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  • अस्पताल दूर टीकाकरण अधूरा और कुपोषण का संकट, बालाघाट में बैगा बच्चों की मौत ने खोली सिस्टम की पोल

    अस्पताल दूर टीकाकरण अधूरा और कुपोषण का संकट, बालाघाट में बैगा बच्चों की मौत ने खोली सिस्टम की पोल


    भोपाल । मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के बिरसा ब्लॉक में बैगा आदिवासी परिवारों के बच्चों की मौत का मामला स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। प्रभावित गांवों में बच्चों के बीमार पड़ने और मौतों की खबर सामने आने के बाद सरकारी टीमें सक्रिय हुईं लेकिन बीमारी के कारण और मृतकों की संख्या को लेकर सरकारी दावे और स्थानीय स्तर पर किए जा रहे दावों में अंतर दिखाई दे रहा है। जिला प्रशासन के अनुसार आठ बच्चों की मौत हुई है जबकि स्थानीय कांग्रेस विधायक संजय उइके ने 20 बच्चों की मौत का दावा किया है। उन्होंने मृत बच्चों की सूची होने और कई परिवारों को लंबे समय तक राशन नहीं मिलने की बात भी कही है।

    बिरसा ब्लॉक के बैगा बहुल इलाकों में कुंडेकसा अडोरी कोरका और बांदरी समेत कई गांवों में बड़ी संख्या में बच्चे बीमार हुए। बच्चों में बुखार सर्दी खांसी दस्त त्वचा संबंधी समस्या और मिजल्स जैसे लक्षण सामने आए। स्वास्थ्य विभाग ने बाद में घर घर सर्वे शुरू किया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 14 अगस्त तक 140 प्रभावित बच्चों में से 100 स्वस्थ होकर घर लौट चुके थे जबकि 40 बच्चों का उपचार चल रहा था। स्वास्थ्य टीमों ने बच्चों को विटामिन ए ओआरएस आयरन सिरप और अन्य जरूरी दवाएं भी दीं।

    इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच को लेकर उठ रहा है। प्रभावित आदिवासी गांव बेहद दुर्गम इलाकों में स्थित हैं और कई जगह अस्पताल तथा स्वास्थ्य केंद्र काफी दूर हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक कुछ इलाकों में निकटतम अस्पताल करीब 70 किलोमीटर दूर है। ऐसे में गंभीर हालत में बच्चों को समय पर अस्पताल पहुंचाना परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। कई परिवार पारंपरिक उपचार और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध साधनों पर निर्भर रहते हैं जिससे अस्पताल पहुंचने में और देरी हो सकती है।

    दूसरी बड़ी चिंता कुपोषण की है। प्रभावित क्षेत्र के आंगनवाड़ी केंद्रों में किए गए वजन परीक्षण में बड़ी संख्या में बच्चे सामान्य से कम वजन के पाए गए। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार जुलाई में 28 आंगनवाड़ी केंद्रों में छह साल से कम उम्र के 1149 बच्चों का वजन किया गया। इनमें 213 बच्चे मध्यम रूप से कम वजन वाले और 18 बच्चे गंभीर रूप से कम वजन वाले पाए गए। यानी पोषण संकट बीमारी के साथ बच्चों की स्थिति को और गंभीर बना रहा था।

    टीकाकरण को लेकर भी सवाल सामने आए हैं। मिजल्स से बचाव के लिए टीकाकरण बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है लेकिन दूरदराज के गांवों में वैक्सीनेशन कवरेज और स्वास्थ्य कर्मियों की नियमित पहुंच को लेकर स्थानीय स्तर पर शिकायतें सामने आई हैं। स्वास्थ्य विभाग ने बाद में प्रभावित इलाकों में सर्वेक्षण टीमों की संख्या बढ़ाई और घर घर जाकर बच्चों की जांच शुरू की। 14 अगस्त तक 20 सर्वेक्षण टीमें सक्रिय थीं और सैकड़ों लोगों की जांच की जा चुकी थी।

    सरकार की ओर से बीमारी को किसी रहस्यमयी बीमारी के बजाय मौसमी संक्रमणों से जोड़कर देखा गया है। स्वास्थ्य अधिकारियों ने कहा है कि कई मामलों में मलेरिया और मिजल्स जैसे लक्षण पाए गए हैं। आईसीएमआर और नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल की टीमें भी क्षेत्र में पहुंचकर स्थिति का आकलन कर चुकी हैं। प्रशासन ने पानी के स्रोतों को सैनिटाइज करने सफाई अभियान चलाने और मच्छरों के नियंत्रण के लिए फॉगिंग तथा एंटी लार्वा गतिविधियां शुरू की हैं।

