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  • राज्यसभा की 37 सीटें दांव पर… BJP-कांग्रेस को फायदा तो घाटे में कौन?

    राज्यसभा की 37 सीटें दांव पर… BJP-कांग्रेस को फायदा तो घाटे में कौन?


    नई दिल्ली । देश के 10 राज्यों की 37 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव का ऐलान हो गया है. निर्वाचन आयोग के मुताबिक 26 फरवरी से 5 मार्च तक नामांकन दाखिल किए जाएंगे. 16 मार्च को सुबह 9 बजे से शाम पांच बजे तक मतदान होगा और उसी दिन देर शाम तक नतीजे घोषित कर दिए जाएंगे. बीजेपी और कांग्रेस दोनों सियासी की ताकत राज्यसभा में बढ़ जाएगी तो फिर किसके सियासी घाटा होगा?

    महाराष्ट्र से लेकर बिहार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु सहित 10 राज्यों की 37 सीटों पर राज्यसभा चुनाव हो रहे हैं. यह सीटें अप्रैल में खाली हो रही है, जिसके चलते निर्वाचन आयोग ने 16 मार्च को चुनाव कराने का ऐलान किया है. राज्यसभा चुनाव में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए की सीटें बढ़ने तो विपक्ष इंडिया ब्लॉक की सीटें घटनी है, लेकिन कांग्रेस की सीटों में इजाफा हो सकता है?

    एनसीपी (एसपी) के प्रमुख शरद पवार, अभिषेक मनु सिंघवी और प्रियंका चतुर्वेदी का कार्यकाल खत्म हो रहा है. इसके अलावा राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश सिंह के लेकर उपेंद्र कुशवाहा का भी टर्म पूरा हो रहा है. ऐसे में देखना है कि इन दिग्गज नेताओं में से किसकी वापसी होती है, इसके अलावा किस दल को किसे फायदा और किसे नुकसान होगा?

    देश के किस राज्य में कितनी सीटों पर चुनाव

    राज्यसभा की इन 37 सीटों में सबसे ज्यादा महाराष्ट्र से सात सीटें खाली हो रही हैं, जिन पर चुनाव है. महाराष्ट्र की सात राज्यसभा सीटों में से बीजेपी के पास दो और शरद पवार की एनसीपी के पास 2 राज्यसभा सीटें है. इसके अलावा कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) और आरपीआई के पास एक-एक सीटें है.

    तमिलनाडु की जिन छह राज्यसभा सीटों पर चुनाव हो रहे हैं, उसमें से 4 राज्यसभा सीट डीएमके के पास है. इसके अलावा एक सीट AIADMK और एक सीट टीएमसी के पास है. पश्चिम बंगाल और बिहार पांच-पांच सीटों पर चुनाव हो रहे हैं. बंगाल की 5 राज्यसभा सीटों में से टीएमसी के पास 4 और एक सीट सीपीआई(एम) के कब्जे है. बिहार की पांच राज्यसभ सीटों में से जेडीयू और आरजेडी के पास 2-2 सीटें और एक सीट आरएलएम के पास है.

    ओडिशा से चार और असम से तीन सीटों पर चुनाव हो रहे हैं. ओडिशा की चार राज्यसभा सीटों में से बीजेपी के पास दो और बीजेडी के पास दो राज्यसभा सीट है. असम की तीन राज्यसभा सीटों में से बीजेपी के पास 2 और असम गढ़ परिषद के पास एक सीट है. हरियाणा, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना से दो-दो सीटों, जबकि हिमाचल प्रदेश से एक सीट पर मतदान होगा.

    हरियाणा की दो राज्यसभा सीटों में से दोनों ही बीजेपी के पास है तो तेलंगाना की दोनों सीटों में एक कांग्रेस और बीआरएस के पास है. छत्तीसगढ़ की दोनों सीटें कांग्रेस के कब्जे में है. हिमाचल की जिस एक सीट पर राज्यसभा चुनाव हो रहे हैं, वह सीट बीजेपी के कब्जे में है.

    राज्यसभा चुनाव किसे नफा और किसे नुकसान

    देश के 10 राज्यों की 37 राज्यसभा सीटों के आंकड़े फिलहाल देखें तो बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के पास करीब 15 सीटें है, जिसमें बीजेपी के पास 9 सीटें, जेडीयू के पास 2 सीटें, AIADM के पास एक सीट, आरएलएम के पास एक और एक सीट आरपीआई के पास है.

    वहीं, विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक की बात करें तो 18 राज्यसभा सीटें उसके कब्जे में है, जिसमें से 4 सीटें कांग्रेस के पास, 4 सीटें टीएमसी के पास, 4 सीटें डीएमके के पास और आरजेडी के पास 2 सीटें है.साथ ही एक सीट शिवसेना (यूबीटी) और एक सीट सीपीआईएम के पास है. इसके अलावा चार सीटें अन्य दलों के पास है, जिसमें दो सीटें बीजेडी, एक सीट बीआरएस और एक सीट तमिलनाडु के क्षेत्रीय दल के कब्जे में है.

    विधानसभा की स्थिति कई राज्यों में बदल गई है. इस लिहाज से एनडीए को 2 से 3 सीट का फायदा मिल सकता है तो इंडिया ब्लॉक की सीटें 3 से 4 घट सकती है. इसके अलावा क्षेत्रीय दलों को सबसे बड़ा झटका लगने जा रहा है. बीजेपी की सीटें बढ़ने और कांग्रेस को भी मामूली सीट की बढ़त मिलने की उम्मीद है.

