Tag: Lord Vishnu

  • गुरुवार पूजा विधि: भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की कृपा पाने के लिए ऐसे करें पूजा

    गुरुवार पूजा विधि: भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की कृपा पाने के लिए ऐसे करें पूजा


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में सप्ताह का प्रत्येक दिन किसी न किसी देवी-देवता को समर्पित होता है। गुरुवार का दिन भगवान विष्णु और देवताओं के गुरु बृहस्पति को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने पर जीवन में सुख, समृद्धि, वैभव और सफलता का आगमन होता है। साथ ही गुरु ग्रह की कृपा प्राप्त होने से शिक्षा, करियर, विवाह और संतान संबंधी बाधाएं भी दूर होती हैं।

    गुरुवार के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ पीले रंग के वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल की सफाई कर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। यदि घर में बृहस्पति देव का चित्र या प्रतीक मौजूद हो तो उसकी भी पूजा की जा सकती है। पूजा के दौरान भगवान विष्णु को पीले फूल, हल्दी, चने की दाल, पीले फल और केसर अर्पित करना शुभ माना जाता है।

    पूजा प्रारंभ करने से पहले दीपक जलाएं और भगवान विष्णु का ध्यान करें। इसके बाद उन्हें अक्षत, चंदन, तुलसी दल और पीले पुष्प अर्पित करें। तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय मानी जाती है, इसलिए पूजा में इसका विशेष महत्व होता है। इसके बाद विष्णु सहस्रनाम, श्रीहरि स्तोत्र, विष्णु चालीसा अथवा ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करें। बृहस्पति देव की कृपा प्राप्त करने के लिए ‘ॐ बृं बृहस्पतये नमः’ मंत्र का जाप भी किया जा सकता है।

    गुरुवार के व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु दिन में एक समय पीले रंग के भोजन का सेवन करते हैं। भोजन में चने की दाल, बेसन से बनी वस्तुएं या पीले रंग के फल शामिल किए जा सकते हैं। इस दिन नमक का सेवन न करने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुरुवार को दान-पुण्य करना अत्यंत शुभ माना जाता है। पीले वस्त्र, हल्दी, चने की दाल, केला, केसर अथवा धार्मिक पुस्तकों का दान करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है। जरूरतमंदों की सहायता करने और गौ सेवा करने का भी विशेष महत्व बताया गया है।

    गुरुवार के दिन कुछ कार्यों से बचने की सलाह भी दी जाती है। मान्यता है कि इस दिन बाल कटवाना, दाढ़ी बनवाना, नाखून काटना तथा घर में अनावश्यक विवाद करना शुभ नहीं माना जाता। इसके अलावा घर की महिलाओं को बाल धोने से भी परहेज करने की सलाह दी जाती है, हालांकि यह धार्मिक परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित है।

    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिन लोगों की कुंडली में गुरु ग्रह कमजोर होता है, उन्हें गुरुवार का व्रत और पूजा विशेष लाभ प्रदान करती है। इससे गुरु ग्रह मजबूत होता है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आने लगते हैं। श्रद्धा, संयम और विश्वास के साथ की गई पूजा व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है।

    इस प्रकार गुरुवार के दिन भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की पूजा करने से न केवल आध्यात्मिक उन्नति होती है, बल्कि परिवार, करियर और आर्थिक जीवन में भी शुभ परिणाम प्राप्त होने की मान्यता है।

  • दुनिया का सबसे अमीर मंदिर कौन सा है? जानिए अरबों के खजाने और रहस्यमयी तहखानों की पूरी कहानी

    दुनिया का सबसे अमीर मंदिर कौन सा है? जानिए अरबों के खजाने और रहस्यमयी तहखानों की पूरी कहानी


    नई दिल्ली । भारत को मंदिरों और आध्यात्मिक विरासत की भूमि कहा जाता है। देश में ऐसे कई प्राचीन मंदिर हैं जो अपनी भव्य वास्तुकला, धार्मिक महत्व और ऐतिहासिक विरासत के लिए प्रसिद्ध हैं। लेकिन जब बात दुनिया के सबसे अमीर मंदिर की आती है, तो सबसे पहले नाम केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम स्थित Sree Padmanabhaswamy Temple का लिया जाता है। भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर अपनी आस्था के साथ-साथ अपार संपत्ति और रहस्यमयी खजाने के लिए भी पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है।

