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  • राष्ट्रीय सुरक्षा पर अमेरिका सख्त विदेशी हस्तक्षेप और सीमापार दमन रोकने के लिए नया कानून लाने की पहल

    राष्ट्रीय सुरक्षा पर अमेरिका सख्त विदेशी हस्तक्षेप और सीमापार दमन रोकने के लिए नया कानून लाने की पहल


    अमेरिका  अमेरिका में राष्ट्रीय सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। अमेरिकी सीनेट में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों दलों के सांसदों ने मिलकर एक नया विधेयक पेश किया है जिसका उद्देश्य विदेशी सरकारों या उनके एजेंटों द्वारा अमेरिकी धरती पर कथित सीमापार दमन की घटनाओं पर सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करना है। स्टॉप ट्रांसनेशनल रिप्रेशन एक्ट नामक यह प्रस्ताव पहली बार ऐसे मामलों की स्पष्ट संघीय कानूनी परिभाषा तय करने और दोषियों के खिलाफ कठोर दंड का प्रावधान करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

    यह विधेयक कैलिफोर्निया के डेमोक्रेट सीनेटर एडम शिफ और यूटा के रिपब्लिकन सीनेटर जॉन कर्टिस ने संयुक्त रूप से पेश किया है। दोनों सांसदों का कहना है कि हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें विदेशी सरकारों पर अमेरिका में रह रहे असंतुष्टों मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पत्रकारों और अन्य लोगों को डराने धमकाने उनकी निगरानी करने या उन पर हमले की साजिश रचने के आरोप लगे हैं। उनका मानना है कि मौजूदा कानूनी ढांचे को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है ताकि ऐसी गतिविधियों पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।

    प्रस्तावित कानून के तहत यदि किसी व्यक्ति को सीमापार दमन से जुड़े संघीय अपराध में दोषी पाया जाता है तो उसे अधिकतम 10 वर्ष की अतिरिक्त कैद और 100000 अमेरिकी डॉलर तक के अतिरिक्त जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है। इसके साथ ही पहली बार ट्रांसनेशनल रिप्रेशन को संघीय आपराधिक कानून में स्पष्ट रूप से परिभाषित करने का प्रस्ताव रखा गया है ताकि जांच और अभियोजन की प्रक्रिया अधिक प्रभावी और एकरूप हो सके।

    विधेयक के अनुसार ऐसे मामलों में अभियोजन की निगरानी अमेरिकी न्याय विभाग के राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभाग के अधीन होगी जबकि आपराधिक जांच की जिम्मेदारी एफबीआई को सौंपी जाएगी। इसके अलावा कांग्रेस को हर वर्ष सीमापार दमन से जुड़े मामलों पर विस्तृत रिपोर्ट और ब्रीफिंग देना अनिवार्य होगा। संघीय एजेंसियों को यह भी निर्देश दिया जाएगा कि वे मौजूदा कानूनी अधिकारों की समीक्षा करें और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से होने वाले संभावित सीमापार दमन से निपटने के लिए व्यापक रणनीति तैयार करें।

    सीनेटर एडम शिफ ने कहा कि अमेरिका की धरती पर किसी भी विदेशी सरकार द्वारा असंतुष्टों या आलोचकों को डराने धमकाने या चुप कराने की कोशिश स्वीकार नहीं की जा सकती। उनके अनुसार यह केवल व्यक्तिगत सुरक्षा का मामला नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का भी प्रश्न है। वहीं सीनेटर जॉन कर्टिस ने कहा कि चाहे कोई भी विदेशी सरकार हो उसे अमेरिका की संप्रभुता और नागरिकों की स्वतंत्रता को चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने इस विधेयक को राष्ट्रीय हित और कानून के शासन को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण कदम बताया।

    प्रस्तावित कानून में सीमापार दमन की परिभाषा के अंतर्गत किसी विदेशी सरकार उसके एजेंट या उसके सहयोगियों द्वारा अमेरिका या अमेरिकी नागरिकों के खिलाफ की जाने वाली धमकी उत्पीड़न प्रतिशोध शारीरिक नुकसान अपहरण या हत्या जैसी गतिविधियों को शामिल किया गया है। साथ ही ऐसे प्रयास भी इस दायरे में आएंगे जिनका उद्देश्य किसी व्यक्ति को अमेरिकी संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों का उपयोग करने से रोकना हो।

    हाल के वर्षों में इस तरह के मामलों को लेकर अमेरिका में चिंता बढ़ी है और कानून प्रवर्तन एजेंसियां कई कथित मामलों की जांच कर चुकी हैं। इसी पृष्ठभूमि में लाया गया यह विधेयक राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने और अमेरिका में रहने वाले लोगों के अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

  • एआई और रोबोटिक्स में चीन की बढ़त रोकने का अमेरिकी प्लान, सांसद बोले- चीनी रोबोट बन सकते हैं जासूसी का हथियार

    एआई और रोबोटिक्स में चीन की बढ़त रोकने का अमेरिकी प्लान, सांसद बोले- चीनी रोबोट बन सकते हैं जासूसी का हथियार


    नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स के क्षेत्र में चीन की तेजी से बढ़ती ताकत अब अमेरिका के लिए नई सुरक्षा चुनौती बनती जा रही है। इसी खतरे को देखते हुए अमेरिकी संसद में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट सांसदों ने एक ऐसे विधेयक को आगे बढ़ाया है जिसका उद्देश्य चीन में निर्मित ह्यूमनॉइड और चार पैरों वाले रोबोट को अमेरिका के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे से दूर रखना है। अमेरिकी सांसदों का मानना है कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में यही रोबोट राष्ट्रीय सुरक्षा और संवेदनशील संस्थानों के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं।

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की एनर्जी एंड कॉमर्स कमेटी की कम्युनिकेशंस एंड टेक्नोलॉजी सब कमेटी में गार्ड एक्ट पर सुनवाई के दौरान सांसदों ने कहा कि चीन पहले ड्रोन उद्योग में जिस रणनीति से वैश्विक बाजार पर कब्जा करने में सफल रहा था अब वही मॉडल रोबोटिक्स और एआई सेक्टर में अपनाया जा रहा है। उनका कहना है कि इंटरनेट से जुड़े ये रोबोट केवल मशीन नहीं बल्कि डेटा संग्रह और निगरानी का माध्यम भी बन सकते हैं।

    समिति के अध्यक्ष ब्रेट गुथरी ने कहा कि अमेरिका पहले ही चीनी दूरसंचार उपकरणों और ड्रोन के खिलाफ कड़े कदम उठा चुका है। अब रोबोटिक्स क्षेत्र में भी उसी सतर्कता की जरूरत है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और अमेरिकी नागरिकों के डेटा की रक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है और किसी भी संभावित खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    सुनवाई के दौरान एसोसिएशन फॉर अनक्रूड व्हीकल सिस्टम्स इंटरनेशनल के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी माइकल रॉबिंस ने चेतावनी दी कि चीन बेहद कम कीमत पर सरकारी सब्सिडी वाले रोबोट दुनिया भर में उपलब्ध करा रहा है। उन्होंने दावा किया कि वैश्विक स्तर पर ह्यूमनॉइड रोबोट की लगभग 90 प्रतिशत आपूर्ति पर चीनी कंपनियों का कब्जा हो चुका है और अमेरिकी अनुसंधान संस्थान भी सस्ते विकल्पों की वजह से इन पर निर्भर होते जा रहे हैं।

    रॉबिंस ने कहा कि एक सामान्य लैपटॉप केवल डेटा चुरा सकता है लेकिन इंटरनेट से जुड़ा रोबोट किसी फैक्ट्री अस्पताल बिजली संयंत्र या सैन्य ठिकाने के भीतर घूमकर निगरानी कर सकता है डेटा इकट्ठा कर सकता है और भौतिक गतिविधियां भी अंजाम दे सकता है। उनके अनुसार यदि ऐसे सिस्टम से छेड़छाड़ की जाए या रिमोट एक्सेस हासिल कर लिया जाए तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। उन्होंने इसे ट्रोजन हॉर्स जैसी स्थिति बताया और कहा कि कार्रवाई में जितनी देरी होगी भविष्य में चीनी तकनीक पर निर्भरता उतनी ही बढ़ती जाएगी।

    व्हाइट हाउस की पूर्व प्रौद्योगिकी सलाहकार लिंडसे गोरमन ने भी सांसदों को चेतावनी देते हुए कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने साइबर सुरक्षा की चुनौतियों को पूरी तरह बदल दिया है। उनके मुताबिक एआई साइबर हमलों को पहले से कहीं अधिक प्रभावी बना रहा है और इससे हमलावरों को बढ़त मिलने का खतरा बढ़ गया है। उन्होंने सुझाव दिया कि अमेरिका को कम लागत वाले भरोसेमंद एआई मॉडल विकसित करने चाहिए ताकि दुनिया के अन्य देशों को चीनी विकल्पों पर निर्भर न रहना पड़े।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की वैश्विक प्रतिस्पर्धा केवल सैन्य ताकत या अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि एआई और रोबोटिक्स में तकनीकी बढ़त भी देशों की रणनीतिक स्थिति तय करेगी। यही वजह है कि अमेरिका अब जापान दक्षिण कोरिया ताइवान इजरायल ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय सहयोगियों के साथ मिलकर सुरक्षित और भरोसेमंद तकनीकी सप्लाई चेन तैयार करने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। आने वाले समय में यह प्रतिस्पर्धा वैश्विक तकनीकी और भू-राजनीतिक समीकरणों को नई दिशा दे सकती है।

  • ट्रंप के पूर्व NSA जॉन बोल्टन पर बड़ा एक्शन, गोपनीय दस्तावेज रखने के मामले में दोष स्वीकार

    ट्रंप के पूर्व NSA जॉन बोल्टन पर बड़ा एक्शन, गोपनीय दस्तावेज रखने के मामले में दोष स्वीकार


    नई दिल्ली । अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे जॉन बोल्टन ने गोपनीय सरकारी दस्तावेजों को अवैध रूप से अपने पास रखने के मामले में अदालत के सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है। इस मामले में अमेरिकी न्याय विभाग के साथ हुए समझौते के बाद बोल्टन ने दोषी होने की बात मानी है। हालांकि उनकी सजा पर अंतिम फैसला अदालत सुनाएगी लेकिन इस समझौते के चलते उन्हें जेल की अवधि में कुछ राहत मिलने की संभावना जताई जा रही है।

