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  • आज ही बदलें जीवनशैली, स्वास्थ्य और इम्यूनिटी के लिए जरूरी कदम

    आज ही बदलें जीवनशैली, स्वास्थ्य और इम्यूनिटी के लिए जरूरी कदम


    नई दिल्ली।सर्दियों में ठंड और आलस के कारण लोग अक्सर लंबे समय तक बिस्तर या कुर्सी पर रहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आज की जीवनशैली में मस्तिष्क का इस्तेमाल तो बढ़ गया है लेकिन शारीरिक गतिविधियां कम हो गई हैं। यह असंतुलन धीरे-धीरे गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है।आयुर्वेद में भी कम शारीरिक गतिविधि को स्वास्थ्य के लिए चेतावनी माना गया है। चरक संहिता में कहा गया है व्यायामात लभते स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बलं सुखम्। यानी व्यायाम से लंबी उम्र ताकत और खुशहाली मिलती है।

    कम गतिविधि से होने वाले प्रमुख स्वास्थ्य खतरे
    मोटापा और मधुमेहलंबे समय तक बैठे रहने से वसा का जमाव बढ़ता है और मेटाबॉलिज्म कमजोर होता है जिससे मोटापा और डायबिटीज़ की संभावना बढ़ जाती है।

    गठिया और जोड़ों में दर्द
    लगातार एक ही पोज़चर में रहने से हड्डियों और मांसपेशियों में जकड़न होती है जो जोड़ों के दर्द का कारण बनती है।

    हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग
    चलने और व्यायाम से रक्त संचार और ऑक्सीजन वितरण बेहतर होता है। कम गतिविधि से ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है जिससे दिल से जुड़े रोगों का खतरा भी बढ़ जाता है।

    मानसिक स्वास्थ्य पर असर
    डिप्रेशन चिंता और पाचन विकार की समस्या बढ़ सकती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कमजोर हो जाती है।विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि रोज़ाना थोड़ी शारीरिक गतिविधि जैसे सुबह की वॉक हल्का व्यायाम या स्ट्रेचिंग को जीवनशैली में शामिल किया जाए। इससे न केवल बीमारियों का जोखिम कम होता है बल्कि मानसिक और शारीरिक संतुलन भी बना रहता है।

  • दिल की बात कहने के कुछ 'स्मार्ट' और रोमांटिक तरीके

    दिल की बात कहने के कुछ 'स्मार्ट' और रोमांटिक तरीके


    नई दिल्ली ।संकेतों और बॉडी लैंग्वेज का सहारा लें सीधे आई लव यू’ कहने से पहले अपनी हरकतों से उन्हें अहसास दिलाएं। उनकी छोटी-छोटी बातों का ख्याल रखना, उनकी पसंद-नापसंद को याद रखना और मुश्किल वक्त में उनके साथ खड़े रहना यह जता देता है कि वो आपके लिए कितने खास हैं। कई बार बिना कहे भी बहुत कुछ कह दिया जाता है।

    लिखावट का जादू आज के डिजिटल दौर में हाथ से लिखा हुआ एक छोटा सा नोट या लेटर किसी भी महंगे गिफ्ट से ज्यादा कीमती होता है। अगर आप बोलने में हिचकिचा रहे हैं, तो अपनी भावनाओं को कागज पर उतारें। एक प्यारा सा कार्ड या छोटा सा मैसेज उनके डेस्क या किताब में छोड़ देना एक बेहद ‘क्यूट’ तरीका हो सकता है।एक यादगार ‘डेट’ प्लान करें जरूरी नहीं कि वह कोई फाइव स्टार होटल हो। किसी शांत जगह पर वॉक, उनकी पसंदीदा जगह पर कॉफी या सूर्यास्त देखते हुए दिल की बात कहना माहौल को रोमांटिक बना देता है। जब माहौल खुशनुमा होता है, तो सामने वाले का जवाब सकारात्मक होने की संभावना बढ़ जाती है।

    दोस्तों की मदद लें, लेकिन संभलकर अगर आप बहुत ज्यादा शर्मीले हैं, तो अपने किसी भरोसेमंद कॉमन फ्रेंड की मदद ले सकते हैं। वे बातों-बातों में यह जान सकते हैं कि सामने वाले के मन में आपके लिए क्या चल रहा है। लेकिन ध्यान रहे, इज़हार आपको खुद ही करना चाहिए क्योंकि आपकी आँखों की सच्चाई कोई और बयां नहीं कर सकता। क्रिएटिविटी दिखाएं अगर आप संगीत, पेंटिंग या कुकिंग के शौकीन हैं, तो अपनी कला का इस्तेमाल करें। उनके लिए कोई गाना गाना या उनकी पसंद का खाना बनाकर ‘सरप्राइज’ देना आपके प्यार की गहराई को दर्शाता है।

