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  • LS में ताकत बढ़ाने की तैयारी में NDA…. टारगेट- दो तिहाई बहुमत के आंकड़े के करीब पहुंचना

    LS में ताकत बढ़ाने की तैयारी में NDA…. टारगेट- दो तिहाई बहुमत के आंकड़े के करीब पहुंचना


    नई दिल्ली।
    केंद्र की सत्ता पर काबिज एनडीए (NDA) गठबंधन लोकसभा (Lok Sabha) में अपना कुनबा और ताकत बढ़ाने की तैयारी में है। टीएमसी (TMC) के बागी गुट द्वारा 19 सांसदों के समर्थन का दावा किए जाने के बाद, अब विपक्षी खेमे की एक और बड़ी पार्टी में फूट की खबरें सामने आ रही हैं। सूत्रों की मानें तो अगला नंबर उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना यूबीटी (Shiv Sena – UBT)) का हो सकता है। बीजेपी के नेतृत्व वाला एनडीए लोकसभा (Lok Sabha) में दो-तिहाई बहुमत (Two-thirds majority) के आंकड़े के करीब पहुंचने के लिए विपक्ष के कई सांसदों को अपने पाले में लाने की जुगत में लगा हुआ है।


    शिवसेना (UBT) के 6 सांसद कर सकते हैं पाला-बदल

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में एनडीए की एकतरफा जीत के बाद से ही उद्धव गुट में बगावत की अटकलें चल रही थीं, लेकिन अब इन चर्चाओं ने काफी जोर पकड़ लिया है। लोकसभा में फिलहाल उद्धव ठाकरे की पार्टी के कुल 9 सांसद हैं। दल-बदल कानून के तहत सदस्यता जाने से बचने के लिए इनमें से कम से कम 6 सांसदों को एक साथ पार्टी छोड़नी होगी और किसी अन्य दल में विलय करना होगा। माना जा रहा है कि इन बागी सांसदों के लिए सबसे मुफीद विकल्प महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना ही होगी।


    मुंबई तक सिमट रहा उद्धव ठाकरे का प्रभाव?

    एकनाथ शिंदे अपनी मजबूत जमीनी पकड़ और आसानी से लोगों के बीच उपलब्ध रहने की छवि के कारण राज्य के बड़े हिस्से में अपने विरोधी गुट को कमजोर करने में सफल रहे हैं। शिंदे ने ठाकरे गुट के कई प्रभावशाली नेताओं को अपने पाले में कर लिया है, जिसके चलते माना जा रहा है कि उद्धव ठाकरे का प्रभाव अब मुख्य रूप से केवल मुंबई तक ही सीमित रह गया है।


    लोकसभा में 360 का आंकड़ा छूने पर NDA की नजर

    संसद में अपने गठबंधन का संख्याबल बढ़ाने की बीजेपी की इस सियासी कवायद के पीछे सबसे बड़ा लक्ष्य दो-तिहाई बहुमत हासिल करना है। फिलहाल लोकसभा में 540 सांसद मौजूद हैं और तीन सीटें खाली हैं। बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए की नजर किसी भी तरह सदन में दो-तिहाई यानी 360 सांसदों का जादुई आंकड़ा हासिल करने पर है।


    टीएमसी में भी हलचल

    इस मुहिम को तब बल मिला, जब हाल ही में टीएमसी के बागी गुट ने दावा किया कि उनके पास 19 लोकसभा सांसदों के हस्ताक्षर हैं, जो एनडीए सरकार को समर्थन देने के लिए तैयार हैं। सूत्रों का कहना है कि संसद में संख्याबल बढ़ाने की बीजेपी की यह पूरी मुहिम अंततः इस बात पर भी निर्भर करेगी कि मौजूदा लोकसभा में 360 के जादुई आंकड़े को पार करने का उनका यह मास्टरप्लान जमीनी स्तर पर कितना व्यावहारिक साबित होता है।

  • राज्यसभा चुनावः 27 सीटों में से 24 का फैसला निर्विरोध… 19 पर NDA और 5 पर कांग्रेस की जीत

    राज्यसभा चुनावः 27 सीटों में से 24 का फैसला निर्विरोध… 19 पर NDA और 5 पर कांग्रेस की जीत


    नई दिल्ली।
    कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे (Mallikarjun Kharge) और पार्टी के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा (Pawan Khera) के अलावा भाजपा नेता सतीश पूनिया (Satish Poonia) और तरुण चुघ (Tarun Chugh) सहित 24 उम्मीदवार गुरुवार को राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए गए। राज्यसभा की 27 सीटों में से 24 सीटों का फैसला निर्विरोध हो गया। इनमें 19 सीटों पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए गए, जबकि शेष पांच सीटें कांग्रेस के खाते में गईं।


    इन सीटों पर होगा चुनाव

    झारखंड की दो सीटों पर, जहां कड़ा मुकाबला होने की संभावना है, तथा मिजोरम की एक सीट पर चुनाव 18 जून को कराया जाएगा। दस राज्यों की 24 राज्यसभा सीटों के चुनाव तथा महाराष्ट्र, ओडिशा और तमिलनाडु की एक-एक सीट पर उपचुनाव के लिए नामांकन पत्रों की जांच गुरुवार को की गई। निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए गए सभी उम्मीदवारों को संबंधित निर्वाचन अधिकारियों ने जीत का प्रमाण-पत्र सौंप दिया।


