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  • जब मोहम्मद रफी ने बिना फीस गाईं सिर्फ 4 लाइनें, अमिताभ बच्चन की मौत वाले सीन ने रुला दिया था पूरा देश

    जब मोहम्मद रफी ने बिना फीस गाईं सिर्फ 4 लाइनें, अमिताभ बच्चन की मौत वाले सीन ने रुला दिया था पूरा देश


    नई दिल्ली। हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में कुछ ऐसे गीत और कुछ ऐसे क्षण हैं, जो समय बीतने के बावजूद लोगों के दिलों में हमेशा जिंदा रहते हैं। महान पार्श्वगायक मोहम्मद रफी की आवाज भी ऐसी ही एक विरासत है, जिसने पीढ़ियों को भावनाओं से जोड़ने का काम किया है। रफी साहब ने अपने करियर में हजारों गीत गाए, लेकिन एक फिल्म में उन्होंने केवल चार लाइनें गाकर ऐसा जादू पैदा किया कि वह दृश्य और वह गीत आज भी लोगों की आंखें नम कर देता है।

    यह किस्सा जुड़ा है साल 1978 में रिलीज हुई सुपरहिट फिल्म ‘मुकद्दर का सिकंदर’ से। निर्देशक प्रकाश मेहरा की इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए रिकॉर्ड बनाए थे। फिल्म में अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना, रेखा और राखी जैसे सितारों ने अभिनय किया था। कहानी, संवाद, संगीत और अभिनय के साथ-साथ इसका भावनात्मक क्लाइमेक्स भी दर्शकों के दिलों में हमेशा के लिए बस गया।

    फिल्म का संगीत मशहूर संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी ने तैयार किया था, जबकि गीतकार अंजान ने इसके गीत लिखे थे। फिल्म के अधिकांश लोकप्रिय गीत किशोर कुमार की आवाज में रिकॉर्ड किए गए थे। ‘ओ साथी रे’, ‘रोते हुए आते हैं सब’ और टाइटल ट्रैक जैसे गीत उस दौर के सुपरहिट गानों में शामिल रहे। हालांकि फिल्म के अंतिम और सबसे भावनात्मक दृश्य के लिए संगीतकारों को कुछ अलग चाहिए था।

    कहा जाता है कि जब फिल्म के क्लाइमेक्स में सिकंदर की मौत का दृश्य फिल्माया गया, तब संगीतकार आनंदजी को लगा कि इस दृश्य में जिस दर्द, विरह और भावनात्मक गहराई की जरूरत है, उसे मोहम्मद रफी की आवाज से बेहतर कोई नहीं दे सकता। इसके लिए केवल चार लाइनों की आवश्यकता थी, लेकिन वे चार लाइनें पूरे दृश्य का भाव बदलने वाली थीं।

    संगीतकारों के सामने एक चुनौती भी थी। फिल्म के लगभग सभी गीत किशोर कुमार गा चुके थे और ऐसे में सिर्फ चार लाइनों के लिए मोहम्मद रफी से अनुरोध करना उन्हें थोड़ा असहज लग रहा था। आखिरकार आनंदजी ने रफी साहब से संपर्क किया और अपनी बात रखी। बताया जाता है कि रफी ने पहले पूछा कि जब पूरी फिल्म के गाने किशोर कुमार गा रहे हैं तो यह हिस्सा भी उनसे ही क्यों नहीं गवाया जाता। तब आनंदजी ने उन्हें समझाया कि इस दृश्य के लिए जिस दर्द और आत्मीयता की जरूरत है, वह उनकी आवाज में ही संभव है।

    रफी साहब ने इस अनुरोध को सहर्ष स्वीकार कर लिया। उन्होंने जिन चार पंक्तियों को अपनी आवाज दी, वे थीं- “जिंदगी तो बेवफा है, एक दिन ठुकराएगी, मौत महबूबा है अपने साथ लेकर जाएगी…”। इन पंक्तियों ने फिल्म के क्लाइमेक्स को एक अलग ही ऊंचाई पर पहुंचा दिया। दर्शकों ने न सिर्फ अमिताभ बच्चन के अभिनय को सराहा, बल्कि रफी की दर्दभरी आवाज ने भी उस दृश्य को अमर बना दिया।

    फिल्मी गलियारों में प्रचलित किस्सों के अनुसार, मोहम्मद रफी ने इन चार पंक्तियों के लिए कोई पारिश्रमिक नहीं लिया था। व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद उन्होंने यह रिकॉर्डिंग की और अपनी संवेदनशील गायकी से दृश्य में ऐसी जान डाल दी कि यह हिंदी सिनेमा के सबसे भावुक क्षणों में शामिल हो गया।

    आज, दशकों बाद भी जब ‘मुकद्दर का सिकंदर’ का यह दृश्य या यह गीत सुनाई देता है, तो दर्शकों की भावनाएं उसी तरह उमड़ पड़ती हैं। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि मोहम्मद रफी की कला, संवेदनशीलता और संगीत के प्रति उनके समर्पण का जीवंत उदाहरण माना जाता है।

