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  • भगवान शिव के गले में क्यों रहता है नाग, जानिए इस रहस्य से जुड़ी पौराणिक कथा?

    भगवान शिव के गले में क्यों रहता है नाग, जानिए इस रहस्य से जुड़ी पौराणिक कथा?



    नई दिल्ली।
    हिंदू धर्म में भगवान शिव की छवि जितनी रहस्यमयी है, उतनी ही गहरी उनके प्रतीकों की भी मान्यता है। उनके गले में लिपटा हुआ नाग अक्सर लोगों के मन में सवाल खड़ा करता है कि आखिर भोलेनाथ ने डर और विष के प्रतीक माने जाने वाले सांप को अपने आभूषण के रूप में क्यों धारण किया। इसके पीछे केवल एक नहीं, बल्कि कई पौराणिक और आध्यात्मिक कारण बताए जाते हैं।

    पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के समय जब वासुकी नाग को रस्सी बनाकर देवताओं और दानवों ने मिलकर मंथन किया था, तब यह घटना शिव और नागों के बीच गहरे संबंध की शुरुआत मानी जाती है। मंथन के दौरान जब हलाहल विष निकला तो पूरी सृष्टि संकट में आ गई। ऐसे समय में भगवान शिव ने उस विष को पीकर संसार की रक्षा की और उसे अपने कंठ में रोक लिया। इसी कारण उनका नाम नीलकंठ पड़ा। माना जाता है कि इसी घटना के बाद नागों की भक्ति और समर्पण शिव के प्रति और मजबूत हो गया।

    धार्मिक मान्यता यह भी कहती है कि भगवान शिव ने नाग को अपने गले में स्थान देकर यह संदेश दिया कि सृष्टि का हर जीव समान है, चाहे वह डरावना ही क्यों न लगे। सांप सामान्यतः भय और मृत्यु का प्रतीक माना जाता है, लेकिन शिव ने उसे अपनाकर यह सिद्ध किया कि सच्चा योगी वही है जो भय पर विजय पा ले। उनके लिए जीवन और मृत्यु दोनों समान हैं, इसलिए नाग उनके लिए आभूषण बन गया।

    आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो नाग को ऊर्जा और जागृति का प्रतीक माना जाता है। योग परंपरा में कुंडलिनी शक्ति को सर्प के रूप में दर्शाया जाता है, जो मानव शरीर में सुप्त अवस्था में रहती है। भगवान शिव को योग और ध्यान का सर्वोच्च स्वरूप माना गया है, इसलिए उनके गले में नाग इस बात का संकेत है कि वे जाग्रत चेतना और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के स्वामी हैं।

    आज भी शिवभक्त सावन, महाशिवरात्रि और नाग पंचमी जैसे पर्वों पर शिव और नाग देवता की एक साथ पूजा करते हैं। शिव मंदिरों में शिवलिंग पर नाग की आकृति इस बात का प्रतीक है कि भगवान शिव अपने भक्तों को हर प्रकार के भय और संकट से मुक्ति दिलाते हैं। उनका यह स्वरूप शक्ति, संतुलन और निडरता का संदेश देता है, जो जीवन के हर पहलू में प्रेरणा बनकर सामने आता है।

  • रणवीर सिंह बनेंगे भगवान शिव, अमिश त्रिपाठी की 'द इमॉर्टल्स ऑफ मेलुहा' पर आधारित भव्य ट्रायलॉजी का हुआ शंखनाद

    रणवीर सिंह बनेंगे भगवान शिव, अमिश त्रिपाठी की 'द इमॉर्टल्स ऑफ मेलुहा' पर आधारित भव्य ट्रायलॉजी का हुआ शंखनाद


