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  • PoK में बड़े विरोध प्रदर्शन से पहले पाकिस्तान अलर्ट, 4000 जवान और रेंजर्स की 7 विंग तैनात करने की तैयारी

    PoK में बड़े विरोध प्रदर्शन से पहले पाकिस्तान अलर्ट, 4000 जवान और रेंजर्स की 7 विंग तैनात करने की तैयारी


    नई दिल्ली। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में 15 जुलाई को प्रस्तावित बड़े विरोध प्रदर्शन और लॉन्ग मार्च से पहले पाकिस्तान समर्थित स्थानीय प्रशासन की चिंता बढ़ गई है। संभावित अशांति को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने केंद्र सरकार से अतिरिक्त सुरक्षा बलों की मांग की है।

    सीएनएन-न्यूज18 की रिपोर्ट के अनुसार, एक गोपनीय आधिकारिक दस्तावेज में PoK के गृह विभाग ने इस्लामाबाद से 4,000 अतिरिक्त जवानों और पाकिस्तान रेंजर्स की सात विंग्स की तत्काल तैनाती की मांग की है। यह मांग क्षेत्र में बढ़ते विरोध प्रदर्शनों और तनावपूर्ण हालात को देखते हुए की गई है।

    यह कदम संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के प्रमुख नेता शौकत नवाज मीर और सैकड़ों अन्य कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद बढ़े जन आक्रोश के बीच उठाया गया है।

    गोपनीय पत्र में सुरक्षा बलों की मांग
    रिपोर्ट के मुताबिक, PoK गृह विभाग की ओर से पाकिस्तान के गृह मंत्रालय के सचिव को 8 जुलाई को भेजे गए पत्र को ‘अति आवश्यक’ और ‘गोपनीय’ बताया गया है। इसमें कहा गया है कि JAAC की ओर से आयोजित लॉन्ग मार्च, विरोध प्रदर्शन और धरनों के कारण क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति गंभीर हो गई है।

    प्रशासन का कहना है कि मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था इस स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं है। अतिरिक्त बलों की तैनाती का उद्देश्य प्रदर्शनों के प्रभाव को नियंत्रित करना, प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखना और पहले से तैनात सुरक्षा कर्मियों पर दबाव कम करना बताया गया है।

    आधे जवान हथियारों से लैस, आधे को मिलेगा दंगा-रोधी उपकरण
    गोपनीय दस्तावेज के अनुसार, मांगी गई अतिरिक्त फोर्स PoK में पहले से मौजूद सुरक्षा बलों के अतिरिक्त होगी। प्रशासन ने मांग की है कि आने वाले सुरक्षा कर्मियों में 50 प्रतिशत जवान आधुनिक हथियारों और पर्याप्त गोला-बारूद से लैस हों, जबकि बाकी 50 प्रतिशत जवानों को दंगा-रोधी उपकरण उपलब्ध कराए जाएं।

    दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि यदि दंगा नियंत्रण उपकरणों की कमी हो तो तैनाती से पहले पाकिस्तान के केंद्रीय स्टॉक से इसकी व्यवस्था की जाए।

    JAAC पर लगाए गए हिंसा के आरोप
    PoK प्रशासन ने मौजूदा तनाव के लिए संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी को जिम्मेदार ठहराया है। प्रशासन का आरोप है कि पुंछ और रावलकोट में लगातार धरने और पड़ोसी जिलों में रैलियां आयोजित कर लोगों को उकसाया जा रहा है।

    प्रशासन ने यह दावा भी किया है कि प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े सशस्त्र लोग मुजफ्फराबाद और मीरपुर डिवीजनों में माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शनकारियों पर सुरक्षा बलों और नागरिकों को निशाना बनाने तथा आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करने वाले ट्रकों को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगाए गए हैं।

    PoK प्रशासन का दावा है कि हिंसा में अब तक चार सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई है और 174 अन्य घायल हुए हैं। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।

    15 जुलाई के मार्च से पहले बढ़ी चिंता
    15 जुलाई के प्रस्तावित बड़े मार्च से पहले इतनी बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की मांग को लेकर क्षेत्र में चिंता बढ़ गई है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने आशंका जताई है कि भारी सुरक्षा तैनाती के जरिए सरकार प्रदर्शनकारियों पर सख्त कार्रवाई कर सकती है।

    JAAC पिछले कुछ समय से PoK में जनता की मांगों और अधिकारों को लेकर सक्रिय संगठन के रूप में सामने आई है। समिति का आरोप है कि पाकिस्तान सरकार और स्थानीय प्रशासन बिजली की ऊंची कीमतों, आटे की कमी और बुनियादी अधिकारों से जुड़े मुद्दों का समाधान करने में विफल रहे हैं। संगठन का कहना है कि इन मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर बल प्रयोग किया जा रहा है।

