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  • फ्रांस में फिर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन, सड़कों पर उतरे लाखों लोग, 1,000 से ज्यादा गिरफ्तार

    फ्रांस में फिर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन, सड़कों पर उतरे लाखों लोग, 1,000 से ज्यादा गिरफ्तार


    नई दिल्ली। फ्रांस में महंगाई, रोजगार, वेतन, पेंशन और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी मांगों को लेकर शनिवार, 24 अक्टूबर को एक बार फिर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। राजधानी पेरिस समेत देश के कई शहरों में लोग सड़कों पर उतरे। फ्रांस के गृह मंत्रालय के मुताबिक, देशभर में करीब 4 लाख 10 हजार लोगों ने प्रदर्शन में हिस्सा लिया, जबकि लगभग 1,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पेरिस में मार्च के अंतिम चरण में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई। हालात नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी और पानी की बौछार का इस्तेमाल किया।

    गृह मंत्रालय के अनुसार, शनिवार को सबसे बड़ा प्रदर्शन पेरिस में हुआ, जहां करीब 1 लाख 10 हजार लोग मार्च में शामिल हुए। शुरुआत में प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन बाद में कुछ जगहों पर स्थिति बिगड़ गई। अधिकारियों के मुताबिक, गिरफ्तारियों की संख्या बढ़ सकती है।

    पेरिस में मार्च के दौरान पुलिस से भिड़े प्रदर्शनकारी
    प्रशासन ने पेरिस में प्रदर्शन का मार्ग शहर के दक्षिण-पूर्वी हिस्से तक सीमित रखा था। मार्च पोर्त द’इटली से शुरू होकर पोर्त द विन्सेन्स तक पहुंचा। इस दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने प्लास द ला नासियों की ओर बढ़ने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उन्हें रोक दिया। इसके बाद कुछ स्थानों पर तनाव बढ़ गया और पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस तथा पानी की बौछार का इस्तेमाल किया।

    पेरिस अभियोजक कार्यालय के मुताबिक, शनिवार के प्रदर्शन के सिलसिले में 64 लोगों को गिरफ्तार किया गया और 40 लोगों को पुलिस हिरासत में रखा गया। गिरफ्तार लोगों में छह नाबालिग भी शामिल हैं। इनमें से ज्यादातर पर हथियार रखने या हिंसा और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की तैयारी करने वाले समूहों में शामिल होने का संदेह है।

    लियोन, स्ट्रासबर्ग और मार्सेय में भी तनाव
    पेरिस के अलावा लियोन, क्लेरमोंट-फेरां और स्ट्रासबर्ग में भी पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल किया। नीस और नांतेस में पानी की बौछार करने वाली गाड़ियों को तैनात किया गया। मार्सेय में प्रदर्शन के अंतिम हिस्से के पास कुछ दर्जन लोगों और पुलिस के बीच झड़प हुई।

    प्रदर्शन को देखते हुए फ्रांस के गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज ने पहले ही देशभर में 70 हजार पुलिसकर्मियों की तैनाती का ऐलान किया था। सुरक्षा व्यवस्था के तहत हेलीकॉप्टर, बख्तरबंद वाहन और पानी की बौछार करने वाली गाड़ियों को भी लगाया गया।

    यह प्रदर्शन पिछले सप्ताह हुई हिंसा के बाद हुआ है। इससे पहले शनिवार को 5 लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर उतरे थे। उस दौरान फ्रांसभर में करीब 3 हजार दुकानों को नुकसान पहुंचाया गया था या उन्हें लूट लिया गया था।

    स्कूलों में शिक्षकों की कमी और महंगाई के खिलाफ आंदोलन
    फ्रांस में यह आंदोलन पिछले महीने पेरिस के दक्षिण-पूर्व में स्थित एक हाई स्कूल में कर्मचारियों की कमी के विरोध से शुरू हुआ था। धीरे-धीरे यह देश के अन्य हिस्सों में भी फैल गया। छात्र बेहतर शिक्षा व्यवस्था और शिक्षकों की नियुक्ति की मांग कर रहे हैं, जबकि कर्मचारियों की मांगों में ज्यादा वेतन और बेहतर पेंशन शामिल हैं।

    शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, शैक्षणिक वर्ष 2024-25 में सरकारी मिडिल और हाई स्कूलों में शिक्षकों की गैरमौजूदगी के कारण 1 करोड़ 54 लाख शिक्षण घंटे प्रभावित हुए। यह कुल निर्धारित शिक्षण समय का 7.5 प्रतिशत था।

    छात्र संगठन उच्च शिक्षा में 2 लाख 50 हजार अतिरिक्त सीटें बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। वे राष्ट्रीय प्रवेश व्यवस्था के तहत होने वाली चयन प्रक्रिया को खत्म करने, स्कूलों और विश्वविद्यालयों में ज्यादा शिक्षकों की नियुक्ति करने और शैक्षणिक संस्थानों की मरम्मत कराने की भी मांग कर रहे हैं।

    इसके अलावा छात्र हर महीने छात्रवृत्ति में 200 यूरो की बढ़ोतरी और सरकारी छात्र आवासों का किराया रोकने की मांग कर रहे हैं। प्रदर्शन में महंगाई, रोजगार के अवसर और आम लोगों की आर्थिक परेशानियां भी प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं।

    प्रदर्शन पर प्रतिबंध से ट्रेड यूनियन नाराज
    फ्रांस के प्रशासन ने लियोन, नीस और मोंपेलिए समेत कुछ शहरों में प्रदर्शनों पर रोक लगा दी थी। ट्रेड यूनियनों ने इन प्रतिबंधों का विरोध किया है। उनका कहना है कि इस तरह की रोक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करती है।

    इस बीच, येलो वेस्ट मूवमेंट से जुड़े संगठनों ने 31 अक्टूबर को फिर प्रदर्शन करने का आह्वान किया है। शिक्षा, महंगाई, वेतन और पेंशन से जुड़ी मांगों को लेकर जारी आंदोलन के कारण फ्रांस में आने वाले दिनों में भी विरोध प्रदर्शन होने की संभावना बनी हुई है।

