Tag: Middle East

  • मिडिल ईस्ट तनाव के बीच भारत अलर्ट तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने कहा फिलहाल ईरान की यात्रा न करें

    मिडिल ईस्ट तनाव के बीच भारत अलर्ट तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने कहा फिलहाल ईरान की यात्रा न करें


    नई दिल्ली । भारत ने ईरान में मौजूद सुरक्षा हालात को देखते हुए अपने नागरिकों के लिए नई ट्रैवल एडवाइजरी जारी की है। तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने साफ कहा है कि परिस्थितियों में कुछ सुधार के संकेत जरूर मिले हैं लेकिन स्थिति अभी पूरी तरह सामान्य नहीं मानी जा सकती। ऐसे में भारतीय नागरिक अगली सूचना तक ईरान की सभी गैर जरूरी यात्राओं से बचें और केवल अत्यंत आवश्यक परिस्थितियों में ही वहां जाने का निर्णय लें।

    दूतावास ने स्पष्ट किया है कि जिन लोगों के लिए ईरान की यात्रा बेहद जरूरी है वे पूरी सतर्कता बरतें और स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी सभी सुरक्षा निर्देशों का पालन करें। भारतीय मिशन लगातार वहां की बदलती परिस्थितियों पर नजर बनाए हुए है और जरूरत पड़ने पर नई एडवाइजरी जारी की जाएगी।

    भारतीय दूतावास ने ईरान में रह रहे भारतीय नागरिकों से भी विशेष सावधानी बरतने की अपील की है। उन्हें सलाह दी गई है कि वे बिना आवश्यकता के यात्रा करने से बचें और किसी भी प्रकार की अफवाह या अपुष्ट जानकारी पर भरोसा न करें। केवल विश्वसनीय समाचार स्रोतों और स्थानीय प्रशासन की आधिकारिक सूचनाओं के आधार पर ही निर्णय लें।

    दूतावास ने कहा कि सुरक्षा हालात में सुधार के बावजूद जोखिम पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। इसलिए भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए मौजूदा एडवाइजरी को फिलहाल वापस नहीं लिया गया है। हालात पर लगातार निगरानी रखी जा रही है और आवश्यकता के अनुसार आगे के निर्देश जारी किए जाएंगे।

    भारतीय नागरिकों से यह भी कहा गया है कि यदि वे ईरान में रह रहे हैं तो अपने संपर्क विवरण भारतीय दूतावास के पास अवश्य दर्ज कराएं ताकि किसी भी आपात स्थिति में उनसे तुरंत संपर्क किया जा सके। दूतावास ने आपातकालीन सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए हैं और जरूरत पड़ने पर तुरंत संपर्क करने की सलाह दी है।

    यह एडवाइजरी ऐसे समय जारी की गई है जब मिडिल ईस्ट में तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी हैं। हालांकि क्षेत्र में हालात अभी भी संवेदनशील बने हुए हैं और किसी भी समय स्थिति बदल सकती है। इसी वजह से भारत सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त सतर्कता बरत रही है।

    भारतीय दूतावास ने भरोसा दिलाया है कि वह ईरान में रह रहे प्रत्येक भारतीय की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय प्रशासन के साथ लगातार संपर्क में है। साथ ही नागरिकों से अपील की गई है कि वे धैर्य बनाए रखें और किसी भी आपात स्थिति में दूतावास द्वारा जारी हेल्पलाइन नंबरों का उपयोग करें।

    आपातकालीन संपर्क नंबर

    +989128109115

    +989128109109

    +989128109102

    +989932179359

  • कर्नाटक HC की सख्त टिप्पणी…. कहा- मिडिल-ईस्ट की तरह हाथ-पैर काटे… तभी लोग मानेंगे कानून

    कर्नाटक HC की सख्त टिप्पणी…. कहा- मिडिल-ईस्ट की तरह हाथ-पैर काटे… तभी लोग मानेंगे कानून


