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  • नारायण की कृपा पाने का आसान तरीका, भगवान विष्णु को प्रिय हैं ये चीजें; पूजा में शामिल करते ही मिलेगा शुभ फल

    नारायण की कृपा पाने का आसान तरीका, भगवान विष्णु को प्रिय हैं ये चीजें; पूजा में शामिल करते ही मिलेगा शुभ फल


    नई दिल्ली। सनातन धर्म में भगवान विष्णु को जगत का पालनहार माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु की पूजाLord Vishnu, Vishnu Puja, Hindu Religion, Lord Vishnu Bhog, Sanatan Dharma श्रद्धा और भक्ति के साथ करने से जीवन में सुख शांति और समृद्धि बनी रहती है। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए भक्त अलग अलग प्रकार की पूजा सामग्री और भोग अर्पित करते हैं। माना जाता है कि नारायण को कुछ विशेष चीजें बेहद प्रिय हैं और पूजा के दौरान इनका इस्तेमाल करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त हो सकती है। हालांकि पूजा में सबसे महत्वपूर्ण चीज भक्त की श्रद्धा और सच्ची भावना को माना गया है।

    भगवान विष्णु को पीला रंग विशेष रूप से प्रिय माना जाता है। यही वजह है कि उनकी पूजा में पीले फूल पीले वस्त्र और पीले रंग की मिठाई का इस्तेमाल किया जाता है। पूजा के दौरान भगवान विष्णु को पीले फूल अर्पित करना शुभ माना जाता है। इसके साथ ही भक्त भगवान को पीले चंदन का तिलक भी लगा सकते हैं। धार्मिक मान्यता है कि पीले रंग का संबंध गुरु और ज्ञान से भी है इसलिए विष्णु पूजा में इसका विशेष महत्व बताया गया है।

    भगवान विष्णु को केले का फल भी प्रिय माना जाता है। पूजा में केले का भोग लगाया जा सकता है। कई स्थानों पर गुरुवार के दिन भगवान विष्णु के साथ केले के पेड़ की भी पूजा करने की परंपरा है। माना जाता है कि ऐसा करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और परिवार में सुख समृद्धि का वातावरण मजबूत होता है।

    नारायण को पंचामृत का भोग भी अर्पित किया जाता है। दूध दही घी शहद और शक्कर से तैयार पंचामृत को धार्मिक दृष्टि से पवित्र माना जाता है। भगवान विष्णु की पूजा में पंचामृत अर्पित करने के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा भी कई घरों में है। इसके अलावा तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय मानी जाती है। विष्णु पूजा में तुलसी दल अर्पित करने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। मान्यता है कि तुलसी के बिना विष्णु पूजा को कई भक्त अधूरा मानते हैं।

    भगवान विष्णु को खीर और पीली मिठाइयों का भोग लगाने की भी परंपरा है। बेसन के लड्डू बूंदी के लड्डू या अन्य सात्विक मिठाइयां श्रद्धा के अनुसार अर्पित की जा सकती हैं। पूजा के बाद इस भोग को प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में बांटना शुभ माना जाता है।

    भगवान विष्णु की पूजा करते समय स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें और पूजा स्थान को स्वच्छ करें। इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाकर पीले फूल तुलसी दल फल और भोग अर्पित करें। विष्णु मंत्र का जाप करें और भगवान से परिवार की सुख शांति तथा कल्याण की प्रार्थना करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए दिखावे से ज्यादा जरूरी मन की पवित्रता और सच्ची श्रद्धा है।

  • हजार कमल लेकर पहुंचे थे विष्णु जी, शिव ने छिपा दिया एक फूल तो चढ़ा दिया अपना कमलनयन, फिर मिला दिव्य वरदान

    हजार कमल लेकर पहुंचे थे विष्णु जी, शिव ने छिपा दिया एक फूल तो चढ़ा दिया अपना कमलनयन, फिर मिला दिव्य वरदान



    नई दिल्ली । सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित माना जाता है और इस दौरान महादेव की आराधना का विशेष महत्व बताया गया है। सावन के सोमवार पर श्रद्धालु शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं और भगवान शिव से सुख शांति समृद्धि तथा मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करते हैं। शिव पुराण में भगवान शिव से जुड़ी ऐसी अनेक कथाओं का वर्णन मिलता है जिनमें उनकी करुणा के साथ साथ भक्तों की परीक्षा लेने वाली लीलाओं का भी उल्लेख है। ऐसी ही एक कथा भगवान विष्णु से जुड़ी है जिसमें भगवान शिव ने उनकी भक्ति की कठिन परीक्षा ली और अंत में प्रसन्न होकर उन्हें दिव्य सुदर्शन चक्र प्रदान किया।

