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  • बुखार से राहत पाने की जल्दबाजी पड़ सकती है भारी, गूगल और रील देखकर दवा ले रहे लोग, किडनी को नुकसान का बढ़ा खतरा

    बुखार से राहत पाने की जल्दबाजी पड़ सकती है भारी, गूगल और रील देखकर दवा ले रहे लोग, किडनी को नुकसान का बढ़ा खतरा


    भोपाल। मध्य प्रदेश में इन दिनों वायरल फीवर सर्दी जुकाम और खांसी के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अस्पतालों की ओपीडी में रोजाना बड़ी संख्या में लोग इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। अनुमान के मुताबिक प्रदेश में प्रतिदिन करीब 3 हजार मरीज वायरल फीवर से जुड़ी शिकायतों के साथ अस्पतालों और क्लीनिकों में पहुंच रहे हैं। भोपाल में जेपी अस्पताल हमीदिया अस्पताल जिला अस्पताल और निजी क्लीनिकों में रोजाना करीब 600 मरीज सर्दी जुकाम और बुखार की समस्या लेकर आ रहे हैं। वहीं इंदौर और जबलपुर में लगभग 500-500 ग्वालियर में 200 और उज्जैन में करीब 150 मरीज रोजाना इन बीमारियों से पीड़ित बताए जा रहे हैं। इस बीच चिंता की बात यह है कि कई लोग जल्द राहत पाने के लिए डॉक्टर की सलाह लेने के बजाय खुद ही एंटीबायोटिक और दर्द निवारक दवाएं लेने लगे हैं। यह आदत सेहत पर भारी पड़ सकती है और कुछ परिस्थितियों में किडनी को नुकसान पहुंचने का खतरा भी बढ़ा सकती है।

    डॉक्टरों के मुताबिक सर्दी जुकाम और वायरल फीवर के दौरान हर मरीज को एंटीबायोटिक की जरूरत नहीं होती। एंटीबायोटिक दवाएं बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमण के इलाज में इस्तेमाल की जाती हैं जबकि वायरल संक्रमण में इनका सामान्य तौर पर फायदा नहीं होता। बिना जरूरत या गलत तरीके से एंटीबायोटिक लेने से भविष्य में बैक्टीरिया पर दवाओं का असर कम हो सकता है। इसी तरह कुछ पेनकिलर यानी दर्द निवारक दवाओं का गलत मात्रा में या लंबे समय तक इस्तेमाल किडनी की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है। खासकर पहले से किडनी की समस्या से जूझ रहे लोगों में अतिरिक्त सावधानी बरतना जरूरी है।

    एमबीबीएस एमडी और एफआईसीडी विशेषज्ञ डॉ. समन ताहिर के अनुसार उनके पास इलाज के लिए आने वाले करीब 50 प्रतिशत मरीज डॉक्टर से मिलने से पहले ही खुद दवाएं ले चुके होते हैं। उनके व्यक्तिगत क्लिनिकल अनुभव में ऐसे कई मरीज सामने आते हैं जिन्हें गलत दवा अनुचित खुराक या लंबे समय तक दवा लेने के कारण जटिलताओं का सामना करना पड़ता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मरीजों से जुड़ा यह अनुभव किसी बड़े सर्वे का आंकड़ा नहीं है। उनका कहना है कि दवा की खुराक और उसे लेने की अवधि मरीज की बीमारी मेडिकल हिस्ट्री और किडनी की स्थिति के अनुसार तय की जानी चाहिए।

    डॉ. ताहिर ने करीब 20 साल के एक युवक का उदाहरण भी दिया जिसे सर्दी जुकाम और शरीर में दर्द की शिकायत रहती थी। युवक डॉक्टर से सलाह लेने के बजाय खुद ही दर्द निवारक दवाएं और एंटीबायोटिक लेने लगा। हर बार कुछ राहत मिलने के कारण उसने दवाओं का इस्तेमाल जारी रखा। बाद में जांच में उसकी किडनी प्रोफाइल में गड़बड़ी और क्रिएटिनिन बढ़ा हुआ पाया गया। हालांकि चिकित्सकीय जांच के बिना यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि किडनी की परेशानी केवल किसी एक दवा के कारण हुई थी।