  • जब मोहम्मद रफी के सदाबहार गीत पर अड़ गए थे शम्मी कपूर: राज कपूर के दखल के बाद रिलीज हुआ गाना, प्रीमियर पर खड़े होकर तालियां बजाने लगे थे देव आनंद और आरडी बर्मन

    जब मोहम्मद रफी के सदाबहार गीत पर अड़ गए थे शम्मी कपूर: राज कपूर के दखल के बाद रिलीज हुआ गाना, प्रीमियर पर खड़े होकर तालियां बजाने लगे थे देव आनंद और आरडी बर्मन

    नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के इतिहास में मोहम्मद रफी और शम्मी कपूर की जोड़ी को संगीत की दुनिया की सबसे कामयाब जोड़ियों में से एक माना जाता है। रफी साहब की बुलंद आवाज और शम्मी कपूर के अनूठे डांसिंग स्टाइल ने मिलकर बॉलीवुड को दर्जनों सदाबहार गाने दिए हैं। हालांकि, संगीत के इस सुनहरे सफर के दौरान एक वक्त ऐसा भी आया था जब शम्मी कपूर खुद मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर के एक प्रतिष्ठित गाने के पूरी तरह खिलाफ हो गए थे। वह इस गाने को फिल्म से हटवाना या बदलवाना चाहते थे, लेकिन बाद में इसी गाने ने सिनेमाघरों में ऐसा तूफान लाया कि हर कोई देखता रह गया।

    यह पूरा विवाद साल 1962 में रिलीज हुई सुपरहिट फिल्म ‘प्रोफेसर’ के एक बेहद लोकप्रिय गीत से जुड़ा हुआ है। इस फिल्म के संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी उस दौर की मशहूर संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन के कंधों पर थी। उन्होंने फिल्म के लिए एक बेहद खूबसूरत और रूहानी धुन तैयार की थी, जिसके बोल थे ‘आवाज देके हमें तुम बुलाओ’। इस रूमानी गीत को सुर कोकिला लता मंगेशकर और संगीत के सरताज मोहम्मद रफी ने अपनी जादुई आवाजों से सजाया था। रिकॉर्डिंग के बाद संगीत से जुड़े सभी लोग इस गाने की तारीफ कर रहे थे, लेकिन जैसे ही फिल्म के मुख्य अभिनेता शम्मी कपूर ने इसे सुना, उन्होंने इस पर कड़ी आपत्ति जता दी।

    अभिनेता शम्मी कपूर को असल में इस बात से गहरी दिक्कत थी कि गाने की शुरुआत मुख्य अभिनेत्री की आवाज से हो रही थी और पूरे दृश्य में उनका खुद का स्क्रीन टाइम बहुत कम नजर आ रहा था। उनका मानना था कि एक मुख्य अभिनेता के तौर पर इस गाने में उनकी मौजूदगी को सही ढंग से नहीं दर्शाया गया है और वह इसमें नाममात्र के लिए ही दिखाई दे रहे हैं। शम्मी कपूर इस बात पर अड़ गए कि इस गाने को फिल्म से बदल दिया जाए। जब यह विवाद काफी बढ़ गया और मेकर्स असमंजस की स्थिति में आ गए, तब फिल्म इंडस्ट्री के ‘शोमैन’ राज कपूर को इस मामले में बीच-बचाव करने के लिए आगे आना पड़ा।

    राज कपूर ने शम्मी कपूर के गुस्से को शांत करते हुए उन्हें समझाया कि वह इस कंपोजिशन और गाने के मिजाज पर भरोसा रखें। उन्होंने शम्मी को सलाह दी कि गाने को बिना किसी बदलाव के फिल्म में वैसे ही रहने दिया जाए जैसा इसे रिकॉर्ड किया गया है। राज कपूर के दखल और उनके विजन पर भरोसा करते हुए शम्मी कपूर आखिरकार मान गए। इसके बाद जब फिल्म बनकर तैयार हुई, तो उद्योग के तमाम दिग्गजों के लिए फिल्म का एक भव्य प्रीमियर शो आयोजित किया गया। इस प्रीमियर में देव आनंद, आरडी बर्मन और महमूद जैसी सिनेमा जगत की कई नामचीन हस्तियां मौजूद थीं।

    थिएटर के भीतर जब फिल्म के दौरान यह गाना बजना शुरू हुआ, तो शुरुआत में लता मंगेशकर की सुरीली आवाज को हॉल में बैठे सभी दिग्गज बेहद शांति और एकाग्रता से सुन रहे थे। जैसे ही गाने के बीच में मोहम्मद रफी की जादुई लाइनें गूंजी, थिएटर का माहौल पूरी तरह बदल गया। रफी साहब की आवाज का जादू ऐसा चला कि वहां बैठे संगीतकार आरडी बर्मन, सदाबहार अभिनेता देव आनंद और मशहूर कॉमेडियन महमूद अपनी सीटों से खड़े हो गए और उत्साह में आकर लगातार तालियां बजाने लगे। थिएटर के अंदर मौजूद दर्शकों और फिल्म समीक्षकों का यह अद्भुत रिस्पॉन्स देखकर खुद शम्मी कपूर भी पूरी तरह हैरान रह गए थे।

