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  • ताश के पत्तों की तरह ढह रहा विपक्ष का किला… राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत के करीब BJP

    ताश के पत्तों की तरह ढह रहा विपक्ष का किला… राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत के करीब BJP


    नई दिल्ली।
    दो साल पहले हुए लोकसभा चुनावों (Lok Sabha elections) में भाजपा (BJP) के नेतृत्व वाले एनडीए (NDA) को कड़ी टक्कर देने वाला विपक्षी इंडिया (INDIA) गठबंधन आज अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। आंतरिक कलह, हालिया चुनावी हार और घटक दलों के पाला बदलने के कारण लोकसभा में विपक्ष का आंकड़ा 200 के नीचे गिरने की कगार पर पहुंच गया है। विपक्ष के रणनीतिकारों को डर है कि इस बिखराव के बाद संसद के भीतर सरकार के विधायी और राजनीतिक एजेंडे को चुनौती देने की विपक्ष की बची-कुची क्षमता भी पूरी तरह खत्म हो जाएगी।

    संसद के भीतर इंडिया गठबंधन (India Alliance) का किला ताश के पत्तों की तरह ढहता नजर आ रहा है। 22 सांसदों वाली डीएमके और 3 सांसदों वाली आम आदमी पार्टी (AAP) ने हाल ही में इंडिया का साथ छोड़ दिया। इससे इंडिया गठबंधन की लोकसभा में ताकत 2024 के 234 से घटकर पहले ही 209 पर आ चुकी है। अब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 29 लोकसभा सांसदों में से दो-तिहाई के बागी होने की खबरों ने विपक्ष की नींद उड़ा दी है। अगर ऐसा होता है तो विपक्षी गठबंधन का आंकड़ा 190 के भी नीचे चला जाएगा।


    भाजपा की नजर पूर्ण बहुमत पर

    विपक्ष के इस पतन से उत्साहित होकर भाजपा लोकसभा में अपने दम पर साधारण बहुमत 272 का आंकड़ा पार करने की रणनीति बना रही है। फिलहाल भाजपा के यहां 240 सांसद हैं। अगर टीएमसी के सांसदों का विलय हो जाता है तो भाजपा का यह आंकड़ा बहुमत के काफी करीब पहुंच जाएगा। वहीं, संकट सिर्फ लोकसभा तक सीमित नहीं है। राज्यसभा में भी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसदों के बीच विभाजन की पूरी संभावना है। हाल ही में आम आदमी पार्टी में भी यह देखा गया। इन बदलते समीकरणों के कारण राज्यसभा में भी एनडीए दो-तिहाई बहुमत के बेहद करीब पहुंच रहा है।

    इंडिया गठबंधन के कुछ पदाधिकारियों को डर है कि इस मजबूती से उत्साहित होकर सत्तारूढ़ गठबंधन (NDA) विपक्ष के अन्य कमजोर या असंतुष्ट धड़ों को भी अपने पाले में लाने के लिए प्रेरित हो सकता है।


    महिला आरक्षण और परिसीमन बिल की वापसी तय

    दोनों सदनों में सरकार का विधायी रास्ता पूरी तरह साफ होने के बाद अब यह माना जा रहा है कि मोदी सरकार अपने कई महत्वाकांक्षी और लंबित विधेयकों को तेजी से आगे बढ़ाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब यह केवल समय की बात है कि सरकार महिला आरक्षण में संशोधन विधेयक और परिसीमन बिल को दोबारा संसद में पेश कर पास करा लेगी, जिन्हें पिछले सत्र में इंडिया गठबंधन ने एकजुट होकर रोक दिया था।


    हार का सिंड्रोम और कांग्रेस पर आरोप

    सोमवार को हुई इंडिया गठबंधन की बैठक में जमकर आरोप-प्रत्यारोप और घोर निराशा का माहौल देखा गया। विपक्षी नेताओं का यह गुस्सा और हताशा लगातार मिली चुनावी शिकस्त का नतीजा है। 2024 के आम चुनाव के बाद विपक्ष को हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी में करारी हार का सामना करना पड़ा है। इस राजनीतिक कुप्रबंधन के चलते क्षेत्रीय दलों खासकर TMC, RJD, DMK, शिवसेना-UBT, एनसीपी-शरदचंद्र पवार, आप और लेफ्ट का कांग्रेस के नेतृत्व की क्षमता पर से भरोसा उठ गया है।


    अब सिर्फ 6 राज्यों में बची INDIA की सत्ता

    लगातार मिली हार के बाद अब ‘इंडिया’ गठबंधन का शासन देश के गिने-चुने राज्यों में ही सिमट कर रह गया है। उत्तर भारत में जम्मू-कश्मीर, झारखंड और हिमाचल प्रदेश में विपक्ष की सरकार है। वहीं, दक्षिण भारत में कर्नाटक, तेलंगाना और केरल में कांग्रेस सत्ता में है।

  • विपक्षी एकता दिखाने की फिर से तैयारी…. दिल्ली में महाबैठक करेगा INDIA' गठबंधन

    विपक्षी एकता दिखाने की फिर से तैयारी…. दिल्ली में महाबैठक करेगा INDIA' गठबंधन


    नई दिल्ली।
    केंद्र सरकार (Central Government) को घेरने और विपक्षी एकता (Opposition unity) दिखाने के लिए ‘INDI’ गठबंधन दिल्ली में महाबैठक (General Meeting) करने जा रहा है। जानकारी के मुताबिक 8 जून को यह बैठक हो सकती है। इसमें केंद्र की मोदी सरकार की नीतियों का विरोध करने के लिए संयुक्त रणनीति पर चर्चा होनी है। बैठक में करीब 15 विपक्षी दलों के प्रतिनिधि भाग ले सकते हैं।


    ममता बनर्जी भी हो सकती हैं शामिल

    जानकारी के मुताबिक हाल के चुनाव में बंगाल में टीएमसी और तमिलनाडु में डीएमके की हार की समीक्षा और आगे की रणनीति पर चर्चा करने के लिए यह बैठक बुलाई गई है। सूत्रों ने बताया कि बैठक में कांग्रेस नेता राहुल गांधी, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, शिवसेना (UBT) नेता उद्धव ठाकरे और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव आदि के भाग लेने की उम्मीद है।

    बता दें कि पश्चिम बंगाल की हार के बाद ममता बनर्जी की टीएमसी भी बड़े संकट का सामना कर रही है। सूत्रों का कहना है कि टीएमसी के अंदर विरोध काफी तेज हो गया है और टीएमसी के कई बड़े नेता बीजेपी का दामन थाम सकते हैं। उधर पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी पर हमला हो गया जिसको लेकर ममता बनर्जी केंद्र पर आक्रामक हैं। वहीं खबरें यहां तक आ रही हैं कि पार्टी में ममता बनर्जी के कद पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।


