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  • रफी साहब भी जिसके गानों के थे दीवाने, जिंदगी में आए ऐसे मोड़ कि जेल तक पहुंच गए मन्ना डे! जानिए अनसुने किस्से

    रफी साहब भी जिसके गानों के थे दीवाने, जिंदगी में आए ऐसे मोड़ कि जेल तक पहुंच गए मन्ना डे! जानिए अनसुने किस्से


    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर में अपनी सुरीली आवाज और शास्त्रीय संगीत पर मजबूत पकड़ से पहचान बनाने वाले मन्ना डे आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में जिंदा हैं। एक चतुर नार बड़ी होशियार और ऐ मेरी जोहरा जबीं जैसे सदाबहार गीतों से लेकर जिंदगी कैसी है पहेली तक उन्होंने संगीत की दुनिया को अनमोल खजाना दिया। उनकी गायकी में शास्त्रीय संगीत की गहराई भी थी और आम जिंदगी से जुड़ी भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति भी। 24 अक्टूबर 2013 को दुनिया को अलविदा कहने वाले मन्ना डे की 13वीं पुण्यतिथि पर उनकी जिंदगी के ऐसे किस्से याद किए जा रहे हैं जो उनके संघर्ष प्रतिभा और दिलचस्प व्यक्तित्व को सामने लाते हैं।

    मन्ना डे का असली नाम प्रबोध चंद्र डे था। उनका जन्म 1 मई 1919 को कोलकाता में हुआ था। बचपन से ही उन्हें संगीत के साथ कुश्ती और मुक्केबाजी का भी शौक था। वह पहलवान बनकर अपनी पहचान कायम करना चाहते थे। कॉलेज के दिनों में उन्होंने कुश्ती का प्रशिक्षण लिया और ऑल बंगाल कुश्ती प्रतियोगिता के फाइनल तक पहुंचे। उनकी आत्मकथा मेमोरीज कम अलाइव में इस दौर से जुड़े अनुभवों का जिक्र मिलता है। हालांकि कमजोर होती नजर उनके खेल के रास्ते में बाधा बन गई। कुश्ती के दौरान चश्मे के टूटने से उन्हें चोट भी लगी। आखिरकार उन्हें खेल और संगीत में से किसी एक को चुनना पड़ा और उन्होंने संगीत को अपना जीवन बना लिया। यही फैसला आगे चलकर भारतीय संगीत के इतिहास में यादगार साबित हुआ।

    पढ़ाई के दौरान भी मन्ना डे की गायकी का जादू दिखाई देने लगा था। स्कॉटिश चर्च कॉलेज में वह दोस्तों के बीच मेज को तबले की तरह बजाकर गाने गाते थे। उनकी प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने लगातार तीन साल तक कॉलेजों के बीच आयोजित गायन प्रतियोगिताओं में पहला स्थान हासिल किया। उनके चाचा कृष्ण चंद्र डे ने उन्हें संगीत की शुरुआती शिक्षा दी। इसके बाद उन्होंने उस्ताद अमान अली खान और उस्ताद अब्दुल रहमान खान जैसे संगीत गुरुओं से प्रशिक्षण लिया। शास्त्रीय संगीत की बारीकियों पर उनकी पकड़ ने उन्हें दूसरे गायकों से अलग पहचान दिलाई।

    साल 1942 में मन्ना डे अपने चाचा के साथ मुंबई पहुंचे। यहां उन्होंने संगीत की दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए कड़ी मेहनत की। शुरुआत में उन्होंने संगीतकारों के सहायक के रूप में काम किया और 1943 की फिल्म तमन्ना से पार्श्व गायन की शुरुआत की। सुरैया के साथ गाया गया उनका शुरुआती गीत उनके करियर की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल रहा। बाद में फिल्म मशाल के गीत ऊपर गगन विशाल ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई। उन्होंने छह दशकों से अधिक लंबे करियर में हिंदी बांग्ला और दूसरी भारतीय भाषाओं में 3500 से ज्यादा गीत रिकॉर्ड किए।

    मन्ना डे की प्रतिभा का सम्मान उनके समकालीन दिग्गज गायक भी करते थे। मोहम्मद रफी की ओर से उनकी गायकी की प्रशंसा किए जाने का किस्सा अक्सर सुनाया जाता है। वहीं 1968 की फिल्म पड़ोसन का गीत एक चतुर नार आज भी उनके हुनर का शानदार उदाहरण माना जाता है। इस गीत में किशोर कुमार के साथ उनकी गायकी का मुकाबला श्रोताओं को खूब पसंद आया। इसके अलावा फिल्म आनंद का जिंदगी कैसी है पहेली गीत भी उनकी पहचान का अहम हिस्सा बना।

    मन्ना डे की जिंदगी में एक ऐसा प्रसंग भी आया जब उन्हें पुलिस हिरासत में जाना पड़ा। बताया जाता है कि वह लखनऊ में एक संगीत कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे थे लेकिन कार्यक्रम के आयोजक गायब हो गए। दर्शकों के नाराज होने और शिकायत किए जाने के बाद पुलिस ने उनसे पूछताछ की। बाद में अन्य कलाकारों के हस्तक्षेप से मामला सुलझ गया और उन्हें राहत मिली। यह घटना उनके जीवन के उन अनपेक्षित मोड़ों में शामिल हो गई जिनकी चर्चा आज भी होती है।