  • लॉकडाउन से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में बढ़ी मुश्किलें, वेतन-पेंशन अटकी, महंगाई और आर्थिक संकट पर सड़कों पर उतरे हजारों लोग

    लॉकडाउन से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में बढ़ी मुश्किलें, वेतन-पेंशन अटकी, महंगाई और आर्थिक संकट पर सड़कों पर उतरे हजारों लोग


    नई दिल्ली ।
    पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में पिछले एक महीने से जारी लॉकडाउन के बीच सामान्य जनजीवन गंभीर रूप से प्रभावित होने के दावे सामने आए हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि बैंकिंग सेवाएं, इंटरनेट और कई प्रशासनिक व्यवस्थाएं बाधित होने से आम लोगों के साथ-साथ सरकारी कर्मचारी और पेंशनभोगी भी भारी परेशानियों का सामना कर रहे हैं। इसी बीच क्षेत्र में आर्थिक समस्याओं और प्रशासनिक नीतियों के विरोध में प्रदर्शन लगातार तेज होते जा रहे हैं।

    स्थानीय लोगों के अनुसार, बैंकिंग सेवाएं प्रभावित होने के कारण सरकारी कर्मचारियों का वेतन और पेंशनभोगियों को मिलने वाली पेंशन समय पर नहीं मिल पा रही है। इंटरनेट सेवाओं में व्यवधान के कारण ऑनलाइन लेनदेन, संचार और कई आवश्यक सेवाएं भी प्रभावित हुई हैं। लोगों का कहना है कि लंबे समय तक बनी इस स्थिति ने दैनिक जीवन और आर्थिक गतिविधियों पर व्यापक असर डाला है।

    क्षेत्र में जम्मू-कश्मीर ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में कई स्थानों पर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए। रावलाकोट, मुजफ्फराबाद और अब्बासपुर सहित विभिन्न इलाकों में हजारों लोग सड़कों पर उतरे और बढ़ती महंगाई, बिजली दरों में वृद्धि, आवश्यक वस्तुओं की कमी तथा आर्थिक दबाव के खिलाफ अपनी नाराजगी व्यक्त की। प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन से जनता की समस्याओं के समाधान की मांग की।

    स्थानीय नागरिकों का कहना है कि सरकार को सख्ती के बजाय संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए। उनका मानना है कि जनसामान्य की समस्याओं का समाधान बातचीत और सहमति के माध्यम से ही संभव है। लोगों ने प्रशासन से अपील की कि नागरिकों की परेशानियों को प्राथमिकता देते हुए सामान्य सेवाओं को जल्द बहाल किया जाए और आर्थिक गतिविधियों को फिर से सुचारु बनाया जाए।

    विरोध प्रदर्शनों के दौरान संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी ने अपने नेताओं की रिहाई की मांग भी दोहराई है। संगठन ने अपनी विभिन्न मांगों को पूरा करने और क्षेत्र में आम लोगों के लिए राहत उपाय लागू करने की अपील की है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि लंबे समय से बढ़ती महंगाई, बिजली की ऊंची दरें और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता से जुड़े मुद्दों का अब तक संतोषजनक समाधान नहीं हो सका है।

    हाल के दिनों में क्षेत्र में विरोध प्रदर्शनों का दायरा लगातार बढ़ा है। बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी इस बात का संकेत मानी जा रही है कि आर्थिक और सामाजिक मुद्दे स्थानीय नागरिकों के लिए प्रमुख चिंता का विषय बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आवश्यक सेवाओं की बहाली और जनसमस्याओं के समाधान के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो असंतोष और बढ़ सकता है।

    पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की मौजूदा स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नजर बनी हुई है। क्षेत्र में सामान्य जनजीवन बहाल करने, आवश्यक सेवाओं को सुचारु बनाने और संवाद के माध्यम से समाधान तलाशने की मांग लगातार उठ रही है। फिलहाल स्थानीय नागरिकों की प्राथमिक अपेक्षा यही है कि बैंकिंग, इंटरनेट और अन्य सार्वजनिक सेवाएं जल्द सामान्य हों ताकि आर्थिक गतिविधियां फिर से पटरी पर लौट सकें।

  • PoK में संकट गहराया, भोजन, दवा और ईंधन की भारी कमी, विरोध दबाने के आरोपों के बीच हालात तनावपूर्ण

    PoK में संकट गहराया, भोजन, दवा और ईंधन की भारी कमी, विरोध दबाने के आरोपों के बीच हालात तनावपूर्ण

    इस्लामाबाद। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में जारी सरकार-विरोधी प्रदर्शनों के बीच हालात गंभीर हो गए हैं। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, इस्लामाबाद पर आरोप है कि उसने विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए क्षेत्र में भोजन, राशन, दवाओं और ईंधन की आपूर्ति पर रोक जैसी स्थिति पैदा कर दी है, जिससे कई इलाकों में मानवीय संकट गहरा गया है।

