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  • मप्र सरकार के 60 फीसदी उपज खरीदने के फैसले के बाद किसानों का आंदोलन खत्म

    मप्र सरकार के 60 फीसदी उपज खरीदने के फैसले के बाद किसानों का आंदोलन खत्म


    – मप्र सरकार प्रत्येक पात्र किसान से करेगी मूंग का 60 प्रतिशत उपार्जन, स्लॉट बुकिंग की अवधि भी 10 दिन बढ़ाई

    भोपाल। मध्य प्रदेश में चल रहे किसान आंदोलन के बीच राज्य सरकार ने प्रत्येक पात्र किसान से 60 फीसदी तक मूंग खरीदी करने का ऐलान किया है। नर्मदापुरम, सीहोर और हरदा जैसे जिलों में लगभग तीन क्विंटल प्रति एकड़ खरीदी की जाएगी। साथ ही स्लॉट बुकिंग की अवधि 10 अगस्त तक बढ़ा दी है और मूंग खरीदी की अंतिम तारीख 20 अगस्त कर दी गई है।

    बुधवार की रात सरकार और किसान प्रतिनिधियों के बीच मंत्रालय में हुई बैठक के बाद किसानों ने अपना आंदोलन समाप्त कर दिया है। सरकार और किसान प्रतिनिधियों के बीच सहमति बनने के बाद किसान अपने-अपने घरों के लिए रवाना हो गए। प्रशासन ने बसों के जरिए किसानों को उनके वाहनों तक पहुंचाया। देर रात तक आंदोलन पूरी तरह समाप्त हो गया।

    एडिशनल सीपी शैलेंद्र सिंह चौहान ने बताया कि किसानों ने सहमति जता दी है। इसके बाद प्रशासन ने रोशनपुरा चौराहे से किसानों को बसों के जरिए उनकी गाड़ियों तक पहुंचाकर रवाना किया। बाद में रोशनपुरा चौराहा लगभग खाली हो गया। बाणगंगा की ओर जाने वाले मार्ग को छोड़कर बाकी रास्ते यातायात के लिए खोल दिए गए।

    कृषि मंत्री एंदल सिंह कंषाना ने बताया कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर बुधवार को किसानों के साथ चर्चा के लिए गठित मंत्री समूह की किसान प्रतिनिधियों के साथ चर्चा हुई। किसानों के व्यापक हित को ध्यान में रखते हुए प्रदेश सरकार ने यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया है कि अब प्रत्येक पात्र किसान से उसकी मूंग उपज का 25 प्रतिशत नहीं, बल्कि 60 प्रतिशत उपार्जन किया जाएगा, जो नर्मदापुरम, सीहोर एवं हरदा जैसे जिलों में लगभग 3 क्विंटल प्रति एकड़ आता है। यह निर्णय तत्काल प्रभाव से लागू किया जाएगा और प्रयास रहेगा कि अधिक से अधिक किसानों को इसका लाभ मिले।

    उन्होंने बताया कि किसानों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए सरकार ने स्लॉट बुकिंग की अवधि भी 10 दिन बढ़ाने का निर्णय लिया है। अब किसान 30 जुलाई के स्थान पर 10 अगस्त तक स्लॉट बुकिंग कर सकेंगे। इसी प्रकार उपार्जन की अंतिम तिथि भी 10 अगस्त से बढ़ाकर 20 अगस्त की जा रही है।

    कृषि मंत्री कंषाना ने कहा कि मध्य प्रदेश सरकार सदैव किसानों के हित में कार्य करती आई है। अन्नदाता प्रदेश की अर्थव्यवस्था और समृद्धि का आधार हैं और उनके परिश्रम से उत्पादित उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है ।

    उन्होंने बताया कि भारत सरकार द्वारा इस वर्ष ग्रीष्मकालीन मूंग के उपार्जन के लिए मध्य प्रदेश को 4.52 लाख मीट्रिक टन का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। भारत सरकार की योजना के अंतर्गत राज्य के कुल उत्पादन का अधिकतम 25 प्रतिशत उपार्जन किए जाने का प्रावधान है। भारत सरकार के इसी नियम के अंतर्गत निर्णय लिया गया था कि प्रदेश के मूंग उत्पादक किसानों से उनकी उपज का 25 प्रतिशत न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर उपार्जित किया जाएगा।

    उन्होने किसान भाइयों-बहनों को आश्वस्त किया कि मध्य प्रदेश सरकार सदैव किसानों के हित में खड़ी है। जहाँ तक खाद वितरण के लिए लागू की गई ई-टोकन व्यवस्था से संबंधित शिकायतों और व्यावहारिक समस्याओं का प्रश्न है, यह व्यवस्था राज्य शासन का एक महत्वपूर्ण सुधार है और आने वाले समय में इससे किसानों को काफी सुविधा एवं लाभ मिलेगा।

