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  • देशभर में चीनी के दाम में तेज उछाल, उत्तर प्रदेश से महानगरों तक महंगी हुई रोजमर्रा की जरूरत

    देशभर में चीनी के दाम में तेज उछाल, उत्तर प्रदेश से महानगरों तक महंगी हुई रोजमर्रा की जरूरत

    नई दिल्ली ।देशभर में चीनी की कीमतों में लगातार तेजी देखने को मिल रही है। त्योहारों और शादियों के सीजन से पहले रोजमर्रा की इस जरूरी वस्तु के महंगे होने से घरेलू बजट पर दबाव बढ़ने की आशंका है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक साल में करीब 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चीनी के दाम में 10 से 18 रुपये प्रति किलो तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

    चीनी की कीमतों में सबसे अधिक वृद्धि ओडिशा में दर्ज की गई है। 21 अगस्त को यहां चीनी का भाव 64.72 रुपये प्रति किलोग्राम रहा, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में करीब 17.80 रुपये अधिक है। इसके बाद मध्य प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में भी कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।

    देश में चीनी की औसत कीमत फिलहाल करीब 58.23 रुपये प्रति किलोग्राम बताई जा रही है। हालांकि कई राज्यों में खुदरा बाजार का भाव राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर है। असम, दिल्ली, गोवा, केरल, मध्य प्रदेश, मेघालय, पंजाब, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल समेत कई इलाकों में चीनी की कीमत 65 रुपये प्रति किलो या उससे अधिक के स्तर तक पहुंच गई है।

    मध्य प्रदेश में भी चीनी के दाम में तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है। पिछले महीने की समान तारीख की तुलना में राज्य में कीमत करीब 15.70 रुपये प्रति किलोग्राम बढ़ी है। पंजाब में भी लगभग 14.67 रुपये प्रति किलो की वृद्धि दर्ज की गई है। इन बढ़ती कीमतों का असर घरों के साथ-साथ मिठाई, बेकरी और अन्य खाद्य कारोबारों पर भी पड़ सकता है।

    उत्तर प्रदेश में स्थिति विशेष रूप से चर्चा में है। यहां चीनी मिलों से निकलने वाली चीनी का थोक भाव 5,400 से 5,800 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है। थोक बाजार में तेजी का सीधा असर खुदरा कीमतों पर दिखाई दे रहा है और कई स्थानों पर उपभोक्ताओं को चीनी के लिए 65 से 68 रुपये प्रति किलो तक खर्च करना पड़ रहा है।

    दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे बड़े शहरों में भी अच्छी गुणवत्ता वाली चीनी की खुदरा कीमत 65 से 70 रुपये प्रति किलो के आसपास पहुंच गई है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, कुछ महानगरों में एक महीने के भीतर ही चीनी के दाम में 15 से 20 रुपये प्रति किलो तक की बढ़ोतरी हुई है।

    बढ़ती कीमतों के पीछे बाजार में आपूर्ति और मांग से जुड़े कई कारक अहम माने जा रहे हैं। त्योहारों के दौरान मिठाइयों और अन्य खाद्य पदार्थों में चीनी की मांग बढ़ती है। ऐसे में यदि बाजार में उपलब्धता अपेक्षाकृत सीमित रहती है तो कीमतों पर दबाव और बढ़ सकता है।

    सरकार भी चीनी बाजार की स्थिति पर नजर बनाए हुए है और कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। हालांकि खुदरा बाजार में अलग-अलग शहरों और गुणवत्ता के आधार पर वास्तविक कीमत में अंतर हो सकता है।

    वर्तमान स्थिति में दिल्ली में चीनी का खुदरा भाव करीब 60 से 63 रुपये किलो, मुंबई में 65 से 70 रुपये, कोलकाता में 64 से 70 रुपये, पंजाब और ओडिशा में 64 से 65 रुपये, लखनऊ में 65 से 68 रुपये तथा पटना में 65 से 68 रुपये किलो के आसपास बताया गया है। आने वाले दिनों में त्योहारों की मांग और बाजार की आपूर्ति के आधार पर कीमतों में आगे बदलाव देखने को मिल सकता है।

  • मेघालय और ओडिशा की तीन खाद्य कंपनियों पर कार्रवाई, निरीक्षण में स्वच्छता मानकों और खाद्य सुरक्षा नियमों की गंभीर अनदेखी

    मेघालय और ओडिशा की तीन खाद्य कंपनियों पर कार्रवाई, निरीक्षण में स्वच्छता मानकों और खाद्य सुरक्षा नियमों की गंभीर अनदेखी

    नई दिल्ली ।भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तीन खाद्य व्यवसाय संचालकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की है। नियामक ने मेघालय की ए.बी. एंटरप्राइज तथा ओडिशा की जाइका ऑर्गेनिक्स और नारायणी फूड्स एंड बेवरेजेज के खाद्य कारोबार लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिए हैं।

    नियामक के अनुसार इन कंपनियों के खिलाफ निरीक्षण के दौरान खाद्य सुरक्षा नियमों के गंभीर उल्लंघन सामने आए। इनमें भ्रामक स्वास्थ्य संबंधी दावे, खराब स्वच्छता व्यवस्था, अनुचित भंडारण, कीट नियंत्रण की कमियां और खाद्य सुरक्षा प्रबंधन से जुड़ी आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन नहीं करना शामिल है।