    रिपोर्टों के मुताबिक मुजफ्फरनगर, पुंछ, रावलाकोट, बाग और नीलम घाटी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में खाद्यान्न और आवश्यक वस्तुओं की भारी कमी देखी जा रही है। स्थानीय लोगों, ट्रक ड्राइवरों और विपक्षी नेताओं का कहना है कि आवश्यक सामान ले जाने वाले वाहनों को सीमा चौकियों पर रोका जा रहा है, जिससे स्थिति और बिगड़ गई है।

    जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में चल रहे शटडाउन और विरोध प्रदर्शनों के कारण पहले से ही आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित थी, लेकिन अब इसे और गंभीर बताया जा रहा है। हालांकि, पाकिस्तानी अधिकारियों ने किसी भी प्रकार की नाकेबंदी से इनकार किया है, जबकि BBC उर्दू और डॉन जैसी मीडिया रिपोर्टों में हालात को चिंताजनक बताया गया है।

    सीमा चौकियों पर वाहनों की आवाजाही प्रभावित

    स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, पीओके में खाद्यान्न और दवाओं की कमी के बाद लोग खैबर पख्तूनख्वा, रावलपिंडी और इस्लामाबाद से सामान लाने को मजबूर हैं, लेकिन उन्हें सीमा चौकियों पर रोका जा रहा है। आजाद पट्टन और फगवारी क्षेत्रों में तैनात पुलिस द्वारा व्यावसायिक और निजी वाहनों की जांच की जा रही है, जिससे कई वाहन लंबे समय से रुके हुए हैं और खराब होने वाला सामान नष्ट हो रहा है।

    स्थानीय लोगों की परेशानियां बढ़ीं

    स्थानीय नागरिकों के अनुसार स्थिति बेहद कठिन हो गई है। एक निवासी नवीद ने बताया कि उन्हें रावलपिंडी से लाया गया भोजन और दवाएं ले जाने से रोका गया और कथित तौर पर सामान फेंकने के बाद ही आगे बढ़ने की अनुमति देने की बात कही गई।

    नीलम घाटी के निवासी अलिफ दीन के अनुसार, शटडाउन और आपूर्ति बाधित होने के कारण पिछले कई दिनों से राशन उपलब्ध नहीं है। सरकारी डिपो पर भुगतान के बावजूद लोगों को आटा नहीं मिल पा रहा है और खुले बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं।

    दवा और ईंधन की गंभीर कमी

    मुजफ्फरनगर के 64 वर्षीय मोहम्मद मकीन ने बताया कि क्षेत्र में दवाओं की भारी कमी है और सभी बड़े मेडिकल स्टोर पिछले दो सप्ताह से बंद पड़े हैं। वहीं पुंछ और मुजफ्फरनगर में पेट्रोल पंप बंद होने से लोग ब्लैक मार्केट से महंगा ईंधन खरीदने को मजबूर हैं।

    आरोप और राजनीतिक बयानबाजी

    पाकिस्तानी अधिकारियों ने नाकेबंदी के आरोपों से इनकार किया है, जबकि मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि सरकार बिना सीधे बल प्रयोग के प्रदर्शन समाप्त करने के लिए आपूर्ति लाइन बाधित करने की रणनीति अपना रही है।

    पीओके में जारी विरोध का मुख्य कारण जम्मू-कश्मीर शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 विधानसभा सीटें बताई जा रही हैं। स्थानीय समूहों का आरोप है कि इन सीटों के माध्यम से चुनावी प्रक्रिया प्रभावित की जाती है। इसी मुद्दे पर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में आंदोलन जारी है, जिसके दौरान इंटरनेट सेवाएं भी बाधित की गई हैं। रिपोर्टों के अनुसार, झड़पों में अब तक कम से कम 58 लोगों की मौत का दावा किया गया है।

    पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) की पीओके इकाई ने सोशल मीडिया पर इस कार्रवाई की आलोचना करते हुए इसे गंभीर दमन बताया है।

    बड़ा आंदोलन जारी

    रिपोर्टों के अनुसार, रावलाकोट के ईदगाह मैदान में चल रहे धरने में पिछले दो हफ्तों में 70,000 से अधिक लोग शामिल हुए हैं। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी ने चेतावनी दी है कि यदि मांगें पूरी नहीं की गईं तो मुजफ्फरनगर तक 1,00,000 लोगों का बड़ा मार्च निकाला जा सकता है।

  • पीओजेके में प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई को लेकर चिंता गहराई, मानवाधिकार और नागरिक सुरक्षा पर फिर छिड़ी बहस

    पीओजेके में प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई को लेकर चिंता गहराई, मानवाधिकार और नागरिक सुरक्षा पर फिर छिड़ी बहस