    यह मंदिर सदियों पुराना है और इसकी देखरेख परंपरागत रूप से Travancore Royal Family द्वारा की जाती रही है। द्रविड़ शैली में निर्मित इस मंदिर की भव्यता और कलात्मकता श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। हालांकि इसकी सबसे बड़ी पहचान इसके भूमिगत तहखानों में छिपे खजाने को लेकर है।

    साल 2011 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर मंदिर के कुछ गुप्त तहखानों का निरीक्षण किया गया। इन तहखानों को वॉल्ट या नेत्रकल कहा जाता है। जब इनमें से कुछ कक्ष खोले गए तो वहां से सोने की मूर्तियां, स्वर्ण आभूषण, दुर्लभ हीरे-जवाहरात, प्राचीन सिक्के, स्वर्ण मुकुट और अनेक ऐतिहासिक कलाकृतियां बरामद हुईं। इन वस्तुओं की अनुमानित कीमत उस समय एक लाख करोड़ रुपये से अधिक आंकी गई थी।

    विशेषज्ञों और इतिहासकारों का मानना है कि यह केवल आर्थिक मूल्यांकन है। वास्तविक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए इस खजाने की कीमत का सही अनुमान लगाना लगभग असंभव है। कई वस्तुएं सैकड़ों वर्ष पुरानी हैं और उनका ऐतिहासिक महत्व उन्हें अनमोल बनाता है।

    मंदिर में कुल छह प्रमुख तहखाने बताए जाते हैं, जिन्हें ए, बी, सी, डी, ई और एफ नाम दिया गया है। इनमें सबसे अधिक चर्चा वॉल्ट बी को लेकर होती है। यह तहखाना आज भी पूरी तरह नहीं खोला गया है। इसके बारे में कई तरह की लोककथाएं और धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। कुछ लोग मानते हैं कि इस कक्ष को विशेष धार्मिक विधियों के माध्यम से सील किया गया था और इसे खोलना शुभ नहीं माना जाता। हालांकि इन दावों की कोई वैज्ञानिक या आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

    वॉल्ट बी को लेकर फैली रहस्यमयी कहानियों ने मंदिर को और अधिक चर्चित बना दिया है। यही वजह है कि दुनियाभर के इतिहासकार, शोधकर्ता और पर्यटक इस मंदिर के बारे में जानने में विशेष रुचि रखते हैं। मंदिर प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां इसकी सुरक्षा के लिए अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करती हैं। यहां चौबीसों घंटे कड़ी निगरानी रखी जाती है।

    श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर केवल धन-संपत्ति का प्रतीक नहीं है, बल्कि भारत की प्राचीन सभ्यता, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। मंदिर में सुरक्षित खजाना भारतीय इतिहास के अनेक अध्यायों को अपने भीतर समेटे हुए है। यही कारण है कि यह मंदिर आज भी श्रद्धा, इतिहास और रहस्य का अनोखा संगम बना हुआ है।

  • गुरुवार व्रत कथा: श्रद्धा से पढ़ें यह पावन कथा, भगवान विष्णु होंगे प्रसन्न, मिलेगा मनचाहा फल

    गुरुवार व्रत कथा: श्रद्धा से पढ़ें यह पावन कथा, भगवान विष्णु होंगे प्रसन्न, मिलेगा मनचाहा फल


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में गुरुवार का दिन भगवान विष्णु और बृहस्पति देव को समर्पित माना जाता है। इस दिन व्रत रखने और श्रद्धा भाव से पूजा-अर्चना करने का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गुरुवार व्रत करने और व्रत कथा का पाठ करने से जीवन में सुख, शांति, धन-समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि जो भक्त पूरे नियम और निष्ठा के साथ गुरुवार व्रत करता है, उसके जीवन से दरिद्रता दूर होती है और घर में लक्ष्मी का वास होता है। विशेष रूप से विवाहित महिलाओं के लिए यह व्रत अत्यंत शुभ माना गया है।