    पौराणिक कथा के अनुसार एक समय दानवों और दैत्यों का अत्याचार बहुत बढ़ गया था। उनके बढ़ते प्रभाव से देवता चिंतित हो गए और उन्होंने भगवान विष्णु से सहायता की प्रार्थना की। सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने भगवान शिव को प्रसन्न करने का संकल्प लिया। इसके बाद उन्होंने कैलाश पर्वत पर पहुंचकर महादेव की विधि विधान से आराधना शुरू की। भगवान विष्णु ने शिव की स्तुति करते हुए उनके एक हजार नामों का स्मरण किया और प्रत्येक नाम के साथ भगवान शिव को एक कमल पुष्प अर्पित करने का संकल्प लिया।

    कथा के अनुसार भगवान विष्णु की भक्ति और उनके संकल्प की परीक्षा लेने के लिए भगवान शिव ने एक लीला रची। उन्होंने भगवान विष्णु द्वारा पूजा के लिए लाए गए एक हजार कमल पुष्पों में से एक कमल को छिपा दिया। भगवान विष्णु को इसकी जानकारी नहीं थी। जब पूजा के दौरान उन्होंने कमल गिनने शुरू किए तो एक पुष्प कम मिला। उन्होंने काफी खोज की लेकिन वह कमल कहीं नहीं मिला।

    भगवान विष्णु को कमलनयन भी कहा जाता है। जब उन्हें लगा कि उनकी पूजा एक कमल के अभाव में अधूरी रह जाएगी तो उन्होंने अपनी भक्ति को पूरा करने के लिए अद्भुत त्याग का निर्णय लिया। उन्होंने अपने एक नेत्र को कमल के समान मानकर उसे भगवान शिव को अर्पित करने का संकल्प किया। जैसे ही भगवान विष्णु अपना नेत्र अर्पित करने के लिए आगे बढ़े उसी समय भगवान शिव उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रकट हो गए।

    भगवान शिव ने भगवान विष्णु को रोक दिया और उनकी आंख को पहले जैसा कर दिया। महादेव ने विष्णु जी की अटूट भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान मांगने के लिए कहा। तब भगवान विष्णु ने किसी व्यक्तिगत सुख की मांग नहीं की बल्कि दानवों और दैत्यों के अत्याचार से सृष्टि की रक्षा करने के लिए एक ऐसे दिव्य और अजेय अस्त्र की इच्छा जताई जिससे अधर्म का नाश किया जा सके।

    भगवान शिव ने उनकी इच्छा पूरी करते हुए उन्हें दिव्य सुदर्शन चक्र प्रदान किया। यही सुदर्शन चक्र आगे चलकर भगवान विष्णु के प्रमुख अस्त्रों में शामिल हुआ। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने इसी दिव्य अस्त्र की शक्ति से दैत्यों का संहार किया और सृष्टि की रक्षा की। इस तरह भगवान शिव और भगवान विष्णु के बीच भक्ति तथा आशीर्वाद का यह प्रसंग हिंदू धार्मिक परंपरा में विशेष महत्व रखता है।

    सावन में इस कथा का स्मरण भक्तों को भक्ति के साथ समर्पण और निस्वार्थ भाव का संदेश भी देता है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव अपने भक्तों की सच्ची श्रद्धा से प्रसन्न होते हैं। सावन के दौरान श्रद्धालु जलाभिषेक रुद्राभिषेक बेलपत्र अर्पित करने और शिव मंत्रों का जाप करने जैसी धार्मिक परंपराओं का पालन करते हैं। मान्यता के अनुसार सच्चे मन से की गई शिव आराधना से मन को शांति मिलती है और भक्त के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। हालांकि इन धार्मिक मान्यताओं को आस्था और पौराणिक परंपरा के संदर्भ में ही देखा जाता है।

    भगवान शिव और भगवान विष्णु की यह कथा इस बात का प्रतीक मानी जाती है कि सच्ची भक्ति में केवल पूजा की विधि नहीं बल्कि श्रद्धा त्याग और समर्पण का भाव भी महत्वपूर्ण होता है। सावन के पावन महीने में इस कथा का स्मरण भक्तों को अपनी आस्था को और मजबूत करने तथा जीवन में सत्य धर्म और सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

  • 30 जुलाई को इन वास्तु दोषों से रहें सावधान वरना घर में बढ़ सकती हैं आर्थिक परेशानी और पारिवारिक कलह

    30 जुलाई को इन वास्तु दोषों से रहें सावधान वरना घर में बढ़ सकती हैं आर्थिक परेशानी और पारिवारिक कलह