    नई दिल्ली । पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में हाल के दिनों में सामने आई हिंसक घटनाओं और विरोध प्रदर्शनों के बाद वहां की स्थिति को लेकर नई चिंताएं सामने आई हैं। जम्मू-कश्मीर के विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक वर्गों ने इन घटनाओं को गंभीर मानते हुए नागरिकों की सुरक्षा, मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक अधिकारों के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया है। क्षेत्र में हुई जनहानि और बड़ी संख्या में लोगों के घायल होने की खबरों ने इस मुद्दे को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

    श्रीनगर में राजनीतिक विश्लेषकों और जनप्रतिनिधियों ने पीओजेके की मौजूदा परिस्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वहां लंबे समय से स्थानीय लोगों को विभिन्न प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना है कि क्षेत्र में आम नागरिकों की आवाज को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा और कई बार लोगों की मांगों तथा समस्याओं को बलपूर्वक दबाने के आरोप सामने आते रहे हैं।

    विश्लेषकों के अनुसार हालिया विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से नागरिक सुविधाओं, आर्थिक राहत और बुनियादी अधिकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर किए जा रहे थे। लेकिन प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा और टकराव ने स्थिति को और अधिक संवेदनशील बना दिया। इस घटनाक्रम ने क्षेत्र में प्रशासनिक व्यवस्था और नागरिक अधिकारों को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं।

    कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि पीओजेके का मुद्दा केवल राजनीतिक दृष्टिकोण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मानवीय पहलू भी बेहद महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि किसी भी क्षेत्र में नागरिकों को अपनी बात रखने, शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराने और सुरक्षित वातावरण में जीवन जीने का अधिकार होना चाहिए। यदि इन मूलभूत अधिकारों पर प्रभाव पड़ता है तो उसका व्यापक सामाजिक असर दिखाई देता है।

    इस पूरे मामले पर जम्मू-कश्मीर के कुछ राजनीतिक नेताओं ने भी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि किसी भी परिस्थिति में निहत्थे नागरिकों के खिलाफ हिंसा स्वीकार्य नहीं हो सकती। उन्होंने क्षेत्र में शांति, संवाद और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही यह भी कहा गया कि मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन किया जाना चाहिए।

    विशेषज्ञों का मानना है कि पीओजेके की स्थिति पर लगातार नजर बनाए रखने की जरूरत है। वहां के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हालात को लेकर समय-समय पर विभिन्न रिपोर्टें और प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं। हालिया घटनाओं ने एक बार फिर इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों की समस्याओं और उनकी सुरक्षा को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया है।

    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार किसी भी क्षेत्र में स्थिरता और विकास तभी संभव है जब नागरिकों को न्यायपूर्ण वातावरण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सुरक्षा का भरोसा मिले। इसलिए मौजूदा परिस्थितियों में सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता शांति बहाली, संवाद को बढ़ावा देने और प्रभावित लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मानी जा रही है।

    पीओजेके में हुई हालिया घटनाओं ने यह संकेत दिया है कि क्षेत्र से जुड़े मानवीय और प्रशासनिक मुद्दे अभी भी गंभीर बने हुए हैं। आने वाले समय में वहां की परिस्थितियों और संबंधित पक्षों की प्रतिक्रियाओं पर व्यापक नजर बनी रहने की संभावना है, क्योंकि यह मुद्दा क्षेत्रीय स्थिरता और नागरिक अधिकारों दोनों से जुड़ा हुआ है।

  • नेपाल में बालेन शाह के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी… भारत ने सीमा पर बढ़ाई चौकसी

    नेपाल में बालेन शाह के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी… भारत ने सीमा पर बढ़ाई चौकसी


    नई दिल्ली।
    भारत (India) की जमीन कब्जा करने के नेपाली पीएम बालेन शाह (Nepali PM Balen Shah) के दावे पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने सधी हुई प्रक्रिया दी है। कहा कि सीमा विवादों को सुलझाने के लिए दोनों देशों के बीच एक स्थापित तंत्र है, जिसके जरिये समाधान निकाला जाएगा। साथ ही इसमें किसी भी तीसरे पक्ष की भूमिका को खारिज कर दिया। इस बीच उत्तराखंड (Uttarakhand) से सटे नेपाल के विभिन्न क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन जारी हैं। बालेन शाह के बयान के खिलाफ डडेलधुरा समेत कई स्थानों पर विभिन्न छात्र और युवा संगठनों के कार्यकर्ता विरोध दर्ज करा रहे हैं। इस बीच भारत-नेपाल सीमा (India-Nepal border) पर सुरक्षा एजेंसियों ने सतर्कता बढ़ा दी है।

    सीमावर्ती क्षेत्रों में सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) और स्थानीय पुलिस ने संयुक्त रूप से गश्त तेज कर दी है। सुरक्षा एजेंसियां घुसपैठ, तस्करी और अन्य अवैध गतिविधियों पर नजर रखने के लिए पगडंडी मार्गों, चेकपोस्टों और सीमावर्ती गांवों में लगातार निगरानी कर रही हैं। विशेष रूप से उन क्षेत्रों पर फोकस किया जा रहा है जहां सीमा अपेक्षाकृत खुली है और लोगों का आवागमन अधिक रहता है।


