Tag: Madhya Pradesh Government

  • नशे के खिलाफ शिवपंथ के अभियान की CM ने की सराहना, बोले- सरकार और समाज मिलकर बदल सकते हैं तस्वीर

    नशे के खिलाफ शिवपंथ के अभियान की CM ने की सराहना, बोले- सरकार और समाज मिलकर बदल सकते हैं तस्वीर


    बड़वानी। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बड़वानी जिले के ग्राम अजगरिया में आयोजित शिवपंथी नशामुक्ति कार्यक्रम में नशे के खिलाफ जनजागरण का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि नशा नाश की जड़ है और अपने साथ कई तरह की बुराइयां तथा सामाजिक विकृतियां लेकर आता है। हर व्यक्ति को संकल्प लेना चाहिए कि वह स्वयं नशे से दूर रहेगा और अपने परिवार तथा समाज को भी इस बुराई से बचाने के लिए प्रयास करेगा। मुख्यमंत्री ने शिवपंथ समुदाय की ओर से नशामुक्ति के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि सामूहिक भागीदारी से इस अभियान को जनआंदोलन बनाया जा सकता है।

    कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने शिवपंथ के संस्थापक परम पूज्य गुरुवर्य श्री वनसिंह महाराज को नमन किया। उन्होंने श्री कालूसिंह महाराज और सुमली माताजी के प्रयासों की भी प्रशंसा की। मुख्यमंत्री ने कहा कि मनुष्य जीवन अनमोल है और इसे नशे की प्रवृत्ति में बर्बाद करने के बजाय ऐसे कार्यों में लगाना चाहिए जिनसे जीवन सार्थक बने। आध्यात्मिकता और सत्संग के माध्यम से लोगों को सकारात्मक दिशा देने का शिवपंथ का प्रयास समाज के लिए प्रेरणादायी है।

    डॉ. मोहन यादव ने कहा कि नशामुक्त समाज बनाने के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। इसमें परिवारों सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नशामुक्त भारत के संकल्प का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 2029 तक नशे की बुराई को दूर करने के लक्ष्य की दिशा में सभी को मिलकर काम करना होगा। मुख्यमंत्री ने शरद पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम की धार्मिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि आस्था और जनजागरण को जोड़कर समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।

    मुख्यमंत्री ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार इस वर्ष किसान कल्याण वर्ष मना रही है। किसान और ग्रामीण परिवार गौपालन तथा दुग्ध उत्पादन के माध्यम से अपनी आय बढ़ा सकते हैं। सरकार गौशालाओं के संचालन और दुग्ध उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए सहायता देगी। दूध समितियों के माध्यम से दूध बेचने पर ग्रामीणों को आमदनी का अवसर मिलेगा। उन्होंने लोगों से दूध और पौष्टिक आहार अपनाने तथा नशे से दूर रहने की अपील की।

    बड़वानी प्रवास के दौरान मुख्यमंत्री ने क्षेत्र के विकास के लिए कई घोषणाएं भी कीं। इनमें ग्राम में खुपजदेव धाम का निर्माण और वहां तक सड़क बनाने की घोषणा शामिल है। ग्राम अजगरिया में बालक और बालिकाओं के लिए 100-100 सीटर छात्रावास बनाए जाने की बात कही गई। ग्राम पांजरिया ध में 50 लाख रुपये की लागत से सर्वसुविधायुक्त शेड बनाने तथा ग्राम धवली में पुलिस चौकी स्थापित करने की घोषणा भी की गई।

    मुख्यमंत्री ने स्थानीय भाषा और जनजातीय समुदाय से जुड़े विषयों पर भी ध्यान देने की बात कही। बारेली भाषा के संरक्षण और विकास के लिए दस्तावेजों के संरक्षण तथा शोध पर काम किया जाएगा। आदिवासी क्षेत्र में सिकल सेल बीमारी की रोकथाम के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं जांच परामर्श और उपचार की व्यवस्था को मजबूत करने की घोषणा की गई। इसके साथ ही वन औषधियों के संरक्षण और शोध को बढ़ावा देने के लिए बड़वानी में वन औषधि शोध संस्थान स्थापित करने की बात कही गई।

    वन अधिकार के तहत जिन जनजातीय परिवारों को अभी पट्टे नहीं मिले हैं उन्हें पट्टे देने और जिन परिवारों को पट्टे मिल चुके हैं उनकी रजिस्ट्री कराने की घोषणा भी की गई। इन घोषणाओं का उद्देश्य क्षेत्र में शिक्षा स्वास्थ्य आजीविका और आदिवासी अधिकारों से जुड़े प्रयासों को गति देना है।

    शिवपंथी सत्संग संगठन लंबे समय से ग्रामीण क्षेत्रों में नशामुक्ति के लिए जागरूकता अभियान चला रहा है। संगठन की मान्यता है कि आध्यात्मिकता सत्संग और अनुशासित जीवनशैली के माध्यम से व्यक्ति को नशे से दूर रहने की प्रेरणा मिल सकती है। शरद पूर्णिमा पर आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाएं पुरुष बुजुर्ग और बच्चे शामिल हुए। धार्मिक भजनों के साथ दूध प्रसादी और चावल की खिचड़ी का वितरण किया गया। कार्यक्रम में नशामुक्त समाज बनाने और क्षेत्र के विकास के लिए सामूहिक प्रयासों का संदेश दिया गया।

  • भारतीय नस्ल की गायों के पालकों के लिए बड़ा मौका, इंदौर में पहले विजेता को 1 लाख और दूसरे को मिलेंगे 50 हजार रुपए

    भारतीय नस्ल की गायों के पालकों के लिए बड़ा मौका, इंदौर में पहले विजेता को 1 लाख और दूसरे को मिलेंगे 50 हजार रुपए


    इंदौर । इंदौर जिले में भारतीय नस्ल की उन्नत गायों के पालन और दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए नई पहल की जा रही है। वृंदावन ग्राम योजना के तहत जिले के चार गांवों में गोपाल कृष्ण ग्राम पुरस्कार योजना आयोजित होगी। यह कार्यक्रम 27 से 31 अक्टूबर तक चलेगा। इसमें सबसे ज्यादा दूध देने वाली गायों के पालकों को नकद पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाएगा। योजना के तहत प्रथम पुरस्कार के रूप में एक लाख रुपए दिए जाएंगे। इससे पशुपालकों को बेहतर नस्ल की गायों के पालन और दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जा रहा है।