    कांग्रेस की सीटें 4 से बढ़कर पांच हो सकती है तो बीजेपी की सीटें 9 से बढ़कर 12 हो सकती है. लेकिन आरजेडी से लेकर शरद पवार की एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) के हाथ से सीटें निकल सकती हैं. इसके अलावा आरएलएम को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है. किस राज्य में क्या होगा राज्यसभा का चुनावी सीन

    महाराष्ट्र में किसे होगा नुकसान

    महाराष्ट्र में 7 राज्यसभा सीटों पर चुनाव है, जिसमें से एनडीए के 6 सीटें मिल सकती है तो विपक्षी गठबंधन महायुति के सिर्फ एक सीट मिलने की संभावना है. राज्य में कुल 286 विधानसभा सीटें है, जिसमें से 2 सीटें खाली हैं. इस लिहाज से एक राज्यसभ सीट के लिए 37 विधायकों के समर्थन की जरूरत है. मौजूदा समय में बीजेपी के पास 131, शिंदे की शिवसेना के पास 57 और अजित पवार की एनसीपी के पास 40 विधायक हैं.

    एनडीए के 235 विधायक बन रहे हैं, जिसके दम पर 6 सीटें आसानी से जीत सकती है. बीजेपी चार सीटें तो शिंदे और अजित पवार की पार्टी को एक-एक सीट जीत सकती है. शरद पवार की एनसीपी के 10, उद्धव ठाकरे की 16 और कांग्रेस के 20 विधायक हैं. इस तरह से तीनों दलों के कुल 46 विधायक. सीपीआई (एम) और एसके (एम) का एक-एक विधायक है. अन्य छोटे दलों और निर्दलीयों का समर्थन मिलने पर यह संख्या कुछ बढ़ सकती है. ऐसे में एक सीट विपक्ष मिलकर सकती है. शरद पवार, उद्धव ठाकरे और कांग्रेस में से किसी एक दल को की यह सीट मिल सकती है, जिसके चलते शरद पवार की सीटें और उद्धव ठाकरे के लिए सियासी नुकसान होगा.

    बिहार में आरजेडी को लगेगा झटका

    बिहार की पांच राज्यसभा सीट पर चुनाव होने हैं, जिसमें एनडीए आसानी से 4 सीटें जीत सकती है और एक सीट विपक्ष को मिल सकती है. बिहार में राज्यसभा चुनाव में 1 सीट के लिए इस बार कम से कम 41 विधायकों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी. बीजेपी और जेडीयू आसानी से 2-2 सीटें जीत सकती है, लेकिन विपक्ष संयुक्त रूप से मिलकर ही एक सीट जीतने की स्थित में है. ऐसे में आरजेडी को कम से कम एक सीट का नुकसान उठाना पड़ेगा और उसे एक सीट जीतने के लिए ओवैसी की पार्टी का भी समर्थन हासिल करना होगा.

    तमिलनाडु और बंगाल में यथावत

    तमिलनाडु में की मौजूदा विधानसभा की स्थिति के लिहाज से डीएमके आसानी से चार सीटें जीत लेगा और एक सीट AIADMK भी बचा ले जाएगा, लेकिन एक सीट पर मुकाबला हो सकता है. ऐसे ही पश्चिम बंगाल की पांच सीटों में से टीएमसी अपनी चारों सीटें बचा लेगा, लेकिन यहां पर एक सीट सीपीएम को खोनी पड़ सकती है, जो बीजेपी के खाते में जा सकती है. ओडिशा में चार सीटों में से बीजेपी 3 सीटें आसानी से जीत लेगी और एक सीट से बीजेडी को संतोष करना पड़ सकता है.

    असम से हरियाणा तक कांग्रेस को फायदा

    असम की तीन राज्यसभ सीटों में से बीजेपी आसानी से दो सीटें जीत लेगी और एक सीट कांग्रेस-AIUDF के साथ मिलकर जीत सकती है. इस तरह से असम में एक सीट का नुकसान एजीपी को हो सकता है. तेलंगाना की दोनों राज्यसभा सीटें कांग्रेस के खाते में जा सकती है और यहां पर बीआरएस को अपनी एक सीट गंवानी पड़ सकती है.

    छत्तीसगढ़ की दो सीटों में से एक सीट बीजेपी और एक सीट कांग्रेस के खाते में जा सकती है. इस तरह कांग्रेस को एक सीट का नुकसान उठाना पड़ सकता. ऐसे ही हरियाणा की दो सीटें बीजेपी के पास हैं, लेकिन मौजूदा विधानसभा सीट के लिहाज से एक सीट बीजेपी और एक सीट कांग्रेस आसानी से जीत लेगी. ऐसे में बीजेपी को एक सीट का नुकसान होगा. हिमाचल की एक सीट पर हो रहे चुनाव में बीजेपी को अपनी यह सीट गंवानी पड़ सकती है और यह सीट कांग्रेस जीत सकती है.