    मन्ना डे की निजी जिंदगी भी भावनात्मक उतार-चढ़ाव से भरी रही। उनकी पत्नी सुलोचना कुमरन का जनवरी 2012 में निधन हो गया था। दोनों ने करीब छह दशक साथ बिताए थे। पत्नी के जाने के बाद उनके जीवन में अकेलापन बढ़ गया। स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के बाद 24 अक्टूबर 2013 को बेंगलुरु में उनका निधन हो गया। भले ही मन्ना डे आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी आवाज और सदाबहार गीत संगीत प्रेमियों की कई पीढ़ियों को आज भी मंत्रमुग्ध कर रहे हैं।

  • रेखा के करियर का वो यादगार मोड़ जब एक गाने ने बदल दी किस्मत मोहम्मद रफी की आवाज ने दिलाई रातोंरात बड़ी पहचान

    रेखा के करियर का वो यादगार मोड़ जब एक गाने ने बदल दी किस्मत मोहम्मद रफी की आवाज ने दिलाई रातोंरात बड़ी पहचान


    नई दिल्ली ।
    बॉलीवुड की दिग्गज अभिनेत्री रेखा आज हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित और सम्मानित अभिनेत्रियों में गिनी जाती हैं। अपनी खूबसूरती दमदार अभिनय और लंबे फिल्मी सफर के दौरान निभाए गए यादगार किरदारों की वजह से उन्होंने इंडस्ट्री में खास मुकाम बनाया है। हालांकि रेखा के लिए बॉलीवुड तक पहुंचने और अपनी पहचान बनाने का सफर बिल्कुल आसान नहीं था। महज 15 साल की उम्र में हिंदी फिल्मों में कदम रखने वाली रेखा को शुरुआती दौर में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। यहां तक कि उन्हें अपने रंग रूप और हिंदी भाषा को लेकर भी ताने सुनने पड़े थे। लेकिन उनकी पहली हिंदी फिल्म सावन भादों उनके करियर के लिए बेहद खास साबित हुई।

    साल 1970 में रिलीज हुई सावन भादों में रेखा के साथ अभिनेता नवीन निश्चल मुख्य भूमिका में नजर आए थे। खास बात यह थी कि दोनों ने इसी फिल्म के जरिए हिंदी सिनेमा में बतौर लीड कलाकार शुरुआत की थी। फिल्म का निर्देशन मोहन सहगल ने किया था। रेखा ने फिल्म में चंदा नाम की एक गांव की लड़की का किरदार निभाया था जबकि नवीन निश्चल विक्रम के रोल में नजर आए थे। फिल्म की कहानी में रोमांस के साथ परिवार जमीन जायदाद और साजिश का भी तड़का देखने को मिला था।

    इस फिल्म ने रेखा को पहली बड़ी पहचान दिलाई लेकिन उनकी लोकप्रियता को जिस गाने ने नई ऊंचाई दी वह आज भी पुराने हिंदी गीतों के चाहने वालों के बीच याद किया जाता है। फिल्म का गाना कान में झुमका चाल में ठुमका कमर पे चोटी लटके रेखा के शुरुआती करियर का बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। इस गाने को दिग्गज गायक मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज दी थी। रफी की आवाज और रेखा तथा नवीन निश्चल की स्क्रीन केमिस्ट्री ने गाने को बेहद लोकप्रिय बना दिया था।

    गाने में रेखा का अंदाज दर्शकों को खूब पसंद आया। उनकी अदाएं और डांस ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा और देखते ही देखते वह दर्शकों के बीच पहचान बनाने लगीं। यही वजह रही कि सावन भादों की सफलता को रेखा के शुरुआती करियर के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। फिल्म की कामयाबी के बाद हिंदी सिनेमा में उनके लिए आगे के रास्ते खुलने लगे।

    रेखा इससे पहले दक्षिण भारतीय फिल्मों में भी काम कर चुकी थीं लेकिन हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में उनकी शुरुआत ने उनके करियर को एक अलग दिशा दी। सावन भादों के बाद उन्हें लगातार फिल्मों के प्रस्ताव मिलने लगे और धीरे धीरे वह उस दौर की चर्चित अभिनेत्रियों में शामिल हो गईं। शुरुआती मुश्किलों से निकलकर रेखा ने आगे चलकर ऐसा मुकाम हासिल किया जिसे आज भी बॉलीवुड की सबसे प्रेरणादायक यात्राओं में गिना जाता है।

    मोहम्मद रफी की आवाज में रिकॉर्ड किया गया यह गाना भी रेखा की शुरुआती पहचान का अहम हिस्सा बन गया। यही वजह है कि करीब 56 साल बाद भी सावन भादों और इस सुपरहिट गीत का जिक्र रेखा के फिल्मी सफर की शुरुआत के साथ जरूर किया जाता है। एक युवा अभिनेत्री के लिए यह गाना सिर्फ एक हिट गीत नहीं बल्कि उनके करियर को नई पहचान देने वाला यादगार पड़ाव साबित हुआ।

  • जब मोहम्मद रफी की आवाज ने रचा इतिहास इस एक गीत ने दिलाया जिंदगी का पहला और आखिरी नेशनल अवॉर्ड

    जब मोहम्मद रफी की आवाज ने रचा इतिहास इस एक गीत ने दिलाया जिंदगी का पहला और आखिरी नेशनल अवॉर्ड


    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर की बात जब भी होती है तो मोहम्मद रफी का नाम सबसे पहले लिया जाता है। उनकी आवाज में ऐसी मिठास ऐसी गहराई और ऐसा दर्द था जिसने करोड़ों लोगों के दिलों में हमेशा के लिए जगह बना ली। चार दशक से ज्यादा लंबे अपने शानदार करियर में उन्होंने हजारों गीत गाए और हर तरह की भावनाओं को अपनी गायकी से जीवंत कर दिया। रोमांस हो भक्ति हो देशभक्ति हो या फिर बिछड़ने का दर्द रफी साहब की आवाज हर एहसास को श्रोताओं तक पूरी सच्चाई के साथ पहुंचाती थी। यही वजह है कि आज भी उनके गीत उतने ही पसंद किए जाते हैं जितने अपने दौर में हुआ करते थे।