    पशु चिकित्सा सेवाएं विभाग के उप संचालक डॉ. दिनकर राव पाटील के मुताबिक जिले के रंगवासा दतोदा शिवनी और बनेड़िया गांवों में योजना के तहत कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इन गांवों में पात्र पशुपालकों का पंजीयन किया जाएगा। इसके बाद गायों के दुग्ध उत्पादन के आधार पर विजेताओं का चयन होगा। प्रतियोगिता में उन्हीं पशुपालकों को शामिल होने का अवसर मिलेगा जिनकी भारतीय नस्ल की उन्नत गाय प्रतिदिन कम से कम छह लीटर दूध देती है।

    योजना के तहत प्रत्येक चयनित गांव में तीन पुरस्कार दिए जाएंगे। सबसे ज्यादा दूध उत्पादन करने वाली गाय के पालक को प्रथम पुरस्कार के रूप में एक लाख रुपए मिलेंगे। दूसरे स्थान पर आने वाले पशुपालक को 50 हजार रुपए और तीसरा स्थान हासिल करने वाले पालक को 25 हजार रुपए दिए जाएंगे। इस तरह प्रत्येक गांव में दुग्ध उत्पादन के आधार पर तीन विजेताओं को सम्मानित किया जाएगा। पुरस्कार राशि के जरिए पशुपालकों को बेहतर पशुपालन पद्धतियां अपनाने और अपनी गायों की देखभाल पर ध्यान देने के लिए प्रेरित करने का लक्ष्य रखा गया है।

    गोपाल कृष्ण ग्राम पुरस्कार योजना का प्रमुख उद्देश्य भारतीय नस्ल की उन्नत गायों के संरक्षण और पालन को बढ़ावा देना है। इसके साथ ही दूध उत्पादन में बेहतर प्रदर्शन करने वाले पशुपालकों को प्रोत्साहन देना भी योजना का अहम हिस्सा है। ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन कई परिवारों की आजीविका का महत्वपूर्ण साधन है। ऐसे में दूध उत्पादन बढ़ने से पशुपालकों की आमदनी में सुधार की संभावना बन सकती है। योजना के माध्यम से बेहतर नस्लों के पालन और दुग्ध उत्पादन के प्रति जागरूकता बढ़ाने की कोशिश की जाएगी।

    प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए गाय का भारतीय उन्नत नस्ल का होना और प्रतिदिन कम से कम छह लीटर दूध देना जरूरी है। पात्र पशुपालकों को पंजीयन कराना होगा और गाय के दूध उत्पादन से संबंधित जानकारी देनी होगी। पंजीयन की प्रक्रिया और जरूरी दस्तावेजों के बारे में संबंधित ग्राम या पशु चिकित्सा विभाग से जानकारी ली जा सकती है।

    27 अक्टूबर से शुरू होने वाली इस योजना के जरिए इंदौर जिले के चार गांवों में दुग्ध उत्पादन के आधार पर पशुपालकों को सम्मानित किया जाएगा। अब यह देखना होगा कि इस पहल में कितने पशुपालक भाग लेते हैं और पुरस्कार योजना से भारतीय नस्ल की गायों के पालन तथा दूध उत्पादन को बढ़ावा देने में कितनी मदद मिलती है।

  • इंडस्ट्रियल एरिया में मनमाने आवासीय निर्माण पर रोक, जमीन की कीमत ₹250 प्रति वर्गमीटर तय, पुराने निर्माण सुरक्षित

    इंडस्ट्रियल एरिया में मनमाने आवासीय निर्माण पर रोक, जमीन की कीमत ₹250 प्रति वर्गमीटर तय, पुराने निर्माण सुरक्षित


