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  • कच्चा तेल 94 डॉलर के पार, फिर भी आज पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर; जानें दिल्ली समेत प्रमुख शहरों के रेट

    कच्चा तेल 94 डॉलर के पार, फिर भी आज पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर; जानें दिल्ली समेत प्रमुख शहरों के रेट

    नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में रविवार को कोई बदलाव नहीं किया गया। तेल विपणन कंपनियों ने 23 अगस्त के लिए घरेलू बाजार में ईंधन के दाम पहले के स्तर पर ही बनाए रखे हैं। हालांकि, वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी भारतीय अर्थव्यवस्था और आने वाले समय में ईंधन लागत को लेकर चिंता बढ़ा रही है।

    अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। पश्चिम एशिया दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है और यहां तनाव बढ़ने पर कच्चे तेल की आपूर्ति तथा समुद्री परिवहन पर असर पड़ने की आशंका रहती है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं।

    23 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी बाजार में रविवार होने के कारण कारोबार बंद है। इसलिए कच्चे तेल की कीमतें शुक्रवार के बंद भाव के आसपास ही बनी हुई हैं। ब्रेंट क्रूड 94.39 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर रहा, जबकि शुक्रवार को इसमें 0.65 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई थी। दूसरी ओर, अमेरिकी WTI क्रूड 87.06 डॉलर प्रति बैरल पर रहा और इसमें शुक्रवार को 0.26 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी।

    घरेलू बाजार की बात करें तो दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये प्रति लीटर और डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर पर बना हुआ है। मुंबई में पेट्रोल 111.12 रुपये और डीजल 97.78 रुपये प्रति लीटर है। कोलकाता में पेट्रोल की कीमत 113.43 रुपये और डीजल 99.78 रुपये प्रति लीटर है।

    चेन्नई में पेट्रोल 107.75 रुपये और डीजल 99.57 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है। बेंगलुरु में पेट्रोल का भाव 110.93 रुपये और डीजल का 98.79 रुपये प्रति लीटर है। हैदराबाद में पेट्रोल 115.69 रुपये और डीजल 103.82 रुपये प्रति लीटर पर है।

    अन्य प्रमुख शहरों में गुरुग्राम में पेट्रोल 102.97 रुपये प्रति लीटर है, जबकि गाजियाबाद में इसका भाव 101.80 रुपये है। पटना में पेट्रोल और डीजल दोनों की कीमत 113.35 रुपये प्रति लीटर दर्ज की गई है। गाजियाबाद में डीजल 95.29 रुपये और चंडीगढ़ में डीजल 99.36 रुपये प्रति लीटर है।

    भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमत बढ़ने का असर देश की ऊर्जा लागत पर पड़ सकता है। यदि ऊंची कीमतें लंबे समय तक बनी रहती हैं तो तेल विपणन कंपनियों की लागत और उनकी अंडर-रिकवरी पर दबाव बढ़ सकता है।

    पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के दाम से तय नहीं होतीं। इनमें केंद्र और राज्य स्तर के कर, वैट, डीलर कमीशन तथा परिवहन लागत जैसे कई घटक शामिल होते हैं। इसी कारण अलग-अलग राज्यों और शहरों में पेट्रोल-डीजल के दाम अलग रहते हैं।

    देश में तेल कंपनियां रोजाना सुबह छह बजे पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बदलाव लागू करती हैं। कीमतों की समीक्षा अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के भाव और रुपये-डॉलर विनिमय दर सहित विभिन्न बाजार परिस्थितियों को ध्यान में रखकर की जाती है। फिलहाल 23 अगस्त को घरेलू उपभोक्ताओं के लिए राहत यह है कि वैश्विक स्तर पर क्रूड महंगा होने के बावजूद पेट्रोल और डीजल के खुदरा दामों में कोई वृद्धि नहीं हुई है। हालांकि, पश्चिम एशिया का तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतें आगे भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण कारक बनी रहेंगी।

  • पेट्रोल पर विंडफॉल टैक्स हुआ शून्य ….., डीजल और एटीएफ पर भी राहत…. आमजन को No Relief

    पेट्रोल पर विंडफॉल टैक्स हुआ शून्य ….., डीजल और एटीएफ पर भी राहत…. आमजन को No Relief


    नई दिल्ली।
    भारत सरकार (Government of India) ने शनिवार से पेट्रोल, डीजल (Petrol, Diesel) और हवाई जहाजों में इस्तेमाल होने वाले तेल एविएशन टर्बाइन फ्यूल (Aviation Turbine Fuel) यानी ATF के निर्यात पर लगने वाले विंडफॉल टैक्स (Windfall tax) को कम कर दिया है। यह जानकारी सरकार के एक आधिकारिक आदेश से मिली है। इस आदेश के अनुसार, डीजल निर्यात पर शुल्क को घटाकर 25.5 रुपये प्रति लीटर से 24 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। वहीं, पेट्रोल निर्यात पर पहले 3.5 रुपये प्रति लीटर शुल्क लगता था, अब इसे पूरी तरह से शून्य कर दिया गया है। एटीएफ के निर्यात पर भी शुल्क में कमी की गई है, जो 22 रुपये से घटकर 19.5 रुपये प्रति लीटर हो गया है।