    इस घटना के बाद शम्मी कपूर को भी अहसास हो गया कि स्क्रीन टाइम से ज्यादा गाने की आत्मा और उसकी गायकी मायने रखती है। बाद में यह गाना न केवल चार्टबस्टर साबित हुआ, बल्कि इसे हिंदी सिनेमा के सबसे बेहतरीन गानों की फेहरिस्त में शामिल किया गया। मोहम्मद रफी ने इसके बाद भी शम्मी कपूर के लिए ‘चाहें कोई मुझे जंगली कहे’, ‘बदन पे सितारे’, ‘तारीफ करूं क्या उसकी’, और ‘ये चांद सा रोशन चेहरा’ जैसे अनगिनत कल्ट गाने गाए, जिन्होंने शम्मी कपूर को इंडस्ट्री का ‘एल्विस प्रेस्ली’ बनाने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

  • मोहम्मद रफी का वो किस्सा, रीटेक से इनकार कर फिर गाया अमर गीत

    मोहम्मद रफी का वो किस्सा, रीटेक से इनकार कर फिर गाया अमर गीत


    नई दिल्ली । बॉलीवुड की क्लासिक फिल्म जंजीर का गाना “दीवाने हैं दीवानों को” आज भी श्रोताओं के दिलों में बसा हुआ है। इस गाने को संगीत दिया था मशहूर संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी ने, जबकि इसके बोल लिखे थे गीतकार गुलशन बावरा ने। रिकॉर्डिंग के दौरान जब यह गाना पहली बार तैयार हुआ, तो इसे सभी ने पसंद किया। खासकर लता मंगेशकर का गाया हिस्सा बेहद प्रभावशाली माना गया। लेकिन लता जी अपने काम में पूर्णता की पक्षधर थीं, इसलिए उन्होंने एक और रीटेक की मांग रख दी।

    स्टूडियो में बढ़ा तनाव, लेकिन रफ़ी ने क्यों किया इनकार?
    रीटेक की बात जब मोहम्मद रफ़ी तक पहुंची, तो उन्होंने शुरुआत में साफ इनकार कर दिया। वजह बेहद इंसानी थी-वे उस समय रोज़े में थे और सुबह से उन्होंने न तो खाना खाया था और न ही पानी पिया था। उनकी हालत ऐसी थी कि दोबारा उसी ऊर्जा और भाव के साथ गाना उनके लिए कठिन हो रहा था। इसी कारण उन्होंने स्टूडियो छोड़ने का फैसला कर लिया।

    अचानक बदला माहौल, और फिर लौटे स्टूडियो
    जैसे ही रफ़ी साहब स्टूडियो से बाहर निकले, उनकी मुलाकात गीतकार गुलशन बावरा से हुई। उन्होंने उत्साहित होकर बताया कि फिल्म में यह गाना वही गा रहे हैं। यह सुनकर रफ़ी साहब चौंक गए, क्योंकि उन्होंने गाना अमिताभ बच्चन के हावभाव और व्यक्तित्व को ध्यान में रखकर गाया था। यह एहसास उन्हें वापस स्टूडियो खींच लाया। उन्होंने बिना देर किए फिर से रिकॉर्डिंग करने का फैसला किया।

    भूखे-प्यासे फिर गूंज उठी आवाज़ और बन गया इतिहास
    इसके बाद मोहम्मद रफ़ी ने उसी हालत में, बिना कुछ खाए-पिए, दोबारा गाना रिकॉर्ड किया। इस बार उनकी आवाज में और भी गहराई, भाव और दर्द महसूस किया गया। रिकॉर्डिंग पूरी हुई और गाना रिलीज़ होते ही सुपरहिट साबित हुआ। यह किस्सा आज भी संगीत जगत में अनुशासन, समर्पण और कला के प्रति जुनून की मिसाल के रूप में याद किया जाता है।

    संगीत की दुनिया का अमर सबक
    यह घटना सिर्फ एक गाने की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर के कलाकारों की संवेदनशीलता और प्रोफेशनलिज्म का प्रतीक है। लता मंगेशकर की परफेक्शन की चाह और रफ़ी साहब की भावनात्मक प्रतिबद्धता ने इस गाने को अमर बना दिया। आज भी जब यह गीत बजता है, तो श्रोता सिर्फ संगीत नहीं सुनते, बल्कि उस संघर्ष और समर्पण को महसूस करते हैं जो इसके पीछे छिपा है।

  • ‘जब रफी साहब की आवाज ने बदल दी राजेश खन्ना की जिद्द’: एक गाने ने रच दिया था इतिहास

    ‘जब रफी साहब की आवाज ने बदल दी राजेश खन्ना की जिद्द’: एक गाने ने रच दिया था इतिहास


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के सुपरस्टार राजेश खन्ना अपने करियर के चरम पर थे। उस समय उनके कई हिट गाने किशोर कुमार की आवाज में रिकॉर्ड हो रहे थे। राजेश खन्ना को यह विश्वास था कि किशोर कुमार उनकी सफलता की “लकी आवाज” हैं। लेकिन फिल्म ‘दो रास्ते’ के एक गाने को लेकर स्थिति बदल गई, जब संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत–प्यारेलाल ने अलग राय रखी।

