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  • राहुल गांधी का सरकार पर हमला, बोले- धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें, घायल छात्र को दिखाकर उठाए पुलिस कार्रवाई पर सवाल

    राहुल गांधी का सरकार पर हमला, बोले- धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें, घायल छात्र को दिखाकर उठाए पुलिस कार्रवाई पर सवाल


    नई दिल्ली । लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने शुक्रवार को अपने आवास 10 जनपथ पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर नीट पेपर लीक मामले और छात्रों के आंदोलन को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। इस दौरान उन्होंने प्रदर्शन के दौरान घायल हुए एक छात्र को मीडिया के सामने पेश किया और उसकी चोटें दिखाते हुए पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए।

    राहुल गांधी ने कहा कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा शिक्षा व्यवस्था की स्थिति के लिए मंत्री जिम्मेदार हैं और इसी कारण हजारों छात्र सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए हैं।

    घायल छात्र की चोटें दिखाईं
    प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने छात्र के हाथ, पीठ और छाती पर लगी चोटों की ओर इशारा करते हुए कहा कि वह शांतिपूर्ण तरीके से तिरंगा लेकर प्रदर्शन कर रहा था, तभी पैलेट गन से घायल हो गया।

    20 जुलाई की झड़प का मामला
    गौरतलब है कि 20 जुलाई को नीट पेपर लीक के विरोध में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा निकाले गए संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हुई थी। इस घटना में 100 से अधिक छात्र और पुलिसकर्मी घायल हुए थे।

    छात्र की आंख की रोशनी पर संकट
    राहुल गांधी के साथ मौजूद छात्र की पहचान साहिल लोचाब (19) के रूप में हुई, जो दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के नजफगढ़ का निवासी है। परिवार के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान पैलेट लगने से उसकी दाहिनी आंख गंभीर रूप से घायल हो गई। उसका उपचार एम्स के जयप्रकाश नारायण एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में हुआ, जहां सर्जरी भी की गई। परिजनों का कहना है कि डॉक्टरों ने बताया है कि घायल आंख की रोशनी लौटने की संभावना करीब एक प्रतिशत ही है, क्योंकि आंख की पुतली को गंभीर क्षति पहुंची है।

    पुलिस अधिकारी बनने का था सपना
    साहिल दिल्ली विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग (SOL) का छात्र है। उसकी मां ज्योति ने बताया कि वह पहले भी CJP के प्रदर्शनों में शामिल हो चुका था। 20 जुलाई को भी वह यह कहकर घर से निकला था कि यह उसकी पढ़ाई और भविष्य से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने बताया कि साहिल का सपना पुलिस अधिकारी बनने का था।

  • सरकार और CJP के बीच नहीं बनी सहमति, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग जारी, कल होगी अगली बैठक

    सरकार और CJP के बीच नहीं बनी सहमति, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग जारी, कल होगी अगली बैठक


    नई दिल्ली। नीट पेपर लीक मामले को लेकर पिछले तीन सप्ताह से आंदोलन कर रही कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और केंद्र सरकार के बीच शुक्रवार को हुई दूसरे दौर की वार्ता किसी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। हालांकि CJP का दावा है कि सरकार ने उनकी तीन प्रमुख मांगों में से दो पर सकारात्मक रुख दिखाया है, लेकिन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर सहमति नहीं बन पाई। इस मुद्दे पर सरकार ने शनिवार तक का समय मांगा है। अब दोनों पक्षों के बीच अगली बैठक शनिवार दोपहर करीब 12 बजे होगी।

    करीब 50 मिनट चली बैठक
    दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में हुई बैठक लगभग 50 मिनट तक चली। CJP की ओर से प्रवक्ता सौरभ दास और आशुतोष रंका मौजूद रहे, जबकि सरकार का प्रतिनिधित्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने किया।

