Tag: Middle East Tensions

  • UAE हमले पर भारत का कड़ा रुख: 3 भारतीय घायल, PM मोदी बोले- नागरिकों पर हमला बर्दाश्त नहीं

    UAE हमले पर भारत का कड़ा रुख: 3 भारतीय घायल, PM मोदी बोले- नागरिकों पर हमला बर्दाश्त नहीं



    नई दिल्ली। UAE के फुजैराह स्थित ऑयल पोर्ट और पेट्रोलियम सुविधाओं पर हुए हमले में 3 भारतीय नागरिकों के घायल होने के बाद भारत ने सख्त नाराजगी जताई है। भारत सरकार ने साफ कहा है कि आम लोगों और जरूरी ढांचों को निशाना बनाना पूरी तरह अस्वीकार्य है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि निर्दोष नागरिकों पर हमला किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

    क्या हुआ फुजैराह में?
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, फुजैराह के इंडस्ट्रियल एरिया में ड्रोन और मिसाइल हमले के बाद पेट्रोलियम प्लांट में आग लग गई। इस घटना में तीन भारतीय घायल हो गए, जिनका इलाज जारी है।

    भारत की दो टूक
    भारत ने सभी पक्षों से तुरंत हिंसा रोकने और कूटनीति के रास्ते अपनाने की अपील की है। साथ ही होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने की बात कही है, जिसे वैश्विक व्यापार के लिए बेहद अहम माना जाता है।

    UAE का दावा, ईरान पर आरोप
    UAE ने इस हमले के पीछे ईरान का हाथ होने का दावा किया है। अधिकारियों के मुताबिक, कई बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों के साथ ड्रोन हमलों को रोका गया। हालांकि ईरान की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

    24 घंटे में बढ़ा तनाव, बड़े अपडेट्स
    ड्रोन प्लांट पर हमला
    फुजैराह के पेट्रोलियम प्लांट पर हमले के बाद भीषण आग लगी, 3 भारतीय घायल।

    ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ लॉन्च
    अमेरिका ने होर्मुज क्षेत्र में फंसे जहाजों को सुरक्षित निकालने के लिए नई पहल शुरू की।

    दक्षिण कोरियाई जहाज पर अटैक
    दक्षिण कोरिया के जहाज पर हमले से आग लगी, कोई हताहत नहीं।

    जब्त जहाज पाकिस्तान को सौंपा
    अमेरिका ने जब्त ईरानी जहाज पाकिस्तान को सौंपा, जिसे बाद में ईरान भेजा गया।

    ईरान में फांसी
    ईरान में जासूसी के आरोप में तीन लोगों को फांसी दी गई।
    पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने साफ संकेत दिया है कि वह अपने नागरिकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर पूरी तरह सतर्क है।

  • ईरान का ट्रंप को 14 सूत्रीय अल्टीमेटम: ‘युद्ध खत्म करो, प्रतिबंध हटाओ, मुआवजा दो’

    ईरान का ट्रंप को 14 सूत्रीय अल्टीमेटम: ‘युद्ध खत्म करो, प्रतिबंध हटाओ, मुआवजा दो’




    नई दिल्ली। मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच कूटनीतिक हल की कोशिशें तेज हो गई हैं। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के 9 सूत्रीय शांति फ्रेमवर्क के जवाब में ईरान ने नया 14 सूत्रीय प्रस्ताव भेजकर साफ संकेत दिया है कि वह अपने शर्तों पर समझौता चाहता है। पाकिस्तान की मध्यस्थता के जरिए वॉशिंगटन तक पहुंचाए गए इस प्रस्ताव में तेहरान ने युद्ध खत्म करने से लेकर प्रतिबंध हटाने और मुआवजे तक की सख्त मांगें रख दी हैं, जिससे वैश्विक राजनीति में हलचल बढ़ गई है।

    ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस प्रस्ताव में सबसे अहम शर्त यह है कि अमेरिका सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई तुरंत रोके, लेबनान समेत पूरे क्षेत्र में युद्ध खत्म किया जाए और अमेरिकी सेना को वापस बुलाया जाए। इसके अलावा हॉर्मुज जलडमरूमध्य के लिए नई व्यवस्था बनाने, नौसैनिक नाकेबंदी हटाने और क्षेत्रीय तनाव कम करने की भी बात कही गई है। ईरान ने साफ तौर पर आर्थिक प्रतिबंध खत्म करने, जब्त संपत्तियां लौटाने और युद्ध से हुए नुकसान का मुआवजा देने की मांग भी शामिल की है।