    एसएसबी और स्थानीय पुलिस की संयुक्त गश्त

    मंगलवार को बलुवाकोट क्षेत्र में थानाध्यक्ष नीमा बोहरा के नेतृत्व में पुलिस और एसएसबी की टीम ने संयुक्त गश्त की। इस दौरान जवानों ने संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने के साथ ही स्थानीय लोगों से सतर्क रहने और किसी भी संदिग्ध व्यक्ति अथवा घटना की जानकारी तुरंत पुलिस को देने की अपील की। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए नियमित गश्त और निगरानी जारी रहेगी।


    बालेन शाह के बयान पर विदेश मंत्रालय

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मंगलवार को साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि हमने भारत-नेपाल सीमा के संबंध में नेपाल के प्रधानमंत्री की टिप्पणियों के साथ-साथ इस मामले पर नेपाली विदेश मंत्रालय द्वारा जारी बयान को भी देखा है।

    रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत-नेपाल सीमा का लगभग 98 फीसदी हिस्सा निर्धारित हो चुका है, फिर भी कुछ हिस्से को सुलझाना बाकी है। उन्होंने कहा कि गंडक नदी के बहाव में परिवर्तन के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है। इसके अतिरिक्त सीमा के निर्धारित हिस्सों में सीमा पार कब्जे और नो-मैन्स लैंड पर अतिक्रमण के मामले भी हैं, जिनका संयुक्त रूप से मानचित्रण किया जा रहा है। रणधीर जायसवाल ने कहा कि हमने सीमा संबंधी सभी मामलों से निपटने के लिए द्विपक्षीय तंत्र स्थापित किए हैं। सभी संबंधित पक्षों को यह स्पष्ट होना चाहिए कि भारत और नेपाल के बीच द्विपक्षीय मामलों में किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं है।

    हाल में पाकिस्तान और यूरोपीय संघ के संयुक्त बयान में जम्मू-कश्मीर के उल्लेख पर भी भारत ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। जायसवाल ने कहा कि हम संयुक्त प्रेस बयान में भारत के अंदरूनी मामलों पर ऐसे बेवजह जिक्र को पूरी तरह से खारिज करते हैं।

  • वॉशिंगटन के होटल में गोलीबारी से पहले ट्रंप-एपस्टीन तस्वीरों का विरोध प्रदर्शन, वीडियो वायरल

    वॉशिंगटन के होटल में गोलीबारी से पहले ट्रंप-एपस्टीन तस्वीरों का विरोध प्रदर्शन, वीडियो वायरल

    वॉशिंगटन । अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन स्थित वॉशिंगटन हिल्टन होटल में हुई गोलीबारी की घटना के बाद अब एक नया घटनाक्रम चर्चा में है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हमले से कुछ घंटे पहले होटल के बाहर विरोध प्रदर्शन किया गया था, जिसमें होटल की बाहरी दीवार पर प्रोजेक्शन के जरिए पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और जेफरी एपस्टीन से जुड़ी तस्वीरें तथा दस्तावेज दिखाए गए।
    बताया जा रहा है कि प्रदर्शन के दौरान एक ऑडियो क्लिप भी चलाई गई, जिसमें कथित ईमेल पढ़कर सुनाए गए। इस अनोखे प्रदर्शन को देखने के लिए होटल के बाहर लोगों की भीड़ जमा हो गई। घटना से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं, हालांकि इन वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

    इसके कुछ समय बाद होटल में गोलीबारी की घटना सामने आई।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक, व्हाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर के दौरान एक संदिग्ध व्यक्ति सुरक्षा घेरा पार करने की कोशिश में पकड़ा गया। सुरक्षा एजेंसियों ने तत्काल कार्रवाई करते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समेत अन्य शीर्ष अधिकारियों को सुरक्षित बाहर निकाला।

    घटना में एक सुरक्षा अधिकारी घायल हुआ, जिसे बुलेट-रेसिस्टेंट जैकेट होने के कारण गंभीर चोट नहीं आई। संदिग्ध को हिरासत में लेकर जांच शुरू कर दी गई है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बाद ट्रंप और एपस्टीन से जुड़े पुराने विवाद एक बार फिर सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गए हैं।

  • MP: टीईटी आदेश के खिलाफ प्रदेशभर में उबाल, नौकरी पर संकट का डर, सड़कों पर उतरे शिक्षक

    MP: टीईटी आदेश के खिलाफ प्रदेशभर में उबाल, नौकरी पर संकट का डर, सड़कों पर उतरे शिक्षक