    नई दिल्ली ।भारतीय फिल्म उद्योग के ऊर्जावान अभिनेता रणवीर सिंह इन दिनों अपने करियर के सबसे सुनहरे दौर से गुजर रहे हैं। अपनी पिछली रिलीज फिल्मों की ऐतिहासिक सफलता के बाद, रणवीर ने अब एक ऐसे प्रोजेक्ट पर हाथ डाला है जो भारतीय सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर साबित हो सकता है। ताजा जानकारी के अनुसार, रणवीर सिंह विख्यात लेखक अमिश त्रिपाठी की सर्वाधिक बिकने वाली पुस्तक शृंखला ‘द इमॉर्टल्स ऑफ मेलुहा’ पर आधारित एक भव्य ट्रायलॉजी फिल्म बनाने की योजना बना रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस फिल्म में रणवीर न केवल मुख्य भूमिका में नजर आएंगे, बल्कि वे इसे अपने स्वयं के प्रोडक्शन बैनर के तले निर्मित भी करेंगे। यह फिल्म भगवान शिव के एक मानवीय और वीर स्वरूप की गाथा होगी, जो एक प्राचीन सभ्यता के भाग्य को बदलने की अद्भुत क्षमता रखते हैं।

    फिल्म जगत में इस खबर के आने के बाद से ही प्रशंसकों और विशेषज्ञों के बीच भारी उत्साह देखा जा रहा है। हालांकि फिल्म की पूरी स्टार कास्ट अभी फाइनल नहीं हुई है, लेकिन स्क्रीनप्ले पर काम तेजी से शुरू कर दिया गया है। रिपोर्टों के अनुसार, इस महागाथा के पहले भाग का प्रोडक्शन कार्य साल 2028 तक शुरू होने की संभावना है। दिलचस्प बात यह है कि इस कहानी के अधिकारों को लेकर बॉलीवुड में लंबे समय से चर्चाएं थीं। पूर्व में अक्षय कुमार जैसे बड़े सितारों ने भी इस कहानी में रुचि दिखाई थी, लेकिन अंततः यह प्रोजेक्ट रणवीर सिंह के खाते में गया है। रणवीर की टीम इस प्रोजेक्ट को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाने के लिए बड़े पैमाने पर तकनीकी और रचनात्मक निवेश करने की तैयारी में है।

    रणवीर सिंह की हालिया फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर कमाई के सभी पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। स्पाई थ्रिलर शैली में उनकी पिछली प्रस्तुतियों ने वैश्विक स्तर पर हजारों करोड़ का कारोबार कर उनकी साख को एक वैश्विक सितारे के रूप में स्थापित किया है। उनके अभिनय की विविधता और किरदार में जान फूंकने की कला को देखते हुए यह माना जा रहा है कि भगवान शिव का जटिल और शक्तिशाली किरदार उनके लिए एक नई चुनौती और उपलब्धि होगा। इसके साथ ही, चर्चाएं यह भी हैं कि वे आगामी वर्षों में कुछ अन्य बड़े निर्देशकों के साथ भी बड़े स्तर की एक्शन और थ्रिलर फिल्मों में नजर आएंगे। फिलहाल, ‘द इमॉर्टल्स ऑफ मेलुहा’ पर आधारित यह प्रोजेक्ट भारतीय पौराणिक कथाओं को बड़े पर्दे पर देखने वाले दर्शकों के लिए एक बड़ा आकर्षण बनने जा रहा है।

  • आज का धार्मिक योग: 11 मई को भगवान शिव की आराधना का खास महत्व

    आज का धार्मिक योग: 11 मई को भगवान शिव की आराधना का खास महत्व


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित माना जाता है और इस दिन शिव आराधना का विशेष महत्व होता है। 11 मई, सोमवार को ऐसा ही एक अत्यंत शुभ और पावन संयोग बन रहा है, जिसे धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से बेहद फलदायी बताया जा रहा है। इस दिन श्रद्धालुओं द्वारा की जाने वाली शिव पूजा जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने वाली मानी जा रही है।

    मान्यता है कि भगवान शिव अत्यंत भोले और शीघ्र प्रसन्न होने वाले देव हैं। सोमवार के दिन यदि सच्चे मन से उनकी आराधना की जाए तो सभी प्रकार के दुख, रोग और बाधाओं का नाश होता है। 11 मई का यह विशेष दिन भक्तों के लिए और भी अधिक महत्वपूर्ण इसलिए माना जा रहा है क्योंकि इस दिन ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति भी शिव भक्ति के अनुकूल मानी जा रही है, जिससे पूजा का फल कई गुना बढ़ सकता है।