    तेहरान ने अमेरिका के 2 महीने के युद्धविराम प्रस्ताव को खारिज करते हुए 30 दिन में सभी मुद्दों के समाधान की समयसीमा सुझाई है। ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने दो टूक कहा कि अब फैसला अमेरिका को करना है या तो कूटनीति का रास्ता चुने या फिर टकराव के लिए तैयार रहे। उनका कहना है कि ईरान दोनों परिस्थितियों के लिए तैयार है और अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा।

    वहीं दूसरी ओर ट्रंप ने इस 14 सूत्रीय प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका इसकी समीक्षा कर रहा है, लेकिन इसे स्वीकार करना आसान नहीं होगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि ईरान ने आक्रामक रुख जारी रखा तो सैन्य कार्रवाई दोबारा हो सकती है। ट्रंप के मुताबिक, “ईरान समझौता करना चाहता है, लेकिन नेतृत्व और शर्तों को लेकर स्पष्टता नहीं है।”

    इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि एक तरफ बातचीत के दरवाजे खुले हैं, तो दूसरी तरफ युद्ध का खतरा अभी टला नहीं है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि अमेरिका और ईरान कूटनीति की राह पकड़ते हैं या फिर मध्य पूर्व एक बार फिर बड़े टकराव की ओर बढ़ता है।

  • हाइपरसोनिक हमले की आशंका: क्या ईरान-अमेरिका टकराव नए मोड़ पर?

    हाइपरसोनिक हमले की आशंका: क्या ईरान-अमेरिका टकराव नए मोड़ पर?


    नई दिल्ली। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच संभावित सैन्य टकराव को लेकर गंभीर संकेत सामने आ रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका पहली बार ईरान के खिलाफ हाइपरसोनिक मिसाइलों के इस्तेमाल पर विचार कर रहा है, जिससे हालात और भी विस्फोटक हो सकते हैं।

    सूत्रों के अनुसार, अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को संभावित सैन्य विकल्पों की जानकारी दी है। व्हाइट हाउस में हुई इस बैठक में एक ‘छोटा लेकिन बेहद प्रभावशाली’ हमले का प्रस्ताव रखा गया, जिसमें ईरान के सैन्य ढांचे, मिसाइल सिस्टम और शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाने की बात कही गई है।

    इस रणनीति में ‘डार्क ईगल’ जैसी अत्याधुनिक हाइपरसोनिक मिसाइलों का इस्तेमाल शामिल हो सकता है। यह मिसाइल 3,000 किलोमीटर से अधिक दूरी तक सटीक हमला करने में सक्षम मानी जाती है। इसके अलावा B-1B लांसर जैसे भारी बमवर्षक विमानों की तैनाती भी बढ़ाई जा रही है, जो इस तरह के हमलों को अंजाम देने में सक्षम हैं।

    तनाव सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं है। मुजतबा खामेनेई ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए चेतावनी दी है कि अगर हमला हुआ तो उसका जवाब समुद्र में दिया जाएगा। वहीं तेल बाजार में भी इसका असर साफ दिख रहा है कच्चे तेल की कीमतें अचानक उछलकर 120 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गईं, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का संकेत है।

    इसी बीच इजराइल ने लेबनान में हमले तेज कर दिए हैं और गाजा जाने वाले सहायता जहाजों को भी रोका है, जिससे क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया है। दूसरी ओर होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट आई है, जो वैश्विक व्यापार के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हाइपरसोनिक हथियारों का इस्तेमाल होता है, तो यह सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि युद्ध की प्रकृति में बड़ा बदलाव होगा। ऐसे हथियारों को रोकना बेहद मुश्किल होता है, जिससे जवाबी कार्रवाई का जोखिम भी बढ़ जाता है।

    कुल मिलाकर, हालात बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच चुके हैं। एक छोटी सी चूक भी बड़े युद्ध में बदल सकती है। ऐसे में दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि कूटनीति हावी होती है या फिर हथियारों की भाषा आगे बढ़ती है।

  • अदृश्य खतरा, अचूक वार! फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन से हिज्बुल्लाह का नया हमला, इजरायल की सुरक्षा चुनौती में इजाफा

    अदृश्य खतरा, अचूक वार! फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन से हिज्बुल्लाह का नया हमला, इजरायल की सुरक्षा चुनौती में इजाफा