    ई-टोकन व्यवस्था में सुधार के लिये समिति गठित होगी

    कृषि मंत्री ने बताया कि चूँकि यह एक नई व्यवस्था है, इसलिए प्रारंभिक स्तर पर सामने आ रही समस्याओं को देखते हुए मुख्यमंत्री ने कृषि उत्पादन आयुक्त की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने का निर्णय लिया है। यह समिति ई-टोकन व्यवस्था से जुड़ी सभी समस्याओं का परीक्षण कर राज्य सरकार को अपनी अनुशंसाएँ प्रस्तुत करेगी। समिति की अनुशंसाओं के आधार पर आवश्यक सुधार तत्काल किए जाएंगे। सुझाव प्राप्त होकर सुधार होने तक ई-टोकन से खाद वितरण की व्यवस्था तत्काल प्रभाव से स्थगित की जा रही है।

  • पुलिस अधिकारियों को मिला बड़ा तोहफा मध्य प्रदेश में 301 निरीक्षकों का डीएसपी पद पर हुआ प्रमोशन

    पुलिस अधिकारियों को मिला बड़ा तोहफा मध्य प्रदेश में 301 निरीक्षकों का डीएसपी पद पर हुआ प्रमोशन


    मध्य प्रदेश। मध्य प्रदेश सरकार ने पुलिस विभाग में लंबे समय से पदोन्नति का इंतजार कर रहे अधिकारियों को बड़ी सौगात देते हुए बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया है। गृह विभाग ने राज्य पुलिस सेवा में कार्यरत 301 निरीक्षकों को पदोन्नत कर उप पुलिस अधीक्षक यानी डीएसपी के पद पर नियुक्त करने के आदेश जारी कर दिए हैं। 13 जुलाई 2026 को जारी इस आदेश के बाद पुलिस महकमे में खुशी का माहौल है और इसे विभाग के सबसे बड़े प्रमोशन आदेशों में से एक माना जा रहा है।

    गृह विभाग की ओर से मंत्रालय वल्लभ भवन भोपाल से जारी आदेश के अनुसार चयनित निरीक्षकों को छठे वेतनमान के ग्रेड पे 5400 से सातवें वेतनमान के लेवल 12 के अंतर्गत उप पुलिस अधीक्षक के पद पर पदोन्नत किया गया है। सरकार के इस फैसले से उन अधिकारियों को राहत मिली है जो कई वर्षों से पदोन्नति की प्रतीक्षा कर रहे थे। विभागीय वरिष्ठता और निर्धारित प्रक्रिया के तहत तैयार की गई सूची के आधार पर यह पदोन्नति दी गई है।

    पुलिस विभाग में निरीक्षक से उप पुलिस अधीक्षक बनना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है। डीएसपी के रूप में अधिकारियों की जिम्मेदारियां पहले की तुलना में काफी बढ़ जाती हैं। कानून व्यवस्था बनाए रखने से लेकर अपराध नियंत्रण विशेष अभियानों की निगरानी और प्रशासनिक कार्यों का नेतृत्व करने जैसी अहम जिम्मेदारियां अब इन अधिकारियों के कंधों पर होंगी। इससे पुलिस प्रशासन की कार्यक्षमता और नेतृत्व क्षमता को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    सरकार के इस फैसले का असर केवल अधिकारियों के पदनाम तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि इसका सीधा लाभ पुलिस व्यवस्था को भी मिलेगा। बड़ी संख्या में नए डीएसपी मिलने से विभिन्न जिलों और इकाइयों में लंबे समय से खाली पड़े पदों को भरने में मदद मिलेगी। इससे पुलिसिंग की गुणवत्ता बेहतर होने के साथ प्रशासनिक कार्यों में भी तेजी आने की संभावना है।

    पदोन्नति पाने वाले अधिकारियों के लिए यह फैसला उनके लंबे अनुभव और सेवा का सम्मान माना जा रहा है। वर्षों तक थाना स्तर पर कानून व्यवस्था संभालने वाले इन अधिकारियों को अब उच्च प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाने का अवसर मिलेगा। इससे विभाग के भीतर कार्य करने वाले अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों का मनोबल भी बढ़ेगा तथा उन्हें अपने करियर में आगे बढ़ने की नई प्रेरणा मिलेगी।

    मध्य प्रदेश सरकार लगातार प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए विभिन्न विभागों में पदोन्नति और नियुक्ति संबंधी फैसले ले रही है। हाल के महीनों में कई विभागों में अधिकारियों और कर्मचारियों को पदोन्नति का लाभ दिया गया है। पुलिस विभाग में 301 निरीक्षकों को एक साथ डीएसपी बनाना भी इसी दिशा में उठाया गया बड़ा कदम माना जा रहा है।

    अब पदोन्नति के बाद इन अधिकारियों की नई पदस्थापना की प्रक्रिया भी जल्द पूरी होने की संभावना है। नई जिम्मेदारियां संभालने के बाद उनसे बेहतर नेतृत्व प्रभावी कानून व्यवस्था और अपराध नियंत्रण में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की उम्मीद की जा रही है। सरकार का मानना है कि अनुभवी अधिकारियों को नेतृत्व की भूमिका देने से राज्य की पुलिस व्यवस्था और अधिक सशक्त तथा प्रभावी बनेगी।

  • फेसबुक एक्स इंस्टाग्राम पर जरा सी लापरवाही पड़ सकती है भारी सरकारी कर्मचारियों के लिए नई आचार संहिता लागू

    फेसबुक एक्स इंस्टाग्राम पर जरा सी लापरवाही पड़ सकती है भारी सरकारी कर्मचारियों के लिए नई आचार संहिता लागू