    भोपाल । मध्य प्रदेश में औद्योगिक क्षेत्रों में आवासीय परियोजनाओं के विकास और औद्योगिक जमीन के आवंटन को लेकर राज्य सरकार ने नए नियम लागू किए हैं। इन नियमों के तहत अब औद्योगिक क्षेत्रों में नई आवासीय परियोजनाओं के लिए रो-हाउस और अलग-अलग आवासीय प्लॉट बनाने की अनुमति नहीं होगी। यहां केवल बहुमंजिला फ्लैट या समूह आवास परियोजनाएं ही विकसित की जा सकेंगी। सरकार के इस फैसले का उद्देश्य औद्योगिक क्षेत्रों में जमीन के इस्तेमाल को व्यवस्थित करना और आवासीय निर्माण को तय मानकों के अनुरूप रखना है। औद्योगिक नीति एवं निवेश प्रोत्साहन विभाग ने इस संबंध में अधिसूचना जारी की है। नए नियम केवल नई परियोजनाओं पर लागू होंगे। पहले से संचालित आवासीय योजनाओं और मौजूदा निर्माण पर इनका असर नहीं पड़ेगा।
    नई व्यवस्था के अनुसार औद्योगिक क्षेत्रों में फ्लैट आधारित आवासीय परियोजनाओं के तहत सिंगल बेडरूम और डबल बेडरूम की इकाइयां बनाई जा सकेंगी। इसके अलावा छात्रावास और उनसे जुड़ी सामाजिक सुविधाओं के विकास की भी अनुमति होगी। ये प्रावधान अधिसूचित आवासीय भूमि पर विकसित होने वाली परियोजनाओं के साथ औद्योगिक इकाइयों को आवंटित जमीन पर बनाई जाने वाली कैप्टिव आवासीय सुविधाओं पर भी लागू होंगे। हालांकि किसी भी परियोजना का निर्माण शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी लेना जरूरी होगा। निर्माण कार्य मास्टर प्लान और विकास योजना के साथ भवन उपविधियों तथा भूमि आवंटन की शर्तों के अनुसार करना होगा। अग्नि सुरक्षा और पर्यावरण संबंधी मानकों का पालन भी अनिवार्य रहेगा।
    सरकार ने औद्योगिक क्षेत्रों में जमीन की कीमत तय करने का आधार भी निर्धारित किया है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में विकसित या विकसित किए जाने वाले औद्योगिक क्षेत्रों में जमीन का मूल्य संबंधित क्षेत्र की असिंचित कृषि भूमि के लिए निर्धारित कलेक्टर गाइडलाइन को 0.6 से भाग देकर निकाला जाएगा। हालांकि इस गणना के बाद भी जमीन की कीमत 250 रुपये प्रति वर्गमीटर से कम नहीं रखी जा सकेगी। यदि तय प्रक्रिया के अनुसार मूल्य इससे कम निकलता है तो मध्य प्रदेश औद्योगिक विकास निगम यानी एमपीआईडीसी के प्रबंध संचालक को संचालक मंडल की अनुमति से कीमत बढ़ाने का अधिकार होगा।
    भूमि आवंटन में निवेश की सीमा से अधिक जमीन मांगने वाली औद्योगिक इकाइयों के लिए भी स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं। निर्धारित निवेश के आधार पर जितनी जमीन पर छूट मिल सकती है उससे अधिक आवंटित क्षेत्रफल पर छूट नहीं दी जाएगी। उदाहरण के तौर पर यदि कोई इकाई संयंत्र और मशीनरी में 200 करोड़ रुपये का निवेश करती है और उसे 25 हेक्टेयर जमीन आवंटित होती है तो 20 हेक्टेयर तक ही छूट मिलेगी। शेष पांच हेक्टेयर पर यह लाभ लागू नहीं होगा। नियमों में 40 हेक्टेयर तक भूमि आवंटन पर प्रीमियम की गणना के दौरान जमीन के मूल्य में 50 प्रतिशत छूट का भी उल्लेख है। अन्य औद्योगिक प्रयोजनों के लिए प्रीमियम की गणना में भी भूमि मूल्य पर 50 प्रतिशत छूट का प्रावधान दिया गया है।
    औद्योगिक इकाइयों को आवंटित जमीन का पूरा उपयोग नहीं होने पर अनुपयोगी हिस्से के हस्तांतरण की व्यवस्था भी तय की गई है। इसके तहत संचालित इकाई अपनी आवंटित जमीन में से अधिकतम 50 प्रतिशत या कम से कम 5000 वर्गमीटर तक अनुपयोगी भूमि को अलग सड़क मार्ग उपलब्ध होने की शर्त पर विभाजित कर दूसरे पक्ष को हस्तांतरित कर सकेगी। इसके लिए मूल आवंटी को हस्तांतरण की तारीख तक भू-भाटक और संधारण शुल्क समेत सभी बकाया राशि का भुगतान करना होगा। आवंटन अभिलेख में जरूरी संशोधन के साथ समर्पण अभिलेख निष्पादित और पंजीकृत कराना भी अनिवार्य होगा।
    नए नियमों में भूमि और भवन आवंटन के लिए एमपीआईडीसी के अधिकारियों के अधिकार भी निर्धारित किए गए हैं। औद्योगिक भवनों का आवंटन क्षेत्रीय कार्यालय के कार्यकारी संचालक के अधिकार क्षेत्र में रहेगा। औद्योगिक क्षेत्रों में आवासीय और व्यावसायिक प्रयोजन के लिए 10000 वर्गमीटर तक जमीन आवंटित करने का अधिकार क्षेत्रीय कार्यालय के कार्यकारी संचालक को दिया गया है जबकि इससे अधिक क्षेत्रफल के आवंटन का अधिकार प्रबंध संचालक के पास रहेगा। इसके अलावा सार्वजनिक निजी भागीदारी यानी पीपीपी मॉडल पर औद्योगिक आवास परियोजनाएं शुरू करने का प्रावधान भी किया गया है।
    सरकार ने निजी औद्योगिक पार्कों के साथ निर्यात पार्कों और प्लग-एंड-प्ले तथा लॉजिस्टिक पार्कों के लिए भी दिशा-निर्देश निर्धारित किए हैं। निजी डेवलपर को परियोजना का विकास अपने खर्च और जोखिम पर करना होगा। जरूरत पड़ने पर वह विशेष प्रयोजन वाहन यानी एसपीवी बना सकेगा और परियोजना की मान्यता तथा प्रोत्साहन संबंधी प्रावधानों के लिए एमपीआईडीसी के साथ समझौता कर सकेगा। कुल मिलाकर नए नियम औद्योगिक जमीन के उपयोग और आवंटन की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित करने की दिशा में उठाया गया कदम हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि इनका प्रभाव नई परियोजनाओं पर ही पड़ेगा और पहले से बने आवासीय परिसरों या वहां रह रहे लोगों को इससे प्रभावित नहीं किया जाएगा।

  • मध्य प्रदेश के विकास को मिलेगी नई दिशा, 55 जिलों के लिए चयनित CM Fellows का प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू

    मध्य प्रदेश के विकास को मिलेगी नई दिशा, 55 जिलों के लिए चयनित CM Fellows का प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू


    मध्य प्रदेश। मध्य प्रदेश में सुशासन और विकास कार्यों को प्रभावी बनाने की दिशा में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एक महत्वपूर्ण पहल की शुरुआत की है। बुधवार 14 अक्टूबर 2026 को भोपाल स्थित अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन एवं नीति विश्लेषण संस्थान में मुख्यमंत्री यंग प्रोफेशनल फॉर डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत चयनित सीएम फेलोज के पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुआत की। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रदेश के 55 जिलों के लिए चयनित सीएम फेलोज शामिल हो रहे हैं। इसका उद्देश्य युवा पेशेवरों को शासन व्यवस्था और विकास से जुड़े कार्यों की बेहतर समझ प्रदान करना है।

    मुख्यमंत्री यंग प्रोफेशनल फॉर डेवलपमेंट प्रोग्राम के अंतर्गत चयनित इन प्रतिभागियों को पांच दिनों तक कार्यक्रम से संबंधित जरूरी जानकारी दी जाएगी। इसके साथ ही उन्हें विकास योजनाओं की प्रक्रिया और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को समझने का अवसर मिलेगा। इस पहल के माध्यम से युवा पेशेवरों को प्रदेश में चल रहे विकास कार्यों से जोड़ने और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की प्रक्रिया से परिचित कराने पर जोर दिया जा रहा है।

    राज्य सरकार की इस पहल में जिलों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। विकास योजनाओं को जमीन पर लागू करने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था और स्थानीय जरूरतों की समझ जरूरी होती है। ऐसे में सीएम फेलोज के प्रशिक्षण का उद्देश्य उन्हें शासन की प्रक्रियाओं से परिचित कराना और विकास संबंधी कार्यों में उनकी भागीदारी के लिए तैयार करना है। प्रदेश के 55 जिलों के लिए चयनित प्रतिभागियों को एक साथ प्रशिक्षण दिए जाने से उन्हें कार्यक्रम के उद्देश्यों और काम करने के तरीकों को समझने का अवसर मिलेगा।

    भोपाल स्थित अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन एवं नीति विश्लेषण संस्थान में आयोजित यह कार्यक्रम सुशासन और नीति निर्माण से जुड़े विषयों पर केंद्रित है। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को मुख्यमंत्री यंग प्रोफेशनल फॉर डेवलपमेंट प्रोग्राम की कार्यप्रणाली और उसके उद्देश्यों की जानकारी दी जाएगी। इसके जरिए युवा पेशेवरों को प्रशासनिक व्यवस्था के साथ समन्वय बनाकर काम करने और विकास योजनाओं की प्रक्रिया को समझने में मदद मिल सकती है।