  • महंगाई, महंगे किराए और भ्रष्टाचार के खिलाफ यूरोप में उग्र प्रदर्शन, फ्रांस से बाल्कन तक बढ़ा जनाक्रोश

    महंगाई, महंगे किराए और भ्रष्टाचार के खिलाफ यूरोप में उग्र प्रदर्शन, फ्रांस से बाल्कन तक बढ़ा जनाक्रोश


    नई दिल्ली ।
    यूरोप के कई देशों में बढ़ती महंगाई, महंगे आवास, कमजोर सार्वजनिक सेवाओं और सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ जनाक्रोश तेज हो गया है। फ्रांस, इटली, स्पेन, पुर्तगाल और बाल्कन क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों में लोग सड़कों पर उतरकर सरकारों की नीतियों के खिलाफ विरोध जता रहे हैं। कई स्थानों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन हिंसक झड़पों, तोड़फोड़ और आगजनी में बदल गए हैं। युवाओं, छात्रों और कामगारों की भागीदारी ने इन आंदोलनों को व्यापक रूप दे दिया है।

    फ्रांस में आंदोलन की शुरुआत माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों और शैक्षणिक संसाधनों की कमी के विरोध से हुई। छात्र तीन सप्ताह से अधिक समय तक स्कूलों की नाकेबंदी कर रहे थे। बाद में श्रमिक संगठन सीजीटी और आम नागरिक भी इसमें शामिल हो गए। इसके बाद प्रदर्शन महंगाई और पेंशन नीतियों के विरोध तक फैल गया। पेरिस, मार्सिले, ल्योन और बोर्डो में झड़पों तथा लूटपाट की घटनाएं हुईं। लिमोज में 19वीं सदी के ऐतिहासिक सिटी हॉल को आग लगाए जाने से भारी नुकसान हुआ। देशभर में अब तक 2,400 लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि गणराज्य और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों से नुकसान की भरपाई कराई जाएगी।

    इटली में महंगाई और घटती क्रय शक्ति के खिलाफ ‘इटालिया इन पियाजा’ आंदोलन के तहत हजारों लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। मिलान, ट्यूरिन और बोलोन्या में निकाले गए मार्च के दौरान कुछ स्थानों पर हिंसा भड़क गई। दुकानों में लूटपाट और वाहनों में आग लगाने की घटनाएं हुईं, जबकि सुरक्षा बलों के 14 जवान घायल हो गए। मिलान में दो दिनों के दौरान 271 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें अधिकांश नाबालिग बताए गए हैं। प्रदर्शनकारी रोजगार की सुरक्षा, न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अधिक बजट की मांग कर रहे हैं।

    स्पेन और पुर्तगाल में आवास संकट विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख कारण बन गया है। स्पेन में न्यूनतम मासिक वेतन 1,221 यूरो बताया गया है, जबकि 80 वर्ग मीटर के सामान्य अपार्टमेंट का औसत किराया 1,130 यूरो तक पहुंच गया है। इस अंतर के कारण कई लोगों के लिए भोजन, परिवहन और अन्य जरूरतों पर खर्च करना मुश्किल हो रहा है। बार्सिलोना और मैड्रिड के पुएर्ता डेल सोल चौक पर प्रदर्शनकारियों ने कई सप्ताह से तंबू लगा रखे हैं। 87 वर्षीय मारिकारमेन को घर से बेदखल किए जाने और बाद में अस्पताल में उनकी मृत्यु की घटना ने भी आक्रोश बढ़ाया है। मैड्रिड में प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों ने वेतन वृद्धि की मांग पर अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू की है। लिस्बन और पोर्टो में भी विरोध जारी है।

    बाल्कन क्षेत्र में अल्बानिया और सर्बिया में सरकारों के खिलाफ असंतोष प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। अल्बानिया की राजधानी तिराना में लगातार छठे दिन विरोध प्रदर्शन हिंसक रहे। छात्रों और युवाओं के ‘फ्लेमिंगो’ आंदोलन से जुड़े प्रदर्शनकारियों ने शिक्षा मंत्रालय के बाहर बैरिकेड्स में आग लगाई और प्रधानमंत्री एदि रामा के इस्तीफे की मांग की। रामा ने आरोप लगाया कि अति-वामपंथी एंटीफा समूह प्रदर्शनकारियों को भड़का रहे हैं। सर्बिया में विश्वविद्यालय के छात्र पिछले दो वर्षों से भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। वे 25 अक्टूबर 2026 को होने वाले आम चुनावों से पहले राष्ट्रपति अलेक्जेंडर वुसिक की सत्ता में वापसी की संभावनाओं को चुनौती दे रहे हैं।

    इन घटनाओं ने यूरोप में राजनीतिक अस्थिरता और आगामी चुनावों को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं। कई देशों में दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी दल आर्थिक असंतोष को राजनीतिक मुद्दा बना रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस की हिंसा के लिए प्रवासियों को जिम्मेदार ठहराते हुए सीमाएं पूरी तरह बंद करने की मांग की है। हालांकि, फ्रांस के स्थानीय प्रशासन ने विरोध के पीछे आम नागरिकों की आर्थिक परेशानियों और जीवन स्तर में गिरावट को प्रमुख कारण बताया है। महंगाई, आवास और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी समस्याओं पर सरकारें कितनी प्रभावी राहत देती हैं, इसका असर आने वाले महीनों में यूरोप की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति पर पड़ सकता है।

  • यूरोप में महंगाई और कम वेतन के खिलाफ सड़कों पर उतरे लाखों लोग, फ्रांस में हिंसा और आगजनी के बाद हजार से ज्यादा गिरफ्तार

    यूरोप में महंगाई और कम वेतन के खिलाफ सड़कों पर उतरे लाखों लोग, फ्रांस में हिंसा और आगजनी के बाद हजार से ज्यादा गिरफ्तार