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष अब तकनीकी युद्ध के नए दौर में प्रवेश कर चुका है। Hezbollah ने ऐसे फाइबर-ऑप्टिक गाइडेड ड्रोन का इस्तेमाल शुरू किया है, जो पारंपरिक रडार और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग से लगभग अछूते रहते हैं। इस नई तकनीक ने Israel की सुरक्षा प्रणाली के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।

    इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच बढ़ते तनाव के बीच अब युद्ध का नया चेहरा सामने आया है—फाइबर-ऑप्टिक नियंत्रित ड्रोन। ये ड्रोन आकार में छोटे, हल्के और बेहद तेज होते हैं। इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये पतली फाइबर-ऑप्टिक केबल के जरिए सीधे ऑपरेटर से जुड़े रहते हैं, जिससे इन पर रेडियो सिग्नल आधारित जैमिंग का कोई असर नहीं पड़ता।

    रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, ये ड्रोन बेहद कम ऊंचाई पर उड़ते हैं और लक्ष्य के बेहद करीब पहुंचकर हमला करने में सक्षम होते हैं। लंदन स्थित Royal United Services Institute के विशेषज्ञ Robert Tolst का कहना है कि यदि ऑपरेटर को सही प्रशिक्षण मिला हो, तो यह तकनीक अत्यंत घातक साबित हो सकती है।

    इजरायली अधिकारियों का मानना है कि हिज्बुल्लाह ने यह रणनीति इसलिए अपनाई है क्योंकि इजरायल का एयर डिफेंस सिस्टम पारंपरिक रॉकेट, मिसाइल और ड्रोन हमलों के खिलाफ प्रभावी है। ऐसे में फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन उस सुरक्षा कवच को भेदने की नई कोशिश हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, इन ड्रोन को स्थानीय स्तर पर भी तैयार किया जा सकता है—साधारण कमर्शियल ड्रोन, सीमित विस्फोटक सामग्री और पारदर्शी फाइबर-ऑप्टिक तार के जरिए।

    पूर्व इजरायली वायु रक्षा प्रमुख Ran Kochav ने चेतावनी दी है कि इन ड्रोन को पहचानना और मार गिराना बेहद कठिन है। उनका कहना है कि ये छोटे आकार, तेज गति और कम ऊंचाई पर उड़ान के कारण पारंपरिक डिफेंस सिस्टम को चुनौती देते हैं।

    बचाव की सीमित संभावनाएं
    विशेषज्ञों के अनुसार, इन ड्रोन से निपटने के केवल दो प्रमुख तरीके हैं—या तो इन्हें उड़ान के दौरान ही मार गिराया जाए या फिर इन्हें नियंत्रित करने वाली फाइबर-ऑप्टिक केबल को काट दिया जाए। हालांकि, दोनों ही विकल्प व्यावहारिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण हैं, क्योंकि केबल पतली और लगभग अदृश्य होती है।

    इसी खतरे को ध्यान में रखते हुए इजरायली सेना ने अपने सैन्य वाहनों पर सुरक्षात्मक जाल और विशेष कवच लगाने शुरू कर दिए हैं। साथ ही, उन्नत सेंसर, ध्वनि पहचान प्रणाली और अन्य तकनीकों के विकास पर भी काम तेज किया गया है।

    यूक्रेन युद्ध से मिली तकनीक:
    विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक का तेजी से विकास Russia-Ukraine War के दौरान हुआ है, जहां रूस और यूक्रेन दोनों ही ड्रोन तकनीक में लगातार नए प्रयोग कर रहे हैं। कुछ मामलों में 50 किलोमीटर तक लंबी फाइबर-ऑप्टिक केबल वाले ड्रोन भी देखे गए हैं, जो इनकी क्षमता को और बढ़ाते हैं।

    हिज्बुल्लाह द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे ये फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन आधुनिक युद्ध की बदलती रणनीति का प्रतीक हैं, जहां तकनीक के साथ खतरा और अधिक जटिल और अदृश्य होता जा रहा है।अब बड़ा सवाल यही है—क्या इजरायल इस नई चुनौती का समय रहते प्रभावी समाधान खोज पाएगा, या यह तकनीक आने वाले समय में युद्ध का नया मानक बन जाएगी?

