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  • ईरान-अमेरिका तनाव के बीच फ्रांस की सक्रिय कूटनीति, क्या मैक्रों दिला पाएंगे राहत?

    ईरान-अमेरिका तनाव के बीच फ्रांस की सक्रिय कूटनीति, क्या मैक्रों दिला पाएंगे राहत?


    वाशिंगटन
    । मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अब इमैनुएल मैक्रों ने शांति बहाली की दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी है। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप और मसूद पेजेश्कियन से अलग-अलग बातचीत कर गतिरोध तोड़ने की कोशिश की है।

    होर्मुज स्ट्रेट बना तनाव का केंद्र

    होर्मुज जलडमरूमध्य में बनी तनावपूर्ण स्थिति इस पूरे विवाद की मुख्य वजह है। अमेरिका द्वारा यहां नौसैनिक नाकाबंदी लगाए जाने के बाद हालात और बिगड़ गए हैं। इस बीच ईरान ने संकेत दिया है कि वह बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन शर्त यह है कि चर्चा अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में हो।

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  • ईरान की शर्तें और रुख

    ईरान ने स्पष्ट किया है कि किसी भी पूर्ण युद्धविराम के लिए लेबनान में जारी शत्रुता को खत्म करना जरूरी होगा। तेहरान का मानना है कि यूरोप, खासकर फ्रांस, इस गतिरोध को खत्म करने में अहम भूमिका निभा सकता है। हालांकि इस्लामाबाद में हालिया वार्ता बेनतीजा रही, लेकिन ईरान ने आगे बातचीत जारी रखने की इच्छा जताई है।

    मैक्रों का शांति फॉर्मूला

    मैक्रों ने दोनों नेताओं से बातचीत के बाद तीन अहम प्रस्ताव सामने रखे—

    क्षेत्रीय स्थिरता के लिए युद्धविराम का विस्तार, जिसमें लेबनान को भी शामिल किया जाए
    होर्मुज जलडमरूमध्य को बिना किसी शर्त और शुल्क के तुरंत खोला जाए
    फ्रांस और ब्रिटेन के नेतृत्व में बहुपक्षीय मिशन बनाकर नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित की जाए

    फ्रांस और ब्रिटेन इस मुद्दे पर पेरिस में एक वीडियो कॉन्फ्रेंस की मेजबानी भी करने जा रहे हैं, जिसमें अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर चर्चा होगी।

    ट्रंप का दावा—ईरान बातचीत को तैयार

    डोनाल्ड ट्रंप ने भी हाल ही में दावा किया कि ईरान की ओर से बातचीत के संकेत मिले हैं और तेहरान समझौता करने को इच्छुक है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका का रुख सख्त बना रहेगा।

    क्या संभव है समाधान?

    विशेषज्ञों के मुताबिक, हालात बेहद संवेदनशील हैं और किसी भी छोटी चूक से बड़ा संघर्ष हो सकता है। ऐसे में फ्रांस की मध्यस्थता अहम साबित हो सकती है, लेकिन अंतिम समाधान दोनों पक्षों की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करेगा।

    मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच फ्रांस की पहल एक उम्मीद जरूर जगाती है, लेकिन शांति की राह अभी भी आसान नहीं दिख रही। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि कूटनीति जीतती है या टकराव और गहराता है।

  • ईरान में फंसे सभी भारतीय नागरिकों के लिए सुरक्षित और नियंत्रित मार्गों से देश वापसी का उच्च स्तरीय अलर्ट जारी

    ईरान में फंसे सभी भारतीय नागरिकों के लिए सुरक्षित और नियंत्रित मार्गों से देश वापसी का उच्च स्तरीय अलर्ट जारी


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में लगातार बिगड़ते हालात को देखते हुए भारत सरकार ने ईरान में रह रहे अपने नागरिकों के लिए नई एडवाइजरी जारी की है। इसमें सभी भारतीय नागरिकों से आग्रह किया गया है कि जितनी जल्दी संभव हो, तय किए गए सुरक्षित और अधिकृत मार्गों से देश छोड़ दें। इसके साथ यह चेतावनी भी दी गई है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय सीमा की ओर बिना दूतावास की अनुमति और समन्वय के बढ़ने का प्रयास न करें। यात्रा के दौरान नागरिकों को लगातार दूतावास के संपर्क में रहने और किसी भी आपात स्थिति में हेल्पलाइन नंबर तथा ईमेल आईडी का उपयोग करने की सलाह दी गई है।