    सीएम फेलोज कार्यक्रम को युवा प्रतिभाओं और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच बेहतर तालमेल विकसित करने की पहल के रूप में देखा जा रहा है। विकास कार्यों में प्रभावी भागीदारी के लिए योजनाओं की जानकारी के साथ उनके क्रियान्वयन की प्रक्रिया को समझना भी जरूरी है। पांच दिवसीय प्रशिक्षण इसी दिशा में एक कदम है। इसके माध्यम से चयनित प्रतिभागियों को अपनी जिम्मेदारियों और कार्यक्रम की अपेक्षाओं को समझने का अवसर मिलेगा।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ प्रदेश में विकास और सुशासन से जुड़ी पहल को आगे बढ़ाने के प्रयासों का हिस्सा है। अब प्रशिक्षण के दौरान दी जाने वाली जानकारी और उसके बाद जिलों में सीएम फेलोज की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। उम्मीद है कि इस कार्यक्रम से युवा पेशेवरों को प्रशासनिक कामकाज की समझ विकसित करने और विकास संबंधी गतिविधियों में योगदान देने में मदद मिलेगी।

  • पानी में सीवर की मिलावट रोकने रोबोटिक निगरानी: MP के 2.30 लाख डेंजर क्रॉसिंग पॉइंट्स पर नजर; ₹40 प्रति मीटर में होगी पाइपलाइन की जांच

    पानी में सीवर की मिलावट रोकने रोबोटिक निगरानी: MP के 2.30 लाख डेंजर क्रॉसिंग पॉइंट्स पर नजर; ₹40 प्रति मीटर में होगी पाइपलाइन की जांच


    इंदौर।
    इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने पेयजल और सीवर पाइपलाइनों की निगरानी के लिए तकनीक का सहारा लेने का फैसला किया है। अब प्रदेश के नगरीय निकायों में पानी और सीवर लाइनों की अंदरूनी स्थिति जांचने के लिए रोबोटिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। खास बात यह है कि इस जांच के लिए सड़कों को खोदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। नगरीय प्रशासन एवं विकास संचालनालय ने प्रदेश के नगर निगमों नगर पालिकाओं और नगर परिषदों को 70 से 900 मिलीमीटर व्यास वाली पेयजल और सीवर पाइपलाइनों की जांच कराने के निर्देश दिए हैं। इसके लिए चेन्नई की पेरमा-लिनियर इंडस्ट्रीज को एम्पैनल किया गया है। विभाग ने एजेंसी के साथ एक साल का समझौता किया है और पाइपलाइन जांच की दर 40 रुपए प्रति मीटर तय की गई है।

    इस फैसले की पृष्ठभूमि इंदौर का भागीरथपुरा हादसा है। दिसंबर 2025 के आखिरी सप्ताह में दूषित पेयजल के कारण यहां 36 लोगों की मौत हुई थी। जांच में पानी में मानव मल से जुड़े बैक्टीरिया पाए गए थे। सामने आया था कि सीवर लाइन में लीकेज के कारण दूषित पानी पेयजल लाइन में मिल गया था। जांच के दौरान अकेले भागीरथपुरा क्षेत्र में ऐसे 260 स्थान मिले थे जहां सीवर का पानी पेयजल लाइन में मिलने की स्थिति बनी हुई थी। इसके बाद सरकार ने पूरे प्रदेश में ऐसी संवेदनशील जगहों की पहचान शुरू की।

    GIS प्लेटफॉर्म गरुड़ के जरिए कराई गई मैपिंग में प्रदेश में 2.30 लाख से अधिक ऐसे पॉइंट्स चिन्हित किए गए जहां सीवर और पेयजल पाइपलाइनें एक दूसरे को क्रॉस कर रही हैं। इनमें इंदौर के करीब 30 हजार और भोपाल के 20 हजार से ज्यादा डेंजर क्रॉसिंग पॉइंट्स शामिल हैं। इन जगहों पर पाइपलाइन में लीकेज या दूसरी तकनीकी खराबी होने की स्थिति में सीवर का पानी पेयजल लाइन में पहुंचने का खतरा बना रहता है।

    अब इन पाइपलाइनों के अंदर की वास्तविक स्थिति जानने के लिए CCTV क्रॉलर सिस्टम वाले रोबोट का इस्तेमाल किया जाएगा। रोबोट को मौजूदा मैनहोल एयर रिलीज वाल्व या दूसरे एक्सेस पॉइंट्स से पाइपलाइन के भीतर भेजा जाएगा। इसमें हाई रिजॉल्यूशन कैमरे और सेंसर लगे होंगे। करीब 300 मीटर लंबे केबल से जुड़े इस सिस्टम की मदद से पाइपलाइन के अंदर लगातार वीडियो रिकॉर्डिंग और तकनीकी डेटा जुटाया जा सकेगा। लीकेज टूट-फूट अवरोध और अवैध कनेक्शन जैसी समस्याओं की पहचान भी की जा सकेगी।

    इस काम के लिए विभाग ने 1.50 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत वाला टेंडर जारी किया था। इसमें तीन कंपनियों ने बोली लगाई। डिजिटल सर्विलॉन्स ने 440 रुपए प्रति मीटर फॉर्म डील ने 400 रुपए प्रति मीटर और पेरमा-लिनियर इंडस्ट्रीज ने 40 रुपए प्रति मीटर की दर पेश की। सबसे कम बोली के आधार पर पेरमा-लिनियर इंडस्ट्रीज को एम्पैनल किया गया है। अब नगरीय निकाय अपनी जरूरत के अनुसार एस्टीमेट तैयार कर एजेंसी को वर्क ऑर्डर जारी करेंगे। विभाग के मुताबिक ऐसी रोबोटिक पाइपलाइन जांच तकनीक देश के 15 से अधिक राज्यों में इस्तेमाल की जा रही है। मध्य प्रदेश में इसका इस्तेमाल पहली बार बड़े स्तर पर किया जाएगा।

  • MP के मेधावी छात्रों के लिए बड़ी खुशखबरी हर महीने मिलेंगे 7500 रुपए NEET JEE और CLAT की तैयारी का खर्च भी उठाएगी सरकार

    MP के मेधावी छात्रों के लिए बड़ी खुशखबरी हर महीने मिलेंगे 7500 रुपए NEET JEE और CLAT की तैयारी का खर्च भी उठाएगी सरकार


    भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार निर्माण श्रमिकों के मेधावी बच्चों के लिए एक बड़ी पहल शुरू करने जा रही है। सरकार की नई योजना के तहत चयनित विद्यार्थियों को हर महीने 7500 रुपए की आर्थिक सहायता दी जाएगी। इस योजना का उद्देश्य ऐसे बच्चों को आगे बढ़ने का मौका देना है जो पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन आर्थिक कारणों से उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की महंगी तैयारी करने में परेशानी का सामना करते हैं। भवन एवं अन्य सन्निर्माण श्रमिक श्री मेधा छात्र उन्नयन योजना के नाम से प्रस्तावित इस योजना का ड्राफ्ट तैयार हो चुका है और इसे गजट नोटिफिकेशन के लिए भेजने की तैयारी है। सरकार का प्रस्ताव है कि योजना इसी साल से लागू की जाए।

    इस योजना के तहत निर्माण श्रमिकों के मेधावी बच्चों को पढ़ाई के साथ NEET JEE और CLAT जैसी महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिए भी आर्थिक मदद दी जाएगी। 7500 रुपए की मासिक सहायता का इस्तेमाल कोचिंग फीस आने जाने के खर्च किताबें हॉस्टल ट्यूशन फीस और अन्य शैक्षणिक जरूरतों के लिए किया जा सकेगा। सरकार का मानना है कि आर्थिक मदद मिलने से श्रमिक परिवारों के प्रतिभाशाली बच्चों को अपनी पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए बेहतर संसाधन उपलब्ध हो सकेंगे।

    मध्य प्रदेश के श्रम मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल के मुताबिक शुरुआत में योजना को प्रयोग के तौर पर लागू किया जाएगा। पहले चरण में 600 विद्यार्थियों को इसका लाभ देने की तैयारी है। इनमें 500 विद्यार्थी भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार मंडल से जबकि 100 विद्यार्थी श्रमिक कल्याण मंडल के माध्यम से लिए जाएंगे। मंत्री ने बताया कि इसके लिए 80 प्रतिशत से अधिक अंक हासिल करने वाले विद्यार्थियों को प्राथमिकता दी जाएगी। अगर योजना का शुरुआती प्रयोग सफल रहा तो आने वाले समय में विद्यार्थियों की संख्या और चयन के लिए निर्धारित कटऑफ बढ़ाने पर भी विचार किया जाएगा।

    योजना का लाभ पाने के लिए कुछ जरूरी पात्रता शर्तें भी तय की गई हैं। बच्चे के माता या पिता का निर्माण श्रमिक के तौर पर संबंधित मंडल में पंजीकरण होना जरूरी होगा। पंजीयन निर्धारित अवधि से होना चाहिए और श्रमिक के कम से कम 90 दिन काम करने का रिकॉर्ड भी आवश्यक होगा। विद्यार्थी को 10वीं कक्षा में कम से कम 80 प्रतिशत अंक हासिल करने होंगे। चयन केवल आवेदन करने से नहीं होगा बल्कि पात्र विद्यार्थियों की मेरिट तैयार की जाएगी और इसी आधार पर अधिकतम 500 विद्यार्थियों का चयन किया जाएगा। योजना में छात्राओं के लिए 20 प्रतिशत सीटें आरक्षित रखने का प्रावधान भी बताया गया है।

    चयन के बाद योजना का लाभ जारी रखने के लिए भी विद्यार्थियों को पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करना होगा। 12वीं कक्षा में कम से कम 75 प्रतिशत अंक हासिल करना जरूरी होगा। इसके अलावा आगे की पढ़ाई के दौरान हर साल निर्धारित समय पर ऑनलाइन आवेदन करना होगा। यानी सरकार की आर्थिक सहायता लगातार पाने के लिए विद्यार्थियों को अपनी पढ़ाई में प्रदर्शन बनाए रखना होगा।

    इस योजना को लेकर सरकार का जोर केवल स्कॉलरशिप देने तक सीमित नहीं है बल्कि श्रमिक परिवारों के बच्चों को बेहतर शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से आगे बढ़ाने पर है। यदि किसी श्रमिक का बच्चा 10वीं में 80 प्रतिशत या उससे अधिक अंक हासिल करता है और बाकी पात्रता शर्तें पूरी करता है तो वह योजना के लिए आवेदन कर सकेगा। हालांकि अंतिम चयन मेरिट के आधार पर ही होगा। सरकार को उम्मीद है कि इस पहल से आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के मेधावी बच्चों को डॉक्टर इंजीनियर वकील और अन्य प्रतिष्ठित करियर की दिशा में आगे बढ़ने का बेहतर अवसर मिलेगा।

  • सरकारी फाइलों पर नहीं चलेगी लेटलतीफी, MP में नए कानून से अफसरों की जवाबदेही होगी तय

    सरकारी फाइलों पर नहीं चलेगी लेटलतीफी, MP में नए कानून से अफसरों की जवाबदेही होगी तय


    भोपाल । मध्य प्रदेश में उद्योग और व्यापार से जुड़े कामों को आसान और तेज बनाने के लिए सरकार ने ऐसी व्यवस्था लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया है जिसमें सरकारी अधिकारी किसी फाइल को तय समय से ज्यादा देर तक अपने पास रोककर नहीं रख सकेंगे। मध्यप्रदेश ईज ऑफ डूइंग बिजनेस अधिनियम 2026 के तहत डिजिटल सिस्टम और समय सीमा के जरिए अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की व्यवस्था की गई है। इस व्यवस्था की सबसे खास बात ऑटो एस्कलेशन सिस्टम है। यदि किसी अधिकारी के पास आई फाइल तय समय सीमा में निपटाई नहीं जाती है तो वह स्वतः अगले वरिष्ठ अधिकारी के पास पहुंच जाएगी। यानी जिस अधिकारी ने फाइल को रोककर रखा था उसके पास आगे उस मामले पर फैसला लेने का अधिकार नहीं रहेगा।

    अब तक कारोबार या उद्योग शुरू करने के लिए अलग अलग विभागों से एनओसी और मंजूरियां लेने में लोगों को काफी समय लग जाता था। कई बार फाइल एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय और एक टेबल से दूसरी टेबल तक घूमती रहती थी। नए कानून के तहत इस प्रक्रिया को डिजिटल सिंगल विंडो सिस्टम से जोड़ने की कोशिश की गई है ताकि आवेदन और मंजूरी की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन तरीके से आगे बढ़े और आवेदक को बार बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें।