  • लोक सभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने श्रीमती सरोजिनी नायडू की जयंती पर दी भावपूर्ण श्रद्धांजलि संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में सम्मान और स्मरण

    लोक सभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने श्रीमती सरोजिनी नायडू की जयंती पर दी भावपूर्ण श्रद्धांजलि संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में सम्मान और स्मरण


    नई दिल्ली । आज 13 फरवरी 2026 को संविधान सदन के केंद्रीय कक्ष में लोक सभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने हमारे देश की महान स्वतंत्रता सेनानी कवयित्री तथा समाज सुधारक श्रीमती सरोजिनी नायडू की जयंती के अवसर पर उन्हें पुष्पांजलि अर्पित कर गहरी श्रद्धा व्यक्त की। इस भावपूर्ण कार्यक्रम में राज्य सभा के उपसभापति श्री हरिवंश कई संसद सदस्य पूर्व सदस्य और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे और उन्होंने भी सरोजिनी नायडू को याद करते हुए उनके योगदान को सम्मान दिया।

    लोक सभा अध्यक्ष ने कहा कि सरोजिनी नायडू ने न केवल स्वतंत्रता संग्राम में एक प्रखर भूमिका निभाई बल्कि उन्होंने अपनी कविताओं वक्तृत्व और महिला सशक्तिकरण के लिए निरंतर कार्य किया। उन्हें भारत कोकिला के नाम से भी संबोधित किया जाता है जो उनकी साहित्यिक प्रतिभा और देशभक्ति की भावना का प्रतीक है।

    उपस्थित गणमान्य लोगों की मौजूदगी से सजी संविधान सदन की केंद्रीय कक्ष में पुष्पांजलि अर्पण की यह रस्म बेहद गंभीर और सम्मानपूर्वक संपन्न हुई। लोक सभा महासचिव श्री उत्पल कुमार सिंह ने भी श्रीमती सरोजिनी नायडू के चित्र पर श्रद्धांजलि दी जबकि कई सांसदों ने उनके जीवन विचारों और सामाजिक योगदान पर प्रकाश डाला।

    सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में हुआ था। वे एक प्रतिभाशाली वक्ता सुप्रसिद्ध कवयित्री और प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थीं जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। उनके नेतृत्व लेखन और देशप्रेम ने महिलाओं के शिक्षा और सशक्तिकरण को एक नई दिशा प्रदान की। उन्होंने दिल्ली में लेडी इरविन कॉलेज फॉर विमेन की स्थापना की जिससे उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा मिला।

    स्वतंत्रता के बाद श्रीमती सरोजिनी नायडू ने संयुक्त प्रांत अब उत्तर प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल के रूप में भी सेवा की। उनका जीवन देश की सेवा के प्रति समर्पण और समाज की भलाई के लिए निरंतर प्रयास का आदर्श रहा है। वे महिलाओं के अधिकारों और समानता की प्रबल समर्थक थीं जिनके विचार आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

    विशेष रूप से यह भी उल्लेखनीय है कि पहले भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 16 दिसंबर 1959 को संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में सरोजिनी नायडू के चित्र का अनावरण किया था जो उनके योगदान और स्मरण को स्थायी रूप से सम्मानित करता है।

    इस अनुष्ठान में सदन के नेताओं ने उनके साहित्यिक सामाजिक और राजनीतिक योगदान को याद करते हुए कहा कि सरोजिनी नायडू का जीवन और कार्य भारतीय जनता के लिए आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं। इस कार्यक्रम ने न केवल उनके स्मरण को सम्मान दिया बल्कि यह याद दिलाया कि स्वतंत्रता और सामाजिक समानता के प्रति उनके आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक और प्रेरणादायी हैं।

  • राघव चड्ढा का संसद में ‘राइट टू रिकॉल’ पर जोर, बोले- मतदाता को नेता हटाने का अधिकार मिले

    राघव चड्ढा का संसद में ‘राइट टू रिकॉल’ पर जोर, बोले- मतदाता को नेता हटाने का अधिकार मिले


    नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने बुधवार को संसद में ‘राइट टू रिकॉल’ यानी जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार पर चर्चा कर सुर्खियां बटोरीं। उन्होंने कहा कि अगर चुने हुए नेता जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते, तो मतदाताओं को उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले उन्हें हटाने का अधिकार होना चाहिए।

    शून्यकाल के दौरान बोलते हुए चड्ढा ने कहा, “जैसे मतदाता को चुनाव में हिस्सा लेने का अधिकार है, उसी तरह अगर नेता काम नहीं करता तो उसे हटाने का अधिकार भी होना चाहिए। ‘राइट टू रिकॉल’ मतदाताओं को सशक्त बनाएगी और नेताओं को जवाबदेह बनाएगी।”

    ‘राइट टू रिकॉल’ क्या है?
    राघव चड्ढा ने इसे एक ऐसी प्रक्रिया बताया है जिसमें वोटर किसी चुने हुए नेता को उनके कार्यकाल पूरा होने से पहले हटाने का अधिकार रखते हैं। आसान शब्दों में, अगर जनता अपने नेता के काम से संतुष्ट नहीं है, तो वह उसे जल्दी हटाने का विकल्प रख सकती है।

    राष्ट्रपति और जज हैं हटाए जा सकते हैं, नेताओं को क्यों नहीं?
    चड्ढा ने तर्क दिया कि भारत में पहले ही राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और न्यायाधीशों के लिए महाभियोग की व्यवस्था है। सरकारों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भी लाया जा सकता है। ऐसे में निर्वाचित नेताओं के लिए भी सुरक्षित और कानूनी प्रक्रिया के जरिए हटाने की सुविधा होना चाहिए।