    रोमांचक होगा मुकाबला

    झारखंड से राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनाव कराया जाएगा, जहां तीन उम्मीदवार मैदान में हैं। इनमें झामुमो के बैद्यनाथ राम, कांग्रेस के प्रणव झा और निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी शामिल हैं। नाथवानी रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के निदेशक हैं और उन्हें भाजपा का समर्थन प्राप्त है। झारखंड विधानसभा में INDIA गठबंधन के 56 विधायक हैं और जीत के लिए प्रत्येक उम्मीदवार को 28 प्रथम वरीयता मतों की आवश्यकता होगी।

    वहीं, भाजपा के पास 21 विधायक हैं। इसके अलावा नीतीश कुमार की पार्टी जद(यू), लोजपा (रामविलास) और ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन का एक-एक विधायक है। मिजोरम से एकमात्र राज्यसभा सीट के चुनाव के लिए, सत्तारूढ़ ज़ोरम पीपल्स मूवमेंट (JPM) के प्रवक्ता के लालतलुआंगकिमा और मुख्य विपक्षी पार्टी मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) से ज़ोथानसांगी हमार चुनावी मैदान में हैं।

    MP में हुआ बड़ा खेला
    मध्यप्रदेश में राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव में भाजपा के तीनों उम्मीदवारों तरुण चुघ, रजनीश अग्रवाल और महेश केवट को निर्वाचन अधिकारी ने निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया।

    कांग्रेस अध्यक्ष खरगे समेत चार उम्मीदवारों को कर्नाटक से राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित घोषित किया गया। इनमें एक भाजपा उम्मीदवार है। खरगे के अलावा, अन्य नवनिर्वाचित सदस्यों में कांग्रेस सचिव मंसूर अली खान, खेड़ा और भाजपा के एम नागराज शामिल हैं। राज्य से मौजूदा चार राज्यसभा सदस्यों इरन्ना कडाडी और नारायण कोरागाप्पा (दोनों भाजपा से), कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खरगे और जनता दल (सेक्युलर) के नेता एचडी देवेगौड़ा का कार्यकाल 25 जून को खत्म हो रहा है और इन रिक्त पदों को भरने के लिए चुनाव की घोषणा की गई थी।


    अन्य राज्यों का हाल

    राज्यसभा चुनाव के इस दौर के साथ ही, संसद में देवेगौड़ा की पांच दशकों से ज्यादा लंबी पारी खत्म हो जाएगी। गुजरात से चार सीट के लिए सत्तारूढ़ भाजपा के सभी चारों उम्मीदवारों को निर्वाचित घोषित कर दिया गया। इनमें राजूभाई शुक्ला, मानसिंह परमार, मुकेशभाई राठवा और जितेंद्र कंजारिया शामिल हैं।

    आंध्र प्रदेश से NDA के चारों उम्मीदवार राज्यसभा के लिए निर्विरोध चुन लिए गए। निर्वाचित उम्मीदवारों में तीन तेलुगु देशम पार्टी (TDP) और एक जनसेना से है। निर्वाचन अधिकारी आर वनिता रानी ने बश्याम रामकृष्ण, लिंगमनेनी रमेश, सी विजय और सना सतीश बाबू के उच्च सदन के लिए निर्विरोध निर्वाचन की घोषणा की। रामकृष्ण, विजय और बाबू तेदेपा से हैं, जबकि रमेश जनसेना से हैं। विजय, आंध्र प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष सी अय्यन्नापतरुदू के पुत्र हैं।

    राजस्थान से भाजपा के दो और कांग्रेस के एक उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए गए। निर्वाचन अधिकारी ने भाजपा के सतीश पूनिया और अलका गुर्जर तथा कांग्रेस के नीरज डांगी को संसद के उच्च सदन के लिए निर्विरोध निर्वाचित घोषित किया।

    नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जेम्स के संगमा मेघालय से राज्यसभा की एकमात्र सीट के लिए निर्विरोध निर्वाचित हुए। मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा के भाई जेम्स के संगमा को उच्च सदन के द्विवार्षिक चुनाव के लिए निर्विरोध निर्वाचित घोषित किया गया, क्योंकि मुकाबले में कोई अन्य उम्मीदवार नहीं था। वानवेइरॉय खरलुखी का कार्यकाल पूरा होने के बाद राज्यसभा की सीट खाली हो गई थी।

    मणिपुर में, भाजपा की प्रदेश अध्यक्ष अधिकारीमायुम शारदा देवी को राज्य से एकमात्र राज्यसभा सीट के लिए निर्विरोध निर्वाचित घोषित किया गया। भाजपा के वरिष्ठ नेता ताई तागाक अरुणाचल प्रदेश से एकमात्र राज्यसभा सीट के लिए निर्विरोध निर्वाचित हुए। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के राजेंद्र जैन उपचुनाव में महाराष्ट्र से राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित हुए हैं।

    ओडिशा में, भाजपा उम्मीदवार देवाशीष सामंतराय को राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित घोषित किया गया। बीजू जनता दल (BJD) छोड़ने और संसद के उच्च सदन के सदस्य के रूप में इस्तीफा देने के बाद 26 मई को भाजपा में शामिल हुए सामंतराय इस उपचुनाव में एकमात्र उम्मीदवार थे। तमिलनाडु से कांग्रेस उम्मीदवार प्रवीण चक्रवर्ती को निर्विरोध निर्वाचित घोषित किया गया।

