ा है जिनमें धार्मिक परंपराओं और सामाजिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने की मांग की गई है। इनमें कुछ विवाद ऐसे हैं जो वर्षों से धार्मिक स्थलों में प्रवेश और परंपरागत प्रथाओं को लेकर समाज में चर्चा का विषय बने हुए हैं। इन मामलों ने यह सवाल भी उठाया है कि आधुनिक संवैधानिक मूल्यों और पारंपरिक आस्थाओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

    सुनवाई में यह भी चिंता जताई गई कि यदि हर धार्मिक प्रथा को लगातार कानूनी चुनौती दी जाती रही, तो इससे समाज में अनावश्यक विवाद बढ़ सकते हैं और धार्मिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। इसलिए यह जरूरी माना गया कि धर्म से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता और समझदारी के साथ दृष्टिकोण अपनाया जाए।

    पुराने एक महत्वपूर्ण धार्मिक विवाद का संदर्भ भी इस चर्चा से जुड़ा रहा, जिसने पहले भी देशभर में व्यापक बहस को जन्म दिया था। उस विवाद ने धार्मिक परंपराओं और समानता के अधिकार के बीच संतुलन को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे।

  • रोज पीते हैं चाय तो जान लें फर्क: दूध वाली और काली चाय में कौन ज्यादा फायदेमंद

    रोज पीते हैं चाय तो जान लें फर्क: दूध वाली और काली चाय में कौन ज्यादा फायदेमंद








    नई दिल्ली । चाय भारतीय जीवनशैली का एक अभिन्न हिस्सा है, जहां दिन की शुरुआत से लेकर शाम की थकान तक लोग एक कप चाय को सबसे आसान राहत मानते हैं। लेकिन जैसे-जैसे लोग स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो रहे हैं, वैसे-वैसे यह सवाल भी आम होता जा रहा है कि Milk Tea और Black Tea में से कौन-सी चाय शरीर के लिए ज्यादा बेहतर है।

    दूध वाली चाय भारतीय घरों में सबसे ज्यादा प्रचलित है। इसका स्वाद मजबूत और आराम देने वाला माना जाता है। इसमें दूध के कारण कुछ पोषक तत्व जैसे कैल्शियम और प्रोटीन भी मिलते हैं, जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करने में मदद करते हैं। कई लोग इसे मानसिक थकान दूर करने और दिनभर की थकावट कम करने के लिए पसंद करते हैं। यही कारण है कि यह अभी भी सबसे ज्यादा पिया जाने वाला विकल्प है।

    हालांकि इसके कुछ नुकसान भी हैं। दूध वाली चाय में कैफीन और टैनिन की मात्रा होती है, जो कुछ लोगों में पेट से जुड़ी समस्याएं पैदा कर सकती है। अधिक मात्रा में इसका सेवन करने से एसिडिटी, गैस और वजन बढ़ने की समस्या भी हो सकती है। इसके अलावा, देर रात इसे पीने से नींद पर भी असर पड़ सकता है।

    दूसरी ओर काली चाय को आजकल स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग अधिक पसंद कर रहे हैं। इसमें एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा अधिक होती है, जो शरीर को हानिकारक तत्वों से बचाने में मदद कर सकते हैं। यह मेटाबॉलिज्म को सक्रिय करने और वजन नियंत्रण में सहायक मानी जाती है। इसके अलावा, यह दिल की सेहत के लिए भी बेहतर विकल्प मानी जाती है क्योंकि इसमें कैलोरी की मात्रा बहुत कम होती है।

    लेकिन काली चाय का भी अधिक सेवन नुकसान पहुंचा सकता है। इसमें कैफीन अधिक होने के कारण कुछ लोगों को घबराहट, बेचैनी या नींद की कमी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। खाली पेट इसका सेवन करने से एसिडिटी की समस्या बढ़ सकती है, इसलिए इसका सेवन सावधानी से करना जरूरी होता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार दोनों ही प्रकार की चाय अपने-अपने तरीके से फायदेमंद हैं, लेकिन उनका असर इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें कितनी मात्रा में और किस समय लिया जा रहा है। यदि कोई व्यक्ति वजन घटाने या हल्के और कम कैलोरी वाले विकल्प की तलाश में है, तो काली चाय बेहतर हो सकती है। वहीं यदि किसी को स्वाद और तुरंत ऊर्जा की आवश्यकता है, तो सीमित मात्रा में दूध वाली चाय भी उपयुक्त है।