    राहुल गांधी बोले- रीति और नीति को प्रसारित करें

    राहुल गांधी ने एक दिन पहले ही पार्टी संगठन को सर्वोपरि बताते हुए कहा कि कार्यकर्ताओं को पार्टी की रीति और नीति को जन-जन तक पहुंचाना है। गांधी सोमवार को कांग्रेस की ओर से अजमेर के पुष्कर स्थित तिलोरा में आयोजित 10 दिवसीय सृजन संगठन चिंतन शिविर के समापन पर कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने शिविर में जिला अध्यक्षों को संगठन के प्रति निष्ठा और एकजुटता का संदेश दिया। उन्होंने जिला अध्यक्षों को स्पष्ट कहा कि संगठन से सर्वोपरि कुछ भी नहीं है। पार्टी की रीति-नीति आम जनता के बीच प्रसारित कर कांग्रेस को और मजबूत किया जाए।

    शिविर को सफल बताते हुए कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा कि संगठन सृजन अभियान के साथ चिंतन शिविर से कांग्रेस के कार्यकर्ता में एक नया जोश पैदा होगा और नयी जिम्मेदारी के साथ कांग्रेस कार्यकर्ता जब पार्टी की रीति के साथ जब सड़कों पर उतरकर जनता के बीच जाएगा तो जनता का मत और समर्थन कांग्रेस को प्राप्त होगा। यही इस शिविर का मूल उद्देश्य भी है।

  • सोना खरीदने और ईंधन खपत कम करने की अपील पर विवाद, व्यापारियों और विपक्ष ने उठाए सवाल

    सोना खरीदने और ईंधन खपत कम करने की अपील पर विवाद, व्यापारियों और विपक्ष ने उठाए सवाल


    नई दिल्ली । देश में हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से संसाधनों के सीमित उपयोग और सोना-चांदी की खरीदारी को लेकर की गई अपील के बाद राजनीतिक और आर्थिक हलकों में बहस तेज हो गई है। इस बयान के बाद जहां विपक्षी दलों ने सरकार की आर्थिक स्थिति और नीतियों पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं, वहीं सराफा व्यापार से जुड़े संगठनों ने भी इसे लेकर अपनी चिंता खुलकर जाहिर की है।

    प्रधानमंत्री द्वारा लगातार दो दिनों तक पेट्रोल-डीजल के सीमित इस्तेमाल और अनावश्यक खर्च से बचने की अपील को कई लोग एहतियाती कदम मान रहे हैं, लेकिन व्यापारिक वर्ग का कहना है कि इस तरह की सार्वजनिक अपीलों का सीधा असर बाजार की गतिविधियों और लोगों की खरीदारी की मानसिकता पर पड़ता है। खासकर ज्वेलरी उद्योग से जुड़े कारोबारियों का मानना है कि सोना-चांदी की खरीद को लेकर पैदा हुई आशंका बाजार में मंदी ला सकती है।

    राजनीतिक मोर्चे पर भी इस मुद्दे ने तेजी से तूल पकड़ लिया है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार ने इस पूरे मामले पर केंद्र सरकार से सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है। उनका कहना है कि जब राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा हो रही हो, तो सभी राजनीतिक दलों को विश्वास में लिया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जनता के बीच अचानक इस तरह की अपीलें आने से असमंजस की स्थिति पैदा होती है और इसका असर आम लोगों के साथ-साथ व्यापारियों पर भी पड़ता है।

    वहीं, सराफा व्यापार से जुड़े संगठनों ने भी सरकार के रुख पर नाराज़गी जाहिर की है। व्यापारिक प्रतिनिधियों का कहना है कि देशभर में लाखों परिवार इस उद्योग पर निर्भर हैं और यदि बाजार में खरीदारी कम होती है, तो इसका असर सीधे रोजगार और छोटे कारोबारियों की आय पर पड़ेगा। उनका मानना है कि किसी भी बड़े फैसले या सार्वजनिक संदेश से पहले उद्योग जगत के प्रतिनिधियों से चर्चा की जानी चाहिए थी।

    व्यापारियों का यह भी कहना है कि ज्वेलरी सेक्टर केवल व्यापार का माध्यम नहीं, बल्कि देश की पारंपरिक अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। शादी-विवाह और सामाजिक आयोजनों में सोना-चांदी की खरीदारी लंबे समय से भारतीय समाज का हिस्सा रही है, इसलिए इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अनिश्चितता बाजार की गति को प्रभावित कर सकती है।

    इस मुद्दे पर विपक्ष के अन्य नेताओं ने भी सरकार को घेरने की कोशिश की है। उनका कहना है कि यदि जनता से बार-बार त्याग और खर्च कम करने की अपील की जा रही है, तो यह देश की आर्थिक चुनौतियों की ओर इशारा करता है। विपक्ष ने इसे आम लोगों पर मानसिक दबाव बनाने वाला कदम बताया है।

    हालांकि, सरकार की ओर से इन तमाम आशंकाओं को खारिज किया गया है। केंद्रीय स्तर पर यह स्पष्ट किया गया कि देश में तेल और गैस का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है और किसी प्रकार की कमी की स्थिति नहीं है। सरकार का कहना है कि नागरिकों से केवल संसाधनों के जिम्मेदार और विवेकपूर्ण उपयोग की अपील की गई है, ताकि ऊर्जा संरक्षण को बढ़ावा दिया जा सके।

    फिलहाल, इस मुद्दे ने राजनीतिक बहस के साथ-साथ व्यापारिक जगत में भी नई चिंता पैदा कर दी है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस पर आगे क्या रुख अपनाती है और बाजार में इसका क्या प्रभाव देखने को मिलता है।

  • शिक्षकों ने अपनी मांगों को लेकर भोपाल में किया प्रदर्शन, TET अनिवार्यता का विरोध, बड़े आंदोलन की चेतावनी

    शिक्षकों ने अपनी मांगों को लेकर भोपाल में किया प्रदर्शन, TET अनिवार्यता का विरोध, बड़े आंदोलन की चेतावनी


    भोपाल । मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में शनिवार को शिक्षकों ने अपनी मांगों को लेकर बड़ा प्रदर्शन किया। अध्यापक शिक्षक संयुक्त मोर्चा के आह्वान पर आयोजित इस आंदोलन में प्रदेशभर से बड़ी संख्या में शिक्षक शामिल हुए। शिक्षकों ने एमपी नगर एसडीएम को ज्ञापन सौंपा।

