नई दिल्ली । उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय में सरकारी आवास खाली कराने की कार्रवाई ने राजनीतिक रंग ले लिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा बंगलों पर वर्षों से काबिज लोगों को नोटिस जारी किए जाने के बाद अब यह मुद्दा सीधे सत्ता और संगठन तक पहुंच गया है। खास बात यह है कि नोटिस मिलते ही भाजपा विधायक डॉ. चिंतामणि मालवीय ने पलटवार करते हुए मुख्यमंत्री के आवास पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे ‘कब्जा पॉलिटिक्स’ और गरमा गई है।
6 लोगों को नोटिस, एक महीने की मोहलत
विश्वविद्यालय के कुलगुरु अर्पण भारद्वाज ने बताया कि हाल ही में हुई कार्यपरिषद की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि जिन लोगों का विश्वविद्यालय से कोई सीधा संबंध नहीं है, उनसे आवास खाली कराया जाएगा। इसी के तहत आलोट से भाजपा विधायक डॉ. चिंतामणि मालवीय सहित करीब 6 लोगों को नोटिस जारी कर एक महीने के भीतर
विश्वविद्यालय के कुलगुरु अर्पण भारद्वाज ने बताया कि हाल ही में हुई कार्यपरिषद की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि जिन लोगों का विश्वविद्यालय से कोई सीधा संबंध नहीं है, उनसे आवास खाली कराया जाएगा। इसी के तहत आलोट से भाजपा विधायक डॉ. चिंतामणि मालवीय सहित करीब 6 लोगों को नोटिस जारी कर एक महीने के भीतर
बंगले खाली करने के निर्देश दिए गए हैं।
जानकारी के मुताबिक, इन आवासों में पूर्व पुलिस अधिकारी, शिक्षक और अन्य लोग भी शामिल हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन का तर्क है कि इन कब्जों के कारण वास्तविक कर्मचारियों को आवास नहीं मिल पा रहा है, जबकि 50 से ज्यादा कर्मचारी लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं।
विधायक का पलटवार: “सीएम का क्या?”
नोटिस मिलते ही विधायक चिंतामणि मालवीय ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब मुख्यमंत्री मोहन यादव स्वयं कुलपति का बंगला उपयोग कर रहे हैं, तो फिर बाकी लोगों पर कार्रवाई क्यों? उन्होंने इसे “नैतिक सवाल” बताते हुए कहा कि वे भी उसी परंपरा का पालन कर रहे हैं।
नोटिस मिलते ही विधायक चिंतामणि मालवीय ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब मुख्यमंत्री मोहन यादव स्वयं कुलपति का बंगला उपयोग कर रहे हैं, तो फिर बाकी लोगों पर कार्रवाई क्यों? उन्होंने इसे “नैतिक सवाल” बताते हुए कहा कि वे भी उसी परंपरा का पालन कर रहे हैं।
मालवीय ने यह भी दावा किया कि उनका विश्वविद्यालय से वित्तीय हिसाब लंबित है। उन्होंने बताया कि 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने करीब 9 लाख रुपए जमा किए थे और जब तक पूरा हिसाब नहीं हो जाता, तब तक आवास खाली करना उचित नहीं होगा। उनका कहना है कि अगर गहराई से जांच हुई तो मामला लंबा खिंच सकता है।
प्रशासन का पक्ष: कर्मचारियों को प्राथमिकता
कुलगुरु अर्पण भारद्वाज ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय के आवास केवल कर्मचारियों के लिए सुरक्षित रखे जाएंगे। उन्होंने कहा कि कई कर्मचारी जर्जर भवनों में रहने को मजबूर हैं, जबकि अच्छे आवास बाहरी लोगों के कब्जे में हैं। प्रशासन ने यह भी योजना बनाई है कि 21 जर्जर भवनों को हटाकर नई व्यवस्था विकसित की जाएगी।
कुलगुरु अर्पण भारद्वाज ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय के आवास केवल कर्मचारियों के लिए सुरक्षित रखे जाएंगे। उन्होंने कहा कि कई कर्मचारी जर्जर भवनों में रहने को मजबूर हैं, जबकि अच्छे आवास बाहरी लोगों के कब्जे में हैं। प्रशासन ने यह भी योजना बनाई है कि 21 जर्जर भवनों को हटाकर नई व्यवस्था विकसित की जाएगी।
सीएम आवास पर भी उठे सवाल
विवाद का एक बड़ा कारण मुख्यमंत्री को आवंटित कुलपति का बंगला भी बना हुआ है। जानकारी के अनुसार, उज्जैन के देवास रोड स्थित यह बंगला मुख्यमंत्री बनने के बाद मोहन यादव के लिए तैयार कराया गया था और वे उज्जैन प्रवास के दौरान अक्सर वहीं रुकते हैं। इसी को आधार बनाकर विधायक ने सवाल उठाए हैं, जिससे मामला और संवेदनशील हो गया है।
विवाद का एक बड़ा कारण मुख्यमंत्री को आवंटित कुलपति का बंगला भी बना हुआ है। जानकारी के अनुसार, उज्जैन के देवास रोड स्थित यह बंगला मुख्यमंत्री बनने के बाद मोहन यादव के लिए तैयार कराया गया था और वे उज्जैन प्रवास के दौरान अक्सर वहीं रुकते हैं। इसी को आधार बनाकर विधायक ने सवाल उठाए हैं, जिससे मामला और संवेदनशील हो गया है।
सियासी तापमान बढ़ा
यह पूरा विवाद अब केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं रह गया, बल्कि राजनीतिक बहस का मुद्दा बन चुका है। एक ओर विश्वविद्यालय नियमों का हवाला देकर आवास खाली कराने पर अड़ा है, वहीं दूसरी ओर जनप्रतिनिधि इसे चयनात्मक कार्रवाई बता रहे हैं। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या विधायक नोटिस का पालन करेंगे या यह मामला और बड़े सियासी टकराव में बदलेगा।
यह पूरा विवाद अब केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं रह गया, बल्कि राजनीतिक बहस का मुद्दा बन चुका है। एक ओर विश्वविद्यालय नियमों का हवाला देकर आवास खाली कराने पर अड़ा है, वहीं दूसरी ओर जनप्रतिनिधि इसे चयनात्मक कार्रवाई बता रहे हैं। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या विधायक नोटिस का पालन करेंगे या यह मामला और बड़े सियासी टकराव में बदलेगा।
