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  • लोकसभा में पास होने के बाद आज राज्यसभा में पेश होगा 'एंटी-पेपर लीक बिल….

    लोकसभा में पास होने के बाद आज राज्यसभा में पेश होगा 'एंटी-पेपर लीक बिल….


    नई दिल्ली।
    लोकसभा (Lok Sabha) में हंगामे के बीच पास होने के बाद, अब मोदी सरकार (Modi Government) गुरुवार यानी आज 30 जुलाई को ‘लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन विधेयक, 2026’ (Public Examinations -Prevention of Unfair Means- Amendment Bill, 2026) राज्यसभा (Rajya Sabha) में पेश करने जा रही है। देशभर में छात्रों के भारी विरोध प्रदर्शन के बाद लाए गए इस नए और सख्त संशोधन विधेयक पर आज पूरे देश की निगाहें टिकी हैं।

    बुधवार को विपक्ष के भारी हंगामे और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के कड़े तेवरों के बावजूद सरकार ने इसे लोकसभा से ध्वनि मत से पारित करा लिया। अब सवाल यह है कि क्या उच्च सदन यानी राज्यसभा में सरकार को इस बिल को पास कराने में कोई अड़चन आएगी? आइए समझते हैं राज्यसभा का ताजा ‘नंबर गेम’।


    राज्यसभा का नंबर गेम: क्या आसानी से पास होगा बिल?

    राज्यसभा की कुल संख्या 245 है, हालांकि अभी 242 सांसद हैं। अभी खास बहुमत के लिए 162 सांसदों की जरूरत है। वहीं साधारण बहुमत का आंकड़ा 123 है। एंटी-पेपर लीक वाले इस बिल के लिए साधारण बहुमत की ही जरूरत है।

    गठबंधन / दल – सांसदों की संख्या- बहुमत का आंकड़ा (123)

    NDA (सत्ता पक्ष) – 152 – बहुमत से 29 सांसद ज्यादा
    INDIA (विपक्ष) – 63 –
    अन्य दल – 29 –
    रिक्त सीट – 1 –
    कुल – 245 –

    राज्यसभा में NDA के पास अपने दम पर 152 सांसदों का मजबूत आंकड़ा है, जो बहुमत के जादुई आंकड़े (123) से काफी ज्यादा है। ऐसे में ‘एंटी-पेपर लीक संशोधन बिल 2026’ को उच्च सदन से पास कराने में सरकार को कोई खास मुश्किल नहीं होगी, भले ही विपक्ष कितना भी हंगामा क्यों न करे।

    इस कानून का मकसद लोगों, संगठित समूहों और संस्थाओं को अनुचित साधनों का इस्तेमाल करने और अपराध करने से प्रभावी ढंग से रोकना है, जिससे सार्वजनिक परीक्षाओं की पवित्रता बनी रहे।


    ‘एंटी-पेपर लीक संशोधन बिल 2026’ में नया क्या है?

    साल 2024 के मूल कानून को और अधिक सख्त बनाने के लिए इस 2026 के संशोधन विधेयक में कई कड़े प्रावधान जोड़े गए हैं। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह द्वारा पेश किए गए इस बिल की मुख्य बातें इस प्रकार हैं।
    – संगठित पेपर लीक और परीक्षा में धांधली करने वाले गिरोह, संस्थानों या अधिकारियों को अब 10 साल तक की सख्त कैद होगी (पहले यह अधिकतम 5 साल थी)।
    – पेपर लीक सिंडिकेट और इसमें शामिल सर्विस प्रोवाइडर संस्थानों पर 10 करोड़ रुपये तक का भारी-भरकम जुर्माना लगाया जाएगा।
    – इन मामलों को लंबा खिंचने से रोकने के लिए हर राज्य में ‘स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट’ बनाए जाएंगे, जहां रोजाना सुनवाई होगी।
    – किसी भी पेपर लीक मामले की जांच राज्य पुलिस या स्पेशल टास्क फोर्स (STF) को अधिकतम 60 दिनों के भीतर पूरी करनी होगी।


    लोकसभा में खूब हुआ हंगामा

    लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की कुछ टिप्पणियों को लेकर सत्तापक्ष के सदस्यों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। इस दौरान हुए हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही दो बार स्थगित करनी पड़ी। दोपहर ढाई बजे प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने चर्चा का जवाब दिया। इसके बाद विधेयक को ध्वनि मत से पारित कर दिया गया। विधेयक में पेपर लीक रोकने के कई कड़े प्रावधान किए गए हैं।


    क्यों मची है संसद में रार?