    इन बातों का रखें खास ख्याल

    जल्दबाजी न करें: इज़हार करने से पहले यह पक्का कर लें कि आप दोनों के बीच एक अच्छी समझ बन चुकी है। प्राइवेसी का सम्मान: सबके सामने इज़हार करने से बचें, इससे सामने वाला दबाव महसूस कर सकता है। एकांत में बात करना हमेशा बेहतर होता है। परिणाम के लिए तैयार रहें: प्यार में ‘हाँ’ और ‘ना’ दोनों की गुंजाइश होती है। अगर जवाब आपकी उम्मीद के मुताबिक न हो, तब भी सामने वाले की पसंद का सम्मान करें और गरिमा बनाए रखें।

  • नेल कटर की एक आदत बना सकती है आपको मरीज, रोज़मर्रा की लापरवाही से बढ़ता संक्रमण का खतरा

    नेल कटर की एक आदत बना सकती है आपको मरीज, रोज़मर्रा की लापरवाही से बढ़ता संक्रमण का खतरा


    नई दिल्ली। नाखूनों से जुड़ी छोटी चूक कैसे बन जाती है बड़ी स्वास्थ्य समस्या  घर हो ऑफिस या फिर ब्यूटी पार्लर-नेल कटर एक ऐसी रोज़मर्रा की चीज है जिसे लोग अक्सर बिना सोचे-समझे एक-दूसरे के साथ साझा कर लेते हैं। देखने में यह आदत बेहद मामूली लगती है लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यही लापरवाही नाखूनों और त्वचा से जुड़े गंभीर संक्रमण की वजह बन सकती है। कई बार लोग लंबे समय तक इलाज कराते रहते हैं जबकि समस्या की जड़ सिर्फ अस्वच्छ नेल कटर होती है।

    डॉक्टरों के अनुसार नाखून काटते समय त्वचा पर बहुत ही बारीक कट या खरोंच लग जाती है जो सामान्य आंखों से दिखाई नहीं देती। जब कोई संक्रमित या पहले से इस्तेमाल किया गया नेल कटर दोबारा उपयोग में लाया जाता है तो उस पर मौजूद बैक्टीरिया और फंगस सीधे इन सूक्ष्म घावों के जरिए शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। यही कारण है कि नाखूनों के फंगल और बैक्टीरियल इंफेक्शन एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक तेजी से फैलते हैं।स्वच्छता से जुड़ी कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि धातु से बने नेल कटर पर फंगस और बैक्टीरिया लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं। खासतौर पर पैरों के नाखूनों में यह खतरा ज्यादा होता है क्योंकि जूते पहनने से वहां नमी बनी रहती है। यही नमी फंगस के पनपने के लिए अनुकूल माहौल बनाती है। सैलून या पार्लर में बिना ठीक से स्टरलाइज़ किए गए औजार इस खतरे को और बढ़ा देते हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि कुछ लोगों में यह जोखिम और भी ज्यादा होता है। कमजोर इम्यूनिटी वाले लोग बुजुर्ग छोटे बच्चे डायबिटीज से पीड़ित मरीज और वे लोग जो लंबे समय तक बंद जूते पहनते हैं-इन सभी में नाखूनों का संक्रमण जल्दी पनप सकता है। इसके अलावा जो लोग बार-बार मैनीक्योर या पेडीक्योर कराते हैं उन्हें भी अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है।नाखूनों में संक्रमण के कुछ संकेतों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जैसे नाखूनों का रंग पीला या काला पड़ना उनका असामान्य रूप से मोटा होना बार-बार टूटना नाखूनों के आसपास जलन या सूजन और कभी-कभी बदबू आना। ये लक्षण बताते हैं कि नाखूनों के भीतर संक्रमण पनप रहा है जिसका समय पर इलाज जरूरी है।

    डॉक्टरों का साफ कहना है कि बचाव ही इसका सबसे बेहतर इलाज है। हर व्यक्ति को अपना अलग नेल कटर इस्तेमाल करना चाहिए और उसे नियमित रूप से साफ व सूखा रखना चाहिए। नाखून बहुत गहराई तक काटने से बचें और हाथ-पैर लंबे समय तक गीले न रखें। सैलून में सेवाएं लेते समय यह जरूर देखें कि औजार ठीक से साफ और स्टरलाइज़ किए गए हों।अगर घरेलू देखभाल के बावजूद नाखूनों की स्थिति बिगड़ती जाए दर्द बढ़े या संक्रमण फैलता महसूस हो तो बिना देरी किए त्वचा विशेषज्ञ से संपर्क करना जरूरी है। समय पर इलाज न मिलने पर यह समस्या गंभीर रूप ले सकती है और उपचार लंबा चल सकता है।

