Tag: Middle East conflict

  • दक्षिणी लेबनान में हिज्बुल्लाह की विशाल सुरंग का खुलासा, 50 ईरानी ड्रोन और भारी हथियार बरामद

    दक्षिणी लेबनान में हिज्बुल्लाह की विशाल सुरंग का खुलासा, 50 ईरानी ड्रोन और भारी हथियार बरामद


    नई दिल्ली। इजरायल डिफेंस फोर्सेज IDF ने दक्षिणी लेबनान के माजदल जौन क्षेत्र में हिज्बुल्लाह के एक बड़े भूमिगत नेटवर्क का खुलासा करने का दावा किया है। सेना के अनुसार, गांव के नीचे करीब 200 मीटर लंबी और 29 मीटर गहरी सुरंग मिली है, जिसमें बड़ी मात्रा में हथियार, एंटी-टैंक मिसाइलें और 50 ईरानी निर्मित विस्फोटक ड्रोन बरामद किए गए हैं।

    IDF ने बताया कि यह कार्रवाई 2026 के युद्धविराम (सीजफायर) के दौरान चलाए जा रहे सुरक्षा अभियान के तहत की गई। पिछले सप्ताह 551वीं ब्रिगेड और विशेष याहलोम यूनिट ने इलाके में सर्च ऑपरेशन चलाया, जिसमें 20 से अधिक हिज्बुल्लाह लड़ाकों को मार गिराने का दावा किया गया। सेना ने सुरंग के आसपास मौजूद कई अन्य ठिकानों को भी ध्वस्त कर दिया।

    सुरंग में मौजूद थीं हमले की पूरी तैयारियां

    सेना के मुताबिक, सुरंग को इस तरह तैयार किया गया था कि आतंकी लंबे समय तक इसमें रह सकें। अंदर रहने के लिए कमरे बनाए गए थे और इजरायल की दिशा में लॉन्च शाफ्ट स्थापित किए गए थे। यहां से रॉकेट और मिसाइल हमलों को अंजाम देने की योजना बनाई गई थी। बरामद किए गए 50 सुसाइड ड्रोन और एंटी-टैंक मिसाइलें संभावित हमले की तैयारियों की ओर संकेत करती हैं।

    ईरानी मदद से निर्माण का दावा

    IDF का कहना है कि यह सुरंग नेटवर्क पिछले एक दशक में ईरानी वित्तीय और सैन्य सहायता के जरिए तैयार किया गया। सेना के अनुसार, सुरंगों को जानबूझकर आबादी वाले क्षेत्रों के नीचे बनाया गया था और इनके कुछ हिस्से गांव की मस्जिद के आसपास भी जुड़े हुए थे। इजरायल ने आरोप लगाया है कि हिज्बुल्लाह नागरिक क्षेत्रों का इस्तेमाल अपनी सैन्य गतिविधियों को छिपाने के लिए करता रहा है।

    नागरिक इलाकों के नीचे हथियारों का जखीरा
    ऑपरेशन के दौरान जारी किए गए वीडियो में सुरंग के भीतर हथियारों के भंडार, ड्रोन और रहने की व्यवस्थाएं दिखाई गई हैं। इजरायल का दावा है कि इन संरचनाओं को स्कूलों, अस्पतालों और धार्मिक स्थलों के आसपास विकसित किया गया, जिससे स्थानीय नागरिकों की सुरक्षा पर भी खतरा पैदा हो सकता था।

    सीजफायर के बीच बढ़ा तनाव

    इजरायल का आरोप है कि युद्धविराम के बावजूद हिज्बुल्लाह अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने में जुटा हुआ था। दूसरी ओर, लेबनान लगातार इजरायली सैन्य अभियानों पर सवाल उठाता रहा है। इस ताजा घटनाक्रम ने क्षेत्र में लागू सीजफायर की प्रभावशीलता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

    आगे भी जारी रहेगा अभियान

    IDF के प्रवक्ता ने कहा कि दक्षिणी लेबनान में तलाशी अभियान आगे भी जारी रहेगा। सेना का लक्ष्य सीमा क्षेत्र के आसपास मौजूद सभी संभावित सुरंगों और आतंकी ठिकानों का पता लगाकर उन्हें निष्क्रिय करना है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इजरायल की सुरक्षा को खतरा पहुंचाने की कोई नई कोशिश हुई तो सेना और कड़ी कार्रवाई करेगी।

  • घर लौटने से पहले छिन गई जिंदगी, फ्लाइट का इंतजार कर रहे उज्जैन के मंजूर अहमद हमले का शिकार

    घर लौटने से पहले छिन गई जिंदगी, फ्लाइट का इंतजार कर रहे उज्जैन के मंजूर अहमद हमले का शिकार