    नई दिल्ली ।
    यूरोप के कई देशों में बढ़ती महंगाई, कम वेतन, महंगे मकानों और सार्वजनिक सेवाओं की खराब स्थिति के खिलाफ 17 अक्टूबर को बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। फ्रांस, बेल्जियम, इटली और पुर्तगाल में हजारों से लेकर बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे। प्रदर्शनकारियों ने जीवनयापन की बढ़ती लागत और आम लोगों की आर्थिक परेशानियों को लेकर नाराजगी जताई। फ्रांस में कई जगह प्रदर्शन के दौरान हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़ और दुकानों में लूटपाट की घटनाएं सामने आईं। पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस और बल प्रयोग किया। फ्रांस में अधिकारियों के अनुसार, प्रदर्शनों में 5.5 लाख से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया, जबकि आयोजकों के अनुमान इससे ज्यादा बताए गए।

    फ्रांस में प्रदर्शन की शुरुआत स्कूलों की स्थिति और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं के साथ हुई थी। बाद में आंदोलन का दायरा बढ़ा और इसमें ईंधन की बढ़ती कीमतों, महंगाई, कम वेतन तथा जीवनयापन की लागत जैसे मुद्दे भी शामिल हो गए। पेरिस, मार्सेई, नीस, नांत, बोर्डो, लिमोज, लिली, टूलूज और स्ट्रासबर्ग समेत कई शहरों में प्रदर्शन हुए। कुछ स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं। कई दुकानों और सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में तोड़फोड़ तथा लूटपाट की घटनाएं भी दर्ज की गईं।

    लिमोज शहर में 143 साल पुराने ऐतिहासिक टाउन हॉल में आग लगा दी गई। इस घटना में इमारत को भारी नुकसान पहुंचा। स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, आग के कारण उसकी छत नीचे की मंजिलों पर गिर गई। शुरुआती जानकारी में इमारत के बाहरी हिस्से का करीब दो-तिहाई भाग नष्ट होने की बात कही गई। अधिकारियों ने इसे शहर की ऐतिहासिक विरासत के लिए बड़ा नुकसान बताया। हिंसा के दौरान कई अन्य स्थानों पर भी आगजनी और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं सामने आईं। हालांकि, बड़ी संख्या में लोगों ने शांतिपूर्ण मार्च में भी हिस्सा लिया।

    फ्रांस में हिंसा के बाद गिरफ्तारियों का आंकड़ा एक हजार से अधिक पहुंच गया। अलग-अलग समय पर जारी रिपोर्टों में गिरफ्तारी की संख्या में अंतर रहा। प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठे। कुछ रिपोर्टों में प्रदर्शनकारियों के घायल होने और नाबालिगों के साथ पुलिस के व्यवहार पर विवाद का उल्लेख किया गया। इन मामलों में अंतिम स्थिति संबंधित जांच और आधिकारिक जानकारी पर निर्भर करेगी।

    फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हिंसक गतिविधियों के बीच अंतर करते हुए सार्वजनिक इमारतों, दुकानों और पुलिस पर हमला करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही। सरकार ने स्पष्ट किया कि आगजनी, तोड़फोड़ और लूटपाट में शामिल लोगों को कानून के तहत जवाबदेह बनाया जाएगा।

    बेल्जियम में भी विरोध प्रदर्शनों के दौरान तनाव देखने को मिला। राजधानी ब्रसेल्स में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं। पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। अधिकारियों के अनुसार, कुछ प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर वस्तुएं फेंकीं और आगजनी की घटनाएं भी हुईं। लीज शहर में भी पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। वहां शिक्षा की बढ़ती लागत और उच्च शिक्षा तक पहुंच को लेकर चिंताएं भी विरोध के प्रमुख मुद्दों में शामिल रहीं।

    पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन समेत कई शहरों में हजारों लोगों ने महंगाई, कम वेतन और आवास संकट के खिलाफ प्रदर्शन किया। लोगों ने बेहतर वेतन, पेंशन और सार्वजनिक सेवाओं की मांग उठाई। मकानों की कीमतों और किराये में लगातार बढ़ोतरी से आम लोगों के लिए घर खरीदना या किराये पर लेना मुश्किल हो रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2017 के बाद से वहां मकानों की कीमतें दोगुने से अधिक हो चुकी हैं। नए किरायेदारी समझौतों में भी किराये में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। सरकार के संसदीय मामलों के मंत्री कार्लोस अब्रू अमोरिम ने कहा था कि सरकार सड़कों पर उठने वाले नारों के दबाव में नहीं झुकेगी। प्रदर्शनकारियों ने राजनीतिक नेतृत्व पर आम लोगों की समस्याओं से दूर रहने का आरोप लगाया।

    इटली के मिलान और बोलोन्या में भी जीवनयापन की बढ़ती लागत के खिलाफ प्रदर्शन हुए। कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पत्थर फेंके और अधिकारियों के साथ झड़प की, जबकि अन्य स्थानों पर मार्च शांतिपूर्ण रहे। अलग-अलग देशों में विरोध के स्थानीय मुद्दे भले ही अलग थे, लेकिन महंगाई, आवास की बढ़ती लागत, कम वेतन और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति को लेकर असंतोष प्रमुख रहा। इन प्रदर्शनों ने यूरोपीय सरकारों पर आर्थिक और सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए दबाव बढ़ाया है।

  • दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों से बाजारों का कारोबार प्रभावित, त्योहारों की बिक्री पर संकट; व्यापारियों ने अमित शाह को लिखा पत्र

    दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों से बाजारों का कारोबार प्रभावित, त्योहारों की बिक्री पर संकट; व्यापारियों ने अमित शाह को लिखा पत्र

    नई दिल्ली । दिल्ली में जारी विरोध प्रदर्शनों का असर राजधानी के बाजारों और व्यापारिक गतिविधियों पर पड़ने की चिंता बढ़ गई है। व्यापारियों का कहना है कि प्रदर्शन के कारण कई इलाकों में दुकानों को बंद रखना पड़ रहा है और बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही भी प्रभावित हो रही है। इसका असर ऐसे समय में दिखाई दे रहा है, जब दशहरा और दिवाली जैसे प्रमुख त्योहारों के कारण कारोबार में तेजी आने की उम्मीद रहती है। इस स्थिति को लेकर विभिन्न व्यापारी संगठनों ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर अपनी समस्याएं बताई हैं और बाजारों में सामान्य गतिविधियां बनाए रखने की मांग की है।

