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  • जब 16 हजार लौटाकर मोहम्मद रफी ने रच दिया इंसानियत का इतिहास, जीतेंद्र भी रह गए हैरान

    जब 16 हजार लौटाकर मोहम्मद रफी ने रच दिया इंसानियत का इतिहास, जीतेंद्र भी रह गए हैरान



    नई दिल्ली(New Delhi)।
    हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर के दिग्गज पार्श्वगायक मोहम्मद रफी को उनकी बेहतरीन आवाज के साथ-साथ उनकी सादगी और इंसानियत के लिए भी याद किया जाता है। उनसे जुड़ा एक ऐसा ही भावुक किस्सा अभिनेता जीतेंद्र ने साझा किया था, जो आज भी लोगों के दिलों को छू जाता है।

    दरअसल, कुछ साल पहले एक संगीत समारोह में जीतेंद्र ने अपने और मोहम्मद रफी के बीच का एक पुराना अनुभव सुनाया था। उन्होंने बताया कि वे एक मिडिल क्लास परिवार से थे और बाद में उन्होंने फिल्म प्रोडक्शन की दुनिया में कदम रखा। अपनी कंपनी “तिरुपति फिल्म्स” के तहत उन्होंने कई फिल्मों का निर्माण किया, जिनमें ‘हमजोली’, ‘परिचय’, ‘खुशबू’, ‘ज्योति बने ज्वाला’ और ‘दीदार-ए-यार’ जैसी फिल्में शामिल थीं।

    ‘दीदार-ए-यार’ उनके करियर की सबसे महंगी फिल्मों में से एक थी, जिसमें ऋषि कपूर भी मुख्य भूमिका में थे। इसी फिल्म के लिए मोहम्मद रफी ने एक गाना गाया था, जिसके लिए उन्हें शुरुआत में 4 हजार रुपये फीस दी गई थी। समय के साथ फिल्म का बजट बढ़ गया और बाद में एक और गाना किशोर कुमार और मोहम्मद रफी दोनों ने मिलकर रिकॉर्ड किया।

    इस दौरान जीतेंद्र के मैनेजर ने निर्णय लिया कि दोनों गायकों को समान फीस दी जाए और उन्होंने मोहम्मद रफी को 20 हजार रुपये भेज दिए। लेकिन जब यह बात मोहम्मद रफी तक पहुंची, तो उन्होंने इस पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि जब फिल्म की शुरुआत में उनकी फीस 4 हजार तय हुई थी, तो उससे अधिक पैसे लेना उन्हें स्वीकार नहीं है।

    इसके बाद मोहम्मद रफी ने केवल 4 हजार रुपये ही अपने पास रखे और बाकी 16 हजार रुपये वापस कर दिए। उन्होंने साफ कहा कि वे सिर्फ उतनी ही रकम लेंगे जितनी शुरुआत में तय हुई थी। उनकी इस ईमानदारी और विनम्रता ने जीतेंद्र को गहराई से प्रभावित किया और यह किस्सा आज भी वह भावुक होकर याद करते हैं।

    यह घटना सिर्फ एक लेन-देन की कहानी नहीं है, बल्कि उस दौर के कलाकारों की सादगी, सिद्धांत और सम्मान की भावना को भी दर्शाती है, जो आज के समय में भी मिसाल के रूप में देखी जाती है।

  • 7 साल तक रिजेक्ट रहा रफी साहब का गाना, शम्मी कपूर की फिल्म में बन गया ऑल-टाइम सुपरहिट

    7 साल तक रिजेक्ट रहा रफी साहब का गाना, शम्मी कपूर की फिल्म में बन गया ऑल-टाइम सुपरहिट



    नई दिल्ली। मोहम्मद रफी, जिनकी आवाज को भारतीय संगीत की सबसे महान आवाजों में गिना जाता है, उन्होंने अपने करियर में एक से बढ़कर एक अमर गीत दिए। लेकिन उनके करियर में एक ऐसा भी गाना रहा, जिसे बार-बार रिजेक्ट किया गया और करीब 7 साल तक वह रिलीज नहीं हो सका। बाद में वही गाना संगीत इतिहास का सुपरहिट गाना बन गया।

    “आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे” की शुरुआत
    इस गाने की कहानी शुरू होती है 1961 में आई फिल्म “जब प्यार किसी से होता है” से। इस फिल्म का निर्देशन नासिर हुसैन ने किया था। फिल्म में देव आनंद, आशा पारेख और प्राण जैसे बड़े कलाकार थे। संगीत शंकर-जयकिशन ने दिया था और गीत हसरत जयपुरी और शैलेंद्र ने लिखे थे।