    मध्य प्रदेश । उज्जैन के राज रॉयल कॉलोनी निवासी मंजूर अहमद (50) की मौत की खबर ने पूरे परिवार और इलाके को गहरे सदमे में डाल दिया है। कुवैत अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल-1 पर हुए ड्रोन और मिसाइल हमले में उनकी जान चली गई। घटना में 63 अन्य लोग घायल हुए हैं और एयरपोर्ट के यात्री टर्मिनल को भारी नुकसान पहुंचा है।

    परिजनों के अनुसार मंजूर अहमद अपने भांजे की शादी में शामिल होने भारत आने वाले थे। उनकी 3 जून को कुवैत से मुंबई की फ्लाइट थी और 4 जून की सुबह उन्हें उज्जैन पहुंचना था। परिवार के सदस्य उनकी अगवानी के लिए तैयारियां कर रहे थे, लेकिन इसी बीच यह दुखद खबर आ गई।

    मंजूर अहमद के बेटे मोहम्मद अनस ने बताया कि मंगलवार शाम उनकी पिता से आखिरी बार बातचीत हुई थी। उन्होंने बताया था कि वे कुवैत से मुंबई पहुंचेंगे और वहां से ट्रेन के जरिए नागदा आएंगे। परिवार के लोग उन्हें लेने जाने वाले थे। किसी ने नहीं सोचा था कि यह उनकी आखिरी बातचीत साबित होगी।

    बताया जाता है कि मंजूर अहमद फ्लाइट पकड़ने के लिए कुवैत एयरपोर्ट के टर्मिनल-1 पर मौजूद थे। इसी दौरान एयरपोर्ट पर ड्रोन और मिसाइल हमला हुआ। हमले में टर्मिनल को गंभीर नुकसान पहुंचा और मंजूर अहमद की मौके पर ही मौत हो गई।

    परिवार के इकलौते कमाने वाले थे
    मंजूर अहमद पिछले करीब 30 वर्षों से खाड़ी देश में रहकर काम कर रहे थे। परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी पूरी तरह उन्हीं के कंधों पर थी। उनके परिवार में पत्नी, दो बेटियां और एक बेटा हैं, जो अभी पढ़ाई कर रहे हैं। बेहतर भविष्य और बच्चों की शिक्षा के लिए उन्होंने वर्षों तक घर से दूर रहकर मेहनत की।

    परिजनों के मुताबिक वे आखिरी बार अक्टूबर 2025 में उज्जैन आए थे। उस समय उन्होंने परिवार से कहा था कि अब वे पहले की तुलना में अधिक बार घर आया करेंगे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

    शव भारत लाने की प्रक्रिया शुरू
    परिवार के सदस्य मोहम्मद सलीम ने बताया कि मंजूर अहमद का पार्थिव शरीर भारत लाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। उम्मीद है कि शव कुवैत से अहमदाबाद पहुंचेगा, जहां से सड़क मार्ग के जरिए उज्जैन लाया जाएगा। सभी औपचारिकताएं समय पर पूरी होने पर अंतिम संस्कार शुक्रवार को किया जा सकता है।

    भारत ने हमले की निंदा की
    भारत सरकार और भारतीय दूतावास ने इस घटना पर गहरा दुख व्यक्त किया है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि नागरिकों और नागरिक सुविधाओं को निशाना बनाना अस्वीकार्य है तथा सभी पक्षों से ऐसे हमले रोकने की अपील की है। भारतीय दूतावास भी पीड़ित परिवार के संपर्क में है और आवश्यक सहायता उपलब्ध करा रहा है।

  • ईरान–अमेरिका तनाव फिर बढ़ा: MQ-9 ड्रोन गिराने का दावा, सीजफायर उल्लंघन पर दी कड़ी चेतावनी

    ईरान–अमेरिका तनाव फिर बढ़ा: MQ-9 ड्रोन गिराने का दावा, सीजफायर उल्लंघन पर दी कड़ी चेतावनी




    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया है कि उसने अमेरिकी सेना के एक MQ-9 रीपर ड्रोन को मार गिराया है। ईरान का कहना है कि यह ड्रोन उसके हवाई क्षेत्र में घुस आया था।

    यह घटनाक्रम उस समय सामने आया जब क्षेत्र में अस्थायी संघर्ष विराम (सीजफायर) लागू बताया जा रहा है और इसी दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) के पास सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं।

    ईरान का दावा और कड़ी चेतावनी
    ईरान की मीडिया एजेंसी मेहर न्यूज के अनुसार, IRGC ने कहा कि अमेरिकी ड्रोन उसकी सीमा में प्रवेश कर रहा था, जिसके बाद उसे निशाना बनाकर मार गिराया गया। साथ ही ईरान ने अमेरिका को चेतावनी दी है कि यदि सीजफायर का उल्लंघन दोबारा किया गया तो इसका “कड़ा और निर्णायक जवाब” दिया जाएगा।ईरान ने यह भी कहा कि उसकी सुरक्षा और संप्रभुता का उल्लंघन किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