    इससे पहले जारी की गई सलाह में नागरिकों को 48 घंटे तक सुरक्षित स्थानों पर रहने की हिदायत दी गई थी। हालात की संवेदनशीलता के मद्देनजर अब सरकार ने अधिक सतर्कता बरतते हुए देश छोड़ने पर जोर दिया है। यह कदम अमेरिकी और ईरानी तनाव के बीच क्षेत्र में बढ़ते खतरे को देखते हुए उठाया गया है। हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के लिए सीजफायर का ऐलान हुआ था, लेकिन इसे पूरी तरह सुरक्षित स्थिति नहीं माना जा रहा है।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार, फरवरी के अंत में संघर्ष शुरू होने के समय ईरान में लगभग 9,000 भारतीय नागरिक थे, जिनमें छात्र, कामगार और पेशेवर शामिल हैं। अब तक करीब 1,800 नागरिक सुरक्षित भारत लौट चुके हैं, जबकि बाकी नागरिकों की सुरक्षित वापसी के प्रयास जारी हैं। अमेरिकी चेतावनी और क्षेत्रीय तनाव ने हालात को और भी संवेदनशील बना दिया है।

    एडवाइजरी में नागरिकों से अपील की गई है कि वे केवल आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करें और अफवाहों से दूर रहें। साथ ही यह सुनिश्चित करें कि यात्रा के सभी मार्ग अधिकृत और सुरक्षित हों। किसी भी जोखिमपूर्ण गतिविधि से बचना अत्यंत आवश्यक है। सरकार स्थिति की निरंतर निगरानी कर रही है और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त दिशा-निर्देश जारी कर सकती है।

  • डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी पर ईरान का तीखा जवाब, ‘मिडिल ईस्ट को बना देंगे नरक’

    डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी पर ईरान का तीखा जवाब, ‘मिडिल ईस्ट को बना देंगे नरक’


    तेहरान। डोनाल्ड ट्रंप की सख्त चेतावनी के बाद ईरान ने कड़ा पलटवार किया है। ट्रंप ने कहा था कि यदि ईरान समझौता नहीं करता तो उस पर “कहर” बरसेगा। इसके जवाब में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने मिडिल ईस्ट में हालात और बिगड़ने की चेतावनी दी है।  खातम अल-अनबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर के प्रवक्ता इब्राहिम जोल्फाघारी ने कहा कि अगर तनाव इसी तरह बढ़ता रहा तो पूरा क्षेत्र अमेरिका और इजरायल के लिए “नरक” बन सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान को हराने का भ्रम विरोधियों को दलदल में फंसा देगा।

    ड्रोन और मिसाइल हमलों का दावा

    इब्राहिम जोल्फाघारी ने दावा किया कि ईरान ने अपने ड्रोन और मिसाइलों से इजरायल और अमेरिका से जुड़े कई ठिकानों को निशाना बनाया है। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका और इजरायल, ईरान पर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने का दबाव बना रहे हैं। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए कहा कि ईरान के पास समझौते या होर्मुज खोलने के लिए बहुत कम समय बचा है। उन्होंने लिखा कि पहले 10 दिन का समय दिया गया था और अब 48 घंटे बाद कड़ी कार्रवाई हो सकती है।


    लगातार बदलते बयान, बढ़ता तनाव

    28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों के बाद शुरू हुए इस संघर्ष में ट्रंप के बयान लगातार बदलते रहे हैं। एक ओर वे कूटनीतिक समाधान की बात करते हैं, तो दूसरी ओर ईरान को “स्टोन एज” में भेजने जैसी कड़ी चेतावनी भी देते हैं। युद्ध को एक महीने से ज्यादा समय हो चुका है, लेकिन होर्मुज अब भी पूरी तरह नहीं खुला है। दुनिया की करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस आपूर्ति इसी समुद्री मार्ग से गुजरती है, जिससे इसकी अहमियत और बढ़ जाती है।

    ऊर्जा संकट और बढ़ती कीमतें

    होर्मुज के बंद रहने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है और ईंधन की कीमतों में तेज उछाल आया है। पहले जहां ब्रेंट क्रूड की कीमत 73 डॉलर प्रति बैरल थी, अब यह 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी है। हालांकि, कुछ देशों के जहाजों को सीमित रूप से होर्मुज से गुजरने की अनुमति दी गई है, जिनमें भारत भी शामिल है। हाल ही में एक फ्रांसीसी कंपनी का जहाज इस मार्ग से गुजरने वाला पहला बड़ा पश्चिमी यूरोपीय जहाज बना। इसके बावजूद, क्षेत्र में लगातार हो रहे ड्रोन और मिसाइल हमलों के चलते सामान्य समुद्री आवाजाही अब भी प्रभावित बनी हुई है।