    दशहरा मैदान में जुटी भारी भीड़

    भोपाल के भेल स्थित दशहरा मैदान में आयोजित मुख्यमंत्री अनुरोध यात्रा के तहत अलग-अलग जिलों से आए करीब 50 हजार से अधिक शिक्षकों ने हिस्सा लिया। भारी भीड़ के चलते पंडाल छोटा पड़ गया, जिससे कई शिक्षकों को पेड़ों की छांव में बैठना पड़ा।

    TET अनिवार्यता पर जताया विरोध
    संयुक्त मोर्चा के पदाधिकारियों ने शिक्षक पात्रता परीक्षा को अनिवार्य किए जाने का विरोध किया। उनका कहना है कि जो शिक्षक पहले से सेवा में हैं, उनसे दोबारा परीक्षा दिलवाना अनुचित है। उन्होंने मांग की कि यदि सरकार परीक्षा लेना चाहती है तो शिक्षकों को तैयारी के लिए पर्याप्त समय दिया जाए और उन्हें अन्य कार्यों, जैसे जनगणना, में न लगाया जाए।
    भोपाल । मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में शनिवार को शिक्षकों ने अपनी मांगों को लेकर बड़ा प्रदर्शन किया। अध्यापक शिक्षक संयुक्त मोर्चा के आह्वान पर आयोजित इस आंदोलन में प्रदेशभर से बड़ी संख्या में शिक्षक शामिल हुए। शिक्षकों ने एमपी नगर एसडीएम को ज्ञापन सौंपा।

    दशहरा मैदान में जुटी भारी भीड़

    भोपाल के भेल स्थित दशहरा मैदान में आयोजित मुख्यमंत्री अनुरोध यात्रा के तहत अलग-अलग जिलों से आए करीब 50 हजार से अधिक शिक्षकों ने हिस्सा लिया। भारी भीड़ के चलते पंडाल छोटा पड़ गया, जिससे कई शिक्षकों को पेड़ों की छांव में बैठना पड़ा।

    TET अनिवार्यता पर जताया विरोध
    संयुक्त मोर्चा के पदाधिकारियों ने शिक्षक पात्रता परीक्षा को अनिवार्य किए जाने का विरोध किया। उनका कहना है कि जो शिक्षक पहले से सेवा में हैं, उनसे दोबारा परीक्षा दिलवाना अनुचित है। उन्होंने मांग की कि यदि सरकार परीक्षा लेना चाहती है तो शिक्षकों को तैयारी के लिए पर्याप्त समय दिया जाए और उन्हें अन्य कार्यों, जैसे जनगणना, में न लगाया जाए।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बढ़ी चिंता 
    शिक्षकों का दावा है कि हालिया सुप्रीम कोर्ट के आदेश से 90 से 95 प्रतिशत शिक्षक प्रभावित हुए हैं, खासकर वे जो पहले अध्यापक संवर्ग में थे और बाद में शिक्षक बने। उनका कहना है कि लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों पर नई शर्तें लागू करना न्यायसंगत नहीं है।

    सेवा गणना और पेंशन को लेकर नाराजगी

    संयुक्त मोर्चा ने आरोप लगाया कि सरकार नियुक्ति की मूल तारीख से सेवा की गणना नहीं कर रही, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान हो रहा है। साथ ही TET अनिवार्यता से भविष्य में पेंशन और ग्रेच्युटी पर भी असर पड़ने की आशंका जताई गई। शिक्षकों ने आखिर में एमपी नगर एसडीएम एल.के खरे को ज्ञापन सौंपा और अपनी मांगों पर जल्द फैसला लेने की अपील की। इसके साथ ही दिन भर चला यह बड़ा प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से समाप्त हो गया।

    जून में बड़े आंदोलन की चेतावनी

    अध्यापक संघ के अध्यक्ष भरत पटेल ने साफ कहा कि यदि सरकार ने मांगों पर जल्द निर्णय नहीं लिया, तो जून में राज्यव्यापी बड़ा आंदोलन किया जाएगा। बता दें कि इससे पहले 8 अप्रैल को जिला स्तर और 11 अप्रैल को ब्लॉक स्तर पर भी प्रदर्शन किए जा चुके हैं। उसी क्रम में भोपाल में यह राज्य स्तरीय आंदोलन आयोजित किया गया।

    शिक्षकों का दावा है कि हालिया सुप्रीम कोर्ट के आदेश से 90 से 95 प्रतिशत शिक्षक प्रभावित हुए हैं, खासकर वे जो पहले अध्यापक संवर्ग में थे और बाद में शिक्षक बने। उनका कहना है कि लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों पर नई शर्तें लागू करना न्यायसंगत नहीं है।

    सेवा गणना और पेंशन को लेकर नाराजगी

    संयुक्त मोर्चा ने आरोप लगाया कि सरकार नियुक्ति की मूल तारीख से सेवा की गणना नहीं कर रही, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान हो रहा है। साथ ही TET अनिवार्यता से भविष्य में पेंशन और ग्रेच्युटी पर भी असर पड़ने की आशंका जताई गई। शिक्षकों ने आखिर में एमपी नगर एसडीएम एल.के खरे को ज्ञापन सौंपा और अपनी मांगों पर जल्द फैसला लेने की अपील की। इसके साथ ही दिन भर चला यह बड़ा प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से समाप्त हो गया।

    जून में बड़े आंदोलन की चेतावनी

    अध्यापक संघ के अध्यक्ष भरत पटेल ने साफ कहा कि यदि सरकार ने मांगों पर जल्द निर्णय नहीं लिया, तो जून में राज्यव्यापी बड़ा आंदोलन किया जाएगा। बता दें कि इससे पहले 8 अप्रैल को जिला स्तर और 11 अप्रैल को ब्लॉक स्तर पर भी प्रदर्शन किए जा चुके हैं। उसी क्रम में भोपाल में यह राज्य स्तरीय आंदोलन आयोजित किया गया।

  • महिला आरक्षण बिल का विरोध…. अमित शाह के राजनीतिक दांव में उलझी अखिलेश की रणनीति!

    महिला आरक्षण बिल का विरोध…. अमित शाह के राजनीतिक दांव में उलझी अखिलेश की रणनीति!


