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  • आश्रमों की सुरक्षा को लेकर साध्वी हर्षानंद ने उठाए सवाल, बोलीं घर पर रहकर पूजा करो, क्यों आश्रम की राजनीति में पड़ना

    आश्रमों की सुरक्षा को लेकर साध्वी हर्षानंद ने उठाए सवाल, बोलीं घर पर रहकर पूजा करो, क्यों आश्रम की राजनीति में पड़ना


    नई दिल्ली। महिलाओं से अकेले बागेश्वर धाम नहीं आने की अपील के बाद अब साध्वी हर्षानंद गिरि का बयान सामने आया है। उन्होंने आश्रमों में महिलाओं और परिवारों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए हैं। साध्वी ने अपने बयान में किसी विशेष संत या आश्रम का नाम नहीं लिया है लेकिन उनकी टिप्पणी को हाल ही में धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की ओर से श्रद्धालुओं को दी गई सुरक्षा संबंधी सलाह से जोड़कर देखा जा रहा है।

    साध्वी हर्षानंद ने कहा कि यदि किसी आश्रम में रहने वाले सेवादारों पर ही भरोसा नहीं किया जा सकता तो ऐसे स्थान पर अपने बच्चों और परिवार को भेजने को लेकर लोगों को खुद सावधानी बरतनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हर आश्रम को गलत नहीं कहा जा सकता लेकिन जब किसी जगह की सुरक्षा को लेकर मन में दुविधा हो तो ऐसी स्थिति में वहां जाने से बचना भी एक विकल्प हो सकता है।

    उन्होंने लोगों को सलाह देते हुए कहा कि यदि उन्हें सुरक्षित रहना है तो अपने घर पर रहकर मंत्र जाप और पूजा पाठ कर सकते हैं। उनके मुताबिक धार्मिक आस्था के लिए किसी आश्रम में लंबे समय तक रुकना जरूरी नहीं है। लोग मंदिर में दर्शन करें और इसके बाद अपने घर लौट सकते हैं।

    साध्वी ने आश्रमों की व्यवस्था और वहां होने वाली गतिविधियों को लेकर भी अपनी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि लोगों को आश्रम की राजनीति और विवादों में पड़ने के बजाय अपनी धार्मिक साधना पर ध्यान देना चाहिए। उनका कहना था कि जिन लोगों ने आश्रम बनाए हैं अगर वे ही वहां की पूरी व्यवस्था को संभालने में सक्षम नहीं हैं तो आम श्रद्धालुओं को अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है।

    यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने 3 अक्टूबर की रात श्रद्धालुओं खासकर महिलाओं को सतर्क रहने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि महिलाएं अकेली धाम पर न आएं। अगर किसी महिला को अकेले आना पड़े तो उसे किसी अनजान व्यक्ति या धाम के सेवादार पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए।

    धीरेंद्र शास्त्री ने श्रद्धालुओं से यह भी कहा था कि मंदिर परिसर और निर्धारित हॉल के अलावा दूसरी जगहों पर जाने से बचें। उन्होंने बताया था कि बागेश्वर धाम के करीब पांच किलोमीटर के पूरे क्षेत्र की सुरक्षा की जिम्मेदारी उनकी नहीं है। उनके मुताबिक वह मंदिर और हॉल की सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी ले सकते हैं लेकिन पूरे क्षेत्र को लेकर ऐसी गारंटी नहीं दी जा सकती।

    उन्होंने श्रद्धालुओं से धाम में लंबे समय तक रुकने से बचने और अपने सामान तथा सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद लेने की अपील भी की थी। शास्त्री ने धार्मिक स्थलों पर सामने आने वाली कुछ घटनाओं का संदर्भ देते हुए कहा था कि वह नहीं चाहते कि किसी अप्रिय घटना के कारण बागेश्वर धाम या श्री बालाजी महाराज की बदनामी हो।

    धीरेंद्र शास्त्री की अपील और साध्वी हर्षानंद की प्रतिक्रिया के बीच मुख्य मुद्दा धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की सुरक्षा को लेकर सामने आया है। दोनों बयानों में श्रद्धालुओं को सावधानी बरतने की बात कही गई है हालांकि साध्वी हर्षानंद ने आश्रमों में जाने को लेकर व्यापक सवाल उठाए हैं।

    ऐसे मामलों में किसी भी घटना या आरोप को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकाला जा सकता है। फिलहाल दोनों संतों की ओर से सामने आए बयानों ने धार्मिक स्थलों पर महिलाओं और परिवारों की सुरक्षा को लेकर एक नई चर्चा जरूर शुरू कर दी है। श्रद्धालुओं के लिए भीड़भाड़ वाले धार्मिक स्थलों पर सतर्क रहना और किसी अनजान व्यक्ति पर तुरंत भरोसा नहीं करना महत्वपूर्ण सावधानी मानी जा सकती है।