    मोहम्मद रफी को अपने करियर में कई सम्मान मिले लेकिन एक उपलब्धि ऐसी रही जिसने उनके नाम को भारतीय संगीत इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज कर दिया। यह उपलब्धि थी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार यानी नेशनल अवॉर्ड। खास बात यह रही कि उन्हें यह सम्मान अपने पूरे करियर में केवल एक बार मिला और वह भी एक ऐसे गीत के लिए जो आज भी लोगों की जुबान पर रहता है।

    साल 1977 में रिलीज हुई फिल्म हम किसी से कम नहीं उस दौर की सबसे चर्चित म्यूजिकल फिल्मों में शामिल थी। फिल्म में ऋषि कपूर और तारिक खान मुख्य भूमिका में नजर आए थे। आरडी बर्मन के संगीत से सजी इस फिल्म के लगभग सभी गीत सुपरहिट साबित हुए। बचना ऐ हसीनों चांद मेरा दिल है अगर दुश्मन जमाना और हमको तो यारा तेरी यारी जैसे गीतों ने फिल्म को जबरदस्त लोकप्रियता दिलाई। लेकिन इन सभी गीतों के बीच एक ऐसा गाना था जिसने लोगों के दिलों को सबसे ज्यादा छुआ और वह था क्या हुआ तेरा वादा।

    यह गीत सिर्फ एक फिल्मी गाना नहीं बल्कि टूटे हुए प्यार के दर्द की ऐसी अभिव्यक्ति बन गया जिसे हर पीढ़ी ने अपनाया। पर्दे पर अभिनेता तारिक खान की भावनाओं को मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज से ऐसा जीवन दिया कि हर श्रोता इस गीत से जुड़ गया। उनकी आवाज में दर्द की गहराई और भावनाओं की सच्चाई इतनी प्रभावशाली थी कि यह गीत सुनने वालों की आंखें नम कर देता था।

    इसी गीत के लिए मोहम्मद रफी को सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का नेशनल अवॉर्ड मिला। यही उनके जीवन का पहला और आखिरी राष्ट्रीय सम्मान साबित हुआ। इतना ही नहीं इसी गीत के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला जबकि गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार प्रदान किया गया। इस गीत ने उस दौर के कई दिग्गज गायकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई और संगीत प्रेमियों के दिलों में स्थायी स्थान हासिल किया।

    फिल्म हम किसी से कम नहीं उस वर्ष की सबसे सफल फिल्मों में शामिल रही। अमिताभ बच्चन की कई बड़ी फिल्मों के बीच भी इस फिल्म ने अपने संगीत के दम पर अलग पहचान बनाई। आरडी बर्मन की धुनें और मोहम्मद रफी की जादुई आवाज ने इसे हिंदी फिल्म संगीत की अमर धरोहर बना दिया। आज भी जब क्या हुआ तेरा वादा सुनाई देता है तो यह सिर्फ एक गीत नहीं बल्कि मोहम्मद रफी की महान गायकी और भारतीय संगीत की समृद्ध विरासत की याद ताजा कर देता है। यही कारण है कि यह गीत और उससे जुड़ा यह राष्ट्रीय सम्मान हमेशा संगीत प्रेमियों के लिए खास बना रहेगा।

  • जब मोहम्मद रफी ने बिना फीस गाईं सिर्फ 4 लाइनें, अमिताभ बच्चन की मौत वाले सीन ने रुला दिया था पूरा देश

    जब मोहम्मद रफी ने बिना फीस गाईं सिर्फ 4 लाइनें, अमिताभ बच्चन की मौत वाले सीन ने रुला दिया था पूरा देश


    नई दिल्ली। हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में कुछ ऐसे गीत और कुछ ऐसे क्षण हैं, जो समय बीतने के बावजूद लोगों के दिलों में हमेशा जिंदा रहते हैं। महान पार्श्वगायक मोहम्मद रफी की आवाज भी ऐसी ही एक विरासत है, जिसने पीढ़ियों को भावनाओं से जोड़ने का काम किया है। रफी साहब ने अपने करियर में हजारों गीत गाए, लेकिन एक फिल्म में उन्होंने केवल चार लाइनें गाकर ऐसा जादू पैदा किया कि वह दृश्य और वह गीत आज भी लोगों की आंखें नम कर देता है।

    यह किस्सा जुड़ा है साल 1978 में रिलीज हुई सुपरहिट फिल्म ‘मुकद्दर का सिकंदर’ से। निर्देशक प्रकाश मेहरा की इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए रिकॉर्ड बनाए थे। फिल्म में अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना, रेखा और राखी जैसे सितारों ने अभिनय किया था। कहानी, संवाद, संगीत और अभिनय के साथ-साथ इसका भावनात्मक क्लाइमेक्स भी दर्शकों के दिलों में हमेशा के लिए बस गया।

    फिल्म का संगीत मशहूर संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी ने तैयार किया था, जबकि गीतकार अंजान ने इसके गीत लिखे थे। फिल्म के अधिकांश लोकप्रिय गीत किशोर कुमार की आवाज में रिकॉर्ड किए गए थे। ‘ओ साथी रे’, ‘रोते हुए आते हैं सब’ और टाइटल ट्रैक जैसे गीत उस दौर के सुपरहिट गानों में शामिल रहे। हालांकि फिल्म के अंतिम और सबसे भावनात्मक दृश्य के लिए संगीतकारों को कुछ अलग चाहिए था।