    नई दिल्ली।
    शतरंज हो या राजनीति, चाल संभलकर खेलनी होती है. अमित शाह (Amit Shah) को भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) का ‘चाणक्य’ माना जाता है, वहीं अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में मजबूत प्रदर्शन करके दिखा दिया कि वह राजनीति के कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं. यह बात भी दीगर है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में इंडिया गठबंधन ने संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने के नैरेटिव के जरिए जीत हासिल की थी, लेकिन राजनीति में काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है. अब बारी थी अमित शाह की. सरकार ने लोकसभा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम (Women Empowerment Act) से जुड़े तीन बिल पेश किए. मकसद था कि महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33 फीसदी आरक्षण दिया जाए, लेकिन सारे विपक्षी दलों ने विरोध कर दिया और आखिरकार बिल लोकसभा में गिर गया।


    लोकसभा में गिरा बिल, अब क्या करेगी सरकार?

    सदन में संविधान (131वां) संशोधन विधेयक, 2026 पर मतदान हुआ. मतदान में बिल के समर्थन में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े. लोकसभा में किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है. जब महिला आरक्षण बिल लोकसभा में गिर गया, तो परिसीमन विधेयक, 2026 और संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 को सरकार ने आगे नहीं बढ़ाया. अब सवाल है कि क्या सरकार लोकसभा और राज्यसभा दोनों का संयुक्त सत्र बुलाकर बिल पास कराएगी, हालांकि सरकार ने यह साफ नहीं किया है।


    महिला आरक्षण बिल के विरोध में सपा

    महिला आरक्षण बिल पर सपा के मुखिया अखिलेश यादव अपने पिता स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के पदचिन्हों पर चल रहे हैं. चाहे सत्ता में रहे हों या बाहर, वे महिला आरक्षण बिल में भी आरक्षण की मांग करते रहे, लेकिन कोई भी सरकार आरक्षण में आरक्षण देने को तैयार नहीं थी. 1996 में एच. डी. देवगौड़ा की सरकार में यह बिल पेश किया गया, लेकिन सरकारें आती-जाती रहीं और बिल पास नहीं हुआ. यह बिल इंद्र कुमार गुजराल की सरकार से होते हुए अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार तक पहुंचा, लेकिन बात सदन में मारपीट तक पहुंच गई. वाजपेयी सरकार के दौरान समाजवादी पार्टी के सांसदों ने इसे सदन में फाड़ डाला. बिल पेश करने पर कानून मंत्री थंबी दोरई की कमीज भी फाड़ दी गई थी. फिर यह बिल मनमोहन सिंह की सरकार में आया। उस समय आरजेडी सरकार का हिस्सा थी, तो समाजवादी पार्टी बाहर से समर्थन कर रही थी, लेकिन बिल का विरोध जारी रहा. हालांकि यह बिल राज्यसभा में पास हुआ, लेकिन लोकसभा में फंस गया।


    अखिलेश यादव क्यों करते हैं विरोध

    सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस बिल पर चर्चा करते हुए कहा कि बीजेपी ‘नारी’ को नारा बनाने की कोशिश कर रही है. उन्होंने यह भी कहा कि वे बिल के समर्थन में हैं, लेकिन सरकार की इस जल्दबाजी के पीछे छिपी साजिश का विरोध करते हैं. अखिलेश की मांग थी कि ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं को इस बिल में आरक्षण दिया जाए, जबकि अमित शाह ने जवाब दिया कि संविधान में मुस्लिमों के लिए कोई आरक्षण का प्रावधान नहीं है. वहीं अखिलेश का आरोप था कि सरकार जाति जनगणना से बचना चाहती है, तो अमित शाह ने जवाब दिया कि इस जनगणना में जाति जनगणना भी होगी. इस पर सपा के धर्मेंद्र यादव ने कहा कि जनगणना में जाति का कॉलम नहीं है. अमित शाह ने जवाब दिया कि आदमी की जाति होती है, घर की जाति नहीं होती है. अभी घरों की गणना हो रही है, उसके बाद लोगों की गणना होगी, जिसमें जाति भी शामिल रहेगी।


    आगे कुआं, पीछे खाई

    देश बदल रहा है, लोगों की आकांक्षाएं बदल रही हैं. खासकर महिलाएं शिक्षा से लेकर हर क्षेत्र में बेहतर कर रही हैं. इसकी भनक अखिलेश यादव को है. उनके शासनकाल में जो कानून-व्यवस्था का हाल हुआ था, उसका खामियाजा वे करीब 10 साल से भुगत रहे हैं. योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में हत्याएं, बलात्कार, दहेज के मामले और एसिड अटैक के मामलों में कमी आई है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक, 2016 में यूपी में हत्याएं 4889 थीं, जो 2023 में घटकर 3307 हो गईं. 2016 में बलात्कार की घटनाएं 4816 थीं, जो 2023 में घटकर 3556 हो गई हैं. 2016 में दहेज हत्याएं 2473 थीं, जो 2023 में घटकर 2141 हो गई हैं. महिलाओं पर एसिड फेंकने के मामले 57 थे, जो 2023 में 31 हो गए हैं. 2016 में महिलाओं के शील भंग (लज्जा भंग की कोशिश) के मामले 11335 थे, जो 2023 में घटकर 9549 हो गए हैं.

    एक तरफ अखिलेश के शासनकाल के आंकड़े हैं, तो दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ के कानून-व्यवस्था का इकबाल है कि जनसंख्या बढ़ने के बावजूद अपराध घट रहे हैं. इस बात का अहसास अखिलेश को है, लेकिन अगर वे इस बिल का समर्थन करते, तो पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के वोटर नाराज हो सकते थे. वहीं अब बिल का विरोध करने पर 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी उन्हें “महिला विरोधी” बताकर घेर सकती है.


    महिलाओं पर मुलायम की बातों की गूंज

    भले मुलायम सिंह यादव नहीं रहे, लेकिन महिलाओं पर उनके बयान अभी तक प्रदेश की जनता भूली नहीं है. लोकसभा 2014 के दौरान अप्रैल में मुरादाबाद की एक रैली में उन्होंने कहा था, ‘क्या बलात्कार के मामले में फांसी की सजा दी जानी चाहिए? वे लड़के हैं, उनसे गलतियां हो जाती हैं.’ इसी बिल की चर्चा के दौरान बीजेपी सांसद कंगना रनौत ने भी मुलायम सिंह के पुराने बयान का जिक्र करते हुए सपा के धर्मेंद्र यादव को जवाब दिया. कंगना का कहना था कि मुलायम सिंह ने कहा था कि यह कानून नौजवानों को संसद में सीटी बजाने के लिए उकसाएगा. मुलायम सिंह ने ये भी कहा था कि महिला आरक्षण बिल के मौजूदा स्वरूप से सिर्फ बड़े घरों और शहरों की लड़कियों को फायदा मिलेगा. हमारे गांव की गरीब महिलाएं ज्यादा आकर्षक नहीं होतीं. ये सारी बातें जनता के संज्ञान में हैं.