    नई दिल्ली । सनातन परंपरा में सावन का महीना अत्यंत पवित्र माना जाता है। 30 जुलाई का गुरुवार भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की पूजा के लिए विशेष महत्व रखता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि इस दिन घर में मौजूद वास्तु दोषों को दूर करने का प्रयास किया जाए तो सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और सुख समृद्धि के मार्ग खुलते हैं। वास्तु शास्त्र के अनुसार घर की दिशा स्वच्छता और ऊर्जा का सीधा संबंध परिवार के स्वास्थ्य आर्थिक स्थिति और मानसिक शांति से माना गया है।

    वास्तु शास्त्र कहता है कि घर का मुख्य द्वार हमेशा साफ सुथरा और व्यवस्थित होना चाहिए। मुख्य द्वार पर टूटी हुई नेम प्लेट खराब दरवाजा या गंदगी नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ावा देती है। गुरुवार के दिन मुख्य द्वार की सफाई करके हल्दी मिले जल का छिड़काव करना शुभ माना जाता है। इससे सकारात्मक वातावरण बनता है और घर में शुभता का प्रवेश होता है।

    ईशान कोण यानी उत्तर पूर्व दिशा को सबसे पवित्र माना गया है। इस दिशा में भारी सामान कबाड़ या गंदगी रखने से वास्तु दोष उत्पन्न हो सकता है। यदि पूजा घर इसी दिशा में हो और वहां नियमित रूप से दीपक जलाया जाए तो वातावरण सकारात्मक बना रहता है। इस स्थान को हमेशा स्वच्छ और शांत रखना शुभ माना जाता है।

    रसोई घर में भी कई ऐसी छोटी गलतियां होती हैं जो वास्तु दोष का कारण बन सकती हैं। गैस चूल्हे के आसपास गंदगी रखना टूटे बर्तन जमा करना या रसोई में अनावश्यक सामान रखना शुभ नहीं माना जाता। गुरुवार के दिन रसोई की विशेष सफाई करें और भगवान विष्णु को पीले रंग के प्रसाद का भोग लगाएं। इससे घर में अन्न धन और समृद्धि बनी रहने की मान्यता है।

    घर में यदि लंबे समय से टूटे हुए फर्नीचर बंद घड़ी खराब इलेक्ट्रॉनिक सामान या बेकार वस्तुएं पड़ी हों तो उन्हें हटाना बेहतर माना जाता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार ऐसी वस्तुएं नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाती हैं और कार्यों में बार बार बाधा उत्पन्न कर सकती हैं। गुरुवार का दिन ऐसे अनुपयोगी सामान को हटाने के लिए शुभ माना जाता है।

    तुलसी का पौधा घर की सकारात्मक ऊर्जा का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। यदि घर में तुलसी का पौधा सूख गया हो तो उसे सम्मानपूर्वक हटाकर नया पौधा लगाना चाहिए। शाम के समय तुलसी के पास दीपक जलाने से घर का वातावरण पवित्र और शांत बना रहता है। साथ ही भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होने की मान्यता भी है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुरुवार के दिन घर में झगड़ा कटु वचन और नकारात्मक विचारों से भी बचना चाहिए। परिवार के सभी सदस्यों के बीच प्रेम और सौहार्द का वातावरण सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है। जरूरतमंद लोगों को पीली दाल हल्दी या पीले वस्त्र का दान करना भी शुभ माना जाता है।

    ध्यान रहे कि वास्तु शास्त्र आस्था और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य घर में स्वच्छता संतुलन और सकारात्मक वातावरण बनाए रखना है। यदि इन बातों का पालन श्रद्धा और सद्भाव के साथ किया जाए तो घर का माहौल सुखद और ऊर्जावान बना रह सकता है।

  • गुरुवार को पीला रंग पहनने से क्यों मिलती है सुख समृद्धि और सफलता भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए जानें इसका पूरा महत्व

    गुरुवार को पीला रंग पहनने से क्यों मिलती है सुख समृद्धि और सफलता भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए जानें इसका पूरा महत्व


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में सप्ताह का प्रत्येक दिन किसी न किसी देवी देवता को समर्पित माना गया है। गुरुवार का दिन भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की आराधना के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दिन पीले रंग के वस्त्र पहनने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पीला रंग केवल एक रंग नहीं बल्कि ज्ञान समृद्धि सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि गुरुवार के दिन अधिकतर श्रद्धालु पीले वस्त्र धारण करते हैं और भगवान विष्णु को पीले पुष्प हल्दी चने की दाल और केले का भोग अर्पित करते हैं।

