Tag: MP politics controversy

  • राज्यसभा टिकट पर बयान से गरमाई सियासत, पूर्व मंत्री वर्मा ने बीजेपी पर साधा निशाना

    राज्यसभा टिकट पर बयान से गरमाई सियासत, पूर्व मंत्री वर्मा ने बीजेपी पर साधा निशाना


    मध्यप्रदेश। भोपाल में राज्यसभा चुनावों की सरगर्मी के बीच राजनीतिक बयानबाज़ी तेज हो गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने भारतीय जनता पार्टी पर तीखा हमला बोलते हुए राज्यसभा चुनाव प्रक्रिया और उम्मीदवार चयन को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

    वर्मा ने आरोप लगाया कि बीजेपी राज्यसभा को “पवित्र सदन” मानने के बजाय इसे राजनीतिक संतुलन साधने का माध्यम बना रही है। उन्होंने कहा कि पार्टी को हॉर्स ट्रेडिंग जैसी प्रवृत्ति की आदत पड़ चुकी है और मध्य प्रदेश को राजनीतिक प्रयोगशाला या “चारागाह” की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।

    पूर्व मंत्री ने विशेष रूप से बाहरी नेताओं के चयन पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि जो नेता अपने ही राज्यों में चुनाव हार चुके हैं, ऐसे “हरल्ले” नेताओं को मध्य प्रदेश से राज्यसभा भेजना स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ अन्याय है। वर्मा ने कुरियन और मुरुगन जैसे नेताओं का नाम लेते हुए कहा कि इससे जमीनी स्तर पर मेहनत करने वाले कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता है।

    उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि बीजेपी हाईकमान मध्य प्रदेश के समर्पित और वर्षों से काम कर रहे कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज कर रहा है, जबकि बाहरी चेहरों को प्राथमिकता दी जा रही है। उनका कहना था कि राज्यसभा में प्रतिनिधित्व केवल स्थानीय और योग्य नेताओं को ही मिलना चाहिए।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब मध्य प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों को लेकर राजनीतिक हलचल तेज है। जल्द ही 21 जून को कई सांसदों का कार्यकाल समाप्त होने वाला है, जिनमें दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह, बीजेपी के जॉर्ज कुरियन और सुमेर सिंह सोलंकी शामिल हैं।

    इन सीटों के लिए 18 जून को मतदान प्रस्तावित है, जिससे दोनों प्रमुख दलों—बीजेपी और कांग्रेस—में अंदरूनी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। कांग्रेस जहां अपनी एक सीट को सुरक्षित मानकर चल रही है, वहीं बीजेपी दो सीटों पर मजबूत स्थिति में बताई जा रही है।

    हालांकि, इस पूरे राजनीतिक माहौल में “स्थानीय बनाम बाहरी” का मुद्दा अब चुनावी बहस का केंद्र बन गया है। कांग्रेस इसे भावनात्मक और संगठनात्मक मुद्दे के तौर पर उठा रही है, जबकि बीजेपी खेमे में भी दावेदारों की सक्रियता बढ़ गई है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्यसभा चुनाव संख्या बल के हिसाब से तय भले हों, लेकिन ऐसे बयान आने वाले दिनों में सियासी तापमान और बढ़ा सकते हैं।

  • नोटिस पर पलटवार: BJP विधायक चिंतामणि का सवाल-CM का क्या? Ujjain में सियासी घमासान

    नोटिस पर पलटवार: BJP विधायक चिंतामणि का सवाल-CM का क्या? Ujjain में सियासी घमासान


    नई दिल्ली । उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय में सरकारी आवास खाली कराने की कार्रवाई ने राजनीतिक रंग ले लिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा बंगलों पर वर्षों से काबिज लोगों को नोटिस जारी किए जाने के बाद अब यह मुद्दा सीधे सत्ता और संगठन तक पहुंच गया है। खास बात यह है कि नोटिस मिलते ही भाजपा विधायक डॉ. चिंतामणि मालवीय ने पलटवार करते हुए मुख्यमंत्री के आवास पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे ‘कब्जा पॉलिटिक्स’ और गरमा गई है।
    6 लोगों को नोटिस, एक महीने की मोहलत
    विश्वविद्यालय के कुलगुरु अर्पण भारद्वाज ने बताया कि हाल ही में हुई कार्यपरिषद की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि जिन लोगों का विश्वविद्यालय से कोई सीधा संबंध नहीं है, उनसे आवास खाली कराया जाएगा। इसी के तहत आलोट से भाजपा विधायक डॉ. चिंतामणि मालवीय सहित करीब 6 लोगों को नोटिस जारी कर एक महीने के भीतर
    बंगले खाली करने के निर्देश दिए गए हैं।
    जानकारी के मुताबिक, इन आवासों में पूर्व पुलिस अधिकारी, शिक्षक और अन्य लोग भी शामिल हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन का तर्क है कि इन कब्जों के कारण वास्तविक कर्मचारियों को आवास नहीं मिल पा रहा है, जबकि 50 से ज्यादा कर्मचारी लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं।
    विधायक का पलटवार: “सीएम का क्या?”
    नोटिस मिलते ही विधायक चिंतामणि मालवीय ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब मुख्यमंत्री मोहन यादव स्वयं कुलपति का बंगला उपयोग कर रहे हैं, तो फिर बाकी लोगों पर कार्रवाई क्यों? उन्होंने इसे “नैतिक सवाल” बताते हुए कहा कि वे भी उसी परंपरा का पालन कर रहे हैं।
    मालवीय ने यह भी दावा किया कि उनका विश्वविद्यालय से वित्तीय हिसाब लंबित है। उन्होंने बताया कि 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने करीब 9 लाख रुपए जमा किए थे और जब तक पूरा हिसाब नहीं हो जाता, तब तक आवास खाली करना उचित नहीं होगा। उनका कहना है कि अगर गहराई से जांच हुई तो मामला लंबा खिंच सकता है।
    प्रशासन का पक्ष: कर्मचारियों को प्राथमिकता
    कुलगुरु अर्पण भारद्वाज ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय के आवास केवल कर्मचारियों के लिए सुरक्षित रखे जाएंगे। उन्होंने कहा कि कई कर्मचारी जर्जर भवनों में रहने को मजबूर हैं, जबकि अच्छे आवास बाहरी लोगों के कब्जे में हैं। प्रशासन ने यह भी योजना बनाई है कि 21 जर्जर भवनों को हटाकर नई व्यवस्था विकसित की जाएगी।
    सीएम आवास पर भी उठे सवाल
    विवाद का एक बड़ा कारण मुख्यमंत्री को आवंटित कुलपति का बंगला भी बना हुआ है। जानकारी के अनुसार, उज्जैन के देवास रोड स्थित यह बंगला मुख्यमंत्री बनने के बाद मोहन यादव के लिए तैयार कराया गया था और वे उज्जैन प्रवास के दौरान अक्सर वहीं रुकते हैं। इसी को आधार बनाकर विधायक ने सवाल उठाए हैं, जिससे मामला और संवेदनशील हो गया है।
    सियासी तापमान बढ़ा
    यह पूरा विवाद अब केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं रह गया, बल्कि राजनीतिक बहस का मुद्दा बन चुका है। एक ओर विश्वविद्यालय नियमों का हवाला देकर आवास खाली कराने पर अड़ा है, वहीं दूसरी ओर जनप्रतिनिधि इसे चयनात्मक कार्रवाई बता रहे हैं। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या विधायक नोटिस का पालन करेंगे या यह मामला और बड़े सियासी टकराव में बदलेगा।