    दुरुपयोग रोकने के लिए सुरक्षा उपाय
    सांसद ने कहा कि ‘राइट टू रिकॉल’ लोकतंत्र को मजबूत करेगा, इसे नेताओं के खिलाफ हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए कम से कम 35-40% मतदाताओं के हस्ताक्षर जरूरी हों। नेता को 18 महीने का ‘परफॉर्मेंस पीरियड’ दिया जाए, ताकि वह सुधार कर सके। इस तरह काम करने वाले नेताओं को पार्टी टिकट देंगी और लोकतंत्र मजबूत होगा।

    किन देशों में लागू है?
    राघव चड्ढा के अनुसार, दुनिया के 20 से अधिक लोकतांत्रिक देशों में यह व्यवस्था मौजूद है। उदाहरण- अमेरिका, स्विट्जरलैंड, कनाडा, ब्रिटेन, वेनेज़ुएला, पेरू, इक्वाडोर, जापान, ताइवान। इसके अलावा भारत में यह व्यवस्था कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान की ग्राम पंचायतों में लागू है।

  • कांग्रेस सांसद थरूर फोन पर बात करते हुए संसद की सीढ़ियों पर लड़खड़ाकर गिरे… अखिलेश यादव ने संभाला

    कांग्रेस सांसद थरूर फोन पर बात करते हुए संसद की सीढ़ियों पर लड़खड़ाकर गिरे… अखिलेश यादव ने संभाला

    नई दिल्ली। संसद (Parliament) के बजट सत्र (Budget Session) में इन दिनों हंगामा और आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। इस बीच बुधवार को एक दिलचस्प घटना घटी, जिसने सोशल मीडिया पर सुर्खियाँ बटोरीं। कांग्रेस सांसद शशि थरूर (Congress MP Shashi Tharoor) संसद भवन की सीढ़ियों पर फोन पर बात करते हुए लड़खड़ा गए और गिरते हुए नजर आए। हालांकि, इस दौरान समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) प्रमुख अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने तुरंत उनकी मदद की और उन्हें सहारा देकर गिरने से बचाया।

    वीडियो में देखा जा सकता है कि शशि थरूर जैसे ही बैलेंस खोते हैं, अखिलेश यादव पास खड़े होते हुए तेजी से उनकी ओर बढ़ते हैं और उन्हें सहारा देते हैं। साथ ही एक महिला सुरक्षा अधिकारी भी तुरंत मदद के लिए पहुंची। अखिलेश ने शशि थरूर को कुछ समय तक सहारा दिया और फिर उन्हें कुछ सीढ़ियाँ नीचे उतारा।

    https://twitter.com/ShashiTharoor/status/2019102516416479508
    इस घटना के बाद शशि थरूर ने ट्विटर (अब एक्स) पर एक शायराना अंदाज में पोस्ट किया, “जिस दिए को, तूफां में जलना होगा, उसे संभल संभल कर चलना होगा। मैं ठीक हूं।” सोशल मीडिया पर इस सजीव और संवेदनशील मदद की काफी सराहना हो रही है, और लोग अखिलेश यादव की सहज शिष्टाचार की तारीफ कर रहे हैं।

    इससे पहले, शशि थरूर ने भाजपा पर निशाना साधते हुए सेना प्रमुख एम एम नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण को लेकर सरकार की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाया था। उन्होंने यह आरोप लगाया कि सरकार ने इस मुद्दे पर अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतिक्रिया दी, जिसके चलते सदन की कार्यवाही बाधित हुई।

  • राहुल गांधी ने संसद को बनाया बंधक, लोकसभा में BJP सांसद निशिकांत दुबे का तीखा हमला

    राहुल गांधी ने संसद को बनाया बंधक, लोकसभा में BJP सांसद निशिकांत दुबे का तीखा हमला


    नई दिल्‍ली । लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी को लेकर भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे ने एक बड़ा और तीखा बयान दिया है। संसद के भीतर जारी गतिरोध और हंगामे के बीच निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा कि बीते कई दिनों से संसद का कामकाज पूरी तरह ठप है और इसके लिए सीधे तौर पर राहुल गांधी जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी ने संसद को बंधक बना लिया है, जिसकी वजह से देश से जुड़े अहम मुद्दों पर चर्चा नहीं हो पा रही है।

    निशिकांत दुबे ने लोकसभा में बोलते हुए कहा कि राहुल गांधी ऐसे विषय उठा रहे हैं जिनका न तो कोई ठोस आधार है और न ही कोई स्पष्ट संदर्भ। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने सदन में जिस किताब का हवाला दिया है, वह आज तक प्रकाशित ही नहीं हुई है। भाजपा सांसद के मुताबिक, “जो किताब छपी ही नहीं, उसका संसद में जिक्र करना दर्शाता है कि उनकी बातें बे सिर-पैर की हैं और उनका कोई वास्तविक मतलब नहीं निकलता।”

    छपी ही नहीं किताब, फिर भी संसद में हंगामा

    निशिकांत दुबे ने कहा कि राहुल गांधी का रवैया गैर-जिम्मेदाराना है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि एक तरफ राहुल गांधी ऐसी किताबों का हवाला दे रहे हैं जो अस्तित्व में ही नहीं हैं, वहीं दूसरी ओर वे खुद ऐसी किताबें लेकर आए हैं जो वास्तव में प्रकाशित हो चुकी हैं, लेकिन भारत में प्रतिबंधित हैं या जिन पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। उनका कहना था कि अगर किताबों के आधार पर ही चर्चा करनी है, तो इन पुस्तकों पर भी बात होनी चाहिए।