    बेंगलुरु।
    देश में अपराध के मामले जिस तरह से बढ़ रहे हैं और लोग कानून को हल्के में ले रहे हैं, उस पर कर्नाटक हाईकोर्ट (Karnataka High Court) ने कड़ी नाराजगी जाहिर की है। एक रेप आरोपी की जमानत याचिका (Bail Petition) पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि लोकतंत्र में लोग अपने अधिकारों का गलत फायदा उठा रहे हैं। अगर खाड़ी (मिडिल-ईस्ट-Middle East) देशों की तरह अपराधियों के हाथ-पैर काटने जैसी कड़ी सजा दी जाए, शायद तभी लोग कानून का पालन करना सीखेंगे।


    ‘कानून ने अपने दांत खो दिए हैं’

    कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस आर. नटराज की बेंच 23 वर्षीय रेप आरोपी गोपी रेड्डी कार्तिक रेड्डी की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसी दौरान जस्टिस नटराज ने बेहद तल्ख मौखिक टिप्पणियां कीं। उन्होंने कहा, “हम अपराधियों से सख्ती से नहीं निपट रहे हैं, इसी वजह से कानून ने अपने दांत खो दिए हैं (प्रभावहीन हो गया है)। मिडिल-ईस्ट के उलट यहां अपराध करना बहुत आसान हो गया है। अगर हाथ या पैर काट दिए जाएं, तो शायद तभी लोगों को समझ आएगा कि कानून का पालन करना है। क्योंकि हमारे यहां लोकतंत्र है, इसलिए हर कोई इसे हल्के में लेता है।”

    ‘नमक खाया है, तो पानी पीना पड़ेगा’
    जज ने आरोपी को फिलहाल जमानत देने से इनकार करते हुए कहा, “अगर आपने नमक खाया है, तो पानी पीना ही पड़ेगा। उसे (आरोपी को) और चार-पांच दिन वहीं रहने दो। उसे जेल की आदत पड़ने दो। क्या पता, अगर उसे सजा हो गई तो वापस वहीं जाना पड़ सकता है।” कोर्ट ने आरोपी की जमानत याचिका पर राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है और मामले की अगली सुनवाई के लिए 8 जून की तारीख तय की है।


    क्या है पूरा मामला?

    आरोपी गोपी रेड्डी कार्तिक रेड्डी मणिपाल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) का छात्र है और रेप के आरोप में 5 अप्रैल से न्यायिक हिरासत में है। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, पीड़िता और आरोपी मणिपाल में क्लासमेट थे। जुलाई 2023 में आरोपी ने लड़की से अपने प्यार का इजहार किया था, जिसे शुरुआत में लड़की ने भी मान लिया, लेकिन बाद में शक होने पर उसने आरोपी से दूरी बना ली।

    शिकायत के अनुसार, 12 सितंबर 2023 को आरोपी रिश्ते पर बात करने के बहाने लड़की को अपने फ्लैट पर ले गया और वहां उसकी इच्छा के खिलाफ उसका यौन उत्पीड़न किया। इस घटना से पीड़िता गहरे सदमे और डिप्रेशन में चली गई, जिसके लिए उसने केएमसी (KMC) मणिपाल में अपना इलाज भी कराया।

    पीड़िता ने पहले बेंगलुरु में राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) का दरवाजा खटखटाया और फिर उडुपी महिला पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 375(ए) और 376 के तहत केस दर्ज कराया।

    बचाव पक्ष की क्या रही दलील?
    बचाव पक्ष की वकील अयानतिका मंडल ने कोर्ट में दलील दी कि उनका मुवक्किल लगभग 2 महीने से जेल में बंद है और उसने कोई अपराध नहीं किया है। वकील की तरफ से यह भी तर्क दिया गया कि ये आरोप करीब 3 साल पुरानी घटना से जुड़े हैं और अगर आरोपी को आगे भी जेल में रखा गया, तो इससे उसका पेशेवर भविष्य पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा। हालांकि, कोर्ट ने फिलहाल कोई राहत नहीं दी है।