    शिव मंदिरों में इस दिन सुबह से ही भक्तों की भीड़ उमड़ने की संभावना है। लोग जलाभिषेक, बेलपत्र, धतूरा, भस्म और पुष्प अर्पित कर भगवान शिव को प्रसन्न करने का प्रयास करेंगे। “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप इस दिन विशेष रूप से लाभकारी बताया जा रहा है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भक्त इस दिन व्रत रखते हैं और पूरी श्रद्धा के साथ शिवलिंग का अभिषेक करते हैं, उनके जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है। साथ ही विवाह, नौकरी, व्यापार और स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं में भी राहत मिलने के योग बनते हैं।

    ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, सोमवार और शिव आराधना का यह संयोग मानसिक शांति और आत्मिक बल को बढ़ाने वाला होता है। यह दिन विशेष रूप से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो लंबे समय से किसी परेशानी या बाधा से जूझ रहे हैं।

    भक्तों को सलाह दी जाती है कि वे इस दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और शिवलिंग पर जल, दूध एवं पंचामृत अर्पित करें। इसके बाद ध्यान और मंत्र जाप के माध्यम से भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करें।

    कुल मिलाकर 11 मई का यह सोमवार धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ अवसर लेकर आ रहा है, जो भक्तों के जीवन में नई ऊर्जा और सकारात्मकता का संचार करने वाला माना जा रहा है।

  • शिव भक्ति का महत्व: सोमवार को बेलपत्र चढ़ाने से दूर होते हैं सभी कष्ट, जानें धार्मिक फल

    शिव भक्ति का महत्व: सोमवार को बेलपत्र चढ़ाने से दूर होते हैं सभी कष्ट, जानें धार्मिक फल

    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित माना जाता है और इस दिन शिव मंदिर जाकर पूजा-अर्चना करने का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि सोमवार के दिन सच्चे मन से शिव दर्शन करने और उन्हें बेलपत्र अर्पित करने से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव को बेलपत्र अत्यंत प्रिय है। कहा जाता है कि केवल एक बेलपत्र श्रद्धा और भक्ति के साथ अर्पित करने से भी शिवजी शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। बेलपत्र अर्पण का अर्थ केवल एक पूजा सामग्री नहीं, बल्कि यह समर्पण और आस्था का प्रतीक माना जाता है।

    सोमवार व्रत के दिन शिवालय जाने वाले भक्त सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और शिवलिंग पर जल, दूध, धतूरा और विशेष रूप से बेलपत्र अर्पित करते हैं। इस दौरान “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करने से पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है।

    मान्यता है कि बेलपत्र अर्पित करने से व्यक्ति के जीवन में चल रही बाधाएं दूर होती हैं। मानसिक तनाव, रोग, आर्थिक समस्याएं और पारिवारिक कलह जैसी परेशानियों से राहत मिलने के योग बनते हैं। साथ ही, भगवान शिव की कृपा से सुख-शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में भी बेलपत्र के महत्व का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि बेलपत्र में तीन पत्तियां त्रिदेवोंब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक मानी जाती हैं, और इसे शिवलिंग पर अर्पित करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, सोमवार के दिन शिव मंदिर में जाना केवल धार्मिक परंपरा ही नहीं, बल्कि मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने का माध्यम भी है। मंदिर का शांत वातावरण और मंत्रोच्चारण व्यक्ति के मन को स्थिरता प्रदान करता है।

    भक्तों का विश्वास है कि यदि कोई व्यक्ति लगातार सोमवार व्रत रखकर शिवजी की सच्चे मन से पूजा करता है, तो उसके जीवन में धीरे-धीरे सभी कष्ट समाप्त होने लगते हैं और नई संभावनाओं के द्वार खुलते हैं। कुल मिलाकर, सोमवार के दिन शिव मंदिर जाना और भगवान शिव को बेलपत्र अर्पित करना केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और आत्मिक शांति का ऐसा माध्यम है, जो भक्त के जीवन में सुख, समृद्धि और संतुलन लाने में सहायक माना जाता है।