  • इटली ने US फाइटर जेट को नहीं दी लैंडिंग परमिशन, ट्रंप हुए नाराज

    इटली ने US फाइटर जेट को नहीं दी लैंडिंग परमिशन, ट्रंप हुए नाराज

    नई दिल्ली! ईरान जंग के बीच इटली ने अमेरिका को बड़ा झटका दिया है. मध्य पूर्व की ओर जा रहे एक विमान को इटली की सरकार ने सिसली में उतरने नहीं दिया है. यह खबर स्थानीय अखबार कोरिएरे डेला सेरा ने दी है. रिपोर्ट के मुताबिक इटली की सरकार ने ईरान जंग से खुद को दूर रखने के लिए यह कदम उठाया है. यह पहली बार है, जब जॉर्जिया मेलोनी की सरकार ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के खिलाफ कोई फैसला लिया है.
    रिपोर्ट के मुताबिक सिसली में अमेरिकी विमानों को लैंडिंग की अनुमति न मिलने से इस क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य अभियानों पर असर पड़ सकता है, क्योंकि सिसिली मध्य पूर्व में मिशनों के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान रखता है.

    स्पेन के बाद इटली का एक्शन
    एक दिन पहले स्पेन ने अमेरिकी विमानों के लिए अपने एयर स्पेस को बंद कर दिया था. अब इटली ने लैंडिंग की मंजूरी नहीं दी है. हालांकि, इटली का मामला इसलिए भी अहम है, क्योंकि इटली नाटो मेंबर है. यूरोप में इटली की अहम दखलअंदाजी है. साथ ही वहां की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का काफी करीबी माना जाता है.

    मेलोनी एकमात्र यूरोप की प्रमुख नेत्री थीं, जिन्हें ट्रंप ने अपने शपथ ग्रहण के दौरान व्हाइट हाउस में आमंत्रित किया था. कई मौकों पर मेलोनी ने ट्रंप के लिए कवच का काम किया है. ऐसे में अब ईरान जंग के दौरान इटली के इस रूख से अमेरिका को बड़ा झटका लगा है.

    इटली ने यह फैसला क्यों लिया है?
    आधिकारिक तौर पर इटली ने इस पर कोई भी बयान नहीं दिया है, लेकिन इस फैसले को हाल ही में इटली में कराए गए जनमत संग्रह से जोड़ा जा रहा है. इटली में जनमत संग्रह में मेलोनी की पार्टी को जबरदस्त हार मिली थी. इस हार की एक वजह ईरान जंग को भी बताया गया.

    जनमत संग्रह को लेकर कराए गए कई सर्वे में यह खुलासा हुआ कि ट्रंप से मेलोनी की दोस्ती की वजह से अधिकांश इटली के लोग नाराज हैं. उन्हें ईरान जंग से आर्थिक परेशानियों का डर सता रहा है. इटली में अगले साल आम चुनाव प्रस्तावित है, जिसमें मेलोनी दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के लिए मैदान में उतरेंगी.

  • मिडिल ईस्ट संकटः कड़े पहरे के बीच होर्मुज पार कर भारत पहुंचा LPG से भरा पोत.. क्या ईरान वसूल रहा टोल!

    मिडिल ईस्ट संकटः कड़े पहरे के बीच होर्मुज पार कर भारत पहुंचा LPG से भरा पोत.. क्या ईरान वसूल रहा टोल!


    तेहरान।
    ईरान युद्ध (Iran War) के बीच दुनियाभर में ऊर्जा का बड़ा संकट (Energy Crisis) खड़ा हो गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होकर दुनिया का करीब 20 फीसदी तेल और गैस व्यापार होता है। अब कई देशों के जहाज इस रास्ते से निकल ही नहीं पा रहे हैं। ऐसे में दुनियाभर के तमाम देश तेल संकट से जूझ रहे हैं। पाकिस्तान समेत कई देशों ने जनता के लिए नए-नए नियम निकाल दिए हैं। कई जगहों पर कार्य सप्ताह चार दिनों का कर दिया गया है। इसी बीच बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को पार करते हुए भारतीय ध्वज वाला पोत ‘जग वसंत’ 47,000 टन द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) लेकर गुजरात के जामनगर स्थित वडीनार बंदरगाह पर पहुंच गया है। ईरान ने साफ कहा है कि भारत के लिए होर्मुज स्ट्रेट में कोई प्रतिबंध नहीं है।