    कोर्ट ने रेड्डी को जमानत देने से इनकार करते हुए टिप्पणी की, “अगर आप नमक खाते हैं, तो आपको पानी भी पीना होगा। उसे चार-पांच दिन और रहने दीजिए। उसे जेल की आदत डालने दीजिए। कौन जानता है, अगर आपको सजा हुई तो आपको वापस जाना पड़ सकता है।” अदालत ने रेड्डी की जमानत याचिका पर राज्य को नोटिस जारी किया और निर्देश दिया कि इस मामले पर आगे विचार के लिए 8 जून को सुनवाई की जाए।

  • ट्रंप को पाकिस्तान का बड़ा झटका, रक्षा मंत्री बोले- इजरायल से समझौता हमारी विचारधारा के खिलाफ

    ट्रंप को पाकिस्तान का बड़ा झटका, रक्षा मंत्री बोले- इजरायल से समझौता हमारी विचारधारा के खिलाफ




    नई दिल्ली। पाकिस्तान ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि वह इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य बनाने वाले अब्राहम समझौते का हिस्सा बनने के पक्ष में नहीं है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री Khawaja Asif ने कहा कि इस तरह का समझौता देश की बुनियादी विचारधारा से मेल नहीं खाता और पाकिस्तान फिलहाल इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाएगा।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब Donald Trump ने मध्य-पूर्व में चल रही कूटनीतिक कोशिशों के बीच कई मुस्लिम देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने की अपील की है। अमेरिका चाहता है कि Saudi Arabia, Qatar, पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र जैसे देश भी इजरायल के साथ संबंध सामान्य करें।

    सोमवार रात एक टीवी कार्यक्रम में ख्वाजा आसिफ ने कहा कि व्यक्तिगत तौर पर उन्हें नहीं लगता कि पाकिस्तान को ऐसे किसी समझौते का हिस्सा बनना चाहिए जो उसकी वैचारिक और राजनीतिक नीति के खिलाफ हो। उन्होंने दोहराया कि पाकिस्तान का पुराना रुख आज भी कायम है और जब तक 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाकर स्वतंत्र फिलिस्तीनी राष्ट्र की स्थापना नहीं होती, तब तक पाकिस्तान इजरायल को मान्यता नहीं देगा।

    पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने इजरायल पर भरोसे का सवाल भी उठाया। उन्होंने कहा कि जिन देशों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, उनके साथ स्थायी समझौता करना मुश्किल है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पाकिस्तान के पासपोर्ट पर आज भी साफ लिखा होता है कि यह इजरायल की यात्रा के लिए मान्य नहीं है।

    गौरतलब है कि अब्राहम अकॉर्ड 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता से शुरू हुआ था। इसके तहत United Arab Emirates और Bahrain समेत कई अरब देशों ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए थे। बाद में मोरक्को और सूडान भी इस समझौते का हिस्सा बने।

    ख्वाजा आसिफ पहले भी इजरायल के खिलाफ कड़े बयान दे चुके हैं। हाल ही में उन्होंने इजरायल को “इंसानियत के लिए अभिशाप” बताते हुए गाजा में कथित नरसंहार का आरोप लगाया था। पाकिस्तान सरकार का यह ताजा बयान संकेत देता है कि फिलहाल इस्लामाबाद अमेरिका के दबाव के बावजूद अपने पारंपरिक फिलिस्तीन समर्थक रुख से पीछे हटने को तैयार नहीं है।

  • सऊदी अरब के ड्रीम प्रोजेक्ट NEOM पर संकट, घटते निवेश और आर्थिक दबाव ने बढ़ाई मुश्किलें

    सऊदी अरब के ड्रीम प्रोजेक्ट NEOM पर संकट, घटते निवेश और आर्थिक दबाव ने बढ़ाई मुश्किलें