    गुरुवार व्रत की पावन कथा
    प्राचीन समय की बात है, एक नगर में एक धर्मपरायण ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी बहुत ही धार्मिक स्वभाव की थी, लेकिन उनके जीवन में धन की कमी के कारण हमेशा कठिनाइयां बनी रहती थीं। ब्राह्मण की पत्नी प्रतिदिन भगवान विष्णु की पूजा करती थी, लेकिन फिर भी घर में दरिद्रता बनी रहती थी। एक दिन वह जंगल में जल लेने गई, वहां उसकी मुलाकात एक वृद्ध साधु से हुई। साधु ने उसे गुरुवार व्रत करने की सलाह दी और बताया कि यदि श्रद्धा से भगवान विष्णु की पूजा और व्रत किया जाए, तो सभी दुख समाप्त हो जाते हैं। महिला ने साधु की बात मानकर गुरुवार व्रत शुरू किया। उसने नियमपूर्वक हर गुरुवार को उपवास रखा, पीले वस्त्र धारण किए और भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा की। कुछ ही समय बाद उसका जीवन बदलने लगा। घर में धन-धान्य की वृद्धि हुई, सुख-समृद्धि आने लगी और सभी परेशानियां दूर हो गईं। उसके जीवन में खुशहाली लौट आई।

    कथा से मिलने वाली सीख
    इस कथा से यह संदेश मिलता है कि श्रद्धा, धैर्य और नियमपूर्वक किया गया व्रत जीवन की कठिनाइयों को दूर कर सकता है। भगवान विष्णु सच्चे मन से की गई पूजा से शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    गुरुवार व्रत के नियम
    गुरुवार को पीले वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है
    भगवान विष्णु को पीले फूल, हल्दी और केले का भोग लगाना चाहिए
    व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करना आवश्यक है
    इस दिन नमक का सेवन करने से बचना चाहिए (व्रत रखने वालों के लिए)
    जरूरतमंदों को पीली वस्तुओं का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है

    गुरुवार व्रत न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आत्मविश्वास भी बढ़ाता है। इस व्रत कथा के श्रवण और पाठ से भक्तों पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा बनी रहती है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।

  • विष्णु पूजा में फूलों का विशेष महत्व, सही अर्पण से मिलती है लक्ष्मी कृपा और जीवन में सुख-शांति

    विष्णु पूजा में फूलों का विशेष महत्व, सही अर्पण से मिलती है लक्ष्मी कृपा और जीवन में सुख-शांति

    नई दिल्ली। गुरुवार का दिन भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई पूजा से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का संचार होता है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान विष्णु की पूजा में फूलों का विशेष महत्व बताया गया है और बिना फूल अर्पण के पूजा अधूरी मानी जाती है।

    मान्यता है कि कुछ विशेष फूल भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय होते हैं। इन फूलों को गुरुवार के दिन अर्पित करने से न केवल भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं, बल्कि मां लक्ष्मी की कृपा भी प्राप्त होती है। इससे आर्थिक समस्याएं दूर होती हैं और घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है।

    1. कदम का फूल: मोक्ष और पुण्य का प्रतीक
    गुरुवार के दिन भगवान विष्णु को कदम का फूल अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह फूल अर्पित करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक लाभ मिलता है और जीवन के कष्टों से मुक्ति मिलती है। इसे लगातार कुछ गुरुवार तक अर्पित करने की परंपरा विशेष फलदायी मानी गई है।

    2. गुलाब का फूल: आर्थिक समृद्धि का संकेत
    लाल गुलाब का फूल भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी दोनों को प्रिय माना गया है। गुरुवार के दिन गुलाब अर्पित करने से आर्थिक तंगी दूर होती है और नौकरी-व्यवसाय में आने वाली बाधाएं कम होती हैं। इसे नियमित गुरुवार को अर्पित करना शुभ माना जाता है।

    3. कनेर और गेंदा: सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत
    पीले रंग के कनेर और गेंदे के फूल भगवान विष्णु की पूजा में विशेष स्थान रखते हैं। पीला रंग बृहस्पति ग्रह का प्रतीक माना जाता है। इन फूलों को अर्पित करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है और शुभ फल की प्राप्ति होती है।

    4. चंपा और कमल: लक्ष्मी कृपा की प्राप्ति
    चंपा और कमल का फूल भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी दोनों को अत्यंत प्रिय है। विशेष रूप से कमल का फूल धन, समृद्धि और वैभव का प्रतीक माना जाता है। गुरुवार को इन फूलों का अर्पण करने से घर में स्थायी सुख-समृद्धि आती है और जीवन में संतुलन बना रहता है।

    5. पारिजात (हरसिंगार): इच्छापूर्ति का फूल
    पारिजात का फूल भगवान विष्णु को अति प्रिय माना जाता है। इसे अर्पित करने से धन-धान्य की कमी नहीं रहती और जीवन में सुख-संपन्नता बनी रहती है। मान्यता है कि लगातार कुछ गुरुवार तक इस फूल को अर्पित करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