    इस व्यवस्था में समय सीमा को सबसे महत्वपूर्ण बनाया गया है। उदाहरण के लिए यदि किसी अधिकारी को किसी आवेदन पर 15 दिन के भीतर निर्णय लेना है और वह तय अवधि में कोई कार्रवाई नहीं करता है तो अगले दिन यानी 16वें दिन आवेदन स्वतः उसके वरिष्ठ अधिकारी के डिजिटल डेस्क पर पहुंच सकता है। इससे फाइल रोकने वाले अधिकारी के हाथ से उस आवेदन पर निर्णय लेने का अधिकार हट जाएगा और मामला उच्च स्तर पर चला जाएगा। साथ ही देरी का रिकॉर्ड भी डिजिटल सिस्टम में दर्ज रहेगा।

    नए कानून की धारा 13 में ऑटो एस्कलेशन का प्रावधान किया गया है। इसके तहत निर्धारित समय सीमा के भीतर आवेदन का निपटारा नहीं होने पर मामला विभाग के अगले उच्चतर प्राधिकारी के पास स्वतः भेजे जाने की व्यवस्था है। इसका सीधा उद्देश्य सरकारी कामकाज में देरी को कम करना और अधिकारियों को समय पर फैसला लेने के लिए जवाबदेह बनाना है।

    नए प्रावधानों में आवेदक को बार बार आपत्ति या नई जानकारी के नाम पर परेशान करने पर भी रोक लगाने की कोशिश की गई है। धारा 12 के अनुसार अधिकारी आवेदन मिलने के बाद निर्धारित अवधि में अतिरिक्त जानकारी मांग सकता है और प्रक्रिया में बार बार नए सवाल खड़े करने की गुंजाइश सीमित की गई है। इसका मकसद यह है कि यदि किसी आवेदन में कमी है तो उसे स्पष्ट रूप से बताया जाए और आवेदक के कमी दूर करने के बाद फाइल अनावश्यक रूप से दोबारा न रोकी जाए।

    इस व्यवस्था का सबसे बड़ा असर अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही पर पड़ सकता है। कानून के तहत यदि कोई सक्षम अधिकारी या कर्मचारी निर्धारित समय सीमा में मंजूरी या आवेदन का निपटारा करने में विफल रहता है तो उस पर मध्यप्रदेश लोक सेवाओं के प्रदान की गारंटी अधिनियम 2010 के प्रावधानों के अनुसार जुर्माना लगाया जा सकता है। खास बात यह है कि जिम्मेदारी संबंधित अधिकारी या कर्मचारी की व्यक्तिगत होगी। यानी देरी के लिए विभाग को जिम्मेदार मानकर मामला खत्म नहीं होगा बल्कि संबंधित अधिकारी पर भी कार्रवाई हो सकती है।

    लोक सेवा गारंटी व्यवस्था में तय समय सीमा में सेवा नहीं देने पर अधिकारी या कर्मचारी पर प्रतिदिन के आधार पर जुर्माने का प्रावधान है। इससे सरकारी कामकाज में लापरवाही करने वाले अधिकारियों पर आर्थिक जवाबदेही भी तय हो सकती है। हालांकि किसी मामले में जुर्माना लगेगा या नहीं और उसकी प्रक्रिया क्या होगी यह संबंधित कानून और निर्धारित नियमों के अनुसार तय किया जाएगा।

    अधिनियम में सरकारी विभागों से मिलने वाली मंजूरियों को अधिक व्यवस्थित तरीके से एकीकृत करने की दिशा में भी प्रावधान किए गए हैं। इसके तहत राज्य स्तर पर नोडल एजेंसी के माध्यम से मंजूरी प्रक्रिया को संचालित करने की व्यवस्था बनाई जा रही है। इसका उद्देश्य उद्योग और व्यापार से जुड़े आवेदनों को अलग अलग विभागों की जटिल प्रक्रिया में उलझने से बचाना है।

    कुल मिलाकर सरकार की नई व्यवस्था का मकसद यही है कि कारोबारियों और निवेशकों की फाइलें अनिश्चित समय तक सरकारी टेबल पर न पड़ी रहें। डिजिटल ट्रैकिंग ऑटो एस्कलेशन और व्यक्तिगत जवाबदेही के जरिए अधिकारियों पर समय पर निर्णय लेने का दबाव बढ़ेगा। यदि व्यवस्था प्रभावी तरीके से लागू होती है तो उद्योग और व्यापार से जुड़े लोगों के लिए मंजूरी की प्रक्रिया तेज हो सकती है और सरकारी दफ्तरों में फाइल रोककर रखने की पुरानी शिकायतों पर भी काफी हद तक अंकुश लग सकता है।

  • मुख्यमंत्री कार्यालय में अब हर दिन तय रहेंगे अधिकारी, मंत्रालय और समत्व के लिए जारी हुआ साप्ताहिक रोस्टर

    मुख्यमंत्री कार्यालय में अब हर दिन तय रहेंगे अधिकारी, मंत्रालय और समत्व के लिए जारी हुआ साप्ताहिक रोस्टर


    भोपाल। मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री कार्यालय और मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में अब सप्ताह के सातों दिन अधिकारियों की मौजूदगी और जिम्मेदारियां तय रहेंगी। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से अधिकारियों का साप्ताहिक रोस्टर जारी किया गया है। इसके तहत सोमवार से रविवार तक अलग-अलग अधिकारियों को मंत्रालय और समत्व में जिम्मेदारी सौंपी गई है। अधिकारियों को मुख्यमंत्री के निर्धारित कार्यक्रमों बैठकों और मुलाकातों से जुड़े कार्यों में समन्वय की जिम्मेदारी निभानी होगी। इस व्यवस्था का उद्देश्य मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों को व्यवस्थित तरीके से संचालित करने के साथ आम नागरिकों से होने वाली मुलाकातों के दौरान भी प्रशासनिक समन्वय सुनिश्चित करना है।

    जारी रोस्टर के अनुसार सोमवार को मंत्रालय में डॉ. सुदाम खाड़े और अरविंद दुबे की ड्यूटी रहेगी। वहीं समत्व में कौशलेंद्र विक्रम सिंह और सुधीर कोचर जिम्मेदारी संभालेंगे। मंगलवार को मंत्रालय में डॉ. सुदाम खाड़े और अरुण परमार मौजूद रहेंगे जबकि समत्व में डॉ. इलेया राजा टी और आदित्य शर्मा को जिम्मेदारी दी गई है। इस तरह सप्ताह की शुरुआत से ही मुख्यमंत्री के सरकारी कार्यक्रमों और निवास कार्यालय से जुड़े कार्यों के लिए अधिकारियों की मौजूदगी सुनिश्चित की गई है।