    नई दिल्ली। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का महत्वाकांक्षी ‘NEOM’ प्रोजेक्ट अब गंभीर आर्थिक चुनौतियों के बीच घिरता नजर आ रहा है। कभी भविष्य के सबसे बड़े और आधुनिक शहर के रूप में पेश किए गए इस मेगा प्रोजेक्ट को लेकर अब खर्चों में कटौती, निर्माण की रफ्तार धीमी करने और योजनाओं को सीमित करने की चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    ‘विजन-2030’ के तहत शुरू किए गए NEOM प्रोजेक्ट का मकसद तेल आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर सऊदी अरब को तकनीक, पर्यटन और वैश्विक निवेश का नया केंद्र बनाना था। इस योजना में रेगिस्तान के बीच करीब 170 किलोमीटर लंबी भविष्यवादी “लाइन सिटी” बनाने की परिकल्पना की गई थी, जिसमें शीशे की दीवारों वाले आधुनिक ढांचे, हाईटेक ट्रांसपोर्ट और लग्जरी सुविधाएं शामिल थीं।

    हालांकि अब वैश्विक आर्थिक दबाव, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और विदेशी निवेश में कमी के कारण प्रोजेक्ट की रफ्तार प्रभावित हुई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई हिस्सों को फिलहाल सीमित किया जा रहा है और शुरुआती चरण में सिर्फ छोटे हिस्से के निर्माण पर फोकस किया जाएगा।

    बताया जा रहा है कि सऊदी सरकार ने कई अंतरराष्ट्रीय कंसल्टेंसी कंपनियों के नए कॉन्ट्रैक्ट रोक दिए हैं और कुछ भुगतान भी होल्ड पर डाल दिए गए हैं। वहीं, कुछ बड़े खेल और मनोरंजन निवेशों की गति भी धीमी पड़ गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यूक्रेन युद्ध, क्षेत्रीय अस्थिरता और वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण विदेशी निवेशकों का भरोसा पहले जैसा नहीं रहा। इसके साथ ही सऊदी अरब को अपने बढ़ते बजट घाटे और भारी खर्चों को संतुलित करने के लिए अब ज्यादा व्यावहारिक रणनीति अपनानी पड़ रही है।

    फिलहाल NEOM पूरी तरह बंद होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इतना साफ है कि सऊदी अरब अब अपने बड़े सपनों को आर्थिक वास्तविकताओं के हिसाब से दोबारा आकार देने की कोशिश कर रहा है।

  • ईरान का सख़्त संदेश: सरेंडर नहीं करेंगे, ट्रंप की धमकी पर राष्ट्रपति पेजेश्कियान का पलटवार

    ईरान का सख़्त संदेश: सरेंडर नहीं करेंगे, ट्रंप की धमकी पर राष्ट्रपति पेजेश्कियान का पलटवार



    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के बीच ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने स्पष्ट कहा है कि उनका देश किसी भी हालत में सरेंडर नहीं करेगा। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों का जवाब देते हुए कहा कि बातचीत का मतलब झुकना नहीं होता, बल्कि अपने अधिकारों और गरिमा के साथ चर्चा करना होता है।

    राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि ईरान अपनी संप्रभुता और कानूनी अधिकारों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि देश पूरी मजबूती और सम्मान के साथ बातचीत की प्रक्रिया में शामिल है, लेकिन दबाव या धमकी के आगे नहीं झुकेगा।

    इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि खाड़ी देशों—कतर, सऊदी अरब और यूएई—के नेताओं के अनुरोध पर ईरान पर प्रस्तावित सैन्य कार्रवाई को फिलहाल रोक दिया गया है। ट्रंप के अनुसार, इस समय क्षेत्र में शांति समझौते को लेकर गंभीर बातचीत चल रही है, लेकिन अगर डील नहीं होती है तो अमेरिका सैन्य विकल्पों के लिए तैयार है।

    ट्रंप ने यह भी कहा कि किसी भी समझौते में सबसे अहम शर्त यह होगी कि ईरान परमाणु हथियार विकसित न कर सके। उन्होंने अमेरिकी सेना को भी निर्देश दिया है कि जरूरत पड़ने पर कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार रहें।

    इस बीच ट्रंप ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा था कि समय तेजी से खत्म हो रहा है और अगर जल्द समझौता नहीं हुआ तो परिणाम गंभीर होंगे। वहीं, दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव के बावजूद कूटनीतिक बातचीत की संभावना अभी भी बनी हुई है।