    इसी फिल्म के लिए एक गाना रिकॉर्ड किया गया था
    “आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हैं जुबान पर”
    जिसे मोहम्मद रफी और सुमन कल्याणपुर ने गाया था।

    देव आनंद ने किया सबसे पहला रिजेक्शन
    फिल्म के लिए जब यह गाना तैयार हुआ तो संगीतकारों को इससे काफी उम्मीद थी, लेकिन जब देव आनंद ने इसे सुना तो उन्होंने इसे रिजेक्ट कर दिया।
    उनका मानना था कि यह गाना उनके किरदार की गंभीरता से मेल नहीं खाता और यह स्क्रीन पर जरूरत से ज्यादा “लाउड” लगेगा।

    इस वजह से गाना फिल्म से बाहर कर दिया गया।
    5 साल बाद भी नहीं मिली जगह
    करीब 5 साल बाद, 1966 में जब शंकर-जयकिशन फिल्म “सूरज” का संगीत बना रहे थे, तो उन्होंने इस पुरानी धुन को फिर से इस्तेमाल करने की कोशिश की।
    इस बार फिल्म के हीरो राजेंद्र कुमार थे।लेकिन एक बार फिर गाने को रिजेक्ट कर दिया गया। राजेंद्र कुमार को भी लगा कि यह गाना उनके स्क्रीन इमेज से मेल नहीं खाता।

    शम्मी कपूर ने बदली किस्मत
    संगीतकार शंकर-जयकिशन इस गाने को लेकर निराश हो चुके थे, लेकिन 1968 में जब फिल्म “ब्रह्मचारी” बनी, तो कहानी बदल गई।जब शम्मी कपूर को यह धुन सुनाई गई तो उन्हें यह बेहद पसंद आई। उन्होंने तुरंत कहा कि यह गाना उनकी फिल्म में शामिल किया जाएगा।

    रिलीज होते ही बना ब्लॉकबस्टर
    फिल्म “ब्रह्मचारी” रिलीज हुई और यह गाना—
    “आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हैं जुबान पर”
    सीधा सुपरहिट बन गया।शम्मी कपूर और मुमताज की जोड़ी पर फिल्माया गया यह गाना इतना लोकप्रिय हुआ कि आज भी यह सदाबहार हिट माना जाता है। लोग इसे आज भी रीमिक्स और स्टेज परफॉर्मेंस में उतने ही उत्साह से सुनते हैं।

    रफी साहब की अमर आवाज
    मोहम्मद रफी की खासियत यह थी कि हर बड़ा अभिनेता उनकी आवाज चाहता था। शम्मी कपूर के साथ उनकी जोड़ी ने कई हिट गाने दिए। उनकी आवाज ने इस गाने को अमर बना दिया।

    करियर की शुरुआत और उपलब्धियां
    मोहम्मद रफी ने अपने करियर की शुरुआत पंजाबी फिल्म “गुल बलोच” से की थी। उनका पहला हिंदी गाना 1945 की फिल्म “गांव की गोरी” में आया था।अपने शानदार करियर में उन्हें6 फिल्मफेयर अवॉर्ड्स1965 में पद्म श्री1977 में नेशनल अवॉर्डसे सम्मानित किया गया।
    7 साल तक रिजेक्ट होने के बाद भी यह गाना भारतीय संगीत का इतिहास बन गया। यह कहानी बताती है कि असली कला समय के साथ पहचान बनाती है और सही मौका मिलने पर अमर हो जाती है।

  • धर्मेंद्र को रोमांटिक हीरो बनाने वाले गायक: मोहम्मद रफी ने गाए थे 119 अमर गाने

    धर्मेंद्र को रोमांटिक हीरो बनाने वाले गायक: मोहम्मद रफी ने गाए थे 119 अमर गाने


    नई दिल्ली। बॉलीवुड के Dharmendra को जब भी याद किया जाता है, तो एक मजबूत, गबरू और एक्शन हीरो की छवि सामने आती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उनकी यही छवि बदलकर उन्हें रोमांटिक स्टार बनाने में सबसे बड़ा योगदान दिवंगत गायक Mohammed Rafi का रहा है।

