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  • मिडिल ईस्ट तनाव का असर….कच्चे तेल ने बिगाड़ा खेल, गेहूं-प्याज की कीमतों में भारी उछाल

    मिडिल ईस्ट तनाव का असर….कच्चे तेल ने बिगाड़ा खेल, गेहूं-प्याज की कीमतों में भारी उछाल


    नई दिल्ली।
    मिडिल ईस्ट तनाव (Middle East tensions) के बाद तेल कंपनियों ने मई में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए थे. जून के बाद अमेरिका और ईरान में तनाव घटने से कच्चे तेल की कीमतों में जब कमी आई तो फ्यूल प्राइस कम होने का भरोसा बढ़ गया था. लेकिन खाड़ी में तनाव फिर बढ़ने से ईंधन की कीमतों में कमी की उम्मीद टूटने लगी है. दरअसल, इस वक्त दुनियाभर में चल रहे तनाव का असर भारत के ईंधन और खाने-पीने के सामानों पर सबसे ज्यादा नजर आ रहा है.


    कच्चा तेल में फिर तेजी
    अमेरिका-ईरान के बीच नए समझौते की उम्मीदें कमजोर पड़ने से कच्चे तेल में तेजी आ रही है. इससे ब्रेंट क्रूड 92 डॉलर प्रति बैरल के करीब और WTI क्रूड करीब 85 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया है. आशंका है कि क्रूड जल्द ही 100 डॉलर प्रति बैरल के पास पहुंच सकता है. तेल की कीमतों में ये तेजी ऐसे समय आई है, जब भारत में पेट्रोल और डीजल सस्ता होने की उम्मीद लगाई जा रही थी. लेकिन हालात फिलहाल राहत वाले नहीं दिख रहे क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बनी अनिश्चितता और ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ी दूरी ने एनर्जी मार्केट की बेचैनी बढ़ा दी है।


    भारत पर ज्यादा असर

    भारत के लिए हालात ज्यादा गंभीर हैं, क्योंकि देश अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है. महंगे कच्चे तेल से ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ सकती है. लंबे समय तक ऊंचे दाम रहने पर ईंधन कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

    तेल के साथ-साथ खाने की थाली से जुड़ी एक और चिंता भी सिर उठाने लगी है. गेहूं की कीमतों में तेजी ने आटा और ब्रेड जैसे जरूरी सामान को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. दुनिया के बड़े गेहूं निर्यातक रूस और यूक्रेन के बीच जारी तनाव ने काला सागर क्षेत्र में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है. इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार से लेकर भारतीय मंडियों तक दिखाई देने लगा है. वैश्विक बाजार में गेहूं करीब 6.7 डॉलर प्रति बुशेल के स्तर पर पहुंच गया है. देश की प्रमुख मंडियों में एक महीने में गेहूं के भाव करीब 4 फीसदी तक बढ़ गए हैं. जाहिर है कि गेहूं की बढ़ती कीमतें आटा, ब्रेड और दूसरे खाद्य उत्पादों की लागत बढ़ा सकती हैं।


    प्याज भी महंगा
    रसोई की चिंता यहीं खत्म नहीं होती, प्याज भी लोगों की जेब पर दबाव बढ़ाने लगा है. प्याज का औसत खुदरा भाव 37 रुपये 20 पैसे प्रति किलो पर पहुंच गया है जबकि एक महीने पहले कीमत 34 रुपये 53 पैसे प्रति किलो थी. एक साल पहले प्याज का भाव 26 रुपये 86 पैसे प्रति किलो था. इस तेजी की वजह खरीफ प्याज की आवक में देरी है जिससे बाजार पर दबाव बढ़ गया है।

    तेल से लेकर गेहूं और प्याज तक, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पैदा हुआ तनाव भारतीय ग्राहकों की जेब तक पहुंच रहा है. ऐसे में सबकी नजर दो मोर्चों पर टिकी हैं. पहला है कि मिडिल ईस्ट में तेल की दिशा क्या रहती है और दूसरा ये कि काला सागर क्षेत्र में सप्लाई का संकट कितना गहराता है क्योंकि इन दोनों का असर सीधे आपकी गाड़ी के खर्च और रसोई के बजट पर पड़ सकता है।

  • दक्षिणी लेबनान में गहराया जल संकट, 7 लाख से अधिक लोग स्वच्छ पेयजल से वंचित; UN ने जताई गंभीर चिंता

    दक्षिणी लेबनान में गहराया जल संकट, 7 लाख से अधिक लोग स्वच्छ पेयजल से वंचित; UN ने जताई गंभीर चिंता