    अखिलेश की चुनौतियां

    अखिलेश यादव को यह भी डर सता रहा है कि परिसीमन से उत्तर प्रदेश की राजनीति का गणित और केमिस्ट्री बदल सकती है. परिसीमन से यूपी में 120 से ज्यादा सीटें हो सकती हैं. इससे कहीं बीजेपी को फायदा न हो जाए. हालांकि, अखिलेश यादव बड़ी चालाकी से राजनीति कर रहे हैं. पीडीए का फॉर्मूला लोकसभा चुनाव में चल गया. इंडिया गठबंधन ने 80 में से 43 सीटें जीतकर यह बता दिया कि लोकतंत्र में कोई भी सत्ता स्थायी नहीं होती और जनमत जब करवट लेता है, तो मजबूत से मजबूत राजनीतिक दीवारें ढह जाती हैं. यह भी ध्यान देने वाली बात है कि मुलायम सिंह यादव अपने राजनीतिक जीवन में कभी भी अपने बलबूते पर 36 सीटें नहीं जीत पाए थे, जो अखिलेश ने जीतकर दिखा दिया. हालांकि, लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा उपचुनाव में सपा को करारी हार का सामना करना पड़ा. लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी लगातार झारखंड को छोड़कर महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और बिहार के चुनाव जीत चुकी है. मतलब संविधान खत्म करने और आरक्षण खत्म करने का मुद्दा फिलहाल ठंडा पड़ चुका है जो कि सिर्फ यूपी में ही चल पाया.


    अखिलेश की अग्नि परीक्षा

    भले ही अखिलेश और विपक्ष के विरोध से बिल संसद में गिर गया है, लेकिन इसका एक जोखिम भी है. शहरी और महिला वोटर्स के एक हिस्से में नकारात्मक संदेश गया है. सत्ता पक्ष अब उन्हें “महिला विरोधी” बताकर हमला करेगा. वहीं अखिलेश यह बताने की कोशिश करेंगे कि उन्होंने पीडीए के हक के लिए बिल का विरोध किया. मतलब महिला आरक्षण बिल की दोधारी तलवार पर अखिलेश चल रहे हैं. जरा सी चूक हुई, तो इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. लेकिन अगर चालाकी से चले, तो फायदा भी हो सकता है. वहीं महिलाओं के लिए नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ सरकार के कामों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. जनधन योजना, शौचालय, मुफ्त सिलेंडर, किसान सम्मान निधि और प्रदेश में अपराध को लेकर जीरो टॉलरेंस, खासकर एंटी रोमियो स्क्वॉड. अब समय ही तय करेगा कि महिला आरक्षण बिल का विरोध अखिलेश के लिए राजनीतिक जोखिम साबित होता है या रणनीतिक बढ़त।

  • विपक्ष ने दिया BJP को बड़ा चुनावी मुद्दा… LS में पास नहीं होने दिया महिला आरक्षण बिल

    विपक्ष ने दिया BJP को बड़ा चुनावी मुद्दा… LS में पास नहीं होने दिया महिला आरक्षण बिल


    नई दिल्ली।
    महिला आरक्षण विधेयक (Women’s Reservation Bill) के खिलाफ 230 विपक्षी सांसदों (Opposition MPs) ने वोट किया. लोकसभा (Lok Sabha) में बिल पास नहीं हो सका. इसका असर समझें. भाजपा अब खुल कर कह सकेगी कि हमने महिला हित में अपने प्रयास में कोई कोताही नहीं की. विपक्ष ने ही साथ नहीं दिया. नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने तो यहां तक कहा था कि क्रेडिट भले ले लीजिए, लेकिन इसे पास होने दीजिए. यानी भाजपा अब हमलावर होगी तो विपक्ष बचाव की मुद्रा में रहेगा. विपक्ष कैसे महिलाओं को समझा पाएगा, यह तो विपक्षी रणनीतिकार ही बता पाएंगे. पर, पहली नजर में विपक्ष इस मुद्दे पर फंसा नजर आता है।


    महिलाएं हित-अहित समझती हैं

    महिलाएं अब 50 साल पहले वाली नहीं रहीं. शिक्षित होने के साथ ही वे हर क्षेत्र में पुरुषों की बराबरी कर रही हैं. इसे ऐसे समझें। 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र की कामकाजी (रोजगार + स्वरोजगार) महिलाओं की संख्या लगभग 20 करोड़ (200 मिलियन) के आसपास है, (PLFS 2023-24 के अनुसार). यह संख्या महिलाओं की करीब 50-52 प्रतिशत आबादी में से है. जाहिर है कि कामकाजी महिलाएं थोड़ी-बहुत शिक्षित तो होंगी ही .उन्हें महिला हित-अहित की समझ भी होगी।


    महिलाएं नाराज हो सकती हैं

    अब जरा इन आंकड़ों पर गौर फरमाएं. 2024 के लोकसभा चुनाव में कुल वोट पड़े थे 64,64,20,869 (लगभग 64.64 करोड़). NDA और INDIA गठबंधन के बीच वोटों का अंतर 1,49,57,501 यानी करीब 1.5 करोड़ का था. NDA को 28,26,68,733 (43.80 प्रतिशत) वोट मिले थे एनडीए ने 293 सीटें जीतीं. विपक्षी दलों के गठबंधन INDIA को 2,67,71,1,232 (41.48 प्रतिशत) वोट मिले. सफलता मिली 234 पर. भाजपा की सीटें 2024 में घट गईं तो उसने ऐसे ही तरीके खोज कर सुधार की कोशिशें शुरू कर दीं।

    भाजपा का योजना बद्ध एक्शन

    2024 और अभी की स्थितियों में कोई बड़ा फर्क नहीं आया है. सिवा इसके कि भाजपा 2814 और 2019 के मुकाबले 2024 में कमजोर पड़ी, लेकिन उसके बाद हुए राज्यों के चुनाव में भाजपा और उसके नेतृत्व में बना एनडीए लगातार जीतता रहा है. एनडीए की लीडर भाजपा ने अपनी कमजोरी खोज कर 2019 से आगे निकलने की रणनीति पर काम कर रही है. विपक्ष अपवाद छोड़ कर आदतन इसे बढ़ाने के बजाय घटाने की जुगत में ही लगा है।