    होर्मुज से कितने शिप निकल पा रहे

    ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच युद्ध अब दूसरे महीने में प्रवेश कर गया है। जहां युद्ध से पहले होर्मुज स्ट्रेट से रोज 100 जहाज निकल जाते थे, अब 3 से 4 जहाज ही निकल पा रहे हैं। इनमें में भारत के भी व्यापारिक जहाज होते हैं। ईरान ने अपने कुछ दोस्त देशों में भारत का भी नाम लिया है और इससे भारत को बड़ी राहत मिली है। ईरान ने कहा है कि भारत के झंडे वाले जहाजों को यहां नहीं रोका जाएगा।


    कौन से देशों को मिली है छूट

    शनिवार को भी दो भारतीय ध्वज वाले एलपीजी और BW Tyr और BW Elm के जहाज होर्मुज स्ट्रेट से गुजरे। पिछले महीने होर्मुज स्ट्रेट से होकर कम से कम पांच जहाज भारत पहुंचे। इनमें पान गैस, जग वसंद, शिवालिक और नंदा देवी शिप शामिल हैं। इनमें एलपीजी और कच्चा तेल भारत पहुंचा है। ईरान ने भारत के साथ चीन, रूस, ईराक और पाकिस्तान को भी छूट दी है।

    गुरुवार को मुंबई में ईरान के कॉन्सुलेट जनरल ने एक पोस्ट में कहा था कि ईरानी विदेस मंत्री अब्बास अरागची ने चीन, रूस, भारत, इराक और पाकिस्तान के लिए होर्मुज को खोल दिया है। इसके बाद थाईलैंड और मलेशिया ने भी दावा किया कि उसके लिए भी होर्मुज कोखोला गया है। ईरान ने साफ तौर पर कहा है कि इजरायल और अमेरिका के सहयोगियों को यहां से नहीं गुजरने दिया जाएगा।


    क्या ईरान होर्मुज में वसूल रहा है टोल?

    ईरान की संसद ने इस बात का समर्थन किया है कि होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों सो टोल वसूला जाए। इसको लेकर कानून फाइनल होने वाला है। इसके मुताबिक जहाजों की सुरक्षा के बदले ईरान टोल वसूल सकता है। दूसरे कॉरिडोर में भी जहाजों से एक शुल्क लिया जाता है। जानकारी के मुताबिक कुछ जहजों से शुल्क लिया जाने लगा है। होर्मुज के दोनों ओर जहाजों का जमावड़ा लग गया है। दोनों ओर करीब 2000 शिप हरी झंडी मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

  • ‘पाकिस्तान मध्यस्थ नहीं, सिर्फ पोस्टमैन है’ और अमेरिका का वफादार

    ‘पाकिस्तान मध्यस्थ नहीं, सिर्फ पोस्टमैन है’ और अमेरिका का वफादार


    नई दिल्‍ली।
     मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच एक बड़ी कूटनीतिक हलचल सामने आई है। पाकिस्तान इस पूरे घटनाक्रम में अहम मध्यस्थ की भूमिका निभाता नजर आ रहा है। जानकारी के मुताबिक, अमेरिका की ओर से तैयार किए गए सीज़फायर प्रस्ताव को पाकिस्तान ने ईरान तक पहुंचा दिया है। इसी बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर ने पाकिस्तान की भूमिका पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने साफ कहा कि पाकिस्तान खुद कोई मध्यस्थ नहीं है, बल्कि सिर्फ ‘पोस्टमैन’ या ‘कूरियर’ की तरह काम कर रहा है। यानी असली बातचीत अमेरिका और ईरान के बीच सीधे तौर पर हो रही है, पाकिस्तान सिर्फ संदेश पहुंचाने का काम कर रहा है।

    ‘अमेरिका का वफादार साथी रहा है पाकिस्तान’

    एमजे अकबर के मुताबिक, अमेरिका को पाकिस्तान पर भरोसा इसलिए है क्योंकि पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिका का ‘वफादार साथी’ रहा है। उन्होंने कहा कि अमेरिका पाकिस्तान को एक आज्ञाकारी सहयोगी मानता है, जबकि भारत एक स्वतंत्र सोच वाला देश है, जो अपनी नीतियां खुद तय करता है और अमेरिका के साथ बराबरी के स्तर पर रिश्ते रखता है।