    नई दिल्ली। दक्षिणी लेबनान में संघर्ष के कारण बुनियादी ढांचे को पहुंचे भारी नुकसान ने मानवीय संकट को और गंभीर बना दिया है। संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि जल आपूर्ति प्रणाली के क्षतिग्रस्त होने से लाखों लोगों के सामने स्वच्छ पेयजल, स्वास्थ्य और आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। संघर्ष प्रभावित इलाकों में लौट रहे विस्थापित परिवारों को बुनियादी सुविधाओं के अभाव में कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।
    दक्षिणी लेबनान में संघर्ष के कारण बुनियादी ढांचे को पहुंचे भारी नुकसान ने मानवीय संकट को और गंभीर बना दिया है। संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि जल आपूर्ति प्रणाली के क्षतिग्रस्त होने से लाखों लोगों के सामने स्वच्छ पेयजल, स्वास्थ्य और आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। संघर्ष प्रभावित इलाकों में लौट रहे विस्थापित परिवारों को बुनियादी सुविधाओं के अभाव में कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।

    संयुक्त राष्ट्र के मानवीय मामलों के समन्वय कार्यालय (ओसीएचए) के अनुसार, दक्षिण लेबनान जल प्राधिकरण द्वारा किए गए प्रारंभिक आकलन में सामने आया है कि दक्षिण और नबातियेह गवर्नरेट्स में जल आपूर्ति प्रणाली को हुए व्यापक नुकसान के कारण 7 लाख से अधिक लोगों की सुरक्षित पेयजल तक पहुंच बाधित हो गई है।

    यूएन का कहना है कि तालाबों, पंपिंग स्टेशनों, बोरहोल और अन्य जल सुविधाओं को हुए नुकसान ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। इसके कारण न केवल पीने के पानी की उपलब्धता प्रभावित हुई है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य पर भी खतरा बढ़ गया है। कृषि गतिविधियां बाधित होने से हजारों परिवारों की आजीविका भी प्रभावित हो रही है।

    संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, संघर्ष के बाद अब तक 8.21 लाख से अधिक लोग अपने घरों और समुदायों में लौट चुके हैं, लेकिन करीब 3.60 लाख लोग अब भी विस्थापित हैं। इनमें लगभग 27 हजार लोग सामूहिक राहत शिविरों में रह रहे हैं और उन्हें भोजन, पानी, स्वास्थ्य सेवाओं तथा अन्य आवश्यक सुविधाओं की जरूरत बनी हुई है।

    मानवीय एजेंसियों ने स्पष्ट किया है कि लोगों का अपने घर लौट आना इस बात का संकेत नहीं है कि उनकी समस्याएं समाप्त हो गई हैं। बड़ी संख्या में घर क्षतिग्रस्त हैं, जल और बिजली जैसी बुनियादी सेवाएं पूरी तरह बहाल नहीं हो सकी हैं और कई क्षेत्रों में आजीविका के साधन भी प्रभावित हुए हैं। ऐसे में राहत और पुनर्वास कार्यों में निरंतर निवेश की आवश्यकता है, ताकि प्रभावित समुदाय सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से सामान्य जीवन की ओर लौट सकें।

    इस बीच संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने भी लेबनान में आम नागरिकों की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने बेरूत में अपने दौरे के समापन पर कहा कि संघर्ष के दौरान अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के गंभीर उल्लंघन के आरोप सामने आए हैं और इनमें से कुछ मामलों को युद्ध अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और कानूनी प्रक्रिया अभी जारी है।

    टर्क के अनुसार, घनी आबादी वाले इलाकों में लगातार हवाई हमलों, गोलाबारी और विस्फोटक हथियारों के इस्तेमाल से बड़ी संख्या में आम नागरिकों की मौत हुई है, हजारों लोग घायल हुए हैं और व्यापक स्तर पर बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा है। संयुक्त राष्ट्र ने बताया कि एक स्वतंत्र आकलन मिशन कथित उल्लंघनों से जुड़े साक्ष्य और जानकारियां एकत्र कर रहा है।

    लेबनानी अधिकारियों के हवाले से संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि 2 मार्च से शुरू हुए संघर्ष में 4,300 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 12,200 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। मृतकों में 135 से अधिक स्वास्थ्यकर्मी तथा कई पत्रकार और मीडिया कर्मी भी शामिल हैं।

    संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि प्रभावित क्षेत्रों में मानवीय सहायता, जल आपूर्ति व्यवस्था की बहाली और पुनर्निर्माण कार्यों को प्राथमिकता दी जाए, ताकि लाखों लोगों को सुरक्षित पेयजल और आवश्यक सेवाएं दोबारा उपलब्ध कराई जा सकें।

  • मिडिल ईस्ट में युद्ध का नया मोर्चा: अमेरिका-सऊदी की संयुक्त कार्रवाई, ईरान समर्थक ठिकानों पर हमला, तनाव चरम पर

    मिडिल ईस्ट में युद्ध का नया मोर्चा: अमेरिका-सऊदी की संयुक्त कार्रवाई, ईरान समर्थक ठिकानों पर हमला, तनाव चरम पर


    नई दिल्ली । मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष अब एक नए और अधिक संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिका और सऊदी अरब ने संयुक्त सैन्य अभियान चलाते हुए इराक में ईरान समर्थित पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्स यानी पीएमएफ के ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए। शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक इन हमलों में कम से कम 20 लड़ाकों की मौत हुई है जबकि 32 अन्य घायल बताए जा रहे हैं। इस कार्रवाई के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है तथा युद्ध के व्यापक रूप लेने की आशंका गहरा गई है।

    अमेरिकी सेना का दावा है कि जिन ठिकानों को निशाना बनाया गया वहां से अमेरिकी सैनिकों और सऊदी अरब के महत्वपूर्ण ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमलों की तैयारी की जा रही थी। सुरक्षा एजेंसियों को मिली खुफिया जानकारी के आधार पर यह संयुक्त कार्रवाई की गई। हमलों के कुछ ही घंटों बाद ईरान की ओर से जवाबी कदम उठाया गया और जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकाने की दिशा में कई बैलिस्टिक मिसाइलें दागी गईं। हालांकि अमेरिकी रक्षा प्रणाली ने सभी मिसाइलों को लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही हवा में नष्ट कर दिया।

    इस घटनाक्रम के बीच व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की महत्वपूर्ण बैठक भी चर्चा का केंद्र रही। बैठक के बाद नेतन्याहू ने कहा कि दोनों देशों के बीच इस बात पर स्पष्ट सहमति बनी है कि ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाएंगे। माना जा रहा है कि यह बैठक मिडिल ईस्ट की भविष्य की रणनीति तय करने के लिहाज से बेहद अहम रही।

    इसी दौरान यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने भी ट्रंप से मुलाकात कर एयर डिफेंस सिस्टम रक्षा सहयोग और रूस यूक्रेन युद्ध पर विस्तार से चर्चा की। दूसरी ओर ओमान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के नियंत्रण को लेकर नया प्रस्ताव रखा है जिसमें इस रणनीतिक समुद्री मार्ग का संचालन क्षेत्र के सभी देशों की साझेदारी से करने की बात कही गई है। इस प्रस्ताव को खाड़ी क्षेत्र के कई देशों का समर्थन मिलने की खबर है।

    बढ़ते तनाव के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच संभावित बातचीत की खबरों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कुछ नरमी देखने को मिली है। हालांकि सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा हालात और बिगड़ते हैं तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है।

    उधर यमन के हूती विद्रोहियों की चेतावनी के बाद रेड सी में जहाजों की सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा बन गई है। रिपोर्टों के अनुसार चीन ने अपने तेल टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए हूती प्रतिनिधियों से सीधे संपर्क किया है ताकि समुद्री व्यापार प्रभावित न हो।

    संयुक्त राष्ट्र में भी इस पूरे घटनाक्रम पर चिंता जताई गई है। पाकिस्तान ने कहा कि सऊदी अरब को इस संघर्ष में घसीटने की कोशिश हो रही है और सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। वहीं गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल ने सऊदी अरब पर हुए हमलों की कड़ी निंदा करते हुए उसकी सुरक्षा और संप्रभुता के समर्थन का भरोसा दोहराया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं हुए तो यह संघर्ष केवल ईरान और इजरायल तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर असर डाल सकता है।

  • केन्द्र सरकार का बड़ा फैसला… मिडिल ईस्ट तनाव के बीच गैस सप्लाई पर लागू किए गए विशेष प्रावधान हटाए

    केन्द्र सरकार का बड़ा फैसला… मिडिल ईस्ट तनाव के बीच गैस सप्लाई पर लागू किए गए विशेष प्रावधान हटाए