  • शिव पूजा का महत्व: आखिर क्यों प्रिय हैं भगवान भोलेनाथ को जल और बेलपत्र

    शिव पूजा का महत्व: आखिर क्यों प्रिय हैं भगवान भोलेनाथ को जल और बेलपत्र


    नई दिल्ली । भगवान शिव को देवों के देव महादेव कहा जाता है। मान्यता है कि शिवजी अपने भक्तों की सच्ची भक्ति से जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या की जरूरत नहीं होती, बल्कि केवल जल और बेलपत्र अर्पित करने से भी भोलेनाथ कृपा बरसाते हैं। यही कारण है कि हर सोमवार और विशेष रूप से सावन माह में शिव मंदिरों में जलाभिषेक और बेलपत्र चढ़ाने की परंपरा निभाई जाती है।लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर भगवान शिव पर जल और बेलपत्र ही क्यों चढ़ाया जाता है? इसके पीछे एक बेहद रोचक और पौराणिक कथा जुड़ी हुई है।

    समुद्र मंथन से जुड़ी है यह पौराणिक कथा
    पुराणों के अनुसार, एक समय देवताओं और दानवों के बीच समुद्र मंथन हुआ। इस मंथन से अमृत सहित कई दिव्य वस्तुएं निकलीं, लेकिन सबसे पहले एक भयंकर विष निकला, जिसे “हलाहल विष” कहा गया। यह विष इतना घातक था कि उसके प्रभाव से पूरा संसार संकट में पड़ गया। देवता और दानव दोनों ही उसके प्रभाव को रोकने में असमर्थ थे। तब सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने उस विष का पान कर लिया। भगवान शिव ने विष को अपने कंठ में ही रोक लिया, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और तभी से उन्हें “नीलकंठ” कहा जाने लगा।

     जल और बेलपत्र से शांत हुई महादेव की तपन
    हलाहल विष का प्रभाव इतना तीव्र था कि भगवान शिव का शरीर अत्यधिक गर्म हो गया। उनके शरीर की तपन से वातावरण भी प्रभावित होने लगा। मान्यता है कि उस समय देवताओं ने भगवान शिव को शीतलता प्रदान करने के लिए उन पर जल अर्पित किया। वहीं बेलपत्र को विषनाशक और शीतल माना जाता है, इसलिए शिवजी को बेलपत्र भी चढ़ाया गया। जल और बेलपत्र से भगवान शिव को राहत मिली और तभी से शिवलिंग पर जलाभिषेक और बेलपत्र अर्पित करने की परंपरा शुरू हो गई, जो आज भी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।

     जलाभिषेक करते समय रखें इन नियमों का ध्यान
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय कुछ विशेष नियमों का पालन करना जरूरी माना गया है-

    जलाभिषेक हमेशा शिवलिंग का ही करें
    जल में तुलसी पत्र न डालें, क्योंकि शिव पूजा में तुलसी वर्जित मानी जाती है
    शिवलिंग की पूरी परिक्रमा नहीं करनी चाहिए
    जलाभिषेक के दौरान शिवलिंग को बार-बार स्पर्श करने से बचें
    पूजा के समय शांत और श्रद्धापूर्ण वातावरण बनाए रखें
    मान्यता है कि उचित विधि और मंत्रोच्चार के साथ किया गया जलाभिषेक विशेष फलदायी होता है।

     बेलपत्र चढ़ाने का धार्मिक महत्व
    बेलपत्र को भगवान शिव का सबसे प्रिय पत्र माना गया है। इसकी तीन पत्तियों को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है। बेलपत्र चढ़ाने से मन की शांति, सकारात्मक ऊर्जा और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।