    राजधानी में केंद्र सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन जारी हैं। व्यापारियों के अनुसार, इन प्रदर्शनों के कारण कई बाजारों में लोग खरीदारी के लिए आने से बच रहे हैं। उनका कहना है कि जब सड़कों पर प्रदर्शन होते हैं और लोगों को आवाजाही में परेशानी या असुरक्षा की आशंका रहती है, तो बाजारों में ग्राहकों की संख्या घट जाती है। इससे दुकानदारों की बिक्री प्रभावित होती है और त्योहारों के दौरान होने वाली कमाई पर भी असर पड़ सकता है।

    दिल्ली इलेक्ट्रिकल ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अजय शर्मा ने कहा कि दशहरा और दिवाली का समय बिजली की सजावटी लाइटों, झूमरों और घरों को सजाने वाले सामान के कारोबार के लिए महत्वपूर्ण होता है। इन त्योहारों के दौरान लोग घरों और प्रतिष्ठानों की सजावट के लिए बड़ी संख्या में सामान खरीदते हैं। ऐसे में बाजारों में मांग बढ़ने से व्यापारियों को साल के इस हिस्से में बेहतर कारोबार की उम्मीद रहती है। हालांकि, मौजूदा प्रदर्शनों के कारण उन्हें बिक्री प्रभावित होने की चिंता सता रही है।

    अजय शर्मा ने सरकार और प्रदर्शन कर रहे लोगों से अपील की कि फिलहाल विरोध प्रदर्शनों को टालने पर विचार किया जाए, ताकि व्यापारिक गतिविधियां बाधित न हों। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनों के कारण लोग सड़कों पर निकलने से डर रहे हैं। उनके मुताबिक, अपनी मांगों और मुद्दों को लेकर बातचीत के जरिए समाधान निकालना चाहिए, जिससे विरोध भी दर्ज हो सके और आम लोगों तथा कारोबारियों को परेशानी का सामना न करना पड़े।

    व्यापारी संगठनों ने यह भी चिंता जताई है कि कारोबार में गिरावट का असर केवल दुकानदारों तक सीमित नहीं रहेगा। बाजारों में बिक्री कम होने पर सरकार को मिलने वाले कर राजस्व पर भी प्रभाव पड़ सकता है। व्यापारियों का तर्क है कि त्योहारों के दौरान खरीदारी में कमी आने से व्यापारिक गतिविधियां कमजोर हो सकती हैं, जिसका असर संबंधित कारोबार और उससे जुड़े लोगों की आय पर पड़ेगा।

    फोटो मार्केट ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय कुमार सेठी ने कहा कि देश में त्योहारों का कारोबारी मौसम 15 अगस्त के बाद शुरू हो जाता है। रक्षाबंधन से लेकर दिवाली के बाद तक बाजारों में आम तौर पर खरीदारी और बिक्री का स्तर बेहतर रहता है। उन्होंने बताया कि व्यापारियों की सालभर की कमाई का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा इन चार महीनों में आता है। ऐसे में इस अवधि के दौरान कारोबार प्रभावित होने से उनकी आर्थिक स्थिति पर गंभीर असर पड़ सकता है।

    सेठी ने प्रदर्शनों के तरीके पर भी सवाल उठाए और इन गतिविधियों को अराजकता बताते हुए आरोप लगाया कि इनके जरिए देश की स्थिरता को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क पर भी भारत के लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने की मंशा रखने का आरोप लगाया और अपनी बात रखते हुए नेपाल तथा श्रीलंका में हुए घटनाक्रमों से तुलना की। ये आरोप उनके निजी बयान के रूप में सामने आए हैं।

    सेठी ने सरकार से मांग की कि मध्य दिल्ली के प्रमुख व्यापारिक इलाकों में प्रदर्शनों की अनुमति देने के मामले में विशेष ध्यान रखा जाए। व्यापारियों का कहना है कि विरोध और अपनी मांगें रखने के अधिकार के साथ बाजारों की सामान्य गतिविधियों को बनाए रखना भी जरूरी है। उनका आग्रह है कि ऐसी व्यवस्था हो, जिससे त्योहारों के दौरान ग्राहक बाजारों तक पहुंच सकें और व्यापारियों को लगातार कारोबार प्रभावित होने की स्थिति का सामना न करना पड़े।

  • फौजी पिता की बेटी नेहा बोरा कैसे बनीं Gen-Z की चर्चित आवाज, थिएटर से जेएनयू और छात्र राजनीति तक का सफर

    फौजी पिता की बेटी नेहा बोरा कैसे बनीं Gen-Z की चर्चित आवाज, थिएटर से जेएनयू और छात्र राजनीति तक का सफर

    नई दिल्ली ।नेहा बोरा इन दिनों छात्र राजनीति और युवा आंदोलनों में अपनी सक्रिय भूमिका के कारण चर्चा में हैं। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में वह छात्र अधिकारों और विभिन्न मुद्दों पर होने वाले प्रदर्शनों में शामिल रही हैं। हाल के दिनों में चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली की सड़कों पर उनकी गतिविधियों के वीडियो सामने आए। आरके आश्रम मेट्रो स्टेशन, कनॉट प्लेस और विजय चौक के आसपास पुलिस से बचते हुए आगे बढ़ने के उनके वीडियो इंटरनेट पर प्रसारित हुए हैं। इन घटनाओं के बाद नेहा बोरा की पृष्ठभूमि और छात्र राजनीति तक पहुंचने का उनका सफर भी चर्चा का विषय बना है।