    आपकी जेब पर क्या पड़ेगा असर

    टैक्स में इस कमी से आम जनता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इस कटौती से निर्यातक कंपनियों को थोड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, हालांकि सरकार अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थितियों पर नजर बनाए हुए है और आने वाले दिनों में भी संशोधन जारी रह सकते हैं।

    गौरतलब है कि भारत ने जुलाई 2022 में पहली बार विंडफॉल टैक्स लागू किया था, ताकि तेल की बढ़ती कीमतों से होने वाले असाधारण मुनाफे पर नियंत्रण पाया जा सके। दो साल बाद इसे समाप्त कर दिया गया था, लेकिन मार्च 2026 में अमेरिका-इजराइल युद्ध के कारण ईरान पर हमले के बाद तेल की कीमतें फिर से बढ़ गईं, जिसके चलते इस कर को दोबारा लागू करना पड़ा।

    अभी भारत हर दो सप्ताह में कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों के आधार पर इन निर्यात शुल्कों में संशोधन करता है। लेटेस्ट रेट के अनुसार, 1 अमेरिकी डॉलर लगभग 95.44 भारतीय रुपये के बराबर है।


    पिछली बार बढ़ा था विंडफॉल टैक्स

    पिछली बार 3 अगस्त को पेट्रोल निर्यात पर शुल्क 2.5 रुपये से बढ़ाकर 3.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया था। डीजल निर्यात पर विंडफॉल टैक्स 15.5 रुपये से बढ़कर 25.5 रुपये प्रति लीटर हो गया था। इसमें लगभग 10 रुपये की भारी बढ़ोतरी की गई। वहीं, एटीएफ के निर्यात पर शुल्क 14.5 रुपये से बढ़ाकर 22 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया था।


    जुलाई में डीजल-एटीएफ पर टैक्स बढ़ा, पेट्रोल का घटा

    गौरतलब है कि इससे पहले 16 जुलाई को हुई समीक्षा में सरकार ने डीजल और एटीएफ के शुल्क बढ़ाए थे, जबकि पेट्रोल पर शुल्क घटाया था। उस समय डीजल 8.5 से बढ़कर 15.5 रुपये, एटीएफ 7.5 से बढ़कर 14.5 रुपये, और पेट्रोल 4 रुपये से घटकर 2.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया था। इससे पहले की समीक्षा में पेट्रोल पर शुल्क 1.5 से बढ़ाकर 4 रुपये, डीजल 14 से घटाकर 8.5 रुपये और एटीएफ 12.5 से घटाकर 7.5 रुपये किया गया था।


    अप्रैल का क्या रहा हाल

    अगर हालिया बदलावों पर नजर डालें तो 30 अप्रैल को डीजल पर 23 रुपये और एटीएफ पर 33 रुपये का शुल्क लगाया गया था, जबकि पेट्रोल पर शून्य था। वहीं, 30 जून को पेट्रोल पर 4 रुपये, डीजल पर 8.5 रुपये और एटीएफ पर 7.5 रुपये का शुल्क निर्धारित किया गया था।

  • पाकिस्तान के 79वें स्वतंत्रता दिवस पर महंगा हुआ पेट्रोल-डीजल, जानें नई कीमतों से आम लोगों पर कितना बढ़ा बोझ

    पाकिस्तान के 79वें स्वतंत्रता दिवस पर महंगा हुआ पेट्रोल-डीजल, जानें नई कीमतों से आम लोगों पर कितना बढ़ा बोझ


    नई दिल्ली । 
    पाकिस्तान अपने 79वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर महंगाई की एक और चुनौती का सामना कर रहा है। देश में 14 अगस्त से पेट्रोल और हाई-स्पीड डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी लागू कर दी गई है। ईंधन के दाम बढ़ने का सीधा असर आम उपभोक्ताओं के साथ-साथ परिवहन और कारोबार की लागत पर पड़ने की संभावना है।

    नई व्यवस्था के तहत पेट्रोल की कीमत में 0.45 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर की वृद्धि की गई है। इसके बाद पेट्रोल का दाम 324.98 रुपये से बढ़कर 325.43 रुपये प्रति लीटर हो गया है। इस बढ़ोतरी के बाद देश में पेट्रोल की कीमत 325 रुपये प्रति लीटर के स्तर को पार कर गई है।

    हाई-स्पीड डीजल के दाम में इससे अधिक वृद्धि की गई है। इसकी कीमत 1.16 रुपये प्रति लीटर बढ़कर 382.79 रुपये से 383.95 रुपये प्रति लीटर हो गई है। नई दरें 14 अगस्त से प्रभावी मानी जा रही हैं। डीजल की कीमत में यह वृद्धि विशेष रूप से परिवहन क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि माल ढुलाई और सार्वजनिक परिवहन में डीजल की बड़ी भूमिका होती है।

