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  • भारत की कूटनीति में अक्टूबर के आखिरी सप्ताह बड़ा बदलाव, अमेरिका से यूरोप तक कई अहम मुलाकातों ने बढ़ाई हलचल|

    भारत की कूटनीति में अक्टूबर के आखिरी सप्ताह बड़ा बदलाव, अमेरिका से यूरोप तक कई अहम मुलाकातों ने बढ़ाई हलचल|

    नई दिल्ली ।अक्टूबर 2026 का आखिरी सप्ताह भारत की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण रहा। 25 से 31 अक्टूबर के बीच भारत ने यूरोप, पश्चिम एशिया, उत्तरी अमेरिका और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के कई देशों के साथ कूटनीतिक संपर्क तेज किए। इस दौरान उच्चस्तरीय यात्राओं, द्विपक्षीय बैठकों और बहुपक्षीय सम्मेलनों के जरिए व्यापार, निवेश, रक्षा, प्रौद्योगिकी और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बातचीत हुई। सप्ताह के दौरान भारत ने पुराने साझेदारों के साथ संबंधों को आगे बढ़ाने के साथ नए सहयोग की संभावनाओं पर भी ध्यान केंद्रित किया।

    इस सप्ताह की सबसे महत्वपूर्ण गतिविधि 30 और 31 अक्टूबर को अमेरिका के अटलांटा में आयोजित जी-20 विदेश मंत्रियों की बैठक रही। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने वैश्विक संघर्षों, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य आपूर्ति, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जुड़े मुद्दों पर भारत का पक्ष रखा।

    जयशंकर ने अपने संबोधन में कहा कि दुनिया के सामने मौजूद चुनौतियों का समाधान सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीति और बातचीत के माध्यम से तलाशा जाना चाहिए। उन्होंने युद्धों के व्यापक आर्थिक प्रभावों का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, किसी क्षेत्र में होने वाला संघर्ष केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि खाद्य आपूर्ति, ऊर्जा और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को प्रभावित करता है। इसका असर विशेष रूप से ग्लोबल साउथ के विकासशील देशों पर पड़ता है।

    अटलांटा में ही क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक भी हुई। इसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग, क्षेत्रीय सुरक्षा और रणनीतिक समन्वय से जुड़े विषयों पर चर्चा की। इस बैठक को आगामी क्वाड नेताओं के शिखर सम्मेलन की तैयारियों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना गया।

    जी-20 बैठक के दौरान जयशंकर ने कई देशों के प्रतिनिधियों के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय मुलाकातें कीं। 30 अक्टूबर को उन्होंने यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कैलास से बातचीत की। इस दौरान यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात पर विचारों का आदान-प्रदान हुआ।

    कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद के साथ हुई मुलाकात में दोनों देशों के बीच सहयोग की प्रगति की समीक्षा की गई। वहीं, ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग के साथ भी बातचीत हुई। इन संपर्कों में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और भारत के बीच प्रौद्योगिकी एवं नवाचार साझेदारी को आगे बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया गया।

    जयशंकर ने अर्जेंटीना, ब्राजील, मैक्सिको और जर्मनी के विदेश मंत्रियों से भी मुलाकात की। अर्जेंटीना के साथ व्यापार, महत्वपूर्ण खनिज, रक्षा और परमाणु सहयोग जैसे विषय चर्चा में रहे। मैक्सिको के साथ बातचीत में द्विपक्षीय संबंधों को और गति देने पर जोर दिया गया। इन बैठकों के जरिए भारत ने विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक और रणनीतिक सहयोग के अवसर तलाशे।

    इससे पहले 25 से 28 अक्टूबर तक लिकटेंस्टीन के वंशानुगत राजकुमार एलोइस अपनी पत्नी राजकुमारी सोफी के साथ भारत की राजकीय यात्रा पर आए थे। इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद हाउस में उनसे मुलाकात की। बातचीत में व्यापार, निवेश, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई। भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (ईएफटीए) के बीच हुए समझौते के तहत आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाना भी प्रमुख विषय रहा।