    कहा जाता है कि जब फिल्म के क्लाइमेक्स में सिकंदर की मौत का दृश्य फिल्माया गया, तब संगीतकार आनंदजी को लगा कि इस दृश्य में जिस दर्द, विरह और भावनात्मक गहराई की जरूरत है, उसे मोहम्मद रफी की आवाज से बेहतर कोई नहीं दे सकता। इसके लिए केवल चार लाइनों की आवश्यकता थी, लेकिन वे चार लाइनें पूरे दृश्य का भाव बदलने वाली थीं।

    संगीतकारों के सामने एक चुनौती भी थी। फिल्म के लगभग सभी गीत किशोर कुमार गा चुके थे और ऐसे में सिर्फ चार लाइनों के लिए मोहम्मद रफी से अनुरोध करना उन्हें थोड़ा असहज लग रहा था। आखिरकार आनंदजी ने रफी साहब से संपर्क किया और अपनी बात रखी। बताया जाता है कि रफी ने पहले पूछा कि जब पूरी फिल्म के गाने किशोर कुमार गा रहे हैं तो यह हिस्सा भी उनसे ही क्यों नहीं गवाया जाता। तब आनंदजी ने उन्हें समझाया कि इस दृश्य के लिए जिस दर्द और आत्मीयता की जरूरत है, वह उनकी आवाज में ही संभव है।

    रफी साहब ने इस अनुरोध को सहर्ष स्वीकार कर लिया। उन्होंने जिन चार पंक्तियों को अपनी आवाज दी, वे थीं- “जिंदगी तो बेवफा है, एक दिन ठुकराएगी, मौत महबूबा है अपने साथ लेकर जाएगी…”। इन पंक्तियों ने फिल्म के क्लाइमेक्स को एक अलग ही ऊंचाई पर पहुंचा दिया। दर्शकों ने न सिर्फ अमिताभ बच्चन के अभिनय को सराहा, बल्कि रफी की दर्दभरी आवाज ने भी उस दृश्य को अमर बना दिया।

    फिल्मी गलियारों में प्रचलित किस्सों के अनुसार, मोहम्मद रफी ने इन चार पंक्तियों के लिए कोई पारिश्रमिक नहीं लिया था। व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद उन्होंने यह रिकॉर्डिंग की और अपनी संवेदनशील गायकी से दृश्य में ऐसी जान डाल दी कि यह हिंदी सिनेमा के सबसे भावुक क्षणों में शामिल हो गया।

    आज, दशकों बाद भी जब ‘मुकद्दर का सिकंदर’ का यह दृश्य या यह गीत सुनाई देता है, तो दर्शकों की भावनाएं उसी तरह उमड़ पड़ती हैं। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि मोहम्मद रफी की कला, संवेदनशीलता और संगीत के प्रति उनके समर्पण का जीवंत उदाहरण माना जाता है।

  • जब मोहम्मद रफी के सदाबहार गीत पर अड़ गए थे शम्मी कपूर: राज कपूर के दखल के बाद रिलीज हुआ गाना, प्रीमियर पर खड़े होकर तालियां बजाने लगे थे देव आनंद और आरडी बर्मन

    जब मोहम्मद रफी के सदाबहार गीत पर अड़ गए थे शम्मी कपूर: राज कपूर के दखल के बाद रिलीज हुआ गाना, प्रीमियर पर खड़े होकर तालियां बजाने लगे थे देव आनंद और आरडी बर्मन

    नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के इतिहास में मोहम्मद रफी और शम्मी कपूर की जोड़ी को संगीत की दुनिया की सबसे कामयाब जोड़ियों में से एक माना जाता है। रफी साहब की बुलंद आवाज और शम्मी कपूर के अनूठे डांसिंग स्टाइल ने मिलकर बॉलीवुड को दर्जनों सदाबहार गाने दिए हैं। हालांकि, संगीत के इस सुनहरे सफर के दौरान एक वक्त ऐसा भी आया था जब शम्मी कपूर खुद मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर के एक प्रतिष्ठित गाने के पूरी तरह खिलाफ हो गए थे। वह इस गाने को फिल्म से हटवाना या बदलवाना चाहते थे, लेकिन बाद में इसी गाने ने सिनेमाघरों में ऐसा तूफान लाया कि हर कोई देखता रह गया।

    यह पूरा विवाद साल 1962 में रिलीज हुई सुपरहिट फिल्म ‘प्रोफेसर’ के एक बेहद लोकप्रिय गीत से जुड़ा हुआ है। इस फिल्म के संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी उस दौर की मशहूर संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन के कंधों पर थी। उन्होंने फिल्म के लिए एक बेहद खूबसूरत और रूहानी धुन तैयार की थी, जिसके बोल थे ‘आवाज देके हमें तुम बुलाओ’। इस रूमानी गीत को सुर कोकिला लता मंगेशकर और संगीत के सरताज मोहम्मद रफी ने अपनी जादुई आवाजों से सजाया था। रिकॉर्डिंग के बाद संगीत से जुड़े सभी लोग इस गाने की तारीफ कर रहे थे, लेकिन जैसे ही फिल्म के मुख्य अभिनेता शम्मी कपूर ने इसे सुना, उन्होंने इस पर कड़ी आपत्ति जता दी।