    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु पीतांबर धारण करते हैं। उनका यह स्वरूप संसार के पालनकर्ता के रूप में शांति संतुलन और समृद्धि का संदेश देता है। ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति गुरुवार के दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान विष्णु की पूजा करता है तथा पीले रंग का प्रयोग करता है उसके जीवन में सुख समृद्धि और सौभाग्य का आगमन होता है। परिवार में खुशहाली बनी रहती है और आर्थिक परेशानियां धीरे धीरे दूर होने लगती हैं।

    ज्योतिष शास्त्र में भी गुरुवार का संबंध देवगुरु बृहस्पति ग्रह से बताया गया है। बृहस्पति को ज्ञान धर्म शिक्षा संतान विवाह धन और सम्मान का कारक ग्रह माना जाता है। पीला रंग बृहस्पति का प्रिय रंग माना जाता है। इसलिए गुरुवार को पीले वस्त्र पहनना पीली वस्तुओं का दान करना और भगवान विष्णु की पूजा करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे कुंडली में बृहस्पति की स्थिति मजबूत होती है और जीवन में सकारात्मक परिणाम मिलने लगते हैं।

    गुरुवार के दिन पूजा के दौरान भगवान विष्णु को पीले फूल चने की दाल हल्दी केसर और केले का भोग अर्पित करना शुभ माना जाता है। इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ या ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करने से मन को शांति मिलती है और आध्यात्मिक ऊर्जा बढ़ती है। कई श्रद्धालु इस दिन व्रत भी रखते हैं और जरूरतमंद लोगों को पीले वस्त्र भोजन या पीली दाल का दान करते हैं। दान और सेवा को भी इस दिन विशेष पुण्यदायी माना गया है।

    पीले रंग का मनोवैज्ञानिक महत्व भी काफी खास माना जाता है। यह रंग आशा आत्मविश्वास उत्साह और सकारात्मक सोच का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के साथ साथ यह व्यक्ति के मन में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार करने वाला रंग भी माना जाता है। यही वजह है कि गुरुवार को पीला रंग पहनना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि सकारात्मक जीवनशैली का भी प्रतीक माना जाता है।

    ध्यान रखने योग्य बात यह है कि किसी भी पूजा या व्रत का सबसे महत्वपूर्ण आधार सच्ची श्रद्धा अच्छे कर्म और सकारात्मक सोच होती है। पीले वस्त्र धारण करना और पूजा करना आस्था का विषय है। यदि व्यक्ति भगवान विष्णु की भक्ति के साथ सदाचार सेवा और ईमानदारी का मार्ग अपनाता है तो जीवन में सुख शांति और समृद्धि का मार्ग स्वयं प्रशस्त होने लगता है।

  • गुरुवार पूजा के विशेष नियम इन बातों का पालन करने से मिलेगा धन समृद्धि और सुख का आशीर्वाद

    गुरुवार पूजा के विशेष नियम इन बातों का पालन करने से मिलेगा धन समृद्धि और सुख का आशीर्वाद


    नई दिल्ली । सनातन धर्म में गुरुवार का दिन भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति को समर्पित माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धा और विधि विधान से पूजा करने तथा निर्धारित नियमों का पालन करने से व्यक्ति के जीवन में सुख समृद्धि ज्ञान और सौभाग्य का आगमन होता है। ज्योतिष शास्त्र में भी बृहस्पति ग्रह को ज्ञान धन संतान विवाह और सम्मान का कारक माना गया है। इसलिए गुरुवार के दिन किए गए धार्मिक कार्यों का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि यदि इस दिन पूजा के नियमों का पालन किया जाए तो भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन की कई परेशानियां दूर होने लगती हैं।

    गुरुवार की शुरुआत प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करने से करनी चाहिए। स्नान के बाद स्वच्छ और विशेष रूप से पीले रंग के वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। पूजा स्थल की सफाई कर भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। इसके बाद घी का दीपक जलाएं और पीले फूल हल्दी चंदन अक्षत तथा पीले रंग के फल अर्पित करें। बेसन के लड्डू चने की दाल या केले का भोग लगाना भी शुभ माना जाता है। पूजा के दौरान विष्णु सहस्रनाम विष्णु चालीसा अथवा ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुरुवार के दिन केले के वृक्ष की पूजा करना भी अत्यंत फलदायी माना जाता है। केले के वृक्ष में भगवान विष्णु का वास माना जाता है। श्रद्धापूर्वक जल अर्पित कर दीपक जलाने और परिक्रमा करने से मनोकामनाएं पूर्ण होने की मान्यता है। यदि संभव हो तो इस दिन पीली वस्तुओं जैसे चने की दाल हल्दी पीले वस्त्र या मिठाई का दान भी करना चाहिए। जरूरतमंद लोगों की सहायता करना और ब्राह्मणों को भोजन कराना भी शुभ फल देने वाला माना गया है।