    अमेरिकी कार्रवाई का दावा
    दूसरी ओर, अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने कहा है कि उसने आत्मरक्षा में कार्रवाई की है। अमेरिकी प्रवक्ता के मुताबिक, क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैनिकों और युद्धपोतों को खतरा पैदा करने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए यह कदम उठाया गया।

    रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट के पास संदिग्ध बोट्स पर भी कार्रवाई की, जिन पर कथित तौर पर बारूदी सुरंगें बिछाने की कोशिश का आरोप था। इसके अलावा बंदर अब्बास के पास एक सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल साइट पर भी हमले की बात सामने आई है।

    चार ईरानी सैनिकों की मौत का दावा
    ईरानी मीडिया का दावा है कि अमेरिकी हमलों में रिवोल्यूशनरी गार्ड के चार सैनिकों की मौत हुई है। हालांकि इस पर स्वतंत्र रूप से आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।

    क्षेत्र में बढ़ता तनाव
    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की सैन्य गतिविधि वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी असर डाल सकती है।

    ईरान और अमेरिका के बीच पहले से ही परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर तनाव बना हुआ है। इस ताजा घटनाक्रम ने दोनों देशों के बीच हालात को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

  • इजरायल की स्थापना की ऐतिहासिक कहानी: कैसे 1948 में बना यहूदी राष्ट्र और बदला पश्चिम एशिया का नक्शा

    इजरायल की स्थापना की ऐतिहासिक कहानी: कैसे 1948 में बना यहूदी राष्ट्र और बदला पश्चिम एशिया का नक्शा

    नई दिल्ली। 14 मई 1948 को तेल अवीव में यहूदी एजेंसी के अध्यक्ष डेविड बेन-गुरियन ने इजरायल की स्वतंत्रता की घोषणा की। इसके साथ ही लगभग 2,000 वर्षों के बाद यहूदियों का एक स्वतंत्र राष्ट्र अस्तित्व में आया और बेन-गुरियन देश के पहले प्रधानमंत्री बने। उसी दिन ब्रिटिश शासन की समाप्ति के बाद क्षेत्र में तनाव और संघर्ष की स्थिति भी तेजी से बढ़ गई।

    घोषणा के तुरंत बाद ही कई अरब देशों और यहूदी समुदायों के बीच संघर्ष शुरू हो गया। उसी शाम मिस्र की ओर से हवाई हमले की खबरें सामने आईं, जिससे हालात और तनावपूर्ण हो गए। हालांकि तेल अवीव में बिजली संकट और युद्ध की आशंका के बावजूद यहूदी समुदाय ने अपने नए राष्ट्र के जन्म को ऐतिहासिक क्षण के रूप में मनाया।

    आधुनिक इजरायल की नींव 19वीं सदी के अंत में शुरू हुए ज़ायोनिस्ट आंदोलन से जुड़ी मानी जाती है। 1896 में ऑस्ट्रियाई पत्रकार थियोडोर हर्ज़ल ने अपनी पुस्तक द ज्यूइश स्टेट में यहूदी राष्ट्र की अवधारणा को मजबूत किया और 1897 में स्विट्जरलैंड में पहला ज़ायोनिस्ट कांग्रेस आयोजित किया।

    प्रथम विश्व युद्ध के बाद ओटोमन साम्राज्य के पतन के साथ ब्रिटेन ने फिलिस्तीन पर नियंत्रण स्थापित किया। 1917 की बाल्फोर घोषणा के जरिए ब्रिटेन ने यहूदी मातृभूमि के समर्थन का संकेत दिया, जिसे बाद में लीग ऑफ नेशंस के शासनादेश में शामिल किया गया।

    इसके बाद 1920 और 1930 के दशक में फिलिस्तीन में यहूदियों और अरबों के बीच तनाव बढ़ता गया। ब्रिटिश शासन ने स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश में यहूदी आप्रवासन पर कई बार रोक लगाने का प्रयास किया, लेकिन संघर्ष लगातार बढ़ता रहा।

    द्वितीय विश्व युद्ध और होलोकॉस्ट के बाद यहूदी प्रवासन में तेजी आई। युद्ध के बाद ब्रिटेन ने मामला संयुक्त राष्ट्र को सौंप दिया, जहां 1947 में फिलिस्तीन के विभाजन का प्रस्ताव पारित हुआ। इसके तहत यहूदी और अरब क्षेत्रों का अलग-अलग विभाजन तय किया गया।