    ऑर्थो स्पाइन एंड स्पोर्ट्स इंजरी विशेषज्ञ डॉ. प्रज्ञेश सक्सेना ने भी एक ऐसे मरीज का मामला बताया जिसे गर्दन की नस पर दबाव के कारण सिरदर्द हो रहा था। मरीज इसे सामान्य सिरदर्द समझकर करीब तीन महीने तक दर्द निवारक दवाएं लेता रहा। बाद में जांच में दर्द की असली वजह सामने आई और उसके क्रिएटिनिन में भी बढ़ोतरी पाई गई। इस मामले से स्पष्ट होता है कि लंबे समय तक दर्द दबाने के बजाय उसकी मूल वजह का पता लगाना जरूरी है।

    डॉक्टरों का कहना है कि अब कई लोग गूगल और सोशल मीडिया पर उपलब्ध जानकारी देखकर अपनी दवा और एक्सरसाइज खुद तय करने लगे हैं। किसी दूसरे व्यक्ति को फायदा पहुंचाने वाला उपचार हर मरीज के लिए सही हो यह जरूरी नहीं है। लगातार बुखार दर्द या सर्दी जुकाम बने रहने पर चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है। पुराने पर्चे के आधार पर दवाएं दोबारा शुरू करने से भी बचना चाहिए।

    केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन यानी सीडीएससीओ ने भी दर्द निवारक दवाओं और एंटीबायोटिक्स के तर्कसंगत इस्तेमाल पर जोर दिया है। विशेषज्ञों के मुताबिक वायरल फीवर के दौरान पर्याप्त आराम पानी और तरल पदार्थों का सेवन तथा जरूरत के अनुसार डॉक्टर की सलाह से उपचार करना बेहतर है। बिना सलाह के एंटीबायोटिक या पेनकिलर लेने से बचना चाहिए। तुरंत राहत पाने की जल्दबाजी में दवाओं का गलत इस्तेमाल बीमारी को और जटिल बना सकता है इसलिए लक्षणों को दबाने के बजाय सही जांच और उचित इलाज को प्राथमिकता देना जरूरी है।

  • मनपुरा PHC में डॉक्टर की मांग को लेकर आरपार, छठे दिन भी नहीं टूटा दिनेश सगर का अनशन, प्रशासन पर उठे सवाल

    मनपुरा PHC में डॉक्टर की मांग को लेकर आरपार, छठे दिन भी नहीं टूटा दिनेश सगर का अनशन, प्रशासन पर उठे सवाल


    शिवपुरी । शिवपुरी जिले के मनपुरा गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर 24 घंटे नियमित डॉक्टर की तैनाती की मांग को लेकर दिनेश सगर का अनशन छठे दिन भी जारी है। दिनेश सगर खुले आसमान के नीचे अन्न जल त्यागकर अनशन पर बैठे हैं। छह दिन बीत जाने के बाद भी स्वास्थ्य विभाग या जिला प्रशासन का कोई जिम्मेदार अधिकारी अनशन स्थल पर नहीं पहुंचा है। इसको लेकर ग्रामीणों में नाराजगी देखने को मिल रही है। ग्रामीणों का कहना है कि स्वास्थ्य केंद्र पर पर्याप्त सुविधाएं और नियमित डॉक्टर नहीं होने से क्षेत्र के मरीजों को इलाज के लिए दूसरे स्थानों पर जाना पड़ता है।

    दिनेश सगर का कहना है कि छह दिनों से जारी भूख हड़ताल के दौरान उनका वजन 5 किलो 400 ग्राम से ज्यादा कम हो चुका है। उन्होंने अपने शुगर लेवल के काफी नीचे पहुंचने की बात भी कही है। इसके बावजूद वह अपनी मांग से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि जब तक मनपुरा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में 24 घंटे डॉक्टर की नियमित व्यवस्था नहीं की जाती तब तक उनका अनशन जारी रहेगा।

    दिनेश के समर्थन में अब ग्रामीण भी अनशन स्थल पर पहुंच रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि मनपुरा और आसपास के लोगों के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र महत्वपूर्ण है लेकिन नियमित डॉक्टर की व्यवस्था नहीं होने के कारण मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। कई बार गंभीर स्थिति में मरीजों को दूसरे स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल ले जाना पड़ता है। ग्रामीणों की मांग है कि केवल डॉक्टर की तैनाती ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य केंद्र पर जरूरी चिकित्सा सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएं।