    बुधवार को मंत्रालय में कौशलेंद्र विक्रम सिंह और सुधीर कोचर की ड्यूटी तय की गई है। इसी दिन समत्व में डॉ. सुदाम खाड़े और अरविंद दुबे जिम्मेदारी संभालेंगे। गुरुवार को मंत्रालय में डॉ. इलेया राजा टी और आदित्य शर्मा मौजूद रहेंगे जबकि समत्व में डॉ. सुदाम खाड़े और अरविंद दुबे की ड्यूटी रहेगी। शुक्रवार को मंत्रालय में कौशलेंद्र विक्रम सिंह और अरुण परमार जिम्मेदारी संभालेंगे। वहीं समत्व में कुमार पुरुषोत्तम और अरुण परमार को तैनात किया गया है।

    शनिवार और रविवार के लिए भी रोस्टर में अलग व्यवस्था की गई है। शनिवार को मंत्रालय में किसी अधिकारी की निर्धारित ड्यूटी नहीं रखी गई है जबकि समत्व में डॉ. इलेया राजा टी और आदित्य शर्मा जिम्मेदारी संभालेंगे। रविवार को भी मंत्रालय में कोई अधिकारी निर्धारित नहीं है। इस दिन समत्व में कौशलेंद्र विक्रम सिंह और सुधीर कोचर जिम्मेदारी संभालेंगे। इससे स्पष्ट है कि सप्ताहांत में मुख्यमंत्री निवास कार्यालय यानी समत्व पर प्रशासनिक समन्वय की व्यवस्था जारी रहेगी।

    रोस्टर में अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल कार्यालय में मौजूद रहने तक सीमित नहीं है। उन्हें मुख्यमंत्री से संबंधित महत्वपूर्ण बैठकों चर्चाओं और कार्यक्रमों में उपस्थित रहकर आवश्यक समन्वय करना होगा। मुख्यमंत्री कार्यालय की कार्यप्रणाली में विभिन्न विभागों और अधिकारियों के बीच तालमेल बेहद महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में दिन के हिसाब से जिम्मेदारी तय होने से कार्यक्रमों की तैयारी और उनसे जुड़े प्रशासनिक कार्यों को समय पर पूरा करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि रोस्टर में शामिल कोई अधिकारी किसी कारण से अनुपस्थित रहता है तो संबंधित लिंक अधिकारी उसकी जिम्मेदारी संभालेगा। यानी अधिकारी की अनुपस्थिति की स्थिति में भी कामकाज प्रभावित न हो इसके लिए वैकल्पिक व्यवस्था रखी गई है। यह व्यवस्था मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों के दौरान प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    इस साप्ताहिक रोस्टर के जरिए मुख्यमंत्री कार्यालय में कामकाज को अधिक व्यवस्थित करने और जिम्मेदारियों को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। खास तौर पर मुख्यमंत्री की बैठकों और आम नागरिकों से मुलाकातों के दौरान अधिकारियों की उपलब्धता सुनिश्चित होने से समन्वय बेहतर होने की उम्मीद है। मुख्यमंत्री सचिवालय की ओर से पहले भी विभागीय समीक्षा और जनहित से जुड़े मामलों पर समयबद्ध कार्रवाई पर जोर दिया जाता रहा है।

  • तकनीकी गड़बड़ी से ई-कैबिनेट व्यवस्था प्रभावित, मुख्यमंत्री मंत्रियों को बताएंगे नर्मदा समझौते की पूरी जानकारी

    तकनीकी गड़बड़ी से ई-कैबिनेट व्यवस्था प्रभावित, मुख्यमंत्री मंत्रियों को बताएंगे नर्मदा समझौते की पूरी जानकारी


    भोपाल । भोपाल में बुधवार को होने वाली मध्यप्रदेश मंत्रिमंडल की बैठक से पहले तकनीकी गड़बड़ी ने प्रशासनिक व्यवस्था की परीक्षा ले ली। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में प्रस्तावित कैबिनेट बैठक से पहले ई-कैबिनेट पोर्टल अचानक काम करना बंद कर गया जिससे मंत्रियों और उनके स्टाफ को बैठक का एजेंडा समय पर उपलब्ध नहीं हो सका। डिजिटल व्यवस्था पर आधारित कैबिनेट प्रक्रिया में आई इस बाधा के कारण सचिवालय स्तर पर देर रात तक हलचल बनी रही और तकनीकी टीम को पोर्टल को दोबारा चालू करने के लिए लगाया गया।

    मुख्य सचिव सचिवालय की ओर से बाद में आधिकारिक सूचना जारी कर बताया गया कि तकनीकी कारणों से ई-कैबिनेट पोर्टल फिलहाल उपलब्ध नहीं है और विशेषज्ञों की टीम लगातार इसे ठीक करने में जुटी हुई है। अधिकारियों का कहना है कि समस्या दूर होते ही संबंधित दस्तावेज और एजेंडा मंत्रियों को उपलब्ध करा दिए जाएंगे ताकि बैठक निर्धारित समय पर सुचारु रूप से संचालित हो सके।

    आज की कैबिनेट बैठक का सबसे महत्वपूर्ण विषय नर्मदा परियोजना से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे विवाद का समाधान रहेगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव हाल ही में दो दिवसीय दिल्ली दौरे से लौटे हैं जहां उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व के साथ कई महत्वपूर्ण बैठकों में हिस्सा लिया। इसी दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में सरदार सरोवर बांध और उससे जुड़े मुआवजा विवाद पर अंतिम सहमति बनी। मुख्यमंत्री इस पूरे घटनाक्रम की विस्तृत जानकारी मंत्रियों के साथ साझा करेंगे और बताएंगे कि किन परिस्थितियों में मध्यप्रदेश को गुजरात से सात हजार करोड़ रुपए से अधिक का दावा छोड़ना पड़ा तथा राज्य को गुजरात को लगभग 550 करोड़ रुपए का भुगतान करना होगा।

    कैबिनेट बैठक में केवल नर्मदा परियोजना ही नहीं बल्कि आगामी विधानसभा मानसून सत्र की रणनीति पर भी चर्चा होगी। 20 जुलाई से शुरू होकर 24 जुलाई तक चलने वाले विधानसभा सत्र के लिए सरकार लगभग एक दर्जन विधेयक तैयार कर रही है। इन प्रस्तावित विधेयकों को कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद विधानसभा में पेश किया जाएगा। सरकार का उद्देश्य विभिन्न प्रशासनिक सुधारों और विकास योजनाओं को कानूनी आधार प्रदान करना है ताकि उनकी प्रभावी क्रियान्विति सुनिश्चित हो सके।