    14 मई 1948 को ब्रिटिश शासन की समाप्ति के साथ ही इजरायल राज्य की आधिकारिक घोषणा की गई। अगले ही दिन मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान और इराक की सेनाओं ने इजरायल पर हमला कर दिया, जिससे पहला अरब-इजरायल युद्ध शुरू हुआ।

    कम संसाधनों के बावजूद इजरायली सेना ने संघर्ष जारी रखा और बाद में कई क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। 1949 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से युद्धविराम हुआ, जिसके बाद इजरायल की सीमाओं को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली।

    इसके बाद 1967 के छह दिवसीय युद्ध में इजरायल ने अपने क्षेत्र का और विस्तार किया। 1979 में मिस्र के साथ ऐतिहासिक शांति समझौता हुआ, जिसके तहत सिनाई प्रायद्वीप वापस किया गया। 1993 में इजरायल और फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) के बीच भी शांति समझौते की शुरुआत हुई, हालांकि क्षेत्र में तनाव और संघर्ष पूरी तरह खत्म नहीं हो सका।

    आज भी इजरायल और फिलिस्तीन के बीच विवाद और संघर्ष की स्थिति बनी हुई है, जो पश्चिम एशिया की राजनीति और वैश्विक कूटनीति को लगातार प्रभावित करता रहा है।

  • मध्य-पूर्व में बड़ा खुलासा: UAE पर ईरान हमले का आरोप, अमेरिका-ईरान तनाव और तेल संकट ने बढ़ाई वैश्विक चिंता

    मध्य-पूर्व में बड़ा खुलासा: UAE पर ईरान हमले का आरोप, अमेरिका-ईरान तनाव और तेल संकट ने बढ़ाई वैश्विक चिंता




    नई दिल्ली। ईरान और मध्य-पूर्व में चल रहे तनाव के बीच एक बड़ा खुलासा सामने आया है, जिसमें दावा किया गया है कि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने ईरान पर गुप्त सैन्य कार्रवाई की थी। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल महीने में ईरान के लावान द्वीप स्थित ऑयल रिफाइनरी को निशाना बनाया गया था। इस हमले के बाद रिफाइनरी में भीषण आग लग गई थी और उत्पादन लंबे समय तक प्रभावित रहा।

    रिपोर्ट में बताया गया है कि यह हमला अप्रैल की शुरुआत में हुआ था, उसी समय जब अमेरिका युद्धविराम की घोषणा कर रहा था। ईरान ने उस दौरान दावा किया था कि उसकी रिफाइनरी पर दुश्मन देश ने हमला किया है। इसके बाद जवाबी कार्रवाई में ईरान ने UAE और कुवैत पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए थे, जिससे क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया था। हालांकि UAE ने कभी भी इस हमले की आधिकारिक जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन उसके विदेश मंत्रालय ने यह जरूर कहा कि देश को किसी भी शत्रुतापूर्ण कार्रवाई का जवाब देने का अधिकार है, जिसमें सैन्य कार्रवाई भी शामिल हो सकती है।

    इसी बीच अमेरिका और ईरान के बीच तनावपूर्ण रिश्तों पर एक बार फिर बयानबाजी तेज हो गई है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरानी नेतृत्व को लेकर कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उन्हें “बेईमान” बताया है। ट्रम्प ने आरोप लगाया कि ईरान बातचीत को लंबा खींचता है और बार-बार अपने रुख बदलता है। उन्होंने यह भी कहा कि जिन दस्तावेजों को कुछ मिनटों में पहुंचना चाहिए, उन्हें ईरान कई दिनों तक रोककर रखता है, जिससे बातचीत की प्रक्रिया बाधित होती है।

    दूसरी ओर, अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता कई विवादित मुद्दों में उलझी हुई है। इनमें होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा, ईरानी जहाजों पर अमेरिकी प्रतिबंध, परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम प्रमुख हैं। इन मुद्दों पर दोनों देशों के बीच गहरी असहमति बनी हुई है।

    हाल के 24 घंटों में कई बड़े घटनाक्रम सामने आए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार ट्रम्प ने ईरान के नए शांति प्रस्ताव को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया है। अमेरिका ने मांग की है कि ईरान कम से कम 12 वर्षों तक यूरेनियम संवर्धन बंद करे और अपने पास मौजूद 60% एनरिच्ड यूरेनियम भी सौंप दे। इसके जवाब में तनाव और बढ़ गया है।

    इसी बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा गया है। ब्रेंट क्रूड 104 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज स्ट्रेट में संभावित बाधा और मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव ने बाजार को अस्थिर कर दिया है, क्योंकि दुनिया का लगभग 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है।