  • बातचीत चाहते हैं, दबाव नहीं सहेंगे: ईरानी राष्ट्रपति की अमेरिका इजरायल को कड़ी चेतावनी

    बातचीत चाहते हैं, दबाव नहीं सहेंगे: ईरानी राष्ट्रपति की अमेरिका इजरायल को कड़ी चेतावनी


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच इरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने साफ किया है कि ईरान युद्ध नहीं बल्कि बातचीत के जरिए समाधान चाहता है। हालांकि उन्होंने अमेरिका और इजरायल को सख्त संदेश देते हुए कहा कि किसी भी तरह का दबाव या शर्तें थोपने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

    संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा ईरान

    ईरानी राष्ट्रपति ने कहा कि उनका देश कभी भी टकराव या अस्थिरता का समर्थक नहीं रहा है। लेकिन यदि किसी ने ईरान को झुकाने या उस पर अपनी शर्तें थोपने की कोशिश की तो वह पूरी तरह विफल होगी। उन्होंने दोहराया कि ईरान अपनी संप्रभुता से किसी भी हाल में समझौता नहीं करेगा।

    नागरिकों पर हमलों पर उठाए सवाल

    ईरानी न्यूज एजेंसी के हवाले से राष्ट्रपति ने अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवीय सिद्धांतों के तहत नागरिकों बच्चों और बौद्धिक वर्ग को निशाना बनाना साथ ही स्कूलों और अस्पतालों जैसे संस्थानों को नुकसान पहुंचाना किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता।

    संवाद ही रास्ता लेकिन दबाव नहीं

    राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि ईरान का रुख हमेशा से संवाद और सहयोग का रहा है। उन्होंने कहा कि देश न तो युद्ध चाहता है और न ही अस्थिरता लेकिन अगर उसकी संप्रभुता पर दबाव बनाया गया तो ईरानी जनता इसे कभी स्वीकार नहीं करेगी। ईरान के राष्ट्रपति ने अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा कि ईरान को झुकाने या सरेंडर करने के लिए मजबूर करने की हर कोशिश नाकाम रहेगी।

    गौरतलब है कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था। इस दौरान तेहरान सहित कई बड़े शहरों पर हमले हुए। इसके जवाब में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने इजरायल के ठिकानों और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाया जिससे पूरे क्षेत्र में तनाव चरम पर पहुंच गया।

    इस्लामाबाद वार्ता रहीं बेनतीजा

    तनाव कम करने के लिए 11 अप्रैल को इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत हुई। ईरान की ओर से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकिर गालिबफ ने नेतृत्व किया जबकि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने की। कई दौर की बातचीत के बावजूद कोई ठोस समझौता नहीं हो सका। दोनों पक्षों ने माना कि कई अहम मुद्दों पर मतभेद अब भी बने हुए हैं जिससे दीर्घकालिक समाधान फिलहाल संभव नहीं हो पाया है।

  • मिडिल ईस्ट तनाव का गोल्ड मार्केट पर असर… कीमत में गिरावट का सिलसिला जारी

    मिडिल ईस्ट तनाव का गोल्ड मार्केट पर असर… कीमत में गिरावट का सिलसिला जारी


    नई दिल्ली।
    ग्लोबल मार्केट (Global Market) में सोने की कीमतों (Gold Prices) में हल्की गिरावट देखने को मिल रही है और इसकी बड़ी वजह मिडिल ईस्ट (Middle East) में बढ़ता तनाव बन रही है। हाल ही में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) को ब्लॉक करने की योजना ने दुनिया भर में ऊर्जा सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है। यह स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऑयल रूट्स में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का व्यवधान सीधे तौर पर तेल की कीमतों को प्रभावित करता है और यही असर अब सोने के बाजार पर भी दिखने लगा है।

    दरअसल, जब तेल महंगा होता है, तो महंगाई बढ़ने लगती है। इस समय कच्चे तेल की कीमतें करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे माहौल में आमतौर पर सोना सुरक्षित निवेश (Safe Haven) माना जाता है, लेकिन इस बार तस्वीर थोड़ी अलग दिख रही है। बढ़ती महंगाई के कारण निवेशक अब ब्याज दरों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं और यही वजह है कि सोने की कीमतों पर दबाव बना हुआ है।

    सोना एक ऐसा निवेश है, ज्यादातर मामलों में ब्याज नहीं देता, इसलिए जब ब्याज दरें बढ़ने की संभावना होती है, तो निवेशक इससे दूरी बनाने लगते हैं। फिलहाल, अमेरिका में महंगाई बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं, जिससे यह उम्मीद कम हो गई है कि जल्द ही ब्याज दरों में कटौती होगी। यही कारण है कि सोने की कीमतों में हाल ही में लगभग 2% तक की गिरावट देखने को मिली।