    इस बिल के लोकसभा में पास होने के दौरान भारी राजनीतिक ड्रामा देखने को मिला। हाल ही में हुए NEET-UG 2026 पेपर लीक विवाद के बाद देशभर में 36 दिनों तक छात्रों का प्रदर्शन चला था, जिसके दबाव में तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा तक देना पड़ा।

    बुधवार को लोकसभा में चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर गृह मंत्री अमित शाह के इशारे पर पुलिस ने पैलेट गन का इस्तेमाल किया। इस पर सत्ता पक्ष ने कड़ी आपत्ति जताई। सरकार की ओर से केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने राहुल के दावों को बेबुनियाद और तथ्यहीन बताते हुए खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए केवल आंसू गैस का इस्तेमाल किया था।

  • राज्यसभा उपचुनावः बंगाल में ममता के साथ खेला…BJP ने TMC से आए तीनों सांसदों को बनाया उम्मीदवार

    राज्यसभा उपचुनावः बंगाल में ममता के साथ खेला…BJP ने TMC से आए तीनों सांसदों को बनाया उम्मीदवार


    नई दिल्ली।
    पश्चिम बंगाल (West Bengal) में चुनाव आयोग (Election Commission) ने खाली हुई राज्यसभा (Rajya Sabha) की तीन सीटों पर उपचुनाव (By-election) की घोषणा कर दी है. इस हादसे की सबसे दिलचस्प बात ये है कि उपचुनाव के बाद भी संसद के उच्च सदन में भेजने वाले चेहरे वही रहने की उम्मीद है, बस उनकी पार्टी का रंग बदल चुका है।

    BJP इन तीनों सीटों पर जीत दर्ज करने के लिए पूरी तरह आश्वस्त नजर आ रही है. दूसरी तरफ, आपसी गुटबाजी और बिखराव से जूझ रही तृणमूल कांग्रेस के सामने राज्यसभा में अपनी ताकत और कम होने का बड़ा खतरा मंडरा रहा है।

    जून में टीएमसी के तीन पूर्व राज्यसभा सांसदों- सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाइक ने अपनी ही पार्टी और राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. विधानसभा चुनाव में टीएमसी की करारी हार के बाद इन नेताओं ने नेतृत्व पर सवाल उठाए थे।


    बीजेपी में शामिल होते ही उम्मीदवार घोषित

    सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाइक अब ये बीजेपी का दामन थाम चुके हैं. उन्होंने आज ही बीजेपी जॉइन की और पार्टी ने आज ही उन्हें ही अपना उम्मीदवार बना दिया है।

    संसदीय नियमों के मुताबिक, सुखेंदु शेखर राय और प्रकाश चिक बड़ाइक का कार्यकाल सितंबर 2029 तक था, जबकि सुष्मिता देव का कार्यकाल अप्रैल 2030 तक चलना था. अब इन खाली सीटों पर 24 जुलाई को उपचुनाव होने जा रहे हैं और यही तीनों नेता एक बार फिर उम्मीदवार होंगे. सिर्फ उनकी पार्टी नई होगी।


    विधानसभा का गणित: बीजेपी का पलड़ा भारी

    बंगाल विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों को देखें तो नंबर गेम पूरी तरह से बीजेपी के पक्ष में झुका हुआ है. 294 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी के पास अपने 208 विधायक हैं. राज्यसभा चुनाव के सिस्टम के मुताबिक, तीन सीटों वाले इस उपचुनाव में किसी भी उम्मीदवार को जीतने के लिए लगभग 70 वोटों की जरूरत होगी।

    बीजेपी के पास विधायकों की संख्या इतनी ज्यादा है कि वो बिना किसी बाहरी समर्थन के अपने तीनों उम्मीदवारों को आसानी से 70, 69 और 69 वोट दिला सकती है. इस गणित के कारण बीजेपी की तीनों सीटों पर जीत पूरी तरह पक्की मानी जा रही है.


    दो गुटों में बंटी टीएमसी, चुनौती बड़ी

    बीजेपी के इस बड़े ‘खेले’ के सामने टीएमसी बेबस नजर आ रही है. किसी भी विरोधी उम्मीदवार को जीतने के लिए कम से कम 70 वोटों की जरूरत होगी. वैसे तो टीएमसी के टिकट पर जीते विधायकों की कुल संख्या अभी भी करीब 80 है. लेकिन पार्टी के भीतर मचे घमासान ने इसे कमजोर कर दिया है. टीएमसी के विधायक अब दो धड़ों में बंट चुके हैं- एक खेमा ममता बनर्जी के साथ है, तो दूसरा बागी गुट विधानसभा में विपक्ष के नेता रीताब्रत बनर्जी के नेतृत्व में काम कर रहा है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर टीएमसी एकजुट होती, तो वह कम से कम एक सीट के लिए मुकाबला कड़ा कर सकती थी. लेकिन अंदरूनी लड़ाई इतनी बढ़ चुकी है कि दोनों गुटों के बीच किसी आम सहमति की गुंजाइश खत्म हो गई है. बागी गुट का दावा है कि टीएमसी के 80 में से 58 विधायकों ने पहले ही रीताब्रत बनर्जी का समर्थन किया था और अब उनके साथ करीब 65 विधायक हैं।


    ‘विश्वासघात’ बनाम ‘नेतृत्व का संकट’