    मखमली आवाज की तलाश और रफी की एंट्री
    म्यूजिक डायरेक्टर्स का मानना था कि इस खास गाने के लिए एक ऐसी आवाज चाहिए जो नरम, भावपूर्ण और रूहानी हो। इसी कारण उन्होंने मोहम्मद रफी को चुना। राजेश खन्ना इसके खिलाफ थे और उन्होंने किशोर कुमार की आवाज की जिद्द रखी, लेकिन संगीतकारों ने स्पष्ट कहा कि इस गाने के साथ सिर्फ रफी साहब ही न्याय कर सकते हैं।

    स्टूडियो में हुआ वो जादू जिसने सब बदल दिया
    जब मोहम्मद रफी ने स्टूडियो में “रेशमी जुल्फें” गाया, तो पूरा माहौल बदल गया। उनकी आवाज में ऐसा जादू था कि हर कोई मंत्रमुग्ध रह गया। रिकॉर्डिंग सुनने के बाद खुद राजेश खन्ना भी इस गाने के फैन बन गए। कहा जाता है कि इसी पल उन्होंने स्वीकार किया कि यह गाना सिर्फ रफी साहब की आवाज में ही सही लग सकता है।

    फिल्म, कास्ट और दिलचस्प किस्से
    फिल्म के लिए पहले संजय खान को अप्रोच किया गया था, लेकिन बाद में यह रोल संजय खान से हटकर राजेश खन्ना को मिला। फिल्म में मुमताज पहली बार बतौर लीड ए-ग्रेड अभिनेत्री नजर आईं और उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई।

    रफी की विरासत और दीवानगी
    मोहम्मद रफी की आवाज का जादू ऐसा था कि संगीतकारों से लेकर दर्शकों तक हर कोई उनके गीतों का दीवाना था। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके अंतिम संस्कार में भारी बारिश के बावजूद हजारों लोग उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे।

    यह किस्सा सिर्फ एक गाने का नहीं, बल्कि उस दौर की संगीत परंपरा और कलाकारों की समझ का प्रतीक है, जहां सही आवाज और सही भाव ही किसी गीत को अमर बना देते थे। “रेशमी जुल्फें” ने न सिर्फ राजेश खन्ना की सोच बदली, बल्कि मोहम्मद रफी की गायकी को एक और ऐतिहासिक ऊंचाई दी

  • SD बर्मन की बात से आहत हुई थीं लता मंगेशकर: ईगो भुलाकर 5 साल बाद मोहम्मद रफी के साथ गाया था यह यादगार गीत

    SD बर्मन की बात से आहत हुई थीं लता मंगेशकर: ईगो भुलाकर 5 साल बाद मोहम्मद रफी के साथ गाया था यह यादगार गीत


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर में अगर किसी सिंगिंग जोड़ी ने सबसे ज्यादा जादू बिखेरा तो वह थी लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी की जोड़ी। दोनों की आवाज का ऐसा असर था कि हर फिल्ममेकर अपनी फिल्म में इनकी आवाज चाहता था। 1950 और 60 के दशक में इस जोड़ी ने दर्जनों सुपरहिट गाने दिए। लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब दोनों दिग्गजों के बीच ऐसा विवाद हुआ कि उन्होंने साथ गाना छोड़ने तक की कसम खा ली।
    दरअसल साल 1962 में गानों की रॉयल्टी को लेकर लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी के बीच मतभेद हो गया। लता मंगेशकर का मानना था कि गायकों को गानों की रॉयल्टी मिलनी चाहिए, जबकि मोहम्मद रफी इस विचार से सहमत नहीं थे। विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों ने साथ काम न करने का फैसला कर लिया।
    इसके बाद करीब चार से पांच साल तक दोनों ने कोई डुएट सॉन्ग रिकॉर्ड नहीं किया। इस दौरान मोहम्मद रफी ने आशा भोसले और सुमन कल्याणपुर जैसी गायिकाओं के साथ कई सुपरहिट गाने दिए। दूसरी तरफ लता मंगेशकर भी अपने सोलो गानों में व्यस्त रहीं। लेकिन धीरे-धीरे इंडस्ट्री में नई आवाजों की एंट्री होने लगी और इसका असर लता मंगेशकर के करियर पर भी पड़ने लगा।

    इसी दौरान मशहूर संगीतकार एसडी बर्मन एक बड़ी फिल्म के लिए गाना तैयार कर रहे थे। उन्होंने इस गाने के लिए लता मंगेशकर को फोन किया। शुरुआत में लता ने गाने के लिए हामी भर दी, लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि इस गाने में मोहम्मद रफी भी होंगे, उन्होंने तुरंत ऑफर ठुकरा दिया।

    कहा जाता है कि एसडी बर्मन इस जवाब से नाराज नहीं हुए बल्कि सीधे लता मंगेशकर के घर पहुंच गए। वहां उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के लता से साफ कहा कि उनकी यह जिद उनके ही करियर को नुकसान पहुंचा रही है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर वह यह गाना नहीं गाएंगी तो वह इसे सुमन कल्याणपुर से रिकॉर्ड करवा देंगे।

    एसडी बर्मन की यह बात लता मंगेशकर को भीतर तक चुभ गई। उन्हें एहसास हुआ कि उनका ईगो धीरे-धीरे उनकी जगह किसी और को दिला सकता है। यही वह पल था जब उन्होंने अपने पुराने विवाद को खत्म करने का फैसला लिया।