    अन्नाद्रमुक नेता सी षणमुगम ने अपना छह वर्षीय कार्यकाल 2028 में समाप्त होने से पहले ही सात मई को राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। वह वर्ष 2022 में राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए थे। सत्तारूढ़ तमिलगा वेत्री कषगम (TVK) के समर्थन से चक्रवर्ती ने नामांकन पत्र दाखिल किया था। नौ जून को अधिकारियों ने उनके नामांकन को वैध घोषित कर दिया, जबकि 12 निर्दलीय उम्मीदवारों के नामांकन पत्र खारिज कर दिए गए।

  • भारतीय राजनीति में नया अध्याय, 4398 दिनों के कार्यकाल के साथ पीएम मोदी बने सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री

    भारतीय राजनीति में नया अध्याय, 4398 दिनों के कार्यकाल के साथ पीएम मोदी बने सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री


    नई दिल्ली ।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ते हुए देश के सबसे लंबे समय तक कार्यरत निर्वाचित प्रधानमंत्री बनने का रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है। उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार के 12 वर्ष पूरे हो चुके हैं और इसी के साथ उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में लगातार सबसे लंबे कार्यकाल के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बार 26 मई 2014 को देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। इसके बाद वर्ष 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में भी उनके नेतृत्व में एनडीए को सफलता मिली और उन्होंने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। 9 जून 2026 तक उनके कार्यकाल के 4398 दिन पूरे हो चुके हैं, जो किसी निर्वाचित भारतीय प्रधानमंत्री के लिए अब तक का सबसे लंबा कार्यकाल माना जा रहा है।

    इससे पहले यह रिकॉर्ड भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नाम था। नेहरू ने 1952 के पहले आम चुनाव के बाद प्रधानमंत्री के रूप में अपना निर्वाचित कार्यकाल शुरू किया था और लगातार 4397 दिनों तक इस पद पर बने रहे थे। हालांकि वह 1947 से 1964 तक प्रधानमंत्री रहे, लेकिन स्वतंत्रता के बाद शुरुआती वर्षों में वह अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में कार्य कर रहे थे। इसी कारण निर्वाचित प्रधानमंत्री के कार्यकाल की गणना अलग आधार पर की जाती है।

    प्रधानमंत्री मोदी की इस उपलब्धि को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वह देश के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी हैं जिन्होंने लगातार दो बार पूर्ण बहुमत वाली सरकार का नेतृत्व किया और तीसरे कार्यकाल में भी सत्ता की कमान संभाल रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह उपलब्धि भारतीय राजनीति में उनके लंबे प्रभाव और जनसमर्थन को दर्शाती है।

    एनडीए सरकार इस अवसर को विशेष रूप से चिह्नित करने की तैयारी में है। 10 जून को गठबंधन शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और सहयोगी दलों के नेताओं की बैठक प्रस्तावित है। बैठक में पिछले 12 वर्षों के दौरान सरकार की प्रमुख उपलब्धियों, विकास योजनाओं और नीतिगत पहलों पर चर्चा किए जाने की संभावना है। गठबंधन के वरिष्ठ नेताओं द्वारा प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में हुए कार्यों को रेखांकित करने वाला प्रस्ताव भी पेश किया जा सकता है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने इससे पहले जुलाई 2025 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लगातार प्रधानमंत्री रहने के रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ा था। वहीं मार्च 2026 में उन्होंने एक और उपलब्धि हासिल की, जब गुजरात के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में उनके कुल शासनकाल ने भारत में सबसे लंबे समय तक सत्ता संभालने वाले नेताओं की सूची में उन्हें शीर्ष स्थान पर पहुंचा दिया।

    राजनीतिक इतिहास में प्रधानमंत्री मोदी का नाम लगातार तीन लोकसभा चुनावों में जीत दर्ज कर सरकार बनाने वाले चुनिंदा नेताओं में भी शामिल हो चुका है। जवाहरलाल नेहरू के बाद वह दूसरे ऐसे नेता बने, जिन्होंने लगातार तीन आम चुनावों में अपने नेतृत्व में गठबंधन को जीत दिलाकर तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

    प्रधानमंत्री मोदी की एक और विशेष पहचान यह है कि वे स्वतंत्र भारत में जन्म लेने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं। उनका जन्म 17 सितंबर 1950 को हुआ था, जबकि उनसे पहले देश के सभी प्रधानमंत्रियों का जन्म स्वतंत्रता से पूर्व हुआ था।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह उपलब्धि केवल एक राजनीतिक रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि पिछले एक दशक से अधिक समय से भारतीय राजनीति में बने नेतृत्व, चुनावी सफलता और प्रशासनिक निरंतरता का भी प्रतीक है। आने वाले वर्षों में यह रिकॉर्ड भारतीय राजनीतिक इतिहास की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाएगा।

  • बिहार एनडीए में विलय की अटकलों पर उपेंद्र कुशवाहा का पूर्ण विराम: बोले- 'दुनिया की कोई ताकत राष्ट्रीय लोक मोर्चा का अस्तित्व खत्म नहीं कर सकती'

    बिहार एनडीए में विलय की अटकलों पर उपेंद्र कुशवाहा का पूर्ण विराम: बोले- 'दुनिया की कोई ताकत राष्ट्रीय लोक मोर्चा का अस्तित्व खत्म नहीं कर सकती'

