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  • अगले माह चांद के लिए रवाना होगा NASA, लेकिन सूरज की क्यों कर रहा निगरानी ? जानिए कारण

    अगले माह चांद के लिए रवाना होगा NASA, लेकिन सूरज की क्यों कर रहा निगरानी ? जानिए कारण


    नई दिल्ली। साल 1972 के बाद NASA का आर्टेमिस II मिशन अगले महीने 1 अप्रैल 2026 को लॉन्च होने जा रहा है। यह मिशन इंसानों को पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से बाहर लेकर चांद के करीब ले जाएगा। हालांकि रोमांचक यह सफर, सूर्य से निकलने वाले घातक रेडिएशन के खतरे के साथ भी है।

    सौर कणों से खतरा और 24 घंटे निगरानी

    चांद की यात्रा के दौरान अंतरिक्ष यात्री लगभग 10 दिनों तक रहेंगे। इस दौरान सबसे बड़ा खतरा सूरज से निकलने वाले सोलर एनर्जेटिक पार्टिकल्स सौर कण का होगा। ये कण सूरज पर होने वाले विस्फोटों के समय इतनी तेज़ी से यात्रा करते हैं कि एक घंटे से भी कम समय में अंतरिक्ष यान तक पहुँच सकते हैं। ये न केवल यान के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को प्रभावित कर सकते हैं, बल्कि अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर की कोशिकाओं को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं।

    मंगल पर परसीवरेंस रोवर देगा एडवांस वार्निंग

    NASA ने सूरज के इस खतरे से निपटने के लिए मंगल ग्रह पर मौजूद परसीवरेंस रोवर की मदद लेने का अनोखा तरीका निकाला है। रोवर का मास्टकैम-Z कैमरा सूरज के उस हिस्से की तस्वीरें खींचेगा, जो पृथ्वी से दिखाई नहीं देता। इससे वैज्ञानिकों को दो हफ्ते पहले पता चल जाएगा कि कौन से सनस्पॉट्स पृथ्वी और चांद की ओर आने वाले हैं। यह एडवांस वार्निंग वैज्ञानिकों को संभावित सौर तूफानों के लिए तैयार रहने का समय देगी।

    Orion यान में रेडिएशन सुरक्षा

    आर्टेमिस II मिशन के Orion अंतरिक्ष यान में HERA हाइब्रिड इलेक्ट्रॉनिक विकिरण मूल्यांकन नामक एडवांस सेंसर लगाया गया है। यह सेंसर लगातार रेडिएशन के स्तर की निगरानी करेगा। यदि रेडिएशन खतरनाक स्तर पर पहुंचता है, तो यान अलार्म बजाएगा। ऐसी स्थिति में अंतरिक्ष यात्री इम्प्रोवाइज्ड स्टॉर्म शेल्टर अस्थायी सुरक्षा घेरा बनाने के लिए प्रशिक्षित होंगे। यान के अंदर मौजूद सामान और वजन का इस्तेमाल करके वे सुरक्षा दीवार बनाएंगे, जिससे सौर कणों के सीधे हमले से बचा जा सके।

  • NASA का मून मिशन स्थगित, मार्च में होने वाला था लांच, जानिए क्‍या रही वजह?

    NASA का मून मिशन स्थगित, मार्च में होने वाला था लांच, जानिए क्‍या रही वजह?



    नई दिल्ली। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA ने अपने बहुप्रतीक्षित मून मिशन को फिलहाल स्थगित कर दिया है। एजेंसी मानवयुक्त फ्लाइबाइ मिशन आर्टेमिस-2 को मार्च में लॉन्च करने की तैयारी में थी, लेकिन ऐन वक्त पर सामने आई तकनीकी समस्या के कारण रॉकेट और यान दोनों को लॉन्च पैड से हटा लिया गया। जानकारी के अनुसार रॉकेट में हीलियम लीक की समस्या पाई गई, जिसके चलते मिशन को टालने का निर्णय लिया गया।

    नासा के प्रमुख जेरेड आइजैकमैन ने शनिवार को बताया कि स्पेस लॉन्च सिस्टम (SLS) में हीलियम रिसाव का पता चला है। इस तकनीकी खामी के कारण अब मार्च में मिशन की लॉन्चिंग संभव नहीं होगी। उन्होंने स्वीकार किया कि इस फैसले से पूरी टीम निराश है, क्योंकि मिशन की तैयारी में लंबे समय से कड़ी मेहनत की जा रही थी। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि बड़े और महत्वपूर्ण अंतरिक्ष अभियानों में सावधानी सर्वोपरि होती है। 1960 के दशक में भी जब नासा ने ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की थीं, तब कई चुनौतियों और देरी का सामना करना पड़ा था।

    रॉकेट सिस्टम में हीलियम की अहमियत
    किसी भी रॉकेट प्रणाली में हीलियम की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। यह प्रोपेलेंट टैंक में आवश्यक दबाव बनाए रखने और इंजन के संचालन में मदद करता है। हीलियम में आई गड़बड़ी को देखते हुए अब एसएलएस रॉकेट और ओरियन अंतरिक्ष यान को मरम्मत के लिए व्हीकल असेंबली बिल्डिंग में ले जाया जाएगा, जहां विस्तृत जांच और सुधार का काम किया जाएगा।

    क्या था मिशन का उद्देश्य
    आर्टेमिस-2 मिशन के तहत अंतरिक्ष यात्री शून्य-गुरुत्वाकर्षण में एक छोटे केबिन में काम करने वाले थे। पृथ्वी की निचली कक्षा में उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन की तुलना में अधिक रेडिएशन का सामना करना पड़ता, हालांकि इसे सुरक्षित दायरे में माना गया था। मिशन की योजना के अनुसार वापसी के दौरान अंतरिक्ष यात्री वायुमंडल से गुजरते हुए एक चुनौतीपूर्ण रिएंट्री का अनुभव करते और अमेरिका के पश्चिमी तट से दूर प्रशांत महासागर में लैंडिंग करते।

    गौरतलब है कि इसके बाद लक्ष्य चंद्रमा पर इंसानों की स्थायी मौजूदगी सुनिश्चित करना है। आगे चलकर आर्टेमिस-4 और आर्टेमिस-5 मिशनों के जरिए ‘गेटवे’ नामक एक छोटा स्पेस स्टेशन स्थापित किया जाएगा, जो चंद्रमा की कक्षा में परिक्रमा करेगा।

    उल्लेखनीय है कि नासा ने आखिरी बार 1960 और 1970 के दशक में अपोलो कार्यक्रम के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर भेजा था। अब आर्टेमिस कार्यक्रम के जरिए एजेंसी चंद्रमा पर दीर्घकालिक और स्थायी उपस्थिति स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है, हालांकि फिलहाल तकनीकी अड़चन ने उसकी रफ्तार पर अस्थायी विराम लगा दिया है।