    नई दिल्ली।
    मिडिल ईस्ट (Middle East) में तनाव कम होने के बाद भारत सरकार (Government of India) ने नेचुरल गैस सप्लाई (Natural gas supply) को लेकर बड़ा फैसला लिया है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) से जहाजों की आवाजाही फिर शुरू होने के बाद सरकार ने मार्च 2026 में लागू किए गए आपातकालीन गैस सप्लाई नियमों में बदलाव किया है. नए आदेश के तहत पहले लागू किए गए कई विशेष प्रावधान हटा दिए गए हैं. यह फैसला तुरंत प्रभाव से लागू हो गया है।

    दरअसल, मार्च 2026 में मिडिल ईस्ट के तनाव की वजह से समुद्र के रास्ते आने वाली एलएनजी (Liquefied Natural Gas) की सप्लाई बुरी प्रभावित हो गई थी. कुछ विदेशी कंपनियों ने भी हाथ खड़े कर दिए थे और गैस देने से मना कर दिया था. ऐसे बिगड़े हालातों को संभालने के लिए सरकार ने 9 मार्च 2026 को नेचुरल गैस (सप्लाई रेगुलेशन) ऑर्डर लागू किया था।

    इस आदेश का मकसद यह था कि देश में उपलब्ध गैस की सप्लाई प्राथमिकता वाले क्षेत्रों तक बिना रुकावट पहुंचती रहे. इसके लिए सरकार ने गैस के उत्पादन, आवंटन और वितरण को लेकर विशेष नियम लागू किए थे।

    सरकार के मुताबिक, मिडिल ईस्ट में अब युद्धविराम लागू हो चुका है. वहां शांति के लिए बातचीत का दौर भी चल रहा है. इसी बीच होर्मुज के रास्ते जहाजों का आना-जाना फिर से शुरू हो गया है. हालात में आए इसी बड़े बदलाव को देखते हुए पेट्रोलियम और नेचुरल गैस मंत्रालय ने 4 जुलाई 2026 को नया आदेश जारी किया है।

    9 मार्च 2026 को जारी किए गए आदेश में सरकार ने आपातकालीन हालात से निपटने के लिए कई विशेष प्रावधान लागू किए थे. अब नए आदेश के जरिए इन्हें हटा दिया गया है. इनमें मुख्य तौर पर ये प्रावधान शामिल थे।

    गैस के उत्पादन और बंटवारे पर नियंत्रण: संकट के समय सरकार ने यह नियम बनाया था कि देश में नेचुरल गैस का कितना उत्पादन होगा और वह किस सेक्टर को कितनी दी जाएगी, यह सब सरकार ही तय करेगी।


    जरूरी क्षेत्रों को प्राथमिकता:

    गैस की कमी को देखते हुए सबसे पहले घरेलू इस्तेमाल और प्राथमिकता वाले क्षेत्रों तक गैस की उपलब्धता सुनिश्चित करने की व्यवस्था की गई थी.


    सप्लाई और इस्तेमाल पर पाबंदियां:

    नेचुरल गैस और एलएनजी (LNG) की सप्लाई, उसके वितरण और इस्तेमाल को लेकर कुछ समय के लिए कड़े नियम लागू कर दिए गए थे, ताकि कोई इसका गलत इस्तेमाल न कर सके.

    अब मिडिल ईस्ट में युद्धविराम और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से समुद्री आवाजाही फिर शुरू होने के बाद सरकार ने ये विशेष प्रावधान हटा दिए हैं. इससे गैस सप्लाई व्यवस्था फिर पहले जैसे सामान्य नियमों के तहत चलेगी।


    इसका क्या असर होगा?

    सरकार का मानना है कि समुद्री मार्ग दोबारा खुलने से गैस की आपूर्ति व्यवस्था पहले के मुकाबले आसान होगी. इसी वजह से आपातकालीन व्यवस्था के तहत लागू कुछ नियमों की अब जरूरत नहीं रही. हालांकि, सरकार ने यह भी साफ किया है कि हालात पर लगातार नजर रखी जाएगी. अगर भविष्य में फिर कोई संकट पैदा होता है, तो जरूरत के मुताबिक नए कदम उठाए जा सकते हैं.