    इन विवादित किताबों का किया जिक्र

    BJP सांसद निशिकांत दुबे ने इस दौरान कई चर्चित और विवादास्पद किताबों का नाम लिया। इनमें इंडिया इंडिपेंडेंट, एडवीना एंड नेहरू, द लाइफ ऑफ़ इंदिरा एंड नेहरू, नेहरू ए पॉलिटिकल बायोग्राफी, सीजफायर, द हर्ट ऑफ़ इंडिया नेपाल जैसी किताबें शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने कुछ अन्य पुस्तकों का भी उल्लेख किया, जिनमें रेड साड़ी, बोफोर्स गेट, एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर और इमरजेंसी रिटोल्ड प्रमुख हैं।

    निशिकांत दुबे का कहना था कि इन किताबों में इतिहास, राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई संवेदनशील विषयों का जिक्र है, लेकिन इन पर संसद में कभी विस्तार से चर्चा नहीं की गई। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर राहुल गांधी किताबों के हवाले से सरकार को घेरना चाहते हैं, तो इन पुस्तकों के तथ्यों पर भी खुली बहस होनी चाहिए।

    सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा

    निशिकांत दुबे ने अपने बयान में आर्मी एक्ट का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सेना से जुड़े किसी भी विषय पर किताब लिखने से पहले रक्षा मंत्रालय की अनुमति लेना अनिवार्य होता है। उन्होंने पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे के बयान का हवाला देते हुए कहा कि “जनरल नरवणे खुद साफ कह चुके हैं कि भारत की एक इंच जमीन भी नहीं गई। इसके बावजूद एक “छोटी सी बात” को लेकर संसद को ठप कर दिया गया है, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उनका कहना था कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों पर राजनीति करना देशहित में नहीं है। इसी वजह से वे चाहते हैं कि जिन किताबों में सेना, युद्ध और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संदर्भ हैं, उन पर भी गंभीरता से चर्चा हो।

    सोशल मीडिया पर भी राहुल गांधी पर निशाना

    निशिकांत दुबे ने एक दिन पहले राहुल गांधी को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पूर्व में ट्विटर पर भी एक पोस्ट साझा की थी। इस पोस्ट में उन्होंने राहुल गांधी को संबोधित करते हुए लिखा था कि वे अपने नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू के तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल करियप्पा के बारे में दिए गए विचार जरूर पढ़ें। इसके साथ ही उन्होंने जनरल थिमय्या का पत्र, फील्ड मार्शल मानेकशॉ का पत्र और मथाई जी की किताब का भी जिक्र किया।उन्होंने पोस्ट में लिखा कि ये सभी दस्तावेज और किताबें बेहद खतरनाक हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से इन्हें हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने राहुल गांधी से अपील की कि वे कम से कम राष्ट्रीय सुरक्षा का तो लिहाज करें।

    सियासी माहौल और तेज होता टकराव

    निशिकांत दुबे के इस बयान के बाद संसद के भीतर और बाहर सियासी माहौल और गरमा गया है। एक तरफ BJP राहुल गांधी पर संसद को बाधित करने का आरोप लगा रही है, तो दूसरी ओर विपक्ष सरकार पर सवाल उठाने की अपनी रणनीति पर अड़ा हुआ है। फिलहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में संसद का गतिरोध कैसे खत्म होता है और क्या इन आरोप-प्रत्यारोप के बीच सदन का कामकाज पटरी पर लौट पाता है या नहीं।

  • संसद का Budget सत्र 28 जनवरी से होगा शुरू,  बजट Day पर सस्पेंस बरकरार

    संसद का Budget सत्र 28 जनवरी से होगा शुरू, बजट Day पर सस्पेंस बरकरार

    नई दिल्ली। बजट सत्र (Budget Session) के शुरू किए जाने की तारीख को लेकर सस्पेंस खत्म हो गया है। सरकार द्वारा मंजूर किए गए एक प्रस्ताव के अनुसार संसद का बजट सत्र (Parliament’s Budget session) 28 जनवरी से 2 अप्रैल, 2026 तक दो चरणों में होगा। सत्र का पहला चरण 28 जनवरी से 13 फरवरी तक चलेगा, जिसके बाद अवकाश होगा। संसद के दूसरे चरण की शुरुआत 9 मार्च को होगी और 2 अप्रैल को समापन होगा। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू (Kiren Rijiju) ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी दी है।


    बजट-डे पर सस्पेंस बरकरार

    हालांकि, यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि आम बजट एक फरवरी को ही पेश किया जाएगा या नहीं लेकिन मीडिया रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि इसी तारीख को बजट पेश होगा। दरअसल, देश का आम बजट आगामी एक फरवरी को ही पेश किया जाता रहा है लेकिन इस बार इस तारीख को रविवार है। ऐसे में कयास लगाया जा रहा है कि रविवार के दिन बजट पेश किया जाएगा या नहीं। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू के सोशल मीडिया पोस्ट में भी जिक्र नहीं है।

    बजट सत्र के दौरान पहले दिन दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में राष्ट्रपति का अभिभाषण होता है और उसके बाद आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया जाता है। पिछले कुछ वर्षों की परंपरा के अनुसार, इसके अगले दिन एक फरवरी को बजट पेश किया जाता है। पहले चरण में राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर और बजट पर चर्चा होती है। इसके बाद अवकाश के दौरान संसद की समितियां बजट पर मंत्रालय-वार विस्तृत चर्चा करती हैं। दूसरे चरण में वित्त विधेयक और अनुदान मांगों पर चर्चा होती है और उन्हें पारित किया जाता है।