    ट्रम्प ने कहा है कि ईरान के साथ चल रहा युद्धविराम अब “बहुत कमजोर स्थिति” में पहुंच चुका है और उन्होंने ईरानी प्रस्ताव को “कूड़ा” बताते हुए अमेरिका के लिए “पूर्ण जीत” की बात कही है। वहीं ईरान ने चेतावनी दी है कि यदि फ्रांस और ब्रिटेन के युद्धपोत होर्मुज स्ट्रेट में प्रवेश करते हैं तो उसे जवाब दिया जाएगा। इससे समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ गई है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच लेबनान सीमा पर भी तनाव तेज हो गया है। हिजबुल्लाह और इजराइल के बीच संघर्ष में तेजी देखी गई है। दक्षिणी लेबनान में इजराइली एयरस्ट्राइक में 6 लोगों की मौत और 7 के घायल होने की खबर है। वहीं हिजबुल्लाह ने भी जवाबी कार्रवाई का दावा किया है, जिससे सीमा क्षेत्र में हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं।

    इसी बीच एक और रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान ने संघर्ष के दौरान ईरानी सैन्य विमानों को अपने एयरबेस पर अस्थायी रूप से जगह दी थी, ताकि उन्हें संभावित हमलों से बचाया जा सके। हालांकि पाकिस्तान ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि नूर खान एयरबेस पर बड़े पैमाने पर विमानों को छिपाना संभव नहीं है।

    कुल मिलाकर ईरान, अमेरिका और मध्य-पूर्व में हालात तेजी से बदल रहे हैं और हर दिन नए तनाव और नए खुलासे सामने आ रहे हैं, जिससे वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार दोनों पर गहरा असर पड़ रहा है।

  • ईरान-अमेरिका तनाव: शांति प्रस्ताव पर टकराव, ट्रंप ने बताया पूरी तरह अस्वीकार्य

    ईरान-अमेरिका तनाव: शांति प्रस्ताव पर टकराव, ट्रंप ने बताया पूरी तरह अस्वीकार्य



    नई दिल्ली। मध्य-पूर्व में जारी तनाव के बीच ईरान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता एक बार फिर विवादों में आ गई है। ईरान की ओर से पेश किए गए नए शांति प्रस्ताव को अमेरिकी पक्ष ने खारिज कर दिया है, जिससे क्षेत्र में कूटनीतिक स्थिति और जटिल हो गई है।

    क्या है पूरा मामला?
    रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान ने अमेरिका के सामने एक शांति प्रस्ताव रखा है, जिसमें तत्काल युद्धविराम, प्रतिबंधों में राहत और सुरक्षा गारंटी जैसी मांगें शामिल हैं। इस प्रस्ताव को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump ने “पूरी तरह अस्वीकार्य” बताया है।ईरान का कहना है कि किसी भी स्थायी शांति के लिए उसकी सुरक्षा और संप्रभुता को सम्मान देना जरूरी है।

    ईरान की प्रमुख शर्तें
    ईरान के प्रस्ताव में कई अहम मांगें शामिल बताई जा रही हैं:

    तुरंत युद्धविराम लागू किया जाए

    ईरानी बंदरगाहों पर लगी नाकेबंदी हटाई जाए

    भविष्य में ईरान पर दोबारा हमला न करने की गारंटी दी जाए

    युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा दिया जाए

    होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर ईरान की संप्रभुता स्वीकार की जाए

    अमेरिका का रुख क्यों सख्त है?
    अमेरिकी पक्ष का मानना है कि ईरान की कुछ मांगें क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए अमेरिका कुछ सैन्य और रणनीतिक शर्तों पर पहले सहमति चाहता हैईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सख्त रुख अपनाए हुए हैबिना ठोस सुरक्षा गारंटी के किसी समझौते के पक्ष में नहीं है डोनाल्ड ट्रम्प ने इस प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा कि यह अमेरिका की सुरक्षा नीति के खिलाफ है।

    इजरायल की भूमिका
    इस मुद्दे पर बेंजामिन नेतन्याहू ने भी सख्त बयान दिया है। उनका कहना है कि ईरान के संवर्धित यूरेनियम(समृद्ध यूरेनियम) को खत्म किए बिना क्षेत्र में स्थायी शांति संभव नहीं है।

    तनाव की मौजूदा स्थिति
    दोनों देशों के बीच पहले भी सीमित सैन्य तनाव देखा गया हैकुछ दौर की वार्ता और अस्थायी युद्धविराम लागू हुए थेलेकिन भरोसे की कमी के कारण स्थायी समाधान अभी भी दूर है
    ईरान का प्रस्ताव शांति और सुरक्षा गारंटी पर आधारित है, जबकि अमेरिका इसे रणनीतिक रूप से अस्वीकार्य मान रहा है। इसी टकराव के कारण मध्य-पूर्व में तनाव बरकरार है। फिलहाल स्थिति यह है कि दोनों पक्ष बातचीत के बावजूद किसी ठोस समझौते पर नहीं पहुंच पाए हैं, जिससे क्षेत्रीय शांति की राह अभी भी अनिश्चित बनी हुई है।

  • होर्मुज में टकराव चरम पर: ईरानी जहाज छोड़ा, US का रेस्क्यू मिशन शुरू, क्या बढ़ेगा युद्ध का खतरा?