    अभिनेता शम्मी कपूर को असल में इस बात से गहरी दिक्कत थी कि गाने की शुरुआत मुख्य अभिनेत्री की आवाज से हो रही थी और पूरे दृश्य में उनका खुद का स्क्रीन टाइम बहुत कम नजर आ रहा था। उनका मानना था कि एक मुख्य अभिनेता के तौर पर इस गाने में उनकी मौजूदगी को सही ढंग से नहीं दर्शाया गया है और वह इसमें नाममात्र के लिए ही दिखाई दे रहे हैं। शम्मी कपूर इस बात पर अड़ गए कि इस गाने को फिल्म से बदल दिया जाए। जब यह विवाद काफी बढ़ गया और मेकर्स असमंजस की स्थिति में आ गए, तब फिल्म इंडस्ट्री के ‘शोमैन’ राज कपूर को इस मामले में बीच-बचाव करने के लिए आगे आना पड़ा।

    राज कपूर ने शम्मी कपूर के गुस्से को शांत करते हुए उन्हें समझाया कि वह इस कंपोजिशन और गाने के मिजाज पर भरोसा रखें। उन्होंने शम्मी को सलाह दी कि गाने को बिना किसी बदलाव के फिल्म में वैसे ही रहने दिया जाए जैसा इसे रिकॉर्ड किया गया है। राज कपूर के दखल और उनके विजन पर भरोसा करते हुए शम्मी कपूर आखिरकार मान गए। इसके बाद जब फिल्म बनकर तैयार हुई, तो उद्योग के तमाम दिग्गजों के लिए फिल्म का एक भव्य प्रीमियर शो आयोजित किया गया। इस प्रीमियर में देव आनंद, आरडी बर्मन और महमूद जैसी सिनेमा जगत की कई नामचीन हस्तियां मौजूद थीं।

    थिएटर के भीतर जब फिल्म के दौरान यह गाना बजना शुरू हुआ, तो शुरुआत में लता मंगेशकर की सुरीली आवाज को हॉल में बैठे सभी दिग्गज बेहद शांति और एकाग्रता से सुन रहे थे। जैसे ही गाने के बीच में मोहम्मद रफी की जादुई लाइनें गूंजी, थिएटर का माहौल पूरी तरह बदल गया। रफी साहब की आवाज का जादू ऐसा चला कि वहां बैठे संगीतकार आरडी बर्मन, सदाबहार अभिनेता देव आनंद और मशहूर कॉमेडियन महमूद अपनी सीटों से खड़े हो गए और उत्साह में आकर लगातार तालियां बजाने लगे। थिएटर के अंदर मौजूद दर्शकों और फिल्म समीक्षकों का यह अद्भुत रिस्पॉन्स देखकर खुद शम्मी कपूर भी पूरी तरह हैरान रह गए थे।

    इस घटना के बाद शम्मी कपूर को भी अहसास हो गया कि स्क्रीन टाइम से ज्यादा गाने की आत्मा और उसकी गायकी मायने रखती है। बाद में यह गाना न केवल चार्टबस्टर साबित हुआ, बल्कि इसे हिंदी सिनेमा के सबसे बेहतरीन गानों की फेहरिस्त में शामिल किया गया। मोहम्मद रफी ने इसके बाद भी शम्मी कपूर के लिए ‘चाहें कोई मुझे जंगली कहे’, ‘बदन पे सितारे’, ‘तारीफ करूं क्या उसकी’, और ‘ये चांद सा रोशन चेहरा’ जैसे अनगिनत कल्ट गाने गाए, जिन्होंने शम्मी कपूर को इंडस्ट्री का ‘एल्विस प्रेस्ली’ बनाने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

  • मोहम्मद रफी का वो किस्सा, रीटेक से इनकार कर फिर गाया अमर गीत

    मोहम्मद रफी का वो किस्सा, रीटेक से इनकार कर फिर गाया अमर गीत


    नई दिल्ली । बॉलीवुड की क्लासिक फिल्म जंजीर का गाना “दीवाने हैं दीवानों को” आज भी श्रोताओं के दिलों में बसा हुआ है। इस गाने को संगीत दिया था मशहूर संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी ने, जबकि इसके बोल लिखे थे गीतकार गुलशन बावरा ने। रिकॉर्डिंग के दौरान जब यह गाना पहली बार तैयार हुआ, तो इसे सभी ने पसंद किया। खासकर लता मंगेशकर का गाया हिस्सा बेहद प्रभावशाली माना गया। लेकिन लता जी अपने काम में पूर्णता की पक्षधर थीं, इसलिए उन्होंने एक और रीटेक की मांग रख दी।

    स्टूडियो में बढ़ा तनाव, लेकिन रफ़ी ने क्यों किया इनकार?
    रीटेक की बात जब मोहम्मद रफ़ी तक पहुंची, तो उन्होंने शुरुआत में साफ इनकार कर दिया। वजह बेहद इंसानी थी-वे उस समय रोज़े में थे और सुबह से उन्होंने न तो खाना खाया था और न ही पानी पिया था। उनकी हालत ऐसी थी कि दोबारा उसी ऊर्जा और भाव के साथ गाना उनके लिए कठिन हो रहा था। इसी कारण उन्होंने स्टूडियो छोड़ने का फैसला कर लिया।

    अचानक बदला माहौल, और फिर लौटे स्टूडियो
    जैसे ही रफ़ी साहब स्टूडियो से बाहर निकले, उनकी मुलाकात गीतकार गुलशन बावरा से हुई। उन्होंने उत्साहित होकर बताया कि फिल्म में यह गाना वही गा रहे हैं। यह सुनकर रफ़ी साहब चौंक गए, क्योंकि उन्होंने गाना अमिताभ बच्चन के हावभाव और व्यक्तित्व को ध्यान में रखकर गाया था। यह एहसास उन्हें वापस स्टूडियो खींच लाया। उन्होंने बिना देर किए फिर से रिकॉर्डिंग करने का फैसला किया।