    आस्था और श्रद्धा से जुड़ी सनातन परंपरा
    भगवान शिव पर जल और बेलपत्र चढ़ाने की परंपरा केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि पौराणिक मान्यताओं और आध्यात्मिक भावनाओं से भी जुड़ी हुई है। यह परंपरा हमें त्याग, संरक्षण और श्रद्धा का संदेश देती है। मान्यता है कि सच्चे मन से किए गए जलाभिषेक से भगवान भोलेनाथ अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं।

  • वास्तु टिप्स: सोमवार को इन कामों से बचें, नहीं तो घर में बढ़ सकती है नकारात्मकता

    वास्तु टिप्स: सोमवार को इन कामों से बचें, नहीं तो घर में बढ़ सकती है नकारात्मकता


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। यह दिन मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और पारिवारिक सुख-समृद्धि से जुड़ा हुआ माना जाता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, सोमवार को किए गए कुछ कार्य घर के वातावरण और व्यक्ति की मानसिक स्थिति पर गहरा प्रभाव डालते हैं। यदि इस दिन कुछ खास बातों का ध्यान न रखा जाए, तो घर में वास्तु दोष बढ़ सकता है, जिससे तनाव, आर्थिक परेशानियां और नकारात्मकता बढ़ने लगती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, सोमवार के दिन घर की दिशा, साफ-सफाई और पूजा-पाठ से जुड़े नियमों का पालन करने से सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और परिवार में सुख-शांति का वातावरण कायम रहता है।

    सोमवार को इन बातों का रखें विशेष ध्यान
    घर का मुख्य द्वार रखें साफ और व्यवस्थित
    वास्तु शास्त्र में घर के मुख्य दरवाजे को ऊर्जा का प्रवेश द्वार माना गया है। सोमवार के दिन मुख्य द्वार के आसपास गंदगी, जूते-चप्पल या टूटा सामान नहीं रखना चाहिए। ऐसा करने से नकारात्मक ऊर्जा घर में प्रवेश कर सकती है।मुख्य दरवाजे पर जल छिड़ककर और साफ-सफाई करके सकारात्मक वातावरण बनाया जा सकता है।

    उत्तर दिशा में रखें पानी का पात्र

    सोमवार का संबंध चंद्र ग्रह और जल तत्व से माना जाता है। वास्तु के अनुसार, घर की उत्तर दिशा में पानी से भरा पात्र या छोटा कलश रखना शुभ माना जाता है। इससे मानसिक शांति और आर्थिक स्थिरता बनी रहती है।

     भगवान शिव की पूजा से दूर होता है वास्तु दोष

    सोमवार को भगवान शिव की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा कम होती है और वास्तु दोष शांत होने लगते हैं। अगर संभव हो तो शाम के समय घर में कपूर या घी का दीपक जलाना भी शुभ माना जाता है।

     सोमवार को न करें ये गलतियां

    वास्तु शास्त्र के अनुसार सोमवार के दिन कुछ गलतियां करने से बचना चाहिए-

    घर में बेवजह झगड़ा या विवाद न करें
    रसोईघर में गंदगी न छोड़ें
    टूटी हुई वस्तुएं घर में न रखें
    देर तक सोने और आलस्य से बचें
    घर के उत्तर-पूर्व कोने को गंदा न रखें
    इन आदतों से घर में नकारात्मक ऊर्जा बढ़ सकती है और मानसिक तनाव भी बढ़ने लगता है।


    सफेद चीजों का प्रयोग माना जाता है शुभ

    सोमवार को सफेद रंग का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन सफेद वस्त्र पहनना, दूध, चावल या सफेद मिठाई का दान करना शुभ फल देता है। इससे चंद्र ग्रह मजबूत होता है और मन शांत रहता है।

     छोटी सावधानियां बदल सकती हैं घर की ऊर्जा

    वास्तु शास्त्र में सोमवार को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। इस दिन की गई छोटी-छोटी सावधानियां घर में सकारात्मक ऊर्जा, मानसिक शांति और सुख-समृद्धि लाने में मदद कर सकती हैं। यदि नियमित रूप से इन वास्तु नियमों का पालन किया जाए, तो जीवन में संतुलन और खुशहाली बनी रह सकती है।