    धार्मिक मान्यता और महत्व
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुरुवार के दिन भगवान विष्णु की पूजा में सही फूलों का चयन जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकता है। यह न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग खोलता है, बल्कि आर्थिक और पारिवारिक जीवन में भी स्थिरता लाता है।

    गुरुवार को भगवान विष्णु को उनके प्रिय फूल अर्पित करना एक सरल लेकिन प्रभावशाली उपाय माना जाता है। श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई पूजा से जीवन में सकारात्मक बदलाव, धन-समृद्धि और मानसिक शांति प्राप्त की जा सकती है।

  • पुरुषोत्तम मास में सावधानी: घर में न रखें ये वस्तुएं, सुख-शांति पर पड़ सकता है असर

    पुरुषोत्तम मास में सावधानी: घर में न रखें ये वस्तुएं, सुख-शांति पर पड़ सकता है असर


    नई दिल्ली। हिंदू पंचांग में Purushottam Maas को अत्यंत पवित्र और विशेष महीना माना जाता है। यह अवधि भगवान विष्णु को समर्पित होती है, जिसमें श्रद्धालु पूजा-पाठ, दान-पुण्य और धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करते हैं। मान्यता है कि इस महीने किए गए शुभ कार्य कई गुना फल देते हैं, लेकिन इसी के साथ वास्तु शास्त्र में कुछ विशेष सावधानियां भी बताई गई हैं।

    वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार, पुरुषोत्तम मास के दौरान घर में रखी कुछ वस्तुएं नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ा सकती हैं और परिवार की सुख-शांति पर असर डाल सकती हैं। इसलिए इस अवधि में विशेष रूप से घर की सफाई और अनावश्यक वस्तुओं को हटाने पर जोर दिया जाता है।

    सबसे पहले जिन चीजों से बचने की सलाह दी गई है, वे हैं टूटी हुई देवी-देवताओं की मूर्तियां। घर में किसी भी प्रकार की खंडित मूर्ति रखना वास्तु दोष का कारण माना जाता है। ऐसी मूर्तियां नकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं और पारिवारिक शांति को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए इन्हें नदी या पवित्र जल में विसर्जित करने की सलाह दी जाती है।

    इसके अलावा सूखे या मुरझाए हुए पौधे भी इस पवित्र माह में अशुभ माने गए हैं। घर में रखे सूखे पौधे न केवल वातावरण की ताजगी को कम करते हैं, बल्कि नकारात्मक ऊर्जा को भी बढ़ाते हैं। इसके स्थान पर हरे-भरे पौधे, विशेषकर तुलसी का पौधा, अत्यंत शुभ माना गया है क्योंकि यह घर में सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि लाता है।

    वास्तु शास्त्र में टूटे-फूटे कांच के बर्तनों को भी अशुभ बताया गया है। ऐसे बर्तन घर में रखने से आर्थिक परेशानियों और बाधाओं का संकेत मिलता है। इसलिए पुरुषोत्तम मास में इन्हें तुरंत घर से बाहर कर देना चाहिए ताकि घर में समृद्धि और स्थिरता बनी रहे।

    इसी तरह बंद पड़ी या खराब घड़ियां भी नकारात्मकता का प्रतीक मानी जाती हैं। समय रुकना प्रगति में बाधा का संकेत माना जाता है, और वास्तु के अनुसार यह परिवार के विकास और तरक्की को प्रभावित कर सकता है। इसलिए ऐसी घड़ियों को या तो ठीक करवा लेना चाहिए या फिर घर से हटा देना चाहिए।

    पुरुषोत्तम मास में धार्मिक आस्था के साथ-साथ घर के वातावरण को भी शुद्ध और सकारात्मक बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। माना जाता है कि इस अवधि में किया गया हर छोटा सुधार भी जीवन में बड़े बदलाव ला सकता है।

    कुल मिलाकर यह पवित्र महीना भक्तों के लिए भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का अवसर है, और साथ ही यह समय घर को नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त करने और सकारात्मकता बढ़ाने का भी संदेश देता है।

  • अधिक मास 2026: 15 जून तक थमेंगे शुभ कार्य, जानें क्यों इसे कहा जाता है ‘पुरुषोत्तम मास’