    भोपाल।
    मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में टीईटी अनिवार्यता के नए आदेश के खिलाफ शिक्षकों का गुस्सा अब खुलकर सड़कों पर दिखाई देने लगा है। बुधवार को बड़ी संख्या में शिक्षक संगठनों ने लोक शिक्षण संचालनालय (डीपीआई) मुख्यालय का घेराव कर जोरदार प्रदर्शन किया और सरकार के खिलाफ नारेबाजी की।

    राजधानी ही नहीं, बल्कि पूरे मध्य प्रदेश में इस आदेश के विरोध में एक साथ आंदोलन हुआ। जिला कलेक्ट्रेट कार्यालयों में मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर शिक्षकों ने टीईटी आदेश को तत्काल निरस्त करने की मांग उठाई।


    डीपीआई आदेश बना विरोध की वजह

    हाल ही में डीपीआई द्वारा जारी आदेश के अनुसार, जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में पांच वर्ष से अधिक समय शेष है, उन्हें दो वर्ष के भीतर टीईटी परीक्षा पास करना अनिवार्य किया गया है। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि निर्धारित समय सीमा में परीक्षा उत्तीर्ण नहीं करने पर सेवा समाप्ति तक की कार्रवाई की जा सकती है। यही प्रावधान अब शिक्षकों के आक्रोश की सबसे बड़ी वजह बन गया है।


    “सुप्रीम कोर्ट के नाम पर अन्याय”

    प्रदर्शन कर रहे शिक्षकों का आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देकर सरकार ऐसा फैसला थोप रही है, जिससे हजारों पुराने शिक्षकों की नौकरी खतरे में पड़ सकती है। अध्यापक-शिक्षक संयुक्त मोर्चा के सदस्य उपेंद्र कौशल ने बताया कि आसपास के जिलों से भी बड़ी संख्या में शिक्षक भोपाल पहुंचे और डीपीआई के बाहर प्रदर्शन किया। उन्होंने कहा कि उनकी मुख्य मांग टीईटी परीक्षा को पूरी तरह रद्द करना है।


    पुराने शिक्षकों पर नई शर्त का विरोध

    शिक्षक संगठनों का कहना है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 लागू होने के बाद 2011 से टीईटी अनिवार्य किया गया, जबकि हजारों शिक्षक इससे पहले नियुक्त हो चुके थे। ऐसे में अब उन पर यह नियम लागू करना “रेट्रोस्पेक्टिव” निर्णय है, जो अन्यायपूर्ण और कानूनी रूप से भी कमजोर है।


    1.5 लाख शिक्षक प्रभावित

    संगठनों के मुताबिक इस आदेश का असर करीब 1.5 लाख शिक्षकों पर पड़ सकता है। इनमें लगभग 70 हजार ऐसे हैं, जिनकी नियुक्ति 2011 से पहले हुई थी। इन शिक्षकों का कहना है कि उनकी नियुक्ति के समय यह शर्त लागू नहीं थी, इसलिए अब इसे आधार बनाकर उनकी नौकरी पर संकट खड़ा करना उचित नहीं है।


    संयुक्त मोर्चा की चेतावनी

    प्रदर्शन के दौरान एक प्रतिनिधिमंडल ने डीपीआई अधिकारियों से मुलाकात कर अपनी मांगें रखीं। बाहर मौजूद शिक्षकों को आश्वासन दिया गया कि उनकी बात शासन तक पहुंचाई जाएगी। वहीं, शिक्षक संगठनों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि जल्द निर्णय नहीं लिया गया, तो आंदोलन और उग्र किया जाएगा। 11 अप्रैल को ब्लॉक स्तर पर प्रदर्शन और जनप्रतिनिधियों को ज्ञापन सौंपे जाएंगे, जबकि 18 अप्रैल को प्रदेशव्यापी बड़े आंदोलन की तैयारी की जा रही है। शिक्षकों का कहना है कि यह सिर्फ एक परीक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि उनके भविष्य, सम्मान और वर्षों की सेवा का सवाल है और इसके लिए अब वे आर-पार की लड़ाई लड़ने को तैयार हैं।

  • व्हाइट हाउस के बाहर ईरान विरोधी रैली, अमेरिकी कार्रवाई पर इरानियों ने जताया उत्साह

    व्हाइट हाउस के बाहर ईरान विरोधी रैली, अमेरिकी कार्रवाई पर इरानियों ने जताया उत्साह


    नई दिल्ली। ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल की हालिया कार्रवाई को लेकर कई लोग खुलेआम समर्थन जता रहे हैं। इस समर्थन और ईरानी खामेनेई शासन का विरोध करने के लिए प्रदर्शनकारी व्हाइट हाउस के बाहर एक बड़ी रैली में जुटे। रैली में शामिल अधिकांश लोग कभी ईरान में रहते थे और उन्होंने अमेरिकी मीडिया को बताया कि वे ट्रंप के हमलों को 1979 से देश पर राज कर रहे इस्लामिक शासन को गिराने का अवसर मानते हैं।