    दिनेश सगर इससे पहले भी अपने विरोध प्रदर्शन के कारण चर्चा में आ चुके हैं। 21 अगस्त को वह पिछोर में शिक्षा स्वास्थ्य और सामाजिक परिवर्तन यात्रा की अनुमति नहीं मिलने के विरोध में पेट्रोल की बोतल लेकर पानी की टंकी पर चढ़ गए थे। वह रातभर पानी की टंकी पर रहे थे। बाद में प्रशासन की समझाइश के बाद वह नीचे उतरे थे। अब मनपुरा स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर की मांग को लेकर उनका अनशन लगातार जारी है।

    वहीं स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि मनपुरा स्वास्थ्य केंद्र में फिलहाल कोई डॉक्टर नियमित रूप से पदस्थ नहीं है लेकिन वहां चिकित्सा सेवाएं पूरी तरह बंद नहीं हैं। जिला चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. संजय ऋषेश्वर के मुताबिक खोड़ और पिछोर स्वास्थ्य केंद्र से दो डॉक्टरों की सेवाएं मनपुरा में लगाई गई हैं। ये डॉक्टर वहां जाकर मरीजों को स्वास्थ्य सेवाएं दे रहे हैं।

    स्वास्थ्य अधिकारी के मुताबिक इससे पहले मनपुरा में दो डॉक्टरों की पदस्थापना की गई थी लेकिन दोनों ने वहां ज्वाइन नहीं किया। इसके बाद नियमित डॉक्टर की पदस्थापना के लिए विभाग की ओर से पत्र लिखा गया है। विभाग का कहना है कि फिलहाल वैकल्पिक व्यवस्था के तहत स्वास्थ्य सेवाएं संचालित हो रही हैं।

    एक तरफ विभाग वैकल्पिक डॉक्टरों के जरिए सेवाएं जारी होने की बात कह रहा है तो दूसरी तरफ दिनेश सगर और ग्रामीण नियमित 24 घंटे डॉक्टर की मांग पर अड़े हुए हैं। छह दिन से चल रहे अनशन और दिनेश के वजन में कमी की बात के बीच अब लोगों की नजर प्रशासन की अगली कार्रवाई पर है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि उनकी मांग पर जल्द निर्णय होगा और मनपुरा स्वास्थ्य केंद्र में स्थायी डॉक्टर की व्यवस्था की जाएगी।

  • शिवपुरी में फर्जी अस्पतालों पर शिकंजा मरीजों के लिए लगाए थे पलंग और इलाज की व्यवस्था पंजीयन के कागज नहीं मिले तो दोनों संस्थान सील

    शिवपुरी में फर्जी अस्पतालों पर शिकंजा मरीजों के लिए लगाए थे पलंग और इलाज की व्यवस्था पंजीयन के कागज नहीं मिले तो दोनों संस्थान सील


    शिवपुरी । शिवपुरी जिले में बिना जरूरी पंजीयन के संचालित किए जा रहे स्वास्थ्य संस्थानों के खिलाफ स्वास्थ्य विभाग ने कार्रवाई तेज कर दी है। इसी अभियान के तहत कोलारस में शुक्रवार शाम स्वास्थ्य विभाग की टीम ने दो मेडिकल स्टोर और उनसे जुड़े अस्पतालों की जांच की। जांच के दौरान दोनों स्थानों पर मरीजों के इलाज और उन्हें भर्ती करने जैसी व्यवस्थाएं मिलीं। हालांकि जब टीम ने अस्पताल संचालन से संबंधित पंजीयन के दस्तावेज मांगे तो संचालक इन्हें प्रस्तुत नहीं कर सके। इसके बाद विभाग ने दोनों मेडिकल स्टोर और उनसे जुड़े अस्पतालों को सील कर दिया।