    यूरोप के साथ संबंधों को लेकर ऑस्ट्रिया की विदेश मंत्री बीट माइनल-राइजिंगर की भारत यात्रा भी महत्वपूर्ण रही। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ उनकी बातचीत में व्यापार, प्रौद्योगिकी और यूरोपीय देशों के साथ सहयोग बढ़ाने से जुड़े मुद्दे शामिल रहे। इसके साथ ही खाड़ी देशों के साथ भारत के बढ़ते संपर्क भी व्यापक कूटनीतिक गतिविधियों का हिस्सा रहे।

    पूरे सप्ताह की गतिविधियों से भारत की विदेश नीति की तीन प्रमुख प्राथमिकताएं सामने आईं। पहली, अमेरिका, यूरोप और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रमुख साझेदारों के साथ रणनीतिक संवाद बनाए रखना। दूसरी, व्यापार, ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज और आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में सहयोग के नए रास्ते तलाशना। तीसरी, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों के बीच बातचीत तथा कूटनीतिक समाधान को बढ़ावा देना।

    इस तरह अक्टूबर का अंतिम सप्ताह भारत के लिए केवल बैठकों और यात्राओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्विक मंचों पर अपनी प्राथमिकताएं रखने और विभिन्न देशों के साथ साझेदारी को आगे बढ़ाने का अवसर भी बना।

  • F-35 लड़ाकू विमान हर देश को नहीं देता अमेरिका, सर्जियो गोर ने भारत को बताया भरोसेमंद साझेदार, रक्षा सहयोग पर कही अहम बात

    F-35 लड़ाकू विमान हर देश को नहीं देता अमेरिका, सर्जियो गोर ने भारत को बताया भरोसेमंद साझेदार, रक्षा सहयोग पर कही अहम बात

    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को लेकर अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपना अत्याधुनिक एफ-35 लड़ाकू विमान हर देश को नहीं देता, बल्कि इसे केवल उन्हीं साझेदारों को उपलब्ध कराता है जिन पर उसे भरोसा होता है। गोर ने भारत को अमेरिका का भरोसेमंद साझेदार बताते हुए क्वॉड समूह में उसकी भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों, सैन्य अभ्यासों और संभावित लड़ाकू विमान सौदों को लेकर चर्चा जारी है।

    सर्जियो गोर ने भारत में हाल के संयुक्त सैन्य अभ्यासों का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले एक महीने के दौरान करीब 500 अमेरिकी सैनिक भारत में आयोजित युद्धाभ्यास में शामिल हुए। इसके अलावा, तरंग शक्ति अभ्यास के दौरान अमेरिकी एफ-35 लड़ाकू विमान भी भारत पहुंचे और भारतीय वायुसेना के साथ अभ्यास किया। इन गतिविधियों को दोनों देशों के बीच बढ़ते सैन्य सहयोग के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    एफ-35 अमेरिका के आधुनिक लड़ाकू विमानों में शामिल है। इसमें स्टील्थ तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिसका उद्देश्य विमान को दुश्मन के रडार की पकड़ में आने से बचने में मदद करना है। इस तरह के विमान और उनसे जुड़ी तकनीक का इस्तेमाल तथा हस्तांतरण संवेदनशील रक्षा मामलों में गिना जाता है। गोर के बयान के मुताबिक, अमेरिका ऐसे विमानों के मामले में भरोसेमंद साझेदारों को प्राथमिकता देता है। हालांकि, भारत के लिए एफ-35 की खरीद को लेकर किसी अंतिम समझौते की घोषणा इस बयान में नहीं की गई।