    इसके बाद लता मंगेशकर ने संगीतकार जय किशन के जरिए मोहम्मद रफी तक संदेश पहुंचाया। खास बात यह रही कि रफी साहब ने भी पुराने मनमुटाव को पीछे छोड़ते हुए तुरंत हामी भर दी। फिर वह ऐतिहासिक पल आया जिसका संगीत प्रेमी वर्षों से इंतजार कर रहे थे।

    मुंबई के शन्मुखानंद हॉल में दोनों दिग्गज फिर एक साथ रिकॉर्डिंग स्टूडियो पहुंचे और 1967 में रिलीज हुई देव आनंद की फिल्म ‘ज्वेल थीफ’ के लिए सुपरहिट गाना ‘दिल पुकारे आ रे आ रे’ रिकॉर्ड किया गया। यह गाना रिलीज होते ही छा गया और इसके साथ ही लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी की जादुई जोड़ी की वापसी हो गई।

    इसके बाद दोनों ने कई फिल्मों में साथ गाने गाए और हिंदी सिनेमा को ऐसे यादगार नगमे दिए जिन्हें आज भी लोग उतने ही प्यार से सुनते हैं। यह किस्सा सिर्फ दो महान कलाकारों के विवाद का नहीं बल्कि इस बात का भी उदाहरण है कि कला के सामने अहंकार ज्यादा देर तक टिक नहीं सकता।

  • मीना कुमारी के आखिरी दिनों का सबसे भावुक किस्सा, मौत के बिस्तर पर मोहम्मद रफी से सुना था अपना पसंदीदा गीत

    मीना कुमारी के आखिरी दिनों का सबसे भावुक किस्सा, मौत के बिस्तर पर मोहम्मद रफी से सुना था अपना पसंदीदा गीत


    नई दिल्ली ।  हिंदी सिनेमा में अपने अभिनय और खूबसूरती से छाप छोड़ने वाली मीना कुमारी का आखिरी वक्त बुरा गुजरा। एक्ट्रेस लीवर सिरोसिस से पीड़ित थीं। और लंबे इलाज के बाद भी उन्हें बचाया नहीं जा सका। लेकिन जब वो बीमार, बिस्तर पर पड़ी थीं तो अक्सर एक गाना सुना करती थीं। उन्हें हमेशा से लगता था कि ये गाना उनकी निजी जिंदगी से जुड़ा हुआ है।
    वो एक ऐसा गीत था जो तकलीफ भरे दिनों में मीना कुमारी को राहत की सांस देता था। मीना जब-जब इस गीत को गुनगुनाया करतीं तो अपने आधे ग़मों को भूल जाया करती थीं। मीना कुमारी का इस गाने से इतना गहरा जुड़ाव था कि जब मोहम्मद रफी उनसे मिलने आए तो एक्ट्रेस ने उनसे ये गाना गाने की रिक्वेस्ट की थी।
    बुरे दिनों में मीना कुमारी का साथी था ये गाना
    1961 में मीना कुमारी की एक रिलीज हुई थी जिसका नाम था प्यार का सागर। इस फिल्म में मीना के साथ एक्टर राजेंद्र कुमार लीड रोल में थे। इस फिल्म में वैसे कई खूबसूरत गाने थे लेकिन ‘मुझे प्यार की जिंदगी देने वाले, कभी गम न देना खुशी देने वाले’। इस गाने को मोहम्मद रफी और आशा भोसले ने गाया था। ये गाना मीना कुमारी के दर्द की दवा बन गया था। अपना अकेलापन, दर्द भूलने के लिए अक्सर एक्ट्रेस इसी गाने को गुनगुनाया करती थीं।
    ये वो समय था जब मीना बहुत बीमार पड़ चुकी थीं, मौत से लड़ रही थीं। उन्हें फिल्मों के सेट पर नहीं बल्कि घर के एक कमरे में पड़े बिस्तर पर बीमार हालत में देखा जाता था। उनके आखिरी समय में फिल्मी जगत के कई कलाकार उनसे मिलने पहुंचा करते थे। एक दिन सिंगर मोहम्मद रफी भी पहुंचे। और मौत के बिस्तर पर मीना ने मोहम्मद रफी से वो गाना गाने की रिक्वेस्ट कर दी जो उनके दिल के बहुत करीब था।

    आत्मा में उतर चुका था मोहम्मद रफी का ये गीत
    बीमार, मौत से लड़ रही मीना कुमारी की इस इच्छा को मोहम्मद रफी ने टाला नहीं। वो उनके सिरहाने बैठे थे। उन्होंने उसी दर्द, और फीलिंग्स के साथ मीना के सामने गाया ‘मुझे प्यार की जिंदगी देने वाले, कभी गम न देना खुशी देने वाले’। ये गाना मीना की आत्मा में उतर चुका था।
    ऐसे बना था ये गाना