    इस्तीफे की मांग पर कायम CJP
    बैठक के बाद CJP प्रवक्ता सौरभ दास ने बताया कि मंत्रियों के साथ हुई चर्चा में सरकार उनकी तीन मांगों में से दो पर सकारात्मक नजर आई। उन्होंने कहा कि NEET की तैयारी के दौरान आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये मुआवजा देने और आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेने के मुद्दे पर सरकार का रुख सकारात्मक रहा। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर संगठन किसी तरह का समझौता करने के लिए तैयार नहीं है।

    दो मांगों पर मिली सैद्धांतिक सहमति
    CJP के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रंका ने कहा कि सरकार ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से जुड़े मुद्दे पर फैसला लेने के लिए शनिवार दोपहर तक का समय मांगा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार जल्द इस पर निर्णय लेगी। रंका के मुताबिक, सरकार ने दो मांगों पर सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। इनमें आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिजनों को मुआवजा और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर व अन्य कानूनी कार्रवाई वापस लेने का प्रस्ताव शामिल है।

    20 जुलाई को भी हुई थी बातचीत
    इससे पहले 20 जुलाई को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के सरकारी आवास पर CJP प्रतिनिधियों और सरकार के बीच दो दौर की बैठक हुई थी, जिसमें भी सौरभ दास और आशुतोष रंका शामिल हुए थे। इसी बीच सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने सरकार की ओर से प्रमुख मांगों पर आश्वासन मिलने के बाद 26 दिनों से जारी अपना अनशन समाप्त कर दिया था। इसके बाद शुक्रवार को कॉन्स्टीट्यूशन क्लब के विठ्ठलभाई पटेल हाउस में दोनों पक्षों के बीच यह नई बैठक आयोजित की गई।

    आंदोलन जारी रखने का ऐलान
    CJP ने पहले ही सरकार के मंत्रियों के आवास या कार्यालय में वार्ता करने से इनकार कर दिया था और किसी तटस्थ स्थान पर बातचीत की मांग की थी। संगठन का कहना है कि जंतर-मंतर पर चल रहा प्रदर्शन तब तक जारी रहेगा, जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देते।

    संगठन की प्रमुख मांगों में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जवाबदेही तय करना, शिक्षा व्यवस्था में सुधार, NEET पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये का मुआवजा तथा आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी एफआईआर और कानूनी कार्रवाई वापस लेना शामिल है।

  • राहुल गांधी का सरकार पर हमला, बोले- शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक पेपर लीक पर बहस में शामिल नहीं होगा विपक्ष

    राहुल गांधी का सरकार पर हमला, बोले- शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक पेपर लीक पर बहस में शामिल नहीं होगा विपक्ष

    नई दिल्ली । लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पेपर लीक मामले को लेकर केंद्र सरकार पर एक बार फिर निशाना साधा है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री अपने पद से इस्तीफा नहीं देते, तब तक विपक्ष इस मुद्दे पर संसद में होने वाली किसी भी चर्चा में भाग नहीं लेगा। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार जवाबदेही से बचने का प्रयास कर रही है, जबकि विपक्ष की मांग है कि पहले जिम्मेदारी तय की जाए और उसके बाद ही सदन में बहस आगे बढ़े।

    संसद परिसर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान राहुल गांधी ने कहा कि उन्हें लोकसभा में अपनी बात रखने का अवसर नहीं दिया गया। उन्होंने दावा किया कि जब उनका नाम लेकर चर्चा की गई और वे उसका जवाब देने के लिए खड़े हुए, तब उन्हें बोलने का मौका नहीं मिला। उनके अनुसार संसदीय परंपरा के तहत जिस सदस्य का नाम लिया जाता है, उसे अपनी बात रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि उनका माइक्रोफोन बंद कर दिया गया और उन्हें अपनी बात पूरी करने का अवसर नहीं दिया गया।

    इससे पहले लोकसभा की कार्यवाही के दौरान केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष से पेपर लीक के मुद्दे पर चर्चा में शामिल होने की अपील की थी। उन्होंने राहुल गांधी से भी आग्रह किया था कि वे अपने दल के सांसदों को सदन में बहस में भाग लेने के लिए प्रेरित करें। हालांकि इसके बाद सदन में हंगामा बढ़ गया और कार्यवाही निर्धारित समय से पहले स्थगित कर दी गई।