    प्रदर्शनकारी साइरस कियान ने कहा कि उन्होंने अपनी पहली 25 साल की जिंदगी ईरान में बिताई। उन्होंने जोर देकर कहा अगर ट्रंप आसमान से दबाव डालना जारी रखते हैं तो ईरानी लोग इस राज को खत्म कर देंगे। रैली में शामिल लोगों ने अमेरिकी कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति ट्रंप का धन्यवाद किया। कुछ प्रदर्शनकारियों ने लाल रंग की हैट पहनी थी जिस पर मेक ईरान ग्रेट अगेन लिखा था।

    इस रैली को आयोजित करने वाले संगठन डीसी प्रोटेस्ट्स फॉर ईरान के वॉलंटियर रेजा मौसवी ने कहा राष्ट्रपति ने कहा था कि मदद आ रही है। उन्होंने वादा किया और उस पर कायम रहे। प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य मौजूदा ईरानी शासन को खत्म करना और देश के आखिरी शाह के बेटे रेजा पहलवी को अगला नेता बनाने के लिए समर्थन देना था।

    प्रदर्शन में शामिल वॉलंटियर मरजीह मिर्जासलेही ने कहा हम चाहते हैं कि हमारे शाह ईरान वापस आएं क्योंकि वे अकेले ही ईरान को फिर से महान बना सकते हैं। मरजीह ने 2007 में ईरान छोड़ दिया था। कई प्रदर्शनकारी अमेरिकी और ईरानी झंडे और पोस्टर लेकर आए थे जिनमें पहलवी को ट्रंप के साथ खड़ा दिखाया गया था।

    वहीं ईरानी सरकारी मीडिया के अनुसार ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने चेतावनी जारी की है। उन्होंने अमेरिका से कहा कि अमेरिकी इंडस्ट्रियल प्लांट्स को इलाके से हटाया जाए। IRGC ने आम लोगों से भी अपील की कि वे उन जगहों को खाली करें जहां अमेरिकी शेयरहोल्डर मौजूद हैं ताकि किसी भी खतरे या नुकसान से बचा जा सके।

    यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब पिछले दो दिनों में ईरानी इंफ्रास्ट्रक्चर पर निशाना बनाकर किए गए हमलों के बाद इलाके में तनाव बढ़ गया है। ईरानी सरकारी मीडिया ने बताया कि इन हमलों में गैर-सैन्य फैक्ट्रियों को निशाना बनाया गया और कई आम लोग मारे गए। इससे क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति और अस्थिर हो गई है और अमेरिकी-ईरानी तनाव चरम पर है।

    इस रैली और ईरानी प्रतिक्रिया से साफ है कि अमेरिका की हालिया कार्रवाई ने राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर गहरा प्रभाव डाला है। प्रदर्शनकारी अमेरिकी हस्तक्षेप को ईरानी शासन को बदलने का अवसर मान रहे हैं जबकि ईरान अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने और नागरिकों को जोखिम से बचाने के लिए सतर्क है।

  • पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन की आहट: चुनाव से पहले राजनीतिक तूफ़ान तेज, एसआईआर और दस्तावेज़ विवाद से बढ़ी चिंता

    पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन की आहट: चुनाव से पहले राजनीतिक तूफ़ान तेज, एसआईआर और दस्तावेज़ विवाद से बढ़ी चिंता

    कोलकाता। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले राष्ट्रपति शासन की अटकलों ने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। राज्यपाल के अचानक बदलाव, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के दौरे पर विवाद और चुनाव आयोग की टीम के दौरे के दौरान हुए विरोध प्रदर्शन ने इस संभावना को और गहरा कर दिया है।

    इतिहास और संवैधानिक पहलू
    पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू होने का इतिहास बहुत लंबा नहीं है। 30 अप्रैल 1977 को तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे की सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाया गया था, जो वाममोर्चा सरकार के शपथ ग्रहण तक 52 दिनों तक जारी रहा। अब विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहा है कि क्या बंगाल एक बार फिर राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रहा है।

    चुनाव आयोग का दौरा और विरोध प्रदर्शन
    चुनाव आयोग की पूर्ण पीठ ने कोलकाता दौरे के दौरान सभी राजनीतिक दलों और पुलिस प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर चुनावी तैयारियों का जायजा लिया। हालांकि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस मुद्दे पर सीधे जवाब देने से परहेज किया और कहा कि कानून-व्यवस्था की समीक्षा के बाद चुनाव की तारीख और चरण तय किए जाएंगे।

    तृणमूल कांग्रेस समेत कई राजनीतिक दलों ने एक या दो चरणों में मतदान कराने की मांग की। आयोग को कोलकाता और आसपास बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ा। तृणमूल समर्थकों ने काले झंडे दिखाए और “लोकतंत्र का हत्यारा” जैसे पोस्टर भी लगाए।