    भूखे-प्यासे फिर गूंज उठी आवाज़ और बन गया इतिहास
    इसके बाद मोहम्मद रफ़ी ने उसी हालत में, बिना कुछ खाए-पिए, दोबारा गाना रिकॉर्ड किया। इस बार उनकी आवाज में और भी गहराई, भाव और दर्द महसूस किया गया। रिकॉर्डिंग पूरी हुई और गाना रिलीज़ होते ही सुपरहिट साबित हुआ। यह किस्सा आज भी संगीत जगत में अनुशासन, समर्पण और कला के प्रति जुनून की मिसाल के रूप में याद किया जाता है।

    संगीत की दुनिया का अमर सबक
    यह घटना सिर्फ एक गाने की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर के कलाकारों की संवेदनशीलता और प्रोफेशनलिज्म का प्रतीक है। लता मंगेशकर की परफेक्शन की चाह और रफ़ी साहब की भावनात्मक प्रतिबद्धता ने इस गाने को अमर बना दिया। आज भी जब यह गीत बजता है, तो श्रोता सिर्फ संगीत नहीं सुनते, बल्कि उस संघर्ष और समर्पण को महसूस करते हैं जो इसके पीछे छिपा है।

  • ‘जब रफी साहब की आवाज ने बदल दी राजेश खन्ना की जिद्द’: एक गाने ने रच दिया था इतिहास

    ‘जब रफी साहब की आवाज ने बदल दी राजेश खन्ना की जिद्द’: एक गाने ने रच दिया था इतिहास


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के सुपरस्टार राजेश खन्ना अपने करियर के चरम पर थे। उस समय उनके कई हिट गाने किशोर कुमार की आवाज में रिकॉर्ड हो रहे थे। राजेश खन्ना को यह विश्वास था कि किशोर कुमार उनकी सफलता की “लकी आवाज” हैं। लेकिन फिल्म ‘दो रास्ते’ के एक गाने को लेकर स्थिति बदल गई, जब संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत–प्यारेलाल ने अलग राय रखी।

    मखमली आवाज की तलाश और रफी की एंट्री
    म्यूजिक डायरेक्टर्स का मानना था कि इस खास गाने के लिए एक ऐसी आवाज चाहिए जो नरम, भावपूर्ण और रूहानी हो। इसी कारण उन्होंने मोहम्मद रफी को चुना। राजेश खन्ना इसके खिलाफ थे और उन्होंने किशोर कुमार की आवाज की जिद्द रखी, लेकिन संगीतकारों ने स्पष्ट कहा कि इस गाने के साथ सिर्फ रफी साहब ही न्याय कर सकते हैं।

    स्टूडियो में हुआ वो जादू जिसने सब बदल दिया
    जब मोहम्मद रफी ने स्टूडियो में “रेशमी जुल्फें” गाया, तो पूरा माहौल बदल गया। उनकी आवाज में ऐसा जादू था कि हर कोई मंत्रमुग्ध रह गया। रिकॉर्डिंग सुनने के बाद खुद राजेश खन्ना भी इस गाने के फैन बन गए। कहा जाता है कि इसी पल उन्होंने स्वीकार किया कि यह गाना सिर्फ रफी साहब की आवाज में ही सही लग सकता है।

    फिल्म, कास्ट और दिलचस्प किस्से
    फिल्म के लिए पहले संजय खान को अप्रोच किया गया था, लेकिन बाद में यह रोल संजय खान से हटकर राजेश खन्ना को मिला। फिल्म में मुमताज पहली बार बतौर लीड ए-ग्रेड अभिनेत्री नजर आईं और उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई।

    रफी की विरासत और दीवानगी
    मोहम्मद रफी की आवाज का जादू ऐसा था कि संगीतकारों से लेकर दर्शकों तक हर कोई उनके गीतों का दीवाना था। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके अंतिम संस्कार में भारी बारिश के बावजूद हजारों लोग उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे।

    यह किस्सा सिर्फ एक गाने का नहीं, बल्कि उस दौर की संगीत परंपरा और कलाकारों की समझ का प्रतीक है, जहां सही आवाज और सही भाव ही किसी गीत को अमर बना देते थे। “रेशमी जुल्फें” ने न सिर्फ राजेश खन्ना की सोच बदली, बल्कि मोहम्मद रफी की गायकी को एक और ऐतिहासिक ऊंचाई दी

  • SD बर्मन की बात से आहत हुई थीं लता मंगेशकर: ईगो भुलाकर 5 साल बाद मोहम्मद रफी के साथ गाया था यह यादगार गीत

    SD बर्मन की बात से आहत हुई थीं लता मंगेशकर: ईगो भुलाकर 5 साल बाद मोहम्मद रफी के साथ गाया था यह यादगार गीत


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर में अगर किसी सिंगिंग जोड़ी ने सबसे ज्यादा जादू बिखेरा तो वह थी लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी की जोड़ी। दोनों की आवाज का ऐसा असर था कि हर फिल्ममेकर अपनी फिल्म में इनकी आवाज चाहता था। 1950 और 60 के दशक में इस जोड़ी ने दर्जनों सुपरहिट गाने दिए। लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब दोनों दिग्गजों के बीच ऐसा विवाद हुआ कि उन्होंने साथ गाना छोड़ने तक की कसम खा ली।
    दरअसल साल 1962 में गानों की रॉयल्टी को लेकर लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी के बीच मतभेद हो गया। लता मंगेशकर का मानना था कि गायकों को गानों की रॉयल्टी मिलनी चाहिए, जबकि मोहम्मद रफी इस विचार से सहमत नहीं थे। विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों ने साथ काम न करने का फैसला कर लिया।
    इसके बाद करीब चार से पांच साल तक दोनों ने कोई डुएट सॉन्ग रिकॉर्ड नहीं किया। इस दौरान मोहम्मद रफी ने आशा भोसले और सुमन कल्याणपुर जैसी गायिकाओं के साथ कई सुपरहिट गाने दिए। दूसरी तरफ लता मंगेशकर भी अपने सोलो गानों में व्यस्त रहीं। लेकिन धीरे-धीरे इंडस्ट्री में नई आवाजों की एंट्री होने लगी और इसका असर लता मंगेशकर के करियर पर भी पड़ने लगा।