    ईंधन की नई कीमतें पाकिस्तान के बदले हुए पेट्रोलियम मूल्य निर्धारण तंत्र के तहत तय की गई हैं। इस व्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों और तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का प्रभाव घरेलू ईंधन दरों पर तेजी से पड़ सकता है।

    पाकिस्तान में ईंधन कीमतों से जुड़ी व्यवस्था में हाल के महीनों में बदलाव किया गया है। जुलाई से लागू नई प्रणाली का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में होने वाले बदलावों के अनुरूप घरेलू कीमतों को समायोजित करना बताया गया है। पश्चिम एशिया में तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता के बीच ईंधन कीमतों पर दबाव बना हुआ है।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बदलाव का असर उन देशों पर ज्यादा पड़ता है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं। पाकिस्तान भी अपनी ईंधन जरूरतों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में वैश्विक कीमतों और विनिमय दर में बदलाव घरेलू बाजार में ईंधन की लागत को प्रभावित कर सकते हैं।

    पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि का असर केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहता। परिवहन लागत बढ़ने पर माल की ढुलाई महंगी हो सकती है, जिसका प्रभाव खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। पहले से महंगाई का सामना कर रही आबादी के लिए ईंधन की कीमत में मामूली वृद्धि भी घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।

    पाकिस्तान में इस वर्ष पहले भी ईंधन कीमतों में बदलाव देखने को मिले हैं। वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता, क्षेत्रीय तनाव और आयात लागत में बदलाव के कारण वहां ईंधन मूल्य निर्धारण लगातार चर्चा में रहा है।

    14 अगस्त को लागू हुई नई दरें ऐसे समय में आई हैं जब पाकिस्तान अपना स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। राष्ट्रीय उत्सव के बीच पेट्रोल और डीजल महंगा होने से महंगाई का मुद्दा एक बार फिर लोगों के बीच चर्चा में है। आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार की दिशा और क्षेत्रीय परिस्थितियां यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी कि पाकिस्तान में ईंधन की कीमतों पर आगे कितना दबाव बना रहता है।

  • प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों का बड़ा फैसला, मध्यरात्रि से सस्ते मिलेंगे पेट्रोल के दाम

    प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों का बड़ा फैसला, मध्यरात्रि से सस्ते मिलेंगे पेट्रोल के दाम

    नई दिल्ली ।अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में आई मजबूती को देखते हुए प्रमुख सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने पेट्रोल की खुदरा कीमतों में कटौती करने का निर्णय लिया है। कंपनियों द्वारा की गई इस कटौती के तहत पेट्रोल के दामों में औसतन 56 पैसे प्रति लीटर की कमी दर्ज की गई है। नई दरें मध्यरात्रि से देश भर में प्रभावी हो जाएंगी, जिससे वाहन चालकों और आम जनता को कुछ हद तक आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद है।

    कीमतों में संशोधन के बाद देश की राजधानी दिल्ली में इंडियन ऑयल के पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल की नई दरें 67.90 रुपये प्रति लीटर तय की गई हैं, जो इससे पहले 68.46 रुपये प्रति लीटर के स्तर पर दर्ज की जा रही थीं। देश की अन्य प्रमुख तेल विपणन कंपनियों भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन द्वारा भी इसी तर्ज पर अपने खुदरा मूल्यों में संशोधन किया जाता है। स्थानीय करों और भिन्न व्यवस्थाओं के कारण अलग-अलग कंपनियों के आउटलेट पर कीमतों में एक से दो पैसे का मामूली अंतर देखा जा सकता है।

    तेल कंपनियों द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, विभिन्न राज्यों में स्थानीय करों और वैट की दरों के आधार पर अलग-अलग शहरों में कटौती की राशि भिन्न रखी गई है। वित्तीय राजधानी मुंबई में पेट्रोल के दामों में 71 पैसे प्रति लीटर की कमी की गई है, जिसके बाद वहां नया मूल्य 74.43 रुपये प्रति लीटर हो जाएगा। इसी प्रकार कोलकाता में 70 पैसे प्रति लीटर की कटौती के साथ नई दर 75.44 रुपये प्रति लीटर और चेन्नई में 71 पैसे की कमी के साथ नया दाम 71.48 रुपये प्रति लीटर तय किया गया है।

    उल्लेखनीय है कि प्रशासनिक सुधारों के तहत पेट्रोल के मूल्य निर्धारण को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया था, जिससे तेल कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की लागत और विनिमय दर के अनुरूप कीमतें तय करने का अधिकार मिला है। इससे पहले जून माह के अंत में पेट्रोल की दरों में 70 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी।