  • पिछोर में फिर रातोंरात प्रतिमा लगाने का मामला फुटेरा में राधा-कृष्ण की मूर्ति देख सुबह उमड़े लोग प्रशासन के सामने बड़ा सवाल

    पिछोर में फिर रातोंरात प्रतिमा लगाने का मामला फुटेरा में राधा-कृष्ण की मूर्ति देख सुबह उमड़े लोग प्रशासन के सामने बड़ा सवाल


    शिवपुरी। शिवपुरी जिले के पिछोर इलाके में सार्वजनिक स्थानों पर रातोंरात प्रतिमाएं स्थापित किए जाने का सिलसिला एक बार फिर चर्चा में है। इस बार मामला धार्मिक प्रतिमा से जुड़ा है। पिछोर क्षेत्र के फुटेरा वार्ड नंबर 15 में रविवार रात अज्ञात लोगों द्वारा राधा-कृष्ण की प्रतिमा स्थापित किए जाने की जानकारी सामने आई है। सोमवार सुबह जैसे ही स्थानीय लोगों की नजर प्रतिमा पर पड़ी तो यह खबर तेजी से पूरे इलाके में फैल गई। कुछ ही समय में बड़ी संख्या में लोग मौके पर पहुंचने लगे और प्रतिमा के दर्शन के साथ पूजा-अर्चना शुरू कर दी। स्थानीय स्तर पर इस घटना को लेकर धार्मिक उत्साह का माहौल दिखाई दिया है।

    बताया जा रहा है कि फुटेरा वार्ड नंबर 15 में रविवार रात किसी अज्ञात व्यक्ति या समूह ने श्रीराधा-कृष्ण की प्रतिमा रखी। रात में प्रतिमा स्थापित किए जाने के बाद सुबह जब लोगों ने इसे देखा तो आसपास के लोगों को इसकी जानकारी दी गई। देखते ही देखते मौके पर लोगों की भीड़ जुटने लगी। श्रद्धालुओं ने प्रतिमा के सामने पूजा की और दर्शन किए। अचानक सार्वजनिक स्थान पर प्रतिमा नजर आने से यह मामला स्थानीय लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया।

    इस पूरे घटनाक्रम की खास बात यह है कि प्रतिमा किसने स्थापित की है इसकी जानकारी अभी सामने नहीं आई है। साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं है कि प्रतिमा स्थापित करने से पहले संबंधित प्रशासन से किसी तरह की अनुमति ली गई थी या नहीं। स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार फिलहाल इस संबंध में स्थिति साफ नहीं है। ऐसे में अब लोगों की नजर पुलिस और प्रशासन की आगे की कार्रवाई पर है।

    पिछोर विधानसभा क्षेत्र में सार्वजनिक स्थानों पर रातोंरात प्रतिमाएं स्थापित किए जाने के मामले पहले भी सामने आते रहे हैं। इससे पहले अलग-अलग स्थानों पर महापुरुषों सहित अन्य लोगों की प्रतिमाएं लगाए जाने को लेकर विवाद की स्थिति बन चुकी है। कुछ मामलों में विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं और कई जगह चक्काजाम जैसी स्थिति तक सामने आई है। पुलिस ने पूर्व के कुछ मामलों में एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई भी की थी। इसके बावजूद इस तरह रातोंरात प्रतिमाएं स्थापित किए जाने की घटनाएं पूरी तरह थमती नजर नहीं आ रही हैं।

    फुटेरा में राधा-कृष्ण की प्रतिमा स्थापित होने के बाद फिलहाल स्थानीय लोगों में धार्मिक उत्साह नजर आ रहा है। सुबह से ही लोग प्रतिमा के दर्शन के लिए पहुंचते रहे और पूजा-अर्चना करते दिखाई दिए। राधा-कृष्ण की प्रतिमा सामने आने के बाद आसपास के लोगों के बीच इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं। हालांकि प्रशासनिक स्तर पर प्रतिमा की स्थापना से जुड़े तथ्य अभी स्पष्ट होना बाकी हैं।

    यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सार्वजनिक स्थान पर किसी प्रतिमा की स्थापना के बाद उसके आसपास धार्मिक गतिविधियां शुरू हो सकती हैं। ऐसे में प्रशासन के लिए यह जानना जरूरी होगा कि प्रतिमा कब किसने और किन परिस्थितियों में स्थापित की। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि संबंधित स्थान पर प्रतिमा लगाने के लिए कोई अनुमति ली गई थी या नहीं। फिलहाल पुलिस और प्रशासन की ओर से इस मामले में आगे क्या कदम उठाया जाता है इस पर सभी की नजर बनी हुई है।