    अधिक मास 2026: 15 जून तक थमेंगे शुभ कार्य, जानें क्यों इसे कहा जाता है ‘पुरुषोत्तम मास’



    नई दिल्ली(New Delhi)। सनातन परंपरा में समय को केवल तारीखों का क्रम नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। इसी परंपरा में एक विशेष अवधि होती है जिसे अधिक मास कहा जाता है, जो इस वर्ष 17 मई से 15 जून 2026 तक रहेगा। इसे अधिक ज्येष्ठ मास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लगभग 30 दिनों तक चलने वाले इस अतिरिक्त महीने में शुभ और मांगलिक कार्यों पर रोक रहती है। विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन और नामकरण जैसे संस्कार इस अवधि में नहीं किए जाते। माना जाता है कि इस समय किए गए सांसारिक कार्य अपेक्षित शुभ फल नहीं देते।

    अधिक मास का आधार हिंदू पंचांग की खगोल गणना में छिपा है। सौर वर्ष लगभग 365 दिनों का होता है, जबकि चंद्र वर्ष करीब 354 दिनों का होता है। दोनों के बीच हर वर्ष लगभग 11 दिनों का अंतर बनता है, जो तीन वर्षों में लगभग 33 दिनों तक पहुंच जाता है। इस अंतर को संतुलित करने के लिए एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है।

    पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब यह अतिरिक्त महीना अस्तित्व में आया तो किसी भी देवता ने इसे स्वीकार नहीं किया। सभी महीनों के अपने-अपने अधिपति थे, लेकिन इस अतिरिक्त मास का कोई स्वामी नहीं था। दुखी होकर यह मास भगवान विष्णु के पास पहुंचा, जहां उन्होंने इसे “पुरुषोत्तम मास” का नाम दिया और इसे अपना संरक्षण प्रदान किया। तभी से यह महीना विशेष और अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।

    धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, यह समय सांसारिक कार्यों की बजाय आत्मिक उन्नति और साधना के लिए श्रेष्ठ माना गया है। इस अवधि में पूजा-पाठ, जप, तप, दान और व्रत को अत्यधिक फलदायी बताया गया है। वहीं व्यापार, निवेश या नए कार्यों की शुरुआत से बचने की सलाह दी जाती है।

    शास्त्रों में वर्णन है कि इस मास में किए गए धार्मिक कार्यों का फल कई गुना बढ़कर प्राप्त होता है। इसलिए इसे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का विशेष अवसर माना जाता है, जहां भक्ति और आत्मचिंतन को सर्वोच्च महत्व दिया गया है।

    टैग्स (comma separated):
    अधिक मास 2026, पुरुषोत्तम मास, शुभ कार्य बंद, ज्योतिष, हिंदू पंचांग, भगवान विष्णु, धार्मिक मान्यता, व्रत और पूजा, ज्येष्ठ मास

  • बृहस्पतिवार पर पीला रंग पहनने का महत्व, जानें कैसे बढ़ती है खुशहाली और सकारात्मकता

    बृहस्पतिवार पर पीला रंग पहनने का महत्व, जानें कैसे बढ़ती है खुशहाली और सकारात्मकता