    नेहा का जन्म उत्तराखंड के खटीमा में हुआ था। उनके पिता भारतीय सेना में अधिकारी थे और नौकरी के कारण परिवार को अलग-अलग स्थानों पर रहना पड़ता था। इस वजह से नेहा का बचपन विभिन्न सैन्य छावनियों और अलग-अलग सांस्कृतिक परिवेशों में बीता। उन्होंने दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं की पढ़ाई पश्चिम बंगाल में पूरी की। उनके मुताबिक, स्कूली शिक्षा के दौरान ही उनकी वैचारिक समझ विकसित होने लगी थी। इसी समय वह कम्युनिस्ट विचारक चारू मजूमदार, कवि पाब्लो नेरुदा और लेखिका अरुंधति रॉय के विचारों तथा रचनाओं से परिचित हुईं। इनसे उनके सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण को आकार मिला।

    राजनीति में सक्रिय होने से पहले नेहा का जुड़ाव रंगमंच से रहा। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने डॉ. बीआर अंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली से परफॉर्मेंस स्टडीज में मास्टर डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स में थिएटर और परफॉर्मेंस स्टडीज में पीएचडी के लिए दाखिला लिया। वह दिल्ली के स्ट्रीट थिएटर समूह संगवारी के साथ भी लंबे समय तक काम कर चुकी हैं। उनके अनुसार, रंगमंच ने उन्हें अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि और विचारधारा वाले लोगों को समझने की दृष्टि दी। उनका मानना है कि किसी किरदार को निभाने से उसके सामाजिक और राजनीतिक परिवेश को समझने में मदद मिलती है।

    जेएनयू में पढ़ाई के दौरान नेहा वामपंथी छात्र राजनीति से जुड़ीं और AISA में सक्रिय हुईं। वर्ष 2018 से वह विश्वविद्यालय परिसर में छात्र आंदोलनों और अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर भाग ले रही थीं। संगठन में अपनी सक्रियता और नेतृत्व की भूमिका के जरिए वह राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद तक पहुंचीं। राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान जुलाई में नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ हुए आंदोलन के दौरान और व्यापक हुई। उन्होंने जंतर-मंतर पर शिक्षा मंत्रालय की कार्यप्रणाली के विरोध में आयोजित प्रदर्शन का नेतृत्व किया।

    इस आंदोलन के दौरान नेहा ने अपने साथियों मनीष कुमार और अमीन अमितोज के साथ 23 दिनों तक भूख हड़ताल की। प्रदर्शन में पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक सहित कई जानी-मानी हस्तियां और सांसद भी शामिल हुए थे। लंबे उपवास के दौरान नेहा का वजन लगभग आठ किलोग्राम कम होने की जानकारी दी गई। आंदोलन में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी उठाई गई। इस विरोध के बाद नेहा को छात्र आंदोलनों में सक्रिय एक चर्चित युवा चेहरे के रूप में पहचान मिली।

    अगस्त में वह झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं और झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) से संबंधित कथित गड़बड़ियों के खिलाफ हुए छात्र आंदोलनों में भी शामिल हुईं। झारखंड विधानसभा के पास प्रदर्शन के दौरान उन पर स्याही फेंके जाने की घटना सामने आई थी। इसके बाद भी उन्होंने छात्र मुद्दों पर अपनी सक्रियता जारी रखी।

    हाल में नेहा ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनाव प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शनों में भाग लिया। जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों में उनके नेतृत्व की भूमिका रही। इस दौरान “ज्ञानेश, बस हो गया, ब्रो!” जैसे नारे और पोस्टर भी सामने आए। दिल्ली में पुलिस बैरिकेड पार करने और अलग-अलग स्थानों पर पहुंचने से जुड़े उनके वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हुए। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि वह पेशेवर धावक नहीं हैं, लेकिन ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग ने उन्हें दौड़ने के लिए प्रेरित किया। हिरासत के दौरान बस के अंदर से बनाए गए उनके वीडियो भी चर्चा में रहे। सेना में अधिकारी रहे पिता से जुड़ा पारिवारिक परिवेश, रंगमंच का अनुभव और जेएनयू में छात्र राजनीति से जुड़ाव उनके सार्वजनिक जीवन के प्रमुख पहलू हैं।

  • फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ छात्रों का उग्र प्रदर्शन, धमाके में 15 वर्षीय छात्र का हाथ उड़ा

    फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ छात्रों का उग्र प्रदर्शन, धमाके में 15 वर्षीय छात्र का हाथ उड़ा


    पेरिस। फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था की कथित खामियों के खिलाफ छात्रों का आंदोलन लगातार उग्र होता जा रहा है। स्कूलों में बढ़ती छात्र संख्या, शिक्षकों की कमी, जर्जर इमारतों और बुनियादी सुविधाओं के अभाव को लेकर छात्र सड़कों पर उतर आए हैं। कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प के बाद हालात हिंसक हो गए। रिपोर्टों के मुताबिक, इस दौरान करीब 1,000 लोग घायल हुए हैं।

    धमाके में 15 वर्षीय छात्र गंभीर घायल

    रिपोर्ट्स के अनुसार, लेंस शहर में प्रदर्शन के दौरान हुए एक धमाके में 15 वर्षीय छात्र गंभीर रूप से घायल हो गया। धमाके में उसका हाथ उड़ गया। उसे तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसके जबड़े की भी सर्जरी करनी पड़ी। प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने 5,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया है। इनमें करीब 90 प्रतिशत नाबालिग छात्र बताए जा रहे हैं।

    पुलिस कार्रवाई को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच मंगलवार को देशभर में आंदोलन के समर्थन में रैलियां आयोजित होने की उम्मीद है, जिनमें हजारों लोगों के शामिल होने की संभावना है।

    प्रधानमंत्री ने छात्रों की मांगों को बताया जायज

    फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने देशव्यापी छात्र विरोध-प्रदर्शनों को शांत करने की कोशिश के तहत हड़ताल कर रहे स्कूली छात्रों की शिकायतों को “जायज” बताया है। ‘द गार्डियन’ की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने मंत्रियों को छात्रों की पांच प्रमुख मांगों पर काम करने और अक्टूबर 2026 के अंत तक प्रस्ताव तैयार कर पेश करने का निर्देश दिया है।