    गोर ने भारत को क्वॉड समूह का मूल्यवान साझेदार भी बताया। क्वॉड में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। यह समूह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा, स्थिरता और सहयोग से जुड़े मुद्दों पर काम करता है। चारों देशों के बीच संवाद और गतिविधियों का उद्देश्य क्षेत्रीय चुनौतियों पर सहयोग बढ़ाना है। ऐसे में भारत के साथ अमेरिकी सैन्य अभ्यास और एफ-35 विमानों की भागीदारी दोनों देशों के रक्षा संबंधों की अहमियत को रेखांकित करती है।

    भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग केवल सैन्य अभ्यासों तक सीमित नहीं है। दोनों देश सैन्य क्षमताओं के समन्वय, संयुक्त प्रशिक्षण और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी सहयोग करते हैं। संयुक्त अभ्यासों के दौरान सेनाओं को एक-दूसरे की कार्यप्रणाली, संचालन प्रक्रियाओं और क्षमताओं को समझने का अवसर मिलता है। इससे भविष्य में साथ काम करने की क्षमता विकसित करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, किसी खास अभ्यास से तकनीक हस्तांतरण या विमान खरीद का समझौता अपने आप तय नहीं हो जाता।

    एफ-35 को लेकर गोर की टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब भारत अपनी वायुसेना की क्षमताओं को मजबूत करने और विभिन्न देशों के साथ रक्षा संबंधों को आगे बढ़ाने पर काम कर रहा है। आधुनिक लड़ाकू विमानों की खरीद से जुड़े फैसलों में लागत, तकनीकी जरूरतें, रखरखाव, परिचालन आवश्यकताएं और रणनीतिक प्राथमिकताएं जैसे कई पहलू महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए अमेरिकी राजदूत का बयान दोनों देशों के बीच भरोसे और सैन्य संपर्कों को तो दर्शाता है, लेकिन इसे किसी निश्चित विमान सौदे की पुष्टि नहीं माना जा सकता।

    कुल मिलाकर, सर्जियो गोर ने अपने बयान में भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण और भरोसेमंद साझेदार बताया है। हाल के सैन्य अभ्यासों और तरंग शक्ति में एफ-35 की भागीदारी को उन्होंने दोनों देशों के मजबूत होते रक्षा संबंधों के संदर्भ में रखा। फिलहाल, भारत को एफ-35 की बिक्री को लेकर किसी अंतिम समझौते की पुष्टि नहीं हुई है। आने वाले समय में दोनों देशों के रक्षा सहयोग की दिशा और संभावित समझौतों पर होने वाली बातचीत महत्वपूर्ण रहेगी।

  • क्वाड मंत्रीस्तरीय बैठक से पहले अमेरिका का बड़ा संदेश, हिंद-प्रशांत में भारत समेत साझेदार देशों की भूमिका को बताया रणनीतिक रूप से अहम

    क्वाड मंत्रीस्तरीय बैठक से पहले अमेरिका का बड़ा संदेश, हिंद-प्रशांत में भारत समेत साझेदार देशों की भूमिका को बताया रणनीतिक रूप से अहम

    नई दिल्ली । फिलीपींस में आयोजित होने वाली क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक से पहले अमेरिका ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत सहित अपने रणनीतिक साझेदार देशों की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया है। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने कहा कि अमेरिका एक स्वतंत्र, मुक्त और समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है तथा इस उद्देश्य की प्राप्ति में क्वाड देशों की साझेदारी निर्णायक महत्व रखती है। उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री स्थिरता से जुड़े मुद्दे वैश्विक स्तर पर लगातार चर्चा का विषय बने हुए हैं।

    अमेरिकी विदेश सचिव मार्को रुबियो फिलीपींस में आयोजित आसियान से जुड़ी विभिन्न बैठकों और क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक में भाग लेने के लिए रवाना हो चुके हैं। उनके दौरे के दौरान आसियान पोस्ट-मिनिस्ट्रियल कॉन्फ्रेंस, ईस्ट एशिया समिट विदेश मंत्रियों की बैठक और आसियान रीजनल फोरम की बैठकों में भी हिस्सा लेने का कार्यक्रम है। इस दौरान उनकी हिंद-प्रशांत क्षेत्र के कई देशों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ द्विपक्षीय और बहुपक्षीय वार्ताएं भी प्रस्तावित हैं।