    तेल विपणन कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि हाल के दिनों में डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर में सुधार दर्ज किया गया है, जिसके कारण आयात लागत पर आंशिक राहत मिली है। हालांकि, वैश्विक बाजार में अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें अब भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। कंपनियों का कहना है कि पूर्ण स्वतंत्रता मिलने के बावजूद बाजार की अनिश्चितताओं के कारण लागत के अनुपात में दरें नहीं बढ़ाई जा सकी थीं, जिससे चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में कंपनियों को संभावित राजस्व में काफी घाटे का सामना करना पड़ा है।

  • IOC को 2,661.37 करोड़ का घाटा… कंपनी बोली- पेट्रोल-डीजल-LPG के दाम नहीं से हुआ नुकसान

    IOC को 2,661.37 करोड़ का घाटा… कंपनी बोली- पेट्रोल-डीजल-LPG के दाम नहीं से हुआ नुकसान


    नई दिल्ली।
    सरकारी पेट्रोलियम कंपनी (State-Owned Petroleum Company) इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) (Indian Oil Corporation – IOC) ने चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही (April-June quarter) के नतीजे जारी कर दिए हैं। इस तिमाही में कंपनी को 2,661.37 करोड़ रुपये का बड़ा घाटा हुआ है। पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में कंपनी को 5,688.60 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ था जबकि जनवरी-मार्च 2026 तिमाही में कंपनी ने 11,377.51 करोड़ रुपये की कमाई हुई थी।


    घाटे की वजह क्या है?

    आईओसी के चेयरमैन ए.एस साहनी ने कहा कि पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण कच्चे तेल की लागत बढ़ने के बावजूद कंपनी ने अन्य सरकारी तेल कंपनियों की तरह पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस (एलपीजी) के दाम नहीं बढ़ाए। इसका नुकसान कंपनी को उठाना पड़ा। हालांकि, इससे हुए नुकसान की भरपाई काफी हद तक तेल रिफाइनरी मार्जिन और परिचालन दक्षता में सुधार से हुई। उन्होंने कहा, ”पहली तिमाही में कंपनी ने करीब 1.91 करोड़ टन कच्चे तेल का अब तक का सर्वाधिक प्रोसेसिंग किया। इसके साथ ही ईंधन और अन्य नुकसान की दर घटकर 8.04 प्रतिशत रही, जो पहले 8.5 प्रतिशत थी।”

    इसके साथ ही साहनी ने यह भी कहा कि जून तिमाही में 45 लाख टन पेट्रोल और करीब 1.8 करोड़ टन डीजल की रिकॉर्ड बिक्री हुई। इसके अलावा प्राकृतिक गैस की बिक्री भी 11 प्रतिशत बढ़ी, जिससे कंपनी को सहारा मिला। इस तिमाही में देश की सबसे बड़ी तेल कंपनी की परिचालन आय 26 प्रतिशत बढ़कर 2.75 लाख करोड़ रुपये हो गई।

    उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई लेकिन कंपनी ने पश्चिम अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका जैसे वैकल्पिक स्रोतों से खरीद बढ़ाकर कमी की भरपाई की। साहनी ने कहा कि कंपनी ने अगस्त के पूरे माह और सितंबर के कुछ दिनों तक के लिए कच्चे तेल की आपूर्ति सुनिश्चित कर ली है। उन्होंने कहा कि अगले 45-50 दिनों के लिए कच्चे तेल की उपलब्धता को लेकर कोई चिंता नहीं है।

    कंपनी का खर्च कम हुआ

    कंपनी की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक सरकार द्वारा पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क कम करने के कारण इस मद में कंपनी का खर्च एक साल पहले के 25,637 करोड़ रुपये से घटकर 13,536 करोड़ रुपये रह गया। वहीं, तैयार उत्पादों के दाम बढ़ने से उसे 20,925 करोड़ रुपये का फायदा हुआ। मौजूदा कर और लंबित कर के भुगतान में छूट से कंपनी को 613 करोड़ रुपये की बचत हुई।


    शेयर का परफॉर्मेंस

    इंडियन ऑयल के शेयर की बात करें तो यह शुक्रवार को मामूली बढ़त के साथ 140.15 रुपये पर बंद हुआ। अब सोमवार को शेयर पर निवेशकों की नजर रहेगी।

  • पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को लेकर फैली अफवाहों को सरकार ने बताया गलत, 10 बिंदुओं में दी सफाई

    पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को लेकर फैली अफवाहों को सरकार ने बताया गलत, 10 बिंदुओं में दी सफाई


    नई दिल्ली। पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल (E20) मिश्रण को लेकर सोशल मीडिया पर फैल रहे दावों पर सरकार ने विस्तृत सफाई दी है। कई पोस्टों में इंजन खराब होने, माइलेज घटने और बीमा रद्द होने जैसे दावे किए जा रहे थे, जिन्हें पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने पूरी तरह भ्रामक बताया है।