    फिलहाल हालात यह हैं कि एक तरफ अमेरिका दबाव और चेतावनी की रणनीति अपना रहा है, तो दूसरी तरफ ईरान अपने रुख पर अडिग रहते हुए बातचीत को “सरेंडर नहीं” मानने की बात दोहरा रहा है।

  • मध्यस्थता के बीच बड़ा खुलासा: पाकिस्तान ने सऊदी अरब में तैनात किए 8000 सैनिक, जंग जैसी तैयारी पर सवाल

    मध्यस्थता के बीच बड़ा खुलासा: पाकिस्तान ने सऊदी अरब में तैनात किए 8000 सैनिक, जंग जैसी तैयारी पर सवाल



    नई दिल्ली(New Delhi)। 
    मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और शांति प्रयासों के बीच पाकिस्तान की सैन्य रणनीति को लेकर बड़े दावे सामने आए हैं। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते के तहत लगभग 8000 सैनिकों की तैनाती की है, जिसमें लड़ाकू विमान, ड्रोन स्क्वाड्रन और वायु रक्षा प्रणाली शामिल हैं।

    सूत्रों के अनुसार इस तैनाती में चीन के सहयोग से विकसित JF-17 Thunder लड़ाकू विमान शामिल हैं, जिनकी संख्या लगभग 16 बताई जा रही है। इसके साथ ही दो ड्रोन स्क्वाड्रन और चीनी मूल की HQ-9 Air Defense System भी तैनात की गई है, जिसे पाकिस्तानी कर्मी संचालित कर रहे हैं।

    रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि यह पूरी तैनाती सऊदी अरब के खर्च पर की जा रही है और इसे “युद्ध-सक्षम समर्थन बल” के रूप में देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि जरूरत पड़ने पर और सैनिकों की तैनाती का भी प्रावधान है, जिससे यह संख्या आगे और बढ़ सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम उस समय उठाया गया है जब पाकिस्तान खुद को अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है और क्षेत्रीय शांति वार्ताओं में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। हालांकि अब तक पाकिस्तान और सऊदी अरब की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

    रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यह तैनाती पश्चिम एशिया में बदलते सुरक्षा समीकरणों और संभावित संघर्ष की आशंकाओं से जुड़ी हो सकती है।

  • ईरान-अमेरिका तनाव में भारत बन सकता है शांति का बड़ा चेहरा, रूस ने नई दिल्ली को बताया सबसे भरोसेमंद मध्यस्थ

    ईरान-अमेरिका तनाव में भारत बन सकता है शांति का बड़ा चेहरा, रूस ने नई दिल्ली को बताया सबसे भरोसेमंद मध्यस्थ



    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच रूस ने भारत की भूमिका को लेकर एक बड़ा कूटनीतिक बयान दिया है। रूसी विदेश मंत्री Sergey Lavrov ने कहा है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में India ईरान, अमेरिका और पश्चिम एशियाई देशों के बीच संवाद स्थापित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

    नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान लावरोव ने भारत की विदेश नीति की तारीफ करते हुए कहा कि भारत लंबे समय से संतुलित कूटनीति अपनाता रहा है और विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ उसके मजबूत संबंध हैं। इसी वजह से भारत को एक “भरोसेमंद मध्यस्थ” के रूप में देखा जा सकता है, जो तनाव कम करने और बातचीत को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।

    रूस का कहना है कि पश्चिम एशिया में हाल के वर्षों में तनाव काफी बढ़ा है, जिसमें ईरान-अमेरिका टकराव, ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे प्रमुख हैं। ऐसे में किसी ऐसे देश की जरूरत है जो दोनों पक्षों के बीच विश्वास पैदा कर सके और बातचीत का रास्ता खोल सके। लावरोव के अनुसार, भारत इस भूमिका के लिए उपयुक्त है क्योंकि वह किसी एक खेमे का हिस्सा न होकर सभी प्रमुख देशों के साथ समान रूप से संबंध बनाए रखता है।