    77 वर्षीय जॉन बोल्टन ने मैरीलैंड के ग्रीनबेल्ट स्थित अमेरिकी जिला अदालत में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील दस्तावेजों को अपने पास रखने के आरोप को स्वीकार किया। अमेरिकी कानून के तहत इस अपराध में अधिकतम 10 वर्ष तक की जेल की सजा का प्रावधान है। अदालत ने इस मामले में सजा सुनाने की तारीख 28 अक्टूबर तय की है।

    अभियोजन पक्ष के अनुसार जॉन बोल्टन पर पिछले वर्ष कुल 18 आरोप लगाए गए थे। जांच में आरोप लगाया गया कि उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहते हुए तैयार किए गए निजी नोट्स और कई गोपनीय दस्तावेज अपने पास सुरक्षित रखे। इतना ही नहीं उन्होंने इनमें से कुछ संवेदनशील जानकारियां अपने परिवार के सदस्यों के साथ भी साझा की थीं। जांच एजेंसियों का दावा है कि बोल्टन ने अपने कार्यकाल से जुड़े एक हजार से अधिक पन्नों की गोपनीय जानकारी अपने परिवार को भेजी थी।

    अदालती दस्तावेजों के अनुसार बोल्टन ने कुछ गोपनीय दस्तावेज अपनी पत्नी और बेटी के साथ साझा किए थे। एक दस्तावेज भेजने के बाद उन्होंने संदेश में यह भी लिखा था कि इस विषय पर कोई चर्चा नहीं करेंगे। हालांकि जांच में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि उनके परिवार ने इन दस्तावेजों को किसी अन्य व्यक्ति के साथ साझा किया हो। लेकिन सरकारी सेवा छोड़ने के बाद उनके निजी ईमेल खाते को ईरान से जुड़े एक हैकर द्वारा निशाना बनाए जाने के कारण सुरक्षा एजेंसियों ने गोपनीय सूचनाओं के लीक होने की आशंका भी जताई थी।

    न्याय विभाग के साथ हुए समझौते के तहत बोल्टन ने 22.5 लाख अमेरिकी डॉलर का जुर्माना भरने पर सहमति जताई है। इसके अलावा उन्हें संघीय सेवा से मिलने वाली सेवानिवृत्ति संबंधी कुछ सुविधाएं छोड़नी होंगी। समझौते में यह भी शामिल है कि वे खुफिया अधिकारियों के साथ पूछताछ में सहयोग करेंगे और 100 घंटे की सामुदायिक सेवा भी करेंगे। अभियोजन पक्ष ने अदालत से जेल की सजा अधिकतम पांच वर्ष तक सीमित रखने की सिफारिश की है लेकिन अदालत इस सिफारिश को मानने के लिए बाध्य नहीं है।

    जॉन बोल्टन और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रिश्ते वर्ष 2019 में काफी खराब हो गए थे जब बोल्टन ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का पद छोड़ दिया था। इसके बाद उन्होंने द रूम व्हेयर इट हैपन्ड नामक पुस्तक लिखी जिसमें ट्रंप प्रशासन की कार्यशैली और कई फैसलों की खुलकर आलोचना की गई थी। ट्रंप प्रशासन ने इस पुस्तक के प्रकाशन को रोकने की कोशिश की लेकिन अदालत से राहत नहीं मिल सकी। तब से दोनों नेताओं के बीच सार्वजनिक रूप से कई बार तीखी बयानबाजी होती रही है।

    बोल्टन के दोष स्वीकार करने के बाद यह मामला अमेरिकी प्रशासन में गोपनीय दस्तावेजों की सुरक्षा और संवेदनशील सूचनाओं के प्रबंधन को लेकर एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। अब सभी की नजर 28 अक्टूबर को होने वाले अदालत के अंतिम फैसले पर टिकी हुई है।

  • चीन को लेकर अमेरिका में बढ़ी चिंता: संवेदनशील प्रयोगशालाओं तक पहुंच पर उठे गंभीर सवाल

    चीन को लेकर अमेरिका में बढ़ी चिंता: संवेदनशील प्रयोगशालाओं तक पहुंच पर उठे गंभीर सवाल


    नई दिल्ली ।अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच अब अमेरिकी राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में चीनी नागरिकों की मौजूदगी एक नया राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दा बन गई है। अमेरिका के दो वरिष्ठ रिपब्लिकन सीनेटरों ने ट्रंप प्रशासन से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने और संवेदनशील शोध संस्थानों तक विदेशी नागरिकों की पहुंच की समीक्षा करने की मांग की है। उनका कहना है कि यह केवल वैज्ञानिक सहयोग का मामला नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और तकनीकी श्रेष्ठता से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।

    अर्कांसस से रिपब्लिकन सीनेटर टॉम कॉटन और यूटा से सीनेटर माइक ली ने अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट को एक विस्तृत पत्र लिखकर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। दोनों सांसदों का कहना है कि अमेरिकी ऊर्जा विभाग की राष्ट्रीय प्रयोगशालाएं कृत्रिम बुद्धिमत्ता उन्नत कंप्यूटिंग ऊर्जा सुरक्षा सामग्री विज्ञान और परमाणु अनुसंधान जैसे अत्यंत संवेदनशील क्षेत्रों में काम करती हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में चीनी नागरिकों की मौजूदगी और उनकी पहुंच राष्ट्रीय हितों के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।