    ए.बी. एंटरप्राइज के मामले में उत्पादों के लेबल और प्रचार सामग्री पर स्वास्थ्य लाभ से जुड़े ऐसे दावे पाए गए, जिन्हें खाद्य सुरक्षा एवं मानक विज्ञापन और दावे संबंधी नियमों का उल्लंघन माना गया। जांच में यह भी पाया गया कि कंपनी आवश्यक विनिर्माण स्वीकृति के बिना खाद्य उत्पादों का कारोबार कर रही थी।

    कंपनी को सुधार नोटिस जारी करने के साथ अपना पक्ष रखने के लिए व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर भी दिया गया था। हालांकि, नियामक के मुताबिक कंपनी की ओर से कोई जवाब या स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। इसके बाद खाद्य कारोबार से जुड़ी सभी गतिविधियों को अगले आदेश तक रोकने का निर्देश दिया गया।

    ओडिशा स्थित जाइका ऑर्गेनिक्स के संयंत्र में निरीक्षण के दौरान स्वच्छता और सैनिटेशन से संबंधित कई गंभीर कमियां सामने आईं। खाद्य पदार्थों के निर्माण, पैकेजिंग और भंडारण की परिस्थितियों को निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पाया गया।

    निरीक्षण में खराब हाउसकीपिंग, कीट नियंत्रण की समस्याएं, जंग लगे उपकरण, कच्चे माल और तैयार उत्पादों का अनुचित भंडारण तथा उत्पादन प्रक्रिया में आवश्यक नियंत्रण की कमी पाई गई। कुछ उत्पादों और सामग्रियों पर निर्माण तिथि, बैच नंबर और उपयोग की अंतिम तिथि जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां भी अंकित नहीं थीं।

    अनुपालन मूल्यांकन में जाइका ऑर्गेनिक्स को 90 में से केवल 10 अंक मिले। 12 प्रतिशत के इस स्कोर के आधार पर कंपनी को गैर-अनुपालन श्रेणी में रखा गया। नियामक ने कहा कि ऐसी परिस्थितियां खाद्य पदार्थों में भौतिक, रासायनिक और जैविक जोखिम पैदा कर सकती हैं।

    नारायणी फूड्स एंड बेवरेजेज के उत्पादन परिसर में भी स्वच्छता और खाद्य सुरक्षा प्रबंधन व्यवस्था में गंभीर कमियां पाई गईं। निरीक्षण के दौरान प्रसंस्करण और भंडारण क्षेत्रों में मक्खियां, मकड़ी के जाले, कीटों के प्रवेश के रास्ते और जल स्रोतों के आसपास शैवाल की मौजूदगी दर्ज की गई।

    इसके अलावा जंग लगे उपकरण, खाद्य सामग्री के पास कचरे का जमाव और तैयार उत्पादों के अनुचित भंडारण जैसी कमियां भी सामने आईं। कंपनी के रिकॉर्ड में खाद्य सुरक्षा प्रशिक्षण और नियंत्रण नमूनों से संबंधित आवश्यक दस्तावेजों का भी अभाव पाया गया।

    नारायणी फूड्स एंड बेवरेजेज को अनुपालन मूल्यांकन में 80 में से 20 अंक मिले, यानी कंपनी का स्कोर 25 प्रतिशत रहा। इसे भी गैर-अनुपालन श्रेणी में रखा गया और लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया।

    खाद्य नियामक ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा से किसी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। नियमों का उल्लंघन करने वाले खाद्य कारोबारियों के खिलाफ निरीक्षण और नियामकीय कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी।

  • केंद्रीय मंत्री पद छोड़ने के बाद भी ओडिशा भाजपा में मजबूत पकड़, धर्मेंद्र प्रधान के स्वागत से मिले राजनीतिक संकेत

    केंद्रीय मंत्री पद छोड़ने के बाद भी ओडिशा भाजपा में मजबूत पकड़, धर्मेंद्र प्रधान के स्वागत से मिले राजनीतिक संकेत

    नई दिल्ली । केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद पहली बार ओडिशा पहुंचे वरिष्ठ भाजपा नेता धर्मेंद्र प्रधान का पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं ने जोरदार स्वागत किया। नीट पेपर लीक विवाद के बीच मंत्री पद से उनके इस्तीफे के बाद राज्य की राजनीति में उनकी भूमिका और भविष्य को लेकर लगातार चर्चाएं चल रही हैं। हालांकि ओडिशा में उनके स्वागत और पार्टी कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने संकेत दिया कि संगठन के भीतर उनकी राजनीतिक पकड़ अब भी मजबूत बनी हुई है।

    धर्मेंद्र प्रधान लंबे समय तक केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं और ओडिशा भाजपा के प्रमुख रणनीतिकारों में उनकी पहचान रही है। उनके इस्तीफे के बाद भाजपा के कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से उनका समर्थन व्यक्त किया था। संसद में भी एनडीए के कई सांसदों ने उनका स्वागत कर उनके प्रति सम्मान और समर्थन का संदेश दिया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम संगठन में उनके प्रभाव को दर्शाता है।

    राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि मंत्री पद से हटने के बाद उनकी प्रशासनिक भूमिका भले बदल गई हो, लेकिन संगठनात्मक स्तर पर उनका अनुभव और नेटवर्क भाजपा के लिए अब भी महत्वपूर्ण बना हुआ है। पार्टी के भीतर लंबे समय से सक्रिय रहने के कारण उनकी पकड़ संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच मजबूत मानी जाती है।