    अमेरिकी पक्ष का कहना है कि इस यात्रा का प्रमुख उद्देश्य क्षेत्रीय सहयोग को और मजबूत करना, रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देना तथा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से जुड़े साझा प्रयासों को आगे बढ़ाना है। अमेरिका ने दोहराया है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नियम आधारित व्यवस्था, समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता और सभी देशों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना उसकी प्रमुख विदेश नीति प्राथमिकताओं में शामिल है।

    क्वाड समूह भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक मंच है। यह समूह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता, आर्थिक सहयोग, आपदा प्रबंधन, समुद्री सुरक्षा, उभरती प्रौद्योगिकियों और आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत बनाने जैसे विषयों पर मिलकर काम करता है। पिछले कुछ वर्षों में क्वाड की गतिविधियों का दायरा लगातार बढ़ा है और इसे क्षेत्रीय सहयोग के महत्वपूर्ण मंच के रूप में देखा जा रहा है।

    इससे पहले आयोजित क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक में चारों देशों ने स्वतंत्र, मुक्त और समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई थी। साथ ही सदस्य देशों ने क्षेत्रीय सहयोग को और मजबूत करने तथा ऐसी साझा पहलों को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई थी, जिनका लाभ हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देशों को सीधे तौर पर मिल सके। बैठक में समुद्री सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर विशेष जोर दिया गया था।

    पिछली बैठक के संयुक्त वक्तव्य में पूर्वी चीन सागर और दक्षिण चीन सागर की स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की गई थी। सदस्य देशों ने किसी भी ऐसे एकतरफा कदम का विरोध दोहराया था, जो बल प्रयोग, दबाव या सैन्य गतिविधियों के माध्यम से क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को प्रभावित करता हो। साथ ही नौवहन की स्वतंत्रता, हवाई आवाजाही की सुरक्षा और समुद्री क्षेत्रों में बढ़ती सैन्य गतिविधियों को लेकर भी चिंता जताई गई थी।

    फिलीपींस में होने वाली इस बैठक पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें टिकी हुई हैं। माना जा रहा है कि बैठक में क्षेत्रीय सुरक्षा, सामरिक सहयोग, समुद्री चुनौतियों और आर्थिक साझेदारी जैसे मुद्दों पर व्यापक चर्चा होगी। भारत सहित सभी सदस्य देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता, संतुलन और सहयोग को मजबूत करने की दिशा में साझा रणनीति पर आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे।

  • अमेरिका की शुल्क नीति पर उठे सवाल, विशेषज्ञों ने भारत-चीन-रूस समीकरण को बताया उभरती चुनौती

    अमेरिका की शुल्क नीति पर उठे सवाल, विशेषज्ञों ने भारत-चीन-रूस समीकरण को बताया उभरती चुनौती

    नई दिल्ली। वैश्विक राजनीति और व्यापारिक संबंधों में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका की टैरिफ नीति एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। हाल के वर्षों में अमेरिकी प्रशासन द्वारा अपनाई गई संरक्षणवादी आर्थिक नीतियों को लेकर दुनिया भर में बहस जारी है। इसी क्रम में यह तर्क सामने आ रहा है कि अमेरिका द्वारा भारत और चीन जैसे बड़े एशियाई देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की रणनीति अनजाने में उन देशों को एक-दूसरे के करीब ला सकती है, जिन्हें अब तक कई मुद्दों पर प्रतिस्पर्धी या विरोधी माना जाता रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक शक्ति संतुलन के इस दौर में आर्थिक दबाव की नीतियां कभी-कभी ऐसे परिणाम भी पैदा कर देती हैं, जिनकी पहले कल्पना नहीं की गई होती।