    ममता बनर्जी का खेमा इस नुकसान को कम आंकने की कोशिश कर रहा है. उनका कहना है कि ये उन नेताओं का ‘विश्वासघात’ है जिन्होंने संकट के समय पार्टी को छोड़ दिया. टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘ये सीटें टीएमसी की थीं, जो पिछले चुनाव में पार्टी की ताकत के दम पर जीती गई थीं. कुछ लोगों ने मुश्किल समय में पार्टी छोड़ दी, बंगाल की जनता सब देख रही है।

    दूसरी तरफ, बागी गुट के नेताओं का कहना है कि ये कोई आम इस्तीफा नहीं है, बल्कि ये पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को लेकर अविश्वास का नतीजा है. उन्होंने कहा, ‘नेतृत्व ने संगठन के भीतर से मिल रही चेतावनियों को नजरअंदाज किया, जिसका नतीजा विधानसभा चुनाव में देखने को मिला. असली मुद्दा राज्यसभा सीट का नहीं, बल्कि ये है कि चुने हुए प्रतिनिधियों का अब मौजूदा नेतृत्व पर भरोसा क्यों नहीं रहा।

    फिलहाल, दोनों गुटों के बीच टीएमसी के नाम, सिंबल और संगठन पर कब्जे की लड़ाई चुनाव आयोग के सामने लंबित है. अगर 24 जुलाई को होने वाले उपचुनाव में बीजेपी इन तीनों सीटों पर जीत हासिल करती है, तो राज्यसभा में उसकी ताकत बढ़ेगी और टीएमसी का कद घटेगा।

  • ताश के पत्तों की तरह ढह रहा विपक्ष का किला… राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत के करीब BJP

    ताश के पत्तों की तरह ढह रहा विपक्ष का किला… राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत के करीब BJP


    नई दिल्ली।
    दो साल पहले हुए लोकसभा चुनावों (Lok Sabha elections) में भाजपा (BJP) के नेतृत्व वाले एनडीए (NDA) को कड़ी टक्कर देने वाला विपक्षी इंडिया (INDIA) गठबंधन आज अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। आंतरिक कलह, हालिया चुनावी हार और घटक दलों के पाला बदलने के कारण लोकसभा में विपक्ष का आंकड़ा 200 के नीचे गिरने की कगार पर पहुंच गया है। विपक्ष के रणनीतिकारों को डर है कि इस बिखराव के बाद संसद के भीतर सरकार के विधायी और राजनीतिक एजेंडे को चुनौती देने की विपक्ष की बची-कुची क्षमता भी पूरी तरह खत्म हो जाएगी।

    संसद के भीतर इंडिया गठबंधन (India Alliance) का किला ताश के पत्तों की तरह ढहता नजर आ रहा है। 22 सांसदों वाली डीएमके और 3 सांसदों वाली आम आदमी पार्टी (AAP) ने हाल ही में इंडिया का साथ छोड़ दिया। इससे इंडिया गठबंधन की लोकसभा में ताकत 2024 के 234 से घटकर पहले ही 209 पर आ चुकी है। अब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 29 लोकसभा सांसदों में से दो-तिहाई के बागी होने की खबरों ने विपक्ष की नींद उड़ा दी है। अगर ऐसा होता है तो विपक्षी गठबंधन का आंकड़ा 190 के भी नीचे चला जाएगा।


    भाजपा की नजर पूर्ण बहुमत पर

    विपक्ष के इस पतन से उत्साहित होकर भाजपा लोकसभा में अपने दम पर साधारण बहुमत 272 का आंकड़ा पार करने की रणनीति बना रही है। फिलहाल भाजपा के यहां 240 सांसद हैं। अगर टीएमसी के सांसदों का विलय हो जाता है तो भाजपा का यह आंकड़ा बहुमत के काफी करीब पहुंच जाएगा। वहीं, संकट सिर्फ लोकसभा तक सीमित नहीं है। राज्यसभा में भी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसदों के बीच विभाजन की पूरी संभावना है। हाल ही में आम आदमी पार्टी में भी यह देखा गया। इन बदलते समीकरणों के कारण राज्यसभा में भी एनडीए दो-तिहाई बहुमत के बेहद करीब पहुंच रहा है।

    इंडिया गठबंधन के कुछ पदाधिकारियों को डर है कि इस मजबूती से उत्साहित होकर सत्तारूढ़ गठबंधन (NDA) विपक्ष के अन्य कमजोर या असंतुष्ट धड़ों को भी अपने पाले में लाने के लिए प्रेरित हो सकता है।


    महिला आरक्षण और परिसीमन बिल की वापसी तय

    दोनों सदनों में सरकार का विधायी रास्ता पूरी तरह साफ होने के बाद अब यह माना जा रहा है कि मोदी सरकार अपने कई महत्वाकांक्षी और लंबित विधेयकों को तेजी से आगे बढ़ाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब यह केवल समय की बात है कि सरकार महिला आरक्षण में संशोधन विधेयक और परिसीमन बिल को दोबारा संसद में पेश कर पास करा लेगी, जिन्हें पिछले सत्र में इंडिया गठबंधन ने एकजुट होकर रोक दिया था।