    इसी दौरान मशहूर संगीतकार एसडी बर्मन एक बड़ी फिल्म के लिए गाना तैयार कर रहे थे। उन्होंने इस गाने के लिए लता मंगेशकर को फोन किया। शुरुआत में लता ने गाने के लिए हामी भर दी, लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि इस गाने में मोहम्मद रफी भी होंगे, उन्होंने तुरंत ऑफर ठुकरा दिया।

    कहा जाता है कि एसडी बर्मन इस जवाब से नाराज नहीं हुए बल्कि सीधे लता मंगेशकर के घर पहुंच गए। वहां उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के लता से साफ कहा कि उनकी यह जिद उनके ही करियर को नुकसान पहुंचा रही है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर वह यह गाना नहीं गाएंगी तो वह इसे सुमन कल्याणपुर से रिकॉर्ड करवा देंगे।

    एसडी बर्मन की यह बात लता मंगेशकर को भीतर तक चुभ गई। उन्हें एहसास हुआ कि उनका ईगो धीरे-धीरे उनकी जगह किसी और को दिला सकता है। यही वह पल था जब उन्होंने अपने पुराने विवाद को खत्म करने का फैसला लिया।

    इसके बाद लता मंगेशकर ने संगीतकार जय किशन के जरिए मोहम्मद रफी तक संदेश पहुंचाया। खास बात यह रही कि रफी साहब ने भी पुराने मनमुटाव को पीछे छोड़ते हुए तुरंत हामी भर दी। फिर वह ऐतिहासिक पल आया जिसका संगीत प्रेमी वर्षों से इंतजार कर रहे थे।

    मुंबई के शन्मुखानंद हॉल में दोनों दिग्गज फिर एक साथ रिकॉर्डिंग स्टूडियो पहुंचे और 1967 में रिलीज हुई देव आनंद की फिल्म ‘ज्वेल थीफ’ के लिए सुपरहिट गाना ‘दिल पुकारे आ रे आ रे’ रिकॉर्ड किया गया। यह गाना रिलीज होते ही छा गया और इसके साथ ही लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी की जादुई जोड़ी की वापसी हो गई।

    इसके बाद दोनों ने कई फिल्मों में साथ गाने गाए और हिंदी सिनेमा को ऐसे यादगार नगमे दिए जिन्हें आज भी लोग उतने ही प्यार से सुनते हैं। यह किस्सा सिर्फ दो महान कलाकारों के विवाद का नहीं बल्कि इस बात का भी उदाहरण है कि कला के सामने अहंकार ज्यादा देर तक टिक नहीं सकता।

  • मीना कुमारी के आखिरी दिनों का सबसे भावुक किस्सा, मौत के बिस्तर पर मोहम्मद रफी से सुना था अपना पसंदीदा गीत

    मीना कुमारी के आखिरी दिनों का सबसे भावुक किस्सा, मौत के बिस्तर पर मोहम्मद रफी से सुना था अपना पसंदीदा गीत


    नई दिल्ली ।  हिंदी सिनेमा में अपने अभिनय और खूबसूरती से छाप छोड़ने वाली मीना कुमारी का आखिरी वक्त बुरा गुजरा। एक्ट्रेस लीवर सिरोसिस से पीड़ित थीं। और लंबे इलाज के बाद भी उन्हें बचाया नहीं जा सका। लेकिन जब वो बीमार, बिस्तर पर पड़ी थीं तो अक्सर एक गाना सुना करती थीं। उन्हें हमेशा से लगता था कि ये गाना उनकी निजी जिंदगी से जुड़ा हुआ है।
    वो एक ऐसा गीत था जो तकलीफ भरे दिनों में मीना कुमारी को राहत की सांस देता था। मीना जब-जब इस गीत को गुनगुनाया करतीं तो अपने आधे ग़मों को भूल जाया करती थीं। मीना कुमारी का इस गाने से इतना गहरा जुड़ाव था कि जब मोहम्मद रफी उनसे मिलने आए तो एक्ट्रेस ने उनसे ये गाना गाने की रिक्वेस्ट की थी।
    बुरे दिनों में मीना कुमारी का साथी था ये गाना
    1961 में मीना कुमारी की एक रिलीज हुई थी जिसका नाम था प्यार का सागर। इस फिल्म में मीना के साथ एक्टर राजेंद्र कुमार लीड रोल में थे। इस फिल्म में वैसे कई खूबसूरत गाने थे लेकिन ‘मुझे प्यार की जिंदगी देने वाले, कभी गम न देना खुशी देने वाले’। इस गाने को मोहम्मद रफी और आशा भोसले ने गाया था। ये गाना मीना कुमारी के दर्द की दवा बन गया था। अपना अकेलापन, दर्द भूलने के लिए अक्सर एक्ट्रेस इसी गाने को गुनगुनाया करती थीं।
    ये वो समय था जब मीना बहुत बीमार पड़ चुकी थीं, मौत से लड़ रही थीं। उन्हें फिल्मों के सेट पर नहीं बल्कि घर के एक कमरे में पड़े बिस्तर पर बीमार हालत में देखा जाता था। उनके आखिरी समय में फिल्मी जगत के कई कलाकार उनसे मिलने पहुंचा करते थे। एक दिन सिंगर मोहम्मद रफी भी पहुंचे। और मौत के बिस्तर पर मीना ने मोहम्मद रफी से वो गाना गाने की रिक्वेस्ट कर दी जो उनके दिल के बहुत करीब था।