    यह कार्रवाई कलेक्टर अर्पित वर्मा के निर्देश पर की गई। जिला टीकाकरण अधिकारी डॉ. रोहित भदकारिया के नेतृत्व में स्वास्थ्य विभाग की टीम सबसे पहले फूल राज होटल के सामने स्थित धाकड़ मेडिकल स्टोर पहुंची। टीम ने मेडिकल स्टोर की जांच के साथ उसके पास संचालित किए जा रहे एएस अस्पताल का भी निरीक्षण किया। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार अस्पताल डॉ. पुष्पेंद्र सिंह के नाम पर बताया गया था लेकिन मौके पर एक ऐसा व्यक्ति मरीजों का इलाज करता मिला जो इसके लिए पात्र नहीं था।

    जांच के दौरान अस्पताल के अंदर मरीजों को भर्ती करने के लिए 10 पलंग भी रखे हुए मिले। इससे स्पष्ट हुआ कि वहां केवल सामान्य मेडिकल स्टोर का संचालन नहीं हो रहा था बल्कि मरीजों के इलाज और भर्ती की व्यवस्था भी बनाई गई थी। स्वास्थ्य विभाग की टीम ने संचालक से अस्पताल के पंजीयन सहित अन्य जरूरी दस्तावेज मांगे लेकिन मौके पर संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए जा सके। इसके बाद विभाग ने एएस अस्पताल के साथ धाकड़ मेडिकल स्टोर को भी सील कर दिया।

    इसके बाद स्वास्थ्य विभाग की टीम कटरा मोहल्ले में स्थित गोपाल मेडिकल स्टोर पहुंची। यहां भी जांच के दौरान मेडिकल स्टोर के पास बने कमरों में अस्पताल जैसी व्यवस्था दिखाई दी। इन कमरों में मरीजों को भर्ती करने के लिए पलंग मौजूद थे। इसके अलावा मरीजों को बोतल चढ़ाने और इलाज करने की व्यवस्था भी मिली। स्वास्थ्य विभाग ने इस संबंध में संचालक रंजन अधिकारी से अस्पताल के पंजीयन से जुड़े दस्तावेज मांगे लेकिन वह भी जरूरी कागजात टीम के सामने प्रस्तुत नहीं कर सके।

    दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने गोपाल मेडिकल स्टोर और उसके पास संचालित हो रहे अस्पताल को भी सील कर दिया। विभाग की इस कार्रवाई के बाद इलाके में बिना अनुमति या पंजीयन के स्वास्थ्य सेवाएं संचालित करने वालों में हड़कंप मचा हुआ है।

    मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. संजय ऋषीश्वर ने बताया कि कलेक्टर के निर्देश पर जिले में अवैध स्वास्थ्य संस्थानों की लगातार जांच की जा रही है। विभाग का उद्देश्य ऐसे संस्थानों पर कार्रवाई करना है जहां नियमों का पालन किए बिना मरीजों का इलाज किया जा रहा है। कार्रवाई करने वाली टीम में खंड चिकित्सा अधिकारी कोलारस डॉ. संजय राठौड़ और फार्मासिस्ट बालेंदु रघुवंशी भी शामिल रहे।

    स्वास्थ्य विभाग की इस कार्रवाई से यह सवाल भी सामने आया है कि बिना पंजीयन और आवश्यक दस्तावेजों के मरीजों के इलाज तथा भर्ती की व्यवस्था किस तरह संचालित हो रही थी। विभाग अब जिले के अन्य क्षेत्रों में भी इसी तरह की जांच जारी रखने की तैयारी में है।

  • अस्पताल दूर टीकाकरण अधूरा और कुपोषण का संकट, बालाघाट में बैगा बच्चों की मौत ने खोली सिस्टम की पोल

    अस्पताल दूर टीकाकरण अधूरा और कुपोषण का संकट, बालाघाट में बैगा बच्चों की मौत ने खोली सिस्टम की पोल


    भोपाल । मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के बिरसा ब्लॉक में बैगा आदिवासी परिवारों के बच्चों की मौत का मामला स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। प्रभावित गांवों में बच्चों के बीमार पड़ने और मौतों की खबर सामने आने के बाद सरकारी टीमें सक्रिय हुईं लेकिन बीमारी के कारण और मृतकों की संख्या को लेकर सरकारी दावे और स्थानीय स्तर पर किए जा रहे दावों में अंतर दिखाई दे रहा है। जिला प्रशासन के अनुसार आठ बच्चों की मौत हुई है जबकि स्थानीय कांग्रेस विधायक संजय उइके ने 20 बच्चों की मौत का दावा किया है। उन्होंने मृत बच्चों की सूची होने और कई परिवारों को लंबे समय तक राशन नहीं मिलने की बात भी कही है।