    पत्र में दोनों सीनेटरों ने ऊर्जा विभाग के आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि वित्त वर्ष 2025 के दौरान लगभग 1900 अल्पकालिक यात्राएं चीनी नागरिकों द्वारा की गईं। इसके अतिरिक्त करीब 1300 दीर्घकालिक शोध नियुक्तियां और लगभग 2100 औपचारिक रोजगार पदों पर भी चीनी नागरिक विभिन्न प्रयोगशालाओं से जुड़े रहे। इन आंकड़ों ने अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।

    सांसदों ने यह भी बताया कि इसी अवधि में चीनी नागरिकों ने राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं की सुविधाओं तक 5000 से अधिक बार प्रत्यक्ष अथवा दूरस्थ पहुंच हासिल की। उनके अनुसार यह स्थिति केवल सामान्य वैज्ञानिक आदान-प्रदान तक सीमित नहीं है बल्कि इससे संवेदनशील तकनीकों और अनुसंधान से जुड़ी जानकारियों के लीक होने की आशंका भी पैदा होती है।

    टॉम कॉटन और माइक ली का तर्क है कि चीन वर्तमान समय में उभरती तकनीकों की वैश्विक दौड़ में अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी है। उन्होंने आरोप लगाया कि चीन लंबे समय से विदेशी तकनीक और बौद्धिक संपदा हासिल करने की रणनीति पर काम करता रहा है। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं तक व्यापक पहुंच देना राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से चिंताजनक है।

    पत्र में दोनों सांसदों ने ऊर्जा विभाग से कई महत्वपूर्ण सवाल भी पूछे हैं। उन्होंने जानना चाहा है कि विभाग अपनी सुरक्षा नीतियों में चीन के राष्ट्रीय खुफिया कानून को किस प्रकार ध्यान में रखता है। सीनेटरों का दावा है कि यह कानून चीनी नागरिकों को आवश्यक होने पर अपने देश की खुफिया एजेंसियों के साथ सहयोग करने के लिए बाध्य करता है। इसलिए अमेरिका को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की आवश्यकता है।

    इसके अलावा सांसदों ने यह भी जानकारी मांगी है कि क्या चीनी नागरिकों को निर्यात नियंत्रण वाली तकनीकों नियंत्रित अनुसंधान परियोजनाओं या अन्य संवेदनशील वैज्ञानिक कार्यक्रमों तक पहुंच दी जा रही है। उन्होंने यह भी पूछा है कि रिमोट एक्सेस को सीमित करने और संभावित जोखिमों को कम करने के लिए विभाग कौन से कदम उठा रहा है।

    सीनेटरों ने अपने पत्र में स्पष्ट कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और महत्वपूर्ण तकनीकी बढ़त को बनाए रखना ऊर्जा विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी है। उनका मानना है कि यदि हजारों विदेशी नागरिक विशेषकर चीन जैसे रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी देश के नागरिक इन प्रयोगशालाओं तक लगातार पहुंच बनाते रहेंगे तो अमेरिका की तकनीकी बढ़त और सुरक्षा दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

    गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब इस मुद्दे को उठाया गया हो। जनवरी में भी टॉम कॉटन माइक ली और अन्य रिपब्लिकन सांसदों ने ऊर्जा विभाग से कार्रवाई की मांग की थी। इसके बाद मार्च 2025 में उन्होंने जीएटीई एक्ट नामक विधेयक पेश किया था जिसका उद्देश्य अमेरिकी राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं और संवेदनशील तकनीकों तक प्रतिद्वंद्वी देशों के नागरिकों की पहुंच को सीमित करना है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा और तेज होगी। ऐसे में वैज्ञानिक सहयोग और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना अमेरिकी प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

  • नक्सलवाद के बाद अब घुसपैठ पर फोकस अमित शाह तय कर सकते हैं नई डेडलाइन

    नक्सलवाद के बाद अब घुसपैठ पर फोकस अमित शाह तय कर सकते हैं नई डेडलाइन


    नई दिल्ली । देश में आंतरिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर केंद्र सरकार लगातार सक्रिय नजर आ रही है। नक्सलवाद के खिलाफ लंबे समय तक चले अभियान को निर्णायक सफलता मिलने के बाद अब सरकार का ध्यान अवैध घुसपैठ की चुनौती पर केंद्रित हो गया है। सूत्रों के अनुसार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस मुद्दे पर व्यापक रणनीति तैयार कर रहे हैं और इसके लिए समयबद्ध लक्ष्य तय किए जाने की संभावना जताई जा रही है।

    गृह मंत्रालय का मानना है कि किसी भी बड़े अभियान को प्रभावी बनाने के लिए स्पष्ट समय सीमा और एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक होता है। इसी सोच के तहत अवैध घुसपैठ की पहचान, निगरानी और कार्रवाई के लिए मिशन मोड में काम करने की तैयारी की जा रही है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में इस दिशा में एक स्पष्ट डेडलाइन निर्धारित की जा सकती है, जिससे सभी राज्यों और सुरक्षा एजेंसियों के प्रयासों को एकीकृत किया जा सके।

    गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने पहले नक्सलवाद के खिलाफ भी समयबद्ध रणनीति अपनाई थी। इसके तहत सुरक्षा बलों और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वित कार्रवाई की गई थी। अब उसी मॉडल को सीमा सुरक्षा और अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर लागू करने की संभावना पर विचार किया जा रहा है।