    शहबाज शरीफ ने मध्यस्थता निभाने की कही बात
    उन्होंने यह भी बताया कि पाकिस्तान और अमेरिका के बीच सैन्य सहयोग बहुत पुराना है। 1950 के दशक में ही दोनों देशों के बीच समझौते हो गए थे, जिसके तहत अमेरिका को पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल करने की अनुमति मिली थी। यही कारण है कि आज भी दोनों के रिश्ते काफी करीबी माने जाते हैं। दरअसल, यह बयान उस समय आया है जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हाल ही में सोशल मीडिया पर कहा था कि अगर अमेरिका और ईरान चाहें तो पाकिस्तान शांति वार्ता की मेजबानी करने के लिए तैयार है। पाकिस्तान ने खुद को इस संघर्ष में एक मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश की थी।

    ईरान ने ठुकराया अमेरिका का प्रस्ता
    लेकिन दूसरी तरफ, ईरान ने अमेरिका के प्रस्ताव को साफ तौर पर ठुकरा दिया है। ईरान का कहना है कि वह युद्ध तभी खत्म करेगा जब उसकी अपनी शर्तें पूरी होंगी और वह अपने समय के अनुसार ही फैसला करेगा। ईरान ने यह भी कहा कि वह तब तक जवाबी कार्रवाई जारी रखेगा जब तक उसकी मांगें पूरी नहीं हो जातीं।

    अमेरिका ने ईरान के सामने रखीं 15 शर्ते
    इसी बीच खबरें हैं कि अमेरिका ने ईरान के सामने युद्ध खत्म करने के लिए करीब 15 शर्तें रखी हैं। हालांकि, इस्राइल को चिंता है कि अमेरिका कहीं नरम रुख अपनाकर सिर्फ एक समझौता ढांचा बनाने की कोशिश न करे। गौरतलब है कि यह संघर्ष 28 फरवरी से शुरू हुआ था और अब चौथे हफ्ते में पहुंच चुका है। इस युद्ध का असर सिर्फ इन देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर तेल और ऊर्जा सप्लाई पर भी असर पड़ा है, जिससे पूरी दुनिया में चिंता बढ़ गई है।

  • मिडिल ईस्ट में कब खत्म होगी जंग? ईरान ने अमेरिका से युद्ध खत्म करने को रख दीं 6 शर्तें ते

    मिडिल ईस्ट में कब खत्म होगी जंग? ईरान ने अमेरिका से युद्ध खत्म करने को रख दीं 6 शर्तें ते

    तेहरान। ईरान ने मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध समाप्त करने के लिए नए कानूनी और रणनीतिक ढांचे के हिस्से के रूप में छह शर्तें रखी हैं। यह युद्ध रविवार को अपने 23वें दिन में प्रवेश कर गया। ईरान की ओर से रखी गयी शर्तें हैं- होर्मुज स्ट्रेट के लिए नया कानूनी ढांचा तैयार करना, युद्ध की पुनरावृत्ति रोकने की गारंटी, क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बंद करना, ईरान के इस्लामी गणराज्य को हर्जाने का भुगतान करना, सभी क्षेत्रीय मोर्चों पर युद्धों को समाप्त करना और ईरान के प्रति शत्रुता रखने वाले मीडिया जगत के लोगों पर मुकदमा चलाना और उनका प्रत्यर्पण करना।

    ईरान के ये प्रस्ताव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे के एक दिन बाद आये हैं, जिसमें उन्होंने शनिवार को कहा था कि अमेरिका पश्चिम एशिया में सैन्य प्रयासों को ‘समेटने’ के लक्ष्यों को पूरा करने के ‘बहुत करीब’ है। उन्होंने संकेत दिया कि वह पश्चिम एशिया के अभियानों को खत्म करने पर विचार कर रहे हैं। ईरान की मेहर न्यूज एजेंसी ने अज्ञात वरिष्ठ राजनीतिक और सुरक्षा अधिकारी के हवाले से कहा कि ईरान अमेरिका-इजरायल के खिलाफ अपने रक्षात्मक युद्ध में पूर्व-नियोजित, बहु-चरणीय योजना लागू कर रहा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह रणनीति महीनों पहले विकसित की गयी थी और इसे उच्च रणनीतिक धैर्य के साथ अंजाम दिया जा रहा है।