  • पश्चाताप कर लें हिजाब विवाद पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने CM नीतीश कुमार को दी सलाह

    पश्चाताप कर लें हिजाब विवाद पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने CM नीतीश कुमार को दी सलाह


    नई दिल्ली । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक कार्यक्रम के मुस्लिम महिला के चेहरे से नकाब हटा दिया इसे लेकर विपक्ष के साथ कई मुस्लिमों संगठनों ने प्रतिक्रिया व्यक्त की अब इस मामले को लेकर उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने अपने एक्स हैंडल पर लंबी चौड़ी पोस्ट लिखते हुए सीएम नीतीश कुमार को सलाह दी है

    बसपा चीफ मायावती ने कहा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा डॉक्टरों को नियुक्ति पत्र वितरण के सार्वजनिक कार्यक्रम में एक मुस्लिम महिला डॉक्टर का हिजाब चेहरे का नकाब हटाने का मामला सुलझने की बजाय खासकर मंत्रियों आदि की बयानबाजी के कारण विवाद का रूप लेकर यह लगातार तूल पकड़ता ही जा रहा है जो दुखद व दुभाग्यपूर्ण है

    ‘पश्चाताप कर यहीं विवाद को यहीं खत्म करने का करें प्रयास’

    मायावती ने कहा यह मामला पहली नजर में ही महिला सुरक्षा व सम्मान से जुड़ा होने के कारण मुख्यमंत्री के सीधे हस्तक्षेप से अब तक सुलझ जाना चाहिये था खासकर तब जब कई जगहों पर ऐसी अन्य वारदातें भी सुनने को मिल रही हैं अच्छा होगा कि मुख्यमंत्री इस घटना को सही परिप्रेक्ष्य में देखते हुये इसके लिये पश्चाताप कर लें और कड़वा होते जा रहे इस विवाद को यहीं पर खत्म करने का प्रयास करें

    कथावाचक को गार्ड ऑफ ऑनर देने पर दी प्रतिक्रिया
    इसके अलावा मायावती ने कहा बहराइच जिला पुलिस द्वारा पुलिस परेड में स्थापित परम्परा नियमों से हटकर एक कथावाचक को सलामी देने का मामला भी काफी बड़े विवाद में है और इसको लेकर सरकार कठघरे में है पुलिस परेड व सलामी की अपनी परम्परा नियम मर्यादा अनुशासन व पवित्रता है जिसको लेकर खिलवाड़ कतई नहीं किया जाना चाहिये

    मायावती ने कहा यह अच्छी बात है कि यूपी के पुलिस प्रमुख ने इस घटना का संज्ञान लेकर जिला पुलिस कप्तान से जवाब तलब किया है कार्रवाई का लोगों को इंतजार है वैसे राज्य सरकार भी इसको गंभीरता से लेकर ऐसी घटनाओं की पुनरावृति पर रोक लगाये तो यह पुलिस प्रशासन अनुशासन एवं कानून का राज के हक में उचित होगा

    पूर्व सीएम ने कहा जहाँ तक कल दिनांक 19 दिसम्बर से शुरू हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा के संक्षिप्त शीतकालीन सत्र का सवाल है तो यह सत्र भी पिछले सत्रों की तरह ही जनहित व जनकल्याण के मुद्दों से दूर रहने के कारण सत्ता व विपक्ष के बीच वाद-विवाद में घिर गया है बेहतर होता कि सरकार किसानों के खाद की समस्या के साथ-साथ जनहित की अन्य समस्याओं तथा जनकल्याण के प्रति गंभीर होकर संदन में इन पर जवाबदेह होती

    उन्होंने आगे कहा इसके साथ ही संसद का शीतकालीन सत्र भी राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण की भीषण समस्या सहित देश व जनहित की विकराल रूप धारण कर रही समस्याओं पर विचार किये बिना ही कल समाप्त हो गया जबकि पूरे देश की निगाहें लगी थीं कि सरकार व विपक्ष दोनों देश के ज्वलन्त समस्याओं पर विचार करेंगे और इससे कुछ उम्मीद की नई किरण पैदा होगी लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं होना दुभाग्यपूर्ण देश की चिन्तायें लगातार बरकरार हैं

    बांग्लादेश में बिगड़ते हालातों पर जताई चिंता

    इसके अलावा मायावती ने कहा इसके साथ-साथ पड़ोसी देश बांग्लादेश में जो हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं तथा वहाँ भी नेपाल की तरह भारत विरोधी गतिविधियाँ बढ़ रही हैं वे भी चिन्तनीय स्थिति है जिसपर भी केन्द्र सरकार समुचित संज्ञान लेकर दीर्घकालीन नीति के तहत कार्य करे तो यह उचित होगा

  • यात्रियों को होगा एक्स्ट्रा खर्च ज्यादा सामान लेकर ट्रेन यात्रा करने पर देना होगा अतिरिक्त शुल्क

    यात्रियों को होगा एक्स्ट्रा खर्च ज्यादा सामान लेकर ट्रेन यात्रा करने पर देना होगा अतिरिक्त शुल्क