    गुरुवार के दिन कुछ कार्यों से बचने की भी सलाह दी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन बिना आवश्यकता बाल कटवाना नाखून काटना और अनावश्यक विवाद करना शुभ नहीं माना जाता। क्रोध करना कटु वचन बोलना या किसी का अपमान करना भी इस दिन वर्जित माना गया है। परिवार में प्रेम और सम्मान का वातावरण बनाए रखना चाहिए ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके। साथ ही फिजूलखर्ची और नकारात्मक विचारों से भी दूरी बनाकर रखना लाभकारी माना गया है।

    जो लोग गुरुवार का व्रत रखते हैं उन्हें दिनभर सात्विक भोजन करना चाहिए। कई श्रद्धालु केवल एक समय भोजन करते हैं जबकि कुछ लोग फलाहार करके व्रत का पालन करते हैं। व्रत के दौरान मन और वाणी की पवित्रता बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक माना गया है जितना पूजा करना। सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई आराधना को ही सबसे श्रेष्ठ माना गया है।

    धार्मिक परंपराओं के अनुसार गुरुवार के नियमों का नियमित पालन करने से करियर में सफलता शिक्षा में उन्नति विवाह में आ रही बाधाएं दूर होने और आर्थिक स्थिति मजबूत होने की मान्यता है। भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की कृपा से परिवार में सुख शांति और समृद्धि बनी रहती है। इसलिए इस दिन केवल पूजा करना ही नहीं बल्कि अच्छे आचरण सेवा भाव और सकारात्मक सोच को भी जीवन का हिस्सा बनाना सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।

  • देवशयनी एकादशी: 24 या 25 जुलाई? जानें सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और व्रत पारण का समय

    देवशयनी एकादशी: 24 या 25 जुलाई? जानें सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और व्रत पारण का समय


    नई दिल्ली। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखती है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीहरि विष्णु चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके साथ ही चातुर्मास की शुरुआत होती है और विवाह, गृह प्रवेश सहित अन्य मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। ऐसे में कई लोगों के मन में सवाल है कि वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी 24 जुलाई को मनाई जाएगी या 25 जुलाई को। आइए जानते हैं सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और व्रत पारण का समय।

    देवशयनी एकादशी कब है?
    देवशयनी एकादशी तिथि की शुरुआत 24 जुलाई 2026 को सुबह 9:13 बजे से होगी और इसका समापन 25 जुलाई 2026 को सुबह 11:35 बजे होगा। उदया तिथि के आधार पर देवशयनी एकादशी का व्रत और पर्व 25 जुलाई 2026 (शनिवार) को मनाया जाएगा।

    पूजा का शुभ मुहूर्त
    देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा के लिए प्रातःकाल का समय सबसे उत्तम माना गया है।
    प्रातः पूजन मुहूर्त: सुबह 4:17 बजे से 6:10 बजे तक
    अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:00 बजे से 12:55 बजे तक
    संध्या पूजन मुहूर्त: शाम 7:17 बजे से रात 8:19 बजे तक

    व्रत पारण का समय
    एकादशी व्रत का पारण अगले दिन किया जाता है। इस वर्ष 26 जुलाई 2026 को सुबह 5:40 बजे से 8:20 बजे के बीच व्रत खोलना शुभ माना गया है।

    ऐसे करें भगवान विष्णु की पूजा
    देवशयनी एकादशी के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।

    भगवान विष्णु का गंगाजल और पंचामृत से अभिषेक करें। इसके बाद पीले पुष्प, चंदन, रोली, अक्षत और तुलसी दल अर्पित करें। श्रीहरि को पीले फल और सात्विक भोग अर्पित करें तथा भोग में तुलसी पत्र अवश्य शामिल करें। पूजा के दौरान ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करें, एकादशी व्रत कथा का श्रवण या पाठ करें और अंत में धूप-दीप से आरती करें।

    देवशयनी एकादशी पर क्या करें?
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत, भगवान विष्णु की आराधना, जप-तप और दान का विशेष महत्व है। यदि किसी कारणवश व्रत न रख सकें, तो भी श्रद्धापूर्वक दान करने से पुण्य फल प्राप्त होता है।

    क्या दान करना शुभ माना गया है?
    देवशयनी एकादशी पर अन्नदान को सर्वोत्तम माना गया है। इस दिन चावल, दाल, आटा, घी, गुड़, नमक, फल और सब्जियों का दान करना शुभ माना जाता है।