    धर्मेंद्र प्रधान का राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरू हुआ था। उनकी सक्रियता अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और संघ परिवार से जुड़ी रही है। उनके पिता देवेंद्र प्रधान भी राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहे और केंद्रीय मंत्री का दायित्व निभा चुके थे। वर्ष 2014 के बाद केंद्र में भाजपा सरकार बनने के साथ धर्मेंद्र प्रधान राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख नेताओं में शामिल हुए और विभिन्न मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली।

    ओडिशा में भाजपा के विस्तार में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। पिछले एक दशक में उन्होंने संगठन को मजबूत करने और राज्य में पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए लगातार काम किया। वर्ष 2017 के स्थानीय निकाय चुनावों तथा 2019 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन को मजबूत करने में उनकी रणनीतिक भूमिका की चर्चा होती रही है। राज्य में लंबे समय तक सत्तारूढ़ रहे राजनीतिक दल के मुकाबले भाजपा को मजबूत विकल्प बनाने के प्रयासों में भी उनका योगदान माना जाता है।

    हालांकि हालिया राजनीतिक घटनाक्रम के बाद यह सवाल भी उठ रहे हैं कि ओडिशा भाजपा में नेतृत्व की भूमिका किस दिशा में आगे बढ़ेगी। राज्य में मौजूदा सरकार और संगठन के बीच समन्वय को लेकर भी राजनीतिक विश्लेषक नजर बनाए हुए हैं। माना जा रहा है कि आने वाले समय में ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकाय चुनाव पार्टी के लिए महत्वपूर्ण होंगे और इन चुनावों में संगठनात्मक रणनीति के लिहाज से धर्मेंद्र प्रधान की भूमिका पर भी ध्यान रहेगा।

    राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि किसी नेता का प्रभाव केवल सरकारी पद से नहीं, बल्कि संगठन में उसकी स्वीकार्यता, कार्यकर्ताओं से जुड़ाव और नेतृत्व क्षमता से भी तय होता है। ओडिशा दौरे के दौरान मिले स्वागत ने यह संकेत दिया है कि धर्मेंद्र प्रधान अभी भी राज्य की भाजपा राजनीति के प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम यह तय करेंगे कि भविष्य में उनकी संगठनात्मक और राजनीतिक भूमिका किस रूप में आगे बढ़ती है।

  • रथ यात्रा के बीच नहीं होगी 'महाप्रभु जगन्नाथ' की रिलीज, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- धार्मिक संवेदनशीलता को देखते हुए इंतजार जरूरी

    रथ यात्रा के बीच नहीं होगी 'महाप्रभु जगन्नाथ' की रिलीज, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- धार्मिक संवेदनशीलता को देखते हुए इंतजार जरूरी

    नई दिल्ली ।भगवान जगन्नाथ के जीवन और उनसे जुड़ी धार्मिक परंपराओं पर आधारित एनिमेटेड फिल्म ‘महाप्रभु जगन्नाथ’ की रिलीज को लेकर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल फिल्म को तत्काल सिनेमाघरों में प्रदर्शित करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुरी में चल रही भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा समाप्त होने के बाद ही फिल्म की रिलीज पर आगे विचार किया जा सकता है। इस फैसले के बाद फिल्म की निर्धारित रिलीज फिलहाल टल गई है।

    फिल्म के निर्माताओं ने ओडिशा हाईकोर्ट के उस अंतरिम आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, जिसमें फिल्म की देशभर में रिलीज पर रोक लगाई गई थी। निर्माता पक्ष का कहना था कि फिल्म पूरी तरह तैयार है, सिनेमाघरों की बुकिंग हो चुकी है और इसे केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से आवश्यक प्रमाणन भी प्राप्त हो चुका है। उनका तर्क था कि तय समय पर रिलीज न होने से आर्थिक नुकसान होने की आशंका है।

    सुनवाई के दौरान निर्माता पक्ष ने अदालत को बताया कि यह एक एनिमेटेड फिल्म है, जिसे विशेष रूप से बच्चों और नई पीढ़ी को भगवान जगन्नाथ की परंपराओं, संस्कृति और धार्मिक विरासत से परिचित कराने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। उनका कहना था कि जिस प्रकार विभिन्न धार्मिक और पौराणिक विषयों पर पहले भी एनिमेशन फिल्में बनाई जाती रही हैं, उसी प्रकार यह फिल्म भी सांस्कृतिक और शैक्षणिक दृष्टि से तैयार की गई है।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि वर्तमान में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा जारी है और इस दौरान धार्मिक भावनाओं से जुड़े विवादों को गंभीरता से देखा जाना चाहिए। अदालत ने संकेत दिया कि रथ यात्रा पूरी होने के बाद फिल्म की रिलीज पर आगे की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। न्यायालय के इस रुख के बाद फिलहाल फिल्म के प्रदर्शन पर लगी रोक प्रभावी बनी हुई है।

    फिल्म को लेकर विवाद की शुरुआत उसके टीजर जारी होने के बाद हुई थी। टीजर सामने आने के बाद कुछ धार्मिक संगठनों और श्रद्धालुओं ने आरोप लगाया कि फिल्म में भगवान जगन्नाथ के स्वरूप और उनसे जुड़ी कुछ परंपराओं को धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप प्रस्तुत नहीं किया गया है। इसी आधार पर फिल्म के कुछ दृश्यों और संवादों पर आपत्ति दर्ज कराई गई।