    लावरोव ने यह भी कहा कि भारत का कूटनीतिक अनुभव केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह बहुपक्षीय मंचों जैसे ब्रिक्स, जी20 और शंघाई सहयोग संगठन में भी सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। उन्होंने यह संकेत दिया कि भारत की यह वैश्विक स्वीकार्यता उसे मध्यस्थता की भूमिका के लिए और मजबूत बनाती है।

    रूस के अनुसार, ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत केवल सुरक्षा या राजनीतिक मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ता है। ऐसे में किसी स्थिर और भरोसेमंद मध्यस्थ की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

    लावरोव ने यह भी कहा कि कुछ पश्चिमी देशों की नीतियां इस क्षेत्र में तनाव को कम करने के बजाय बढ़ाने का काम कर रही हैं, जबकि समाधान केवल संवाद और कूटनीति के जरिए ही संभव है। उन्होंने आरोप लगाया कि ईरान और अरब देशों के बीच दूरी बढ़ाने की कोशिशें की जा रही हैं, जो वैश्विक स्थिरता के लिए सही नहीं है।

    भारत को लेकर रूस की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब प्रधानमंत्री की हालिया कूटनीतिक गतिविधियों और खाड़ी देशों के साथ बढ़ते संबंधों ने भारत की भूमिका को और मजबूत किया है। ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और निवेश जैसे क्षेत्रों में भारत की बढ़ती भागीदारी ने उसे एक महत्वपूर्ण वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित किया है।

    हालांकि भारत सरकार की ओर से इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाता है तो वह पश्चिम एशिया में शांति स्थापना के प्रयासों का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है।

    कुल मिलाकर रूस का यह बयान भारत की बढ़ती वैश्विक कूटनीतिक ताकत को दर्शाता है, जहां वह अब केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय शांति और स्थिरता में योगदान देने वाला अहम देश बनता जा रहा है।

  • तेल की राजनीति में नया तूफान! UAE के फैसले पर ईरान का हमला, OPEC में बढ़ी दरार

    तेल की राजनीति में नया तूफान! UAE के फैसले पर ईरान का हमला, OPEC में बढ़ी दरार


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट की तेल राजनीति में तनाव खुलकर सामने आ गया है। Iran ने United Arab Emirates (UAE) के OPEC से बाहर निकलने के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है और इसे “नकारात्मक और बदले की भावना से लिया गया कदम” बताया है।

    ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmail Baghaei ने साफ कहा कि इस तरह का फैसला संगठन की एकजुटता को कमजोर करता है। उन्होंने यह भी दोहराया कि ईरान OPEC के भीतर अपनी जिम्मेदारियों को निभाता रहेगा और वैश्विक तेल संतुलन बनाए रखने में सक्रिय भूमिका जारी रखेगा।

    तनाव यहीं नहीं रुका। ईरान ने UAE पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि हालिया क्षेत्रीय संघर्ष के दौरान उसने अमेरिका और इजराइल का साथ देकर “गलत रवैया” अपनाया, जिससे भरोसे पर असर पड़ा है।

    वहीं दूसरी तरफ UAE ने इन आरोपों को खारिज करते हुए अपना पक्ष रखा। Sultan Al Jaber ने कहा कि OPEC और OPEC+ से अलग होने का फैसला किसी देश के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह रणनीतिक और आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर लिया गया कदम है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह टकराव सिर्फ OPEC तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे मिडिल ईस्ट की बदलती राजनीतिक समीकरण और वैश्विक ऊर्जा बाजार की प्रतिस्पर्धा भी अहम वजह हैं।

    कुल मिलाकर, UAE के इस कदम और ईरान की कड़ी प्रतिक्रिया ने साफ कर दिया है कि आने वाले समय में तेल बाजार के साथ-साथ क्षेत्रीय राजनीति में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

  • हॉर्मुज संकट के बीच भारत की बड़ी कामयाबी: 45 हजार टन LPG लेकर ‘सर्व शक्ति’ ने तोड़ी नाकेबंदी

    हॉर्मुज संकट के बीच भारत की बड़ी कामयाबी: 45 हजार टन LPG लेकर ‘सर्व शक्ति’ ने तोड़ी नाकेबंदी