    भाजपा महिला बिल को भुनाएगी

    करीब 4 दशक पहले से ही महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण की चर्चा चल रही है. किसी को अपने हित और हक की बात समझने के लिए इतना वक्त कम नहीं होता. बिल पेश होने के पहले से ही भाजपा यह संदेश गांव-गांव तक पहुंचाने के अभियान में लग गई है. अब तो वह महिलाओं को यह कह सकेगी कि उसने तो पूरी कोशिश की, पर विपक्ष ने ही पानी फेर दिया. जहां 1.5 करोड़ के अंतर से एनडीए की सरकार बन गई वहां 20-21 करोड़ कामकाजी महिलाओं में 10 प्रतिशत को भी भाजपा ने अपने प्रभाव में ले लिया तो विपक्ष की परेशानी बढ़ सकती है।

    महिलाएं आरक्षण समझती हैं

    महिलाएं परिसीमन नहीं समझतीं. पुरुषों की तरह ही उन्हें भी सिर्फ इतनी ही समझ है कि इधर-उधर से कांट-छांट कर एमपी-एमएलए की सीट बढ़ जाएंगी. बहुसंख्यक महिलाओं को सियासी दांव-पेंच से क्या मतलब! अलबत्ता वे इसे अधिक समझेंगी कि आरक्षण बिल पास हो जाने पर सैकड़ा 33 महिलाएं विधानसभा और लोकसभा में बढ़ जातीं. 543 सीटों वाली लोकसभा में अभी 74 (13.6 प्रतिशत) महिला सांसद हैं. महिला आरक्षण बिल पास हो जाने पर यह संख्या दोगुनी से अधिक होने की बाध्यता रहती .विपक्ष ने रोड़ा अंटका दिया।

    महिलाओं की ताकत सभी जानते

    विपक्ष महिलाओं की ताकत से अनजान नहीं है. बिहार में नीतीश कुमार के साथ महिलाओं की ताकत का एहसास सभी राजनीतिक दलों को है. जेडीयू की साथी भाजपा भी महिलाओं में उतनी पैठ नहीं बना पाई है. नीतीश ने 2005 से ही महिला वोट बैंक तैयार किया है. यह वोट बैंक इतना मजबूत है कि 2024 के संसदीय चुनाव में जब बड़े-बड़े विश्लेषक और चुनावी पंडित मात खा गए. प्रशांत किशोर भी मात खा गए. जेडीयू में कुछ दिन रहने के बावजूद उन्हें यह भान नहीं हुआ कि नीतीश की असली ताकत आधी आबादी यानी महिलाएं हैं. वे जेडीयू के 5 सीटों पर सिमट जाने की शर्त लगाने लगे. उनके बुढ़ापे का मज़ाक़ उड़ाया जाने लगा. विपक्ष उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से बीमार बनाता-बताता रहा. इसके बावजूद नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने भाजपा से कम पर लड़ कर भाजपा के बराबर लोकसभा की 12 सीटें जीत लीं।


    राज्यों में दिखी महिलाओं की शक्ति

    दिल्ली, हरियाणा महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बंगाल और झारखंड के बाद बिहार में भी विधानसभा चुनाव के दौरान महिलाओं की मिली अहमियत उनकी ताकत का इजहार करती है. सबने महिलाओं पर ही दांव लगाया. महिलाओं ने जिन पर ज्यादा भरोसा किया, उन्होंने बाजी मारी ली. बीजेपी ने भी फ्री बीज की रणनीति अपना ली. भाजपा-एनडीए शासित राज्यों में फ्री बीज से एंटी इनकम्बैंसी को प्रो इनकम्बैंसी बदल दिया. ममता और हेमंत सोरेन महिलाओं की बदौलत ही कामयाब हो पाए. नुकसान की समझ होते हुए भी विपक्ष ने यह मौका गंवा दिया.


    भाजपा के जाल में उलझा विपक्ष

    भाजपा ने बड़े कायदे से महिला आरक्षण के मुद्दे को भुना लिया. जानिए, कैसे भुनाया. भाजपा जानती थी कि यह बिल इतने विवादों में रहा है कि इसका पास होना आठवां आश्चर्य ही होगा. दूसरे कि भाजपा अपनी 2/3 बहुमत न होने की सच्चाई से भी वाकिफ थी .फिर भी बिल पेश कर दिया और इसे सियासी इवेंट बना दिया. विपक्ष भाजपा की इस चाल को समझ नहीं पाया. भाजपा और मोदी विरोध के नाम पर विपक्ष ने बिल का विरोध कर एक जरूरी काम को नकार दिया। विपक्ष का दांव उल्टा पड़ गया.

  • लोकसभा में विपक्ष को झटका… ओम बिरला को अध्यक्ष पद से हटाने का प्रस्ताव हुआ खारिज

    लोकसभा में विपक्ष को झटका… ओम बिरला को अध्यक्ष पद से हटाने का प्रस्ताव हुआ खारिज


    नई दिल्ली।
    ओम बिरला (Om Birla) को स्पीकर पद (Speaker Post) से हटाने का प्रस्ताव बुधवार को लोकसभा (Lok Sabha) में ध्वनिमत से खारिज हो गया, जिससे विपक्ष (Opposition) को झटका लगा है। विपक्ष के विरोध और नारेबाजी के बीच, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) से माफी की मांग की गई थी, चेयर पर बैठे जगदंबिका पाल ने घोषणा की कि अविश्वास प्रस्ताव खारिज हो गया है। पाल ने विपक्ष से अपनी सीटों पर बैठने का आग्रह किया ताकि वह प्रस्ताव पर वोटिंग करा सकें। लेकिन विरोध जारी रहने पर, उन्होंने सदन से वोटिंग की मांग की और प्रस्ताव को वॉइस वोट से खारिज कर दिया गया, जिसके बाद उन्होंने सदन को दिन भर के लिए स्थगित कर दिया। इससे पहले, गृह मंत्री ने बिरला को स्पीकर पद से हटाने का प्रस्ताव लाने के लिए विपक्ष पर निशाना साधा।

    विपक्ष ने शाह की कुछ बातों पर आपत्ति जताई और नारे लगाने लगे, कार्यवाही में बाधा डाली और उनसे माफी की मांग की। दो दिन तक चली बहस का जवाब देते हुए शाह ने कहा कि सदन अपने नियमों से चलेगा, किसी पार्टी के नियमों से नहीं। उन्होंने कहा, “यह कोई आम बात नहीं है, क्योंकि लगभग चार दशकों के बाद स्पीकर के खिलाफ ऐसा मोशन लाया गया है।” गृह मंत्री ने कहा कि पार्लियामेंट्री पॉलिटिक्स के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ विपक्षी पार्टियां स्पीकर की ईमानदारी पर सवाल उठा रही हैं। शाह ने कहा कि भाजपा सबसे लंबे समय तक विपक्ष में रही है, लेकिन पार्टी ने कभी किसी स्पीकर के खिलाफ नो-कॉन्फिडेंस मोशन नहीं लाया।