  • अघोरी बाबा बनने की कठिन साधना: 12 साल की तपस्या और 5 कठिन नियम

    अघोरी बाबा बनने की कठिन साधना: 12 साल की तपस्या और 5 कठिन नियम


    नई दिल्ली । अघोरी बाबा हिंदू धर्म के सबसे रहस्यमयी और कठिन आध्यात्मिक पंथों में से एक माने जाते हैं। भगवान शिव के भैरव रूप के उपासक अघोरी अपनी कठोर साधना भूत-प्रेत से संबंधित क्रियाओं और सनातन मार्ग से अलग हटकर जीवनशैली के लिए प्रसिद्ध हैं। अघोर शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है जो घोर न हो यानी एक ऐसा व्यक्ति जो संसार की जटिलताओं से ऊपर उठकर अत्यधिक सरल और सहज जीवन जीता हो। हालांकि इस सहजता तक पहुंचने का मार्ग अत्यंत कठिन है और इसके लिए एक कठोर साधना की आवश्यकता होती है।

    अघोरी बनने के लिए 12 वर्षों की कठिन तपस्या

    अघोरी बनने के लिए सबसे पहली शर्त है 12 वर्षों की तपस्या। यह तपस्या किसी साधारण साधना से कहीं अधिक कठोर होती है। अघोरी बनने के इच्छुक व्यक्ति को पहले अपने गुरु के पास जाकर उनका दीक्षा ग्रहण करना होता है। इस दौरान गुरु के मार्गदर्शन में शारीरिक मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर कठिन साधनाएं की जाती हैं। अघोरी बनने के इस रास्ते में व्यक्ति को अपने शरीर और आत्मा को नियंत्रित करने की अत्यधिक कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। गुरु की उपस्थिति में 12 साल की साधना के दौरान, अघोरी ने अपनी चेतना को शुद्ध करने के लिए व्रत, उपवास और अन्य कठिन तपों का पालन करना होता है। यह तपस्या आत्मा को शुद्ध करने और शिव भक्ति में गहरे उतरने के लिए की जाती है।

    सांसारिक मृत्यु और नया जन्म

    अघोरी बनने से पूर्व व्यक्ति को एक मानसिक और शारीरिक मृत्यु का अनुभव करना होता है। इसका अर्थ है कि वह अपने परिवार और समाज के लिए पूरी तरह से मृत हो चुका है और उसे एक नए जन्म की आवश्यकता होती है। यह मृत्यु एक प्रकार का ‘पिंडदान’ होती है जिसमें व्यक्ति अपने पुराने अहंकार और सांसारिक आकर्षण को छोड़कर केवल शिव भक्ति की ओर अग्रसर होता है। अघोरी बनने के बाद उनका जीवन पूरी तरह से गुरु और शिव की सेवा में समर्पित हो जाता है। उनके द्वारा किए गए कार्यों और साधनाओं में कोई भी परंपरागत या सामाजिक बंधन नहीं होते। वे अपने मार्ग में जाने वाले हर कार्य को भैरव रूप में स्वीकार करते हैं।

    अघोरी जीवन के 5 कठिन नियम

    शरीर की तपस्या: अघोरी के लिए शरीर केवल एक माध्यम होता है, और इसे पूरी तरह से शुद्ध किया जाता है। शरीर को संयमित और तपस्वी जीवन जीने के लिए तैयार किया जाता है। सांसारिक मोह-माया से दूर रहना: अघोरी के लिए यह आवश्यक है कि वह सांसारिक सुख-साधनों से दूर रहे। उन्हें अपनी इच्छाओं और भौतिक सुखों से कोई आकर्षण नहीं होता। मृत्यु और जीवन के बीच की सीमा को समझना: अघोरी प्राचीन परंपराओं के अनुसार मृत्यु को एक प्राकृतिक प्रक्रिया मानते हैं और वे उसे शिव के रूप में स्वीकार करते हैं। इसके कारण वे शवों के पास बैठकर साधना करते हैं और शमशान भूमि को भी अपने साधना स्थल के रूप में चुनते हैं।