    अमेरिका की ओर से विभिन्न देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणाओं ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत में नई चिंताएं पैदा की हैं। भारत और चीन दोनों दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में यदि दोनों देशों को समान प्रकार के आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ता है, तो उनके बीच व्यापारिक सहयोग और संवाद बढ़ने की संभावनाओं पर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि भारत और चीन के बीच सीमा विवाद सहित कई जटिल मुद्दे मौजूद हैं, फिर भी आर्थिक हितों के आधार पर सहयोग की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता।

    पिछले कुछ समय में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत, चीन और रूस की सक्रिय भागीदारी ने भी वैश्विक रणनीतिक समीकरणों को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दिया है। कई विश्लेषकों का मानना है कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ती दुनिया में क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियां अपने-अपने हितों के आधार पर नए साझेदारी मॉडल तलाश रही हैं। इसी संदर्भ में रूस-भारत-चीन (RIC) समूह को लेकर भी चर्चाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यह मंच किसी बड़े रणनीतिक गठबंधन का रूप ले लेगा, लेकिन तीनों देशों के बीच संवाद और सहयोग के कुछ क्षेत्रों में गतिविधियां बढ़ी हैं।

    दूसरी ओर, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सक्रिय क्वाड (QUAD) समूह को लेकर भी विभिन्न प्रकार के आकलन सामने आते रहते हैं। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के इस समूह का उद्देश्य क्षेत्रीय सहयोग, समुद्री सुरक्षा और आर्थिक साझेदारी को मजबूत करना बताया जाता है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भारत अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देता है और वह किसी भी मंच को किसी एक देश के खिलाफ गठबंधन के रूप में नहीं देखना चाहता। यही कारण है कि भारत एक तरफ क्वाड में सक्रिय रहता है, वहीं दूसरी ओर ब्रिक्स, एससीओ और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर भी अपनी भूमिका निभाता है।

    सितंबर में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को लेकर भी वैश्विक स्तर पर नजरें टिकी हुई हैं। ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वित्तीय सहयोग और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों जैसे विषयों पर चर्चा लंबे समय से होती रही है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सदस्य देश आपसी आर्थिक सहयोग को और मजबूत करते हैं तो इससे डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में कुछ कदम उठाए जा सकते हैं। हालांकि डॉलर अभी भी वैश्विक वित्तीय प्रणाली की प्रमुख मुद्रा बना हुआ है और निकट भविष्य में उसकी स्थिति में किसी बड़े बदलाव की संभावना सीमित मानी जाती है।

    अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि वर्तमान दौर में किसी भी वैश्विक शक्ति के लिए केवल आर्थिक दबाव के जरिए अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को लागू करना आसान नहीं रह गया है। दुनिया तेजी से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जहां देश अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर अलग-अलग मंचों पर सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों करते हैं। भारत भी इसी संतुलित दृष्टिकोण का पालन करता रहा है, जिसमें अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और अन्य देशों के साथ संबंधों को समान महत्व दिया जाता है।

    फिलहाल यह स्पष्ट है कि वैश्विक व्यापार युद्ध, टैरिफ नीतियां और बदलते भू-राजनीतिक समीकरण आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित करते रहेंगे। भारत, चीन और रूस के बीच बढ़ता संवाद, ब्रिक्स की सक्रियता और क्वाड की भूमिका जैसे विषय भविष्य की वैश्विक राजनीति में महत्वपूर्ण बने रहेंगे। हालांकि इन सभी संभावनाओं का वास्तविक प्रभाव आने वाले समय में देशों के ठोस कदमों और नीतिगत निर्णयों पर निर्भर करेगा।

  • फिजी में QUAD का बड़ा दांव: बंदरगाह प्रोजेक्ट से इंडो-पैसिफिक में चीन को चुनौती, भारत की भूमिका अहम