    हार का सिंड्रोम और कांग्रेस पर आरोप

    सोमवार को हुई इंडिया गठबंधन की बैठक में जमकर आरोप-प्रत्यारोप और घोर निराशा का माहौल देखा गया। विपक्षी नेताओं का यह गुस्सा और हताशा लगातार मिली चुनावी शिकस्त का नतीजा है। 2024 के आम चुनाव के बाद विपक्ष को हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी में करारी हार का सामना करना पड़ा है। इस राजनीतिक कुप्रबंधन के चलते क्षेत्रीय दलों खासकर TMC, RJD, DMK, शिवसेना-UBT, एनसीपी-शरदचंद्र पवार, आप और लेफ्ट का कांग्रेस के नेतृत्व की क्षमता पर से भरोसा उठ गया है।


    अब सिर्फ 6 राज्यों में बची INDIA की सत्ता

    लगातार मिली हार के बाद अब ‘इंडिया’ गठबंधन का शासन देश के गिने-चुने राज्यों में ही सिमट कर रह गया है। उत्तर भारत में जम्मू-कश्मीर, झारखंड और हिमाचल प्रदेश में विपक्ष की सरकार है। वहीं, दक्षिण भारत में कर्नाटक, तेलंगाना और केरल में कांग्रेस सत्ता में है।

  • 10 राज्यों की 24 राज्यसभा सीटों के लिए 18 जून को मतदान…

    10 राज्यों की 24 राज्यसभा सीटों के लिए 18 जून को मतदान…


    नई दिल्ली।
    भारत (India) के 10 राज्यों की 24 सीटों पर राज्यसभा चुनाव (Rajya Sabha elections) होने जा रहे हैं। 18 जून को मतदान (Voting June 18) होगा और संभावनाएं हैं कि एक ही दिन में नतीजे भी घोषित कर दिए जाएं। खास बात है कि यह चुनाव केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन NDA के लिए बेहद अहम होने जा रहा है। आंकड़े बता रहे हैं कि उच्च सदन में एनडीए दो तिहाई के आंकड़े से महज 15 सांसद दूर है। अब सवाल है कि गठबंधन का सबसा बड़ा सदस्य भारतीय जनता पार्टी कितनी सीटें जीत सकती है।


    समझें राज्यसभा का गणित

    245 सदस्यों वाले राज्यसभा में एनडीए के पास कुल 148 सांसद हैं। इनमें से सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के पास 113 सांसद हैं। अब इस गठबंधन को दो तिहाई का जादुई आंकड़ा छूने के लिए 15 और सांसदों की जरूरत है। खास बात है कि कोई भी संविधान संशोधन बिल पार कराने के लिए सरकार को दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। हालांकि, कहा जा रहा है कि इस चुनाव में एनडीए का इस आंकड़े तक पहुंचना तय नहीं है, लेकिन भाजपा कई राज्यों में बढ़त बना सकती है।


    कहां कितनी सीटें हो रही हैं खाली

    आंध्र प्रदेश और गुजरात में 4-4 सीटों पर चुनाव होने हैं। जबकि, मध्य प्रदेश और राजस्थान में प्रत्येक में 3 सीटों पर चुनाव हैं। इसके अलावा मणिपुर, मेघालाय में 1-1, झारखंड में 2, अरुणाचल प्रदेश में 1, कर्नाटक में 4 और मिजोरम की 1 सीट पर चुनाव होगा। साथ ही 2 राज्यसभा सीट पर उपचुनाव के लिए भी वोट डाले जाएंगे।


    कर्नाटक

    कर्नाटक में एनडीए के खाते में 1 सीट आना तय है। जबकि, कांग्रेस 2 सीटें अपने नाम कर सकती है। कहा जा रहा है कि चौथी सीट इस बात पर निर्भर करेगा कि विधायक किस ओर अपना वोट डाल रहे हैं।


    आंध्र प्रदेश

    175 विधायकों वाले आंध्र प्रदेश में टीडीपी के पास 135 और जन सेना पार्टी के पास 21 विधायक हैं। जबकि, भाजपा के पास 8 और YSRCP के 11 विधायक हैं। इस लिहाज से 164 सीटों वाली एनडीए यहां चारों राज्यसभा सीट जीत सकती है।


    गुजरात

    गुजरात की 182 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा के पास 161 विधायकों का भारी बहुमत है। इस मजबूत आंकड़े के दम पर पार्टी को 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव में सभी चारों सीटों पर अपनी आसान और पक्की जीत का पूरा भरोसा है।


    राजस्थान

    राजस्थान विधानसभा में सदस्यों की संख्या 200 है। यहां भाजपा के पास 115 और कांग्रेस के 69 विधायक हैं। इस लिहाज से माना जा रहा है कि भाजपा 2 और कांग्रेस 1 सीट जीत सकती है।