    400 से 500 स्कूलों में कक्षाएं प्रभावित

    फ्रांस के शिक्षा मंत्री एडुआर्ड गेफ्रे ने बताया कि सुरक्षा व्यवस्था पूरी नहीं होने के कारण करीब 400 से 500 उच्च विद्यालयों में कक्षाएं पूर्ण या आंशिक रूप से निलंबित कर दी गई हैं। उन्होंने कहा कि आंदोलन शुरू होने के बाद से 24 विद्यालयों में आगजनी या तोड़फोड़ की घटनाएं हुई हैं। हिंसा में शिक्षा विभाग के 85 कर्मचारी घायल हुए हैं। मंत्री ने मौजूदा स्थिति को अभूतपूर्व बताया।

    बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले सप्ताह पेरिस से शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब मोंटपेलियर, नांत और मार्सिले सहित कई प्रमुख शहरों तक फैल चुका है। छात्र शिक्षा के गिरते स्तर में सुधार के साथ स्कूलों में बेहतर बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे हैं।

    फ्रांस के न्याय मंत्री गेराल्ड डारमानिन के अनुसार, देश के करीब 3,700 विद्यालयों में से लगभग 735 विद्यालय इस उग्र आंदोलन से किसी न किसी रूप में प्रभावित हुए हैं।

    प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता और सुविधाओं में सुधार पर जोर

    प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने कहा कि सरकार छात्रों और शैक्षणिक कर्मचारियों की समस्याओं के समाधान के लिए तेजी से कदम उठा रही है। इसमें कक्षाओं का सुचारू संचालन, स्कूलों में सुविधाओं का सुधार और विश्वविद्यालय प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता जैसे मुद्दे शामिल हैं। सरकार विद्यालयों में तोड़फोड़ करने वालों से ही हुए नुकसान की भरपाई कराने संबंधी विधेयक को भी जल्द आगे बढ़ाने की तैयारी में है।

  • राहुल गांधी ने शुरू की ‘सत्याग्रह’ पहल, लोगों से अन्याय और अधिकारों से जुड़े संघर्ष की कहानी भेजने की अपील

    राहुल गांधी ने शुरू की ‘सत्याग्रह’ पहल, लोगों से अन्याय और अधिकारों से जुड़े संघर्ष की कहानी भेजने की अपील

    नई दिल्ली: लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने देशभर में अपने अधिकारों और अलग-अलग मुद्दों को लेकर संघर्ष कर रहे लोगों की आवाज को एक मंच पर लाने के लिए ‘सत्याग्रह’ नाम से डिजिटल पहल शुरू की है। उन्होंने शनिवार को लोगों से अपील की कि जो भी व्यक्ति किसी अन्याय के खिलाफ लड़ रहा है, वह अपनी कहानी साझा करे। इस पहल के तहत लोगों के संघर्ष और आंदोलनों की जानकारी एक डिजिटल नक्शे पर दिखाई जाएगी, जिससे समान मुद्दों को लेकर संघर्ष कर रहे अन्य लोगों और समूहों के बारे में भी जानकारी मिल सकेगी। राहुल गांधी ने कहा कि नेता विपक्ष के तौर पर वह संसद से लेकर सड़क तक जरूरत पड़ने पर लोगों के साथ खड़े रहेंगे।

    राहुल गांधी ने कहा कि देशभर में लोग अपने हक के लिए लड़ रहे हैं और अक्सर उनकी लड़ाई अकेले रह जाती है। उन्होंने जेन-जी, छात्रों, किसानों, आदिवासियों, दलितों और महिलाओं के संघर्षों का उल्लेख करते हुए कहा कि हर संघर्ष की अपनी कहानी है, लेकिन अकेले उठने वाली आवाज अक्सर दब जाती है। उनके अनुसार, ‘सत्याग्रह’ का उद्देश्य इन आवाजों को एक साथ लाना है। उन्होंने महात्मा गांधी की विचारधारा का उल्लेख करते हुए कहा कि सत्य एक बड़ा हथियार है और सत्य के साथ एकजुट होकर खड़ा होना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने लोगों से अपनी कहानी साझा करने को कहा और बताया कि इसमें करीब दो मिनट लगेंगे।

    इस पहल का नाम महात्मा गांधी के सत्याग्रह से जुड़ा है। गांधी हेरिटेज पोर्टल महात्मा गांधी के जीवन, लेखन, सत्याग्रह और अन्य गतिविधियों से जुड़े दस्तावेजों का डिजिटल संग्रह उपलब्ध कराता है। उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड में गांधीजी के लेखन और पत्राचार का व्यापक संग्रह दर्ज है। हालांकि, दी गई खबर में गांधीजी को भेजे गए 8,500 से अधिक पत्रों का जो विशेष आंकड़ा बताया गया है, उसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से स्पष्ट रूप से नहीं हो सकी। आधिकारिक अभिलेखों में गांधीजी से संबंधित पत्रों का बड़ा संग्रह दर्ज होने की जानकारी उपलब्ध है।

    राहुल गांधी की इस पहल के साथ देश में चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शनों का भी उल्लेख किया गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और अन्य समूहों की ओर से प्रदर्शन किए गए हैं। 2 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शनकारियों ने चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन किया और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठाई। इसी बीच विपक्षी सांसदों के 6 अक्टूबर को चुनाव आयोग तक मार्च करने की योजना भी घोषित की गई थी।

    मतदाता सूची से जुड़े विवाद के बीच फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता डेटा तक राज्यों की पहुंच, पश्चिम बंगाल में अपीलों और गोवा के 97 मतदाताओं से जुड़े मुद्दों को लेकर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के सॉफ्टवेयर में बदलावों की समीक्षा शुरू की है और एक समिति को इसकी जांच की जिम्मेदारी दी है। राहुल गांधी की ‘सत्याग्रह’ पहल ऐसे समय में सामने आई है, जब देशभर में अलग-अलग मुद्दों को लेकर चल रहे आंदोलनों और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े विवाद सार्वजनिक चर्चा में हैं।