    नई दिल्ली। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव और नाकेबंदी के बीच भारत के लिए बड़ी राहत की खबर सामने आई है। अमेरिका-ईरान तनातनी के कारण जहां इस अहम समुद्री रास्ते पर जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो चुकी है, वहीं भारत से जुड़ा एलपीजी टैंकर ‘सर्व शक्ति’ सफलतापूर्वक इस खतरनाक मार्ग को पार कर आगे बढ़ गया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब वैश्विक ऊर्जा सप्लाई पर संकट गहराता जा रहा है और भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए हर शिपमेंट बेहद अहम बन चुका है।

    मरीन ट्रैफिक डेटा के मुताबिक करीब 45 हजार टन एलपीजी लेकर चल रहा यह टैंकर ईरान के लारक और क़ेश्म द्वीप के पास से तय मार्ग का पालन करते हुए ओमान की खाड़ी में दाखिल हुआ। जहाज पर 18 भारतीय चालक दल के सदस्य मौजूद हैं और यह विशाखापत्तनम की ओर बढ़ रहा है। इस पूरे ऑपरेशन को इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि अमेरिकी नाकेबंदी के बाद यह भारत से जुड़ा पहला बड़ा एलपीजी टैंकर है जिसने हॉर्मुज का रास्ता पार किया है।

    इस कार्गो को सरकारी कंपनी इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने खरीदा है, हालांकि कंपनी ने आधिकारिक तौर पर कोई बयान नहीं दिया है। लेकिन ऊर्जा बाजार के जानकारों का मानना है कि इस शिपमेंट का सुरक्षित पहुंचना भारत के लिए बड़ी रणनीतिक सफलता है, क्योंकि मिडिल ईस्ट से सप्लाई बाधित होने के कारण देश में एलपीजी की उपलब्धता पर दबाव बना हुआ है।

    दरअसल, भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी उपभोक्ता है। ऐसे में हॉर्मुज जैसे संवेदनशील मार्ग पर रुकावट का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ता है। हाल के दिनों में सप्लाई में कमी के चलते कई जगहों पर घबराहट, लंबी कतारें और सीमित वितरण जैसी स्थिति देखने को मिली। यही वजह है कि सरकार ने एलपीजी टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए कूटनीतिक स्तर पर ईरान से बातचीत तेज की और वैकल्पिक व्यवस्थाएं भी शुरू कीं।

    बताया जा रहा है कि भारत अब तक इस संकट के बीच कम से कम आठ एलपीजी जहाजों को सुरक्षित निकालने में सफल रहा है। साथ ही घरेलू उत्पादन को भी तेजी से बढ़ाया गया है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी के मुताबिक देश में उत्पादन बढ़ाकर करीब 54 हजार टन प्रतिदिन कर दिया गया है, जबकि खपत को संतुलित करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं।

    हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरना तकनीकी रूप से भी चुनौतीपूर्ण होता है। सामान्य हालात में यह सफर 10 से 14 घंटे का होता है, लेकिन मौजूदा तनाव के बीच इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप, लोकेशन गड़बड़ी और सुरक्षा जोखिमों के कारण यह और जटिल हो गया है। कई जहाज ट्रैकिंग से बचने के लिए अपने ट्रांसपोंडर तक बंद कर देते हैं।

    इन सभी चुनौतियों के बीच ‘सर्व शक्ति’ का सुरक्षित पारगमन न केवल भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए राहत भरी खबर है, बल्कि यह भी दिखाता है कि संकट के दौर में कूटनीति, रणनीति और लॉजिस्टिक्स के दम पर देश अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम है। आने वाले दिनों में हॉर्मुज की स्थिति कैसी रहती है, इस पर भारत की ऊर्जा आपूर्ति और बाजार की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।

  • ईरान जंग में तबाह हुए मिडिल ईस्ट के मुल्कों की मदद के लिए आगे आए 11 देश, विश्व बैंक- IMF से की अपील

    ईरान जंग में तबाह हुए मिडिल ईस्ट के मुल्कों की मदद के लिए आगे आए 11 देश, विश्व बैंक- IMF से की अपील