    स्वास्थ्य के लिहाज से यह सलाह दी जाती है कि दिनभर में दो से तीन कप से अधिक चाय का सेवन न किया जाए और सोने से ठीक पहले चाय से बचा जाए। सही समय और संतुलित मात्रा में सेवन करने पर दोनों ही प्रकार की चाय संतुलित जीवनशैली का हिस्सा बन सकती हैं।

  • शरीर में पानी की कमी बढ़ा सकती है कई गंभीर समस्याएं, जानें इसके संकेत और बचाव

    शरीर में पानी की कमी बढ़ा सकती है कई गंभीर समस्याएं, जानें इसके संकेत और बचाव


    नई दिल्ली। शरीर का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा पानी से बना होता है, इसलिए इसका संतुलन बनाए रखना अच्छे स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी माना जाता है। जब शरीर में पानी की कमी हो जाती है, तो इसे डिहाइड्रेशन कहा जाता है, जो धीरे-धीरे कई शारीरिक और मानसिक समस्याओं का कारण बन सकता है।

    पानी की कमी का सबसे पहला असर शरीर की ऊर्जा पर पड़ता है। व्यक्ति को लगातार थकान, कमजोरी और सुस्ती महसूस हो सकती है। कई मामलों में ध्यान केंद्रित करने में भी दिक्कत आने लगती है, जिससे रोजमर्रा के काम प्रभावित हो सकते हैं।

    त्वचा पर भी डिहाइड्रेशन का सीधा असर दिखाई देता है। पानी की कमी से त्वचा रूखी, बेजान और डल हो सकती है। साथ ही होंठ फटने और आंखों के नीचे काले घेरे बढ़ने की समस्या भी देखी जा सकती है।

    पाचन तंत्र पर भी इसका असर पड़ता है। पर्याप्त पानी न पीने से कब्ज, पेट भारी लगना और अपच जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। पानी आंतों के सुचारू कामकाज में अहम भूमिका निभाता है, इसलिए इसकी कमी पाचन को धीमा कर देती है।

    इसके अलावा, शरीर में पानी की कमी से सिरदर्द और चक्कर आने की समस्या भी हो सकती है। गंभीर स्थिति में डिहाइड्रेशन रक्तचाप को प्रभावित कर सकता है, जिससे स्वास्थ्य जोखिम बढ़ जाता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, दिनभर में पर्याप्त मात्रा में पानी पीना जरूरी है। आमतौर पर 7-8 गिलास पानी रोजाना पीने की सलाह दी जाती है, हालांकि यह व्यक्ति की उम्र, मौसम और शारीरिक गतिविधि पर निर्भर करता है।

    पानी की कमी से बचने के लिए सिर्फ सादा पानी ही नहीं, बल्कि नारियल पानी, फलों का जूस और पानी से भरपूर फल जैसे तरबूज, खीरा और संतरा भी डाइट में शामिल करना फायदेमंद होता है।

    गर्मियों के मौसम में पसीना ज्यादा निकलने के कारण डिहाइड्रेशन का खतरा और बढ़ जाता है, इसलिए इस दौरान विशेष रूप से पानी का सेवन बढ़ाना चाहिए।

    सही मात्रा में पानी पीना न केवल शरीर को हाइड्रेट रखता है, बल्कि त्वचा, पाचन और संपूर्ण स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाए रखने में मदद करता है।

  • नींद की कमी पर अनोखी पहल: सियोल में ‘पावर नैप कॉन्टेस्ट’, 80 साल के बुजुर्ग ने मारी बाजी

    नींद की कमी पर अनोखी पहल: सियोल में ‘पावर नैप कॉन्टेस्ट’, 80 साल के बुजुर्ग ने मारी बाजी


    नई दिल्ली। दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में एक अनोखा और दिलचस्प आयोजन देखने को मिला, जहां लोगों को सोने के लिए आमंत्रित किया गया। ‘पावर नैप कॉन्टेस्ट’ नाम की इस प्रतियोगिता का मकसद सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि देश में बढ़ती नींद की कमी की गंभीर समस्या की ओर ध्यान खींचना था। सियोल मेट्रोपॉलिटन गवर्नमेंट द्वारा आयोजित इस इवेंट में हजारों युवा हान नदी किनारे स्थित पार्क में पहुंचे और खुले आसमान के नीचे सुकून की नींद लेने की कोशिश की।

    तेज-रफ्तार जिंदगी और काम के भारी दबाव के लिए मशहूर दक्षिण कोरिया में युवाओं के बीच नींद की कमी एक बड़ी समस्या बन चुकी है। यही वजह है कि इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए प्रतिभागियों को थका हुआ और पेट भरकर आने की शर्त दी गई थी, ताकि वे गहरी नींद ले सकें। कई प्रतिभागी मजेदार वेशभूषा में पहुंचे। कोई ‘स्लीपिंग ब्यूटी’ बना तो कोई ‘स्लीपिंग प्रिंस’।