    सीमा क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई स्तरों पर कदम उठाए जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के आसपास होने वाले अवैध निर्माण और अतिक्रमणों की पहचान के निर्देश दिए गए हैं। सीमा से जुड़े संवेदनशील इलाकों में जमीन उपयोग और जनसंख्या संरचना में होने वाले बदलावों पर भी विशेष निगरानी रखी जा रही है। इसके लिए संबंधित एजेंसियां विस्तृत सर्वेक्षण और समीक्षा कार्य कर रही हैं।

    सुरक्षा एजेंसियां आधुनिक तकनीकों का भी व्यापक उपयोग कर रही हैं। सीमा क्षेत्रों में थर्मल कैमरे, सेंसर, रडार और ड्रोन जैसी तकनीकों की मदद से निगरानी बढ़ाई गई है। विशेष रूप से संवेदनशील सीमाई इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाने के प्रयास जारी हैं। सीमा बाड़बंदी और अन्य बुनियादी सुरक्षा परियोजनाओं को भी तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है।

    अवैध रूप से देश में प्रवेश करने वाले लोगों की पहचान और कार्रवाई के लिए सरकार कथित रूप से तीन स्तरीय रणनीति पर काम कर रही है। इसमें पहचान, हिरासत और कानूनी प्रक्रिया के तहत निष्कासन जैसे चरण शामिल हैं। इस पूरी प्रक्रिया की नियमित निगरानी और समीक्षा भी की जा रही है ताकि अभियान प्रभावी ढंग से आगे बढ़ सके।

    हाल के महीनों में गृह मंत्री अमित शाह विभिन्न राज्यों के दौरे कर सुरक्षा व्यवस्था और सीमा प्रबंधन से जुड़े मुद्दों की समीक्षा कर चुके हैं। राज्य सरकारों और केंद्रीय एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाने पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है। अधिकारियों का मानना है कि अवैध घुसपैठ की चुनौती से निपटने के लिए केंद्र और राज्यों के साझा प्रयास बेहद महत्वपूर्ण होंगे।

    आने वाले समय में यदि इस अभियान के लिए औपचारिक समय सीमा तय की जाती है तो यह देश की सीमा सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा नीति में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा। फिलहाल सरकार और सुरक्षा एजेंसियां इस दिशा में रणनीतिक स्तर पर तैयारियों को आगे बढ़ा रही हैं।

  • मिशन 2047 के नाम पर देशविरोधी साजिश ATS जांच में चौंकाने वाले खुलासे ब्रेनवॉश से टारगेट नेटवर्क तक का दावा

    मिशन 2047 के नाम पर देशविरोधी साजिश ATS जांच में चौंकाने वाले खुलासे ब्रेनवॉश से टारगेट नेटवर्क तक का दावा


    मध्यप्रदेश । भोपाल में आतंकवाद विरोधी दस्ते यानी ATS द्वारा की जा रही जांच में कथित आतंकी मॉड्यूल से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलू सामने आए हैं। एजेंसी की हिरासत में मौजूद आरोपियों से पूछताछ के दौरान ऐसे इनपुट मिले हैं जिनके आधार पर जांच का दायरा लगातार बढ़ाया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि अभी जांच जारी है और सामने आई जानकारियों का सत्यापन किया जा रहा है।

    जांच एजेंसियों के अनुसार बिहार के मधुबनी से गिरफ्तार आरोपी इजहार उल हक से पूछताछ में एक कथित नेटवर्क और उसके उद्देश्यों को लेकर कई दावे सामने आए हैं। पूछताछ में आरोपी ने कथित रूप से बताया कि कुछ लोग एक विशेष एजेंडे के तहत काम कर रहे थे और सोशल मीडिया तथा मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए युवाओं को जोड़ने की कोशिश की जा रही थी। एजेंसियां इन दावों की गहन जांच कर रही हैं।

    ATS के अनुसार जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ संदिग्ध व्यक्ति विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से संपर्क में थे। टेलीग्राम और वॉट्सएप जैसे मैसेजिंग एप्लिकेशन का उपयोग कथित तौर पर संवाद और विचारों के आदान प्रदान के लिए किया जा रहा था। एजेंसी अब इन डिजिटल संपर्कों और चैट रिकॉर्ड की तकनीकी जांच कर रही है ताकि नेटवर्क की वास्तविक संरचना और उसके विस्तार का पता लगाया जा सके।

    पूछताछ में आरोपी फराज से भी कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिलने का दावा किया गया है। जांच एजेंसियों के मुताबिक फराज पिछले कई वर्षों से कुछ संदिग्ध व्यक्तियों के संपर्क में था। पूछताछ के दौरान उसने स्वीकार किया कि उसकी पहचान कुछ ऐसे लोगों से कराई गई थी जो विदेश में बैठे कथित हैंडलर्स से जुड़े बताए जा रहे हैं। एजेंसी अब इन संपर्कों की प्रामाणिकता और उनके संभावित प्रभाव की जांच कर रही है।

    जांच में यह भी सामने आया है कि सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म का उपयोग युवाओं तक पहुंच बनाने के लिए किया जा रहा था। अधिकारियों का कहना है कि ऐसे मामलों में अक्सर वैचारिक प्रभाव डालकर लोगों को प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। इसी कारण डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।