    हालांकि, पूरी तरह से तस्वीर नकारात्मक भी नहीं है। डॉलर में कमजोरी और बॉन्ड यील्ड में गिरावट जैसे फैक्टर सोने को कुछ हद तक सपोर्ट दे रहे हैं। इसके अलावा ग्लोबल स्तर पर आर्थिक सुस्ती और अनिश्चितता भी निवेशकों को सोने की ओर आकर्षित कर सकती है। यही वजह है कि शुरुआती गिरावट के बाद सोने ने कुछ रिकवरी भी दिखाई।

    एक और दिलचस्प बात यह है कि फरवरी से शुरू हुए इस जियो-पॉलिटिकल तनाव के दौरान सोना करीब 10% तक गिर चुका है, लेकिन अब धीरे-धीरे यह संभलने की कोशिश कर रहा है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाले समय में अगर तनाव बढ़ता है या आर्थिक ग्रोथ धीमी होती है, तो सोना फिर से मजबूत हो सकता है।

    अभी सोने का बाजार कई फैक्टर्स के बीच फंसा हुआ है। इसमें एक तरफ बढ़ती महंगाई और ब्याज दरों का दबाव है, तो दूसरी तरफ वैश्विक अनिश्चितता का सपोर्ट है। ऐसे में निवेशकों के लिए जरूरी है कि वे जल्दबाजी में फैसला न लें, बल्कि बाजार के रुझान को समझकर ही निवेश करें।

  • इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान के बीच होगी अहम वार्ता, पाकिस्तान मेजबान, इजरायली हमलों ने बढ़ाई चिंता

    इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान के बीच होगी अहम वार्ता, पाकिस्तान मेजबान, इजरायली हमलों ने बढ़ाई चिंता


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में तनाव कम करने के उद्देश्य से अमेरिका और ईरान के बीच उच्चस्तरीय वार्ता की मेजबानी पाकिस्तान करने जा रहा है। शुक्रवार को इस्लामाबाद में होने वाली इस अहम बैठक से पहले पाकिस्तान ने राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी कर दी है। हालांकि, क्षेत्रीय हालात और इजरायल के हालिया हमलों को लेकर तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है।

    ईरान की कड़ी चेतावनी से बढ़ी चिंता

    वार्ता से ठीक पहले ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने चेतावनी दी है कि लेबनान पर इजरायल के हमले शुरुआती युद्धविराम का उल्लंघन हैं और इससे बातचीत पर गंभीर असर पड़ सकता है। ईरानी नेतृत्व का कहना है कि ऐसे कदम शांति प्रक्रिया को “निरर्थक” बना सकते हैं। लेबनान में हुए हालिया हमलों में भारी जनहानि की रिपोर्ट के बाद तेहरान का रुख और सख्त हो गया है, और उसने संकेत दिया है कि वह अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ खड़ा रहेगा।

    इस्लामाबाद में हाई-लेवल डिप्लोमैसी की तैयारी

    पाकिस्तान इस पूरी वार्ता प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख के बीच क्षेत्रीय शांति प्रयासों की समीक्षा भी की गई है। पाकिस्तान ने दोनों पक्षों को भरोसा दिलाया है कि सभी विदेशी प्रतिनिधिमंडलों को “पूर्ण सुरक्षा” प्रदान की जाएगी और बातचीत को सफल बनाने के लिए हर संभव सहयोग दिया जाएगा।

    ईरानी पक्ष में अब भी संशय बरकरार
    पाकिस्तान में ईरान के राजदूत रजा अमीरी मोघादम ने स्पष्ट किया है कि इजरायली हमलों के चलते शांति वार्ता को लेकर गंभीर संदेह बना हुआ है। इसके बावजूद ईरानी प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद पहुंच रहा है और प्रस्तावित 10-बिंदु एजेंडे पर बातचीत करेगा।

    सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय भागीदारी

    वार्ता में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है, जिसमें वरिष्ठ अमेरिकी नेतृत्व के साथ प्रमुख रणनीतिक सलाहकार भी मौजूद हो सकते हैं। पाकिस्तान ने अमेरिकी पक्ष को आश्वासन दिया है कि उनकी यात्रा के दौरान अभेद्य सुरक्षा उपलब्ध कराई जाएगी। इस बीच सुरक्षा प्रबंधों की समीक्षा के लिए एक विशेष टीम पहले ही इस्लामाबाद पहुंच चुकी है।

    शांति समझौते पर वैश्विक नजरें
    इस वार्ता में मुख्य ध्यान दीर्घकालिक शांति ढांचे पर रहेगा, जिसमें प्रतिबंधों में राहत, क्षेत्रीय सुरक्षा गारंटी और ईरान के परमाणु व मिसाइल कार्यक्रम जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल हो सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बातचीत सफल होती है या असफल, इसका सीधा असर पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति और वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर पड़ेगा।