    फुटेरा में सुबह अचानक राधा-कृष्ण की प्रतिमा मिलने से जहां श्रद्धालुओं में उत्साह दिखाई दिया वहीं रातोंरात प्रतिमा स्थापित किए जाने की प्रक्रिया को लेकर सवाल भी खड़े हुए हैं। अब पूरे मामले की तस्वीर प्रशासनिक जांच और पुलिस की कार्रवाई के बाद ही साफ हो सकेगी।

  • उज्जैन का काल भैरव मंदिर क्यों है दुनिया भर में प्रसिद्ध, जानिए शराब के भोग और अनोखी मान्यता का रहस्य

    उज्जैन का काल भैरव मंदिर क्यों है दुनिया भर में प्रसिद्ध, जानिए शराब के भोग और अनोखी मान्यता का रहस्य


    नई दिल्ली। धार्मिक नगरी उज्जैन अपने विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर के साथ साथ अनेक प्राचीन और रहस्यमयी मंदिरों के लिए भी जानी जाती है। इन्हीं में से एक है बाबा काल भैरव का प्राचीन मंदिर जहां सदियों से चली आ रही एक ऐसी परंपरा आज भी निभाई जाती है जो पहली बार सुनने वाले को हैरान कर देती है। यहां भगवान को पेड़े लड्डू या मिठाई का नहीं बल्कि मदिरा का भोग लगाया जाता है। श्रद्धालु फूल माला और प्रसाद के साथ शराब की बोतल लेकर मंदिर पहुंचते हैं और इसे बाबा काल भैरव को श्रद्धा भाव से अर्पित करते हैं। यही अनूठी परंपरा इस मंदिर को देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में विशेष पहचान दिलाती है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार काल भैरव भगवान शिव के उग्र और रक्षक स्वरूप माने जाते हैं। तंत्र साधना और शैव परंपरा में उनका विशेष महत्व है। तांत्रिक मान्यता के अनुसार काल भैरव की पूजा में मदिरा का भोग स्वीकार्य माना गया है। इसी कारण इस मंदिर में वर्ष भर श्रद्धालु बाबा को मदिरा अर्पित करते हैं। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि यह परंपरा कई सौ वर्षों से लगातार चली आ रही है और आज भी उसी श्रद्धा और विधि विधान के साथ निभाई जाती है।

    इस मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण वह रहस्यमयी दृश्य है जिसे देखने के लिए हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन यहां पहुंचते हैं। जब कोई भक्त मदिरा अर्पित करता है तो मंदिर के पुजारी उसे एक छोटी धातु की थाली या पात्र में लेकर बाबा काल भैरव की प्रतिमा के मुख से लगाते हैं। कुछ ही क्षणों में पूरा पात्र खाली हो जाता है और ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रतिमा स्वयं भोग ग्रहण कर रही हो। प्रतिमा में कोई स्पष्ट छेद या पाइप दिखाई नहीं देता फिर भी मदिरा गायब हो जाती है। वर्षों से यह दृश्य लोगों के लिए कौतूहल और आस्था का विषय बना हुआ है। इस रहस्य को लेकर अनेक तरह की चर्चाएं होती रही हैं लेकिन श्रद्धालुओं के लिए यह बाबा काल भैरव की दिव्य कृपा और चमत्कार का प्रतीक है।

    मंदिर के बाहर का वातावरण भी अन्य धार्मिक स्थलों से अलग दिखाई देता है। जहां अधिकांश मंदिरों के बाहर फूल माला नारियल और मिठाई की दुकानें होती हैं वहीं यहां पूजा सामग्री के साथ मदिरा की अधिकृत बोतलें भी उपलब्ध रहती हैं। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार भोग के लिए बोतल खरीदते हैं और मंदिर में अर्पित करते हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार भोग अर्पित करने के बाद शेष मदिरा को प्रसाद स्वरूप श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है जिसे लोग आस्था के साथ ग्रहण करते हैं।

    काल भैरव को उज्जैन नगरी का कोतवाल या रक्षक भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि महाकालेश्वर के दर्शन के साथ काल भैरव के दर्शन किए बिना उज्जैन की धार्मिक यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती। बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहले बाबा महाकाल के दर्शन करते हैं और फिर काल भैरव मंदिर पहुंचकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। विशेष अवसरों पर यहां दूरदराज के राज्यों और विदेशों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं।