    सूत्रों के अनुसार कुछ आरोपियों ने विभिन्न राज्यों के लोगों के संपर्क में होने की बात भी स्वीकार की है। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि यह नेटवर्क किन क्षेत्रों तक सक्रिय था और इसमें कितने लोग शामिल हो सकते हैं। इसके लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की फॉरेंसिक जांच की जा रही है।

    ATS अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल जांच प्रारंभिक चरण में है और सभी तथ्यों की पुष्टि की जा रही है। एजेंसी यह भी स्पष्ट कर चुकी है कि किसी भी आरोपी की भूमिका का अंतिम निर्धारण जांच पूरी होने और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही किया जाएगा। इसी कारण जांच से जुड़ी जानकारियों को सावधानीपूर्वक परखा जा रहा है।

    इस मामले ने एक बार फिर डिजिटल माध्यमों के जरिए फैलाए जाने वाले कट्टरपंथी विचारों और संदिग्ध नेटवर्क की चुनौती को सामने ला दिया है। जांच एजेंसियां लगातार ऐसे तत्वों पर नजर बनाए हुए हैं और यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही हैं कि किसी भी प्रकार की अवैध या राष्ट्रविरोधी गतिविधि को समय रहते रोका जा सके।

  • घुसपैठ और जनसांख्यिकीय बदलाव पर सख्त होगी सरकार, पीएम मोदी जल्द लॉन्च करेंगे ‘हाई-पावर्ड डेमोग्राफी मिशन’

    घुसपैठ और जनसांख्यिकीय बदलाव पर सख्त होगी सरकार, पीएम मोदी जल्द लॉन्च करेंगे ‘हाई-पावर्ड डेमोग्राफी मिशन’

    नई दिल्ली । देश की सीमा सुरक्षा और जनसांख्यिकीय संतुलन को लेकर केंद्र सरकार अब एक बड़े और निर्णायक कदम की तैयारी में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जल्द ही ‘हाई-पावर्ड डेमोग्राफी मिशन’ की औपचारिक घोषणा कर सकते हैं। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य सीमावर्ती राज्यों में अवैध घुसपैठ को रोकना और देश में कृत्रिम जनसांख्यिकीय बदलाव की चुनौतियों से निपटना बताया जा रहा है। सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक संतुलन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अभियान मान रही है।

    हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संकेत दिए कि नक्सलवाद के खिलाफ बड़ी सफलता हासिल करने के बाद अब सरकार का अगला फोकस अवैध घुसपैठ को पूरी तरह रोकने पर है। उन्होंने कहा कि वर्षों से सीमावर्ती इलाकों में चल रही घुसपैठ अब राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुकी है और इसे रोकने के लिए कठोर और व्यापक रणनीति तैयार की जा रही है। उनके अनुसार देश अब नक्सलवाद से लगभग मुक्त हो चुका है और अब सुरक्षा एजेंसियों को उसी दृढ़ता के साथ सीमा सुरक्षा पर ध्यान देना होगा।

    सरकार का मानना है कि सीमावर्ती इलाकों में अवैध प्रवासन के कारण कई क्षेत्रों की जनसंख्या संरचना में तेजी से बदलाव आया है। इसे देखते हुए ‘हाई-पावर्ड डेमोग्राफी मिशन’ के तहत सुरक्षा एजेंसियों, राज्य सरकारों और प्रशासनिक तंत्र के बीच बेहतर तालमेल स्थापित किया जाएगा। इस मिशन में सीमा सुरक्षा बल की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है। सुरक्षा एजेंसियों को घुसपैठ के संभावित क्षेत्रों की विशेष जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी ताकि निगरानी और कार्रवाई को और मजबूत बनाया जा सके।

    बताया जा रहा है कि इस मिशन के तहत सीमाओं पर आधुनिक तकनीक आधारित सुरक्षा व्यवस्था विकसित की जाएगी। सीमा पर स्मार्ट निगरानी, मजबूत बाड़बंदी और संदिग्ध गतिविधियों पर रियल टाइम नजर रखने जैसी व्यवस्थाओं को प्राथमिकता दी जाएगी। साथ ही विदेशी नागरिकों से जुड़े मामलों के त्वरित निपटारे के लिए विशेष तंत्र को भी मजबूत किया जाएगा। सरकार की योजना पड़ोसी देशों के साथ वापसी समझौतों को और प्रभावी बनाने की भी है ताकि अवैध रूप से रह रहे लोगों की पहचान और वापसी की प्रक्रिया तेज हो सके।

    गृह मंत्री अमित शाह ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मिशन में केवल सीमा सुरक्षा एजेंसियां ही नहीं बल्कि जिला प्रशासन, पुलिस और स्थानीय अधिकारियों की भी सक्रिय भागीदारी होगी। उन्होंने कहा कि जिला कलेक्टर से लेकर पुलिस थाना स्तर तक सभी विभागों को मिलकर काम करना होगा ताकि घुसपैठियों की पहचान और कार्रवाई में किसी प्रकार की ढिलाई न रहे।

    सरकार जल्द ही त्रिपुरा, असम और पश्चिम बंगाल जैसे प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक भी करने जा रही है। इस बैठक में एक संयुक्त सुरक्षा रणनीति तैयार की जाएगी ताकि सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ को प्रभावी तरीके से रोका जा सके। केंद्र सरकार का मानना है कि राज्यों और केंद्र के बीच बेहतर समन्वय के बिना इस चुनौती से पूरी तरह नहीं निपटा जा सकता।