    बिरसा ब्लॉक के बैगा बहुल इलाकों में कुंडेकसा अडोरी कोरका और बांदरी समेत कई गांवों में बड़ी संख्या में बच्चे बीमार हुए। बच्चों में बुखार सर्दी खांसी दस्त त्वचा संबंधी समस्या और मिजल्स जैसे लक्षण सामने आए। स्वास्थ्य विभाग ने बाद में घर घर सर्वे शुरू किया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 14 अगस्त तक 140 प्रभावित बच्चों में से 100 स्वस्थ होकर घर लौट चुके थे जबकि 40 बच्चों का उपचार चल रहा था। स्वास्थ्य टीमों ने बच्चों को विटामिन ए ओआरएस आयरन सिरप और अन्य जरूरी दवाएं भी दीं।

    इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच को लेकर उठ रहा है। प्रभावित आदिवासी गांव बेहद दुर्गम इलाकों में स्थित हैं और कई जगह अस्पताल तथा स्वास्थ्य केंद्र काफी दूर हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक कुछ इलाकों में निकटतम अस्पताल करीब 70 किलोमीटर दूर है। ऐसे में गंभीर हालत में बच्चों को समय पर अस्पताल पहुंचाना परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। कई परिवार पारंपरिक उपचार और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध साधनों पर निर्भर रहते हैं जिससे अस्पताल पहुंचने में और देरी हो सकती है।

    दूसरी बड़ी चिंता कुपोषण की है। प्रभावित क्षेत्र के आंगनवाड़ी केंद्रों में किए गए वजन परीक्षण में बड़ी संख्या में बच्चे सामान्य से कम वजन के पाए गए। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार जुलाई में 28 आंगनवाड़ी केंद्रों में छह साल से कम उम्र के 1149 बच्चों का वजन किया गया। इनमें 213 बच्चे मध्यम रूप से कम वजन वाले और 18 बच्चे गंभीर रूप से कम वजन वाले पाए गए। यानी पोषण संकट बीमारी के साथ बच्चों की स्थिति को और गंभीर बना रहा था।

    टीकाकरण को लेकर भी सवाल सामने आए हैं। मिजल्स से बचाव के लिए टीकाकरण बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है लेकिन दूरदराज के गांवों में वैक्सीनेशन कवरेज और स्वास्थ्य कर्मियों की नियमित पहुंच को लेकर स्थानीय स्तर पर शिकायतें सामने आई हैं। स्वास्थ्य विभाग ने बाद में प्रभावित इलाकों में सर्वेक्षण टीमों की संख्या बढ़ाई और घर घर जाकर बच्चों की जांच शुरू की। 14 अगस्त तक 20 सर्वेक्षण टीमें सक्रिय थीं और सैकड़ों लोगों की जांच की जा चुकी थी।

    सरकार की ओर से बीमारी को किसी रहस्यमयी बीमारी के बजाय मौसमी संक्रमणों से जोड़कर देखा गया है। स्वास्थ्य अधिकारियों ने कहा है कि कई मामलों में मलेरिया और मिजल्स जैसे लक्षण पाए गए हैं। आईसीएमआर और नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल की टीमें भी क्षेत्र में पहुंचकर स्थिति का आकलन कर चुकी हैं। प्रशासन ने पानी के स्रोतों को सैनिटाइज करने सफाई अभियान चलाने और मच्छरों के नियंत्रण के लिए फॉगिंग तथा एंटी लार्वा गतिविधियां शुरू की हैं।

    प्रशासन ने अब प्रभावित गांवों में निगरानी बढ़ा दी है। घर घर स्वास्थ्य जांच के साथ बीमार बच्चों को अस्पताल पहुंचाया जा रहा है और पोषण तथा राशन की व्यवस्था पर भी ध्यान दिया जा रहा है। प्रशासन की ओर से यह भी बताया गया है कि कई बच्चों को उपचार के बाद स्वस्थ होने पर घर भेजा जा चुका है।