    नई दिल्ली। हिंदू मान्यताओं में गुरुवार को पीले वस्त्र पहनना बेहद शुभ माना गया है। मान्यता है कि इससे भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की कृपा मिलती है, जिससे जीवन में तरक्की, धन और मानसिक शांति आती है। सनातन परंपरा में सप्ताह का हर दिन किसी न किसी देवी-देवता को समर्पित माना गया है। गुरुवार यानी बृहस्पतिवार का संबंध भगवान विष्णु और देवताओं के गुरु बृहस्पति से माना जाता है। यही कारण है कि इस दिन पूजा-पाठ, व्रत और पीले रंग के विशेष महत्व का उल्लेख मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुरुवार को पीले वस्त्र धारण करना शुभ फलदायी माना जाता है और इससे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
    ज्योतिष शास्त्र में पीले रंग को ज्ञान, समृद्धि, सुख और सौभाग्य का प्रतीक बताया गया है। यह रंग मानसिक शांति और आत्मविश्वास बढ़ाने वाला माना जाता है। भोपाल के ज्योतिष एवं वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार, गुरुवार को पीले कपड़े पहनने से व्यक्ति के भीतर सकारात्मक सोच विकसित होती है और नकारात्मकता दूर होती है। यही वजह है कि धार्मिक अनुष्ठानों, विवाह और शुभ कार्यों में पीले रंग का विशेष उपयोग किया जाता है।
    मान्यता है कि गुरुवार के दिन पीले वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु की पूजा करने से घर में सुख-शांति बनी रहती है और आर्थिक परेशानियां धीरे-धीरे कम होने लगती हैं। जिन लोगों के जीवन में बार-बार बाधाएं आती हैं या काम बनते-बनते बिगड़ जाते हैं, उनके लिए भी यह उपाय लाभकारी माना गया है।
    धार्मिक मान्यता के अनुसार यदि किसी व्यक्ति का इंटरव्यू, परीक्षा, व्यापारिक सौदा या कोई महत्वपूर्ण काम गुरुवार को हो, तो पीले रंग के कपड़े पहनना शुभ माना जाता है। इससे मन शांत रहता है और सफलता की संभावना बढ़ती है। वहीं मानसिक तनाव, डर और चिंता से परेशान लोगों के लिए भी पीला रंग सकारात्मक प्रभाव डालने वाला माना गया है।
    ज्योतिष शास्त्र में विवाह में देरी या रिश्तों में बाधा आने पर भी गुरुवार के उपाय करने की सलाह दी जाती है। खासतौर पर अविवाहित लड़कियों को हर गुरुवार पीले वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की पूजा करने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि इससे विवाह के योग मजबूत होते हैं और योग्य जीवनसाथी मिलने की संभावना बढ़ती है।
    अगर किसी कारणवश पीले कपड़े पहनना संभव न हो, तो हल्दी का तिलक लगाना या कपड़ों पर हल्दी का स्पर्श करना भी शुभ माना जाता है। हल्दी को स्वयं शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना गया है।
    धार्मिक विशेषज्ञों के अनुसार गुरुवार के दिन पीले रंग के साथ चने की दाल, हल्दी, केला और पीले फूलों का दान करना भी बेहद पुण्यकारी माना जाता है। इससे गुरु ग्रह मजबूत होता है और व्यक्ति को करियर, शिक्षा, विवाह और धन से जुड़े मामलों में लाभ मिलने लगता है।

  • आज नृसिंह जयंती, ऐसे करें भगवान नृसिंह की पूजा, जानें शुभ मुहूर्त और विधि

    आज नृसिंह जयंती, ऐसे करें भगवान नृसिंह की पूजा, जानें शुभ मुहूर्त और विधि


    नई दिल्ली। आज नृसिंह जयंती पूरे श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही है। यह दिन भगवान विष्णु के उग्र अवतार भगवान नृसिंह को समर्पित है, जिन्होंने अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए अवतार लिया था। आधा मनुष्य और आधा सिंह के रूप में प्रकट होकर उन्होंने अधर्म का अंत किया और धर्म की स्थापना की।

    शुभ मुहूर्त और तिथि
    नृसिंह चतुर्दशी की तिथि 29 अप्रैल को शाम 7:51 बजे से शुरू होकर 30 अप्रैल को रात 9:12 बजे तक रहेगी। मध्याह्न संकल्प का समय सुबह 10:59 बजे से दोपहर 1:38 बजे तक रहेगा।
    वहीं, सायंकाल पूजा का शुभ समय शाम 4:17 बजे से 6:56 बजे तक निर्धारित किया गया है।
    व्रत का पारण 1 मई को सुबह 5:41 बजे किया जाएगा।

    नृसिंह जयंती का महत्व
    वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाने वाली यह जयंती विशेष महत्व रखती है। मान्यता है कि इसी दिन संध्या समय खंभे से प्रकट होकर भगवान नृसिंह ने हिरण्यकश्यप का वध किया था। यह पर्व भक्तों की रक्षा, शत्रुओं के नाश और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।

    भगवान नृसिंह की महिमा
    भगवान नृसिंह को शक्ति और संरक्षण के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। उनकी आराधना से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, विरोधियों से राहत मिलती है और भय व संकटों से सुरक्षा प्राप्त होती है। साथ ही मानसिक शांति और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।

    पूजा विधि
    इस दिन सुबह जल्दी उठकर घर की साफ-सफाई कर स्नान के बाद शुद्ध वस्त्र धारण करें। चूंकि भगवान नृसिंह का प्राकट्य गोधूली बेला में हुआ था, इसलिए सूर्यास्त के समय पूजा करना विशेष फलदायी माना गया है। पूजा के दौरान भगवान की प्रतिमा या चित्र के सामने घी का दीपक जलाएं, लाल फूल अर्पित करें और श्रद्धा से मंत्र जाप करते हुए अपनी मनोकामना व्यक्त करें।