  • ईरान युद्ध के बीच IMFकी चेतावनी… मिडिल ईस्ट तनाव से वैश्विक अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित

    ईरान युद्ध के बीच IMFकी चेतावनी… मिडिल ईस्ट तनाव से वैश्विक अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित

    तेल अबीव। मिडिल ईस्ट तनाव (Middle East Tensions) के बीच अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund- IMF) ने सोमवार को चेतावनी दी है। उसने कहा है कि मध्य पूर्व में ईरान युद्ध ने सीमावर्ती देशों की अर्थव्यवस्थाओं को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। साथ ही कई ऐसी अर्थव्यवस्थाओं की संभावनाएं धूमिल कर दी हैं, जो हाल ही में पिछले संकटों से उबरना शुरू कर रही थीं। आईएमएफ के शीर्ष अर्थशास्त्रियों द्वारा जारी एक ब्लॉग पोस्ट में कहा गया है कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर शुरू किए गए हमलों से उत्पन्न युद्ध वैश्विक स्तर पर एक असममित झटका पैदा कर रहा है, जिससे वित्तीय स्थितियां और अधिक कठिन हो गई हैं।

    आईएमएफ ने स्पष्ट किया कि युद्ध का प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि संघर्ष कितने समय तक चलता है, कितना फैलता है और बुनियादी ढांचे तथा आपूर्ति श्रृंखलाओं को कितना नुकसान पहुंचाता है। संगठन ने सदस्य देशों से आग्रह किया है कि इस झटके से निपटने के लिए कोई भी नीतिगत उपाय सावधानीपूर्वक तय करें। आईएमएफ ने कहा कि वह जहां जरूरत हो, सदस्य देशों को नीतिगत सलाह और वित्तीय सहायता प्रदान कर रहा है तथा यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समन्वय से किया जा रहा है।

    आईएमएफ की ओर से यह बयान ऐसे समय में आया है जब जी-7 के वित्त मंत्रियों ने ऊर्जा बाजार की स्थिरता बनाए रखने और हाल की अस्थिरता से उत्पन्न व्यापक आर्थिक दुष्प्रभावों को सीमित करने के लिए ‘सभी आवश्यक उपाय’ करने का संकल्प लिया है। वहीं, अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने और क्षेत्रीय बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान के कारण वैश्विक तेल बाजार में इतिहास का सबसे बड़ा व्यवधान उत्पन्न हुआ है। सामान्यतः वैश्विक तेल का 25-30 प्रतिशत और द्रवीकृत प्राकृतिक गैस का 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे जलमार्ग से गुजरता है।


    खाद्य असुरक्षा के खतरे में सबसे गरीब देश

    आईएमएफ के ब्लॉग में कहा गया है कि खाद्य पदार्थों और उर्वरकों की बढ़ती कीमतों को देखते हुए कम आय वाले देश खाद्य असुरक्षा के विशेष जोखिम में हैं। कई विकसित अर्थव्यवस्थाएं अपनी अंतरराष्ट्रीय सहायता में कटौती कर रही हैं, ऐसे में इन देशों को अधिक बाहरी समर्थन की आवश्यकता हो सकती है। अर्थशास्त्रियों ने लिखा है कि युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित कर सकता है, लेकिन सभी रास्ते उच्च कीमतों और धीमी वृद्धि की ओर ले जाते हैं।

    उन्होंने बताया कि एशिया और यूरोप के बड़े ऊर्जा आयातक देशों को ईंधन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों का सबसे अधिक खामियाजा भुगतना पड़ रहा है, जबकि अफ्रीका और एशिया के कई देश बढ़ी हुई कीमतों पर भी अपनी जरूरत की आपूर्ति प्राप्त करने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं। आईएमएफ के अनुसार, यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो इससे जुड़ी अनिश्चितता और भू-राजनीतिक जोखिम ऊर्जा को महंगा बनाए रखेंगे, आयात पर निर्भर देशों पर दबाव बढ़ाएंगे तथा मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाएगा।