  • मिडिल ईस्ट तनाव के बीच भारत अलर्ट तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने कहा फिलहाल ईरान की यात्रा न करें

    मिडिल ईस्ट तनाव के बीच भारत अलर्ट तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने कहा फिलहाल ईरान की यात्रा न करें


    नई दिल्ली । भारत ने ईरान में मौजूद सुरक्षा हालात को देखते हुए अपने नागरिकों के लिए नई ट्रैवल एडवाइजरी जारी की है। तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने साफ कहा है कि परिस्थितियों में कुछ सुधार के संकेत जरूर मिले हैं लेकिन स्थिति अभी पूरी तरह सामान्य नहीं मानी जा सकती। ऐसे में भारतीय नागरिक अगली सूचना तक ईरान की सभी गैर जरूरी यात्राओं से बचें और केवल अत्यंत आवश्यक परिस्थितियों में ही वहां जाने का निर्णय लें।

    दूतावास ने स्पष्ट किया है कि जिन लोगों के लिए ईरान की यात्रा बेहद जरूरी है वे पूरी सतर्कता बरतें और स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी सभी सुरक्षा निर्देशों का पालन करें। भारतीय मिशन लगातार वहां की बदलती परिस्थितियों पर नजर बनाए हुए है और जरूरत पड़ने पर नई एडवाइजरी जारी की जाएगी।

    भारतीय दूतावास ने ईरान में रह रहे भारतीय नागरिकों से भी विशेष सावधानी बरतने की अपील की है। उन्हें सलाह दी गई है कि वे बिना आवश्यकता के यात्रा करने से बचें और किसी भी प्रकार की अफवाह या अपुष्ट जानकारी पर भरोसा न करें। केवल विश्वसनीय समाचार स्रोतों और स्थानीय प्रशासन की आधिकारिक सूचनाओं के आधार पर ही निर्णय लें।

    दूतावास ने कहा कि सुरक्षा हालात में सुधार के बावजूद जोखिम पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। इसलिए भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए मौजूदा एडवाइजरी को फिलहाल वापस नहीं लिया गया है। हालात पर लगातार निगरानी रखी जा रही है और आवश्यकता के अनुसार आगे के निर्देश जारी किए जाएंगे।

    भारतीय नागरिकों से यह भी कहा गया है कि यदि वे ईरान में रह रहे हैं तो अपने संपर्क विवरण भारतीय दूतावास के पास अवश्य दर्ज कराएं ताकि किसी भी आपात स्थिति में उनसे तुरंत संपर्क किया जा सके। दूतावास ने आपातकालीन सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए हैं और जरूरत पड़ने पर तुरंत संपर्क करने की सलाह दी है।

    यह एडवाइजरी ऐसे समय जारी की गई है जब मिडिल ईस्ट में तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी हैं। हालांकि क्षेत्र में हालात अभी भी संवेदनशील बने हुए हैं और किसी भी समय स्थिति बदल सकती है। इसी वजह से भारत सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त सतर्कता बरत रही है।

    भारतीय दूतावास ने भरोसा दिलाया है कि वह ईरान में रह रहे प्रत्येक भारतीय की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय प्रशासन के साथ लगातार संपर्क में है। साथ ही नागरिकों से अपील की गई है कि वे धैर्य बनाए रखें और किसी भी आपात स्थिति में दूतावास द्वारा जारी हेल्पलाइन नंबरों का उपयोग करें।

    आपातकालीन संपर्क नंबर

    +989128109115

    +989128109109

    +989128109102

    +989932179359

  • कर्नाटक HC की सख्त टिप्पणी…. कहा- मिडिल-ईस्ट की तरह हाथ-पैर काटे… तभी लोग मानेंगे कानून

    कर्नाटक HC की सख्त टिप्पणी…. कहा- मिडिल-ईस्ट की तरह हाथ-पैर काटे… तभी लोग मानेंगे कानून


    बेंगलुरु।
    देश में अपराध के मामले जिस तरह से बढ़ रहे हैं और लोग कानून को हल्के में ले रहे हैं, उस पर कर्नाटक हाईकोर्ट (Karnataka High Court) ने कड़ी नाराजगी जाहिर की है। एक रेप आरोपी की जमानत याचिका (Bail Petition) पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि लोकतंत्र में लोग अपने अधिकारों का गलत फायदा उठा रहे हैं। अगर खाड़ी (मिडिल-ईस्ट-Middle East) देशों की तरह अपराधियों के हाथ-पैर काटने जैसी कड़ी सजा दी जाए, शायद तभी लोग कानून का पालन करना सीखेंगे।


    ‘कानून ने अपने दांत खो दिए हैं’

    कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस आर. नटराज की बेंच 23 वर्षीय रेप आरोपी गोपी रेड्डी कार्तिक रेड्डी की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसी दौरान जस्टिस नटराज ने बेहद तल्ख मौखिक टिप्पणियां कीं। उन्होंने कहा, “हम अपराधियों से सख्ती से नहीं निपट रहे हैं, इसी वजह से कानून ने अपने दांत खो दिए हैं (प्रभावहीन हो गया है)। मिडिल-ईस्ट के उलट यहां अपराध करना बहुत आसान हो गया है। अगर हाथ या पैर काट दिए जाएं, तो शायद तभी लोगों को समझ आएगा कि कानून का पालन करना है। क्योंकि हमारे यहां लोकतंत्र है, इसलिए हर कोई इसे हल्के में लेता है।”

    ‘नमक खाया है, तो पानी पीना पड़ेगा’
    जज ने आरोपी को फिलहाल जमानत देने से इनकार करते हुए कहा, “अगर आपने नमक खाया है, तो पानी पीना ही पड़ेगा। उसे (आरोपी को) और चार-पांच दिन वहीं रहने दो। उसे जेल की आदत पड़ने दो। क्या पता, अगर उसे सजा हो गई तो वापस वहीं जाना पड़ सकता है।” कोर्ट ने आरोपी की जमानत याचिका पर राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है और मामले की अगली सुनवाई के लिए 8 जून की तारीख तय की है।


    क्या है पूरा मामला?

    आरोपी गोपी रेड्डी कार्तिक रेड्डी मणिपाल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) का छात्र है और रेप के आरोप में 5 अप्रैल से न्यायिक हिरासत में है। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, पीड़िता और आरोपी मणिपाल में क्लासमेट थे। जुलाई 2023 में आरोपी ने लड़की से अपने प्यार का इजहार किया था, जिसे शुरुआत में लड़की ने भी मान लिया, लेकिन बाद में शक होने पर उसने आरोपी से दूरी बना ली।

    शिकायत के अनुसार, 12 सितंबर 2023 को आरोपी रिश्ते पर बात करने के बहाने लड़की को अपने फ्लैट पर ले गया और वहां उसकी इच्छा के खिलाफ उसका यौन उत्पीड़न किया। इस घटना से पीड़िता गहरे सदमे और डिप्रेशन में चली गई, जिसके लिए उसने केएमसी (KMC) मणिपाल में अपना इलाज भी कराया।

    पीड़िता ने पहले बेंगलुरु में राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) का दरवाजा खटखटाया और फिर उडुपी महिला पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 375(ए) और 376 के तहत केस दर्ज कराया।

    बचाव पक्ष की क्या रही दलील?
    बचाव पक्ष की वकील अयानतिका मंडल ने कोर्ट में दलील दी कि उनका मुवक्किल लगभग 2 महीने से जेल में बंद है और उसने कोई अपराध नहीं किया है। वकील की तरफ से यह भी तर्क दिया गया कि ये आरोप करीब 3 साल पुरानी घटना से जुड़े हैं और अगर आरोपी को आगे भी जेल में रखा गया, तो इससे उसका पेशेवर भविष्य पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा। हालांकि, कोर्ट ने फिलहाल कोई राहत नहीं दी है।

    कोर्ट ने रेड्डी को जमानत देने से इनकार करते हुए टिप्पणी की, “अगर आप नमक खाते हैं, तो आपको पानी भी पीना होगा। उसे चार-पांच दिन और रहने दीजिए। उसे जेल की आदत डालने दीजिए। कौन जानता है, अगर आपको सजा हुई तो आपको वापस जाना पड़ सकता है।” अदालत ने रेड्डी की जमानत याचिका पर राज्य को नोटिस जारी किया और निर्देश दिया कि इस मामले पर आगे विचार के लिए 8 जून को सुनवाई की जाए।

  • ट्रंप को पाकिस्तान का बड़ा झटका, रक्षा मंत्री बोले- इजरायल से समझौता हमारी विचारधारा के खिलाफ

    ट्रंप को पाकिस्तान का बड़ा झटका, रक्षा मंत्री बोले- इजरायल से समझौता हमारी विचारधारा के खिलाफ




    नई दिल्ली। पाकिस्तान ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि वह इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य बनाने वाले अब्राहम समझौते का हिस्सा बनने के पक्ष में नहीं है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री Khawaja Asif ने कहा कि इस तरह का समझौता देश की बुनियादी विचारधारा से मेल नहीं खाता और पाकिस्तान फिलहाल इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाएगा।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब Donald Trump ने मध्य-पूर्व में चल रही कूटनीतिक कोशिशों के बीच कई मुस्लिम देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने की अपील की है। अमेरिका चाहता है कि Saudi Arabia, Qatar, पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र जैसे देश भी इजरायल के साथ संबंध सामान्य करें।