    काल भैरव मंदिर केवल अपनी अनोखी परंपरा के कारण ही नहीं बल्कि आस्था और आध्यात्मिक विश्वास के केंद्र के रूप में भी प्रसिद्ध है। यहां आने वाले भक्तों के लिए मदिरा का भोग किसी सामान्य वस्तु का अर्पण नहीं बल्कि धार्मिक परंपरा और श्रद्धा का प्रतीक है। यही वजह है कि उज्जैन का यह प्राचीन मंदिर आज भी देश के सबसे अनूठे और चर्चित धार्मिक स्थलों में अपनी विशेष पहचान बनाए हुए है।

  • चातुर्मास कब से शुरू होगा? जानिए तिथि, धार्मिक महत्व, पूजा-विधि और पालन के प्रमुख नियम

    चातुर्मास कब से शुरू होगा? जानिए तिथि, धार्मिक महत्व, पूजा-विधि और पालन के प्रमुख नियम


    नई दिल्ली। सनातन धर्म में चातुर्मास को भक्ति, तपस्या और आत्मसंयम का विशेष काल माना जाता है। यह चार महीने का पावन समय भगवान विष्णु को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी पर जागते हैं। इसी अवधि को चातुर्मास कहा जाता है।

    द्रिक पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में चातुर्मास की शुरुआत 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी से होगी और इसका समापन 20 नवंबर को देवउठनी एकादशी के दिन होगा। इस दौरान श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक मास आएंगे।

    क्या है चातुर्मास का धार्मिक महत्व?

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसी कारण इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, उपनयन संस्कार और अन्य मांगलिक कार्यों को स्थगित रखा जाता है। देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागने के साथ ही शुभ और मांगलिक कार्यों की शुरुआत फिर से हो जाती है।

    पौराणिक कथाओं में चातुर्मास का संबंध राजा बलि और भगवान विष्णु के वामन अवतार से बताया गया है। कथा के अनुसार, भगवान वामन ने राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी थी। दो पग में उन्होंने पृथ्वी और आकाश को नाप लिया, जबकि तीसरे पग के लिए राजा बलि ने अपना सिर अर्पित कर दिया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया और चार माह तक उनके द्वार पर रहने का संकल्प लिया। इसी परंपरा से चातुर्मास की मान्यता जुड़ी मानी जाती है।

    चातुर्मास में क्यों नहीं होते मांगलिक कार्य?

    चातुर्मास के दौरान विवाह, यज्ञ, गृह प्रवेश, जनेऊ संस्कार सहित अन्य बड़े शुभ कार्यों को वर्जित माना जाता है। हालांकि नियमित पूजा-पाठ, सत्यनारायण कथा, रुद्राभिषेक, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों पर कोई रोक नहीं होती। बल्कि इस समय को साधना, ध्यान और आध्यात्मिक उन्नति के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

    चातुर्मास में खान-पान के नियम

    इस अवधि में सात्विक जीवनशैली अपनाने और खान-पान में संयम रखने की सलाह दी जाती है। कई श्रद्धालु गुड़, तेल, बैंगन, हरी पत्तेदार सब्जियां, अधिक मसालेदार और तामसिक भोजन का त्याग करते हैं। वैष्णव परंपरा का पालन करने वाले भक्त प्याज, लहसुन और कुछ विशेष खाद्य पदार्थों से भी दूरी बनाए रखते हैं।

    मास अनुसार परहेज के नियम इस प्रकार बताए गए हैं

    श्रावण मास: पालक और हरी पत्तेदार सब्जियों से परहेज।
    भाद्रपद मास: दही का सेवन नहीं किया जाता।
    आश्विन मास: दूध का त्याग करने की परंपरा है।
    कार्तिक मास: मांसाहार, विशेष रूप से मछली का सेवन वर्जित माना जाता है।

    चातुर्मास में कैसे करें पूजा और साधना?