    नई दिल्ली । बिहार की क्षेत्रीय राजनीति और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के आंतरिक समीकरणों के बीच दलगत अस्तित्व को लेकर जारी कयासबाजियों पर आखिरकार राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। उन्होंने बेहद कड़े और स्पष्ट शब्दों में अपनी पार्टी का भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में विलय होने की तमाम संभावनाओं और मीडिया में चल रही अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया है। रविवार को आयोजित अपनी पार्टी के एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक मंच से बोलते हुए उन्होंने साफ किया कि राष्ट्रीय लोक मोर्चा का किसी अन्य दल में विलय होने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता।

    पार्टी के प्रदेश सम्मेलन को संबोधित करते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने गठबंधन की राजनीति पर अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि वे और उनकी पार्टी गठबंधन धर्म का पूरी निष्ठा से पालन करने वाले लोग हैं और एनडीए में शामिल सबसे बड़े राजनीतिक दल के प्रति उनके मन में पूरा सम्मान है। गठबंधन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय लोक मोर्चा पूरी मजबूती के साथ एनडीए का हिस्सा था, वर्तमान में भी है और भविष्य में भी बना रहेगा, इसलिए इस विषय को लेकर किसी के मन में कोई संदेह या संशय नहीं होना चाहिए।

    मीडिया के एक वर्ग में पिछले कुछ महीनों से चल रही खबरों पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कुशवाहा ने कहा कि कुछ चैनलों पर तो विलय की बाकायदा तारीखें तक घोषित कर दी गई थीं और इसे महज एक औपचारिकता बताया जा रहा था। इन दावों को पूरी तरह भ्रामक करार देते हुए उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को आश्वस्त किया कि वे शत-प्रतिशत इस बात को लेकर निश्चिंत रहें कि किसी एक राजनीतिक पद के लिए उनकी पार्टी का स्वतंत्र वजूद कभी समाप्त नहीं होगा। उन्होंने हुंकार भरते हुए कहा कि दुनिया की कोई भी ताकत राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अस्तित्व को मिटा नहीं सकती है।

    इस राजनीतिक बयानबाजी के पीछे बिहार की हालिया विधायी राजनीति को एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। दरअसल, आगामी 18 जून को बिहार में होने वाले विधान परिषद (MLC) चुनाव को लेकर एनडीए ने अपने उम्मीदवारों की सूची घोषित की है, जिसमें उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र और बिहार सरकार के मौजूदा मंत्री दीपक प्रकाश का नाम शामिल नहीं है। टिकट न मिलने के कारण राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज थी कि कुशवाहा गुट एनडीए के शीर्ष नेतृत्व से नाराज चल रहा है। सम्मेलन के दौरान कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने के उद्देश्य से उन्होंने भावुक संदेश देते हुए कहा कि वे एक राजनीतिक दल नहीं बल्कि एक परिवार चलाते हैं, जिसका हिस्सा सभी कार्यकर्ता हैं।

    संवैधानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो दीपक प्रकाश के उम्मीदवारों की सूची में शामिल न होने से उनके मंत्री पद पर कानूनी संकट गहरा गया है। भारतीय संविधान के नियमों के मुताबिक, यदि कोई व्यक्ति विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है, तो वह अधिकतम छह महीने तक ही मंत्री पद पर रह सकता है। इस अवधि के भीतर उसे किसी भी एक सदन का सदस्य निर्वाचित होना अनिवार्य होता है। चूंकि दीपक प्रकाश वर्तमान में नीतीश कैबिनेट में मंत्री हैं और उन्हें आगामी चुनाव के लिए टिकट नहीं मिला है, इसलिए उनके राजनीतिक भविष्य और मंत्री पद पर बने रहने को लेकर प्रशासनिक और राजनैतिक हलचलें काफी तेज हो गई हैं।

  • सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी का बड़ा बयान, ऑपरेशन सिंदूर को बताया संयुक्त सैन्य शक्ति और राष्ट्रीय इच्छाशक्ति का प्रतीक

    सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी का बड़ा बयान, ऑपरेशन सिंदूर को बताया संयुक्त सैन्य शक्ति और राष्ट्रीय इच्छाशक्ति का प्रतीक

    नई दिल्ली । भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने ऑपरेशन सिंदूर को लेकर दिए गए अपने बयान में भारत की सैन्य क्षमता, रणनीतिक सोच और बदलते वैश्विक सुरक्षा माहौल पर महत्वपूर्ण संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि आज का समय पारंपरिक युद्धों से आगे बढ़कर हाइब्रिड युद्ध और तेज़ी से बदलते सुरक्षा परिदृश्य का है, जिसमें किसी भी देश की सेना को हर स्थिति में तुरंत और सटीक निर्णय लेने की क्षमता रखनी होती है। उनके अनुसार ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की राष्ट्रीय इच्छाशक्ति को स्पष्ट रूप से दर्शाते हुए यह स्थापित किया है कि उकसावे की स्थिति में देश किस प्रकार दृढ़ और संतुलित प्रतिक्रिया देने में सक्षम है।

    सेना प्रमुख ने कहा कि भारत की सैन्य कार्रवाई केवल ताकत का प्रदर्शन नहीं होती, बल्कि यह रणनीति, अनुशासन और संयुक्तता का परिणाम होती है। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर को तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल का उदाहरण बताया और कहा कि आज की सुरक्षा चुनौतियों का सामना केवल अलग-अलग बलों के प्रयासों से नहीं, बल्कि एकीकृत दृष्टिकोण से ही किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि बदलते समय में सेना की संरचना और कार्यप्रणाली में लगातार सुधार किया जा रहा है ताकि किसी भी चुनौती का सामना अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सके।