    राहुल गांधी ने कहा कि विपक्ष का रुख पूरी तरह स्पष्ट है। उनके अनुसार शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बिना पेपर लीक जैसे गंभीर विषय पर चर्चा का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने कहा कि विपक्ष लगातार तीन प्रमुख मांगों पर कायम है। इनमें शिक्षा मंत्री की जवाबदेही तय करना, छात्रों के साथ हुई कथित कार्रवाई की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ उचित कार्रवाई शामिल है। उनका कहना है कि केवल चर्चा से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि जवाबदेही सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।

    पेपर लीक के मुद्दे को लेकर पिछले कुछ समय से संसद के भीतर और बाहर राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। विभिन्न विपक्षी दल परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग उठा रहे हैं, जबकि सरकार परीक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का भरोसा जता चुकी है। इसी बीच केंद्र सरकार पेपर लीक से जुड़े कानून को और सख्त बनाने की दिशा में भी कदम उठा रही है, जिससे यह मुद्दा राजनीतिक और विधायी दोनों स्तरों पर चर्चा का केंद्र बना हुआ है।

    संसद में जारी गतिरोध के बीच अब सभी की नजर इस बात पर है कि सरकार और विपक्ष के बीच इस विषय पर सहमति बन पाती है या नहीं। यदि दोनों पक्षों के बीच संवाद आगे बढ़ता है तो पेपर लीक, परीक्षा सुधार और छात्रों से जुड़े मुद्दों पर विस्तृत चर्चा संभव हो सकती है। फिलहाल विपक्ष अपने रुख पर कायम है और सरकार सदन की कार्यवाही सुचारु रूप से चलाने के लिए सभी दलों से सहयोग की अपील कर रही है।

  • जंतर-मंतर से सोनम वांगचुक को अस्पताल ले जाने पर बढ़ा सियासी विवाद, CJP ने पीएम मोदी के इस्तीफे की उठाई मांग

    जंतर-मंतर से सोनम वांगचुक को अस्पताल ले जाने पर बढ़ा सियासी विवाद, CJP ने पीएम मोदी के इस्तीफे की उठाई मांग

    नई दिल्ली । राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर 21 दिनों से जारी अनशन के बीच शनिवार को उस समय नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया, जब पुलिस ने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को धरनास्थल से हटाकर इलाज के लिए अस्पताल पहुंचा दिया। लंबे समय से भोजन नहीं करने के कारण उनकी सेहत लगातार कमजोर हो रही थी। पुलिस की इस कार्रवाई के बाद आंदोलन से जुड़े संगठनों और समर्थकों ने विरोध जताया, जबकि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने इसे लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग कर दी।

    सोनम वांगचुक 28 जून से जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे थे। उनका अनशन देश में पेपर लीक की घटनाओं के खिलाफ शुरू हुए आंदोलन के समर्थन में चल रहा था। प्रदर्शनकारी परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित करने, दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहे थे। आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी उठाई थी।

    शनिवार सुबह पुलिस ने स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को देखते हुए वांगचुक को धरनास्थल से हटाकर अस्पताल पहुंचाया। अधिकारियों के अनुसार, लंबे समय तक अनशन के कारण उनकी शारीरिक स्थिति कमजोर हो रही थी और चिकित्सकीय निगरानी आवश्यक थी। इससे पहले न्यायालय की ओर से भी उनके स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता पर टिप्पणी की गई थी। पुलिस का कहना है कि यह कदम उनकी सुरक्षा और उपचार सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया।

    वांगचुक को अस्पताल ले जाने के बाद आंदोलन से जुड़े लोगों ने इस कार्रवाई का विरोध किया। कॉकरोच जनता पार्टी ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस्तीफे की मांग की। पार्टी ने आरोप लगाया कि लोकतांत्रिक तरीके से चल रहे आंदोलन के साथ उचित व्यवहार नहीं किया गया। इस बयान के बाद राजनीतिक बहस और तेज हो गई।