    बाद में इस मामले में ओडिशा हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने की मांग की गई। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यदि विवादित अंशों के साथ फिल्म प्रदर्शित की गई तो इससे श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाएं प्रभावित हो सकती हैं। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए फिल्म की रिलीज पर रोक लगा दी थी।

    विवाद के बीच फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग पुरी के गजपति महाराजा और श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन के प्रतिनिधियों के समक्ष भी कराई गई। बताया गया कि इस दौरान फिल्म में कुछ आवश्यक बदलावों को लेकर सुझाव दिए गए थे। हालांकि, याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि सभी आवश्यक संशोधन किए बिना ही फिल्म को रिलीज करने की तैयारी की जा रही थी।

    सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद अब फिल्म के निर्माता रथ यात्रा समाप्त होने के बाद आगे की कानूनी प्रक्रिया और संशोधनों के आधार पर अगला कदम उठाएंगे। फिलहाल फिल्म की रिलीज स्थगित रहने से यह मामला धार्मिक आस्था, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सांस्कृतिक प्रस्तुति के बीच संतुलन को लेकर चर्चा का विषय बना हुआ है।

  • मतदाता सूची शुद्धीकरण अभियान का व्यापक असर, ओडिशा सहित चार राज्यों से लाखों नाम हटे, निर्वाचन प्रक्रिया पर बढ़ी राजनीतिक हलचल

    मतदाता सूची शुद्धीकरण अभियान का व्यापक असर, ओडिशा सहित चार राज्यों से लाखों नाम हटे, निर्वाचन प्रक्रिया पर बढ़ी राजनीतिक हलचल

    नई दिल्ली । देश के चार राज्यों में विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण अभियान के बाद मतदाता सूचियों में बड़े स्तर पर बदलाव दर्ज किए गए हैं। ओडिशा, मणिपुर, मिजोरम और सिक्किम में अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद 22 लाख से अधिक नाम सूची से हटाए गए हैं। संशोधित सूची जारी होने के साथ ही राजनीतिक दलों के बीच इस विषय को लेकर चर्चा तेज हो गई है, जबकि निर्वाचन प्राधिकरण का कहना है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह निर्धारित नियमों और सत्यापन के आधार पर पूरी की गई है।

    इस अभियान का सबसे अधिक प्रभाव ओडिशा में देखने को मिला, जहां मतदाता सूची से 21 लाख से अधिक नाम हटाए गए। संशोधन के बाद राज्य में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 3.25 करोड़ रह गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इनमें पुरुष और महिला मतदाताओं की संख्या लगभग संतुलित बनी हुई है तथा मतदाता लिंगानुपात में भी सुधार दर्ज किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि सूची से वे नाम हटाए गए हैं जो सत्यापन के दौरान मृत, स्थानांतरित या दोहराव वाले पाए गए।

    पूर्वोत्तर के राज्यों में भी विशेष पुनरीक्षण का असर दिखाई दिया। मणिपुर में हजारों मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए, जिसके बाद राज्य की संशोधित मतदाता संख्या 20 लाख से अधिक दर्ज की गई। इसी प्रकार मिजोरम में भी व्यापक सत्यापन के बाद हजारों नाम हटाए गए। राज्य की नई मतदाता सूची में बड़ी संख्या में नए युवा मतदाताओं को भी शामिल किया गया है, जिससे चुनावी भागीदारी में नई पीढ़ी की हिस्सेदारी बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।

    देश के सबसे कम आबादी वाले राज्य सिक्किम में भी पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत हजारों नाम सूची से हटाए गए। हालांकि कुल संख्या अन्य राज्यों की तुलना में कम रही, लेकिन निर्वाचन अधिकारियों का कहना है कि उद्देश्य सभी राज्यों में मतदाता सूची को अद्यतन और त्रुटिरहित बनाना था। इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार सत्यापन अभियान चलाया गया और उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर आवश्यक संशोधन किए गए।

    इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के बाद राजनीतिक दलों के बीच विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ विपक्षी दलों ने प्रक्रिया की पारदर्शिता और सत्यापन के मानकों को लेकर सवाल उठाए हैं तथा प्रभावित मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। वहीं निर्वाचन अधिकारियों का कहना है कि प्रत्येक संशोधन विधिक प्रावधानों के अनुरूप किया गया है और केवल उन्हीं नामों को हटाया गया है जो निर्धारित मानकों पर पात्र नहीं पाए गए।

    निर्वाचन प्राधिकरण का मानना है कि समय-समय पर मतदाता सूची का अद्यतन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे मृत, स्थानांतरित और डुप्लिकेट नामों को हटाकर वास्तविक और पात्र मतदाताओं की सूची तैयार की जा सकती है। अधिकारियों के अनुसार, इसका उद्देश्य किसी भी पात्र मतदाता को वंचित करना नहीं, बल्कि मतदाता सूची की शुद्धता और विश्वसनीयता बनाए रखना है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि संशोधित मतदाता सूची का प्रभाव आगामी चुनावों की रणनीतियों पर भी पड़ सकता है। राजनीतिक दल अब नई मतदाता संरचना के आधार पर अपनी चुनावी तैयारियों और बूथ स्तर की रणनीति की समीक्षा कर सकते हैं। आने वाले समय में इस पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर चर्चा जारी रहने की संभावना है, जबकि अंतिम उद्देश्य निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय चुनावी प्रक्रिया सुनिश्चित करना बताया जा रहा है।