    मंत्रालय के अनुसार, E20 कार्यक्रम वैज्ञानिक शोध और कई देशों के लंबे अनुभव पर आधारित है। सरकार ने कहा कि वाहन मालिकों को किसी तरह की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह ईंधन मानकों के अनुरूप सुरक्षित है।

    सरकार ने 10 बिंदुओं में दी स्पष्ट जानकारी
    सरकार ने सोशल मीडिया पर फैल रही गलतफहमियों का जवाब देते हुए कई अहम तथ्य सामने रखे:-

    – एक लीटर एथेनॉल उत्पादन में 10,000 लीटर पानी लगने का दावा गलत है। सरकार के अनुसार, उत्पादन प्रक्रिया में केवल 3 से 5 लीटर प्रोसेस्ड पानी की आवश्यकता होती है और कई प्लांट जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) तकनीक से काम करते हैं।

    – E20 कोई नया प्रयोग नहीं है, बल्कि इसका उपयोग अमेरिका, ब्राजील, कनाडा, जापान, थाईलैंड और कई यूरोपीय देशों में लंबे समय से किया जा रहा है।
    – इंजन खराब होने का दावा गलत है। ARAI और अन्य संस्थाओं के अध्ययन में E20 से इंजन पर कोई बड़ा नकारात्मक प्रभाव नहीं पाया गया है, हालांकि पुराने वाहनों में कुछ रबर पार्ट्स बदलने की आवश्यकता हो सकती है।
    – परीक्षणों में केवल मामूली माइलेज बदलाव देखा गया है, जिससे वाहन की सामान्य कार्यक्षमता पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ता।
    – E20 के लिए डिजाइन या स्वीकृत वाहनों की वारंटी और बीमा पर कोई असर नहीं पड़ता।
    – फ्यूल ग्रेड एथेनॉल में चीनी नहीं होती और इसमें डिनैचुरेंट मिलाए जाते हैं, जिससे पेट्रोल की गंध हावी रहती है। इसलिए चींटियों या मधुमक्खियों के आकर्षित होने का दावा गलत है।
    – अदालत में E20 कार्यक्रम की वैधता पर नहीं, बल्कि एथेनॉल खरीद अनुबंधों से जुड़े मामलों पर सुनवाई हो रही थी।
    – आधुनिक वाहनों और पेट्रोल पंपों की संरचना ऐसी है कि फ्यूल टैंक में पानी जाने की संभावना न्यूनतम रहती है।
    – सोशल मीडिया पर वायरल ‘रस मिलाने’ वाला वीडियो फर्जी बताया गया है। मंत्रालय के अनुसार एथेनॉल औद्योगिक मानकों के तहत ही तैयार होता है।
    – सरकार का दावा है कि एथेनॉल मिश्रण से अब तक 1.9 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा बची है, किसानों को 1.6 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की आय मिली है, कच्चे तेल के आयात में 310 लाख मीट्रिक टन की कमी आई है और प्रदूषण में भी गिरावट दर्ज की गई है।
  • US: ट्रंप की तेल कंपनियों को सख्त चेतावनी, बोले- 'पेट्रोल के दाम कम करो वरना…'

    US: ट्रंप की तेल कंपनियों को सख्त चेतावनी, बोले- 'पेट्रोल के दाम कम करो वरना…'


    वाशिंगटन।
    अंतरराष्ट्रीय बाजार (International Market) में कच्चे तेल की कीमतों (Crude Oil Prices) में आई भारी गिरावट के बाद अब अमेरिकी राजनीति में उबाल आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने देश के सभी पेट्रोल रिटेलर्स (पेट्रोल पंप मालिकों) और बड़ी तेल कंपनियों को सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए ईंधन की कीमतों में तुरुंत कटौती करने का आदेश दिया है। ट्रंप ने तेल कंपनियों पर आम जनता की जेब काटने और ‘प्राइस गॉजिंग’ यानी नाजायज मुनाफाखोरी का सीधा आरोप लगाया है।

    राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया और आधिकारिक बयानों के जरिए अमेरिकी तेल कंपनियों और पेट्रोल पंप एसोसिएशनों को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने कहा कि हाल ही में वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों (जैसे अमेरिका-इरान वार्ता) और बाजार के रुख के कारण कच्चे तेल की कीमत गिरकर लगभग $68 प्रति बैरल पर आ गई।

    ट्रंप का तर्क है कि जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो ये कंपनियां कुछ ही घंटों में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा देती हैं। लेकिन अब जब कच्चा तेल $68 पर आ चुका है, तो आम अमेरिकी नागरिकों को इसका फायदा क्यों नहीं दिया जा रहा है?