    प्रशासन ने अब प्रभावित गांवों में निगरानी बढ़ा दी है। घर घर स्वास्थ्य जांच के साथ बीमार बच्चों को अस्पताल पहुंचाया जा रहा है और पोषण तथा राशन की व्यवस्था पर भी ध्यान दिया जा रहा है। प्रशासन की ओर से यह भी बताया गया है कि कई बच्चों को उपचार के बाद स्वस्थ होने पर घर भेजा जा चुका है।

    हालांकि मौतों की वास्तविक संख्या और उनके कारण को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होने तक किसी एक बीमारी को सभी मौतों का निश्चित कारण बताना जल्दबाजी होगी। फिलहाल यह मामला सिर्फ बीमारी का नहीं बल्कि दूरदराज आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच पोषण टीकाकरण और समय पर निगरानी की व्यवस्था का भी बड़ा सवाल बन चुका है। बैगा जैसे विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूह के बच्चों तक सरकारी योजनाओं का लाभ समय पर पहुंचाना इस संकट से निकलने की सबसे बड़ी चुनौती है।

  • एंटी-रेबीज के लिए उमड़ी भीड़: Satna जिला अस्पताल में हड़कंप

    एंटी-रेबीज के लिए उमड़ी भीड़: Satna जिला अस्पताल में हड़कंप


    नई दिल्ली । Satna शहर में बुधवार शाम एक खौफनाक घटना ने लोगों को दहशत में डाल दिया। एक आक्रामक स्ट्रीट डॉग ने महज तीन घंटे के भीतर करीब 40 लोगों को काट लिया। इस घटना के बाद रीवा रोड से लेकर अस्पताल चौराहा तक हड़कंप मच गया। घायलों को तत्काल जिला अस्पताल पहुंचाया गया, जहां एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगवाने के लिए भारी भीड़ उमड़ पड़ी।
     गहरानाला से शुरू हुआ हमला, शहरभर में फैला डर
    प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, शाम करीब 4 बजे गहरानाला इलाके में एक सफेद रंग का कुत्ता अचानक हिंसक हो गया और राहगीरों पर हमला करने लगा। शुरुआत में लोगों ने इसे सामान्य घटना समझा, लेकिन जैसे-जैसे हमलों की संख्या बढ़ती गई, हालात गंभीर होते गए। कुत्ते ने गहरानाला से माहेश्वरी स्वीट्स तक 20-25 लोगों को काटा, फिर खेरमाई रोड, खोवा मंडी और अस्पताल चौराहे होते हुए रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ गया।
     अस्पताल में लगी लंबी कतारें, 3 घंटे बढ़ाया गया समय
    घटना के बाद शाम 5:30 बजे से घायलों का जिला अस्पताल पहुंचना शुरू हुआ। देखते ही देखते इंजेक्शन कक्ष मरीजों से भर गया। स्थिति को संभालने के लिए अस्पताल प्रबंधन ने इंजेक्शन कक्ष को निर्धारित समय से लगभग तीन घंटे अधिक, रात 7:30 बजे तक खुला रखा। सभी घायलों को एंटी-रेबीज वैक्सीन (ARV) लगाई गई। पीड़ितों में 25 से 60 वर्ष तक के लोग शामिल हैं। राहत की बात यह रही कि इस घटना में कोई बच्चा घायल नहीं हुआ।
     गंभीर घायलों को लगाया गया इम्युनोग्लोब्युलिन
    करीब 25 लोगों को गंभीर चोटें आईं, जिनके हाथ-पैरों में गहरे घाव हो गए। डॉक्टरों के अनुसार ऐसे मामलों में केवल एंटी-रेबीज इंजेक्शन पर्याप्त नहीं होता, इसलिए वार्ड क्रमांक-10 में मरीजों को इम्युनोग्लोब्युलिन इंजेक्शन भी दिया गया। यह संक्रमण के उच्च खतरे को कम करने के लिए जरूरी होता है।
    डॉक्टरों की अपील और प्रशासन पर सवाल
    जिला अस्पताल के आरएमओ डॉ. शरद दुबे ने बताया कि सभी घायलों का इलाज किया गया है और आवश्यक दवाएं उपलब्ध कराई गई हैं। हालांकि, इस घटना ने शहर में आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या और नगर निगम की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
     शहर में दहशत का माहौल
    नीरज मिश्रा, धर्मेंद्र सिंह, वंदना केशरवानी, अब्दुल सलीम समेत कई लोग इस हमले का शिकार हुए। घटना के बाद लोग सड़कों से हटकर दुकानों और घरों में छिपने को मजबूर हो गए। फिलहाल इलाके में डर का माहौल बना हुआ है और लोग प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।