  • ओडिशा में एल्युमीनियम क्षेत्र की सबसे बड़ी औद्योगिक पहल, अदाणी ग्रुप और आईएचसी का 1.08 लाख करोड़ रुपये निवेश; हजारों रोजगार और वैश्विक विनिर्माण क्षमता को मिलेगा नया आधार

    ओडिशा में एल्युमीनियम क्षेत्र की सबसे बड़ी औद्योगिक पहल, अदाणी ग्रुप और आईएचसी का 1.08 लाख करोड़ रुपये निवेश; हजारों रोजगार और वैश्विक विनिर्माण क्षमता को मिलेगा नया आधार

    नई दिल्ली । भारत के औद्योगिक विकास को नई दिशा देने वाली एक बड़ी पहल के तहत अदाणी ग्रुप ने अबु धाबी की इंटरनेशनल होल्डिंग कंपनी (आईएचसी) के साथ मिलकर ओडिशा में अत्याधुनिक एल्युमीनियम परियोजना स्थापित करने की घोषणा की है। करीब 11.5 अरब डॉलर यानी लगभग 1.08 लाख करोड़ रुपये के प्रस्तावित निवेश वाली यह परियोजना देश के धातु उद्योग के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक पहलों में शामिल मानी जा रही है। इसके माध्यम से भारत की एल्युमीनियम उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    भुवनेश्वर में आयोजित समझौता हस्ताक्षर कार्यक्रम के दौरान कंपनी की ओर से बताया गया कि यह परियोजना केवल एक औद्योगिक इकाई तक सीमित नहीं होगी, बल्कि पूरी एल्युमीनियम वैल्यू चेन को एकीकृत रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखेगी। इसके तहत कच्चे माल के प्रसंस्करण से लेकर तैयार उत्पादों के निर्माण तक की सभी प्रमुख गतिविधियां एक ही औद्योगिक परिसर में संचालित की जाएंगी। इससे उत्पादन लागत में कमी आने के साथ आपूर्ति श्रृंखला भी अधिक प्रभावी बन सकेगी।

    प्रस्तावित परियोजना में प्रतिवर्ष लगभग 40 लाख टन क्षमता वाली एल्युमिना रिफाइनरी स्थापित की जाएगी, जबकि करीब 20 लाख टन वार्षिक क्षमता वाला एल्युमीनियम स्मेल्टर भी विकसित होगा। इसके अलावा लगभग 10 लाख टन वार्षिक क्षमता वाला डाउनस्ट्रीम एल्युमीनियम पार्क तैयार किया जाएगा, जहां विभिन्न औद्योगिक और उपभोक्ता क्षेत्रों के लिए मूल्यवर्धित एल्युमीनियम उत्पादों का निर्माण किया जाएगा। इससे देश में आयात पर निर्भरता कम होने और निर्यात क्षमता बढ़ने की संभावना है।

    परियोजना के सुचारु संचालन के लिए लगभग 4,000 मेगावाट क्षमता का कैप्टिव पावर सिस्टम विकसित किया जाएगा। इसके साथ ही करीब 400 मेगावाट हरित ऊर्जा का भी उपयोग किया जाएगा, जिससे उत्पादन प्रक्रिया में स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ेगी। यह पहल उद्योग और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    इस निवेश का सबसे बड़ा प्रभाव रोजगार के क्षेत्र में देखने को मिलेगा। निर्माण चरण के दौरान करीब 35 हजार लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने का अनुमान है। वहीं परियोजना के पूर्ण रूप से संचालित होने के बाद लगभग 18,500 स्थायी रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। इसके अतिरिक्त परिवहन, लॉजिस्टिक्स, लघु उद्योग, सेवा क्षेत्र और स्थानीय कारोबार से जुड़े हजारों लोगों को भी आर्थिक गतिविधियों का लाभ मिलने की संभावना है।

    कंपनी का मानना है कि इस परियोजना के माध्यम से केवल एक औद्योगिक संयंत्र का निर्माण नहीं होगा, बल्कि ओडिशा में व्यापक आर्थिक गतिविधियों का नया केंद्र विकसित होगा। इससे स्थानीय उद्यमों को नए बाजार, युवाओं को कौशल आधारित रोजगार और छोटे व्यवसायों को दीर्घकालिक अवसर प्राप्त होंगे। परियोजना के आसपास सहायक उद्योगों के विकसित होने से क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी उल्लेखनीय गति मिलने की उम्मीद है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर एल्युमीनियम की बढ़ती मांग को देखते हुए यह निवेश भारत के धातु उद्योग को नई ऊंचाई प्रदान कर सकता है। एकीकृत उत्पादन मॉडल, आधुनिक तकनीक, ऊर्जा दक्षता और बड़े पैमाने की विनिर्माण क्षमता के कारण यह परियोजना आने वाले वर्षों में भारत को एल्युमीनियम क्षेत्र में वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। साथ ही यह औद्योगिक विकास, रोजगार सृजन और निवेश आकर्षित करने के क्षेत्र में ओडिशा के लिए भी एक नई पहचान बनाने का आधार बनेगी।

  • 19 हजार के लिए टूटी इंसानियत: बहन का कंकाल लेकर बैंक पहुंचा भाई, अब बदली जिंदगी में मिला 15 लाख का सहारा

    19 हजार के लिए टूटी इंसानियत: बहन का कंकाल लेकर बैंक पहुंचा भाई, अब बदली जिंदगी में मिला 15 लाख का सहारा