  • रविवार की भस्म आरती में Mahakaleshwar Jyotirlinga का अलौकिक रूप: रजत मुकुट और भस्म से हुआ भव्य श्रृंगार

    रविवार की भस्म आरती में Mahakaleshwar Jyotirlinga का अलौकिक रूप: रजत मुकुट और भस्म से हुआ भव्य श्रृंगार


    नई दिल्ली । विश्व प्रसिद्ध Shri Mahakaleshwar Jyotirlinga Temple में रविवार तड़के भस्म आरती के दौरान अद्भुत आध्यात्मिक दृश्य देखने को मिला। सुबह करीब 4 बजे जैसे ही मंदिर के पट खुले, पंडे-पुजारियों ने गर्भगृह में स्थापित सभी देव प्रतिमाओं का विधिवत पूजन किया और भगवान महाकाल का जलाभिषेक संपन्न कराया।
    इसके बाद दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से बने पंचामृत से भगवान का अभिषेक किया गया। इस दौरान त्रिशूल, त्रिपुंड और डमरू के साथ भांग अर्पित कर विशेष श्रृंगार किया गया, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा।
    भस्म अर्पण के साथ हुआ दिव्य श्रृंगार
    कपूर आरती के बाद हरिओम जल अर्पित किया गया और फिर भगवान महाकाल के ज्योतिर्लिंग को वस्त्र से ढंककर भस्म अर्पित की गई। भस्म अर्पण के बाद भगवान का दिव्य श्रृंगार और भी भव्य रूप में सामने आया।
    शेषनाग का रजत मुकुट, रजत मुंडमाल और रुद्राक्ष की माला के साथ सुगंधित पुष्पों की मालाएं बाबा महाकाल को अर्पित की गईं। मोगरे और गुलाब के फूलों से सजे भगवान महाकाल का स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा।
    भोग और आरती के बाद भक्तों को मिला दर्शन
    श्रृंगार पूर्ण होने के बाद भगवान को फल और मिष्ठान का भोग लगाया गया। भस्म आरती के दौरान महा निर्वाणी अखाड़े की ओर से भस्म अर्पित की गई। मान्यता है कि भस्म अर्पित होने के बाद भगवान निराकार से साकार स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं।
    आरती में बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल के दिव्य स्वरूप के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। पूरा मंदिर परिसर “हर हर महादेव” के जयघोष से गूंज उठा।
  • “महादेव सबसे शक्तिशाली किरदार”-तरुण खन्ना ने तोड़ी टाइपकास्ट की धारणा

    “महादेव सबसे शक्तिशाली किरदार”-तरुण खन्ना ने तोड़ी टाइपकास्ट की धारणा


    नई दिल्ली। टीवी इंडस्ट्री में तरुण खन्ना को ‘महादेव’ के रूप में खास पहचान मिली है। उन्होंने अब तक 400 से ज्यादा बार भगवान भगवान शिव का किरदार निभाया है। ‘कर्म फल दाता शनि’, ‘राधा कृष्ण’, ‘जय कन्हैया लाल की’, ‘देवी आदि पराशक्ति’ और ‘परम अवतार श्री कृष्ण’ जैसे कई लोकप्रिय पौराणिक शोज में उनकी मौजूदगी ने दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई है।

     टाइपकास्ट या सोच-समझकर लिया फैसला?
    लगातार एक ही तरह के किरदार निभाने पर अक्सर कलाकारों को ‘टाइपकास्ट’ कहा जाता है, लेकिन तरुण खन्ना इस धारणा से अलग सोच रखते हैं। उनका कहना है कि वह जानबूझकर इस भूमिका को चुनते हैं क्योंकि यह बेहद प्रभावशाली और शक्तिशाली किरदार है। उनके अनुसार, “एक अभिनेता के लिए किरदार की ताकत समझना जरूरी है और महादेव से ज्यादा शक्तिशाली रोल मिलना मुश्किल है। इसलिए यह मेरा सोचा-समझा निर्णय है।”