    मोहम्मद रफी ने धर्मेंद्र के लिए एक-दो नहीं, बल्कि करीब 119 गाने गाए थे। यह सिलसिला 1961 की फिल्म शोला और शबनम से शुरू हुआ और 1980 के दशक तक लगातार चलता रहा। इन गीतों में लगभग 60 सोलो और 59 डुएट गाने शामिल थे। रफी की आवाज ने धर्मेंद्र के किरदारों को वह भावनात्मक गहराई दी, जिसने दर्शकों के दिलों में उनके लिए खास जगह बना दी।

    फिल्मी दुनिया में अक्सर कहा जाता है कि धर्मेंद्र को रोमांटिक हीरो का दर्जा दिलाने में संगीतकारों की अहम भूमिका रही, लेकिन असली जादू रचा संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और मोहम्मद रफी ने मिलकर। इस जोड़ी ने धर्मेंद्र के लिए 50 से ज्यादा गाने तैयार किए, जिनमें प्रतिज्ञा का मशहूर गाना “मैं जट यमला पगला दीवाना” आज भी बेहद लोकप्रिय है।

    इसके अलावा मदन मोहन के संगीत में जब रफी ने “आप के हसीन रुख पे” जैसे गीत गाए, तो धर्मेंद्र की रोमांटिक छवि और भी निखर गई। यह वही दौर था जब एक्शन फिल्मों के साथ-साथ धर्मेंद्र को एक सॉफ्ट रोमांटिक हीरो के रूप में भी देखा जाने लगा।

    धर्मेंद्र ने खुद एक इंटरव्यू में कहा था कि जब रफी उनके लिए गाते थे, तो उन्हें लगता था जैसे वह खुद गा रहे हों। यह भावना ही उनकी ऑन-स्क्रीन परफॉर्मेंस को और अधिक वास्तविक बना देती थी।

    रफी और धर्मेंद्र की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को कई यादगार गीत दिए। हकीकत का “होके मजबूर मुझे उसने पुकारा होगा”, लोफर का “आज मौसम बड़ा बेईमान है” और दो रास्ते का “सुख के सब साथी” जैसे गाने आज भी लोगों की प्लेलिस्ट में शामिल हैं।

    इन दोनों की जोड़ी ने हर भावना प्यार, दर्द, खुशी और संघर्ष—को आवाज दी। यही कारण है कि आज भी जब ये गीत बजते हैं, तो धर्मेंद्र की मुस्कान और रफी की आवाज एक साथ अमर हो उठती है।

  • 47 रीटेक के बाद तैयार हुआ ऐसा जोशीला गीत, मोहम्मद रफी की आवाज सुनकर आज भी भर आते हैं आंखें

    47 रीटेक के बाद तैयार हुआ ऐसा जोशीला गीत, मोहम्मद रफी की आवाज सुनकर आज भी भर आते हैं आंखें


    नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा में कुछ गाने ऐसे हैं जो समय के साथ और भी गहरे हो जाते हैं, और उनमें सबसे खास नाम है फिल्म गाइड का गीत “दिल ढल जाए”। इस गीत को अपनी आवाज से अमर बनाने वाले थे महान पार्श्वगायक मोहम्मद रफी, जिनकी गायकी ने दशकों से लोगों के दिलों को छुआ है।
    इस गीत की खासियत सिर्फ इसका संगीत या शब्द नहीं थे, बल्कि उसमें भरा हुआ भावनात्मक दर्द था, जिसे रफी साहब ने अपनी आवाज से जीवंत कर दिया। दिलचस्प बात यह है कि इस गाने को रिकॉर्ड करते समय रफी साहब पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने इसे परफेक्ट बनाने के लिए 47 रीटेक लिए थे।
    फिल्म गाइड के इस गीत के संगीतकार थे एस.डी. बर्मन और इसके बोल लिखे थे शैलेंद्र ने। यह गीत दिल टूटने और भावनात्मक संघर्ष को दर्शाता है, जिसे देव आनंद और वहीदा रहमान पर फिल्माया गया था।
    एस.डी. बर्मन ने पहले ही टेक में रफी की आवाज को पसंद कर लिया था, लेकिन रफी साहब को लगा कि वह अभी उस भावनात्मक गहराई तक नहीं पहुंचे हैं, जिसकी जरूरत इस गीत को थी। इसी वजह से उन्होंने बार-बार प्रयास किया और 47 बार गाने को दोहराया, ताकि हर शब्द में सही दर्द और भावना उतर सके।
    कहा जाता है कि जब अंतिम टेक पूरा हुआ, तब एस.डी. बर्मन ने रफी साहब को गले लगाकर कहा था कि उन्होंने हिंदी सिनेमा को एक अमर गीत दे दिया है। यह वही पल था जिसने इस गीत को इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज कर दिया।
    फिल्म गाइड न सिर्फ एक कलात्मक फिल्म थी, बल्कि तकनीकी और संगीत के स्तर पर भी बेहद खास मानी जाती है। इस फिल्म का संगीत तैयार करना आसान नहीं था। कई रिपोर्ट्स के अनुसार, इसके संगीत निर्माण में देर रात तक काम चलता था और कई बार स्वास्थ्य समस्याओं के बावजूद टीम ने काम जारी रखा।
    इस फिल्म की एक और खास बात यह है कि यह हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में बनी थी, जो उस दौर में एक बड़ा प्रयोग था। हालांकि अंग्रेजी संस्करण को भारत में ज्यादा लोकप्रियता नहीं मिली, लेकिन बाद में इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली।
    देव आनंद की यह फिल्म उनके करियर की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में से एक मानी जाती है, और इसका संगीत आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है।
    मोहम्मद रफी ने अपने पूरे करियर में हजारों गीत गाए, लेकिन “दिल ढल जाए” जैसा भावनात्मक गाना उनकी कला की पराकाष्ठा माना जाता है। उनकी आवाज की खासियत यही थी कि वह हर भावना को इतनी गहराई से व्यक्त करती थी कि श्रोता खुद को उस स्थिति में महसूस करने लगते थे।
    आज भी जब यह गीत सुना जाता है, तो उसकी गहराई और दर्द लोगों की आंखों को नम कर देता है। यह सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय संगीत इतिहास की एक अमर विरासत बन चुका है।