  • योगिनी एकादशी: पढ़ें पौराणिक व्रत कथा, जानें पूजा विधि और इसका महत्‍व

    योगिनी एकादशी: पढ़ें पौराणिक व्रत कथा, जानें पूजा विधि और इसका महत्‍व


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में प्रत्येक एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है, लेकिन आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली योगिनी एकादशी को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत, पूजा और कथा का श्रवण करने से हजारों ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। मान्यता है कि इस व्रत से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और साधक को पापों से मुक्ति के साथ सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।

    योगिनी एकादशी की पौराणिक कथा
    धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने इस व्रत की महिमा और कथा धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई थी। प्राचीन समय में स्वर्गलोक में अलकापुरी नाम की एक सुंदर नगरी थी, जहां धन के देवता कुबेर का शासन था। कुबेर भगवान शिव के परम भक्त थे और उनकी पूजा के लिए हेम नाम का एक माली प्रतिदिन ताजे फूल लाकर अर्पित करता था।

    हेम अपनी पत्नी विशालाक्षी से अत्यधिक प्रेम करता था। एक दिन वह मानसरोवर से फूल तो ले आया, लेकिन पत्नी के साथ समय बिताने में इतना मग्न हो गया कि समय पर भगवान शिव की पूजा के लिए फूल नहीं पहुंचा सका। जब यह बात कुबेर को पता चली तो वे क्रोधित हो गए और हेम को श्राप दे दिया कि वह अपनी पत्नी से बिछड़ जाएगा और पृथ्वी पर कोढ़ी के रूप में जीवन बिताएगा।

    श्राप के प्रभाव से हेम तत्काल स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गिरा। उसका शरीर कोढ़ से ग्रसित हो गया और पत्नी भी उससे अलग हो गई। लंबे समय तक कष्ट झेलने के बाद एक दिन वह महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम पहुंचा। ऋषि ने उसकी दयनीय अवस्था का कारण पूछा, तब हेम ने पूरी घटना उन्हें बताई।

    हेम की व्यथा सुनने के बाद महर्षि मार्कण्डेय ने उसे योगिनी एकादशी का व्रत करने का उपदेश दिया। हेम ने श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उसका श्राप समाप्त हो गया, वह पुनः अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त कर अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक रहने लगा। तभी से योगिनी एकादशी को पापों का नाश करने और सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला व्रत माना जाता है।

    योगिनी एकादशी व्रत की पूजा विधि
    योगिनी एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पूजा स्थल पर कलश स्थापित करें और भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर विधिपूर्वक पूजा करें। भगवान को फूल, फल और प्रसाद अर्पित करें, दीप प्रज्वलित कर आरती करें तथा गुड़ और चने का भोग लगाएं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धापूर्वक पूजा और व्रत करने से भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख, समृद्धि एवं सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

  • गुरुवार पूजा विधि से मिलेगा भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति का आशीर्वाद सुख समृद्धि और तरक्की के खुलेंगे नए द्वार

    गुरुवार पूजा विधि से मिलेगा भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति का आशीर्वाद सुख समृद्धि और तरक्की के खुलेंगे नए द्वार


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में सप्ताह का प्रत्येक दिन किसी न किसी देवी देवता को समर्पित माना गया है। गुरुवार का विशेष महत्व भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की आराधना के लिए माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा करने से जीवन में आर्थिक उन्नति वैवाहिक सुख संतान का कल्याण और ज्ञान की प्राप्ति होती है। जिन लोगों की कुंडली में बृहस्पति कमजोर होता है या विवाह शिक्षा और करियर में लगातार बाधाएं आती हैं उनके लिए गुरुवार का व्रत और पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।

    गुरुवार की शुरुआत प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करने से करें। स्नान के बाद साफ और संभव हो तो पीले रंग के वस्त्र धारण करें क्योंकि पीला रंग देवगुरु बृहस्पति का प्रिय माना जाता है। इसके बाद घर के मंदिर की साफ सफाई करें और भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाएं। पूजा में पीले फूल हल्दी चंदन केले चने की दाल पीले फल और बेसन या बूंदी के लड्डू का भोग अर्पित करना शुभ माना जाता है।