    चातुर्मास का पालन घर पर रहकर भी सरलता से किया जा सकता है। इसके लिए प्रतिदिन भगवान विष्णु की आराधना, मंत्र-जाप और धार्मिक ग्रंथों का पाठ करने का विशेष महत्व बताया गया है।

    – प्रातः सूर्योदय से पहले उठकर भगवान विष्णु की पूजा करें।
    – दीप प्रज्वलित कर तुलसी दल अर्पित करें।
    – विष्णु सहस्रनाम अथवा हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करें।
    – चातुर्मास में कम से कम एकादशी व्रत अवश्य रखें।
    – किसी एक प्रिय वस्तु या आदत का त्याग कर व्यक्तिगत संकल्प लें।
    – श्रीमद्भागवत, रामायण या अन्य धार्मिक ग्रंथों का पाठ एवं श्रवण करें।
    – अन्नदान, जरूरतमंदों की सहायता और धार्मिक सेवा कार्यों में सहभागिता करें।
    धार्मिक दृष्टि से चातुर्मास केवल व्रत और नियमों का समय नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, अनुशासन और ईश्वर भक्ति को जीवन में उतारने का अवसर भी माना जाता है।

  • भस्म आरती में महाकाल का दिव्य श्रृंगार, पंचामृत से लेकर भस्म अर्पण तक पूरी हुई महापूजा

    भस्म आरती में महाकाल का दिव्य श्रृंगार, पंचामृत से लेकर भस्म अर्पण तक पूरी हुई महापूजा


    मध्य प्रदेश । विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में शुक्रवार तड़के भस्म आरती के दौरान एक बार फिर आस्था, परंपरा और वैदिक विधियों का अद्भुत संगम देखने को मिला। सुबह ब्रह्ममुहूर्त में मंदिर के कपाट खुलते ही पूरे परिसर में मंत्रोच्चार और स्वस्तिवाचन की ध्वनि गूंज उठी।

    सभा मंडप में सबसे पहले वीरभद्रजी के कान में स्वस्तिवाचन किया गया और उसके बाद घंटी बजाकर भगवान से आज्ञा ली गई। इसके बाद सभा मंडप के चांदी के पट खोले गए और गर्भगृह में पुजारियों ने विधिवत पूजा आरंभ की।

    गर्भगृह में भगवान महाकाल का श्रृंगार उतारकर सबसे पहले पंचामृत पूजन किया गया। दूध, दही, घी, शक्कर, शहद और फलों के रस से बने पंचामृत से भगवान का अभिषेक किया गया, जिसके बाद कर्पूर आरती संपन्न हुई। इसके साथ ही नंदी हॉल में नंदी महाराज का स्नान, ध्यान और पूजन भी किया गया।

    इसके बाद जलाभिषेक कर भगवान महाकाल का पुनः शुद्धिकरण किया गया। फिर उन्हें रजत चंद्र-त्रिशूल मुकुट, रुद्राक्ष की माला, शेषनाग का रजत मुकुट, सुगंधित पुष्पमालाएं और आभूषणों से दिव्य श्रृंगार किया गया। भांग, चंदन, सूखे मेवे और भस्म अर्पित कर भगवान को अलौकिक स्वरूप प्रदान किया गया।

    पूजा के अगले चरण में फल और मिष्ठान का भोग लगाया गया। इस संपूर्ण भस्म आरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और बाबा महाकाल के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से परंपरागत रूप से भगवान को भस्म अर्पित की गई।

    मान्यता है कि भस्म अर्पण के बाद भगवान महाकाल निराकार स्वरूप से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं, जिसे अत्यंत दिव्य और दुर्लभ माना जाता है।

  • 17 मई से शुरू अधिक मास: 27 साल बाद खास संयोग, जानें क्या करें और क्या बिल्कुल न करें

    17 मई से शुरू अधिक मास: 27 साल बाद खास संयोग, जानें क्या करें और क्या बिल्कुल न करें

    नई दिल्ली। हिंदू पंचांग के अनुसार 17 मई से अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) की शुरुआत हो रही है, जो 15 जून तक चलेगा। इस बार खास बात यह है कि यह ज्येष्ठ मास में लग रहा है, जिससे पूरा महीना 60 दिनों का हो गया है। धार्मिक मान्यताओं में भगवान विष्णु को समर्पित इस मास को अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है, लेकिन इसमें शुभ मांगलिक कार्यों पर रोक रहती है।