    मध्य प्रदेश

    मध्य प्रदेश के नतीजे चौंकाने वाले साबित हो सकते हैं। 163 विधायकों वाली भाजपा यहां 2 सीटें अपने नाम कर सकती है। वहीं, एक सीट कांग्रेस के खाते में जा सकती है।


    झारखंड

    INDIA गठबंधन के शासन वाले राज्य में दोनों ही सीटें सत्तारूढ़ गठबंधन को मिल सकती हैं। हालांकि, कहा जा रहा है कि रणनीति के तहत एनडीए एक सीट हासिल कर सकता है। यहां कुल 81 विधायक हैं, जिनमें 56 INDIA गठबंधन और 24 एनडीए के हैं।

  • राज्यसभा चुनाव कार्यक्रम घोषित, बीरेन सिंह, रवनीत बिट्टू और नरोत्तम मिश्रा समेत कई नेताओं पर सबकी नजर

    राज्यसभा चुनाव कार्यक्रम घोषित, बीरेन सिंह, रवनीत बिट्टू और नरोत्तम मिश्रा समेत कई नेताओं पर सबकी नजर

    नई दिल्ली । देश में राज्यसभा की 24 रिक्त सीटों पर चुनाव की घोषणा के बाद राजनीतिक माहौल तेजी से गर्म हो गया है। चुनाव आयोग की ओर से जारी कार्यक्रम के अनुसार यह मतदान 10 राज्यों में कराया जाएगा, जिससे संसद के उच्च सदन में प्रतिनिधित्व और शक्ति संतुलन पर महत्वपूर्ण असर पड़ने की संभावना है। विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने-अपने स्तर पर रणनीति बनानी शुरू कर दी है और संभावित उम्मीदवारों के नामों पर मंथन तेज हो गया है। इस चुनाव को आगामी संसदीय समीकरणों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे राज्यसभा में दलों की स्थिति में बदलाव संभव है।

    सूत्रों और राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार कई राज्यों में वरिष्ठ और प्रभावशाली नेताओं के नाम संभावित उम्मीदवारों की सूची में शामिल किए जा रहे हैं। इनमें पूर्वोत्तर के प्रमुख नेता बीरेन सिंह, पंजाब के नेता रवनीत बिट्टू और मध्य प्रदेश के वरिष्ठ नेता नरोत्तम मिश्रा जैसे नाम प्रमुखता से चर्चा में हैं। हालांकि अंतिम निर्णय संबंधित दलों के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा राज्यवार राजनीतिक परिस्थितियों और विधायकों की संख्या के आधार पर लिया जाएगा। उम्मीदवार चयन में क्षेत्रीय संतुलन, जातीय समीकरण और संगठनात्मक अनुभव जैसे कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

    चुनाव कार्यक्रम के अनुसार नामांकन प्रक्रिया से लेकर मतदान और मतगणना तक की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से पूरी की जाएगी। कुछ राज्यों में जहां एक दल का स्पष्ट बहुमत है, वहां निर्विरोध निर्वाचन की संभावना जताई जा रही है, जबकि कुछ अन्य राज्यों में कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है। विशेष रूप से उन राज्यों में जहां विधानसभा में बहुदलीय संतुलन है, वहां क्रॉस वोटिंग और रणनीतिक मतदान के कारण परिणाम अनिश्चित रह सकते हैं।

    राजनीतिक दलों ने इस चुनाव को गंभीरता से लेते हुए अपने विधायकों के साथ लगातार बैठकें शुरू कर दी हैं। विधायकों की संख्या और वोटिंग गणित को ध्यान में रखते हुए हर पार्टी अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटी है। इस प्रक्रिया में पार्टी अनुशासन और व्हिप जारी करने जैसे कदम भी अहम साबित हो सकते हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव केवल रिक्त सीटों को भरने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे राज्यसभा में सत्ता संतुलन पर भी असर पड़ेगा। आने वाले समय में विधेयकों की मंजूरी और संसदीय बहसों में दलों की भूमिका इसी परिणाम से प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि सभी प्रमुख दल इस चुनाव को लेकर बेहद सतर्क और सक्रिय नजर आ रहे हैं।

    इसके अलावा कई राज्यों में स्थानीय राजनीतिक समीकरण भी इस चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं। क्षेत्रीय दलों की भूमिका उन राज्यों में खास तौर पर महत्वपूर्ण होगी जहां किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं है। ऐसे में छोटे दल और निर्दलीय विधायक भी चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

    कुल मिलाकर राज्यसभा की 24 सीटों के लिए घोषित यह चुनाव देश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। उम्मीदवारों की अंतिम सूची सामने आने के बाद राजनीतिक हलचल और भी तेज होने की संभावना है और सभी की नजर अब मतदान प्रक्रिया और उसके परिणामों पर टिकी हुई है।

  • राज्यसभा सांसद हरभजन सिंह ने गृह मंत्री अमित शाह से की भेंट, पंजाब से जुड़े मुद्दों पर केंद्र से सहयोग का आग्रह