    मध्यप्रदेश। मध्यप्रदेश सरकार ने सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के सोशल मीडिया उपयोग को लेकर बड़ा और सख्त फैसला लिया है। सामान्य प्रशासन विभाग ने नई आचार संहिता जारी करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अब सोशल मीडिया पर किसी भी प्रकार की गैर जिम्मेदाराना गतिविधि बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सरकार का उद्देश्य शासकीय सेवकों की निष्पक्षता बनाए रखना और सामाजिक सौहार्द को सुरक्षित रखना है। नई व्यवस्था तत्काल प्रभाव से लागू कर दी गई है तथा सभी विभागों को इसका कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।

    नई गाइडलाइन के अनुसार कोई भी सरकारी कर्मचारी फेसबुक एक्स इंस्टाग्राम व्हाट्सएप यूट्यूब या किसी भी अन्य सोशल मीडिया मंच पर ऐसी पोस्ट टिप्पणी फोटो वीडियो या अन्य सामग्री साझा नहीं करेगा जिससे जातीय धार्मिक सामाजिक या राजनीतिक वैमनस्य फैलने की आशंका हो। सरकार का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर साझा की गई सामग्री का व्यापक प्रभाव पड़ता है और इससे समाज में तनाव की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। इसलिए प्रत्येक शासकीय सेवक को सोशल मीडिया पर संयम और जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करना होगा।

    सरकार ने केवल पोस्ट करने पर ही नहीं बल्कि विवादित सामग्री को लाइक शेयर या फॉरवर्ड करने पर भी रोक लगा दी है। यदि कोई कर्मचारी किसी भड़काऊ या विवादित पोस्ट को आगे बढ़ाता है तो उसे भी नियमों का उल्लंघन माना जाएगा। यानी अब केवल स्वयं सामग्री लिखना ही नहीं बल्कि आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार में सहयोग करना भी अनुशासनहीनता की श्रेणी में आएगा।

    राजनीतिक गतिविधियों को लेकर भी सरकार ने स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया है। आदेश के अनुसार कोई भी सरकारी कर्मचारी सोशल मीडिया के माध्यम से किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध में प्रचार नहीं करेगा। किसी राजनीतिक अभियान पर सार्वजनिक टिप्पणी करना या किसी दल के पक्ष अथवा विपक्ष में सक्रियता दिखाना मध्यप्रदेश सिविल सेवा आचरण नियमों का उल्लंघन माना जाएगा। सरकार का कहना है कि शासकीय सेवकों की निष्पक्षता लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला है और उसे हर परिस्थिति में बनाए रखना आवश्यक है।

    नई आचार संहिता में कर्मचारियों को सोशल मीडिया पर होने वाली बहस विवाद और क्रॉस कमेंट से भी दूर रहने की सलाह दी गई है। शासन का मानना है कि सरकारी कर्मचारियों द्वारा की गई सार्वजनिक टिप्पणी को आम लोग सरकार की आधिकारिक सोच से जोड़कर देखते हैं। इसलिए डिजिटल माध्यम पर किसी भी प्रतिक्रिया से पहले पूरी सावधानी बरतना आवश्यक है।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि नियमों का उल्लंघन करने वाले कर्मचारियों के खिलाफ केवल विभागीय कार्रवाई ही नहीं बल्कि आवश्यक होने पर भारतीय न्याय संहिता 2023 तथा अन्य लागू कानूनी प्रावधानों के तहत वैधानिक कार्रवाई भी की जा सकती है। विभागाध्यक्षों को निर्देश दिए गए हैं कि सभी कर्मचारियों को इन नियमों की जानकारी दें और पालन सुनिश्चित करें।

    डिजिटल युग में सोशल मीडिया सरकारी कर्मचारियों के लिए संवाद का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। नई आचार संहिता का उद्देश्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाना नहीं बल्कि सरकारी सेवा की गरिमा निष्पक्षता और सामाजिक सद्भाव बनाए रखना है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई व्यवस्था का पालन किस प्रकार सुनिश्चित किया जाता है और इससे सरकारी कार्यप्रणाली में किस तरह का सकारात्मक बदलाव देखने को मिलता है।

  • MP : 190 तहसीलदार और प्रभारी डिप्टी कलेक्टर पदोन्नत, बने डिप्टी कलेक्टर, आदेश जारी

    MP : 190 तहसीलदार और प्रभारी डिप्टी कलेक्टर पदोन्नत, बने डिप्टी कलेक्टर, आदेश जारी

    भोपाल। मध्यप्रदेश शासन के सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) ने मंगलवार को बड़ा प्रशासनिक आदेश जारी करते हुए प्रदेश के 190 तहसीलदार एवं प्रभारी डिप्टी कलेक्टरों को नियमित रूप से डिप्टी कलेक्टर पद पर पदोन्नत कर दिया है। इस संबंध में सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा आदेश जारी कर सभी अधिकारियों की पदोन्नति को तत्काल प्रभाव से लागू करने के निर्देश दिए गए हैं।