    सोमवार रात एक टीवी कार्यक्रम में ख्वाजा आसिफ ने कहा कि व्यक्तिगत तौर पर उन्हें नहीं लगता कि पाकिस्तान को ऐसे किसी समझौते का हिस्सा बनना चाहिए जो उसकी वैचारिक और राजनीतिक नीति के खिलाफ हो। उन्होंने दोहराया कि पाकिस्तान का पुराना रुख आज भी कायम है और जब तक 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाकर स्वतंत्र फिलिस्तीनी राष्ट्र की स्थापना नहीं होती, तब तक पाकिस्तान इजरायल को मान्यता नहीं देगा।

    पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने इजरायल पर भरोसे का सवाल भी उठाया। उन्होंने कहा कि जिन देशों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, उनके साथ स्थायी समझौता करना मुश्किल है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पाकिस्तान के पासपोर्ट पर आज भी साफ लिखा होता है कि यह इजरायल की यात्रा के लिए मान्य नहीं है।

    गौरतलब है कि अब्राहम अकॉर्ड 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता से शुरू हुआ था। इसके तहत United Arab Emirates और Bahrain समेत कई अरब देशों ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए थे। बाद में मोरक्को और सूडान भी इस समझौते का हिस्सा बने।

    ख्वाजा आसिफ पहले भी इजरायल के खिलाफ कड़े बयान दे चुके हैं। हाल ही में उन्होंने इजरायल को “इंसानियत के लिए अभिशाप” बताते हुए गाजा में कथित नरसंहार का आरोप लगाया था। पाकिस्तान सरकार का यह ताजा बयान संकेत देता है कि फिलहाल इस्लामाबाद अमेरिका के दबाव के बावजूद अपने पारंपरिक फिलिस्तीन समर्थक रुख से पीछे हटने को तैयार नहीं है।

  • सऊदी अरब के ड्रीम प्रोजेक्ट NEOM पर संकट, घटते निवेश और आर्थिक दबाव ने बढ़ाई मुश्किलें

    सऊदी अरब के ड्रीम प्रोजेक्ट NEOM पर संकट, घटते निवेश और आर्थिक दबाव ने बढ़ाई मुश्किलें



    नई दिल्ली। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का महत्वाकांक्षी ‘NEOM’ प्रोजेक्ट अब गंभीर आर्थिक चुनौतियों के बीच घिरता नजर आ रहा है। कभी भविष्य के सबसे बड़े और आधुनिक शहर के रूप में पेश किए गए इस मेगा प्रोजेक्ट को लेकर अब खर्चों में कटौती, निर्माण की रफ्तार धीमी करने और योजनाओं को सीमित करने की चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    ‘विजन-2030’ के तहत शुरू किए गए NEOM प्रोजेक्ट का मकसद तेल आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर सऊदी अरब को तकनीक, पर्यटन और वैश्विक निवेश का नया केंद्र बनाना था। इस योजना में रेगिस्तान के बीच करीब 170 किलोमीटर लंबी भविष्यवादी “लाइन सिटी” बनाने की परिकल्पना की गई थी, जिसमें शीशे की दीवारों वाले आधुनिक ढांचे, हाईटेक ट्रांसपोर्ट और लग्जरी सुविधाएं शामिल थीं।

    हालांकि अब वैश्विक आर्थिक दबाव, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और विदेशी निवेश में कमी के कारण प्रोजेक्ट की रफ्तार प्रभावित हुई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई हिस्सों को फिलहाल सीमित किया जा रहा है और शुरुआती चरण में सिर्फ छोटे हिस्से के निर्माण पर फोकस किया जाएगा।

    बताया जा रहा है कि सऊदी सरकार ने कई अंतरराष्ट्रीय कंसल्टेंसी कंपनियों के नए कॉन्ट्रैक्ट रोक दिए हैं और कुछ भुगतान भी होल्ड पर डाल दिए गए हैं। वहीं, कुछ बड़े खेल और मनोरंजन निवेशों की गति भी धीमी पड़ गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यूक्रेन युद्ध, क्षेत्रीय अस्थिरता और वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण विदेशी निवेशकों का भरोसा पहले जैसा नहीं रहा। इसके साथ ही सऊदी अरब को अपने बढ़ते बजट घाटे और भारी खर्चों को संतुलित करने के लिए अब ज्यादा व्यावहारिक रणनीति अपनानी पड़ रही है।