    नकारात्मक ऊर्जा से संवाद अघोरी अक्सर भूत-प्रेत और नकारात्मक शक्तियों से संवाद करते हैं। इसका उद्देश्य आत्मा को शुद्ध करना और सच्चे शिव दर्शन को प्राप्त करना होता है। निर्विकल्प समर्पण: अघोरी बाबा के लिए समर्पण सबसे बड़ा साधना है। उन्हें अपने जीवन में कोई दुराव या स्वार्थ नहीं होता वे पूर्ण रूप से शिव की भक्ति में लीन रहते हैं। घोरी बनने की साधना को आम तौर पर एक अत्यंत कठिन और जोखिमपूर्ण प्रक्रिया माना जाता है, लेकिन इसके जरिए व्यक्ति अपनी आत्मा की शुद्धि और शिव के निकटता प्राप्त करने का प्रयास करता है। यह एक ऐसा मार्ग है जिसमें शरीर, मन, और आत्मा की पूरी तपस्या और बलिदान शामिल होता है।

  • लाइफस्टाइल तय करती है दिमाग की उम्र, जन्मतिथि नहीं: वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा

    लाइफस्टाइल तय करती है दिमाग की उम्र, जन्मतिथि नहीं: वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा

    नई दिल्ली।अगर आप मानते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ दिमाग का कमजोर होना तय है, तो विज्ञान इस सोच को बदलने की तैयारी में है। यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा की एक नई स्टडी में दावा किया गया है कि दिमाग की असली उम्र आपकी जन्मतिथि से नहीं, बल्कि आपकी रोजमर्रा की जीवनशैली से तय होती है। सही आदतें अपनाकर इंसान अपने दिमाग को 8 साल तक “युवा” बनाए रख सकता है।

    MRI और मशीन लर्निंग से मापी गई ब्रेन एज

    इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने अत्याधुनिक MRI स्कैन और मशीन लर्निंग तकनीक का इस्तेमाल किया। इन तकनीकों के जरिए प्रतिभागियों की ब्रेन एज यानी दिमाग की जैविक उम्र मापी गई। इसे व्यक्ति की वास्तविक उम्र से तुलना कर ब्रेन एज गैप निकाला गया, जो यह बताता है कि दिमाग कितना बूढ़ा या जवान दिखता है।

    128 लोगों पर दो साल तक चला अध्ययन

    इस रिसर्च में मध्यम और अधिक उम्र के 128 लोगों को शामिल किया गया। इनमें से कई लोग घुटनों के ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी क्रॉनिक मस्कुलोस्केलेटल पेन से जूझ रहे थे। आमतौर पर लंबे समय तक रहने वाला दर्द, तनाव, आर्थिक दबाव और सामाजिक समस्याएं दिमागी उम्र को तेज़ी से बढ़ाती हैं।शुरुआती दौर में इन नकारात्मक कारकों का असर जरूर देखा गया, लेकिन दो साल के फॉलो-अप में यह प्रभाव कम होता चला गया। इसकी जगह जीवनशैली से जुड़ी आदतें सबसे ज्यादा असरदार साबित हुईं।

    8 साल तक जवान दिखा दिमाग

    जिन प्रतिभागियों की जीवनशैली ज्यादा सकारात्मक थी, उनके दिमाग स्टडी की शुरुआत में ही औसतन 8 साल तक युवा पाए गए। इतना ही नहीं, समय के साथ उनके दिमाग की उम्र बढ़ने की गति भी धीमी रही। शोधकर्ताओं के मुताबिक अच्छी आदतें मिलकर दिमाग को उम्र से होने वाले नुकसान से बचाती हैं।

    ये आदतें रखती हैं दिमाग को जवान
    शोध में कुछ खास जीवनशैली आदतों को दिमागी सेहत के लिए बेहद फायदेमंद बताया गया:
    गहरी और गुणवत्तापूर्ण नींद ,आशावादी सोच और मानसिक लचीलापन, तनाव पर नियंत्रण और मानसिक शांति ,मजबूत सामाजिक रिश्ते और सपोर्ट सिस्टम ,संतुलित वजन, जिससे सूजन कम होती है तंबाकू से दूरी, जिससे ब्रेन सेल्स सुरक्षित रहती हैं

    डिमेंशिया और अल्जाइमर से बचाव में मदद

    शोधकर्ताओं का कहना है कि आशावाद सीखा जा सकता है तनाव को नए नजरिए से संभाला जा सकता है और नींद से जुड़ी समस्याओं का इलाज संभव है। उम्र बढ़ने के साथ दिमाग डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसी बीमारियों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो जाता है, लेकिन यह स्टडी बताती है कि छोटे-छोटे जीवनशैली बदलाव लंबे समय तक दिमाग को स्वस्थ और सक्रिय बनाए रख सकते हैं।
    यह रिसर्च साफ संकेत देती है कि दिमाग की उम्र आपके हाथ में है। अगर आप अपनी आदतों पर ध्यान दें, तो न सिर्फ शरीर बल्कि दिमाग भी उम्र को मात दे सकता है।