    अपने संबोधन के दौरान जनरल द्विवेदी ने भावनात्मक रूप से अपने सैन्य जीवन के अनुभवों को साझा किया और कहा कि वे अपने करियर के अंतिम चरण में खड़े हैं, जबकि नई पीढ़ी अब जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार हो रही है। उन्होंने कहा कि वर्दी भले ही बदलती रहे, लेकिन उसके पीछे छिपे मूल्य, अनुशासन और राष्ट्रसेवा की भावना कभी नहीं बदलती। उन्होंने कैडेट्स को प्रेरित करते हुए कहा कि प्रशिक्षण के दौरान जो सिद्धांत और आदर्श उन्होंने सीखे हैं, वही उनके पूरे जीवन की दिशा तय करेंगे।

    उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कैडेट्स का भी उल्लेख किया जो प्रशिक्षण के बाद अपने-अपने देशों में लौट रहे हैं। उनके अनुसार विभिन्न देशों से आए कैडेट्स यहां एक साझा अनुभव और मूल्यों के साथ जुड़े, जो भविष्य में वैश्विक सैन्य सहयोग और समझ को और मजबूत करेगा। यह कार्यक्रम केवल एक परेड या औपचारिकता नहीं, बल्कि एक साझा सैन्य संस्कृति का प्रतीक है जो सीमाओं से परे जाकर सहयोग की भावना को बढ़ावा देती है।

    सेना प्रमुख ने अंत में कहा कि आज का सुरक्षा वातावरण तीव्र निर्णय, तकनीकी दक्षता और मानसिक दृढ़ता की मांग करता है। ऐसे समय में सेना का हर सदस्य देश की रक्षा के लिए पूरी तरह सक्षम और तैयार रहना चाहिए। उनका यह संदेश न केवल वर्तमान सैन्य व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में देखा जा रहा है।

  • पटना में पीएम मोदी का भव्य रोड शो, गांधी मैदान में 32 मंत्रियों के शपथ ग्रहण से पहले दिखा शक्ति प्रदर्शन

    पटना में पीएम मोदी का भव्य रोड शो, गांधी मैदान में 32 मंत्रियों के शपथ ग्रहण से पहले दिखा शक्ति प्रदर्शन

    नई दिल्ली। /पटना में आज सुबह से ही पूरा राजनीतिक माहौल उत्साह और हलचल से भरा नजर आया। राजधानी की सड़कों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोड शो को लेकर भारी भीड़ उमड़ पड़ी। एयरपोर्ट से गांधी मैदान तक के इस सफर में सड़क के दोनों ओर लोग घंटों खड़े रहे और फूल बरसाकर उनका स्वागत करते दिखे। ढोल-नगाड़ों की आवाज और समर्थकों के नारों ने पूरे शहर को उत्सव के माहौल में बदल दिया।

    प्रधानमंत्री का यह रोड शो केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं बल्कि एक बड़ा राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन माना जा रहा है। जैसे-जैसे उनका काफिला आगे बढ़ा, लोगों का उत्साह और बढ़ता गया। कई जगहों पर भीड़ इतनी अधिक थी कि ट्रैफिक व्यवस्था भी प्रभावित हुई, हालांकि सुरक्षा बल लगातार स्थिति को नियंत्रित करते नजर आए।

    इसी बीच गांधी मैदान में सम्राट चौधरी सरकार के कैबिनेट विस्तार की तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही दिनों बाद यह पहला बड़ा राजनीतिक कदम माना जा रहा है, जिसमें 32 विधायकों को मंत्री पद की शपथ दिलाई जा रही है। इस कैबिनेट में अलग-अलग दलों के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है, जिससे गठबंधन की मजबूती का संदेश देने की कोशिश की जा रही है।

    गांधी मैदान में आयोजित इस समारोह में कई बड़े नेताओं की मौजूदगी ने कार्यक्रम की अहमियत और बढ़ा दी। मंच पर वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति के बीच शपथ ग्रहण समारोह को बेहद भव्य तरीके से आयोजित किया गया है। पूरे क्षेत्र में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं और हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है ताकि कार्यक्रम शांतिपूर्ण तरीके से पूरा हो सके।

    सुबह से ही गांधी मैदान के बाहर कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी। जैसे-जैसे शपथ ग्रहण का समय नजदीक आया, उत्साह और भी बढ़ता गया। समर्थक अपने नेताओं के समर्थन में लगातार नारेबाजी करते दिखे, जिससे पूरा माहौल राजनीतिक ऊर्जा से भर गया।

    रोड शो के दौरान प्रधानमंत्री की एक झलक पाने के लिए लोग लंबे समय तक सड़क किनारे खड़े रहे। जैसे ही उनका काफिला गुजरा, पूरा इलाका तालियों और नारों से गूंज उठा। इस पूरे घटनाक्रम ने पटना को आज पूरी तरह देश की राजनीति का केंद्र बना दिया, जहां शक्ति प्रदर्शन और सत्ता विस्तार एक साथ देखने को मिले।

  • भारतीय राजनीति के 5 सबसे चौंकाने वाले गठबंधन, जब सत्ता के लिए धुर विरोधियों ने मिलाया हाथ

    भारतीय राजनीति के 5 सबसे चौंकाने वाले गठबंधन, जब सत्ता के लिए धुर विरोधियों ने मिलाया हाथ

    नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में स्थायी दोस्ती या स्थायी दुश्मनी जैसी कोई चीज नहीं मानी जाती। यहां समीकरण बदलते देर नहीं लगती और अक्सर वही नेता, जो कल तक एक-दूसरे पर तीखे हमले कर रहे होते हैं, आज सत्ता की जरूरत में साथ खड़े नजर आते हैं। विचारधाराएं पीछे छूट जाती हैं और कुर्सी सबसे आगे आ जाती है। देश के राजनीतिक इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जिन्होंने जनता को हैरान कर दिया।

    1. आम आदमी पार्टी और कांग्रेस: 49 दिन का अनोखा साथ
    दिल्ली की राजनीति में साल 2013 के बाद एक अप्रत्याशित मोड़ आया। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस को सबसे बड़ा विरोधी बनाया था। लेकिन विधानसभा चुनाव में बहुमत से दूर रहने के बाद कांग्रेस के 8 विधायकों के बाहरी समर्थन से केजरीवाल पहली बार मुख्यमंत्री बने। यह गठबंधन ज्यादा दिन नहीं चला और महज 49 दिनों में सरकार गिर गई।

    2. भाजपा और पीडीपी: जम्मू-कश्मीर का अप्रत्याशित मेल
    जम्मू-कश्मीर में 2015 से 2018 तक का समय भी राजनीतिक दृष्टि से बेहद चौंकाने वाला रहा, जब महबूबा मुफ्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई। वैचारिक रूप से दोनों दलों के बीच गहरा अंतर था, लेकिन सत्ता की मजबूरी में यह गठबंधन बना। 2018 में मतभेद बढ़ने पर यह सरकार गिर गई।

    3. नीतीश-लालू की जोड़ी: बिहार की सियासी करवटें
    बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव की साझेदारी और टकराव दोनों ही बार-बार देखने को मिले हैं। एक समय नीतीश ने लालू की राजनीति का विरोध कर अलग राह बनाई, लेकिन 2015 में दोनों ने साथ मिलकर सरकार बनाई। बाद में फिर गठबंधन टूटा और नीतीश ने कई बार राजनीतिक पाला बदला, जिससे यह राज्य गठबंधन राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण बन गया।

    4. महाराष्ट्र में शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी का साथ
    महाराष्ट्र की राजनीति में 2019 के बाद बड़ा उलटफेर हुआ, जब शिवसेना ने वैचारिक रूप से विपरीत मानी जाने वाली कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर महा विकास अघाड़ी सरकार बनाई। दशकों तक बीजेपी के साथ रही शिवसेना का यह कदम राजनीति में बड़ा यू-टर्न माना गया।

    5. उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन
    2019 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने लंबे समय की दुश्मनी भुलाकर गठबंधन किया। दोनों दलों का उद्देश्य भाजपा को रोकना था, हालांकि यह गठबंधन चुनावी सफलता में बड़ा असर नहीं डाल सका, लेकिन राजनीतिक रूप से बेहद चर्चा में रहा।

  • केरल विधानसभा चुनाव 2026: प्रधानमंत्री मोदी करेंगे रोड शो और रैली, राज्य में त्रिकोणीय मुकाबला

    केरल विधानसभा चुनाव 2026: प्रधानमंत्री मोदी करेंगे रोड शो और रैली, राज्य में त्रिकोणीय मुकाबला


    नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम। केरल में विधानसभा चुनाव प्रचार अपने चरम पर है और राजनीतिक हलकों में चुनावी गतिविधियों का शोर हर तरफ सुनाई दे रहा है। रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केरल के पलक्कड़ और त्रिशूर में चुनावी कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। उन्होंने इस मौके पर कहा कि केरल के लोगों के बीच रहने का उन्हें बेसब्री से इंतजार है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा कि आज शाम वह पलक्कड़ में एक रैली को संबोधित करेंगे और उसके बाद त्रिशूर में रोड शो में हिस्सा लेंगे। मोदी ने कहा कि केरल में आम माहौल एनडीए के पक्ष में है और लोग एलडीएफ और यूडीएफ के कुशासन से नाखुश हैं। यह स्पष्ट संदेश है कि भाजपा इस बार केरल में अपनी पैठ मजबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है।

    केरल चुनाव में राजनीतिक दलों ने पूरी ताकत झोंक दी है। राज्य भर में विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रमुख नेता सक्रिय रूप से रैलियों और चुनावी कार्यक्रमों में भाग ले रहे हैं। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने भी रविवार को पलक्कड़ जिले की चार विधानसभा सीटों पर चुनावी कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। यह दिखाता है कि चुनावी माहौल तेज और प्रतिस्पर्धात्मक है।

    इस बार केरल विधानसभा चुनाव में कुल 140 सीटों के लिए चुनाव होने हैं। वोटिंग 9 अप्रैल 2026 को होगी और मतों की गिनती और परिणाम 4 मई 2026 को घोषित किए जाएंगे। केरल विधानसभा का वर्तमान कार्यकाल 23 मई को समाप्त होने वाला है। भारतीय निर्वाचन आयोग की अंतिम मतदाता सूची के अनुसार, इस चुनाव में 2.71 करोड़ मतदाता अपने मत का इस्तेमाल करने के पात्र हैं।

    राजनीतिक विश्लेषक बता रहे हैं कि इस बार केरल में त्रिकोणीय मुकाबला है, जिसमें माकपा के नेतृत्व वाले एलडीएफ, कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ और भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए आमने-सामने हैं। एलडीएफ सत्ता बनाए रखने की चुनौती का सामना कर रहा है, यूडीएफ वापसी की कोशिश में है और भाजपा को पहली बार बड़ी सफलता की उम्मीद है।