    उन्होंने कहा, “इस सदन के स्थापित इतिहास के अनुसार, इसकी कार्यवाही आपसी विश्वास के आधार पर चलती है। स्पीकर एक न्यूट्रल कस्टोडियन के रूप में काम करते हैं, जो रूलिंग पार्टी और विपक्ष दोनों को रिप्रेजेंट करते हैं। पार्लियामेंट्री पॉलिटिक्स के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव आया है।” शाह ने कहा कि विपक्ष ने बिरला की ईमानदारी पर सवाल उठाए और कहा कि यह देश की डेमोक्रेटिक प्रक्रियाओं पर सवाल उठाने जैसा है। बहस के पूरे समय के दौरान बिरला सदन में मौजूद नहीं थे।


    बिरला के खिलाफ प्रस्ताव अफसोसजनक: शाह

    गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ संकल्प लाने को लेकर विपक्ष पर निशाना साधते हुए बुधवार को कहा कि विपक्षी दलों ने बिरला की निष्ठा पर सवाल खड़े किए हैं, जो बहुत अफसोसजनक है। उन्होंने सदन में विपक्ष के संकल्प पर चर्चा का जवाब देते हुए यह भी कहा कि किसी को भी नियम के विपरीत बोलने का अधिकार नहीं है। शाह ने कहा कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी दावा करते हैं कि उन्हें सदन में बोलने नहीं दिया जाता, जबकि ”वह खुद बोलना नहीं चाहते।” उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में सरकार द्वारा लाए गए विधेयकों का उल्लेख करते हुए कहा कि नेता प्रतिपक्ष ने विधेयकों पर चर्चा में भाग नहीं लिया। उन्होंने दावा किया कि वह (राहुल) पिछले साल शीतकालीन सत्र के दौरान जर्मनी की यात्रा पर थे। शाह ने कहा, ”जब-जब महत्वपूर्ण सत्र होता है, उनका विदेश दौरा होता है। जब आप विदेश में हैं तो आप कैसे बोलेंगे। यहां वीडियो कांफ्रेंस का प्रावधान नहीं है। अगर ऐसा प्रावधान होता तो उन्हें बोलने का मौका दे देते।”

  • MP के पुलिस ट्रेनिंग केंद्रों में अब ‘दक्षिणामूर्ति स्तोत्र’ से होगी दिन की शुरुआत, विपक्ष ने उठाए सवाल

    MP के पुलिस ट्रेनिंग केंद्रों में अब ‘दक्षिणामूर्ति स्तोत्र’ से होगी दिन की शुरुआत, विपक्ष ने उठाए सवाल


    भोपाल।
    मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के पुलिस प्रशिक्षण केंद्रों (Police Training Centres) में अब दिन की शुरुआत ‘श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्र’ के पाठ से होगी। पुलिस प्रशिक्षण विंग के इस नए निर्देश के बाद राज्य में एक बार फिर सियासी विवाद खड़ा हो गया है। विपक्ष ने इसे सरकारी संस्थानों की निष्पक्षता से जोड़ते हुए सवाल उठाए हैं, जबकि सत्तारूढ़ बीजेपी (BJP) ने इसे भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बताते हुए इसका बचाव किया है।

    दरअसल, पुलिस प्रशिक्षण विंग के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक राजा बाबू सिंह ने राज्य के सभी पुलिस प्रशिक्षण स्कूलों (PTS) को निर्देश जारी किया है कि हर दिन प्रशिक्षण शुरू होने से पहले परिसर में लगे लाउडस्पीकरों के जरिए ‘श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्र’ बजाया जाए, ताकि प्रशिक्षक और भर्ती दोनों इसे सुन सकें।


    एडीजी ने बताई वजह

    एडीजी ने कहा कि दक्षिणामूर्ति को ज्ञान और विवेक का प्रतीक माना जाता है। उनके मुताबिक, एक पुलिस अधिकारी के लिए केवल जानकारी होना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे विवेक, संवेदनशीलता और सहानुभूति भी होनी चाहिए। उनका मानना है कि स्तोत्र के माध्यम से प्रशिक्षुओं में नैतिक स्पष्टता और जिम्मेदारी की भावना विकसित होगी।


    पहले भी हो चुका है ऐसा निर्देश

    दरअसल, यह पहली बार नहीं है जब पुलिस प्रशिक्षण में धार्मिक या दार्शनिक ग्रंथों को शामिल किया गया हो। पिछले साल भी विभाग ने आठ पुलिस प्रशिक्षण स्कूलों में रात के ध्यान सत्र से पहले भागवद गीता का एक अध्याय पढ़ने का सुझाव दिया था। इससे पहले प्रशिक्षुओं को रामचरितमानस के दोहे पढ़ने के लिए भी कहा गया था। अधिकारियों का कहना था कि इससे लगभग 4000 प्रशिक्षुओं में अनुशासन और नैतिक सोच को बढ़ावा मिलेगा।


    कांग्रेस ने उठाए सवाल

    नए आदेश के बाद कांग्रेस ने आपत्ति जताई है। पार्टी के प्रवक्ता भूपेंद्र गुप्ता ने कहा कि कानून व्यवस्था संभालने वाली संस्थाओं को पूरी तरह तटस्थ होना चाहिए और किसी एक आस्था से जुड़ी परंपरा को बढ़ावा देना ठीक नहीं है।


    बीजेपी का पलटवार

    भाजपा ने इस पहल का बचाव किया है। पार्टी के प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि गीता या दक्षिणामूर्ति स्तोत्र जैसे ग्रंथ सांप्रदायिक नहीं बल्कि ज्ञान, अनुशासन और कर्तव्य की शिक्षाएं देते हैं। उनके मुताबिक, इन्हें सांप्रदायिक बताना भारत की सभ्यतागत परंपरा को न समझने जैसा है।