    इस गाने को बनाने की भी एक अलग कहानी है। फिल्म प्यार का सागर में कुल 8 गाने थे। इन सभी गानों को रवि और प्रेम धवन ने कंपोज़ किया था। असद भोपाली ने गीत लिखे थे। इन गानों को आशा भोसले। शमशाद बेगम, मोहम्मद रफी और मुकेश ने गाए थे। फिल्म का गाना ‘ ‘मुझे प्यार की जिंदगी देने वाले, कभी गम न देना खुशी देने वाले’ गाने को अगले दिन फिल्माया जाना था,
    लेकिन उस वक़्त तक रिकॉर्डिंग नहीं हुई थी।
    प्रेम धवन ने गाने को लिखा था और सिंगर मोहम्मद रफी को गाना रिकॉर्डिंग के लिए उसी दिन बुला लिया गया। लेकिन फीमेल सिंगर के लिए आशा भोसले और लता मंगेशकर से संपर्क नहीं हो पा रहा था। ऐसे में कंपोजर रवि ने सुमन कल्यानपुर से बात की गई। उन्होंने आने का वादा किया लेकिन वो स्टूडियो पहुंची नहीं। बहुत इंतजार के बाद अंत में एक बार फिर आशा भोसले से संपर्क किया गया और उनसे इस गाने को लेकर बात पक्की हो गई। आशा भोसले और मोहम्मद रफी ने मिलकर इस गाने को गया। अगले दिन गाने की शूटिंग को गई। मीना कुमारी और राजेंद्र इस गाने में नजर आए थे।
  • बॉलीवुड का ऐतिहासिक डुएट: किशोर कुमार बनाम मोहम्मद रफी की जादुई जुगलबंदी

    बॉलीवुड का ऐतिहासिक डुएट: किशोर कुमार बनाम मोहम्मद रफी की जादुई जुगलबंदी


    नई दिल्ली । बॉलीवुड के सुनहरे दौर में जब मोहम्मद रफी और किशोर कुमार जैसे दिग्गज गायक एक साथ किसी गाने में अपनी आवाज देते थे, तो वह सिर्फ एक गीत नहीं बल्कि इतिहास बन जाता था। ऐसा ही एक यादगार किस्सा फिल्म दोस्ताना (1980) से जुड़ा है, जिसमें अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा मुख्य भूमिकाओं में थे।

    इस फिल्म के मशहूर डुएट गीत “सलामत रहे दोस्ताना हमारा” की रिकॉर्डिंग के दौरान स्टूडियो में एक दिलचस्प माहौल देखने को मिला। बताया जाता है कि मोहम्मद रफी समय पर स्टूडियो पहुंच गए थे और उन्होंने गाने की रिहर्सल भी पूरी तैयारी के साथ की थी। उनकी क्लासिकल और मधुर आवाज ने वहां मौजूद सभी लोगों को प्रभावित कर दिया था।

    लेकिन जब किशोर कुमार स्टूडियो पहुंचे तो उन्होंने माहौल को गंभीर बनाने के बजाय हल्का-फुल्का कर दिया। वे रफी साहब के साथ मजाक-मस्ती करने लगे, जिससे कई लोगों को लगा कि वह गाने को लेकर गंभीर नहीं हैं। उस समय कई लोगों को लगा कि रफी साहब अपनी परफॉर्मेंस से बाजी मार लेंगे।

    हालांकि, जैसे ही रिकॉर्डिंग शुरू हुई, पूरा माहौल बदल गया। पहले मोहम्मद रफी ने अपने हिस्से को बेहद खूबसूरती और गहराई के साथ गाया। लेकिन जब किशोर कुमार की बारी आई, तो उनकी आवाज ने स्टूडियो में मौजूद हर शख्स को हैरान कर दिया। उनकी गायकी में जो ऊर्जा, भाव और सहजता थी, उसने गाने को एक अलग ही ऊंचाई पर पहुंचा दिया।

    संगीतकार पंडित रोनू मजुमदार के अनुसार, उस दिन दोनों ही दिग्गजों ने शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन किशोर कुमार की आवाज में एक अलग तरह का जादू था, जिसने माहौल को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी परफॉर्मेंस को कई लोग उस दौर की सबसे यादगार रिकॉर्डिंग्स में से एक मानते हैं।

    फिल्म दोस्ताना के अन्य गीत भी सुपरहिट साबित हुए और फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया। लेकिन यह डुएट गाना आज भी इसलिए याद किया जाता है क्योंकि इसमें दो महान गायकों की अद्भुत टक्कर और संगीत की असली ताकत देखने को मिली।

  • जब 16 हजार लौटाकर मोहम्मद रफी ने रच दिया इंसानियत का इतिहास, जीतेंद्र भी रह गए हैरान

    जब 16 हजार लौटाकर मोहम्मद रफी ने रच दिया इंसानियत का इतिहास, जीतेंद्र भी रह गए हैरान



    नई दिल्ली(New Delhi)।
    हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर के दिग्गज पार्श्वगायक मोहम्मद रफी को उनकी बेहतरीन आवाज के साथ-साथ उनकी सादगी और इंसानियत के लिए भी याद किया जाता है। उनसे जुड़ा एक ऐसा ही भावुक किस्सा अभिनेता जीतेंद्र ने साझा किया था, जो आज भी लोगों के दिलों को छू जाता है।

