Tag: Madhya Pradesh Tourism

  • पर्यटन मानचित्र पर चमकेगा विदिशा का उदयपुर: सरकार ने दी 'विरासत गांव' की सौगात, चार प्राचीन धरोहरें राज्य संरक्षित घोषित

    पर्यटन मानचित्र पर चमकेगा विदिशा का उदयपुर: सरकार ने दी 'विरासत गांव' की सौगात, चार प्राचीन धरोहरें राज्य संरक्षित घोषित


    विदिशा । मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक और पुरातात्विक विरासत में अब एक और सुनहरा अध्याय जुड़ने जा रहा है। विदिशा जिले की गंजबसौदा तहसील में स्थित ऐतिहासिक गांव ‘उदयपुर’ को मध्य प्रदेश सरकार ने ‘विरासत गांव  के तौर पर विकसित करने का बड़ा फैसला लिया है। यह कदम न केवल इस प्राचीन क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित करेगा, बल्कि इसे देश के प्रमुख पर्यटन केंद्रों की सूची में भी अग्रणी स्थान दिलाएगा।

    उदयपुर अपनी भव्य स्थापत्य कला और समृद्ध इतिहास के लिए दुनिया भर के पुरातत्व प्रेमियों के बीच प्रसिद्ध है। यहाँ का भव्य ‘नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर’ पहले से ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित राष्ट्रीय स्मारक है। अब इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए संचालनालय पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय ने गांव की चार अन्य महत्वपूर्ण धरोहरों को ‘राज्य संरक्षित स्मारक’ के रूप में अधिसूचित कर दिया है। सरकार की इस योजना के तहत उदयसागर तालाब, प्राचीन गणेश मंदिर और ऐतिहासिक बावड़ी जैसे स्थलों का विशेष जीर्णोद्धार और संरक्षण किया जाएगा।

    विरासत गांव के तौर पर विकसित होने से यहाँ बुनियादी सुविधाओं का विस्तार होगा, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। सरकार का लक्ष्य यहाँ आने वाले पर्यटकों को मध्य प्रदेश की पौराणिक और शिवकालीन वास्तुकला से रूबरू कराना है। विशेषज्ञों का मानना है कि गंजबसौदा के उदयपुर में वो तमाम खूबियाँ मौजूद हैं जो इसे खजुराहो या ओरछा जैसी पहचान दिला सकती हैं। संरक्षण की इस पहल से उदयपुर की प्राचीन गलियां, मंदिर और जल संरचनाएं एक बार फिर अपने पुराने वैभव को प्राप्त कर सकेंगी।

  • खजुराहो में आकार ले रहा ‘विरासत वन’, 17 एकड़ में प्रकृति-संस्कृति का अनूठा संगम; बंगाल के कलाकार गढ़ रहे जीवंत मूर्तियां

    खजुराहो में आकार ले रहा ‘विरासत वन’, 17 एकड़ में प्रकृति-संस्कृति का अनूठा संगम; बंगाल के कलाकार गढ़ रहे जीवंत मूर्तियां


    खजुराहो /पर्यटन नगरी खजुराहो अब केवल अपने विश्वप्रसिद्ध मंदिरों के लिए ही नहीं बल्कि प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण की एक अनूठी पहल के लिए भी पहचानी जाने वाली है। खजुराहो के खर्रोही क्षेत्र में 17 एकड़ भूमि पर विरासत वन विकसित किया जा रहा है जो हरियाली जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण बनेगा। यह वन खास तौर पर बच्चों और युवाओं को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है ताकि वे घूमते-घूमते जंगल पर्यावरण और प्रकृति के महत्व को खुद समझ सकें।

    विरासत वन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे पारंपरिक उद्यान की तरह नहीं बल्कि एक लिविंग क्लासरूम के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहां लगाए गए पेड़-पौधे वन्यजीवों की आकृतियां और थीम आधारित वन क्षेत्र बच्चों को किताबों से बाहर निकलकर सीखने का अवसर देंगे। वन विभाग की इस पहल के तहत एक समय के बंजर भू-भाग को हरित स्वरूप में बदल दिया गया है जो अब पर्यावरण संरक्षण का मिसाल बन रहा है।विरासत वन में आधुनिक तकनीक का भी खास इस्तेमाल किया गया है। यहां पेड़ों और प्रमुख स्थलों पर क्यूआर कोड लगाए गए हैं। जैसे ही कोई बच्चा या पर्यटक क्यूआर कोड स्कैन करेगा उससे जुड़ी जानकारी सीधे मोबाइल स्क्रीन पर आ जाएगी। इसमें उस पेड़ या पौधे का नाम उसकी प्रजाति औषधीय गुण पर्यावरण में भूमिका और उससे जुड़े रोचक तथ्य डिजिटल रूप में उपलब्ध होंगे। इससे बच्चों में तकनीक के माध्यम से सीखने की रुचि भी बढ़ेगी।

    इस वन को और आकर्षक बनाने के लिए जंगल के जानवरों की जीवंत मूर्तियां भी स्थापित की जा रही हैं। खास बात यह है कि इन मूर्तियों को अंतिम रूप देने के लिए बंगाल से आए अनुभवी कलाकार काम कर रहे हैं। कलाकारों द्वारा बनाई जा रही ये मूर्तियां इतनी वास्तविक होंगी कि देखने वालों को जंगल में होने का अहसास कराएंगी। अधिकारियों के अनुसार इस मूर्तिकला का लगभग 90 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है और जल्द ही यह वन पूरी तरह तैयार होकर लोगों के लिए खोल दिया जाएगा।विरासत वन में 200 से अधिक प्रजातियों के 25 हजार से ज्यादा पौधे लगाए गए हैं। यहां अलग-अलग विषयों पर आधारित वन विकसित किए गए हैं जिनमें नवग्रह वन नक्षत्र वन सप्तऋषि वन लक्ष्मी वन औषधीय वन और जैव विविधता वन शामिल हैं। हर वन का अपना अलग महत्व और उद्देश्य है जिससे भारतीय संस्कृति ज्योतिष आयुर्वेद और प्रकृति के गहरे संबंध को समझा जा सके।

    वन विभाग का मानना है कि विरासत वन न केवल पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में मदद करेगा बल्कि पर्यटन को भी नया आयाम देगा। खजुराहो आने वाले पर्यटक अब मंदिरों के साथ-साथ प्रकृति और पर्यावरण से जुड़े इस विशेष केंद्र का भी अनुभव ले सकेंगे। यह पहल आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाने और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने में अहम भूमिका निभाएगी।