    राज्यसभा सांसद हरभजन सिंह ने गृह मंत्री अमित शाह से की भेंट, पंजाब से जुड़े मुद्दों पर केंद्र से सहयोग का आग्रह

    नई दिल्ली । केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से राज्यसभा सांसद और पूर्व भारतीय क्रिकेटर हरभजन सिंह ने शनिवार को नई दिल्ली में मुलाकात की। इस दौरान दोनों के बीच पंजाब से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई। मुलाकात को राज्य के विकास, जनकल्याण और कानून-व्यवस्था की स्थिति को मजबूत करने के संदर्भ में अहम माना जा रहा है। हरभजन सिंह ने इस मुलाकात की जानकारी स्वयं साझा करते हुए बताया कि उन्होंने केंद्र सरकार से पंजाब के हितों की रक्षा और विकास कार्यों को गति देने के लिए सहयोग की अपील की है। यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब हरभजन सिंह के राजनीतिक रुख को लेकर भी चर्चा बनी हुई है और उनकी यह मुलाकात राजनीतिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    हरभजन सिंह भारतीय क्रिकेट टीम के एक सफल और अनुभवी खिलाड़ी रहे हैं, जिन्होंने अपनी गेंदबाजी से देश को कई महत्वपूर्ण जीत दिलाने में योगदान दिया। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा और राज्यसभा सांसद के रूप में पंजाब के मुद्दों को उठाने का कार्य किया। हाल के वर्षों में वे पंजाब से जुड़े विभिन्न सामाजिक और प्रशासनिक विषयों पर सक्रिय रूप से अपनी राय रखते रहे हैं। अमित शाह से उनकी यह मुलाकात ऐसे समय में सामने आई है जब राज्य में सुरक्षा व्यवस्था, विकास योजनाओं और जनकल्याणकारी कार्यक्रमों को लेकर केंद्र और राज्य के बीच समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है।

    सूत्रों के अनुसार, बैठक के दौरान पंजाब की वर्तमान परिस्थितियों, कानून-व्यवस्था की चुनौतियों और विकास परियोजनाओं को लेकर विस्तार से विचार-विमर्श हुआ। हरभजन सिंह ने राज्य के हितों को प्राथमिकता देने की बात रखते हुए केंद्र से सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पंजाब के विकास के लिए मजबूत समन्वय और प्रभावी नीतियों की आवश्यकता है, जिससे आम जनता को सीधे लाभ मिल सके। वहीं, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी विभिन्न मुद्दों को ध्यान से सुना और आवश्यक सहयोग का आश्वासन दिया।

    यह मुलाकात इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि राजनीतिक हलकों में हरभजन सिंह के हालिया रुख को लेकर विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। पंजाब में कुछ राजनीतिक समूहों द्वारा इस मुलाकात को लेकर अलग-अलग राय व्यक्त की जा रही है, जबकि समर्थक इसे विकास के दृष्टिकोण से एक सकारात्मक कदम मान रहे हैं। राज्यसभा सांसद के रूप में हरभजन सिंह लगातार पंजाब से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय मंच पर उठाने का प्रयास कर रहे हैं और यह मुलाकात भी उसी कड़ी का हिस्सा मानी जा रही है।

    कुल मिलाकर यह बैठक पंजाब की राजनीति और विकास के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखी जा रही है, जिसमें केंद्र और राज्य के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने पर जोर दिया गया है।

  • राज्यसभा का समीकरण बदला, राघव चड्ढा के फैसले से NDA बहुमत के और करीब पहुंचा..

    राज्यसभा का समीकरण बदला, राघव चड्ढा के फैसले से NDA बहुमत के और करीब पहुंचा..

    नई दिल्ली। राज्यसभा की राजनीति में अचानक बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जिसने पूरे सत्ता समीकरण को प्रभावित कर दिया है। सदन में हुए हालिया घटनाक्रम के बाद नंबर गेम पूरी तरह बदल गया है और इसका सीधा असर राजनीतिक ताकतों के संतुलन पर पड़ा है।

    इस पूरे घटनाक्रम में Raghav Chadha का नाम प्रमुख रूप से सामने आया है। उनके राजनीतिक कदम और उससे जुड़े बदलावों के बाद राज्यसभा में सत्ता पक्ष की स्थिति पहले से ज्यादा मजबूत हो गई है। माना जा रहा है कि इससे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को सीधा फायदा मिला है।

    सूत्रों के अनुसार, कुछ सांसदों के दलगत बदलाव और विलय की प्रक्रिया के बाद सदन में सीटों का गणित बदल गया है। इस बदलाव के बाद सत्ता पक्ष की संख्या में बढ़ोतरी हुई है, जबकि विपक्ष की स्थिति कमजोर हुई है।

    राज्यसभा में यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यहां बहुमत का सीधा असर कानून निर्माण और बड़े विधायी फैसलों पर पड़ता है। अब बदले हुए समीकरण के बाद सत्ता पक्ष बहुमत के आंकड़े के और करीब पहुंच गया है।

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस तरह के बदलाव आने वाले समय में संसद की कार्यवाही और महत्वपूर्ण बिलों पर असर डाल सकते हैं। खासकर उन मुद्दों पर जहां दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है, वहां अब स्थिति पहले से ज्यादा अनुकूल दिखाई दे रही है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है, जहां इसे सत्ता पक्ष की बड़ी रणनीतिक जीत के तौर पर देखा जा रहा है, वहीं विपक्ष इसे अपने लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति मान रहा है।

  • हरभजन सिंह की सुरक्षा वापसी से बढ़ा विवाद, जालंधर आवास पर बदली व्यवस्था..