    क्या करें
    अधिक मास को भक्ति और साधना का महीना कहा गया है। इस दौरान

    भगवान विष्णु की रोज पूजा-अर्चना करें

    “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें

    विष्णु सहस्त्रनाम, गीता या श्रीमद्भागवत का पाठ करें

    जरूरतमंदों को वस्त्र, फल, जल और अन्न का दान करें

    पवित्र नदी में स्नान करें या घर पर ही शुद्ध जल से स्नान कर पुण्य अर्जित करें

    माना जाता है कि इस महीने किए गए जप-तप और दान का फल कई गुना बढ़ जाता है।

    क्या न करें 
    इस पूरे मास में कुछ कामों से बचना जरूरी माना गया है

    शादी-विवाह, गृह प्रवेश, सगाई जैसे शुभ कार्य न करें

    नया बिजनेस या बड़ा काम शुरू करने से बचें

    तामसिक भोजन (लहसुन, प्याज) से दूरी रखें

    झूठ बोलने और किसी का अपमान करने से बचें

    अधिक मास क्यों लगता है?
    हिंदू पंचांग चंद्र गणना पर आधारित है, जो सौर वर्ष से करीब 11 दिन छोटा होता है। यह अंतर हर साल बढ़ता जाता है और करीब 32 महीने बाद एक अतिरिक्त महीना जोड़ना पड़ता है इसी को अधिक मास कहा जाता है। कुल मिलाकर, अधिक मास को आत्मशुद्धि, भक्ति और दान-पुण्य का विशेष समय माना जाता है, जहां सांसारिक कार्यों की बजाय आध्यात्मिक साधना को महत्व दिया जाता है।

  • उज्जैन में महाकाल की दिव्य भस्म आरती: रजत चंद्र, भांग-चंदन से सजा बाबा का अद्भुत श्रृंगार

    उज्जैन में महाकाल की दिव्य भस्म आरती: रजत चंद्र, भांग-चंदन से सजा बाबा का अद्भुत श्रृंगार


    नई दिल्ली। उज्जैन स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में गुरुवार तड़के बाबा महाकाल की भव्य भस्म आरती संपन्न हुई, जहां श्रद्धा और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला। अलसुबह ठीक 4 बजे मंदिर के पट खुलते ही पंडे-पुजारियों ने गर्भगृह में विराजित देव प्रतिमाओं का विधिवत पूजन शुरू किया।
    पूजा की शुरुआत जलाभिषेक से हुई, जिसके बाद भगवान महाकाल का पंचामृत से अभिषेक किया गया। दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से बने पंचामृत से स्नान कराने के दौरान ‘हरि ओम’ के मंत्रोच्चार से पूरा मंदिर परिसर गूंज उठा। प्रथम घंटाल बजते ही श्रद्धालु भक्ति में लीन नजर आए।
    अभिषेक के बाद भगवान का विशेष श्रृंगार किया गया। ज्योतिर्लिंग को वस्त्र से ढंककर विधिवत भस्म अर्पित की गई। इसके पश्चात शेषनाग का रजत मुकुट, रजत मुण्डमाल, रुद्राक्ष की माला और सुगंधित फूलों से बाबा को सजाया गया। कपूर आरती के बाद जटाधारी स्वरूप में भगवान महाकाल का दिव्य रूप सामने आया।
    श्रृंगार के दौरान बाबा के मस्तक पर रजत चंद्र, भांग, चंदन और गुलाब की मालाएं अर्पित की गईं। त्रिपुण्ड धारण कर भगवान को राजसी स्वरूप दिया गया। इसके साथ ही भांग, ड्रायफ्रूट, आभूषण और पुष्पों से सुसज्जित कर उन्हें राजा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया।
    गुलाब के फूलों की सुगंध से महकते मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। जैसे ही भस्म आरती पूर्ण हुई, भक्तों ने बाबा के दिव्य दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। आरती के अंत में भगवान को फल और मिष्ठान का भोग अर्पित किया गया।
    धार्मिक मान्यता के अनुसार, भस्म अर्पित होने के बाद भगवान महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। यही कारण है कि महाकाल की भस्म आरती का विशेष महत्व माना जाता है और देशभर से श्रद्धालु इस अद्वितीय अनुष्ठान के साक्षी बनने उज्जैन पहुंचते हैं
  • अप्रैल 2026 के व्रत त्योहारों की पूरी लिस्ट हनुमान जयंती से अक्षय तृतीया तक जानें सभी तिथियां

    अप्रैल 2026 के व्रत त्योहारों की पूरी लिस्ट हनुमान जयंती से अक्षय तृतीया तक जानें सभी तिथियां


    नई दिल्ली । मार्च माह के समापन के साथ ही अब अप्रैल 2026 की शुरुआत होने जा रही है जो धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से बेहद खास माना जाता है। इस माह में जहां एक ओर चैत्र मास का समापन होगा वहीं दूसरी ओर पवित्र वैशाख माह का आरंभ भी होगा। इस पूरे महीने में कई महत्वपूर्ण व्रत और त्योहार पड़ रहे हैं जिनका विशेष धार्मिक महत्व है और जिनका पालन करने से श्रद्धालुओं को पुण्य की प्राप्ति होती है।

    अप्रैल माह की शुरुआत के साथ ही 2 अप्रैल को हनुमान जयंती और चैत्र पूर्णिमा का व्रत मनाया जाएगा। यह दिन भगवान हनुमान के जन्मोत्सव के रूप में पूरे देश में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इसके अगले दिन 3 अप्रैल से वैशाख माह का आरंभ हो जाएगा जो हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है।