    आदेश के अनुसार, पदोन्नत किए गए अधिकारी पूर्व से प्रभारी डिप्टी कलेक्टर अथवा तहसीलदार के रूप में कार्यरत थे। अब इन्हें मध्यप्रदेश राज्य प्रशासनिक सेवा के डिप्टी कलेक्टर (वरिष्ठ श्रेणी) के पद पर नियमित पदोन्नति प्रदान की गई है। पदोन्नति के साथ ही इन अधिकारियों को नियमित डिप्टी कलेक्टर का दर्जा मिल गया है।

    सामान्य प्रशासन विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह पदोन्नति मध्यप्रदेश लोक सेवा (पदोन्नति) नियमों तथा विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की अनुशंसा के आधार पर की गई है। आदेश में यह भी उल्लेख किया गया है कि पदोन्नति शासन द्वारा निर्धारित नियमों एवं शर्तों के अधीन प्रभावी रहेगी।

    विभाग ने सभी संबंधित विभागाध्यक्षों, संभागायुक्तों, कलेक्टरों तथा अन्य अधिकारियों को आदेश की प्रति भेजते हुए आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही पदोन्नत अधिकारियों की सूची भी आदेश के साथ संलग्न की गई है, जिसमें सभी 190 अधिकारियों के नाम एवं वर्तमान पदस्थापना का उल्लेख है।

    इस निर्णय से प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे को मजबूती मिलने के साथ-साथ जिलों एवं उपखंड स्तर पर नियमित डिप्टी कलेक्टरों की उपलब्धता बढ़ेगी, जिससे राजस्व एवं प्रशासनिक कार्यों के संचालन में गति आने की उम्मीद है।

  • MP के 70 हजार शिक्षकों को TET से राहत दिलाने सुप्रीम कोर्ट जाएगी सरकार, स्कूल शिक्षा विभाग की नई कानूनी तैयारी

    MP के 70 हजार शिक्षकों को TET से राहत दिलाने सुप्रीम कोर्ट जाएगी सरकार, स्कूल शिक्षा विभाग की नई कानूनी तैयारी


    भोपाल । मध्यप्रदेश सरकार प्रदेश के करीब 70 हजार शिक्षकों को शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी टीईटी से राहत दिलाने के लिए एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रही है। स्कूल शिक्षा विभाग का मानना है कि वर्ष 2005 से 2009 के बीच नियुक्त हुए शिक्षकों ने पहले ही सरकारी चयन परीक्षा पास कर अपनी नियुक्ति हासिल की थी। ऐसे में उन्हें दोबारा शिक्षक पात्रता परीक्षा देने के लिए बाध्य करना न्यायसंगत नहीं होगा। इसी आधार पर राज्य सरकार जल्द ही सुप्रीम कोर्ट में नई याचिका दायर करने की तैयारी कर रही है।

    सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2025 के फैसले के बाद प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग और जनजातीय कार्य विभाग के वर्ष 1998 से 2009 के बीच नियुक्त लगभग डेढ़ लाख शिक्षकों के लिए टीईटी पास करना अनिवार्य कर दिया गया था। इसके बाद लोक शिक्षण संचालनालय ने अप्रैल में निर्देश जारी करते हुए जुलाई और अगस्त में पात्रता परीक्षा आयोजित कराने की प्रक्रिया शुरू की। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जिन शिक्षकों की सेवा अवधि पांच वर्ष से कम बची है उन्हें परीक्षा से छूट मिलेगी जबकि अन्य सभी शिक्षकों के लिए टीईटी उत्तीर्ण करना अनिवार्य रहेगा। परीक्षा पास नहीं करने वाले शिक्षकों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि अदालत ने राहत देते हुए परीक्षा पास करने की अंतिम समय सीमा 31 अगस्त 2028 तक बढ़ा दी है।

    अब स्कूल शिक्षा विभाग का पूरा जोर वर्ष 2005 से 2009 के बीच नियुक्त हुए करीब 70 हजार शिक्षकों को राहत दिलाने पर है। विभाग का तर्क है कि इन शिक्षकों की भर्ती व्यापम के माध्यम से आयोजित प्रतियोगी परीक्षा के आधार पर हुई थी और चयन प्रक्रिया पूरी तरह सरकारी नियमों के अनुसार संपन्न हुई थी। इसलिए उन्हें दोबारा पात्रता परीक्षा देना आवश्यक नहीं माना जाना चाहिए।

    सूत्रों के अनुसार विधि विभाग और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ताओं से कानूनी सलाह लेने के बाद एक सप्ताह के भीतर नई याचिका दाखिल की जा सकती है। इसमें अदालत से अनुरोध किया जाएगा कि इन शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से छूट दी जाए क्योंकि वे पहले ही चयन प्रक्रिया पूरी कर नियमित नियुक्ति प्राप्त कर चुके हैं।

    हालांकि विभागीय अधिकारियों का यह भी मानना है कि सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने की संभावना बहुत अधिक नहीं है क्योंकि अदालत पहले ही इस विषय पर अपना स्पष्ट रुख जाहिर कर चुकी है। इसके बावजूद शिक्षकों के हितों को ध्यान में रखते हुए सरकार यह कानूनी प्रयास कर रही है। यदि अदालत राहत देती है तो पात्रता परीक्षा के दायरे में आने वाले लगभग आधे शिक्षकों को इसका सीधा लाभ मिलेगा।

    गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही टीईटी को लेकर 65 से अधिक पुनर्विचार याचिकाएं खारिज कर चुका है। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी शिक्षकों का न्यूनतम शैक्षणिक मानकों को पूरा करना आवश्यक है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षा का अधिकार कानून और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद के मानकों के अनुसार शिक्षक पात्रता परीक्षा शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

    अब सभी की निगाहें राज्य सरकार की नई याचिका और सुप्रीम कोर्ट के अगले फैसले पर टिकी हैं। यदि अदालत सरकार की दलीलों से सहमत होती है तो हजारों शिक्षकों को बड़ी राहत मिल सकती है। वहीं यदि याचिका खारिज होती है तो वर्ष 2005 से 2009 के बीच नियुक्त शिक्षकों को भी निर्धारित समय सीमा के भीतर टीईटी उत्तीर्ण करना अनिवार्य होगा।

  • मध्य प्रदेश पुलिस में देर रात बड़ा बदलाव, भोपाल ग्रामीण से सागर-नर्मदापुरम तक नए आईजी की तैनाती

    मध्य प्रदेश पुलिस में देर रात बड़ा बदलाव, भोपाल ग्रामीण से सागर-नर्मदापुरम तक नए आईजी की तैनाती


    मध्यप्रदेश । मध्य प्रदेश सरकार ने पुलिस प्रशासन में बड़ा फेरबदल करते हुए 9 भारतीय पुलिस सेवा यानी आईपीएस अधिकारियों के तबादले कर दिए हैं। गृह विभाग की ओर से देर रात जारी आदेशों में कई महत्वपूर्ण पदों पर नई नियुक्तियां की गई हैं। इस प्रशासनिक बदलाव के तहत शाजापुर और शहडोल जैसे अहम जिलों को नए पुलिस अधीक्षक मिले हैं जबकि भोपाल ग्रामीण सागर और नर्मदापुरम रेंज में भी नए पुलिस महानिरीक्षक यानी आईजी की तैनाती की गई है। माना जा रहा है कि कानून व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने तथा प्रशासनिक कार्यों में गति लाने के उद्देश्य से यह बदलाव किया गया है।

    तबादला सूची के अनुसार संजय कुमार अग्रवाल को शहडोल जिले का नया पुलिस अधीक्षक नियुक्त किया गया है जबकि प्रियंका शुक्ला को शाजापुर जिले की जिम्मेदारी सौंपी गई है। दोनों अधिकारियों को ऐसे समय नई जिम्मेदारी मिली है जब प्रदेश में कानून व्यवस्था और अपराध नियंत्रण को लेकर सरकार लगातार सक्रिय नजर आ रही है।

    प्रदेश के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों में भी महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। अब तक पुलिस मुख्यालय में आईजी प्रशासन के पद पर कार्यरत रुचि वर्धन मिश्रा को भोपाल ग्रामीण जोन का नया आईजी बनाया गया है। उनके अनुभव और प्रशासनिक क्षमता को देखते हुए उन्हें राजधानी से जुड़े ग्रामीण क्षेत्रों की जिम्मेदारी सौंपी गई है। वहीं मिथिलेश शुक्ला को सागर रेंज का आईजी बनाया गया है। वे अब तक नर्मदापुरम जोन के आईजी थे और सागर रेंज का अतिरिक्त प्रभार भी संभाल रहे थे। हिमानी खन्ना के सेवानिवृत्त होने के बाद यह पद लंबे समय से अतिरिक्त प्रभार के रूप में संचालित हो रहा था जिसे अब नियमित नियुक्ति मिल गई है।

    इसी क्रम में चंद्रशेखर सोलंकी को नर्मदापुरम जोन का नया आईजी नियुक्त किया गया है। वे इससे पहले इंदौर एसएएफ रेंज में पदस्थ थे। वहीं हरि नारायणचारी मिश्रा को आईजी प्रशासन पुलिस मुख्यालय की जिम्मेदारी दी गई है। वे अभी तक आईजी एससीआरबी के पद पर कार्यरत थे।

    तबादला सूची में अन्य अधिकारियों को भी नई जिम्मेदारियां मिली हैं। सिमाला प्रसाद को डीआईजी खरगोन रेंज बनाया गया है। यशपाल सिंह राजपूत को शाजापुर एसपी के पद से हटाकर पुलिस अधीक्षक रेल इंदौर भेजा गया है जबकि रामजी श्रीवास्तव को शहडोल एसपी से एआईजी पुलिस अकादमी भौंरी पदस्थ किया गया है।

    सरकार ने कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को अतिरिक्त प्रभार भी सौंपे हैं। विशेष पुलिस महानिदेशक प्रशासन आदर्श कटियार को उनके वर्तमान दायित्वों के साथ स्पेशल डीजी दूरसंचार पुलिस मुख्यालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। वहीं आईजी इंदौर ग्रामीण जोन अनुराग को आईजी एसएएफ इंदौर रेंज और आईजी आरएपीटीसी इंदौर की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी सौंपी गई है।

    गौरतलब है कि मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने विभागीय तबादलों के लिए समय सीमा तय की थी। निर्धारित समय सीमा समाप्त होने के बाद देर रात गृह विभाग ने यह आदेश जारी किए। माना जा रहा है कि आगामी प्रशासनिक चुनौतियों और कानून व्यवस्था को अधिक मजबूत बनाने के लिए यह व्यापक फेरबदल किया गया है। नई नियुक्तियों से प्रदेश के विभिन्न जिलों और रेंज में पुलिस कार्यप्रणाली को नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