    नई दिल्ली। ओडिशा के क्योंझर जिले में मानवता को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, जहां 52 वर्षीय जीतू मुंडा अपनी मृत बहन के बैंक खाते से पैसे निकालने के लिए उसका कंकाल लेकर बैंक पहुंच गया। यह घटना दियानाली गांव की है और अब पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है।

    जानकारी के अनुसार, जीतू मुंडा की बड़ी बहन कलरा मुंडा के बैंक खाते में करीब 19,400 रुपए जमा थे। बहन की मौत 26 जनवरी को बीमारी के कारण हो गई थी। परिवार का आरोप है कि उनके पास जीवनयापन का कोई और साधन नहीं था और यही पैसे आखिरी सहारा थे।

    दस्तावेजों की कमी का हवाला देते हुए टाल दिया।
    27 अप्रैल को जब जीतू पैसे निकालने बैंक गया, तो उसके अनुसार बैंक कर्मचारियों ने पहचान और दस्तावेजों की कमी का हवाला देते हुए उसे टाल दिया। इसी दौरान हालात इतने बिगड़ गए कि वह अपनी बहन की कब्र खोदकर उसका कंकाल लेकर बैंक पहुंच गया।

    बैंक परिसर में इस घटना से हड़कंप मच गया और तुरंत पुलिस को सूचना दी गई। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर स्थिति संभाली और जीतू को समझाकर कंकाल को वापस अंतिम संस्कार के लिए भेजा।

    दोनों का जीवन सरकारी सहायता और सीमित आमदनी पर निर्भर
    ग्रामीणों के मुताबिक, जीतू और उसकी बहन बेहद गरीब स्थिति में रहते थे। दोनों का जीवन सरकारी सहायता और सीमित आमदनी पर निर्भर था। बहन की मौत के बाद परिवार पूरी तरह टूट गया था।

    मामला सामने आने के बाद प्रशासन और सामाजिक संगठनों की ओर से जीतू को करीब 15 लाख रुपए की आर्थिक सहायता दी गई है। साथ ही उसके रहने और बुनियादी जरूरतों की व्यवस्था भी की गई है।

    इस घटना ने बैंकिंग व्यवस्था, गरीबी और मानवीय संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां एक तरफ नियमों की जटिलता सामने आई, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक संवेदनहीनता को लेकर भी बहस तेज हो गई है।

    पुलिस और प्रशासन का कहना है कि मामले की जांच की जा रही है और यह भी देखा जा रहा है कि आखिर किस स्तर पर चूक हुई, जिससे एक व्यक्ति को इतनी दर्दनाक स्थिति का सामना करना पड़ा।यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि सिस्टम और इंसानियत दोनों को झकझोर देने वाली सच्चाई बनकर सामने आई है।

  • चैत्र नवरात्रि: मां हिंगुला के चमत्कार से जलती है जगन्नाथ मंदिर की रसोई, निकलती है हिंगुला यात्रा

    चैत्र नवरात्रि: मां हिंगुला के चमत्कार से जलती है जगन्नाथ मंदिर की रसोई, निकलती है हिंगुला यात्रा


    नई दिल्ली। चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर जहां भक्त मां दुर्गा की आराधना में लीन हैं वहीं पूजा में चढ़ाए जाने वाले फलों का भी विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अनार जिसे संस्कृत में दादिमा कहा जाता है माता भगवती को अत्यंत प्रिय फल माना गया है। लाल-लाल दानों से भरा यह फल न केवल आस्था का प्रतीक है बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी किसी वरदान से कम नहीं है।

    धर्म शास्त्रों में अनार को विशेष स्थान दिया गया है। मान्यता है कि सभी फलों में यह देवी को सबसे अधिक प्रिय है और इसे अर्पित करने से सुख-समृद्धि संतान सुख आरोग्य और कर्ज मुक्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। नवरात्रि में अनार चढ़ाने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है जिसे अत्यंत फलदायी माना जाता है।

    अनार की गहरी लाल रंगत शक्ति ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक मानी जाती है। यह रंग मां दुर्गा के शक्तिशाली और रौद्र स्वरूप से भी जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि भक्त नवरात्रि के दौरान विशेष रूप से अनार अर्पित करते हैं ताकि उनके जीवन में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहे। धार्मिक मान्यता यह भी है कि इसे चढ़ाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।

    अनार को अखंड फल भी माना जाता है ठीक वैसे ही जैसे नारियल नई दिल्ली। चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर देशभर में देवी मंदिरों में विशेष तैयारियां की जा रही हैं। इस दौरान मां भगवती के नौ स्वरूपों की पूजा होती है, लेकिन ओडिशा में मां के एक अद्भुत और रहस्यमयी रूप की आराधना की जाती है अग्नि स्वरूप। यह परंपरा जुड़ी है मां हिंगुला मंदिर से, जिसे सिद्धपीठों में विशेष स्थान प्राप्त है।

    ओडिशा के मयूरभंज जिले में स्थित यह मंदिर अपनी भव्यता और आस्था के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर के गर्भगृह में मां हिंगुला की सोने से सजी प्रतिमा विराजमान है, जिनके चारों हाथों में अस्त्र-शस्त्र हैं। नवरात्रि के नौ दिनों तक मां का विशेष श्रृंगार किया जाता है और भक्त दूर-दूर से दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं। खास बात यह है कि यहां मां को अग्नि की देवी के रूप में पूजा जाता है। श्रद्धालु दर्शन के बाद मंदिर परिसर में बने अग्निकुंड में भोग अर्पित करते हैं, जो इस परंपरा को और भी विशेष बनाता है।