    अधिकारी ने कहा कि पूरे क्षेत्र में अमेरिकी-इजरायली हवाई रक्षा प्रणालियों और रडार बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने और नष्ट करने के बाद ईरान ने अब इजरायली सत्ता के हवाई क्षेत्र पर ‘पूर्ण नियंत्रण’ स्थापित कर लिया है। अधिकारी ने कहा कि ईरान ‘आक्रमणकारी को सजा देने’ की अपनी नीति तब तक जारी रखने का इरादा रखता है, जब तक वह अमेरिका-इजरायली आक्रामकता और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ‘ऐतिहासिक सबक’ नहीं सिखा देता। अधिकारी ने आगे बताया कि कई क्षेत्रीय पक्षों और मध्यस्थों ने युद्ध समाप्त करने के उद्देश्य से ईरान को प्रस्ताव भेजे हैं। ईरान ने उनके सामने ऐसी शर्तें रखी हैं, जिन्हें किसी भी समझौते पर पहुंचने से पहले पूरा किया जाना और गंभीरता से लिया जाना जरूरी है।
    युद्ध के दो-तीन हफ्ते चलने की और उम्मीद

    वहीं, ‘एक्सियोस’ ने व्हाइट हाउस के करीबी सूत्रों के हवाले से बताया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को कहा था कि वह संघर्ष को समेटने पर विचार कर रहे हैं, हालांकि अमेरिकी अधिकारियों ने संकेत दिया कि वे अभी दो-तीन सप्ताह और सैन्य अभियानों की उम्मीद कर रहे हैं। इसके समानांतर सलाहकारों ने बातचीत के लिए जमीन तैयार करना शुरू कर दिया है, ताकि यदि कोई अवसर मिले तो उसका लाभ उठाया जा सके। पर्दे के पीछे काम करते हुए विशेष दूत जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ पहले से ही तेहरान के अधिकारियों के साथ कूटनीतिक संपर्क की शुरुआती योजना बनाने में जुटे हैं। अधिकारियों ने कहा है कि ईरान के साथ किसी भी समझौते के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खुलवाना, इस्लामिक गणराज्य के अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम के विशाल भंडार का समाधान करना और उसके परमाणु व मिसाइल कार्यक्रमों के साथ-साथ क्षेत्रीय प्रॉक्सी मिलिशिया और आतंकी समूहों के समर्थन पर दीर्घकालिक सीमाएं तय करना आवश्यक होगा।

  • व्हाइट हाउस के बाहर ईरान विरोधी रैली, अमेरिकी कार्रवाई पर इरानियों ने जताया उत्साह

    व्हाइट हाउस के बाहर ईरान विरोधी रैली, अमेरिकी कार्रवाई पर इरानियों ने जताया उत्साह


    नई दिल्ली। ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल की हालिया कार्रवाई को लेकर कई लोग खुलेआम समर्थन जता रहे हैं। इस समर्थन और ईरानी खामेनेई शासन का विरोध करने के लिए प्रदर्शनकारी व्हाइट हाउस के बाहर एक बड़ी रैली में जुटे। रैली में शामिल अधिकांश लोग कभी ईरान में रहते थे और उन्होंने अमेरिकी मीडिया को बताया कि वे ट्रंप के हमलों को 1979 से देश पर राज कर रहे इस्लामिक शासन को गिराने का अवसर मानते हैं।

    प्रदर्शनकारी साइरस कियान ने कहा कि उन्होंने अपनी पहली 25 साल की जिंदगी ईरान में बिताई। उन्होंने जोर देकर कहा अगर ट्रंप आसमान से दबाव डालना जारी रखते हैं तो ईरानी लोग इस राज को खत्म कर देंगे। रैली में शामिल लोगों ने अमेरिकी कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति ट्रंप का धन्यवाद किया। कुछ प्रदर्शनकारियों ने लाल रंग की हैट पहनी थी जिस पर मेक ईरान ग्रेट अगेन लिखा था।

    इस रैली को आयोजित करने वाले संगठन डीसी प्रोटेस्ट्स फॉर ईरान के वॉलंटियर रेजा मौसवी ने कहा राष्ट्रपति ने कहा था कि मदद आ रही है। उन्होंने वादा किया और उस पर कायम रहे। प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य मौजूदा ईरानी शासन को खत्म करना और देश के आखिरी शाह के बेटे रेजा पहलवी को अगला नेता बनाने के लिए समर्थन देना था।