  • राज्यपाल के निर्देशों पर विभाग की चुप्पी आदिवासी विकास रिपोर्ट 2 महीने से लंबित

    राज्यपाल के निर्देशों पर विभाग की चुप्पी आदिवासी विकास रिपोर्ट 2 महीने से लंबित


    नई दिल्ली ।मध्य प्रदेश में आदिवासी क्षेत्रों के विकास कार्यों को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक मामला चर्चा में आ गया है। राज्यपाल मंगू भाई पटेल द्वारा मांगी गई रिपोर्ट दो महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी राजभवन तक नहीं पहुंची है। मामला आदिवासी और अनुसूचित क्षेत्रों में जल संसाधन विभाग द्वारा कराए गए विकास कार्यों और उन पर खर्च किए गए बजट से जुड़ा हुआ है। रिपोर्ट में देरी को लेकर अब विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

    जानकारी के अनुसार राज्यपाल मंगू भाई पटेल ने आदिवासी क्षेत्रों में चल रही विकास योजनाओं की समीक्षा के उद्देश्य से अप्रैल महीने में जल संसाधन विभाग की प्रमुख अभियंता को पत्र भेजा था। इस पत्र में विशेष रूप से आदिवासी अंचलों में जल आपूर्ति और जल जीवन मिशन से संबंधित परियोजनाओं की विस्तृत जानकारी मांगी गई थी। साथ ही यह भी पूछा गया था कि इन योजनाओं का लाभ कितने लोगों तक पहुंचा और उनका वास्तविक प्रभाव क्या रहा।

    राजभवन की ओर से भेजे गए इस पत्र को दो महीने से अधिक समय बीत चुका है लेकिन विभाग की ओर से अब तक कोई विस्तृत रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराई गई है। बताया जा रहा है कि विभाग के 116 मुख्य अभियंताओं को इस संबंध में जानकारी एकत्र कर रिपोर्ट भेजने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी लेकिन अपेक्षित कार्रवाई समय पर नहीं हो सकी।

    स्थिति तब और गंभीर हो गई जब जून महीने में जनजाति क्षेत्रीय विकास योजना के संचनालय और मध्य प्रदेश शासन ने भी विभाग को अलग से पत्र लिखकर जल्द रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। इसके बावजूद विभागीय स्तर पर अपेक्षित तत्परता नहीं दिखाई गई और मामला लंबित बना हुआ है।

    इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल बजट खर्च को लेकर उठ रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार जल संसाधन विभाग ने पिछले एक वर्ष के दौरान आदिवासी क्षेत्रों में 38 विभिन्न परियोजनाओं पर लगभग 1085 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। विभाग आवंटित बजट का करीब 95 प्रतिशत हिस्सा उपयोग भी कर चुका है। इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद योजनाओं से लाभान्वित हुए लोगों का स्पष्ट ब्यौरा अब तक राजभवन को उपलब्ध नहीं कराया गया है।

    राज्यपाल ने अपने पत्र में विशेष रूप से यह जानकारी मांगी थी कि इन परियोजनाओं से कितने आदिवासी परिवारों को वास्तविक लाभ मिला और योजनाओं का जमीनी प्रभाव क्या रहा। लेकिन करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी लाभार्थियों की संख्या और परियोजनाओं के परिणामों को लेकर रिपोर्ट लंबित रहना कई सवाल खड़े कर रहा है।

    प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि यदि किसी योजना पर बड़ी राशि खर्च की जाती है तो उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक होता है। ऐसे में राजभवन द्वारा मांगी गई जानकारी समय पर उपलब्ध नहीं कराना विभागीय समन्वय और जवाबदेही दोनों पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

    अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि विभाग कब तक रिपोर्ट प्रस्तुत करता है और आदिवासी क्षेत्रों में खर्च किए गए करोड़ों रुपये के वास्तविक परिणामों का विवरण राजभवन के सामने कब आता है। यह मामला आने वाले दिनों में प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना रह सकता है।

  • MP सरकार को बड़ा झटका…. HC ने राज्य परिवहन प्राधिकरण के पुनर्गठन पर लगाई रोक

    MP सरकार को बड़ा झटका…. HC ने राज्य परिवहन प्राधिकरण के पुनर्गठन पर लगाई रोक


    ग्वालियर।
    मध्य प्रदेश सरकार (Government of Madhya Pradesh) को राज्य परिवहन प्राधिकरण यानी एसटीए (State Transport Authority – STA) के पुनर्गठन मामले में बड़ा झटका लगा है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट (Madhya Pradesh High Court) की ग्वालियर खंडपीठ (Gwalior Bench) ने 9 फरवरी 2026 को जारी पुनर्गठन संबंधी अधिसूचना पर अंतरिम रोक लगा दी है। सबसे अहम बात यह रही कि सुनवाई के दौरान राज्य शासन ने खुद स्वीकार किया कि पूरी प्रक्रिया में कुछ कानूनी खामियां रह गई हैं। इन त्रुटियों को दूर करने के लिए सरकार ने हाईकोर्ट से तीन महीने का समय मांगा है। अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए वरिष्ठ आईएएस अधिकारी मनीष सिंह से भी जवाब तलब किया है।