     किरदार ने बदली जिंदगी
    तरुण खन्ना मानते हैं कि भगवान शिव का किरदार निभाने से उनके व्यक्तित्व में बड़ा बदलाव आया है। इस भूमिका ने उन्हें अधिक धैर्यवान बनाया और उनके भीतर की विनम्रता को फिर से जागृत किया।

     टीवी से फिल्मों और थिएटर तक का सफर
    तरुण खन्ना ने सिर्फ टीवी ही नहीं, बल्कि फिल्मों और थिएटर में भी महादेव का किरदार निभाया है। तेलुगु फिल्म ‘अखंडा 2’ और नाटक ‘हमारे राम’ में भी उन्होंने इसी रूप में दर्शकों को प्रभावित किया।

    सिर्फ VFX नहीं, भावनाएं जरूरी
    पौराणिक शोज पर अपनी राय रखते हुए तरुण खन्ना ने कहा कि केवल VFX और भव्य कॉस्ट्यूम से शो सफल नहीं होता। उनका मानना है कि अगर कहानी में भावनाओं की गहराई नहीं होगी, तो दर्शकों से जुड़ाव नहीं बन पाएगा। उन्होंने साफ कहा, “महादेव सिर्फ एक लुक नहीं, बल्कि एक दिव्य अनुभूति है, जिसे निभाने के लिए सच्ची श्रद्धा और समर्पण चाहिए।”

     किरदार नहीं, आस्था का प्रतीक
    तरुण खन्ना के लिए ‘महादेव’ का किरदार सिर्फ एक रोल नहीं, बल्कि आस्था और समर्पण का प्रतीक है। यही वजह है कि वह इसे बार-बार निभाने के बावजूद इसे अपनी ताकत मानते हैं, कमजोरी नहीं।

  • उज्जैन में महाकाल की भस्म आरती: दिव्य श्रृंगार में सजे बाबा, श्रद्धालुओं का उमड़ा सैलाब

    उज्जैन में महाकाल की भस्म आरती: दिव्य श्रृंगार में सजे बाबा, श्रद्धालुओं का उमड़ा सैलाब


    नई दिल्ली। उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में सोमवार तड़के भस्म आरती के दौरान दिव्य और भव्य दृश्य देखने को मिला। भगवान महाकाल का विधि-विधान से पंचामृत पूजन कर आकर्षक श्रृंगार किया गया, जिसमें भांग, चंदन, बिल्वपत्र और रजत आभूषणों से बाबा को राजा स्वरूप में सजाया गया।

    भोर की पहली आरती के साथ ही मंदिर परिसर “हरिओम” के जयघोष और मंत्रोच्चार से गूंज उठा। पंडे-पुजारियों ने गर्भगृह में स्थापित ज्योतिर्लिंग का जलाभिषेक किया, जिसके बाद दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से बने पंचामृत से अभिषेक किया गया। इसके बाद पारंपरिक रूप से भस्म अर्पित की गई, जिसे महाकाल पूजा का सबसे विशेष और पवित्र क्षण माना जाता है।

    भस्म अर्पण के दौरान महानिर्वाणी अखाड़ा की ओर से विशेष भस्म चढ़ाई गई। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी क्षण भगवान महाकाल अपने निराकार स्वरूप से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। 

    नई दिल्ली। उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में सोमवार तड़के भस्म आरती के दौरान दिव्य और भव्य दृश्य देखने को मिला। भगवान महाकाल का विधि-विधान से पंचामृत पूजन कर आकर्षक श्रृंगार किया गया, जिसमें भांग, चंदन, बिल्वपत्र और रजत आभूषणों से बाबा को राजा स्वरूप में सजाया गया।