  • सुप्रीम कोर्ट ने कॉकरोच प्रदर्शन मामलों में कमेटी की शक्तियां तय कीं, कहा- FIR का आदेश देने का अधिकार सिर्फ अदालत को

    सुप्रीम कोर्ट ने कॉकरोच प्रदर्शन मामलों में कमेटी की शक्तियां तय कीं, कहा- FIR का आदेश देने का अधिकार सिर्फ अदालत को

    नई दिल्ली ।कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों की जांच के लिए गठित पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड एनक्वायरी कमेटी की शक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति स्पष्ट कर दी है। अदालत ने कहा कि कमेटी आरोपों की जांच कर सकती है, पीड़ितों की पहचान कर सकती है और अपनी सिफारिशें दे सकती है, लेकिन किसी आपराधिक जांच के लिए FIR दर्ज कराने का आदेश देने का अधिकार केवल सुप्रीम कोर्ट के पास रहेगा।

    भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने यह टिप्पणी की। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। अदालत ने कहा कि कमेटी सीधे FIR दर्ज करने का आदेश नहीं दे सकती और उसे अदालत की निगरानी में काम करना होगा। कार्यवाही के दौरान आने वाली किसी समस्या के समाधान के लिए कमेटी सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकती है।

    अदालत ने कमेटी को अपनी सहायता के लिए अमिकस या वकील नियुक्त करने की भी अनुमति दी है। इसके अलावा कमेटी अपनी जांच से संबंधित जानकारी व्यापक स्तर पर सार्वजनिक कर सकती है और लोगों से सुझाव तथा आपत्तियां मांग सकती है। संवेदनशील और जरूरतमंद गवाहों तक पहुंच बनाने के लिए अलग व्यवस्था भी तैयार की जा सकती है।

    इसमें हेल्पलाइन जैसी व्यवस्था शामिल हो सकती है, ताकि वे लोग भी अपनी बात कमेटी तक पहुंचा सकें जो सीधे उसके सामने उपस्थित नहीं हो सकते। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र और दिल्ली पुलिस की ओर से अदालत को बताया कि कमेटी की पहली बैठक 15 सितंबर को निर्धारित है।

    सुप्रीम कोर्ट ने एक सितंबर के अपने आदेश का भी उल्लेख किया। अदालत ने उस समय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए प्रदर्शन से जुड़े आपराधिक मामलों को खत्म करने का आदेश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि 20 से 25 जुलाई के बीच हुए प्रदर्शनों के संबंध में दर्ज FIR पर आगे कार्रवाई या जांच नहीं की जाएगी और उन्हें बंद माना जाएगा। साथ ही इन घटनाओं के संबंध में नई FIR दर्ज नहीं करने का निर्देश भी दिया गया था।

    पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में गठित HPEC को 20 जुलाई के छात्र प्रदर्शन से जुड़े विभिन्न आरोपों की स्वतंत्र जांच करनी है। कमेटी पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों के साथ सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपों की भी जांच करेगी। उसे दस्तावेजी सबूत, लोगों के प्रतिवेदन और गुमनाम शिकायतें लेने की अनुमति है।

    सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी की संरचना बदलने की मांग भी खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि कमेटी का गठन स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने किया है और काम शुरू होने से पहले इसमें बदलाव नहीं किया जाएगा। हालांकि, किसी पक्ष को कमेटी के कामकाज को लेकर चिंता होने पर वह अदालत के सामने अपनी बात रख सकता है।

    सुनवाई के दौरान 14 वर्षीय लड़की को कथित तौर पर धमकाने और परेशान किए जाने का मामला भी सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को संसद मार्ग थाने में दर्ज FIR पर तत्काल कार्रवाई कर रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। लड़की फिलहाल उत्तर प्रदेश में रह रही है। अदालत ने उत्तर प्रदेश पुलिस को लड़की और उसके परिवार को पुलिस सुरक्षा तथा जरूरी सुरक्षा उपाय उपलब्ध कराने को भी कहा।

    अदालत ने कहा कि यदि किसी बच्चे या उसके परिवार को आपराधिक कार्रवाई आगे नहीं बढ़ाने के लिए डराया-धमकाया जा रहा है तो HPEC की जांच के नतीजे का इंतजार नहीं किया जा सकता। लड़की के बयान की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी बताते हुए कोर्ट ने कहा कि आरोप सही पाए जाने पर जांच को उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाना चाहिए।

    सुनवाई में स्वातंत्र भारद्वाज से जुड़े आपराधिक मामलों का भी उल्लेख हुआ। उनके खिलाफ कथित हमले, आपराधिक धमकी और POCSO से जुड़े मामलों का जिक्र किया गया। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कमेटी की संरचना, संवेदनशील गवाहों की पहुंच, अंतरिम मुआवजा, पेलेट गन के इस्तेमाल और प्रदर्शनकारियों के डेटा के कथित संग्रह को लेकर चिंताएं रखीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संबंधित पक्ष अपनी सामग्री और सुझाव कमेटी के सामने रख सकते हैं और जरूरत पड़ने पर अदालत भी इन मुद्दों को स्पष्ट करेगी।

  • PoK में थम नहीं रही हिंसा, 53 दिन से प्रदर्शन जारी…. अब तक 109 लोगों की मौत

    PoK में थम नहीं रही हिंसा, 53 दिन से प्रदर्शन जारी…. अब तक 109 लोगों की मौत


    इस्लामाबाद।
    पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (Pakistan-occupied Jammu and Kashmir- PoK) में पिछले कई हफ्तों से जारी तनाव अब और बढ़ता जा रहा है। पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और प्रतिबंधित जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के सदस्यों-कार्यकर्ताओं के बीच झड़पें फिर से तेज हो गई हैं। क्षेत्रीय चुनावों के साथ शुरू हुई यह अशांति अब 53वें दिन में पहुंच चुकी है और हिंसा का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। जेएएसी के अनुसार, आंदोलन शुरू होने के बाद से अब तक कुल 109 प्रदर्शनकारी मारे जा चुके हैं। संगठन का कहना है कि इनमें हाल के दिनों की हिंसा में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। वहीं पाकिस्तानी सरकार इन आंकड़ों को पूरी तरह खारिज कर रही है। इस्लामाबाद का दावा है कि कोई आम नागरिक नहीं मारा गया है।