    यह मामला हरिशंकर सिंह पटेल एवं अन्य द्वारा दायर याचिका के माध्यम से हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ के समक्ष पहुंचा था। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एमपीएस रघुवंशी और अधिवक्ता हिमांशु शर्मा ने अदालत में पक्ष रखते हुए कहा कि राज्य शासन ने मोटर वाहन अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत राज्य परिवहन प्राधिकरण की संरचना में परिवहन विभाग के सचिव को शामिल कर दिया है। याचिका में यह भी कहा गया कि संबंधित अधिकारी राज्य सड़क परिवहन निगम के प्रबंध निदेशक का दायित्व भी संभाल रहे हैं, जिससे हितों के टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि ऐसी व्यवस्था निष्पक्ष प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल खड़े कर सकती है।

    सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से भी यह स्वीकार किया गया कि पुनर्गठन की प्रक्रिया में कुछ कानूनी कमियां रह गई हैं। शासन ने अदालत से इन कमियों को दूर करने के लिए तीन माह का समय देने का अनुरोध किया। इसके बाद हाईकोर्ट ने फिलहाल पुनर्गठन संबंधी अधिसूचना के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी।

    इस पूरे विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह सामने आया है कि याचिकाकर्ताओं, बस ऑपरेटरों और परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि पुनर्गठन की प्रक्रिया के जरिए राज्य परिवहन प्राधिकरण के कामकाज को ग्वालियर से भोपाल स्थानांतरित करने की कोशिश की जा सकती है। हालांकि सरकार की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन यही आशंका इस मामले के केंद्र में मानी जा रही है। यदि भविष्य में ऐसा होता है तो प्रदेशभर के बस ऑपरेटरों और परिवहन कारोबार से जुड़े लोगों को नई प्रशासनिक व्यवस्था का सामना करना पड़ सकता है।

    बता दें कि राज्य परिवहन प्राधिकरण प्रदेश में बस परमिट जारी करने, रूट आवंटन करने और परिवहन नीति से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसले लेने वाली प्रमुख संस्था है। ऐसे में हाईकोर्ट के इस आदेश को परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। फिलहाल पुनर्गठन की प्रक्रिया पर रोक लग गई है और अब सभी की निगाहें अदालत की अगली सुनवाई और सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले जवाब पर टिकी हुई हैं।

  • भोपाल मेट्रो पर बढ़ा खर्च, कैबिनेट ने दी 10,033 करोड़ की संशोधित मंजूरी; मंडी शुल्क में भी बड़ा बदलाव

    भोपाल मेट्रो पर बढ़ा खर्च, कैबिनेट ने दी 10,033 करोड़ की संशोधित मंजूरी; मंडी शुल्क में भी बड़ा बदलाव

    मध्यप्रदेश । मध्यप्रदेश सरकार ने राज्य की महत्वाकांक्षी भोपाल मेट्रो रेल परियोजना को लेकर बड़ा फैसला किया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में मंगलवार को हुई कैबिनेट बैठक में परियोजना की संशोधित लागत को मंजूरी प्रदान कर दी गई। लागत में करीब 4 हजार करोड़ रुपए की वृद्धि के बाद अब भोपाल मेट्रो परियोजना की कुल लागत 10,033 करोड़ रुपए पहुंच गई है। इसके साथ ही सरकार ने कृषि क्षेत्र से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लेते हुए मंडी शुल्क व्यवस्था में भी बदलाव किया है।

    कैबिनेट बैठक के बाद एमएसएमई मंत्री चैतन्य काश्यप ने बताया कि भोपाल मेट्रो परियोजना का प्रारंभिक स्वरूप वर्ष 2016 में तैयार किया गया था। उस समय इसकी अनुमानित लागत लगभग 6,241 करोड़ रुपए आंकी गई थी। हालांकि समय के साथ निर्माण सामग्री की कीमतों, तकनीकी आवश्यकताओं और अन्य कारणों से परियोजना की लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अब संशोधित लागत 10,033 करोड़ रुपए निर्धारित की गई है, जिसे कैबिनेट ने स्वीकृति प्रदान कर दी है।

    सरकार का मानना है कि संशोधित बजट से परियोजना के निर्माण कार्य में तेजी आएगी और आगामी दो वर्षों में मेट्रो परियोजना का स्वरूप अधिक स्पष्ट रूप से सामने दिखाई देगा। भोपाल मेट्रो को राजधानी के सार्वजनिक परिवहन ढांचे को मजबूत करने वाली प्रमुख परियोजना माना जा रहा है, जिससे यातायात व्यवस्था को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

    बैठक में किसानों से जुड़ा एक अहम निर्णय भी लिया गया। सरकार ने कपास उत्पादक किसानों को राहत देते हुए कपास पर लगने वाले मंडी शुल्क को घटाकर 0.50 प्रतिशत कर दिया है। मंत्री काश्यप ने बताया कि पहले अधिक मंडी शुल्क के कारण किसानों और व्यापारियों पर अतिरिक्त आर्थिक भार पड़ता था। महाराष्ट्र में भी कपास पर इसी दर से शुल्क लिया जाता है, इसलिए प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है।