    दरअसल, कुछ साल पहले एक संगीत समारोह में जीतेंद्र ने अपने और मोहम्मद रफी के बीच का एक पुराना अनुभव सुनाया था। उन्होंने बताया कि वे एक मिडिल क्लास परिवार से थे और बाद में उन्होंने फिल्म प्रोडक्शन की दुनिया में कदम रखा। अपनी कंपनी “तिरुपति फिल्म्स” के तहत उन्होंने कई फिल्मों का निर्माण किया, जिनमें ‘हमजोली’, ‘परिचय’, ‘खुशबू’, ‘ज्योति बने ज्वाला’ और ‘दीदार-ए-यार’ जैसी फिल्में शामिल थीं।

    ‘दीदार-ए-यार’ उनके करियर की सबसे महंगी फिल्मों में से एक थी, जिसमें ऋषि कपूर भी मुख्य भूमिका में थे। इसी फिल्म के लिए मोहम्मद रफी ने एक गाना गाया था, जिसके लिए उन्हें शुरुआत में 4 हजार रुपये फीस दी गई थी। समय के साथ फिल्म का बजट बढ़ गया और बाद में एक और गाना किशोर कुमार और मोहम्मद रफी दोनों ने मिलकर रिकॉर्ड किया।

    इस दौरान जीतेंद्र के मैनेजर ने निर्णय लिया कि दोनों गायकों को समान फीस दी जाए और उन्होंने मोहम्मद रफी को 20 हजार रुपये भेज दिए। लेकिन जब यह बात मोहम्मद रफी तक पहुंची, तो उन्होंने इस पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि जब फिल्म की शुरुआत में उनकी फीस 4 हजार तय हुई थी, तो उससे अधिक पैसे लेना उन्हें स्वीकार नहीं है।

    इसके बाद मोहम्मद रफी ने केवल 4 हजार रुपये ही अपने पास रखे और बाकी 16 हजार रुपये वापस कर दिए। उन्होंने साफ कहा कि वे सिर्फ उतनी ही रकम लेंगे जितनी शुरुआत में तय हुई थी। उनकी इस ईमानदारी और विनम्रता ने जीतेंद्र को गहराई से प्रभावित किया और यह किस्सा आज भी वह भावुक होकर याद करते हैं।

    यह घटना सिर्फ एक लेन-देन की कहानी नहीं है, बल्कि उस दौर के कलाकारों की सादगी, सिद्धांत और सम्मान की भावना को भी दर्शाती है, जो आज के समय में भी मिसाल के रूप में देखी जाती है।

  • 7 साल तक रिजेक्ट रहा रफी साहब का गाना, शम्मी कपूर की फिल्म में बन गया ऑल-टाइम सुपरहिट

    7 साल तक रिजेक्ट रहा रफी साहब का गाना, शम्मी कपूर की फिल्म में बन गया ऑल-टाइम सुपरहिट



    नई दिल्ली। मोहम्मद रफी, जिनकी आवाज को भारतीय संगीत की सबसे महान आवाजों में गिना जाता है, उन्होंने अपने करियर में एक से बढ़कर एक अमर गीत दिए। लेकिन उनके करियर में एक ऐसा भी गाना रहा, जिसे बार-बार रिजेक्ट किया गया और करीब 7 साल तक वह रिलीज नहीं हो सका। बाद में वही गाना संगीत इतिहास का सुपरहिट गाना बन गया।

    “आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे” की शुरुआत
    इस गाने की कहानी शुरू होती है 1961 में आई फिल्म “जब प्यार किसी से होता है” से। इस फिल्म का निर्देशन नासिर हुसैन ने किया था। फिल्म में देव आनंद, आशा पारेख और प्राण जैसे बड़े कलाकार थे। संगीत शंकर-जयकिशन ने दिया था और गीत हसरत जयपुरी और शैलेंद्र ने लिखे थे।

    इसी फिल्म के लिए एक गाना रिकॉर्ड किया गया था
    “आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हैं जुबान पर”
    जिसे मोहम्मद रफी और सुमन कल्याणपुर ने गाया था।

    देव आनंद ने किया सबसे पहला रिजेक्शन
    फिल्म के लिए जब यह गाना तैयार हुआ तो संगीतकारों को इससे काफी उम्मीद थी, लेकिन जब देव आनंद ने इसे सुना तो उन्होंने इसे रिजेक्ट कर दिया।
    उनका मानना था कि यह गाना उनके किरदार की गंभीरता से मेल नहीं खाता और यह स्क्रीन पर जरूरत से ज्यादा “लाउड” लगेगा।

    इस वजह से गाना फिल्म से बाहर कर दिया गया।
    5 साल बाद भी नहीं मिली जगह
    करीब 5 साल बाद, 1966 में जब शंकर-जयकिशन फिल्म “सूरज” का संगीत बना रहे थे, तो उन्होंने इस पुरानी धुन को फिर से इस्तेमाल करने की कोशिश की।
    इस बार फिल्म के हीरो राजेंद्र कुमार थे।लेकिन एक बार फिर गाने को रिजेक्ट कर दिया गया। राजेंद्र कुमार को भी लगा कि यह गाना उनके स्क्रीन इमेज से मेल नहीं खाता।