    मां हिंगुला का संबंध विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर से भी जुड़ा हुआ है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, पुरी के राजा को भगवान जगन्नाथ ने स्वप्न में आदेश दिया था कि वे मां हिंगुला की पूजा करें, जिससे मंदिर की विशाल रसोई सुचारू रूप से संचालित हो सके। माना जाता है कि मां हिंगुला ही पवित्र अग्नि के रूप में प्रकट होकर जगन्नाथ मंदिर की रसोई में ऊर्जा प्रदान करती हैं। यही कारण है कि यह रसोई आज भी अनूठे ढंग से संचालित होती है और इसे दुनिया की सबसे बड़ी मंदिर रसोइयों में गिना जाता है।

    चैत्र माह में यहां विशेष रूप से हिंगुला यात्रा निकाली जाती है, जो आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम है। यह यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि ओडिशा की समृद्ध लोक संस्कृति का भी प्रतीक है। इस दौरान मंदिर परिसर में भव्य मेला लगता है, जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।

    भक्तों का मानना है कि मां हिंगुला के अग्नि स्वरूप के दर्शन करने से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। यही वजह है कि कई परिवार अपने नवजात बच्चों को पहली बार मां के दर्शन कराने यहां लाते हैं। कुछ श्रद्धालु यहां मुंडन संस्कार भी कराते हैं, जिसे अत्यंत शुभ माना जाता है।

    चैत्र नवरात्रि के दौरान मां हिंगुला का यह पावन धाम आस्था, चमत्कार और संस्कृति का जीवंत केंद्र बन जाता है। यहां देवी की अग्नि स्वरूप में पूजा और उससे जुड़ी मान्यताएं न केवल भक्तों की श्रद्धा को मजबूत करती हैं, बल्कि भारतीय परंपराओं की विविधता और गहराई को भी दर्शाती हैं। श्रीफल का धार्मिक महत्व है। कई भक्त इसे विशेष रूप से कर्ज से मुक्ति और परिवार की खुशहाली के लिए माता को अर्पित करते हैं। पूजा-पाठ के साथ-साथ यह फल परिवार के स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी माना जाता है।

    अगर आयुर्वेद की दृष्टि से देखें तो अनार औषधीय गुणों से भरपूर होता है। प्राचीन ग्रंथों विशेषकर 12वीं शताब्दी के संस्कृत ग्रंथ मानसोल्लास में इसे पवित्र और स्वास्थ्यवर्धक बताया गया है। यह फल रक्त शुद्ध करने एनीमिया यानी खून की कमी दूर करने पाचन तंत्र को मजबूत बनाने और हृदय रोगों से बचाव में सहायक माना जाता है।

    अनार में भरपूर मात्रा में विटामिन C एंटीऑक्सीडेंट फाइबर और पोटैशियम पाए जाते हैं जो इम्युनिटी बढ़ाने में मदद करते हैं। गर्मी के मौसम में यह शरीर को ठंडक प्रदान करता है और त्वचा को स्वस्थ बनाए रखता है। अनार का जूस पीने से शरीर में नई ऊर्जा आती है और थकान दूर होती है।

    इस तरह अनार केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं बल्कि स्वास्थ्य का भी महत्वपूर्ण स्रोत है। नवरात्रि के इस पावन पर्व पर इसे अर्पित करना जहां आध्यात्मिक लाभ देता है वहीं इसका सेवन शरीर को स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखने में भी मदद करता है।

  • Odisha: दो हादसों में 5 स्कूली छात्रों की तालाब में डूबने से मौत

    Odisha: दो हादसों में 5 स्कूली छात्रों की तालाब में डूबने से मौत


    भुवनेश्वर।
    ओडिशा (Odisha) के कोरापुट और मयूरभंज जिलों (Koraput and Mayurbhanj districts) में शनिवार को अलग-अलग घटनाओं में पांच स्कूली छात्रों (Five School Students) की डूबने से मौत हो गई। इन दुखद घटनाओं ने राज्य को झकझोर कर रख दिया है, और घटनाओं पर बीजू जनता दल (बीजद) और विपक्षी कांग्रेस ने गहरा शोक व्यक्त किया है।


    कोरापुट में तीन छात्रों की दर्दनाक मौत

    कोरापुट जिले में, कोलंब तालाब में कक्षा 10 के तीन छात्रों की डूबने से मौत हो गई। ये छात्र अपने स्कूल से निकले थे और कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षाएं खत्म होने के बाद अपने माता-पिता के आने का इंतजार कर रहे थे। परीक्षा पूरी होने की खुशी में वे पानी में खेलने चले गए, जहां वे डूब गए। स्थानीय लोगों ने छात्रों को बचाने की कोशिश की और उन्हें कोरापुट के शहीद लक्ष्मण नायक मेडिकल कॉलेज और अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

    पुलिस के अनुसार, यह घटना दोपहर 3 बजे से 3:30 बजे के बीच हुई। मरने वाले छात्रों की पहचान लिंगराज खिल (16), स्वस्तिक (15) और ओम प्रकाश (16) के रूप में हुई है। मृतकों के परिवार वालों ने स्कूल प्रबंधन पर लापरवाही का आरोप लगाया है और घटना की जांच की मांग की है।