    राष्ट्रपति ने केवल चेतावनी ही नहीं दी, बल्कि अमेरिकी न्याय विभाग को इस पूरे मामले की जांच करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने साफ कहा कि अगर रिटेलर्स ने तुरंत कीमतें कम नहीं कीं, तो उन्हें इसके गंभीर कानूनी नतीजे भुगतने होंगे।


    बड़ी कंपनियों पर आपदा में अवसर खोजने का आरोप

    Fortune और Al Jazeera की रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों में मिडिल-ईस्ट संकट और युद्ध के हालातों के चलते अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें आसमान छू रही थीं, जिससे आम जनता पर भारी आर्थिक दबाव था। इस संकट के दौरान वैश्विक तेल कंपनियों (जैसे एक्सॉनमोबिल, शेल और शेवरॉन) ने अरबों डॉलर का ‘अप्रत्याशित मुनाफा’ कमाया है।

    एक तरफ जहां आम अमेरिकी नागरिक $4.50 प्रति गैलन तक की दर से महंगा ईंधन खरीदने को मजबूर थे, वहीं शीर्ष तेल कंपनियों ने युद्ध के शुरुआती महीनों में ही करीब 23 अरब डॉलर का अतिरिक्त मुनाफा कूट लिया। ट्रंप प्रशासन का आरोप है कि बड़ी तेल कंपनियां इस मुनाफे का इस्तेमाल आम उपभोक्ताओं को राहत देने या भविष्य के संकट से निपटने के लिए निवेश करने के बजाय, अपने शेयर होल्डर्स को डिविडेंड बांटने और खुद की जेबें भरने में कर रही हैं।


    तेल कंपनियों की सफाई: “दाम हमारे हाथ में नहीं”

    इस तीखे हमले के बाद तेल उद्योग और रिफाइनिंग संगठनों ने भी अपनी सफाई पेश की है। उद्योग से जुड़े समूहों का कहना है कि पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें सीधे तौर पर केवल कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करतीं। इसके पीछे कई अन्य वैश्विक कारक होते हैं, जैसे:


    रिफाइनिंग क्षमता की कमी:
    कच्चे तेल को पेट्रोल में बदलने वाली रिफाइनरियों की अपनी सीमाएं और लागतें होती हैं।

    स्थानीय टैक्स का बोझ: कैलिफोर्निया जैसे अमेरिकी राज्यों में भारी स्थानीय गैस टैक्स लागू हैं, जिसकी वजह से भी पेट्रोल की कीमतें नीचे नहीं आ पा रही हैं, जिसकी खुद ट्रंप ने भी आलोचना की है।

    अमेरिका में इस समय महंगाई और ईंधन की बढ़ती कीमतें सबसे बड़ा घरेलू मुद्दा बनी हुई हैं। महंगे डीजल के कारण खाने-पीने की चीजों की ढुलाई महंगी हो गई है, जिससे सीधे तौर पर ग्रोसरी और अन्य जरूरी सामान के दाम बढ़ रहे हैं। यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन ने अब अपनी पुरानी ‘घरेलू तेल उत्पादन समर्थक’ छवि को थोड़ा बदलते हुए तेल कंपनियों के खिलाफ सीधे टकराव का रास्ता चुना है ताकि आम उपभोक्ताओं को तुरंत राहत पहुंचाई जा सके।

  • पेट्रोल-डीजल पर ड्यूटी कटौती से सरकार पर बढ़ा आर्थिक दबाव: जनता को राहत देने की कीमत ₹1 लाख करोड़, वित्त मंत्री ने रखी बड़ी तस्वीर

    पेट्रोल-डीजल पर ड्यूटी कटौती से सरकार पर बढ़ा आर्थिक दबाव: जनता को राहत देने की कीमत ₹1 लाख करोड़, वित्त मंत्री ने रखी बड़ी तस्वीर


    नई दिल्ली। देश में बढ़ती ईंधन कीमतों के बीच आम जनता को राहत देने के उद्देश्य से उठाए गए कदम का अब आर्थिक असर भी सामने आने लगा है। पेट्रोल और डीजल पर करों में कटौती के बाद जहां उपभोक्ताओं को कुछ राहत महसूस हुई है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी खजाने पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ने की बात कही जा रही है। आर्थिक मोर्चे पर यह फैसला एक संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें जनता को तत्काल राहत और राजस्व पर पड़ने वाले असर के बीच सरकार को संतुलन साधना पड़ रहा है।

    हाल के समय में वैश्विक हालातों ने ऊर्जा बाजारों पर गहरा असर डाला है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए ऐसी परिस्थितियां अतिरिक्त चुनौती पैदा करती हैं। ऐसे समय में ईंधन की बढ़ती कीमतें सीधे आम आदमी और व्यापारिक गतिविधियों दोनों को प्रभावित करती हैं। इसी कारण सरकार ने कीमतों के दबाव को कम करने के लिए ईंधन पर लगने वाले करों में राहत देने का रास्ता चुना।