    होर्मुज में टकराव चरम पर: ईरानी जहाज छोड़ा, US का रेस्क्यू मिशन शुरू, क्या बढ़ेगा युद्ध का खतरा?


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका, ईरान और चीन से जुड़ी घटनाओं ने वैश्विक राजनीति और समुद्री सुरक्षा को बेहद संवेदनशील मोड़ पर ला खड़ा किया है। हाल ही में अमेरिका ने जब्त किए गए ईरानी जहाज ‘टूस्का’ को पाकिस्तान के हवाले कर दिया है, जिससे इस पूरे विवाद में नया मोड़ आ गया है। अब इस जहाज को उसके क्रू मेंबर्स के साथ ईरान भेजा जाएगा। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक, यह फैसला ऐसे समय लिया गया है जब होर्मुज स्ट्रेट में हालात लगातार बिगड़ रहे हैं।

    दरअसल, अमेरिका ने 21 अप्रैल को इस जहाज को उस वक्त कब्जे में लिया था, जब यह चीन से लौट रहा था। अमेरिकी अधिकारियों का दावा था कि जहाज पर हथियार बनाने से जुड़ा सामान मौजूद था, जिसे ईरान ने सिरे से खारिज करते हुए इस कार्रवाई को ‘समुद्री डकैती’ करार दिया था। अब जहाज की रिहाई को कई जानकार कूटनीतिक संकेत के तौर पर भी देख रहे हैं।

    इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ के तहत होर्मुज स्ट्रेट में फंसे जहाजों को सुरक्षित बाहर निकालने का बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि कई देशों ने मदद मांगी है और अमेरिका इन जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने के लिए सोमवार से ऑपरेशन शुरू करेगा। ट्रम्प ने यह भी साफ कर दिया कि अगर इस मिशन में ईरान ने कोई रुकावट डाली, तो उसे कड़ा जवाब दिया जाएगा।

    हालांकि, ईरान ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। ईरानी सैन्य नेतृत्व ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिकी नेवी ने होर्मुज में प्रवेश करने की कोशिश की, तो उस पर हमला किया जाएगा। IRGC के पूर्व कमांडर मोहसिन रजाई ने तो यहां तक कह दिया कि यह क्षेत्र अमेरिकी सेना की “कब्रगाह” बन सकता है।

    तनाव की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि Strait of Hormuz में इस समय करीब 2,000 जहाज फंसे हुए हैं। इंटरनेशनल मैरिटाइम ऑर्गनाइजेशन के अनुसार, इन जहाजों पर करीब 20,000 नाविक मौजूद हैं, जो लगातार बिगड़ती स्थिति के बीच फंसे हुए हैं। खाने-पीने का सामान, ईंधन और जरूरी संसाधनों की कमी तेजी से बढ़ रही है।

    स्थिति को और जटिल बनाते हुए, हाल के दिनों में इस क्षेत्र में जहाजों पर हमलों की घटनाएं भी सामने आई हैं। छोटे नावों के जरिए कार्गो शिप पर हमला किया गया, जबकि अब तक कम से कम 49 जहाज अपने रास्ते बदल चुके हैं। इससे वैश्विक सप्लाई चेन और तेल बाजार पर भी असर पड़ा है। अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें बढ़कर 4.45 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई हैं।

    इस पूरे संकट के बीच एक और बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी सेना ने एक ईरानी कंटेनर जहाज से 22 क्रू मेंबर्स को पाकिस्तान के हवाले किया है, जिन्हें बाद में ईरान भेजा जाएगा। इसे मानवीय पहल के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन इससे तनाव पूरी तरह कम होता नजर नहीं आ रहा।

    उधर, वैश्विक कूटनीति भी तेजी से सक्रिय हो गई है। Xi Jinping और Donald Trump के बीच 14-15 मई को संभावित मुलाकात पर दुनिया की नजरें टिकी हैं। यह बैठक पहले अप्रैल में होनी थी, लेकिन युद्ध जैसे हालात के कारण टाल दी गई थी। चीन इस बैठक को बेहद अहम मान रहा है, क्योंकि इससे दोनों महाशक्तियों के बीच लंबे समय के लिए स्थिर संबंध बन सकते हैं।

    हालांकि, चीन के लिए सबसे बड़ी चिंता भी होर्मुज ही है, जहां से वह अपनी करीब एक-तिहाई तेल और गैस की जरूरत पूरी करता है। अगर यह समुद्री रास्ता लंबे समय तक बाधित रहता है, तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