    तेरहान।
    ब्रिटेन (Britain) और जापान (Japan) समेत 11 देशों के वित्त मंत्रियों ने ईरान जंग (Iran War) में तबाह हुए मध्य-पूर्व के मुल्कों (Middle East) की ‘समन्वित’ आर्थिक मदद की अपील की है। इन देशों ने बुधवार (15 अप्रैल) को विश्व बैंक (World Bank) और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund- IMF) से अपील की है कि प्रभावित देशों को “समन्वित आपातकालीन सहायता” उपलब्ध कराई जाए, ताकि जरूरत के हिसाब से वित्तीय मदद और लचीले टूलकिट उपलब्ध कराए जा सकें। ब्रिटिश सरकार द्वारा जारी एक संयुक्त बयान में मंत्रियों ने कहा, “हम IMF और विश्व बैंक से अपील करते हैं कि वे ज़रूरतमंद देशों को समन्वित आपातकालीन सहायता प्रदान करें; यह सहायता उन देशों की परिस्थितियों के अनुरूप हो और इसमें उनके पास उपलब्ध सभी संसाधनों और लचीलेपन का पूरा इस्तेमाल किया जाए।”

    बयान में आगे कहा गया है, “अगर ईरान-अमेरिका के बीच शत्रुता फिर से शुरू हुई या संघर्ष का दायरा बढ़ा या होर्मुज़ समुद्री मार्ग में लगातार बाधाएं आती रहीं तो ये वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, उनकी सप्लाई चेन और दुनिया की आर्थिक और वित्तीय स्थिरता के लिए यह गंभीर अतिरिक्त जोखिम पैदा कर सकती हैं।”


    इंफ्रास्ट्रक्चर की मरम्मत पर 58 अरब डॉलर तक का खर्च

    इस बीच, रायटर्स ने ऊर्जा रिसर्च कंपनी Rystad Energy के डेटा का हवाला देते हुए बताया है कि मध्य-पूर्व युद्ध के कारण इस क्षेत्र को ऊर्जा से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की मरम्मत पर 58 अरब डॉलर तक का खर्च उठाना पड़ सकता है; इसमें अकेले तेल और गैस सुविधाओं पर ही 50 अरब डॉलर तक का खर्च शामिल है। यह अनुमान रिसर्च फर्म के तीन हफ़्ते पहले के शुरुआती 25 अरब डॉलर के अनुमान से काफ़ी ज़्यादा है। यह 8 अप्रैल को US और ईरान के बीच हुए संघर्ष-विराम से पहले हुए नुकसान के व्यापक दायरे को दर्शाता है।


    मरम्मत से कोई नई क्षमता नहीं बनेगी

    Rystad के सीनियर एनालिस्ट करण सतवानी कहते हैं, “मरम्मत के काम से कोई नई क्षमता नहीं बनती। यह मौजूदा क्षमता को दूसरी तरफ़ मोड़ देता है, और इस बदलाव का असर प्रोजेक्ट में देरी और महंगाई के रूप में मध्य-पूर्व से कहीं दूर तक महसूस किया जाएगा।” उन्होंने कहा कि 58 अरब डॉलर का बिल तो सिर्फ़ मुख्य बात है, लेकिन वैश्विक स्तर पर ऊर्जा निवेश की समय-सीमा पर पड़ने वाले इसके दूरगामी प्रभाव भी उतने ही महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।”

    Rystad का कहना है कि मरम्मत पर कुल खर्च औसतन लगभग 46 अरब डॉलर रहने की संभावना है; इसमें डाउनस्ट्रीम रिफाइनिंग और पेट्रोकेमिकल संपत्तियों का हिस्सा सबसे ज़्यादा होगा, क्योंकि वे काफ़ी जटिल होती हैं और उन्हें नुकसान भी बड़े पैमाने पर हुआ है। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि औद्योगिक, बिजली और विलवणीकरण (desalination) संपत्तियों की मरम्मत पर अतिरिक्त 3 अरब से 8 अरब डॉलर तक का खर्च आ सकता है।