    भोर की पहली आरती के साथ ही मंदिर परिसर “हरिओम” के जयघोष और मंत्रोच्चार से गूंज उठा। पंडे-पुजारियों ने गर्भगृह में स्थापित ज्योतिर्लिंग का जलाभिषेक किया, जिसके बाद दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से बने पंचामृत से अभिषेक किया गया। इसके बाद पारंपरिक रूप से भस्म अर्पित की गई, जिसे महाकाल पूजा का सबसे विशेष और पवित्र क्षण माना जाता है।
    भस्म अर्पण के दौरान महानिर्वाणी अखाड़ा की ओर से विशेष भस्म चढ़ाई गई। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी क्षण भगवान महाकाल अपने निराकार स्वरूप से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। इसके बाद शेषनाग का रजत मुकुट, रुद्राक्ष की माला, रजत मुण्डमाल और सुगंधित पुष्पों से बाबा का दिव्य श्रृंगार किया गया।
    मोगरा और गुलाब के फूलों से सजे महाकाल का स्वरूप अत्यंत मनमोहक दिखाई दिया। आरती के दौरान भगवान को फल और मिष्ठान का भोग अर्पित किया गया, जिसे श्रद्धालुओं ने बड़े श्रद्धा भाव से देखा।
    इस पावन अवसर पर देशभर से आए हजारों श्रद्धालुओं ने भस्म आरती के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। मंदिर परिसर में भक्ति, आस्था और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत संगम देखने को मिला।
    भगवान महाकाल की भस्म आरती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था और ऊर्जा का अद्वितीय अनुभव है, जो हर भक्त के मन को भक्ति से भर देता है।

  • सोमवार व्रत कथा: भोलेनाथ की कृपा से पूरी होती हैं हर मनोकामनाएं

    सोमवार व्रत कथा: भोलेनाथ की कृपा से पूरी होती हैं हर मनोकामनाएं


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। इस दिन व्रत रखकर विधि-विधान से पूजा करने और सोमवार व्रत कथा सुनने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि सच्चे मन से किए गए इस व्रत से भोलेनाथ जल्दी प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सभी इच्छाएं पूरी करते हैं।

    सोमवार व्रत कथा

    प्राचीन समय में एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसके पास धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, लेकिन संतान न होने के कारण वह बेहद दुखी रहता था। संतान प्राप्ति की इच्छा से वह हर सोमवार व्रत रखता और माता पार्वती के साथ शिवजी की पूजा करता था।

    उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता पार्वती ने भगवान शिव से उसकी मनोकामना पूर्ण करने का आग्रह किया। पहले तो शिवजी ने कर्म और भाग्य का तर्क दिया, लेकिन माता पार्वती के आग्रह पर उन्होंने साहूकार को पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि वह पुत्र केवल 12 वर्ष तक ही जीवित रहेगा।

    समय बीता और साहूकार के घर पुत्र का जन्म हुआ। जब वह 11 वर्ष का हुआ तो उसे शिक्षा के लिए काशी भेजा गया। रास्ते में एक नगर में राजकुमारी का विवाह हो रहा था। परिस्थितियों के कारण साहूकार के पुत्र का विवाह राजकुमारी से करा दिया गया, लेकिन वह आगे पढ़ाई के लिए काशी चला गया।

    काशी में जब वह बालक 12 वर्ष का हुआ, तभी उसकी मृत्यु हो गई। उसके मामा का रो-रोकर बुरा हाल था। तभी वहां से भगवान शिव और माता पार्वती गुजरे। माता पार्वती ने करुणा वश शिवजी से उस बालक को जीवित करने का आग्रह किया। अंततः शिवजी ने प्रसन्न होकर उसे पुनः जीवनदान दे दिया।

    बालक शिक्षा पूरी कर जब वापस लौटा, तो उसका परिवार उसे जीवित देखकर अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसी रात भगवान शिव ने साहूकार को स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि उसके सोमवार व्रत और कथा के प्रभाव से ही उसके पुत्र को लंबी आयु प्राप्त हुई है।

    व्रत का महत्व

    सोमवार व्रत और कथा का पाठ करने से-

    जीवन के कष्ट दूर होते हैं
    संतान सुख की प्राप्ति होती है
    वैवाहिक जीवन सुखमय बनता है
    मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं

    सच्चे मन, श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया सोमवार व्रत व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाता है। भगवान शिव अपने भक्तों पर हमेशा कृपा बनाए रखते हैं और उनकी हर इच्छा पूर्ण करते हैं।