    मयूरभंज में दो बालिकाओं की डूबने से मौत

    मयूरभंज जिले में एक अन्य घटना में, कप्तपाड़ा पुलिस स्टेशन क्षेत्र के नछीपुर गांव के पास एक तालाब में नहाते समय दूसरी कक्षा में पढ़ने वाली दो बालिकाओं की डूबने से मौत हो गई। सात वर्षीय सुभाषसंध्या नायक और आठ वर्षीय राजलक्ष्मी संखुआल, स्कूल से लौटने के बाद तालाब में नहाने गई थीं। जब परिवार वालों को घटना का पता चला, तो वे तुरंत तालाब की ओर भागे और दोनों बालिकाओं को बाहर निकाला। उन्हें कप्तपाड़ा अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।


    राजनीतिक पार्टियों ने दी प्रतिक्रिया

    इन घटनाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए, बीजद अध्यक्ष नवीन पटनायक ने ट्वीट कर दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा, ‘कोरापुट नवोदय विद्यालय के तीन छात्रों के तालाब में डूबने से हुई मौत की खबर दिल दहला देने वाली है। मैं दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना करता हूं। मैं शोक संतप्त परिवारों और प्रियजनों के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करता हूं, क्योंकि वे इस दुखद समय का सामना कर रहे हैं।’

    ओडिशा प्रदेश कांग्रेस कमेटी (ओपीसीसी) के अध्यक्ष भक्त चरण दास ने भी सोशल मीडिया पर अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं। उन्होंने कहा, ‘कोरापुट के कोलंब जलाशय में डूबने से नवोदय विद्यालय के तीन छात्रों की दुखद मृत्यु से मैं बहुत आहत हूं। मैं शोक संतप्त परिवारों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदना व्यक्त करता हूं। ईश्वर उन्हें इस अपूरणीय क्षति को सहने की शक्ति प्रदान करे।’

  • होली 2026: राजस्थान से बिहार तक, मालपुआ से मिठास का त्योहार

    होली 2026: राजस्थान से बिहार तक, मालपुआ से मिठास का त्योहार


    नई दिल्ली । होली का त्योहार रंगों और मस्ती के साथ साथ स्वाद और पारंपरिक व्यंजनों का भी अवसर है। फाल्गुन के महीने में घरों में गुजिया ठंडाई दही भल्ले और तरह तरह के पकवान बनने लगते हैं लेकिन होली पर एक खास मिठाई है जो पूरे भारत में लोकप्रिय है मालपुआ। यह पारंपरिक मिठाई हर राज्य में अलग अंदाज में बनाई जाती है लेकिन स्वाद में हर जगह लाजवाब होती है। कहीं इसे दूध और खोये से बनाया जाता है तो कहीं गुड़ से। भारत में कई राज्यों में होली और मालपुआ का रिश्ता बहुत पुराना है और बिना मालपुआ के होली अधूरी मानी जाती है।

    राजस्थान रबड़ी वाला शाही मालपुआ

    राजस्थान में मालपुआ को खासतौर पर रबड़ी के साथ तैयार किया जाता है। इसके लिए मैदा खोया और दूध मिलाकर गाढ़ा बैटर तैयार किया जाता है फिर इसमें इलायची और सौंफ डालकर स्वाद बढ़ाया जाता है। बैटर को घी में गोल आकार में तलकर चीनी की चाशनी में डुबोया जाता है और ऊपर से ठंडी रबड़ी डालकर मेहमानों को परोसा जाता है। यह शाही अंदाज इसे खास बनाता है।

    बिहार केला मालपुआ

    बिहार में मालपुआ का स्वाद थोड़ी अलग दिशा में जाता है। यहाँ केले का इस्तेमाल किया जाता है और यह अक्सर बिना चाशनी के ही खाया जाता है। पके केले मैदा खोया और दूध का बैटर बनाकर घी में तलने पर यह नरम और खुशबूदार मालपुआ तैयार होता है।

    मथुरा पारंपरिक मालपुआ

    मथुरा में होली का रंग और स्वाद दोनों खास होते हैं। यहाँ मालपुआ मैदा और सूजी से बनाया जाता है। बैटर तैयार करने के लिए मैदा सूजी और दूध मिलाकर घी में तला जाता है और हल्की चाशनी में डुबोकर परोसा जाता है। इसका स्वाद ज्यादा मीठा नहीं होता लेकिन पारंपरिक लुत्फ देता है।

    ओडिशा अंपुआ

    ओडिशा में मालपुआ को अंपुआ कहा जाता है। यहाँ चावल के आटे और नारियल के साथ गुड़ मिलाकर बैटर तैयार किया जाता है। तेल में तलकर बनाई गई अंपुआ हल्की मीठी और बेहद स्वादिष्ट होती है।

    झारखंड होली पर घर घर में मालपुआ

    झारखंड में भी होली पर मालपुआ बनती है और इसकी रेसिपी बिहार से काफी मिलती जुलती है। घर घर में इसे बनाया जाता है और त्योहार की मिठास को बढ़ाता है।इस तरह होली 2026 पर राजस्थान बिहार मथुरा ओडिशा और झारखंड में मालपुआ का अपना अलग महत्व है। यह सिर्फ मिठाई नहीं बल्कि त्योहार की रंगीन यादों और पारंपरिक स्वाद का प्रतीक है। चाहे आप शाही रबड़ी वाला मालपुआ पसंद करें या केले वाला हर प्रकार में इसका स्वाद लाजवाब और होली के जश्न को और खास बना देता है।