    नई दिल्ली । रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने संसद में एक महत्वपूर्ण जानकारी दी है जिसमें कहा गया है कि अब ट्रेन यात्रा करते समय यदि यात्री निर्धारित सीमा से अधिक सामान ले जाते हैं तो उन्हें अतिरिक्त शुल्क का भुगतान करना होगा। यह नियम ट्रंक सूटकेस और बक्से जैसी वस्तुओं के लिए लागू होगा जिनका बाहरी माप निर्धारित सीमा से ज्यादा होगा। ऐसे सामान को यात्री के डिब्बों में नहीं बल्कि ब्रेकवैन एसएलआर/पार्सल वैन में बुक करके ले जाना होगा। वैष्णव ने यह जानकारी तेलुगु देशम पार्टी के सांसद वेमिरेड्डी प्रभाकर रेड्डी के सवाल के जवाब में दी। उन्होंने बताया कि विभिन्न श्रेणियों में सामान ले जाने की अधिकतम सीमा तय की गई है।

    क्या हैं नए नियम

    द्वितीय श्रेणी 35 किग्रा तक सामान मुफ्त 70 किग्रा तक शुल्क देकर ले जा सकते हैं। स्लीपर श्रेणी 40 किग्रा तक मुफ्त 80 किग्रा तक शुल्क देकर ले जा सकते हैं। एसी थ्री टियर/चेयर कार 40 किग्रा तक सामान मुफ्त अधिकतम सीमा भी 40 किग्रा। प्रथम श्रेणी/एसी टू टियर 50 किग्रा तक मुफ्त 100 किग्रा तक शुल्क देकर ले जा सकते हैं। एसी प्रथम श्रेणी 70 किग्रा तक मुफ्त 150 किग्रा तक शुल्क देकर ले जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त अगर कोई यात्री 100 सेंटीमीटर लंबा 60 सेंटीमीटर चौड़ा और 25 सेंटीमीटर ऊंचा सामान लेता है तो उसे ब्रेकवैन या पार्सल वैन में बुक करना होगा। यह सामान यात्री डिब्बों में नहीं ले जाया जा सकेगा।

    मंत्री ने यह भी कहा कि कमर्शियल सामान को निजी सामान के रूप में डिब्बों में ले जाने की अनुमति नहीं होगी। इस नए नियम के लागू होने से यात्रियों को यात्रा के दौरान अधिक सामान ले जाने के मामले में ध्यान रखना होगा ताकि उन्हें अतिरिक्त शुल्क का सामना न करना पड़े।
     रेल मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि इन नियमों का उद्देश्य यात्रियों को सुविधाजनक यात्रा प्रदान करना है और साथ ही रेलवे के संसाधनों का भी बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना है।

  • Pakistan की संसद में ईमानदारी के इम्तिहान… एक दर्जन से ज्यादा सांसद हुए फेल

    Pakistan की संसद में ईमानदारी के इम्तिहान… एक दर्जन से ज्यादा सांसद हुए फेल


    इस्लामाबाद।
    पड़ोसी देश पाकिस्तान (Pakistan) की संसद में बैठे सांसद कितने ईमानदार (Honest MPs) हैं? इसकी जब परीक्षा हुई तो करीब एक दर्जन से ज्यादा सांसद उसमें फेल हो गए। यह सब हुआ ऑन कैमरा। अब उसका वीडियो फुटेज सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। दरअसल, हुआ यूं कि पाकिस्तान की नेशनल असेंबली (Pakistan National Assembly) के स्पीकर सरदार अयाज सादिक (Speaker Sardar Ayaz Sadiq) ने सांसदों की ईमानदारी का इम्तिहान लेने के लिए एक मजेदार तरकीब निकाला। उन्होंने कुछ कड़क-कड़क नोट लहराकर संसद में पूछा कि ये किसके हैं?

    वीडियो में दिख रहा है कि वह हाथों में नोट लहराते हुए पूछ रहे हैं कि ये किसी के पैसे गिर गए हैं, जिनके हैं हाथ खड़े करें। इसी बीच संसद में बैठे 12-13 सांसदों ने हाथ खड़े कर दिए। इस पर मुस्कुराते हुए स्पीकर ने कहा, “ये तो 10-12 हाथ खड़े हो गए हैं, पैसे उतने नहीं हैं, जितने लोगों के हाथ खड़े हुए हैं। ये तो सारे हाउस के हाथ खड़े हो गए हैं।” उसके बाद उन्होंने थैंक यू कहकर मामला समाप्त कर दिया। अब ये वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।


    रूपये असली मालिक को मिल गए

    पाकिस्तान के टीवी के मुताबिक, नेशनल असेंबली की ये घटना सोमवार की है। स्पीकर अयाज सादिक के हाथ में उस वक्त 5000 रुपये के कुल 10 नोट थे, जिन्हें वह लहरा रहे थे। यानी उनके हाथ में कुल 50,000 रुपये थे, जो किसी सांसद के संसद भवन में गिर गए थे। आखिरकार कैश अपने असली मालिक PTI के सांसद मुहम्मद इकबाल अफरीदी के पास पहुंच गया लेकिन पाक सोशल मीडिया पर इसको लेकर गरमागरम बहस छिड़ गई है।