    महीने के प्रारंभिक दिनों में 5 अप्रैल को विकट संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाएगा जबकि 9 अप्रैल को मासिक कृष्ण जन्माष्टमी और 10 अप्रैल को कालाष्टमी का व्रत मनाया जाएगा। इसके बाद 13 अप्रैल को वरुथिनी एकादशी का विशेष महत्व है जो भगवान विष्णु को समर्पित होती है। इसी दिन वल्लभाचार्य जयंती भी मनाई जाएगी।

    14 अप्रैल को मेष संक्रांति के साथ सूर्य के राशि परिवर्तन का पर्व मनाया जाएगा जबकि 15 अप्रैल को मासिक शिवरात्रि और प्रदोष व्रत का संयोग रहेगा। 17 अप्रैल को वैशाख अमावस्या का दिन होगा जो पितरों के तर्पण और दान पुण्य के लिए विशेष माना जाता है।

    अप्रैल माह के सबसे महत्वपूर्ण पर्वों में से एक अक्षय तृतीया 19 अप्रैल को मनाई जाएगी। इस दिन किए गए शुभ कार्य और दान का फल अक्षय माना जाता है यानी कभी समाप्त नहीं होता। इसी दिन परशुराम जयंती भी मनाई जाती है।

    इसके अलावा 21 अप्रैल को आदि शंकराचार्य जयंती और सूरदास जयंती मनाई जाएगी जबकि 23 अप्रैल को गंगा सप्तमी का पर्व श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। 24 अप्रैल को बगलामुखी जयंती और मासिक दुर्गाष्टमी का संयोग रहेगा।

    महीने के अंतिम दिनों में 25 अप्रैल को सीता नवमी व्रत रखा जाएगा और 27 अप्रैल को मोहिनी एकादशी का महत्व रहेगा। इसके बाद 28 अप्रैल को प्रदोष व्रत और 30 अप्रैल को नृसिंह जयंती मनाई जाएगी जो भगवान विष्णु के अवतार से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है।

    वैशाख माह का विशेष महत्व भी इस पूरे महीने को और अधिक पावन बनाता है। इस दौरान गंगा स्नान दान पुण्य और भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि इस माह में किए गए धार्मिक कार्यों का फल अक्षय होता है और जीवन में सुख समृद्धि आती है।

    इस प्रकार अप्रैल 2026 का महीना आस्था भक्ति और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर रहने वाला है जिसमें अनेक महत्वपूर्ण व्रत और त्योहार श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करेंगे।

  • अयोध्या में कब मनेगी राम नवमी जानिए तिथि मुहूर्त और सूर्य तिलक का समय

    अयोध्या में कब मनेगी राम नवमी जानिए तिथि मुहूर्त और सूर्य तिलक का समय


    नई दिल्ली । पूरे देश में राम नवमी को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं लेकिन इस वर्ष तिथि को लेकर लोगों के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है। विशेष रूप से अयोध्या में इस पर्व को लेकर श्रद्धालुओं में काफी उत्साह देखा जा रहा है क्योंकि यह भगवान श्रीराम की जन्मस्थली है और यहां राम नवमी का उत्सव अत्यंत भव्य रूप में मनाया जाता है।

    पंचांग के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि 26 मार्च 2026 को सुबह 11 बजकर 46 मिनट पर प्रारंभ हो रही है और 27 मार्च 2026 को सुबह 10 बजकर 7 मिनट पर समाप्त होगी। भगवान श्रीराम का जन्म मध्याह्न काल में हुआ था इसलिए कई श्रद्धालु 26 मार्च को भी राम नवमी मना रहे हैं। वहीं उदया तिथि के आधार पर 27 मार्च को भी इस पर्व का आयोजन किया जा रहा है जिससे लोगों के बीच भ्रम की स्थिति बनी हुई है।

    धार्मिक मान्यताओं और स्थानीय परंपराओं के अनुसार अयोध्या में राम नवमी 27 मार्च 2026 शुक्रवार को मनाई जाएगी। इसी दिन राम मंदिर में रामलला का भव्य जन्मोत्सव आयोजित किया जाएगा। दोपहर 12 बजकर 27 मिनट पर मध्याह्न मुहूर्त में भगवान श्रीराम का जन्म उत्सव मनाया जाएगा जो इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण क्षण माना जाता है।