    व्रत नियम
    व्रत रखने वाले भक्त इस दिन फलाहार या जलाहार ग्रहण करते हैं और संयम का पालन करते हैं। अगले दिन दान-पुण्य कर व्रत का पारण किया जाता है। जो व्रत नहीं रखते, वे भी भक्ति भाव से पूजा कर पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।

    विशेष उपाय
    यदि कोई व्यक्ति शत्रु या मुकदमे से परेशान है, तो भगवान नृसिंह को लाल फूल अर्पित कर लाल रेशमी धागा चढ़ाएं। इसके बाद घी का चौमुखी दीपक जलाकर “ऊं नृसिंहाय शत्रु भुजबल विधराय स्वाहा” मंत्र का 3, 5 या 11 माला जाप करें। पूजा के बाद उस धागे को दाहिने हाथ में बांधने से बाधाएं शांत होने की मान्यता है।

  • श्रीकृष्ण जन्मभूमि केसः अदालत में पेश होंगी भगवान विष्णु और अन्य देवताओं की मूर्तियां

    श्रीकृष्ण जन्मभूमि केसः अदालत में पेश होंगी भगवान विष्णु और अन्य देवताओं की मूर्तियां


    मथुरा ।
    श्रीकृष्ण जन्मभूमि (Shri Krishna Janmabhoomi) बनाम शाही ईदगाह मस्जिद (Shahi Eidgah Mosque) मामले में भगवान विष्णु (Lord Vishnu) के विश्वरूप एवं अन्य देवों की मूर्तियों के तथ्य अदालत में पेश किए जाएंगे। ये मूर्तियां समय समय पर श्रीकृष्ण जन्मभूमि क्षेत्र में कराई गई खुदाई के दौरान प्राप्त हुई थीं जो इस समय मथुरा के राजकीय संग्रहालय में सुरक्षित हैं। जन्मभूमि पक्ष ने पत्र के माध्यम से इन सभी के बारे में पूरी जानकारी संग्रहालय से प्राप्त कर ली है। जन्मभूमि पक्ष इसे अपने लिए बेहद महत्वपूर्ण मानकर चल रहा है।

    मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद का मामला हाईकोर्ट में चल रहा है। जन्मभूमि पक्ष यह बात रख रहा है कि जहां वर्तमान में शाही ईदगाह मस्जिद बनी है वही क्षेत्र भगवान श्रीकृष्ण का वास्तविक जन्मस्थान है जबकि मस्जिद पक्ष इसका विरोध कर रहा है।

    इलाहाबाद हाईकोर्ट में जन्मभूमि पक्ष वाद बिंदू तय कराने के लिए अपनी दलील पेश कर रहा है जबकि मस्जिद पक्ष ने दलील दी है कि दूसरा पक्ष पहले यह तो साबित करे कि यह आस्था का विषय है। दोनों पक्ष अपनी अपनी बात के लिए तमाम साक्ष्य जुटा रहे हैं।

    इस मामले के वादी श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष एडवोकेट महेंद्र प्रताप सिंह ने आरटीआई के माध्यम से राजकीय संग्रहालय से उन मूर्तियों की जानकारी जुटाई है जो विभिन्न समय पर इस क्षेत्र में हुई खुदाई में प्राप्त हुई हैं। वहां से विधिवत सूचना प्रेषित कर दी गई है। ऐसी सात मूर्तियां एवं स्तंभ की जानकारी दी गई जो यहां से प्राप्त हुए हैं। इनमें से तीन मूर्ति व एक स्तंभ ऐसा है जिसे हिंदू पक्ष अपने लिए बेहद महत्वपूर्ण मानकर चल रहा है।

    ये भगवान कार्तिकेय एवं अग्निदेव की, देवी गंगा एवं विश्वरूप विष्णु भगवान की हैं। अन्य भगवान बुद्ध एवं जैन तीर्थंकर ऋषभनाथ से जुड़े हैं। ये सभी कटरा केशवदेव, श्रीकृष्ण जन्मस्थान से प्राप्त हुई हैं। यह पूरा क्षेत्र कटरा केशवदेव के ही नाम से जाना जाता है व अभिलेखों में भी दर्ज है।