    इसके विपरीत सरकार ने अन्य कृषि उपज पर मंडी शुल्क बढ़ाने का फैसला किया है। कुछ वर्ष पहले इसे डेढ़ प्रतिशत से घटाकर एक प्रतिशत किया गया था, लेकिन अब फिर से इसे बढ़ाकर 1.5 प्रतिशत कर दिया गया है। सरकार का अनुमान है कि इस निर्णय से राज्य को लगभग 800 करोड़ रुपए का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होगा। यह राशि सड़क विकास, ग्रामीण बुनियादी ढांचे के विस्तार और गौ-संवर्धन जैसी योजनाओं पर खर्च की जाएगी।

    कृषि क्षेत्र को और मजबूत बनाने के उद्देश्य से प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में भी पहल की गई है। प्रदेश के विभिन्न जिलों में कार्यशालाओं का आयोजन कर किसानों को प्राकृतिक खेती की तकनीकों और उसके लाभों के बारे में जागरूक किया जाएगा। सरकार को उम्मीद है कि इससे कृषि लागत में कमी आएगी और किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी।

    कैबिनेट बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन और शासन के 12 वर्ष पूर्ण होने पर भी चर्चा हुई। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इसे देश के विकास का महत्वपूर्ण पड़ाव बताते हुए 5 जून से 21 जून तक प्रदेशभर में जनकल्याण और विकास कार्यों से जुड़े विशेष कार्यक्रम आयोजित करने की जानकारी दी।

    इसके अलावा राज्य के लगभग एक लाख संविदा कर्मचारी-अधिकारियों को 4.5 प्रतिशत वार्षिक वेतन वृद्धि दिए जाने के फैसले का भी स्वागत किया गया। कुल मिलाकर कैबिनेट बैठक में लिए गए निर्णयों को राज्य के बुनियादी ढांचे, कृषि क्षेत्र और कर्मचारी हितों से जुड़ा महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

  • उज्जैन में अनोखी पहल: सिंहस्थ कार्यों के निरीक्षण में अधिकारी ट्रैवलर बस से पहुंचे, खर्च में भारी कटौती

    उज्जैन में अनोखी पहल: सिंहस्थ कार्यों के निरीक्षण में अधिकारी ट्रैवलर बस से पहुंचे, खर्च में भारी कटौती


    नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के Ujjain में सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के बीच प्रशासन ने ईंधन बचत की दिशा में एक अनोखी और अनुकरणीय पहल शुरू की है। प्रधानमंत्री Narendra Modi की ईंधन बचत अपील और मुख्यमंत्री Mohan Yadav के निर्देशों के बाद जिला प्रशासन ने यह कदम उठाया है।
    अब सिंहस्थ कार्यों के निरीक्षण के लिए अधिकारी अलग-अलग वाहनों की बजाय एक ही ट्रैवलर बस में यात्रा कर रहे हैं। बुधवार को संभागायुक्त, कलेक्टर, नगर निगम आयुक्त सहित करीब 15 अधिकारी एक साथ बस में बैठकर 29 किलोमीटर लंबे घाट क्षेत्र के निरीक्षण के लिए पहुंचे।
    पहले स्थिति यह थी कि हर दिन विभिन्न विभागों के अधिकारी 15 अलग-अलग इनोवा वाहनों से निरीक्षण के लिए निकलते थे, जिससे भारी मात्रा में ईंधन खर्च होता था। अनुमान के अनुसार, केवल एक दिन के निरीक्षण में लगभग 6750 रुपये तक का ईंधन खर्च हो जाता था।
    नई व्यवस्था के तहत अब सभी अधिकारी एक साथ यात्रा कर रहे हैं, जिससे खर्च में भारी कमी आई है। ट्रैवलर बस के उपयोग से यह पूरा सफर अब लगभग 250 रुपये के डीजल खर्च में पूरा हो रहा है, हालांकि बस का दैनिक किराया करीब 4100 रुपये है।
    प्रशासन का कहना है कि इस पहल से न केवल सरकारी खर्च में कमी आएगी, बल्कि ट्रैफिक व्यवस्था पर भी दबाव घटेगा। पहले कई वाहनों के काफिले से सड़कों पर जाम जैसी स्थिति बन जाती थी, अब एक ही वाहन से यात्रा होने पर यह समस्या कम हो गई है।
    निरीक्षण के दौरान अधिकारी सुबह 6 बजे से घाटों और प्रस्तावित एप्रोच रोड का जायजा लेते हैं और कई किलोमीटर पैदल भी चलते हैं। इस दौरान निर्माण कार्यों की समीक्षा कर संबंधित विभागों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए जा रहे हैं।
    सिंहस्थ मेला अधिकारी आशीष सिंह ने कहा कि यह निर्णय न केवल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इससे टीम भावना भी मजबूत होगी। सभी अधिकारी एक साथ यात्रा करेंगे तो समन्वय बेहतर होगा और निर्णय लेने की प्रक्रिया भी आसान होगी।
    कलेक्टर ने इसे एक अनुकरणीय पहल बताते हुए कहा कि यह व्यवस्था आगे चलकर अन्य जिलों के लिए भी मिसाल बन सकती है।