    फिजी में QUAD का बड़ा दांव: बंदरगाह प्रोजेक्ट से इंडो-पैसिफिक में चीन को चुनौती, भारत की भूमिका अहम




    नई दिल्ली। ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान और अमेरिका (QUAD) ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी रणनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। चारों देशों ने फिजी में मिलकर एक आधुनिक बंदरगाह विकसित करने पर सहमति जताई है। इसे क्वाड के इतिहास में पहली बार ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट माना जा रहा है, जो सीधे तौर पर क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन से जुड़ा है।

    फिजी, जो प्रशांत महासागर के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में स्थित द्वीप राष्ट्र है, लंबे समय से इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों का केंद्र बनता जा रहा था। अब क्वाड देशों की यह पहल चीन के प्रभाव को संतुलित करने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।

    फिजी में बंदरगाह क्यों अहम?
    फिजी भौगोलिक रूप से ऑस्ट्रेलिया के पूर्व और हवाई के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। यह प्रशांत महासागर के प्रमुख समुद्री मार्गों के बीच आता है। इस कारण यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

    पिछले कुछ वर्षों में चीन ने छोटे द्वीपीय देशों में निवेश और कर्ज के जरिए अपनी पकड़ मजबूत की है। कई जगहों पर बंदरगाह और बुनियादी ढांचे के विकास के पीछे चीन की रणनीतिक उपस्थिति को लेकर भी चिंता जताई जाती रही है। इसी पृष्ठभूमि में क्वाड का यह कदम देखा जा रहा है।

    भारत के लिए क्या है महत्व?
    फिजी में लगभग 37% आबादी भारतीय मूल की है, जिन्हें “गिरमिटिया” समुदाय के वंशज माना जाता है। भारत और फिजी के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध बहुत मजबूत हैं।

    इस प्रोजेक्ट में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत अपने समुद्री अनुभव, बंदरगाह विकास विशेषज्ञता और तकनीकी सहयोग के जरिए इस परियोजना में योगदान देगा। इसके अलावा भारत के Information Fusion Centre-IOR (गुरुग्राम) के माध्यम से समुद्री गतिविधियों की निगरानी में भी सहयोग संभव है।

    QUAD की नई रणनीति
    इस प्रोजेक्ट के साथ QUAD ने “Indo-Pacific Maritime Surveillance Cooperation” की भी शुरुआत की है, जिसके तहत समुद्री क्षेत्र में रीयल टाइम डेटा साझा किया जाएगा। इसका उद्देश्य अवैध मछली पकड़ने, संदिग्ध जहाजों और समुद्री सुरक्षा चुनौतियों पर नजर रखना है।

    साथ ही “Quad-at-Sea” नाम से एक संयुक्त अभ्यास योजना भी प्रस्तावित है, जिसमें चारों देशों की कोस्ट गार्ड एक साथ समुद्री अभ्यास करेंगे।

    चीन की चिंता क्यों बढ़ी?
    विशेषज्ञों के मुताबिक, यह पहली बार है जब QUAD ने केवल बयानबाजी से आगे बढ़कर किसी तीसरे देश में संयुक्त इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट शुरू करने का फैसला किया है। इससे चीन की “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति को सीधी चुनौती मिल सकती है।

    चीन पहले से ही सोलोमन आइलैंड्स जैसे देशों में सुरक्षा समझौतों के जरिए अपनी उपस्थिति बढ़ा चुका है। ऐसे में फिजी में क्वाड की सक्रियता को बीजिंग एक रणनीतिक दबाव के रूप में देख सकता हैफिजी में प्रस्तावित यह बंदरगाह परियोजना केवल एक विकासात्मक कदम नहीं, बल्कि इंडो-पैसिफिक में शक्ति संतुलन बदलने की दिशा में बड़ा भू-राजनीतिक संकेत है। भारत समेत QUAD देशों की यह साझेदारी आने वाले समय में समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय कूटनीति में नई दिशा तय कर सकती है।