    दावे-प्रतिदावे के बीच ताजा मामला कोटली से सामने आया है। जेएएसी के नेता उमर नजीर कश्मीरी ने दावा किया है कि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर कथित तौर पर गोलीबारी की, जिसमें एक प्रदर्शनकारी की मौत हो गई और तीन अन्य घायल हो गए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि फायरिंग के दौरान महिलाओं को भी निशाना बनाया गया। हालांकि यह दावा आधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं हो सका है।


    दो महीने से विरोध प्रदर्शन

    बता दें कि जेएएसी विभिन्न एक्टिविस्ट ग्रुप्स का गठबंधन है, जो पीओके विधानसभा की 12 विवादित सीटों को लेकर करीब दो महीने से विरोध-प्रदर्शन कर रहा है। संगठन का आरोप है कि पाकिस्तान सरकार इन आरक्षित सीटों में हेरफेर करके अपनी पसंद का प्रधानमंत्री बनवाती है। इन सीटों पर विवाद लंबे समय से चला आ रहा है और जेएएसी इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर हमला बता रही है। सोमवार से सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें और बढ़ गई हैं। सबसे ज्यादा हिंसा रावलकोट और मीरपुर क्षेत्रों में हुई है, जहां स्थिति सबसे अधिक तनावपूर्ण बताई जा रही है।

    इससे पहले जेएएसी ने दावा किया था कि हाल के दिनों में हुई हिंसा में महिलाओं और बच्चों समेत कम से कम 37 लोग मारे गए हैं। घायलों की सही संख्या अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाई है। संगठन ने एक बयान जारी कर कहा कि भारी गोलीबारी के बीच हमारे लोग शांतिपूर्वक और बिना किसी हथियार के खड़े रहे हैं। खुदा चाहेंगे तो जुल्म और अन्याय के खिलाफ हमारी शांतिपूर्ण लड़ाई जारी रहेगी। जेएएसी अपने आंदोलन को पूरी तरह अहिंसक बता रही है और सुरक्षा बलों पर अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप लगा रही है।


    क्या कह रही पाकिस्तान सरकार?

    पाकिस्तान सरकार ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। आधिकारिक बयान में कहा गया है कि कोई भी आम नागरिक नहीं मारा गया है। सरकार का दावा है कि प्रतिबंधित तेहरिक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के आतंकवादी प्रदर्शनकारियों के बीच घुसपैठ कर चुके हैं। इस्लामाबाद ने साफ कहा है कि वह अपनी कार्रवाई जारी रखेगा। पाकिस्तान के गृह राज्य मंत्री तलाल चौधरी ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि हम प्रदर्शनकारियों से कोई बात नहीं करेंगे। कानून अपना काम करेगा।

  • दिल्ली में राहुल गांधी की गिरफ्तारी पर मप्र में प्रदर्शन, विधानसभा में धरने पर बैठे कांग्रेस विधायक

    दिल्ली में राहुल गांधी की गिरफ्तारी पर मप्र में प्रदर्शन, विधानसभा में धरने पर बैठे कांग्रेस विधायक


    भोपाल।
    दिल्ली में राहुल गांधी की गिरफ्तारी के विरोध में मंगलवार को मध्य प्रदेश में कांग्रेस का प्रदर्शन देर रात तक जारी रहा। प्रदेशभर में हुए विरोध प्रदर्शनों के बीच विधानसभा में मुख्यमंत्री कक्ष के बाहर कांग्रेस विधायक देर रात तक धरने पर बैठे हुए हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी भी उनके साथ धरने में शामिल हैं।

    मंगलवार को जीतू पटवारी लोकभवन के सामने धरने पर बैठे थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें और अन्य कांग्रेस कार्यकर्ताओं को वहां से हटाकर वाहन में बैठा लिया। कुछ देर बाद वे सीधे विधानसभा पहुंचे और धरना दे रहे विधायकों का समर्थन किया।

    दरअसल, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर कांग्रेस नेताओं ने प्रधानमंत्री आवास के पास प्रदर्शन किया था। इसके बाद राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और अखिलेश यादव समेत कई विपक्षी नेताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया। इसी के विरोध में मध्य प्रदेश कांग्रेस ने भी प्रदेश में प्रदर्शन किया।

    विधानसभा में मुख्यमंत्री कक्ष के बाहर धरना जारी

    मंगलवार को शाम तक विधानसभा की कार्यवाही के बाद नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के नेतृत्व में कांग्रेस विधायक मुख्यमंत्री कक्ष के बाहर धरने पर बैठ गए। कुछ विधायक विरोध जताने के लिए फर्श पर भी लेट गए। इससे पहले विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने धरना खत्म कराने की कोशिश की लेकिन विधायक नहीं माने। बाद में संसदीय कार्य मंत्री कैलाश विजयवर्गीय भी बातचीत के लिए पहुंचे। इस दौरान उनकी नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार से तीखी बहस हुई और कांग्रेस विधायकों ने नारेबाजी की।

    भोपाल के अलावा इंदौर, जबलपुर, कटनी, खंडवा, हरदा, शाजापुर, टीकमगढ़, रतलाम, डबरा और खरगोन समेत कई जिलों में कांग्रेस और एनएसयूआई कार्यकर्ताओं ने धरना-प्रदर्शन, रैली और नारेबाजी की। कुछ जगह चक्काजाम और पुलिस से धक्का-मुक्की की स्थिति भी बनी। देर रात तक अधिकांश जिलों में प्रदर्शन समाप्त हो गए, जबकि विधानसभा में कांग्रेस विधायकों का धरना जारी है।