    सरकार के इस फैसले से देशभर में ईंधन की कीमतों पर कुछ हद तक नियंत्रण दिखाई दिया, जिससे परिवहन लागत और दैनिक खर्चों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने की कोशिश की गई। हालांकि आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि इस प्रकार की राहत का सीधा असर सरकारी आय पर भी पड़ता है। राजस्व में कमी का प्रभाव भविष्य की आर्थिक योजनाओं और विकास परियोजनाओं पर भी दिखाई दे सकता है। इसलिए ऐसे फैसले केवल उपभोक्ताओं को राहत देने तक सीमित नहीं होते बल्कि उनके दीर्घकालिक आर्थिक परिणाम भी होते हैं।

    वित्तीय मामलों से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की मौजूदा आर्थिक चुनौतियां केवल घरेलू कारणों से नहीं बल्कि वैश्विक परिस्थितियों से भी प्रभावित हैं। विदेशी बाजारों में लगातार हो रहे बदलाव, कमोडिटी कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक मुद्रा बाजार की अस्थिरता जैसे कारक भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर डाल रहे हैं। ऐसे माहौल में नीति निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वे आम लोगों को राहत देने के साथ आर्थिक स्थिरता भी बनाए रखें।

    इसके अलावा उद्योग और व्यापार से जुड़े क्षेत्रों में भी समय पर भुगतान और वित्तीय अनुशासन पर जोर दिया जा रहा है। छोटे और मध्यम उद्योगों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर भी ध्यान केंद्रित किया जा रहा है, ताकि आर्थिक गतिविधियों की गति प्रभावित न हो। विशेषज्ञ मानते हैं कि अर्थव्यवस्था की मजबूती केवल बड़े फैसलों से नहीं बल्कि छोटे स्तर पर वित्तीय अनुशासन बनाए रखने से भी तय होती है।

    इस बीच ईंधन कीमतों में लगातार हो रहे बदलाव ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। आने वाले समय में वैश्विक परिस्थितियां किस दिशा में जाती हैं, इसका सीधा असर भारत के ऊर्जा बाजार और आर्थिक स्थिति पर देखने को मिल सकता है। फिलहाल सरकार राहत और आर्थिक संतुलन के बीच रास्ता निकालने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।

  • दुनिया में ईंधन महंगा, लेकिन भारत ने संभाली रफ्तार, पेट्रोल-डीजल कीमतों में राहत भरी तस्वीर

    दुनिया में ईंधन महंगा, लेकिन भारत ने संभाली रफ्तार, पेट्रोल-डीजल कीमतों में राहत भरी तस्वीर

    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की आपूर्ति पर बढ़ते दबाव का असर अब दुनिया भर के देशों की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। इसी कड़ी में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है। हालांकि वैश्विक स्तर पर ईंधन की कीमतों में तेज उछाल के बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि अन्य तेल आयातक देशों की तुलना में काफी कम रही है। यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब कई देश ईंधन संकट और महंगाई की दोहरी चुनौती का सामना कर रहे हैं।

    मध्य पूर्व में जारी संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल आपूर्ति मार्गों पर असर पड़ा है। रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग प्रभावित होने से वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ी है। इसका सीधा असर ईंधन की कीमतों पर पड़ा और देश में तेल कंपनियों ने मई महीने के दौरान कई बार कीमतों में बदलाव किया। इन संशोधनों के बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कुल मिलाकर लगभग साढ़े सात प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। हालांकि यह वृद्धि अन्य देशों की तुलना में काफी सीमित मानी जा रही है।

    राजधानी में पेट्रोल और डीजल दोनों के दामों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ईंधन कीमतों में बदलाव के कारण आम उपभोक्ताओं पर असर महसूस किया जा रहा है, लेकिन वैश्विक तुलना में भारत की स्थिति अपेक्षाकृत संतुलित बनी हुई है। दुनिया के कई देशों में पेट्रोल की कीमतें पहले ही बेहद ऊंचे स्तर पर पहुंच चुकी हैं और कई अर्थव्यवस्थाओं में उपभोक्ताओं को भारी आर्थिक बोझ उठाना पड़ रहा है।

    विकसित देशों और यूरोप के कई हिस्सों में ईंधन की कीमतें काफी ऊंची बनी हुई हैं। कई देशों में पेट्रोल और डीजल के दाम भारतीय बाजार की तुलना में काफी अधिक हैं। वहीं भारत के पड़ोसी देशों में भी ईंधन कीमतों ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। कम आय वाले कई देशों में पेट्रोल की कीमतें तेजी से ऊपर पहुंची हैं, जिससे वहां महंगाई का दबाव और बढ़ गया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने ईंधन कीमतों को लेकर अपेक्षाकृत संतुलित रणनीति अपनाई है। अन्य बड़े आयातक देशों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ी लागत का सीधा बोझ उपभोक्ताओं पर डाल दिया, जबकि भारत में वृद्धि नियंत्रित स्तर पर देखने को मिली। इसी कारण देश में कीमतों में वृद्धि की रफ्तार सीमित रही है।

    वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और ऊर्जा संकट के इस दौर में ईंधन की कीमतें आने वाले समय में भी महत्वपूर्ण मुद्दा बनी रह सकती हैं। फिलहाल भारत में हालात अन्य देशों की तुलना में कुछ हद तक नियंत्रित दिखाई दे रहे हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति में बदलाव भविष्य में नई चुनौतियां भी खड़ी कर सकता है। ऐसे में देश की नजरें अब वैश्विक तेल बाजार की अगली दिशा पर टिकी हुई हैं।

  • पेट्रोल-डीजल पर समान कर और आर्थिक राहत के लिए सांसद पात्रा ने जीएसटी परिषद में चरणबद्ध योजना की मांग की

    पेट्रोल-डीजल पर समान कर और आर्थिक राहत के लिए सांसद पात्रा ने जीएसटी परिषद में चरणबद्ध योजना की मांग की

    नई दिल्ली।पेट्रोल और डीजल को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे में लाने की मांग राजनीतिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर तेज हो रही है। राज्यसभा सांसद डॉ. सस्मित पात्रा ने इस संबंध में केंद्रीय वित्त मंत्री से मुलाकात कर विस्तृत प्रस्ताव सौंपा और इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर संरचित और व्यापक चर्चा शुरू करने की अपील की। उनके अनुसार, पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी में शामिल करना केवल कर सुधार का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह आम जनता, उद्योग और परिवहन क्षेत्र में आर्थिक संतुलन स्थापित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

    डॉ. पात्रा ने अपने प्रस्ताव में संविधान के अनुच्छेद 279ए(5) का हवाला देते हुए कहा कि पेट्रोलियम उत्पादों को भविष्य में जीएसटी के दायरे में लाने का प्रावधान पहले से मौजूद है। हालांकि, उन्होंने यह स्वीकार किया कि पहले भी इस विषय पर जीएसटी परिषद में चर्चा हुई थी, लेकिन मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों और महंगाई की चुनौतियों को देखते हुए अब इस पर नए सिरे से व्यावहारिक और संतुलित विचार करना आवश्यक है।

    सांसद ने कहा कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों का सीधा असर महंगाई, परिवहन लागत, लॉजिस्टिक्स खर्च, कृषि उत्पादन लागत, एमएसएमई सेक्टर के संचालन और आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है। वर्तमान में अलग-अलग राज्यों में वैट की अलग-अलग दरें होने के कारण जीएसटी का उद्देश्य—एक समान कर और एकीकृत बाजार—पूरी तरह पूरा नहीं हो पा रहा है। उनके अनुसार, यदि पेट्रोल-डीजल को चरणबद्ध तरीके से जीएसटी में शामिल किया जाता है तो माल ढुलाई और सप्लाई चेन की लागत में कमी आएगी, जिससे उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी और आम लोगों, किसानों तथा ट्रांसपोर्ट ऑपरेटरों को राहत मिलेगी।

    ओडिशा को उदाहरण के रूप में लेते हुए सांसद पात्रा ने बताया कि यह राज्य खनन, उद्योग और लॉजिस्टिक्स गतिविधियों का बड़ा केंद्र है। यदि यहां के उद्योग और व्यवसाय जीएसटी के तहत समान कर व्यवस्था का लाभ उठाएं, तो न केवल राज्य बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को भी स्थिरता और पारदर्शिता मिलेगी। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि राज्यों को मिलने वाले राजस्व पर ध्यान रखते हुए पेट्रोलियम उत्पादों को तुरंत जीएसटी में शामिल करने की बजाय चरणबद्ध और संतुलित मॉडल अपनाया जाए।

    डॉ. पात्रा ने जीएसटी परिषद को सुझाव दिया कि इसके लिए अलग जीएसटी स्लैब, राज्यों के लिए ट्रांजिशनल मुआवजा, सीमित अवधि का उपकर (सेस) और वित्तीय स्थिरता के लिए तय फॉर्मूला तैयार करने पर विचार किया जाए। उन्होंने वित्त मंत्री से आग्रह किया कि इस मुद्दे पर सभी राज्यों के साथ व्यापक चर्चा कराई जाए और एक तकनीकी व वित्तीय विशेषज्ञ समूह का गठन किया जाए, जो चरणबद्ध तरीके से पेट्रोल और डीजल को जीएसटी में शामिल करने का मॉडल तैयार कर सके और राष्ट्रीय सहमति बनाने में मदद करे।

    डॉ. सस्मित पात्रा ने कहा कि पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के तहत लाना केवल कर सुधार नहीं होगा, बल्कि यह देश में आर्थिक संतुलन, उद्योगों की प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और आम लोगों को महंगाई से राहत देने की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा। उनका मानना है कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी, आपूर्ति श्रृंखला की लागत कम होगी और भारत का एकीकृत बाजार अधिक प्रभावी तरीके से काम करेगा।