    एसआईआर प्रक्रिया पर विवाद
    राज्य में नवंबर से चल रही एसआईआर (Special Summary Revision) प्रक्रिया के तहत लगभग 60 लाख मतदाताओं के दस्तावेज विचाराधीन हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दस्तावेजों की जांच में न्यायिक अधिकारियों को दो महीने का समय लगने की संभावना है। राजनीतिक दलों का कहना है कि इस स्थिति में चुनाव कराना चुनौतीपूर्ण होगा।

    मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि भाजपा और चुनाव आयोग की मिलीभगत से वैध वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटाने की साजिश की जा रही है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अचानक राज्यपाल सीवी आनंद बोस की जगह आर.एन. रवि को क्यों नियुक्त किया गया, जो तमिलनाडु में विवादित रहे हैं।

    राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का दौरा और विवाद
    राष्ट्रपति का दौरा सिलीगुड़ी में आदिवासी सम्मेलन के लिए था। हालांकि मुख्यमंत्री ने इसे लेकर असंतोष जताया और कहा कि उन्हें न्यूनतम प्रोटोकॉल तक नहीं मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए तृणमूल कांग्रेस पर राष्ट्रपति के अपमान का आरोप लगाया।

    राजनीतिक माहौल और भविष्य की चुनौतियां
    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या एसआईआर के तहत विचाराधीन 60 लाख मतदाताओं के दस्तावेज समय पर जांच कर लिए जाएंगे। यदि यह कार्य पूरा नहीं हुआ, तो या तो चुनाव टालना पड़ सकता है या बिना पूरी सूची के चुनाव कराना पड़ सकता है। इससे राष्ट्रपति शासन की संभावना बढ़ सकती है।अगले कुछ दिनों में केंद्र और चुनाव आयोग की रिपोर्ट के आधार पर पश्चिम बंगाल की राजनीतिक दिशा साफ होगी।

  • J&K: खामेनेई की मौत के बाद जारी प्रदर्शनों के बीच घाटी में तनावपूर्ण शांति, स्कूल-कॉलेज 7 मार्च तक बंद

    J&K: खामेनेई की मौत के बाद जारी प्रदर्शनों के बीच घाटी में तनावपूर्ण शांति, स्कूल-कॉलेज 7 मार्च तक बंद


    जम्मू।
    ईरान के सर्वोच्च नेता (Iran’s Supreme Leader) अयातुल्ला अली खामनेई (Ayatollah Ali Khamenei) की हमले में मौत के विरोध में कश्मीर (Kashmir) में जारी प्रदर्शनों के बीच मंगलवार को तनावपूर्ण शांति रही। पाबंदियां लागू रहीं तो शिक्षण संस्थान बंद रहे। घाटी में स्कूल-कॉलेज की दो दिन की बंदी को एहतियात के तौर पर बढ़ाकर सात मार्च तक कर दिया गया है। राजोरी और पुंछ में बंद शांतिपूर्ण रहा। लद्दाख के कारगिल के बाजार भी बंद रहे।

    मंगलवार को श्रीनगर के सिविल लाइन इलाके में कुछ दुकानें खुली दिखीं और सड़कों पर वाहन चलते नजर आए। डाउनटाउन और शिया बहुल इलाकों में प्रदर्शन हुए। लाल चौक पर घंटा घर को अभी सील ही रखा गया है। इसके चारों ओर बैरिकेड लगे हुए हैं। शहर में बड़ी संख्या में पुलिस और सीआरपीएफ के जवान तैनात हैं। पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक बुधवार को भी प्रतिबंध जारी रहेंगे। इंटरनेट सेवाएं भी बाधित रहेंगी। पुलिस ने लोगों से हिंसा और उकसावे से बचने की अपील की है।

    राजोरी शहर व आसपास के इलाकों में मुस्लिम संगठनों ने दुकानें बंद रखीं। पहाड़ी इलाकों में भी मुस्लिम समुदाय की ही दुकानें बंद रहीं। पुलिस की हर गतिविधि पर कड़ी नजर रही। कहीं भी किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं है। पुंछ पूरी तरह से बंद रहा। इस दौरान हिंदू-सिख के धार्मिक, सामाजिक और व्यावसायिक संगठनों ने भी बंद को अपना समर्थन दिया।

    शांति बनाए रखना और समाज की तरक्की को बनाए रखना सभी की साझा जिम्मेदारी है। अफसर हाई अलर्ट पर रहें। शांति बनाए रखने के लिए हर जरूरी कदम उठाया जाए। -मनोज सिन्हा, उपराज्यपाल

    कुछ लोग माहौल खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के लोगों से गुजारिश है कि वे संयम रखें। गुस्सा-नाराजगी, दुख-दर्द का इजहार करें लेकिन कानून हाथ में न लें। -उमर अब्दुल्ला, मुख्यमंत्री