    प्रदर्शन में शामिल वॉलंटियर मरजीह मिर्जासलेही ने कहा हम चाहते हैं कि हमारे शाह ईरान वापस आएं क्योंकि वे अकेले ही ईरान को फिर से महान बना सकते हैं। मरजीह ने 2007 में ईरान छोड़ दिया था। कई प्रदर्शनकारी अमेरिकी और ईरानी झंडे और पोस्टर लेकर आए थे जिनमें पहलवी को ट्रंप के साथ खड़ा दिखाया गया था।

    वहीं ईरानी सरकारी मीडिया के अनुसार ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने चेतावनी जारी की है। उन्होंने अमेरिका से कहा कि अमेरिकी इंडस्ट्रियल प्लांट्स को इलाके से हटाया जाए। IRGC ने आम लोगों से भी अपील की कि वे उन जगहों को खाली करें जहां अमेरिकी शेयरहोल्डर मौजूद हैं ताकि किसी भी खतरे या नुकसान से बचा जा सके।

    यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब पिछले दो दिनों में ईरानी इंफ्रास्ट्रक्चर पर निशाना बनाकर किए गए हमलों के बाद इलाके में तनाव बढ़ गया है। ईरानी सरकारी मीडिया ने बताया कि इन हमलों में गैर-सैन्य फैक्ट्रियों को निशाना बनाया गया और कई आम लोग मारे गए। इससे क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति और अस्थिर हो गई है और अमेरिकी-ईरानी तनाव चरम पर है।

    इस रैली और ईरानी प्रतिक्रिया से साफ है कि अमेरिका की हालिया कार्रवाई ने राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर गहरा प्रभाव डाला है। प्रदर्शनकारी अमेरिकी हस्तक्षेप को ईरानी शासन को बदलने का अवसर मान रहे हैं जबकि ईरान अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने और नागरिकों को जोखिम से बचाने के लिए सतर्क है।

  • ट्रंप ने ईरान डील से किया इनकार, नए सुप्रीम लीडर के जीवित होने पर जताया शक

    ट्रंप ने ईरान डील से किया इनकार, नए सुप्रीम लीडर के जीवित होने पर जताया शक


    वॉशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ चल रहे तनाव को लेकर संभावित समझौते को खारिज कर दिया है। शनिवार को एनबीसी न्यूज से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि ईरान ने बातचीत में दिलचस्पी दिखाई है लेकिन प्रस्तावित शर्तें काफी अच्छी नहीं हैं”। उन्होंने साफ किया कि जब तक युद्ध की स्थिति जारी है वाशिंगटन जल्दबाजी में कोई सीजफायर डील नहीं करेगा।

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा ईरान डील करना चाहता है और मैं इसे नहीं करना चाहता क्योंकि शर्तें अभी पर्याप्त नहीं हैं। उन्होंने संभावित समझौते की शर्तों पर अधिक जानकारी देने से इनकार किया लेकिन यह स्वीकार किया कि न्यूक्लियर महत्वाकांक्षाओं को छोड़ना किसी भी मामले में प्राथमिकता होगी।

    इंटरव्यू में ट्रंप ने अमेरिकी फोर्स द्वारा ईरान के रणनीतिक ऑयल हब खार्ग आइलैंड पर स्ट्राइक का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि खार्ग आइलैंड को पूरी तरह तबाह कर दिया गया है लेकिन जरूरत पड़ने पर हम फिर से हमला कर सकते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने ऊर्जा लाइनों को नहीं छुआ क्योंकि उन्हें फिर से बनाने में सालों लग जाते हैं।

    ट्रंप ने ईरान के नए सुप्रीम लीडर सैय्यद मोजतबा हुसैनी खामेनेई के जीवित होने पर भी संदेह व्यक्त किया। उन्होंने कहा मुझे नहीं पता कि वह जिंदा भी हैं या नहीं। अभी तक कोई उन्हें सार्वजनिक रूप में नहीं देख पाया है। मैं सुन रहा हूं कि वह जिंदा नहीं हैं और अगर हैं तो उन्हें अपने देश के लिए स्मार्ट काम करना चाहिए और वह है सरेंडर करना।”

    ट्रंप ने किसी खास ईरानी नेता को भविष्य के विकल्प के रूप में नामित करने से इनकार करते हुए कहा कि अमेरिका के पास ऐसे लोग हैं जो देश के भविष्य के लिए बेहतरीन नेतृत्व कर सकते हैं। उन्होंने ग्लोबल ऊर्जा की कीमतों के बीच रूस के तेल पर लगाए गए बैन को अस्थायी रूप से कम करने की रणनीति का भी जिक्र किया। ट्रंप के अनुसार यह बैन 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद लगाया गया था और संकट खत्म होते ही इसे वापस ले लिया जाएगा।