    पिछले चुनावों की बात करें तो 2021 में एलडीएफ ने 99 सीटें जीतीं, कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ को 41 सीटें मिलीं और भाजपा को कोई सीट नहीं मिली थी। 2016 में भाजपा ने पहली बार केवल एक सीट जीती थी। इस बार भाजपा की रणनीति और प्रधानमंत्री मोदी की सक्रिय भागीदारी एनडीए की स्थिति मजबूत करने के लिए अहम मानी जा रही है।

    चुनावी माहौल हर तरफ उत्साही है। प्रधानमंत्री मोदी की पलक्कड़ और त्रिशूर की रैलियां राज्य में एनडीए के प्रचार अभियान को और गति देंगी। राजनीतिक दल हर क्षेत्र में मतदाताओं से संवाद कर रहे हैं और जनता के बीच चुनावी मुद्दों पर बहस चल रही है। राज्य में त्रिकोणीय मुकाबले और जनता की बढ़ती भागीदारी के बीच आगामी चुनावों के परिणाम पर सभी की नजर है।

  • विहारः एनडीए को राज्यसभा की पांचवी सीट पर जीत के लिए संख्या बल के साथ जातीय समीकरण की भी परीक्षा

    विहारः एनडीए को राज्यसभा की पांचवी सीट पर जीत के लिए संख्या बल के साथ जातीय समीकरण की भी परीक्षा


    पटना।
    बिहार में पांच सीटों पर हो रहे राज्यसभा का चुनाव 16 मार्च यानि साेमवार काे है। ऐसे में यहां का सियासी पारा रविवार काे काफी चढ़ा रहा। यह चुनाव अब सिर्फ एक संसदीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच प्रतिष्ठा की जंग बन चुकी है। सियासी गलियारों में आज देर शाम तक लगातार बैठकों, रणनीतियों और जोड़-तोड़ की खबरें आ रही हैं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के घटक दलाें के बीच बैठकाें का दाैर आज चलता रहा। भाजपा की काेर कमिटी की बैठके हुई।वहीं राजद के वरिष्ठ नेता लगातार अन्य पाटियाें के विधायकाें से मिलते रहे।

    राजग नेताओं काे वाेट देने कब आना है,कैसे और किसकाे किसके लिए वाेट करना है सहित अन्य बाताें काे समझाया गया। वहीं राष्ट्रीय जनता (राजद) ने अपने समर्थन के विधायकाें काे हाेटल पनाश में ठहराया है। रविवार देर शाम तेजस्वी यादव एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरूल इमान के आवास पर आयोजित दावत-ए-इफ्तार में शामिल हुए।

    राजग जहां अपने संख्या बल के आधार पर चार सीटों पर जीत सुनिश्चित मान रहा है। वहीं पांचवीं सीट को लेकर राजद और राजग दोनों खेमों में रणनीतिक गणित और सियासी जोड़-तोड़ तेज हो गई है।

    बिहार विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं और राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए कम से कम 41 विधायकों के वोट की जरूरत होती है। 202 विधायक होने से राजग खेमे की स्थिति मजबूत है और 4 सीट आसानी से जीत सकते हैं। पांचवीं सीट के लिए 38 विधायकों का समर्थन है ऐसे ओं उन्हें 3 अतिरिक्त विधायकों की जरूरत होगी।

    जबकि विपक्षी खेमे की स्थिति काे देखा जाये ताे राजद के 25 विधायक, कांग्रेस के 6 विधायक, वाम दल के 3 विधायक, आईपीपी के 1 विधायक है। राजद काे 6 विधायकाें की आवश्यकता है। इसके लिए राजद की ओवैसी की पार्टी का समर्थन के लिए सकारात्मक बातचीत हुई है। बसपा के भी एक विधायक का समर्थन पाने की उम्मीद में है।

    एआईएमआईएम के निमंत्रण पर तेजस्वी यादव रविवार की शाम पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरूल इमान के आवास पर आयोजित दावत-ए-इफ्तार में शामिल हुए, जिसके बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया। ऐसी उम्मीद जतायी जा रही है कि ओवैसी के पांचों विधायक कल महागठबंधन के उम्मीदवार के पक्ष में वोट कर सकते हैं। अब देखना है कि कौन सियासी बाजी मारता है? इस प्रकार पांचवीं सीट के लिए मुकाबला दिलचस्प हो गया है।

    बिहार विधानसभा में संख्या बल के साथ साथ यदि राजद और राजग दोनों खेमों में जातीय समीकरण काे देखा जाये ताे एनडीए काे इसके लिए भी खास तैयारी करनी हाेगी। जदयू से उम्मीदवार नीतीश कुमार कुर्मी जाति से आते हैं, जबकि रामनाथ ठाकुर नाई समुदाय से हैं। भाजपा के उम्मीदवार नितिन नवीन कायस्थ जाति से हैं और शिवेश कुमार दलित समाज से आते हैं। वहीं राष्ट्रीय लोक मोर्चा के नेता उपेंद्र कुशवाहा कुशवाहा समुदाय से हैं। ऐसे में राजग के पांच उम्मीदवारों में कोई भी सवर्ण चेहरा नहीं है।

    जबकि राष्ट्रीय जनता (राजद) ने राज्यसभा के लिए एडी सिंह को उम्मीदवार बनाया है, जो जाति से भूमिहार हैं। बिहार विधानसभा में एनडीए के भीतर भी बड़ी संख्या में भूमिहार विधायक हैं। ऐसे में क्रॉस वोटिंगकी आशंका काे राजनीति में पूरी तरह गलत नहीं ठहराया जा सकता। सत्तारूढ़ गठबंधन में यह आशंका जताई जा रही है कि कुछ विधायक स्वजातीय उम्मीदवार होने के कारण राजद उम्मीदवार के पक्ष में क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं।