  • सुरों के सरताज मोहम्मद रफी का वो कालजयी गीत, जिसे गाने के लिए महमूद ने बुलावाया था असली किन्नरों को, आज भी ताजा हैं यादें।

    सुरों के सरताज मोहम्मद रफी का वो कालजयी गीत, जिसे गाने के लिए महमूद ने बुलावाया था असली किन्नरों को, आज भी ताजा हैं यादें।


    नई दिल्ली। भारतीय संगीत के स्वर्ण युग में जब भी सादगी और प्रतिभा के संगम की बात होती है, तो मोहम्मद रफी का नाम सबसे ऊपर आता है। संगीत जगत के इस महान गायक से जुड़े अनगिनत किस्से आज भी लोगों की आँखों में चमक और दिल में सम्मान भर देते हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प और भावुक कर देने वाला वाकया मशहूर कॉमेडियन और अभिनेता महमूद की एक फिल्म के दौरान घटित हुआ था। उस दौर में महमूद अपनी फिल्मों में नवीनता लाने के लिए जाने जाते थे, और उन्होंने एक गीत के फिल्मांकन के लिए कुछ ऐसा करने का निर्णय लिया जो उस समय के सिनेमा के लिए बेहद अनूठा था। उन्होंने तय किया कि एक विशेष गीत के चित्रण में किसी कलाकार के बजाय असली किन्नरों को शामिल किया जाएगा, ताकि उस दृश्य की संवेदनशीलता और वास्तविकता को पर्दे पर जीवंत किया जा सके।

    जब इस गीत की रिकॉर्डिंग की बात आई, तो सुरों के सम्राट मोहम्मद रफी ने अपनी जादुई आवाज से उसे इस तरह सजाया कि हर कोई मंत्रमुग्ध रह गया। रिकॉर्डिंग स्टूडियो से लेकर फिल्म के सेट तक, रफी साहब का व्यवहार उन सभी लोगों के प्रति इतना सहज और सम्मानजनक था कि वहां मौजूद हर व्यक्ति उनकी विनम्रता का कायल हो गया। सेट पर जब असली किन्नरों ने रफी साहब के गाये उस गीत पर अपनी प्रस्तुति दी, तो माहौल पूरी तरह से भावनात्मक हो गया। उस समय के चश्मदीदों का कहना है कि रफी साहब ने न केवल अपनी आवाज का जादू बिखेरा, बल्कि उन कलाकारों के साथ बेहद आत्मीयता से बातचीत भी की, जिससे उन्हें कभी यह महसूस नहीं हुआ कि वे सिनेमा की चकाचौंध वाली दुनिया से अलग हैं।