    यूक्रेन को मदद देने के सवाल पर ट्रंप ने कहा कि हमें जिस आखिरी इंसान से मदद चाहिए वह वोलोडिमिर जेलेंस्की हैं। उनका यह बयान वैश्विक राजनीति और सुरक्षा स्थिति में अमेरिका के रुख को स्पष्ट करता है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति का ईरान डील से इनकार और नए सुप्रीम लीडर के जीवित होने पर संदेह ने मध्य पूर्व की राजनीति में नई अस्थिरता की संभावना पैदा कर दी है। ट्रंप ने अपनी प्राथमिकताओं में ऊर्जा सुरक्षा और सैन्य सटीकता को सबसे ऊपर रखा है जबकि वार्ता और रणनीतिक समझौते फिलहाल लंबित हैं।

  • मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच CBSE ने GCC देशों में 12वीं बोर्ड परीक्षाओं को रद्द किया

    मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच CBSE ने GCC देशों में 12वीं बोर्ड परीक्षाओं को रद्द किया


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल अमेरिका के हालिया संघर्ष के चलते तनावपूर्ण स्थिति बढ़ने के बीच भारतीय दूतावासों ने छात्रों और अभिभावकों के लिए नई एडवाइजरी जारी की है। इस अपडेट में सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) ने 12वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाओं को बहरीन ईरान कुवैत ओमान कतर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में रद्द करने की घोषणा की है। यह निर्णय छात्रों की सुरक्षा और शिक्षण गतिविधियों पर पड़ रहे प्रभावों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

    ओमान में भारतीय दूतावास ने बताया कि यह एडवाइजरी पहले जारी 01.03.2026 03.03.2026 05.03.2026 07.03.2026 और 09.03.2026 के सर्कुलरों का अपडेशन है। इन सर्कुलरों के माध्यम से प्रभावित देशों में स्कूलों और संबंधित अधिकारियों से मिले इनपुट और अपील के आधार पर बोर्ड ने 12वीं क्लास की परीक्षाओं की समीक्षा की। बोर्ड ने स्पष्ट किया कि 16 मार्च से लेकर 10 मार्च तक निर्धारित सभी परीक्षाएं रद्द कर दी गई हैं। इसके साथ ही पहले स्थगित की गई परीक्षाओं की तारीखें भी पूरी तरह रद्द होंगी।

    इस निर्णय का उद्देश्य न केवल छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि उनके परिणाम सही समय पर घोषित किए जाएं। एडवाइजरी में यह भी कहा गया कि परीक्षा स्थगित होने के बाद रिजल्ट जारी करने की प्रक्रिया और तरीका बाद में अलग से बताया जाएगा। इससे पहले दूतावास ने कहा था कि सीबीएसई 10 मार्च को स्थिति की पुनः समीक्षा करेगा और 12 मार्च से होने वाली परीक्षाओं के लिए सही निर्णय लेगा।

    मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण ओमान में भारतीय दूतावास ने पहले भी 9 10 और 11 मार्च को होने वाली 12वीं बोर्ड परीक्षाओं को फिलहाल टालने की जानकारी साझा की थी। यह कदम ईरान इजरायल युद्ध और वहां की सुरक्षा स्थिति के मद्देनजर छात्रों और उनके परिवारों के हित में उठाया गया। दूतावास ने यह भी बताया कि सभी संबंधित स्कूलों और अधिकारियों को बोर्ड ने सीधे निर्देश दिए हैं कि परीक्षा स्थगित होने की जानकारी तुरंत छात्रों तक पहुँचाई जाए।

    इस स्थिति से प्रभावित छात्रों और अभिभावकों के लिए राहत की बात यह है कि बोर्ड ने पहले से ही स्पष्ट कर दिया है कि परीक्षाओं के परिणामों को घोषित करने की प्रक्रिया सुरक्षित और पारदर्शी तरीके से की जाएगी। इस बीच छात्रों को आवश्यकतानुसार ऑनलाइन अध्ययन सामग्री और मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा सकता है ताकि उनका अकादमिक नुकसान कम से कम हो।

    इस निर्णय से यह भी साफ हो जाता है कि वैश्विक तनाव और सुरक्षा स्थिति सीधे तौर पर शिक्षा पर प्रभाव डाल सकती है। सीबीएसई का यह कदम छात्रों की सुरक्षा मानसिक शांति और शिक्षण गतिविधियों की निरंतरता को सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।