    राम नवमी के अवसर पर अयोध्या में एक विशेष आकर्षण सूर्य तिलक होता है। इस बार भी वैज्ञानिक तकनीक के माध्यम से सूर्य की किरणें सीधे भगवान राम के मस्तक पर पड़ेंगी और यह अद्भुत दृश्य लगभग चार से पांच मिनट तक दिखाई देगा। यह नजारा लाखों श्रद्धालुओं के लिए आस्था और विज्ञान का अनूठा संगम होता है जिसे देखने के लिए दूर दूर से लोग अयोध्या पहुंचते हैं।

    राम नवमी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जन्म का प्रतीक है जो धर्म सत्य और मर्यादा के आदर्श माने जाते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में सत्य और धर्म का मार्ग ही सर्वोपरि है और अंततः अच्छाई की ही जीत होती है।

    अयोध्या में इस अवसर पर मंदिरों को भव्य रूप से सजाया जाता है और विशेष पूजा अर्चना भजन कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। श्रद्धालु बड़ी संख्या में सरयू नदी में स्नान कर भगवान राम के दर्शन करते हैं और अपने जीवन में सुख समृद्धि और शांति की कामना करते हैं।

    इस प्रकार राम नवमी 2026 का पर्व अयोध्या में 27 मार्च को अत्यंत श्रद्धा और भव्यता के साथ मनाया जाएगा। यह दिन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि आस्था और संस्कृति का भी प्रतीक है जो हर भक्त के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और प्रेरणा लेकर आता है।

  • कल है दुर्गा अष्टमी 2026 इस शुभ मुहूर्त में करें कन्या पूजन मिलेगा मां महागौरी का आशीर्वाद

    कल है दुर्गा अष्टमी 2026 इस शुभ मुहूर्त में करें कन्या पूजन मिलेगा मां महागौरी का आशीर्वाद


    नई दिल्ली । चैत्र नवरात्र का पावन पर्व अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है और अब भक्तों को महाअष्टमी का बेसब्री से इंतजार है। दुर्गा अष्टमी का दिन नवरात्र के सबसे महत्वपूर्ण दिनों में से एक माना जाता है। इस दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप महागौरी की पूजा की जाती है और कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि विधान से पूजा करने पर जीवन में सुख समृद्धि और खुशहाली आती है।

    पंचांग के अनुसार इस वर्ष अष्टमी तिथि 25 मार्च को दोपहर 1 बजकर 50 मिनट से शुरू होकर 26 मार्च को सुबह 11 बजकर 48 मिनट तक रहेगी। ऐसे में महाअष्टमी का पर्व 26 मार्च को मनाया जाएगा। इस दिन शुभ मुहूर्त में कन्या पूजन करना अत्यंत फलदायी माना गया है।

    कन्या पूजन के लिए इस बार तीन प्रमुख शुभ मुहूर्त बताए गए हैं। पहला मुहूर्त सुबह 6 बजकर 16 मिनट से लेकर 7 बजकर 48 मिनट तक रहेगा। दूसरा मुहूर्त सुबह 10 बजकर 56 मिनट से लेकर दोपहर 2 बजकर 1 मिनट तक रहेगा। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 2 मिनट से लेकर 12 बजकर 52 मिनट तक रहेगा। इन सभी समयों में श्रद्धालु कन्या पूजन कर सकते हैं और माता का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।

    इस वर्ष दुर्गा अष्टमी पर विशेष योग का भी संयोग बन रहा है जो इसे और अधिक शुभ बना रहा है। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार इस दिन सर्वार्थसिद्धि योग और रवि योग का निर्माण हो रहा है। यह योग शाम 4 बजकर 19 मिनट से प्रारंभ होकर अगले दिन सुबह तक रहेगा। ऐसे योग में किए गए धार्मिक कार्यों का विशेष फल प्राप्त होता है और जीवन में सफलता के मार्ग खुलते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्र में अष्टमी और नवमी दोनों दिन कन्या पूजन करना शुभ माना जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि जहां कन्याओं का सम्मान होता है वहां देवी का वास होता है। इसलिए इस दिन नौ कन्याओं को माता का स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है। उन्हें भोजन के रूप में हलवा पूरी और चने का प्रसाद दिया जाता है और दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।

    कन्या पूजन केवल एक धार्मिक परंपरा ही नहीं बल्कि नारी शक्ति के सम्मान का प्रतीक भी है। यह पर्व हमें यह संदेश देता है कि समाज में महिलाओं का सम्मान और आदर करना कितना महत्वपूर्ण है। इस प्रकार दुर्गा अष्टमी का दिन श्रद्धा भक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। इस शुभ अवसर पर सही मुहूर्त में कन्या पूजन करने से मां दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख शांति और समृद्धि का आगमन होता है।