    आईएमएफ ने कहा कि वह 14 अप्रैल को वाशिंगटन में अपनी वसंतकालीन बैठकों के दौरान जारी होने वाले विश्व आर्थिक आउटलुक (डब्ल्यूईओ) में इस युद्ध के प्रभाव का व्यापक मूल्यांकन पेश करेगा। लेखकों ने चेतावनी दी कि यदि ऊर्जा और खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतें बनी रहीं तो वे विश्व स्तर पर मुद्रास्फीति को बढ़ावा देंगी। ऐतिहासिक रूप से तेल की कीमतों में वृद्धि मुद्रास्फीति बढ़ने और विकास दर घटने से जुड़ी रही है। उन्होंने कहा कि युद्ध से यह आशंका भी बढ़ सकती है कि मुद्रास्फीति लंबे समय तक उच्च स्तर पर बनी रहेगी, जिससे मजदूरी-कीमतों का चक्र तेज हो सकता है और बिना तीव्र मंदी के इस झटके को नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। आईएमएफ ने सदस्य देशों से सतर्क रहने और समन्वित प्रयासों के साथ इस संकट का सामना करने की अपील की है।

  • ईरान पर इजरायल की नजर: पूरे मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच सैन्य ठिकानों को निशाना

    ईरान पर इजरायल की नजर: पूरे मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच सैन्य ठिकानों को निशाना


    नई दिल्ली । यरूशलम से आई ताजा जानकारी के अनुसार इजरायल डिफेंस फोर्स के प्रवक्ता एफी डेफ्रिन ने एक लाइव प्रसारण में दावा किया है कि आने वाले कुछ ही दिनों में इजरायली सेना ईरान की सैन्य इंडस्ट्री के सभी महत्वपूर्ण ठिकानों पर हमले पूरी तरह से कर लेगी डेफ्रिन ने कहा कि इसका मतलब यह है कि ईरान की अधिकांश सैन्य उत्पादन क्षमता नष्ट हो जाएगी और उसे उसे ठीक करने में काफी समय लगेगा

    प्रवक्ता ने बताया कि IDF के पास एक व्यवस्थित प्लान है जो बड़े हमले के लिए पहले से तैयार किया गया है और स्थिति के अनुसार इसे लगातार अपडेट किया जा रहा है डेफ्रिन ने कहा कि इजरायली सेना के पास स्थिति को पूरी तरह से बदलने का अवसर है और यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है कि कोई भी ईरायली नागरिकों को नुकसान न पहुंचे

    सिन्हुआ न्यूज एजेंसी के अनुसार यमन से इजरायल पर मिसाइल लॉन्च किए जाने की घटना पर डेफ्रिन ने कहा कि इजरायल हूतियों समेत कई मोर्चों पर लड़ाई के लिए पूरी तरह तैयार है उन्होंने चेतावनी दी कि जो कोई भी इजरायली नागरिकों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेगा उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी

    लेबनानी मोर्चे पर भी इजरायली सेना ने अब तक 850 से अधिक हिज्बुल्लाह मिलिटेंट्स को मार गिराया है और उत्तरी इजरायली बस्तियों पर सीधे फायरिंग रोकने के लिए दक्षिणी लेबनान में नियंत्रण बढ़ाया जा रहा है

    इस बीच, तेल अवीव में शुक्रवार को ईरान की ओर से दागी गई मिसाइल हमले में लगभग 60 वर्षीय कंस्ट्रक्शन वर्कर की मौत हो गई पुलिस के अनुसार यह घटना डिस्पर्सिंग क्लस्टर म्यूनिशन मिसाइल से जुड़ी थी जिसने मेट्रोपॉलिटन एरिया के कई हिस्सों में हमला किया इस हमले में दो लोग मामूली रूप से घायल भी हुए

    ईरान से मिसाइल लॉन्च के बाद सेंट्रल इजरायल के बड़े इलाकों में एयर डिफेंस सायरन बज गए और लोग शेल्टर में चले गए इससे पहले दक्षिणी इजरायल में भी मिसाइल लॉन्च हुई थी जिसमें दो लोग हल्की चोटें आई हैं

    यह घटनाक्रम 28 फरवरी से अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए संयुक्त हमलों के बाद बढ़े तनाव के बीच हुआ है उस समय ईरान और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों ने पूरे मिडिल ईस्ट में इजरायल और अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया था इस पूरे घटनाक्रम ने क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा दिया है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसकी बारीकी से निगरानी कर रहा है

  • मिडिल ईस्ट तनाव के चलते रुपये में भारी गिरावट… पहली बार ₹93 प्रति डॉलर के पार

    मिडिल ईस्ट तनाव के चलते रुपये में भारी गिरावट… पहली बार ₹93 प्रति डॉलर के पार


    नई दिल्ली।
    भारतीय रुपया (Indian Rupee.) शुक्रवार, 20 मार्च को पहली बार 93 प्रति अमेरिकी डॉलर (93 Per US Dollar) के स्तर को पार गया। शुरुआती कारोबार (Initial business) में रुपया 3 पैसे गिरकर 92.92 पर खुला और बाद में 93.08 तक फिसल गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। इससे पहले 18 मार्च को रुपया 92.63 के स्तर तक गिरा था, जिसे अब पार कर लिया गया है।


    क्यों टूट रहा है रुपया?