    इसी बीच CJP के संस्थापक अभिजी दीपके ने घोषणा की कि वह स्वयं भूख हड़ताल पर बैठेंगे। उन्होंने पुलिस कार्रवाई को लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ बताते हुए इसकी आलोचना की। दीपके ने एक वीडियो संदेश जारी कर आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान छात्रों के साथ बल प्रयोग किया गया और उनके साथ भी मारपीट हुई। उन्होंने इन आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए लोगों से शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से विरोध जारी रखने की अपील की।

    घटना के बाद जंतर-मंतर और आसपास के क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था भी बढ़ा दी गई। प्रशासन की ओर से स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है ताकि कानून-व्यवस्था प्रभावित न हो। दूसरी ओर, आंदोलन से जुड़े लोग अपनी मांगों पर कायम हैं और उनका कहना है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार तथा परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता बहाल करने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।

    इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर शांतिपूर्ण विरोध, प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा और प्रशासन की जिम्मेदारी को लेकर बहस को तेज कर दिया है। जहां एक ओर पुलिस का कहना है कि स्वास्थ्य कारणों से यह कदम उठाना आवश्यक था, वहीं आंदोलन से जुड़े संगठन इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर हस्तक्षेप बता रहे हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर प्रतिक्रियाएं जारी रहने की संभावना है, जबकि सभी की नजर सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य और आंदोलन की आगामी दिशा पर बनी हुई है।

  • शहीद दिवस रैली से ठीक पहले कामरहाटी के कद्दावर विधायक ने छोड़ी पार्टी, भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगा कर दी खुली चुनौती

    शहीद दिवस रैली से ठीक पहले कामरहाटी के कद्दावर विधायक ने छोड़ी पार्टी, भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगा कर दी खुली चुनौती

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस में आगामी 21 जुलाई की शहीद दिवस रैली से ठीक पहले एक बहुत बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। प्रवर्तन निदेशालय द्वारा सपरिवार समन जारी किए जाने के बाद कामरहाटी विधानसभा क्षेत्र के वरिष्ठ और कद्दावर विधायक मदन मित्रा ने मंगलवार रात को ही पार्टी के आधिकारिक नेतृत्व से दूरी बना ली और सुबह होते ही ममता बनर्जी के आधिकारिक कालीघाट गुट को औपचारिक रूप से अलविदा कह दिया। तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफा देने के तुरंत बाद मदन मित्रा ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व, विशेष रूप से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के खिलाफ बेहद आक्रामक रुख अख्तियार करते हुए कई सनसनीखेज और गंभीर आरोप लगाए हैं, जिससे राज्य का सियासी पारा पूरी तरह से गरमा गया है।

    एक प्रमुख बांग्ला समाचार चैनल को दिए गए अपने विस्तृत साक्षात्कार में पूर्व तृणमूल नेता ने पार्टी के भीतर व्याप्त सांगठनिक ढांचे और नेतृत्व की कार्यशैली पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने बेहद आक्रामक लहजे में खुले मंच से यह दावा किया कि वह इस तथ्य को पूरी तरह साबित कर सकते हैं कि वर्तमान सत्ता पक्ष की टीम में शामिल प्रत्येक दस में से आठ लोग भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। उन्होंने स्वयं को पूरी तरह से पाक-साफ बताते हुए नेतृत्व को खुली चुनौती दी कि यदि कोई भी व्यक्ति उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को प्रमाणित कर देता है, तो वह राजनीति छोड़ने के साथ-साथ अत्यंत कठोर कदम उठाने से भी पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने विपक्ष के खेमे में जाने और वहां मौजूद अन्य नेताओं के संदर्भ में पूछे गए सवालों पर स्पष्ट किया कि परिस्थितिजन्य राजनीति के तहत बड़े सांगठनिक बदलाव अब अवश्यंभावी हो चुके हैं।