    कुल मिलाकर, होर्मुज स्ट्रेट इस वक्त दुनिया का सबसे संवेदनशील फ्लैशपॉइंट बन चुका है, जहां एक छोटी सी चूक भी बड़े युद्ध का कारण बन सकती है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि कूटनीति हालात संभालती है या यह संकट और गहराता है।

  • अमेरिका-चीन हाई-लेवल डिप्लोमेसी पर संकट की छाया: ट्रम्प-जिनपिंग मीटिंग टली, होर्मुज तनाव से वैश्विक कूटनीति पर असर

    अमेरिका-चीन हाई-लेवल डिप्लोमेसी पर संकट की छाया: ट्रम्प-जिनपिंग मीटिंग टली, होर्मुज तनाव से वैश्विक कूटनीति पर असर


    नई दिल्ली। अमेरिका और चीन के बीच होने वाली संभावित उच्च स्तरीय बैठक को लेकर बड़ा अपडेट सामने आया है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और ईरान-हॉर्मुज संकट के बीच यह अहम मुलाकात फिलहाल टाल दी गई है। यह बैठक पहले अप्रैल में प्रस्तावित थी।

    अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping के बीच यह मुलाकात दोनों देशों के रिश्तों में स्थिरता लाने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही थी, लेकिन हालात बदलने के कारण इसे स्थगित कर दिया गया।

    चीन के लिए क्यों अहम है यह बैठक?
    चीन इस बैठक को बेहद महत्वपूर्ण अवसर मान रहा है क्योंकि यह दुनिया की दो सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्तियों के बीच लंबे समय तक स्थिर संबंध बनाने की दिशा तय कर सकती है।

    लेकिन बीजिंग के अंदर इस पर एकमत नहीं है। सरकार के भीतर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं कि मौजूदा वैश्विक तनाव के बीच आगे रणनीति क्या होनी चाहिए।

    सबसे बड़ी चिंता: होर्मुज स्ट्रेट
    सबसे गंभीर मुद्दा Strait of Hormuz को लेकर है। यह वही समुद्री मार्ग है जहां से चीन अपनी लगभग एक-तिहाई तेल और गैस आपूर्ति पूरी करता है।अगर इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या मार्ग बाधित होता है, तो इसका सीधा असर चीन की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ेगा और अमेरिका-चीन वार्ता भी प्रभावित हो सकती है।

    ट्रम्प की यात्रा पर भी असर
    चीनी अधिकारियों के अनुसार, अगर मिडिल ईस्ट संकट जारी रहता है तो ट्रम्प की संभावित चीन यात्रा सामान्य राजनयिक दौरे जैसी नहीं रह जाएगी।एक चीनी अधिकारी के मुताबिक, यह दौरा केवल द्विपक्षीय संबंधों का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन और भविष्य की अंतरराष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है।

    बड़ा संकेत क्या है?
    विशेषज्ञ मानते हैं कि यह बैठक सिर्फ एक डिप्लोमैटिक इवेंट नहीं बल्कि आने वाले वर्षों में अमेरिका-चीन रिश्तों की दिशा तय करने वाला मोड़ हो सकती है—चाहे भविष्य में किसी भी देश में सत्ता परिवर्तन क्यों न हो।

  • भू-राजनीतिक तनाव का असर, तेल कीमतों को लेकर नया वैश्विक अनुमान..

    भू-राजनीतिक तनाव का असर, तेल कीमतों को लेकर नया वैश्विक अनुमान..

    नई दिल्ली। वैश्विक ऊर्जा बाजार इस समय एक महत्वपूर्ण बदलाव के दौर से गुजर रहा है, जहां मध्यपूर्व में बढ़ते तनाव ने कच्चे तेल की आपूर्ति और कीमतों पर गहरा प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामने आए नए आकलनों में यह संकेत दिया गया है कि आने वाले समय में तेल की कीमतें पहले के अनुमान से अधिक रह सकती हैं, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।

    मध्यपूर्व लंबे समय से विश्व ऊर्जा आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है, लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने इस क्षेत्र की स्थिरता को प्रभावित किया है। तनाव बढ़ने के कारण तेल उत्पादन और परिवहन दोनों पर दबाव बढ़ा है, जिससे वैश्विक बाजार में आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता की स्थिति बन गई है। इसी अनिश्चितता ने कच्चे तेल की कीमतों में संभावित वृद्धि के संकेत दिए हैं।

    नए अनुमान के अनुसार ब्रेंट क्रूड और WTI क्रूड दोनों की औसत कीमतों में पहले की तुलना में वृद्धि देखी जा सकती है। यह बदलाव मुख्य रूप से आपूर्ति में संभावित कमी और बाजार में बढ़ते जोखिम के कारण हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वर्तमान स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो तेल भंडार में गिरावट और तेज हो सकती है, जिससे कीमतों पर और अधिक दबाव बढ़ेगा।