    पूजा के दौरान भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए विष्णु सहस्रनाम विष्णु चालीसा या श्री हरि के मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जाप करें। देवगुरु बृहस्पति की कृपा प्राप्त करने के लिए बृहस्पति मंत्र का जप भी किया जा सकता है। पूजा के अंत में आरती करें और परिवार के सभी सदस्यों को प्रसाद वितरित करें। यदि संभव हो तो इस दिन केले के वृक्ष की पूजा भी करें और उसके पास दीपक जलाकर जल अर्पित करें। धार्मिक मान्यताओं में इसे अत्यंत शुभ माना गया है।

    गुरुवार के व्रत में सात्विक भोजन करने का विशेष महत्व बताया गया है। कई श्रद्धालु दिनभर उपवास रखकर केवल एक समय भोजन ग्रहण करते हैं। इस दिन पीले रंग के भोजन जैसे चने की दाल बेसन से बने व्यंजन केसर युक्त खीर या केला खाना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि गुरुवार के दिन तामसिक भोजन और नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके।

    धार्मिक परंपराओं के अनुसार इस दिन जरूरतमंद लोगों को पीले वस्त्र हल्दी चने की दाल केला या पीले रंग की मिठाई का दान करना भी शुभ माना जाता है। दान और सेवा के कार्यों से भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति दोनों प्रसन्न होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    गुरुवार के दिन कुछ बातों का विशेष ध्यान रखने की भी सलाह दी जाती है। कई धार्मिक मान्यताओं में इस दिन बाल और नाखून नहीं कटवाने तथा अनावश्यक क्रोध और कटु वचन से बचने की बात कही गई है। परिवार में प्रेम और सौहार्द बनाए रखना भी इस दिन की पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

    यदि श्रद्धा विश्वास और नियम के साथ प्रत्येक गुरुवार भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की पूजा की जाए तो धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जीवन में सुख समृद्धि सम्मान ज्ञान और सफलता के नए अवसर प्राप्त होते हैं। पूजा का सबसे महत्वपूर्ण आधार सच्ची आस्था सकारात्मक सोच और अच्छे कर्म हैं क्योंकि यही जीवन में स्थायी खुशहाली और शांति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

  • निर्जला एकादशी 2026 से पहले कर लें ,ये जरूरी तैयारियां तभी मिलेगा व्रत का पूर्ण फल

    निर्जला एकादशी 2026 से पहले कर लें ,ये जरूरी तैयारियां तभी मिलेगा व्रत का पूर्ण फल


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना गया है लेकिन सभी एकादशियों में निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ और पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु विधि विधान से निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं उन्हें वर्ष भर की 24 एकादशियों के व्रत के समान पुण्य प्राप्त होता है। यही कारण है कि इस व्रत को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्ष 2026 में निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून गुरुवार को रखा जाएगा लेकिन इसकी तैयारी और नियम एक दिन पहले दशमी तिथि से ही प्रारंभ हो जाते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब श्रद्धालु दशमी तिथि से ही संयम और नियमों का पालन शुरू कर दें। इस दिन भोजन और दिनचर्या दोनों में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।

    दशमी तिथि के दिन केवल सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। भोजन में प्याज लहसुन और तामसिक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। शाम के समय सूर्यास्त से पहले हल्का और सुपाच्य भोजन कर लेना उचित माना गया है। इसके बाद अन्न का त्याग कर देना चाहिए। कई श्रद्धालु दशमी की रात से ही जल का सेवन भी बंद कर देते हैं ताकि अगले दिन निर्जला व्रत का पालन पूरी निष्ठा के साथ कर सकें।

    एकादशी के दिन बाल धोना शुभ नहीं माना जाता इसलिए व्रत रखने वाले लोगों को दशमी तिथि में ही स्नान के साथ बाल धो लेने चाहिए। इससे व्रत के दिन किसी प्रकार की असुविधा भी नहीं होती और धार्मिक नियमों का पालन भी हो जाता है।

    भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल का विशेष महत्व है। बिना तुलसी के विष्णु पूजन अधूरा माना जाता है। हालांकि एकादशी के दिन तुलसी के पौधे को स्पर्श करना या पत्तियां तोड़ना वर्जित माना गया है। इसलिए पूजा के लिए आवश्यक तुलसी दल दशमी तिथि में ही तोड़कर सुरक्षित रख लेना चाहिए। एकादशी के दिन तुलसी माता को दूर से प्रणाम कर दीपक अर्पित किया जा सकता है।

    धार्मिक ग्रंथों के अनुसार दशमी तिथि की रात्रि में भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। श्रद्धा और विश्वास के साथ लिया गया यह संकल्प व्रत की सफलता का आधार माना जाता है। इसके बाद व्रती को द्वादशी तिथि में पारण होने तक नियमों का पालन करना चाहिए।