    शम्मी कपूर ने बदली किस्मत
    संगीतकार शंकर-जयकिशन इस गाने को लेकर निराश हो चुके थे, लेकिन 1968 में जब फिल्म “ब्रह्मचारी” बनी, तो कहानी बदल गई।जब शम्मी कपूर को यह धुन सुनाई गई तो उन्हें यह बेहद पसंद आई। उन्होंने तुरंत कहा कि यह गाना उनकी फिल्म में शामिल किया जाएगा।

    रिलीज होते ही बना ब्लॉकबस्टर
    फिल्म “ब्रह्मचारी” रिलीज हुई और यह गाना—
    “आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हैं जुबान पर”
    सीधा सुपरहिट बन गया।शम्मी कपूर और मुमताज की जोड़ी पर फिल्माया गया यह गाना इतना लोकप्रिय हुआ कि आज भी यह सदाबहार हिट माना जाता है। लोग इसे आज भी रीमिक्स और स्टेज परफॉर्मेंस में उतने ही उत्साह से सुनते हैं।

    रफी साहब की अमर आवाज
    मोहम्मद रफी की खासियत यह थी कि हर बड़ा अभिनेता उनकी आवाज चाहता था। शम्मी कपूर के साथ उनकी जोड़ी ने कई हिट गाने दिए। उनकी आवाज ने इस गाने को अमर बना दिया।

    करियर की शुरुआत और उपलब्धियां
    मोहम्मद रफी ने अपने करियर की शुरुआत पंजाबी फिल्म “गुल बलोच” से की थी। उनका पहला हिंदी गाना 1945 की फिल्म “गांव की गोरी” में आया था।अपने शानदार करियर में उन्हें6 फिल्मफेयर अवॉर्ड्स1965 में पद्म श्री1977 में नेशनल अवॉर्डसे सम्मानित किया गया।
    7 साल तक रिजेक्ट होने के बाद भी यह गाना भारतीय संगीत का इतिहास बन गया। यह कहानी बताती है कि असली कला समय के साथ पहचान बनाती है और सही मौका मिलने पर अमर हो जाती है।

  • धर्मेंद्र को रोमांटिक हीरो बनाने वाले गायक: मोहम्मद रफी ने गाए थे 119 अमर गाने

    धर्मेंद्र को रोमांटिक हीरो बनाने वाले गायक: मोहम्मद रफी ने गाए थे 119 अमर गाने


    नई दिल्ली। बॉलीवुड के Dharmendra को जब भी याद किया जाता है, तो एक मजबूत, गबरू और एक्शन हीरो की छवि सामने आती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उनकी यही छवि बदलकर उन्हें रोमांटिक स्टार बनाने में सबसे बड़ा योगदान दिवंगत गायक Mohammed Rafi का रहा है।

    मोहम्मद रफी ने धर्मेंद्र के लिए एक-दो नहीं, बल्कि करीब 119 गाने गाए थे। यह सिलसिला 1961 की फिल्म शोला और शबनम से शुरू हुआ और 1980 के दशक तक लगातार चलता रहा। इन गीतों में लगभग 60 सोलो और 59 डुएट गाने शामिल थे। रफी की आवाज ने धर्मेंद्र के किरदारों को वह भावनात्मक गहराई दी, जिसने दर्शकों के दिलों में उनके लिए खास जगह बना दी।

    फिल्मी दुनिया में अक्सर कहा जाता है कि धर्मेंद्र को रोमांटिक हीरो का दर्जा दिलाने में संगीतकारों की अहम भूमिका रही, लेकिन असली जादू रचा संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और मोहम्मद रफी ने मिलकर। इस जोड़ी ने धर्मेंद्र के लिए 50 से ज्यादा गाने तैयार किए, जिनमें प्रतिज्ञा का मशहूर गाना “मैं जट यमला पगला दीवाना” आज भी बेहद लोकप्रिय है।

    इसके अलावा मदन मोहन के संगीत में जब रफी ने “आप के हसीन रुख पे” जैसे गीत गाए, तो धर्मेंद्र की रोमांटिक छवि और भी निखर गई। यह वही दौर था जब एक्शन फिल्मों के साथ-साथ धर्मेंद्र को एक सॉफ्ट रोमांटिक हीरो के रूप में भी देखा जाने लगा।

    धर्मेंद्र ने खुद एक इंटरव्यू में कहा था कि जब रफी उनके लिए गाते थे, तो उन्हें लगता था जैसे वह खुद गा रहे हों। यह भावना ही उनकी ऑन-स्क्रीन परफॉर्मेंस को और अधिक वास्तविक बना देती थी।

    रफी और धर्मेंद्र की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को कई यादगार गीत दिए। हकीकत का “होके मजबूर मुझे उसने पुकारा होगा”, लोफर का “आज मौसम बड़ा बेईमान है” और दो रास्ते का “सुख के सब साथी” जैसे गाने आज भी लोगों की प्लेलिस्ट में शामिल हैं।

    इन दोनों की जोड़ी ने हर भावना प्यार, दर्द, खुशी और संघर्ष—को आवाज दी। यही कारण है कि आज भी जब ये गीत बजते हैं, तो धर्मेंद्र की मुस्कान और रफी की आवाज एक साथ अमर हो उठती है।