    पाकिस्तानी सांसदों की हो रही खिंचाई

    जैसे ही वीडियो सोशल मीडिया पर पॉपुलर हुआ, पाकिस्तानियों ने अपने सांसदों की खिंचाई शुरू कर दी। कुछ लोगों का कहना है कि जिन 12 MPs ने हाथ उठाए थे, उन्हें संसद का अपमान करने का दोषी मानकर सदन से निकाल देना चाहिए। एक मज़ाकिया यूज़र, महनूर आसिफ ने ट्वीट किया, “स्पीकर ने शरीफ भाइयों के 25 कॉल मिस कर दिए।” हालांकि, कुछ लोग इस घटना से हैरान नहीं हैं। एक और ने ट्वीट किया, “वे लाखों में सैलरी और भत्ते लेते हैं, फिर भी यह उनका हाल है।”

  • राहुल गांधी ने विदेशियों से मिलने की विपक्ष की परंपरा पर उठाया सवाल, कंगना रनौत ने जताई आपत्ति

    राहुल गांधी ने विदेशियों से मिलने की विपक्ष की परंपरा पर उठाया सवाल, कंगना रनौत ने जताई आपत्ति


    नई दिल्ली। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि वह विदेशी मेहमानों को विपक्ष के नेता से नहीं मिलने देती, जबकि पहले यह परंपरा रही है कि किसी भी विदेशी गणमान्य व्यक्ति को विपक्ष के नेता से मिलने की अनुमति दी जाती थी। राहुल गांधी ने अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के कार्यकाल का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय विपक्ष के नेताओं को भी विदेशी मेहमानों से मिलने की इजाजत थी।

    राहुल गांधी ने संसद भवन परिसर में संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि विपक्ष के नेता का दृष्टिकोण अलग होता है और विदेशी गणमान्य अतिथि से मिलने का अधिकार उन्हें होना चाहिए। उन्होंने बताया कि मोदी सरकार और विदेश मंत्रालय इस परंपरा का पालन नहीं करते हैं। राहुल गांधी ने यह भी कहा कि जब वे विदेश यात्रा पर जाते हैं तो उन्हें भी बताया जाता है कि विदेशी नेताओं से नहीं मिलना है, जो नीति के अनुसार होता है।

    रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन की भारत यात्रा के संदर्भ में पूछे गए सवाल पर राहुल गांधी ने कहा कि आम तौर पर यह परंपरा रही है कि विदेश से आने वाले मेहमान विपक्ष के नेता से भी मिलते हैं। उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह के समय यही नियम रहा, लेकिन अब इस परंपरा का पालन नहीं किया जाता। उनका यह भी कहना था कि एलओपी (नेता विपक्ष) एक अलग दृष्टिकोण पेश करते हैं और वह भी भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। केवल सरकार ही देश का प्रतिनिधित्व नहीं करती।

    राहुल गांधी के इन आरोपों के बाद बॉलीवुड और राजनीति जगत की हस्ती कंगना रनौत ने प्रतिक्रिया दी। कंगना ने कहा कि राहुल गांधी की भावनाएं देश के प्रति संदिग्ध हैं। उन्होंने कहा कि अगर राहुल गांधी अटल बिहारी वाजपेयी के समान बनने की कोशिश कर रहे हैं, तो उन्हें भाजपा में शामिल होना चाहिए। कंगना ने ट्वीट या बयान में कहा कि भगवान ने उन्हें जन्म दिया है, जीवन दिया है, वे भी अटल जी बन सकते हैं, इसके लिए उन्हें भाजपा ज्वाइन कर लेना चाहिए।

    कंगना ने कहा, “सरकार के अपने फैसले होते हैं। अटल जी नेशनल असेट थे, पूरे देश को उन पर गर्व था। लेकिन राहुल गांधी की देश के प्रति भावनाएं संदिग्ध हैं। चाहे दंगे फैलाने की योजना हो या देश को टुकड़े करने की साजिश, उनकी नीयत पर संदेह है। अगर वह खुद को अटल जी से तुलना कर रहे हैं तो मैं यही सुझाव दूंगी कि आप भाजपा में शामिल हो जाइए।”

    राहुल गांधी की टिप्पणी पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि विपक्ष का अधिकार है कि वह सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए और जनता के सामने अपनी राय रखे। थरूर ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में विपक्ष को अपनी भूमिका निभाने का पूरा अधिकार है और विदेशी नेताओं से मिलने का उनका हक संविधान और परंपरा दोनों के तहत सुरक्षित है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि राहुल गांधी का यह आरोप देश की राजनीतिक परंपरा और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाता है। विपक्ष का यह अधिकार है कि वह विदेशी प्रतिनिधियों से मिले और अपने दृष्टिकोण को साझा करे। राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि विदेश नीति केवल सरकार तक सीमित नहीं हो सकती, विपक्ष का दृष्टिकोण भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

    राहुल गांधी के बयान और कंगना रनौत की प्रतिक्रिया के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। विपक्ष का मानना है कि लोकतंत्र में अलग-अलग दृष्टिकोण रखने वाले नेताओं को भी सम्मान दिया जाना चाहिए और परंपराओं का पालन होना चाहिए। वहीं, भाजपा समर्थक इसे केवल राजनीति के हिस्से के रूप में देख रहे हैं।

    इस घटना ने एक बार फिर देश में राजनीतिक संवाद और विपक्ष की भूमिका को लेकर चर्चा शुरू कर दी है। राहुल गांधी का आरोप और कंगना रनौत की प्रतिक्रिया यह दर्शाती है कि राजनीतिक बयानबाजी और आलोचना आज भी भारतीय राजनीति में उतनी ही तीव्र है जितनी पहले रही है।