    पुलिस विभाग के कुछ अधिकारियों का कहना है कि प्रशिक्षण कार्यक्रम में पहले से ही योग, ध्यान और मानसिक अनुशासन शामिल हैं और यह पहल उसी का हिस्सा है। उनका दावा है कि इसका उद्देश्य धार्मिक अभ्यास लागू करना नहीं बल्कि नैतिक सोच और संवेदनशीलता को मजबूत करना है। हालांकि, इस निर्देश के बाद एक बार फिर मध्य प्रदेश की पुलिस ट्रेनिंग व्यवस्था सियासी बहस के केंद्र में आ गई है, जहां सांस्कृतिक परंपरा और संस्थागत तटस्थता को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही है।

  • एमपी विधानसभा बजट सत्र की शुरुआत हंगामेदार, विपक्ष ने राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान किया हंगामा

    एमपी विधानसभा बजट सत्र की शुरुआत हंगामेदार, विपक्ष ने राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान किया हंगामा


    भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा का बजट सत्र सोमवार से हंगामेदार रहा। सत्र की शुरुआत में संपूर्ण छह छंदों में “वंदे मातरम्” का गायन हुआ, इसके बाद राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने अपना अभिभाषण प्रस्तुत किया। अभिभाषण के दौरान विपक्ष ने हंगामा किया, जिससे कार्यवाही अगले दिन तक स्थगित कर दी गई।
    राज्यपाल ने अपने संबोधन में सरकार की विकास उपलब्धियों, जनकल्याणकारी योजनाओं और संकल्प पत्र 2023 में किए गए वादों के तहत अब तक हुए कार्यों तथा आगामी लक्ष्यों की जानकारी दी। साथ ही सदन में विभिन्न हस्तियों और नेताओं के निधन पर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। संसद भवन पहुंचने पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने राज्यपाल का स्वागत किया।

    अभिभाषण और हंगामा
    राज्यपाल ने अपने भाषण में देश की वर्तमान स्थिति को “अमृत काल” बताया और उद्योगों के अनुकूल वातावरण, भोपाल में हुई ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट, वर्ष 2047 तक मध्यप्रदेश की 2 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य, 2026 को कृषि वर्ष के रूप में मनाने, पीएम जनमन योजना के तहत 1.35 लाख आवास निर्माण, उज्जैन में शिप्रा नदी को प्रदूषण मुक्त करने और नई शिक्षा नीति के तहत किए गए कार्यों का उल्लेख किया।

    इसी दौरान नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि नल-जल योजना और इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों का मुद्दा अभिभाषण में शामिल नहीं किया गया। इसके बाद विपक्ष ने नारेबाजी शुरू कर दी। हंगामे के बीच राज्यपाल ने अपना अभिभाषण जारी रखा।

    राज्यपाल के सदन से जाने के बाद कार्यवाही पुनः शुरू हुई, जहां विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि जो हिस्सा पढ़ा नहीं जा सका, उसे पढ़ा हुआ माना जाएगा। इसके बाद सदन की कार्यवाही अगले दिन तक स्थगित कर दी गई।

    सत्र का विस्तृत कार्यक्रम
    बजट सत्र 16 फरवरी से 6 मार्च तक चलेगा। पहले दिन राज्यपाल का अभिभाषण हुआ। इस सत्र में कुल 3478 प्रश्न, 236 ध्यानाकर्षण, 10 स्थगन प्रस्ताव, 41 अशासकीय संकल्प और शून्यकाल में 83 सवाल विधानसभा में प्रस्तुत किए जाएंगे।

  • उमंग सिंघार का बड़ा आरोप सिंगरौली में AI फोटो से फर्जी मनरेगा मजदूर भुगतान मामले में उच्चस्तरीय जांच की मांग

    उमंग सिंघार का बड़ा आरोप सिंगरौली में AI फोटो से फर्जी मनरेगा मजदूर भुगतान मामले में उच्चस्तरीय जांच की मांग


    सिंगरौली /विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सिंगरौली जिले में मनरेगा योजना के तहत चल रहे फर्जीवाड़े को लेकर भाजपा सरकार पर निशाना साधा है। सिंघार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर ट्वीट कर आरोप लगाया कि AI जनरेटेड फर्जी मजदूरों की तस्वीरें अपलोड कर उनके नाम पर भुगतान किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इसमें कमीशन की मांग भी शामिल है और सरकारी धन का दुरुपयोग हो रहा है।

    सिंघार ने कहा कि सिंगरौली में 120 से अधिक मजदूरों के नाम AI द्वारा बनाई गई फर्जी तस्वीरों के माध्यम से भुगतान किया गया है। इसके बावजूद अब तक किसी जिम्मेदार अधिकारी पर ठोस कार्रवाई नहीं की गई। नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि जी-रामजी योजना का उद्देश्य मजदूरों के सम्मान और उनकी आर्थिक सुरक्षा होना चाहिए न कि सरकारी धन की लूट का साधन। उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मामले का संज्ञान लेकर उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराने तथा दोषी अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने की मांग की।

    सिंघार ने अपने ट्वीट में यह भी कहा कि भाजपा केवल नाम बदलने की राजनीति कर रही है जबकि योजनाओं के धरातलीय कार्यान्वयन में भ्रष्टाचार हो रहा है और गरीब मजदूरों के हक को मारा जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे मामले न केवल योजनाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं बल्कि आम नागरिकों में सरकार और प्रशासन के प्रति असंतोष बढ़ाते हैं।

    नेता प्रतिपक्ष ने इस अवसर पर चंदेरी की घटना को भी लेकर सरकार पर निशाना साधा। अशोकनगर जिले के चंदेरी में भाजपा नेता और सरपंच द्वारा एक युवक की कथित पिटाई का वीडियो साझा करते हुए उन्होंने इसे कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल बताया। सिंघार ने कहा कि सत्ता से जुड़े लोग जब कानून हाथ में ले लेते हैं तो आम नागरिक कैसे सुरक्षित रह सकता है। उन्होंने इसे सत्ता का दुरुपयोग और प्रशासन की विफलता करार दिया।

    सिंघार ने कहा कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह न केवल फर्जीवाड़ों की जांच करे बल्कि कानून के उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करे। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ऐसे मामलों को नजरअंदाज किया गया तो समाज में कानून और व्यवस्था पर विश्वास कमजोर होगा और भ्रष्टाचार और गुंडाराज बढ़ेगा।

    इस पूरे मामले ने प्रदेश में भाजपा सरकार के कार्यान्वयन और प्रशासनिक नियंत्रण पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्षी दल लगातार ऐसे मामलों को उजागर कर जनता और सरकार का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार दोषियों पर कार्रवाई करती है या इन फर्जीवाड़ों और हिंसक घटनाओं को अनदेखा करती रहती है।