    प्रतियोगिता में शामिल 20 वर्षीय छात्र पार्क जून-सियोक पारंपरिक शाही पोशाक पहनकर आए और बताया कि पढ़ाई और पार्ट-टाइम जॉब के कारण उन्हें रोजाना सिर्फ 3-4 घंटे ही नींद मिल पाती है। वहीं, अनिद्रा से जूझ रही एक शिक्षिका कोआला की ड्रेस में नजर आईं, ताकि वह इस मौके पर सुकून से सो सकें।

    इस अनोखे मुकाबले में प्रतिभागियों की नींद की गुणवत्ता को मापने के लिए उनकी हार्ट रेट मॉनिटर की गई, जिससे पता चल सके कि कौन सबसे गहरी और शांत नींद ले रहा है। प्रतियोगिता की शुरुआत दोपहर में हुई और कुछ ही देर में पूरे पार्क में सन्नाटा छा गया, मानो शहर की भागदौड़ थम गई हो।

    सबसे दिलचस्प बात यह रही कि इस ‘नींद की जंग’ में 80 वर्षीय बुजुर्ग ने बाजी मार ली, जबकि दूसरे स्थान पर एक 37 वर्षीय ऑफिस वर्कर रहे, जो नाइट शिफ्ट और काम के दबाव से बेहद थके हुए थे।

    यह प्रतियोगिता सिर्फ एक इवेंट नहीं, बल्कि एक बड़ा संदेश है कि आधुनिक जीवनशैली में नींद की अनदेखी किस हद तक बढ़ चुकी है। OECD देशों में सबसे कम सोने वाले देशों में शामिल दक्षिण कोरिया अब इस समस्या को लेकर जागरूकता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और यह ‘पावर नैप कॉन्टेस्ट’ उसी दिशा में एक अनोखी पहल बनकर सामने आया है।

  • शुरुआती लोगों के लिए बेस्ट योग रूटीन, रोज 15 मिनट ,में पाएं फिट बॉडी और शांत मन

    शुरुआती लोगों के लिए बेस्ट योग रूटीन, रोज 15 मिनट ,में पाएं फिट बॉडी और शांत मन


    नई दिल्ली । अगर आप योग की शुरुआत करना चाहते हैं लेकिन समझ नहीं पा रहे कि कौन से आसन से शुरुआत करें, तो आयुष मंत्रालय की सलाह आपके लिए एक बेहतरीन गाइड साबित हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, शुरुआती लोगों के लिए ताड़ासन, वज्रासन और भुजंगासन सबसे सरल और प्रभावी योगासन हैं, जिन्हें घर पर आसानी से किया जा सकता है।

    योग विशेषज्ञों का मानना है कि रोजाना केवल 10 से 15 मिनट इन आसनों का अभ्यास करने से शरीर लचीला बनता है, मांसपेशियां मजबूत होती हैं और मानसिक शांति मिलती है। योग की शुरुआत हमेशा धीरे-धीरे करनी चाहिए और सांसों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। नियमित अभ्यास से जल्दी ही सकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं।

    ताड़ासन योग का सबसे बुनियादी आसन है, जो शरीर को संतुलन और मजबूती देता है। इसमें सीधे खड़े होकर हाथों को ऊपर उठाया जाता है और पूरे शरीर को खींचा जाता है। यह आसन रीढ़ की हड्डी को सीधा करता है, शरीर की मुद्रा सुधारता है और एकाग्रता बढ़ाता है। शुरुआत में इसे 20 से 30 सेकंड तक करें और धीरे-धीरे समय बढ़ाएं।

    वज्रासन एकमात्र ऐसा आसन है जिसे भोजन के बाद भी किया जा सकता है। इसमें घुटनों को मोड़कर एड़ियों पर बैठा जाता है और शरीर को सीधा रखा जाता है। यह पाचन तंत्र को मजबूत करता है, पेट की समस्याओं में राहत देता है और ध्यान के लिए आदर्श मुद्रा मानी जाती है। शुरुआती लोग इसे 3 से 5 मिनट तक करें और धीरे-धीरे समय बढ़ाएं।

    भुजंगासन पीठ और रीढ़ के लिए बेहद फायदेमंद है। इसमें पेट के बल लेटकर छाती को ऊपर उठाया जाता है। यह आसन रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाता है, फेफड़ों की क्षमता बढ़ाता है और तनाव को कम करता है। इसे 15 से 20 सेकंड तक रोककर 3 से 5 बार दोहराना चाहिए।