    इसके अलावा सरकार अगले साल ‘स्मार्ट बॉर्डर’ परियोजना शुरू करने की तैयारी में है। इस परियोजना के तहत पाकिस्तान और बांग्लादेश से लगने वाली लगभग 6,000 किलोमीटर लंबी सीमा को अत्याधुनिक सुरक्षा तकनीक से लैस किया जाएगा। सरकार का दावा है कि यह कदम देश की सुरक्षा को नई मजबूती देगा और सीमावर्ती क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के अवैध जनसांख्यिकीय बदलाव की कोशिशों को विफल करने में मदद करेगा।

  • पहली बार कनाडा की सख्ती: खालिस्तानी चरमपंथ पर खुलकर बोली एजेंसी, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बताया खतरा

    पहली बार कनाडा की सख्ती: खालिस्तानी चरमपंथ पर खुलकर बोली एजेंसी, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बताया खतरा


    नई दिल्ली। कनाडा ने पहली बार आधिकारिक तौर पर खालिस्तानी चरमपंथ को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए इसे अपनी आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा माना है। देश की खुफिया एजेंसी Canadian Security Intelligence Service (CSIS) की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि कनाडा में सक्रिय कुछ खालिस्तानी चरमपंथी तत्व लगातार हिंसक गतिविधियों से जुड़े रहे हैं, जो न सिर्फ देश के भीतर बल्कि उसके वैश्विक हितों के लिए भी जोखिम पैदा करते हैं।

    रिपोर्ट के मुताबिक, हाल के वर्षों में चरमपंथी गतिविधियों में युवाओं की भागीदारी को लेकर भी चिंता बढ़ी है। जांच एजेंसियों का कहना है कि कई मामलों में नाबालिगों तक को कट्टरपंथी नेटवर्क के जरिए प्रभावित किया जा रहा है। आंकड़े बताते हैं कि आतंकवाद से जुड़ी जांचों में अब कम उम्र के लोगों की संलिप्तता भी सामने आ रही है, जो सुरक्षा एजेंसियों के लिए नई चुनौती बन रही है।

    एक रिपोर्ट में “राजनीतिक रूप से प्रेरित हिंसक चरमपंथ” (PMVE) को एक उभरता खतरा बताया है। इसके तहत ऐसे समूहों का जिक्र किया गया है, जो मौजूदा राजनीतिक ढांचे को बदलने या नए ढांचे स्थापित करने के लिए हिंसा का सहारा लेते हैं। एजेंसी के अनुसार, कुछ अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए युवाओं को निशाना बना रहे हैं, जिससे स्थिति और जटिल होती जा रही है।

    रिपोर्ट में 1985 की Air India Flight 182 bombing का भी उल्लेख किया गया है, जिसे आज भी कनाडा के इतिहास का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला माना जाता है। इस हमले में 329 लोगों की जान गई थी, जिनमें अधिकांश कनाडाई नागरिक थे। जांच में उस समय खालिस्तानी चरमपंथी तत्वों की भूमिका सामने आई थी।

    हालांकि रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि 2025 के दौरान कनाडा में इस तरह के समूहों से जुड़ा कोई बड़ा आतंकी हमला दर्ज नहीं हुआ, लेकिन उनकी गतिविधियां और नेटवर्क अब भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। एजेंसी का कहना है कि कुछ चरमपंथी तत्व स्थानीय संस्थाओं और सामाजिक नेटवर्क का दुरुपयोग कर अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं, जिसमें फंडिंग जुटाने जैसे तरीके भी शामिल हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि कनाडा का यह रुख अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण संकेत है, खासकर भारत जैसे देशों के लिए, जो लंबे समय से इस मुद्दे को उठाते रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग और मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है।

    कुल मिलाकर, CSIS की यह रिपोर्ट न केवल कनाडा की आंतरिक सुरक्षा चिंताओं को उजागर करती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि वैश्विक स्तर पर चरमपंथ से निपटने के लिए अधिक सतर्क और समन्वित रणनीति की जरूरत है।

  • शौर्य और बलिदान की मिसाल सीआरपीएफ, मुख्यमंत्री मोहन यादव ने वीर जवानों को किया नमन

    शौर्य और बलिदान की मिसाल सीआरपीएफ, मुख्यमंत्री मोहन यादव ने वीर जवानों को किया नमन

    भोपाल । भोपाल मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के शौर्य दिवस के अवसर पर देश के वीर जवानों को शुभकामनाएं दी हैं। इस मौके पर उन्होंने सीआरपीएफ के शौर्य साहस और बलिदान को नमन करते हुए कहा कि यह बल देश की सुरक्षा का एक मजबूत आधार है और इसके जवान अदम्य साहस अटूट संकल्प और राष्ट्रभक्ति के प्रतीक हैं।

    मुख्यमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि सीआरपीएफ के जवान कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ करते हैं। चाहे आंतरिक सुरक्षा की चुनौती हो या आतंकवाद और नक्सलवाद से निपटना हो सीआरपीएफ के जवान हर मोर्चे पर डटकर देश की रक्षा करते हैं। उनका साहस और त्याग पूरे देश के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