    हरभजन सिंह की सुरक्षा वापसी से बढ़ा विवाद, जालंधर आवास पर बदली व्यवस्था..


    नई दिल्ली।
    पंजाब में एक अहम प्रशासनिक निर्णय सामने आया है, जिसमें राज्यसभा सांसद और पूर्व भारतीय क्रिकेट टीम के दिग्गज खिलाड़ी हरभजन सिंह की सुरक्षा व्यवस्था को वापस ले लिया गया है। इस फैसले के बाद जालंधर स्थित उनके आवास के बाहर तैनात सुरक्षा कर्मियों को हटा दिया गया, जिससे राजनीतिक और सार्वजनिक स्तर पर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।

    लंबे समय से उन्हें राज्य की ओर से उच्च स्तरीय सुरक्षा प्रदान की जा रही थी, जिसे अब अचानक समाप्त कर दिया गया है।
    जानकारी के अनुसार, यह बदलाव राज्य सरकार के निर्णय के तहत किया गया है। सुरक्षा हटने के बाद उनके आवास के बाहर का माहौल पूरी तरह बदल गया है और पहले मौजूद सुरक्षा व्यवस्था अब वहां दिखाई नहीं दे रही है। इस घटनाक्रम की पुष्टि उनके निजी सहायक द्वारा भी की गई है, जिसमें बताया गया कि सरकारी निर्देशों के बाद सुरक्षा कर्मियों को वापस बुला लिया गया है।

    इस फैसले के बाद राजनीतिक हलचल भी तेज हो गई है। हाल के दिनों में राज्य की राजनीति में कुछ बदलाव और आरोप-प्रत्यारोप के माहौल के बीच यह निर्णय और अधिक चर्चा का विषय बन गया है। विभिन्न राजनीतिक हलकों में इसे अलग-अलग नजरिए से देखा जा रहा है और इस पर लगातार प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

    हरभजन सिंह लंबे समय से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं और राज्यसभा सांसद के रूप में भी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा में बदलाव को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक माना जा रहा है। हालांकि इस फैसले के पीछे के विस्तृत कारणों को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

    इसी बीच राज्य में पहले से चल रही राजनीतिक बयानबाजी और विरोध प्रदर्शनों ने माहौल को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। कुछ जगहों पर हुए विरोध प्रदर्शनों और आरोपों के बाद यह मामला और भी चर्चा में आ गया है, जिससे स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है।

    फिलहाल इस पूरे मामले पर हरभजन सिंह की ओर से कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है। उनकी चुप्पी के कारण भी इस निर्णय को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। आने वाले समय में यह मामला किस दिशा में जाएगा, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

  • राज्यसभा में NDA मजबूत, AAP सांसदों के दल-बदल से दो-तिहाई बहुमत के करीब पहुंचा गठबंधन

    राज्यसभा में NDA मजबूत, AAP सांसदों के दल-बदल से दो-तिहाई बहुमत के करीब पहुंचा गठबंधन


    नई दिल्ली। देश की राजनीति में एक अहम बदलाव देखने को मिला है, जहां आम आदमी पार्टी के सात सांसदों के दल बदलकर भाजपा में शामिल होने के बाद राज्यसभा में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की स्थिति काफी मजबूत हो गई है। इस घटनाक्रम ने उच्च सदन में राजनीतिक संतुलन को प्रभावित किया है और सत्ता पक्ष को दो-तिहाई बहुमत के और करीब पहुंचा दिया है।

    वर्तमान स्थिति के अनुसार राज्यसभा में कुल 244 सदस्य हैं और किसी भी पार्टी या गठबंधन को दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के लिए 163 सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है। हालिया बदलावों के बाद एनडीए के समर्थन में सांसदों की संख्या 145 तक पहुंच गई है। हालांकि यह आंकड़ा अभी भी आवश्यक बहुमत से 18 सीट दूर है, लेकिन इसे सत्ता पक्ष के लिए एक महत्वपूर्ण बढ़त माना जा रहा है।

    भाजपा की स्थिति भी इस घटनाक्रम के बाद मजबूत हुई है। पहले जहां पार्टी के पास 106 सांसद थे, वहीं अब यह संख्या बढ़कर 113 हो गई है। इसके अलावा कुछ मनोनीत सदस्यों और निर्दलीय सांसदों के समर्थन से यह आंकड़ा और बढ़कर करीब 122 तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है, जो सदन के कुल सदस्यों का लगभग आधा हिस्सा है।

    राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही रुझान जारी रहता है, तो आने वाले समय में सरकार को महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में आसानी हो सकती है। विशेष रूप से वे संविधान संशोधन विधेयक, जिनके लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, उन पर सत्ता पक्ष की स्थिति पहले से अधिक मजबूत दिखाई दे रही है।

    हाल ही में महिला आरक्षण से जुड़े एक महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में आवश्यक बहुमत न मिलने के कारण झटका लगा था। उस समय सत्ता पक्ष दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका था, जिससे यह विधेयक पारित नहीं हो पाया। अब राज्यसभा में बदलते समीकरणों को उसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

    सूत्रों के अनुसार, हाल ही में शामिल हुए सांसदों का विलय राज्यसभा में उनकी मूल पार्टी के संसदीय दल के दो-तिहाई से अधिक हिस्से का प्रतिनिधित्व होने के कारण मान्य किया जा सकता है। यदि ऐसा होता है, तो यह सत्ता पक्ष की स्थिति को और मजबूत करेगा और सदन में उसकी पकड़ और अधिक प्रभावी हो जाएगी।

  • महिला आरक्षण पर राहुल गांधी ने सरकार को घेरा, कहा- यह असली वुमन बिल नहीं, दादी इंदिरा का किया जिक्र

    महिला आरक्षण पर राहुल गांधी ने सरकार को घेरा, कहा- यह असली वुमन बिल नहीं, दादी इंदिरा का किया जिक्र

    नई दिल्ली। संसद के विशेष सत्र के दूसरे दिन लोकसभा में बोलते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने महिला आरक्षण मुद्दे पर अपनी बात रखते हुए एक निजी अनुभव साझा किया और सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने अपनी दादी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को याद करते हुए कहा कि उन्होंने उन्हें बचपन में डर का सामना करना सिखाया था।

    सुनाया बचपन का किस्सा

    राहुल गांधी ने बताया कि बचपन में एक बार उनकी दादी उन्हें घर से बाहर ले गईं और कुछ समय के लिए अकेला छोड़ दिया। वहां मौजूद कुत्तों और लोगों के कारण वे डर गए थे। जब इंदिरा गांधी वापस आईं और उन्होंने अपनी परेशानी बताई तो उन्होंने समझाया कि डर असल में उनके मन में था। राहुल ने कहा कि इस अनुभव ने उन्हें जिंदगी में डर से लड़ना सिखाया।

    महिलाओं से हर कोई सीखता है

    अपने संबोधन में राहुल गांधी ने कहा कि हर व्यक्ति अपने जीवन में महिलाओं से सीखता है चाहे वह मां हो बहन हो या अन्य कोई भूमिका। उन्होंने यह भी कहा कि सच्चाई कड़वी होती है लेकिन उसका सामना करना जरूरी है। हालांकि उन्होंने मौजूदा महिला आरक्षण विधेयक पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह वास्तव में महिलाओं के हितों का बिल नहीं है।

    विधेयक की मंशा पर उठाए सवाल

    राहुल गांधी ने कहा कि 2023 में पारित महिला आरक्षण बिल को लेकर सत्ता पक्ष के सहयोगियों ने संकेत दिया था कि इसे 10 साल बाद लागू किया जा सकता है। उनके अनुसार यह महिलाओं को तत्काल लाभ देने वाला कदम नहीं है।

    चुनावी नक्शा बदलने की कोशिश

    कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि देश के इलेक्टोरल मैप को बदलने की कोशिश की जा रही है जो महिला आरक्षण के मूल मुद्दे से अलग है। उन्होंने कहा कि यह एक बड़ा राजनीतिक सवाल है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    जाति जनगणना का भी उठाया मुद्दा

    लोकसभा में अपने भाषण के दौरान राहुल गांधी ने जाति जनगणना को लेकर भी सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा। उन्होंने कहा कि गृह मंत्री ने इस पर बात तो की लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि इसके आंकड़ों का उपयोग आरक्षण तय करने में होगा या नहीं। उन्होंने कहा कि अगर सरकार वास्तविक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती है तो कांग्रेस इसका पूरा समर्थन करेगी।

    सरकार पर डर की राजनीति का आरोप

    राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार डर की राजनीति कर रही है और देश की राजनीतिक संरचना को बदलने की कोशिश हो रही है। उन्होंने कहा कि छोटे राज्यों को उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी कम होने का संकेत दिया जा रहा है जिसे विपक्ष स्वीकार नहीं करेगा। साथ ही उन्होंने कहा कि दलित और ओबीसी समुदायों को पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है। राहुल गांधी ने अंत में कहा कि उनकी पार्टी देश के लोगों के प्रतिनिधित्व से कोई समझौता नहीं करेगी। उन्होंने भरोसा दिलाया कि किसी भी वर्ग के अधिकारों पर आंच नहीं आने दी जाएगी और हर हमले का मजबूती से विरोध किया जाएगा।