    जदयू भाजपा दलों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक राजग ने अंदरूनी स्तर पर एक रणनीति बनाई है। इसके तहत जदयू के भूमिहार विधायकों से कहा गया है कि वे नीतीश कुमार को वोट दें, जबकि भाजपा के भूमिहार विधायक नितिन नवीन को वोट करेंगे। माना जा रहा है कि इस रणनीति के जरिए एनडीए क्रॉस वोटिंग की आशंका को कम करना चाहता है।

    पूर्व मंत्री और भाजपा नेता जीवेश मिश्रा ने कहा कि हम लोग बिहार को रफ्तार दे रहे हैं और तेजस्वी यादव इफ्तार में लगे हुए है, यही अंतर हैं हममें और तेजस्वी यादव में। कल राज्यसभा का चुनाव होने वाला है। कल के इलेक्शन में राजग की जीत तय है।

    समाज कल्याण मंत्री मदन सहनी ने कहा कि राजग के सभी उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित है। वोट खराब ना हो इसे लेकर विधायकों को बताया गया है कि कैसे वोटिंग करना है। राजद के होटल पनाश में विधायकाें काे रहने के लिए 40 कमरा बुक कराये जाने पर मदन सहनी ने कहा कि वैसे ही वोट कम रहा है उनका 40 कमरा के बजाय 41 कमरा बुक करते तो कुछ कहा भी जा सकता है।

    तेजस्वी का कहना था कि अख्तरूल इमान के निमंत्रण के बाद आज हम इफ्तार में शामिल होने के लिए पहुंचे थे। कल होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए ओवैसी की पार्टी से हमलोगों ने समर्थन मांगा है। कल के चुनाव में हम सभी सेक्यूलर दल मिलकर भाजपा के लोगों को परास्त करेंगे और चुनाव जीतेंगे।

  • असम विधानसभा चुनाव की तैयारी तेज, NDA में सीट बंटवारे पर 10 मार्च तक अंतिम मुहर

    असम विधानसभा चुनाव की तैयारी तेज, NDA में सीट बंटवारे पर 10 मार्च तक अंतिम मुहर

    गुवाहाटी। असम में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर बातचीत अंतिम चरण में पहुंच गई है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने गठबंधन के फार्मूले को अंतिम रूप देने के लिए नई तारीख 10 मार्च तय की है।
    मुख्यमंत्री ने बताया कि सहयोगी दलों के साथ चर्चा जारी है और कुछ बिंदुओं पर सहमति बननी बाकी है। उन्होंने कहा कि बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ बातचीत एक-दो दिन में पूरी होने की उम्मीद है, जबकि असम गण परिषद के साथ 9–10 मार्च तक सभी मुद्दों पर सहमति बन जाएगी। इसके बाद गठबंधन औपचारिक रूप से सीट बंटवारे की घोषणा करेगा।

    कुछ दलों से सहमति, कुछ से बातचीत जारी
    सरमा के अनुसार, राभा हासोंग जौथा संग्राम समिति के साथ सीटों को लेकर समझौता पहले ही हो चुका है। देरी की एक वजह हाल में हुए राज्यसभा चुनाव भी बताए गए, जिनके कारण सहयोगी दल रणनीतिक रूप से सतर्क रुख अपनाए हुए हैं।

    असम में एनडीए के प्रमुख घटक दलों में
    भारतीय जनता पार्टी
    असम गण परिषद
    यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल
    बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट शामिल हैं।
    इसके अलावा जनशक्ति पार्टी भी गठबंधन का हिस्सा है, हालांकि वर्तमान विधानसभा में उसका प्रतिनिधित्व नहीं है।

    पहले कई बार बदली समयसीमा
    मुख्यमंत्री इससे पहले भी सीट बंटवारे को लेकर अलग-अलग समयसीमाएं घोषित कर चुके थे। फरवरी और जनवरी में भी समझौते की बात कही गई थी, लेकिन अंतिम सहमति टलती रही। अब 10 मार्च को निर्णायक तारीख माना जा रहा है।

    परिसीमन के बाद बदला चुनावी गणित
    2023 के परिसीमन के बाद राज्य के कई निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदली हैं। कुछ सीटें सामान्य से आरक्षित श्रेणी में गई हैं, जबकि कुछ आरक्षित सीटों को सामान्य श्रेणी में परिवर्तित किया गया है। इससे दलों के बीच सीट समायोजन और अधिक जटिल हो गया है।

    वर्तमान विधानसभा की स्थिति
    126 सदस्यीय असम विधानसभा में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है, जबकि उसके सहयोगी दल भी सत्ता संतुलन में अहम भूमिका निभाते हैं। विपक्षी खेमे में

    भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
    ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट
    भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)
    शामिल हैं, जिनके पास सीमित संख्या में विधायक हैं।

    चुनाव से पहले ताकत का संतुलन साधने की कवायद
    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि परिसीमन के बाद बदले सामाजिक और भौगोलिक समीकरणों को देखते हुए एनडीए सहयोगियों के बीच सीटों का संतुलन साधना रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। 10 मार्च की प्रस्तावित घोषणा को राज्य की चुनावी राजनीति का निर्णायक पड़ाव माना जा रहा है।