    फिलहाल NEOM पूरी तरह बंद होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इतना साफ है कि सऊदी अरब अब अपने बड़े सपनों को आर्थिक वास्तविकताओं के हिसाब से दोबारा आकार देने की कोशिश कर रहा है।

  • ईरान का सख़्त संदेश: सरेंडर नहीं करेंगे, ट्रंप की धमकी पर राष्ट्रपति पेजेश्कियान का पलटवार

    ईरान का सख़्त संदेश: सरेंडर नहीं करेंगे, ट्रंप की धमकी पर राष्ट्रपति पेजेश्कियान का पलटवार



    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के बीच ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने स्पष्ट कहा है कि उनका देश किसी भी हालत में सरेंडर नहीं करेगा। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों का जवाब देते हुए कहा कि बातचीत का मतलब झुकना नहीं होता, बल्कि अपने अधिकारों और गरिमा के साथ चर्चा करना होता है।

    राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि ईरान अपनी संप्रभुता और कानूनी अधिकारों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि देश पूरी मजबूती और सम्मान के साथ बातचीत की प्रक्रिया में शामिल है, लेकिन दबाव या धमकी के आगे नहीं झुकेगा।

    इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि खाड़ी देशों—कतर, सऊदी अरब और यूएई—के नेताओं के अनुरोध पर ईरान पर प्रस्तावित सैन्य कार्रवाई को फिलहाल रोक दिया गया है। ट्रंप के अनुसार, इस समय क्षेत्र में शांति समझौते को लेकर गंभीर बातचीत चल रही है, लेकिन अगर डील नहीं होती है तो अमेरिका सैन्य विकल्पों के लिए तैयार है।

    ट्रंप ने यह भी कहा कि किसी भी समझौते में सबसे अहम शर्त यह होगी कि ईरान परमाणु हथियार विकसित न कर सके। उन्होंने अमेरिकी सेना को भी निर्देश दिया है कि जरूरत पड़ने पर कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार रहें।

    इस बीच ट्रंप ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा था कि समय तेजी से खत्म हो रहा है और अगर जल्द समझौता नहीं हुआ तो परिणाम गंभीर होंगे। वहीं, दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव के बावजूद कूटनीतिक बातचीत की संभावना अभी भी बनी हुई है।

    फिलहाल हालात यह हैं कि एक तरफ अमेरिका दबाव और चेतावनी की रणनीति अपना रहा है, तो दूसरी तरफ ईरान अपने रुख पर अडिग रहते हुए बातचीत को “सरेंडर नहीं” मानने की बात दोहरा रहा है।

  • मध्यस्थता के बीच बड़ा खुलासा: पाकिस्तान ने सऊदी अरब में तैनात किए 8000 सैनिक, जंग जैसी तैयारी पर सवाल

    मध्यस्थता के बीच बड़ा खुलासा: पाकिस्तान ने सऊदी अरब में तैनात किए 8000 सैनिक, जंग जैसी तैयारी पर सवाल



    नई दिल्ली(New Delhi)। 
    मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और शांति प्रयासों के बीच पाकिस्तान की सैन्य रणनीति को लेकर बड़े दावे सामने आए हैं। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते के तहत लगभग 8000 सैनिकों की तैनाती की है, जिसमें लड़ाकू विमान, ड्रोन स्क्वाड्रन और वायु रक्षा प्रणाली शामिल हैं।

    सूत्रों के अनुसार इस तैनाती में चीन के सहयोग से विकसित JF-17 Thunder लड़ाकू विमान शामिल हैं, जिनकी संख्या लगभग 16 बताई जा रही है। इसके साथ ही दो ड्रोन स्क्वाड्रन और चीनी मूल की HQ-9 Air Defense System भी तैनात की गई है, जिसे पाकिस्तानी कर्मी संचालित कर रहे हैं।

    रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि यह पूरी तैनाती सऊदी अरब के खर्च पर की जा रही है और इसे “युद्ध-सक्षम समर्थन बल” के रूप में देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि जरूरत पड़ने पर और सैनिकों की तैनाती का भी प्रावधान है, जिससे यह संख्या आगे और बढ़ सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम उस समय उठाया गया है जब पाकिस्तान खुद को अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है और क्षेत्रीय शांति वार्ताओं में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। हालांकि अब तक पाकिस्तान और सऊदी अरब की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

    रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यह तैनाती पश्चिम एशिया में बदलते सुरक्षा समीकरणों और संभावित संघर्ष की आशंकाओं से जुड़ी हो सकती है।