F-35 लड़ाकू विमान हर देश को नहीं देता अमेरिका, सर्जियो गोर ने भारत को बताया भरोसेमंद साझेदार, रक्षा सहयोग पर कही अहम बात

नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को लेकर अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपना अत्याधुनिक एफ-35 लड़ाकू विमान हर देश को नहीं देता, बल्कि इसे केवल उन्हीं साझेदारों को उपलब्ध कराता है जिन पर उसे भरोसा होता है। गोर ने भारत को अमेरिका का भरोसेमंद साझेदार बताते हुए क्वॉड समूह में उसकी भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों, सैन्य अभ्यासों और संभावित लड़ाकू विमान सौदों को लेकर चर्चा जारी है।

सर्जियो गोर ने भारत में हाल के संयुक्त सैन्य अभ्यासों का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले एक महीने के दौरान करीब 500 अमेरिकी सैनिक भारत में आयोजित युद्धाभ्यास में शामिल हुए। इसके अलावा, तरंग शक्ति अभ्यास के दौरान अमेरिकी एफ-35 लड़ाकू विमान भी भारत पहुंचे और भारतीय वायुसेना के साथ अभ्यास किया। इन गतिविधियों को दोनों देशों के बीच बढ़ते सैन्य सहयोग के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

एफ-35 अमेरिका के आधुनिक लड़ाकू विमानों में शामिल है। इसमें स्टील्थ तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिसका उद्देश्य विमान को दुश्मन के रडार की पकड़ में आने से बचने में मदद करना है। इस तरह के विमान और उनसे जुड़ी तकनीक का इस्तेमाल तथा हस्तांतरण संवेदनशील रक्षा मामलों में गिना जाता है। गोर के बयान के मुताबिक, अमेरिका ऐसे विमानों के मामले में भरोसेमंद साझेदारों को प्राथमिकता देता है। हालांकि, भारत के लिए एफ-35 की खरीद को लेकर किसी अंतिम समझौते की घोषणा इस बयान में नहीं की गई।

गोर ने भारत को क्वॉड समूह का मूल्यवान साझेदार भी बताया। क्वॉड में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। यह समूह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा, स्थिरता और सहयोग से जुड़े मुद्दों पर काम करता है। चारों देशों के बीच संवाद और गतिविधियों का उद्देश्य क्षेत्रीय चुनौतियों पर सहयोग बढ़ाना है। ऐसे में भारत के साथ अमेरिकी सैन्य अभ्यास और एफ-35 विमानों की भागीदारी दोनों देशों के रक्षा संबंधों की अहमियत को रेखांकित करती है।

भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग केवल सैन्य अभ्यासों तक सीमित नहीं है। दोनों देश सैन्य क्षमताओं के समन्वय, संयुक्त प्रशिक्षण और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी सहयोग करते हैं। संयुक्त अभ्यासों के दौरान सेनाओं को एक-दूसरे की कार्यप्रणाली, संचालन प्रक्रियाओं और क्षमताओं को समझने का अवसर मिलता है। इससे भविष्य में साथ काम करने की क्षमता विकसित करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, किसी खास अभ्यास से तकनीक हस्तांतरण या विमान खरीद का समझौता अपने आप तय नहीं हो जाता।

एफ-35 को लेकर गोर की टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब भारत अपनी वायुसेना की क्षमताओं को मजबूत करने और विभिन्न देशों के साथ रक्षा संबंधों को आगे बढ़ाने पर काम कर रहा है। आधुनिक लड़ाकू विमानों की खरीद से जुड़े फैसलों में लागत, तकनीकी जरूरतें, रखरखाव, परिचालन आवश्यकताएं और रणनीतिक प्राथमिकताएं जैसे कई पहलू महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए अमेरिकी राजदूत का बयान दोनों देशों के बीच भरोसे और सैन्य संपर्कों को तो दर्शाता है, लेकिन इसे किसी निश्चित विमान सौदे की पुष्टि नहीं माना जा सकता।

कुल मिलाकर, सर्जियो गोर ने अपने बयान में भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण और भरोसेमंद साझेदार बताया है। हाल के सैन्य अभ्यासों और तरंग शक्ति में एफ-35 की भागीदारी को उन्होंने दोनों देशों के मजबूत होते रक्षा संबंधों के संदर्भ में रखा। फिलहाल, भारत को एफ-35 की बिक्री को लेकर किसी अंतिम समझौते की पुष्टि नहीं हुई है। आने वाले समय में दोनों देशों के रक्षा सहयोग की दिशा और संभावित समझौतों पर होने वाली बातचीत महत्वपूर्ण रहेगी।