    निर्जला एकादशी केवल उपवास का पर्व नहीं बल्कि आत्मसंयम और भक्ति का महापर्व है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा आराधना जप और दान का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि श्रद्धा पूर्वक किया गया यह व्रत जीवन में सुख समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। इसलिए यदि आप इस वर्ष निर्जला एकादशी का व्रत रखने जा रहे हैं तो दशमी तिथि से ही इसकी तैयारी शुरू कर लें ताकि आपको व्रत का संपूर्ण और शुभ फल प्राप्त हो सके।

  • गुरुवार के वास्तु टिप्स: इन आसान उपायों से बढ़ेगी सुख-समृद्धि, मिलेगा गुरु ग्रह का शुभ प्रभाव

    गुरुवार के वास्तु टिप्स: इन आसान उपायों से बढ़ेगी सुख-समृद्धि, मिलेगा गुरु ग्रह का शुभ प्रभाव


    नई दिल्ली । वास्तु शास्त्र में सप्ताह के प्रत्येक दिन का अपना विशेष महत्व बताया गया है। गुरुवार का दिन भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति को समर्पित माना जाता है। ज्योतिष और वास्तु दोनों ही शास्त्रों में गुरु ग्रह को ज्ञान, समृद्धि, वैवाहिक सुख, संतान और आध्यात्मिक उन्नति का कारक माना गया है। ऐसे में गुरुवार के दिन किए गए कुछ सरल वास्तु उपाय जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं और घर-परिवार में खुशहाली बढ़ा सकते हैं।

    वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार गुरुवार की सुबह घर की अच्छी तरह सफाई करनी चाहिए। विशेष रूप से पूजा स्थल और उत्तर-पूर्व दिशा यानी ईशान कोण को साफ-सुथरा रखना अत्यंत शुभ माना जाता है। यह दिशा देवताओं की दिशा मानी जाती है और यहां स्वच्छता बनाए रखने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    गुरुवार के दिन घर के मंदिर में भगवान विष्णु की पूजा करें और पीले फूल अर्पित करें। पूजा के दौरान घी का दीपक जलाना शुभ माना जाता है। पीला रंग गुरु ग्रह का प्रतीक है, इसलिए इस दिन पीले वस्त्र पहनना और घर में पीले रंग की वस्तुओं का उपयोग करना लाभकारी माना जाता है।

    वास्तु शास्त्र के अनुसार गुरुवार को घर के मुख्य द्वार के आसपास साफ-सफाई रखने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। मुख्य प्रवेश द्वार पर गंदगी या अव्यवस्था होने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह प्रभावित हो सकता है। यदि संभव हो तो द्वार पर शुभ प्रतीक या रंगोली बनाकर घर के वातावरण को सकारात्मक बनाया जा सकता है।

    आर्थिक उन्नति के लिए गुरुवार के दिन हल्दी का विशेष महत्व माना गया है। घर के मंदिर में हल्दी अर्पित करना तथा पीली वस्तुओं का दान करना शुभ फलदायी माना जाता है। जरूरतमंदों को चने की दाल, पीले वस्त्र या केले का दान करने से गुरु ग्रह मजबूत होता है और जीवन में शुभ परिणाम मिलने की मान्यता है।

    वास्तु के अनुसार गुरुवार को घर के उत्तर-पूर्व दिशा में भारी सामान रखने से बचना चाहिए। इस दिशा को खुला और साफ रखना बेहतर माना जाता है। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बना रहता है और मानसिक शांति प्राप्त होती है। साथ ही परिवार के सदस्यों के बीच सामंजस्य भी बढ़ता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाना और जल अर्पित करना भी शुभ माना जाता है। तुलसी का पौधा घर में सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक वातावरण बनाए रखने में सहायक माना जाता है। हालांकि तुलसी के पत्ते तोड़ने से पहले स्थानीय परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं का ध्यान रखना चाहिए।

    गुरुवार के दिन अनावश्यक विवाद, कटु वचन और नकारात्मक विचारों से दूरी बनाए रखने की सलाह दी जाती है। वास्तु शास्त्र के अनुसार घर का वातावरण जितना शांत और सकारात्मक होगा, उतनी ही शुभ ऊर्जा घर में बनी रहेगी।

    इन सरल वास्तु उपायों को अपनाकर व्यक्ति अपने जीवन में सकारात्मकता, आर्थिक स्थिरता और पारिवारिक सुख-शांति को बढ़ा सकता है। गुरुवार का दिन आध्यात्मिक और मानसिक उन्नति के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, इसलिए इस दिन अच्छे कार्यों और सकारात्मक सोच को प्राथमिकता देना लाभकारी हो सकता है।