    तेल बाजार में इस बदलाव का एक बड़ा कारण सप्लाई चेन में आने वाली बाधाएं भी हैं। मध्यपूर्व से होने वाली सप्लाई में कमी के कारण वैश्विक भंडार स्तर में तेजी से गिरावट दर्ज की गई है। यह स्थिति ऊर्जा बाजार के संतुलन को प्रभावित कर रही है और निवेशकों के बीच चिंता बढ़ा रही है।

    हालांकि मांग की स्थिति में बहुत बड़ा बदलाव नहीं देखा गया है, लेकिन आपूर्ति में किसी भी प्रकार की बाधा सीधे कीमतों को प्रभावित कर रही है। इसी कारण बाजार में अस्थिरता का माहौल बना हुआ है और कीमतों में उतार-चढ़ाव की संभावना लगातार बनी हुई है।

    विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भू-राजनीतिक तनाव केवल अल्पकालिक प्रभाव ही नहीं डालता, बल्कि यह दीर्घकालिक निवेश और ऊर्जा रणनीतियों को भी प्रभावित करता है। यही कारण है कि वैश्विक बाजार में सतर्कता का माहौल देखा जा रहा है।

    दूसरी ओर, यदि आने वाले समय में स्थिति में सुधार होता है और आपूर्ति व्यवस्था सामान्य होती है, तो कीमतों में स्थिरता लौटने की संभावना भी मौजूद है। लेकिन फिलहाल बाजार अनिश्चितता की स्थिति में है और हर नई घटना इसका सीधा असर ऊर्जा कीमतों पर डाल रही है।

  • ईरान अमेरिका तनाव के बीच इजरायल लेबनान वार्ता क्या बदलने वाली है मध्य पूर्व की तस्वीर

    ईरान अमेरिका तनाव के बीच इजरायल लेबनान वार्ता क्या बदलने वाली है मध्य पूर्व की तस्वीर


    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में जारी भू राजनीतिक तनाव के बीच एक बड़ा कूटनीतिक घटनाक्रम सामने आया है जहां इजरायल और लेबनान के बीच करीब 33 साल बाद सीधी बातचीत शुरू हुई है। यह वार्ता ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है।

    इस पूरी बातचीत को एक बड़े कूटनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है जिसकी मध्यस्थता अमेरिका कर रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की मौजूदगी में दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत हुई।

    दरअसल इजरायल और लेबनान के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ है जिसकी एक बड़ी वजह दक्षिणी लेबनान में सक्रिय संगठन हिजबुल्लाह है। यह संगठन ईरान का समर्थक माना जाता है और समय समय पर इजरायल पर हमले करता रहा है।

    विशेष रूप से 7 अक्टूबर 2023 हमास हमला के बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया था जब हमास के हमलों के साथ ही हिजबुल्लाह ने भी इजरायल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था।

    हाल के घटनाक्रमों में अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान की स्थिति कुछ कमजोर मानी जा रही है। ऐसे में अमेरिका और इजरायल इस मौके का फायदा उठाकर क्षेत्रीय समीकरण बदलने की कोशिश में हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि लेबनान के साथ सीधी बातचीत का मकसद हिजबुल्लाह के प्रभाव को कम करना है। यदि लेबनानी सरकार इस दिशा में सख्त कदम उठाती है तो यह ईरान के लिए बड़ा झटका हो सकता है क्योंकि हिजबुल्लाह को उसका प्रमुख सहयोगी माना जाता है।

    हाल ही में लेबनान सरकार ने गैर सरकारी हथियारों को हटाने के निर्देश दिए हैं जिसकी सराहना बेंजामिन नेतन्याहू ने भी की है। यह संकेत देता है कि लेबनान धीरे धीरे हिजबुल्लाह के प्रभाव को सीमित करने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है।

    इसके साथ ही अमेरिका और इजरायल अन्य मोर्चों पर भी ईरान को घेरने की रणनीति अपना रहे हैं जिसमें समुद्री मार्गों पर दबाव बनाना भी शामिल है।हालांकि इजरायल ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका और ईरान के बीच संभावित सीजफायर का असर लेबनान पर नहीं पड़ेगा यानी दक्षिणी लेबनान में सैन्य कार्रवाई जारी रह सकती है।

    कुल मिलाकर यह वार्ता केवल दो देशों के बीच संवाद नहीं बल्कि पूरे मध्य पूर्व की राजनीति को प्रभावित करने वाला बड़ा कदम है। अगर यह बातचीत सफल होती है तो इससे क्षेत्र में लंबे समय से जारी संघर्ष की दिशा बदल सकती है और हिजबुल्लाह के प्रभाव को कमजोर किया जा सकता है।