    हालांकि मौतों की वास्तविक संख्या और उनके कारण को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होने तक किसी एक बीमारी को सभी मौतों का निश्चित कारण बताना जल्दबाजी होगी। फिलहाल यह मामला सिर्फ बीमारी का नहीं बल्कि दूरदराज आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच पोषण टीकाकरण और समय पर निगरानी की व्यवस्था का भी बड़ा सवाल बन चुका है। बैगा जैसे विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूह के बच्चों तक सरकारी योजनाओं का लाभ समय पर पहुंचाना इस संकट से निकलने की सबसे बड़ी चुनौती है।

  • एंटी-रेबीज के लिए उमड़ी भीड़: Satna जिला अस्पताल में हड़कंप

    एंटी-रेबीज के लिए उमड़ी भीड़: Satna जिला अस्पताल में हड़कंप


    नई दिल्ली । Satna शहर में बुधवार शाम एक खौफनाक घटना ने लोगों को दहशत में डाल दिया। एक आक्रामक स्ट्रीट डॉग ने महज तीन घंटे के भीतर करीब 40 लोगों को काट लिया। इस घटना के बाद रीवा रोड से लेकर अस्पताल चौराहा तक हड़कंप मच गया। घायलों को तत्काल जिला अस्पताल पहुंचाया गया, जहां एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगवाने के लिए भारी भीड़ उमड़ पड़ी।
     गहरानाला से शुरू हुआ हमला, शहरभर में फैला डर
    प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, शाम करीब 4 बजे गहरानाला इलाके में एक सफेद रंग का कुत्ता अचानक हिंसक हो गया और राहगीरों पर हमला करने लगा। शुरुआत में लोगों ने इसे सामान्य घटना समझा, लेकिन जैसे-जैसे हमलों की संख्या बढ़ती गई, हालात गंभीर होते गए। कुत्ते ने गहरानाला से माहेश्वरी स्वीट्स तक 20-25 लोगों को काटा, फिर खेरमाई रोड, खोवा मंडी और अस्पताल चौराहे होते हुए रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ गया।
     अस्पताल में लगी लंबी कतारें, 3 घंटे बढ़ाया गया समय
    घटना के बाद शाम 5:30 बजे से घायलों का जिला अस्पताल पहुंचना शुरू हुआ। देखते ही देखते इंजेक्शन कक्ष मरीजों से भर गया। स्थिति को संभालने के लिए अस्पताल प्रबंधन ने इंजेक्शन कक्ष को निर्धारित समय से लगभग तीन घंटे अधिक, रात 7:30 बजे तक खुला रखा। सभी घायलों को एंटी-रेबीज वैक्सीन (ARV) लगाई गई। पीड़ितों में 25 से 60 वर्ष तक के लोग शामिल हैं। राहत की बात यह रही कि इस घटना में कोई बच्चा घायल नहीं हुआ।
     गंभीर घायलों को लगाया गया इम्युनोग्लोब्युलिन
    करीब 25 लोगों को गंभीर चोटें आईं, जिनके हाथ-पैरों में गहरे घाव हो गए। डॉक्टरों के अनुसार ऐसे मामलों में केवल एंटी-रेबीज इंजेक्शन पर्याप्त नहीं होता, इसलिए वार्ड क्रमांक-10 में मरीजों को इम्युनोग्लोब्युलिन इंजेक्शन भी दिया गया। यह संक्रमण के उच्च खतरे को कम करने के लिए जरूरी होता है।
    डॉक्टरों की अपील और प्रशासन पर सवाल
    जिला अस्पताल के आरएमओ डॉ. शरद दुबे ने बताया कि सभी घायलों का इलाज किया गया है और आवश्यक दवाएं उपलब्ध कराई गई हैं। हालांकि, इस घटना ने शहर में आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या और नगर निगम की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
     शहर में दहशत का माहौल
    नीरज मिश्रा, धर्मेंद्र सिंह, वंदना केशरवानी, अब्दुल सलीम समेत कई लोग इस हमले का शिकार हुए। घटना के बाद लोग सड़कों से हटकर दुकानों और घरों में छिपने को मजबूर हो गए। फिलहाल इलाके में डर का माहौल बना हुआ है और लोग प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।