    बैठक में पहले अनुपूरक बजट को भी स्वीकृति दिए जाने की संभावना है। इसके साथ ही वर्ष 2031 तक विभिन्न विभागों की संचालित योजनाओं को जारी रखने संबंधी प्रस्तावों पर भी विचार किया जाएगा। इन योजनाओं के माध्यम से अधोसंरचना विकास शिक्षा स्वास्थ्य ग्रामीण विकास सिंचाई और सामाजिक कल्याण जैसे क्षेत्रों में चल रही परियोजनाओं को निरंतर गति देने की तैयारी है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि शासन की डिजिटल प्रणाली जितनी सुविधाजनक है उतनी ही उसकी तकनीकी मजबूती भी आवश्यक है। ई-कैबिनेट जैसी व्यवस्था का उद्देश्य कागजरहित प्रशासन को बढ़ावा देना और निर्णय प्रक्रिया को अधिक तेज और पारदर्शी बनाना है। ऐसे में तकनीकी बाधाएं शासन की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि अधिकारियों का दावा है कि समस्या का शीघ्र समाधान कर लिया जाएगा और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न आए इसके लिए भी आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।

    आज होने वाली कैबिनेट बैठक में लिए जाने वाले फैसलों पर पूरे प्रदेश की नजर रहेगी क्योंकि नर्मदा परियोजना से जुड़े निर्णयों के साथ विधानसभा सत्र की तैयारियां और विकास योजनाओं को लेकर सरकार की आगामी रणनीति भी इसी बैठक से तय होगी।

  • ग्रामीणों के लिए बड़ी सौगात मध्य प्रदेश में शुरू हुई जी राम जी स्कीम 125 दिन रोजगार की गारंटी और मजदूरी में देरी पर मुआवजा

    ग्रामीणों के लिए बड़ी सौगात मध्य प्रदेश में शुरू हुई जी राम जी स्कीम 125 दिन रोजगार की गारंटी और मजदूरी में देरी पर मुआवजा


    भोपाल । मध्य प्रदेश सरकार ने ग्रामीण रोजगार और गांवों के समग्र विकास को नई दिशा देने के उद्देश्य से एक जुलाई से जी राम जी योजना लागू कर दी है। इस नई व्यवस्था के तहत पात्र ग्रामीण परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में कम से कम 125 दिन के अकुशल रोजगार की गारंटी मिलेगी। यह अवधि मौजूदा मनरेगा के 100 दिनों की तुलना में 25 दिन अधिक है। योजना का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं बल्कि गांवों में स्थायी विकास कार्यों को गति देना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना भी है।

    योजना के तहत सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि यदि कोई पात्र व्यक्ति रोजगार के लिए आवेदन करता है तो उसे 15 दिनों के भीतर काम उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा। यदि निर्धारित समय सीमा में रोजगार नहीं दिया जाता है तो संबंधित व्यक्ति बेरोजगारी भत्ते का हकदार होगा। पहले 30 दिनों तक मजदूरी दर का 25 प्रतिशत और इसके बाद 50 प्रतिशत तक भत्ता देने की व्यवस्था की गई है। इससे रोजगार की कानूनी गारंटी को और मजबूत बनाया गया है।

    सरकार ने मजदूरी भुगतान को लेकर भी स्पष्ट नियम तय किए हैं। योजना में काम करने वाले श्रमिकों को साप्ताहिक आधार पर भुगतान किया जाएगा और किसी भी स्थिति में काम पूरा होने के 15 दिनों के भीतर मजदूरी देना अनिवार्य होगा। यदि भुगतान में देरी होती है तो 16वें दिन से बकाया मजदूरी पर प्रतिदिन 0.05 प्रतिशत की दर से मुआवजा भी दिया जाएगा। इससे समय पर भुगतान सुनिश्चित करने और श्रमिकों को आर्थिक नुकसान से बचाने का प्रयास किया गया है।

    रोजगार प्राप्त करने के लिए आवेदन की प्रक्रिया भी सरल बनाई गई है। पात्र व्यक्ति मौखिक लिखित या डिजिटल माध्यम से आवेदन कर सकेगा। आवेदन ग्राम पंचायत वार्ड सदस्य कार्यक्रम अधिकारी अथवा अधिकृत ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से किया जा सकेगा। आवेदन करने पर रसीद देना भी अनिवार्य होगा ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे।

    योजना का लाभ केवल उन्हीं ग्रामीण परिवारों को मिलेगा जिनका पंजीकरण होगा और जिनके वयस्क सदस्यों का नाम रोजगार गारंटी कार्ड में दर्ज होगा। परिवार का कोई भी वयस्क सदस्य रोजगार के लिए आवेदन कर सकेगा। सरकार ने वंचित और जरूरतमंद परिवारों को प्राथमिकता देने का भी प्रावधान किया है ताकि रोजगार का लाभ सबसे पहले उन लोगों तक पहुंचे जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।

    जी राम जी योजना के तहत जल संरक्षण सिंचाई ग्रामीण सड़कें आजीविका बढ़ाने वाले कार्य आधारभूत ग्रामीण अधोसंरचना और जलवायु परिवर्तन से जुड़े विकास कार्य कराए जाएंगे। सरकार का उद्देश्य ऐसी स्थायी परिसंपत्तियां तैयार करना है जिनका लाभ गांवों को लंबे समय तक मिलता रहे। साथ ही विकसित ग्राम पंचायत योजना के माध्यम से पंचायत स्तर की योजनाओं को जिला राज्य और राष्ट्रीय विकास योजनाओं से जोड़ने की भी तैयारी की गई है।

    योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए आधुनिक तकनीक का भी उपयोग किया जाएगा। जीपीएस आधारित निगरानी मोबाइल उपस्थिति प्रणाली रियल टाइम डैशबोर्ड और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों के जरिए कार्यों की निगरानी होगी। इससे फर्जीवाड़े पर रोक लगाने पारदर्शिता बढ़ाने और समय पर भुगतान सुनिश्चित करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    इस योजना के वित्तीय मॉडल में केंद्र सरकार 60 प्रतिशत और राज्य सरकार 40 प्रतिशत खर्च वहन करेगी। सरकार का मानना है कि यह योजना ग्रामीण रोजगार बढ़ाने के साथ गांवों के स्थायी विकास और बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।