    इन तीनों आसनों का नियमित अभ्यास न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है। योग को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाकर आप लंबे समय तक स्वस्थ और संतुलित जीवन जी सकते हैं।

  • मोटापा बन रहा बीमारियों का बड़ा कारण, रोजमर्रा की आदतों में बदलाव से करें नियंत्रण

    मोटापा बन रहा बीमारियों का बड़ा कारण, रोजमर्रा की आदतों में बदलाव से करें नियंत्रण


    नई दिल्ली । आज की तेज रफ्तार जिंदगी में लोग सुविधाओं के पीछे इतने व्यस्त हो गए हैं कि अपने स्वास्थ्य की ओर ध्यान देना लगभग भूलते जा रहे हैं। यही कारण है कि मोटापा अब केवल दिखने या शरीर की बनावट से जुड़ी समस्या नहीं रह गया है बल्कि यह एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है। बदलती जीवनशैली असंतुलित खानपान और शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण मोटापे के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो यह कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि जब शरीर का वजन सामान्य सीमा से अधिक हो जाता है तो यह केवल शरीर में अतिरिक्त चर्बी ही नहीं बढ़ाता बल्कि शरीर के अंदरूनी तंत्र को भी प्रभावित करता है। मोटापे के कारण शरीर में आंतरिक सूजन बढ़ने लगती है जो धीरे धीरे इंसुलिन प्रतिरोध को जन्म देती है। यही स्थिति आगे चलकर कई गंभीर बीमारियों का कारण बनती है जिनमें Type 2 Diabetes High Blood Pressure Thyroid Disease और धमनियों में ब्लॉकेज जैसी समस्याएं शामिल हैं। इसलिए विशेषज्ञ मोटापे को कई बीमारियों का प्रवेश द्वार भी मानते हैं।

    मोटापा बढ़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण आज का बदलता खानपान है। फास्ट फूड जंक फूड और कोल्ड ड्रिंक्स का अत्यधिक सेवन शरीर में अनावश्यक कैलोरी जमा कर देता है। इन खाद्य पदार्थों में पोषक तत्व कम और वसा व चीनी की मात्रा अधिक होती है जो वजन तेजी से बढ़ाने का काम करते हैं। इसके अलावा लंबे समय तक बैठकर काम करने की आदत भी मोटापे को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती है। ऑफिस में घंटों कंप्यूटर के सामने बैठना और बच्चों का खेल के मैदान के बजाय मोबाइल या टीवी पर समय बिताना शारीरिक सक्रियता को कम कर देता है जिससे शरीर की कैलोरी खर्च नहीं हो पाती।

    इसके साथ ही मानसिक तनाव और अनियमित नींद भी वजन बढ़ने का बड़ा कारण बनते जा रहे हैं। जब व्यक्ति पर्याप्त नींद नहीं लेता या लगातार तनाव में रहता है तो शरीर का मेटाबॉलिज्म प्रभावित होता है और वजन बढ़ने लगता है। ऐसे में विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि मोटापे को नियंत्रित करने के लिए दवाइयों से अधिक जरूरी है कि लोग अपनी जीवनशैली और आदतों में बदलाव करें।

    मोटापा नियंत्रित करने के लिए रोजाना कम से कम 30 मिनट तक तेज चलना साइकिल चलाना या योग करना बेहद फायदेमंद माना जाता है। नियमित व्यायाम से शरीर की अतिरिक्त कैलोरी बर्न होती है और वजन नियंत्रित रहता है। इसके साथ ही आहार में भी बदलाव जरूरी है। घर का बना संतुलित और पौष्टिक भोजन हरी सब्जियां फल और साबुत अनाज को प्राथमिकता देनी चाहिए जबकि चीनी और तेल का सेवन कम करना चाहिए।

    विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि स्क्रीन टाइम को सीमित किया जाए खासकर बच्चों के लिए। उन्हें अधिक समय तक मोबाइल या कंप्यूटर पर बैठने के बजाय शारीरिक खेलों के लिए प्रेरित करना चाहिए। इसके अलावा रोजाना 7 से 8 घंटे की गहरी नींद लेना भी वजन नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। छोटे छोटे बदलाव जैसे लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का उपयोग करना हर एक घंटे के बाद कुछ मिनट टहलना और दैनिक काम खुद करना भी शरीर को सक्रिय बनाए रखने में मदद करते हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि लोग समय रहते अपनी आदतों में सुधार कर लें तो मोटापे से बचना संभव है और इसके कारण होने वाली कई गंभीर बीमारियों के खतरे को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है।