    आत्मा में उतर चुका था मोहम्मद रफी का ये गीत
    बीमार, मौत से लड़ रही मीना कुमारी की इस इच्छा को मोहम्मद रफी ने टाला नहीं। वो उनके सिरहाने बैठे थे। उन्होंने उसी दर्द, और फीलिंग्स के साथ मीना के सामने गाया ‘मुझे प्यार की जिंदगी देने वाले, कभी गम न देना खुशी देने वाले’। ये गाना मीना की आत्मा में उतर चुका था।
    ऐसे बना था ये गाना

    इस गाने को बनाने की भी एक अलग कहानी है। फिल्म प्यार का सागर में कुल 8 गाने थे। इन सभी गानों को रवि और प्रेम धवन ने कंपोज़ किया था। असद भोपाली ने गीत लिखे थे। इन गानों को आशा भोसले। शमशाद बेगम, मोहम्मद रफी और मुकेश ने गाए थे। फिल्म का गाना ‘ ‘मुझे प्यार की जिंदगी देने वाले, कभी गम न देना खुशी देने वाले’ गाने को अगले दिन फिल्माया जाना था,
    लेकिन उस वक़्त तक रिकॉर्डिंग नहीं हुई थी।
    प्रेम धवन ने गाने को लिखा था और सिंगर मोहम्मद रफी को गाना रिकॉर्डिंग के लिए उसी दिन बुला लिया गया। लेकिन फीमेल सिंगर के लिए आशा भोसले और लता मंगेशकर से संपर्क नहीं हो पा रहा था। ऐसे में कंपोजर रवि ने सुमन कल्यानपुर से बात की गई। उन्होंने आने का वादा किया लेकिन वो स्टूडियो पहुंची नहीं। बहुत इंतजार के बाद अंत में एक बार फिर आशा भोसले से संपर्क किया गया और उनसे इस गाने को लेकर बात पक्की हो गई। आशा भोसले और मोहम्मद रफी ने मिलकर इस गाने को गया। अगले दिन गाने की शूटिंग को गई। मीना कुमारी और राजेंद्र इस गाने में नजर आए थे।
  • बॉलीवुड का ऐतिहासिक डुएट: किशोर कुमार बनाम मोहम्मद रफी की जादुई जुगलबंदी

    बॉलीवुड का ऐतिहासिक डुएट: किशोर कुमार बनाम मोहम्मद रफी की जादुई जुगलबंदी


    नई दिल्ली । बॉलीवुड के सुनहरे दौर में जब मोहम्मद रफी और किशोर कुमार जैसे दिग्गज गायक एक साथ किसी गाने में अपनी आवाज देते थे, तो वह सिर्फ एक गीत नहीं बल्कि इतिहास बन जाता था। ऐसा ही एक यादगार किस्सा फिल्म दोस्ताना (1980) से जुड़ा है, जिसमें अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा मुख्य भूमिकाओं में थे।

    इस फिल्म के मशहूर डुएट गीत “सलामत रहे दोस्ताना हमारा” की रिकॉर्डिंग के दौरान स्टूडियो में एक दिलचस्प माहौल देखने को मिला। बताया जाता है कि मोहम्मद रफी समय पर स्टूडियो पहुंच गए थे और उन्होंने गाने की रिहर्सल भी पूरी तैयारी के साथ की थी। उनकी क्लासिकल और मधुर आवाज ने वहां मौजूद सभी लोगों को प्रभावित कर दिया था।

    लेकिन जब किशोर कुमार स्टूडियो पहुंचे तो उन्होंने माहौल को गंभीर बनाने के बजाय हल्का-फुल्का कर दिया। वे रफी साहब के साथ मजाक-मस्ती करने लगे, जिससे कई लोगों को लगा कि वह गाने को लेकर गंभीर नहीं हैं। उस समय कई लोगों को लगा कि रफी साहब अपनी परफॉर्मेंस से बाजी मार लेंगे।

    हालांकि, जैसे ही रिकॉर्डिंग शुरू हुई, पूरा माहौल बदल गया। पहले मोहम्मद रफी ने अपने हिस्से को बेहद खूबसूरती और गहराई के साथ गाया। लेकिन जब किशोर कुमार की बारी आई, तो उनकी आवाज ने स्टूडियो में मौजूद हर शख्स को हैरान कर दिया। उनकी गायकी में जो ऊर्जा, भाव और सहजता थी, उसने गाने को एक अलग ही ऊंचाई पर पहुंचा दिया।

    संगीतकार पंडित रोनू मजुमदार के अनुसार, उस दिन दोनों ही दिग्गजों ने शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन किशोर कुमार की आवाज में एक अलग तरह का जादू था, जिसने माहौल को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी परफॉर्मेंस को कई लोग उस दौर की सबसे यादगार रिकॉर्डिंग्स में से एक मानते हैं।

    फिल्म दोस्ताना के अन्य गीत भी सुपरहिट साबित हुए और फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया। लेकिन यह डुएट गाना आज भी इसलिए याद किया जाता है क्योंकि इसमें दो महान गायकों की अद्भुत टक्कर और संगीत की असली ताकत देखने को मिली।