    1. कच्चे तेल की कीमतों में उछाल: मिडिल ईस्ट में तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड करीब $120 प्रति बैरल तक पहुंच गया। हालांकि शुक्रवार को यह घटकर $107 के आसपास आ गया, लेकिन अभी भी ऊंचे स्तर पर है। तेल महंगा होने से भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ता है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है।


    2. डॉलर की बढ़ती मांग:
    ऊंचे इंपोर्ट बिल के कारण कंपनियां ज्यादा डॉलर खरीद रही हैं, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ रहा है।


    3. विदेशी निवेशकों की बिकवाली:
    मार्च में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से $8 अरब से ज्यादा निकाल लिए हैं। यह जनवरी 2025 के बाद सबसे बड़ा आउटफ्लो है।

    4. मजबूत होता अमेरिकी डॉलर: वैश्विक अनिश्चितता के बीच निवेशक सुरक्षित विकल्प के तौर पर डॉलर की ओर जा रहे हैं, जिससे डॉलर मजबूत हो रहा है और अन्य मुद्राएं कमजोर।


    डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट: आपकी जेब पर कैसे पड़ता है असर?

    डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि आम लोगों की मुश्किलें भी बढ़ा देती है। जब रुपया कमजोर होता है, तो इसका सीधा असर महंगाई और आपके महीने के बजट पर पड़ता है। आइए समझते हैं कि रुपये में गिरावट क्यों होती है और इसका असर आप पर कैसे पड़ता है।


    महंगाई बढ़ती है

    भारत अपनी जरूरत का 75% से 80% कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। जब रुपया कमजोर होता है, तो तेल आयात महंगा हो जाता है। अनुमान के मुताबिक, डॉलर के मुकाबले रुपये में 1 रुपये की गिरावट से तेल कंपनियों पर करीब 8,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। इस वजह से पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ जाते हैं, जिससे महंगाई बढ़ती है। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में 10% बढ़ोतरी से महंगाई लगभग 0.8% तक बढ़ सकती है। इसका असर खाने-पीने की चीजों और ट्रांसपोर्ट खर्च पर साफ दिखता है।


    दवाएं और पढ़ाई महंगी

    कई जरूरी दवाएं भारत में विदेशों से आती हैं। रुपये के कमजोर होने से इन दवाओं की कीमत बढ़ जाती है। इसके अलावा विदेश में पढ़ाई महंगी हो जाती है। विदेश यात्रा का खर्च बढ़ जाता है। होटल और खाने-पीने पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है।


    विकास योजनाओं पर असर

    सरकार तेल कंपनियों को सब्सिडी देती है ताकि जनता को राहत मिल सके, लेकिन जब डॉलर महंगा होता है, तो सरकार का खर्च बढ़ जाता है। ऐसे में सरकार को विकास योजनाओं (जैसे सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा) पर खर्च कम करना पड़ सकता है। इसका असर आम लोगों को मिलने वाली सुविधाओं पर पड़ता है।


    सरकारी खजाने पर दबाव

    देश में आने और जाने वाली विदेशी मुद्रा के अंतर को चालू खाता घाटा (CAD) कहते हैं। जब आयात ज्यादा होता है, तो देश से ज्यादा डॉलर बाहर जाता है और CAD बढ़ जाता है। भारत में सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा तेल और सोने के आयात पर खर्च होती है।

    गिरावट थामने के लिए RBI क्या कर रहा है?
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मार्च में अब तक 15 अरब डॉलर से ज्यादा बेचकर रुपये को संभालने की कोशिश की है। वित्तीय वर्ष के अंत (मार्च) में RBI का हस्तक्षेप आमतौर पर बढ़ जाता है, जिससे थोड़ी राहत मिल सकती है।


    आगे क्या?

    विश्लेषकों के अनुसार जब तक तेल कीमतें ऊंची रहेंगी, रुपये पर दबाव बना रहेगा, विदेशी निवेश का आउटफ्लो जारी रह सकता है। RBI का हस्तक्षेप ही फिलहाल बड़ा सपोर्ट है। शॉर्ट टर्म में रुपया कमजोर रह सकता है।