    डॉ यादव ने कहा कि सीआरपीएफ का इतिहास वीरता और बलिदान की गौरवगाथाओं से भरा हुआ है। इस बल के जवानों ने कई बार अपने प्राणों की आहुति देकर देश की एकता और अखंडता की रक्षा की है। उनका यह समर्पण देशवासियों के मन में सुरक्षा और विश्वास की भावना को मजबूत करता है।

    मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि शौर्य दिवस हमें उन वीर जवानों की याद दिलाता है जिन्होंने अपने कर्तव्य का पालन करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। यह दिन उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनके साहस से प्रेरणा लेने का अवसर है। उन्होंने कहा कि हमें अपने सुरक्षा बलों के प्रति सम्मान और समर्थन की भावना हमेशा बनाए रखनी चाहिए।

    उन्होंने यह भी कहा कि सीआरपीएफ के जवानों का अनुशासन परिश्रम और कर्तव्यनिष्ठा उन्हें अन्य बलों से विशिष्ट बनाती है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि देश सेवा सर्वोपरि है और इसके लिए हर कठिनाई का सामना करना चाहिए।

    प्रदेशवासियों से अपील करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि वे भी इन वीर जवानों के त्याग और समर्पण से प्रेरणा लेकर अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करें और देश की प्रगति में अपना योगदान दें।

    इस अवसर पर पूरे देश में सीआरपीएफ के शौर्य दिवस को सम्मान और गर्व के साथ मनाया जा रहा है। यह दिन न केवल बल के वीर जवानों के शौर्य को याद करने का अवसर है बल्कि उनके प्रति आभार व्यक्त करने का भी प्रतीक है।

  • भारत की सुरक्षा में सेंध लगाने की नाकाम कोशिश: म्यांमार के विद्रोहियों को ट्रेनिंग दे रहे थे विदेशी नागरिक, दिल्ली से कोलकाता तक NIA की बड़ी कार्रवा

    भारत की सुरक्षा में सेंध लगाने की नाकाम कोशिश: म्यांमार के विद्रोहियों को ट्रेनिंग दे रहे थे विदेशी नागरिक, दिल्ली से कोलकाता तक NIA की बड़ी कार्रवा


    नई दिल्ली। भारत की आंतरिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी NIA ने एक सनसनीखेज अंतरराष्ट्रीय साजिश का पर्दाफाश किया है। एनआईए ने म्यांमार में जातीय विद्रोही समूहों को हथियारों की आपूर्ति, आतंकी सामग्री और सैन्य प्रशिक्षण देने के गंभीर आरोपों में सात विदेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किए गए आरोपियों में एक अमेरिकी नागरिक मैथ्यू वैनडाइक और यूक्रेन के छह नागरिक शामिल हैं। सुरक्षा एजेंसियों ने इस कार्रवाई को अंजाम देते हुए तीन यूक्रेनी नागरिकों को देश की राजधानी दिल्ली, तीन को लखनऊ और अमेरिकी नागरिक मैथ्यू को कोलकाता से हिरासत में लिया है।

    एनआईए द्वारा विशेष अदालत में पेश किए गए दस्तावेजों के अनुसार, ये सभी आरोपी वैध वीजा पर भारत आए थे, लेकिन इनका असली मकसद बेहद खतरनाक था। जांच में सामने आया है कि ये आरोपी मिजोरम के रास्ते म्यांमार पहुंचे, जहाँ उन्होंने उन जातीय संघर्ष समूहों से संपर्क साधा जो भारत में सक्रिय प्रतिबंधित विद्रोही संगठनों से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। इन पर आरोप है कि इन्होंने यूरोप से भारत के रास्ते ड्रोन की एक बड़ी खेप म्यांमार पहुंचाई और वहां विद्रोहियों को एके-47 राइफलों जैसे घातक हथियारों का प्रशिक्षण दिया। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए माना कि यह कोई सामान्य अपराध नहीं है और प्रथम दृष्टया गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धारा-18 के तहत आतंकी साजिश का मामला बनता है, जिसके बाद सातों आरोपियों को 11 दिन की एनआईए रिमांड पर भेज दिया गया है।

    इस हाई-प्रोफाइल गिरफ्तारी के बाद कूटनीतिक गलियारों में भी हलचल तेज हो गई है। यूक्रेन सरकार ने अपने नागरिकों की गिरफ्तारी पर कड़ा ऐतराज जताते हुए भारत को आधिकारिक विरोध पत्र (Note Verbale) सौंपा है। भारत में यूक्रेन के राजदूत डॉ. ओलेक्सांद्र पोलिशचुक ने विदेश मंत्रालय के अधिकारियों से मुलाकात कर अपने नागरिकों की तत्काल रिहाई और उनसे मिलने की अनुमति मांगी है। वहीं, गिरफ्तार अमेरिकी नागरिक मैथ्यू वैनडाइक का प्रोफाइल बेहद संदिग्ध बताया जा रहा है; वह पूर्व में लीबिया, सीरिया और यूक्रेन जैसे युद्धग्रस्त क्षेत्रों में सैन्य गतिविधियों में शामिल रह चुका है। एनआईए अब इस बात की तह तक जाने की कोशिश कर रही है कि इस पूरी साजिश के पीछे किन अंतरराष्ट्रीय ताकतों का हाथ है और भारत की सुरक्षा को इससे कितना बड़ा खतरा हो सकता था।