    यह किस्सा न केवल मोहम्मद रफी की महान गायकी को दर्शाता है, बल्कि उनके उस व्यक्तित्व को भी उजागर करता है जहाँ ऊंच-नीच या सामाजिक भेदभाव की कोई जगह नहीं थी। महमूद, जो खुद एक मंझे हुए कलाकार थे, रफी साहब के इस समर्पण और व्यवहार को देखकर दंग रह गए थे। इस गीत के माध्यम से समाज के एक ऐसे वर्ग को मुख्यधारा के सिनेमा में सम्मान के साथ पेश किया गया, जिन्हें अक्सर हाशिये पर रखा जाता था। रफी साहब की आवाज में जो दर्द और रूहानियत थी, उसने उस गीत को कालजयी बना दिया। आज दशकों बाद भी जब इस गाने की चर्चा होती है, तो लोग केवल उसकी धुन को ही नहीं, बल्कि उसके पीछे की इस मानवीय कहानी को भी याद करते हैं।

    फिल्मी गलियारों में यह बात आज भी मिसाल के तौर पर दी जाती है कि कैसे एक महान कलाकार अपनी कला के जरिए सामाजिक दूरियों को मिटा सकता है। मोहम्मद रफी ने अपनी पूरी जिंदगी में हजारों गाने गाए, लेकिन कुछ चुनिंदा काम ऐसे थे जिन्होंने उन्हें ‘फरिश्ता’ इंसान की छवि दी। इस विशेष अनुभव ने साबित किया कि संगीत की कोई सीमा नहीं होती और जब इसे सच्चे दिल से गाया जाए, तो यह हर आत्मा को छू लेता है। महमूद और रफी साहब की इस जुगलबंदी ने सिनेमा के इतिहास में एक ऐसा अध्याय जोड़ दिया, जो आज की पीढ़ी के कलाकारों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है। सादगी, सम्मान और सुरों का यह अद्भुत मेल भारतीय सिनेमा की उन धरोहरों में से एक है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।

  • ऋषि कपूर की ‘कर्ज’: फ्लॉप फिल्म, लेकिन सुपरहिट म्यूजिक और मानसिक तनाव की सच्ची कहानी

    ऋषि कपूर की ‘कर्ज’: फ्लॉप फिल्म, लेकिन सुपरहिट म्यूजिक और मानसिक तनाव की सच्ची कहानी



    नई दिल्ली। बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता ऋषि कपूर की 1980 में आई फिल्म कर्ज आज भले ही एक कल्ट क्लासिक मानी जाती है, लेकिन रिलीज के समय यह बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई थी। दिलचस्प बात यह है कि फिल्म की असफलता नहीं, बल्कि उसके गानों की भारी सफलता ने उस दौर में ऋषि कपूर को भावनात्मक रूप से प्रभावित किया था।

    क्या थी फिल्म की खासियत?
    फिल्म का निर्देशन सुभाष घई ने किया था और यह एक म्यूजिकल थ्रिलर के रूप में बनाई गई थी। कहानी के साथ-साथ इसके संगीत पर खास फोकस किया गया था।इस फिल्म के संगीत को तैयार किया था लक्ष्मीकांत–प्यारेलाल की जोड़ी ने, और गानों को आवाज दी थी किशोर कुमार और मोहम्मद रफ़ी जैसे महान गायकों ने।

    सुपरहिट हुए गाने
    फिल्म के गाने जैसे
    ओम शांति ओम
    एक हसीना थी
    पैसा ये पैसा
    दर्द-ए-दिलइतने लोकप्रिय हुए कि वे आज भी याद किए जाते हैं।

    बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप
    जहां फिल्म का संगीत सुपरहिट रहा, वहीं सिनेमाघरों में फिल्म दर्शकों को आकर्षित नहीं कर पाई और फ्लॉप हो गई। शुरुआती हफ्तों के बाद इसकी कमाई तेजी से गिर गई।इसके कुछ समय बाद रिलीज हुई कुर्बानी ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया और कर्ज पीछे छूट गई।

    क्यों परेशान हुए ऋषि कपूर?
    रिपोर्ट्स और ऋषि कपूर की आत्मकथा के अनुसार, उन्हें इस बात का मानसिक दबाव महसूस हुआ कि उनकी फिल्म भले ही असफल रही, लेकिन उसके गाने हर जगह लोकप्रिय हो रहे थे। इस वजह से वे भावनात्मक तनाव में आ गए थे।कई रिपोर्ट्स में यह भी उल्लेख मिलता है कि वे उस समय काफी परेशान रहे और यह दौर उनके लिए चुनौतीपूर्ण था।

    आज क्या है स्थिति?
    समय के साथ कर्ज को दर्शकों ने एक आइकॉनिक फिल्म के रूप में स्वीकार किया और आज इसे बॉलीवुड की सबसे यादगार म्यूजिकल फिल्मों में गिना जाता है।