    हमनें संग्रहालय से रखी इन मूर्तियों के बारे में जानकारी ली है। चाहे भगवान विष्णु का विश्वरूप हो या भगवान कार्तिकेय या नदी देवी की मूर्ति, सभी यह दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र हिंदू आस्था का केंद्र रहा है। खास तौर से भगवान कृष्ण से जुड़ा रहा है। हम ये सारे तथ्य अदालत में पेश कर रहे हैं।
    -एडवोकेट महेंद्र प्रताप सिंह, अध्यक्ष श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास

    मामला अदालत में विचाराधीन है। इस दौरान विभिन्न साक्ष्य कोर्ट में पेश किए जाते हैं। जो भी सबूत वो कोर्ट में पेश करेंगे उसका अध्ययन कर हम अपनी दलील पेश करेंगे। पहले भी इस तरह के तथ्य पेश किए गए हैं।
    -एडवोकेट तनवीर अहमद, शाही ईदगाह मस्जिद सचिव एवं पैरोकार

  • वरदराज पेरुमल मंदिर की अनोखी जलवास परंपरा, कांचीपुरम में आस्था और इतिहास का संगम..

    वरदराज पेरुमल मंदिर की अनोखी जलवास परंपरा, कांचीपुरम में आस्था और इतिहास का संगम..


    नई दिल्ली:
    तमिलनाडु का प्राचीन और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शहर कांचीपुरम सदियों से धार्मिक आस्था और परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। इसी पवित्र नगर में स्थित वरदराज पेरुमल मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित एक अत्यंत प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मंदिर माना जाता है। द्रविड़ शैली की भव्य वास्तुकला से सुसज्जित यह मंदिर न केवल अपनी धार्मिक मान्यताओं के लिए बल्कि अपनी अनूठी परंपराओं के कारण भी श्रद्धालुओं के बीच विशेष स्थान रखता है।

    स्थानीय परंपराओं के अनुसार यह मंदिर भगवान विष्णु के वरदराज पेरुमल स्वरूप की आराधना का केंद्र है, जहां वे अपनी दिव्य शक्ति और कृपा के प्रतीक के रूप में पूजे जाते हैं। मंदिर परिसर में विशाल गोपुरम, विस्तृत प्रांगण और बारीक नक्काशी इसकी प्राचीन कला और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं। माना जाता है कि यह स्थान सदियों से भक्तों की आस्था और विश्वास का केंद्र रहा है और यहां आने वाले श्रद्धालु इसे अत्यंत पवित्र मानते हैं।

    इस मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपराओं में से एक भगवान विष्णु की प्रतिमा से जुड़ी जलवास की प्रथा है। मान्यता के अनुसार प्रतिमा को एक पवित्र जल कुंड में लंबे समय तक रखा जाता है और विशेष अवसरों पर ही भक्तों को इसके दर्शन प्राप्त होते हैं। इस परंपरा को लेकर श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है और इसे दिव्य संरक्षण और आध्यात्मिक शक्ति से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि प्रतिमा वर्षों तक जल में रहने के बावजूद अपनी संरचना में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं दिखाती, जिससे इसकी पवित्रता और भी विशेष मानी जाती है।

    मंदिर से जुड़ी एक अन्य प्रसिद्ध मान्यता गर्भगृह में स्थित दो छिपकलियों से संबंधित है, जिन्हें लेकर श्रद्धालुओं में विशेष विश्वास देखा जाता है। परंपरा के अनुसार इन छिपकलियों के दर्शन को शुभ माना जाता है और इसे जीवन में समृद्धि और बाधाओं के निवारण से जोड़कर देखा जाता है। यह मान्यता मंदिर को अन्य धार्मिक स्थलों से अलग और विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।

    जलवास परंपरा के कारण भगवान विष्णु की प्रतिमा को लंबे अंतराल के बाद ही बाहर निकाला जाता है और इसी कारण भक्तों को इसके दर्शन का अवसर भी विशेष समय पर ही प्राप्त होता है। वर्तमान परंपरा के अनुसार अगली बार प्रतिमा के दर्शन कई वर्षों बाद होने की संभावना बताई जाती है, जिससे यह अवसर श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत प्रतीक्षित और दुर्लभ माना जाता है।

    वरदराज पेरुमल मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक भी है, जहां हर परंपरा और विश्वास गहरी आध्यात्मिक भावना से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।