    अभिषेक बनर्जी के पार्टी में तेजी से बढ़ते प्रभाव और उनके काम करने के तौर-तरीकों को मुख्य निशाना बनाते हुए मदन मित्रा ने भूतकाल की राजनीतिक घटनाओं का भी जिक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि जब अभिषेक बनर्जी ने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया था, तब उनके सामने संगठन में पार्थ चटर्जी, मुकुल रॉय और सुब्रत बख्शी जैसे अत्यंत अनुभवी और वरिष्ठ चेहरे मौजूद थे। आरोप के अनुसार, इन वरिष्ठ चेहरों को आगे रखकर पृष्ठभूमि से पूरी तरह से समानांतर सत्ता चलाने का प्रयास किया गया। मित्रा ने वर्तमान सांगठनिक गतिविधियों को बेहद नकारात्मक बताते हुए आरोप लगाया कि समकालीन राजनीति में इतनी जटिल और रणनीतिक प्रवृत्तियां किसी अन्य नेता में नहीं हैं और उनके सामने विरोधी राजनीतिक दल जैसे माकपा और भाजपा के नेता भी काफी पीछे नजर आते हैं।

    राजनीतिक हलकों में इस प्रकार के तीखे बयानों के बाद संभावित सुरक्षा खतरों और पार्टी की ओर से होने वाली किसी भी जवाबी कार्रवाई के डर के संबंध में पूछे गए प्रश्नों का मदन मित्रा ने बेहद बेबाकी से जवाब दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब उनके मन से किसी भी प्रकार का राजनीतिक या प्रशासनिक भय पूरी तरह समाप्त हो चुका है और वह मानसिक रूप से पूरी तरह शांत हैं। उन्होंने आगे पलटवार करते हुए कहा कि उनके ऊपर किसी भी प्रकार का दबाव बनाने या संगठनात्मक हमला करने का साहस विरोधियों में नहीं है। अभिषेक बनर्जी के क्षेत्रीय जनाधार पर गंभीर सवालिया निशान लगाते हुए उन्होंने दावा किया कि उनके स्थानीय क्षेत्र के नागरिक भी उनके साथ खड़े नहीं हैं, जिसके संबंध में विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक आंकड़ों का हवाला दिया गया है, जिसका आज तक संगठन की ओर से कोई आधिकारिक खंडन जारी नहीं किया जा सका है।

  • फीफा विश्व कप से बाहर होते ही इक्वाडोर में बड़ा फैसला, मेक्सिको से हार के बाद हेड कोच सेबेस्टियन बेकासे ने दिया इस्तीफा

    फीफा विश्व कप से बाहर होते ही इक्वाडोर में बड़ा फैसला, मेक्सिको से हार के बाद हेड कोच सेबेस्टियन बेकासे ने दिया इस्तीफा

    नई दिल्ली । फीफा विश्व कप 2026 में मेक्सिको के हाथों राउंड ऑफ 32 में मिली हार के बाद इक्वाडोर फुटबॉल टीम में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। टीम के मुख्य कोच सेबेस्टियन बेकासे ने अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। उन्होंने कहा कि विश्व कप में तय लक्ष्य हासिल नहीं हो सके, इसलिए पद छोड़ना उचित निर्णय है। उनके अनुसार विश्व कप अभियान की समाप्ति के साथ ही उनका अनुबंध भी समाप्त होना था और इसी कारण उन्होंने अपने कार्यकाल का समापन करने का फैसला लिया।

    मेक्सिको के खिलाफ खेले गए नॉकआउट मुकाबले में इक्वाडोर को 2-0 से हार का सामना करना पड़ा। इस हार के साथ टीम का विश्व कप अभियान समाप्त हो गया। मैच के बाद आयोजित प्रेस वार्ता में बेकासे ने कहा कि वह इक्वाडोर फुटबॉल महासंघ और उसके नेतृत्व के प्रति आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर दिया। उन्होंने खिलाड़ियों, सहयोगी स्टाफ और पूरे देश का धन्यवाद करते हुए कहा कि यह उनके लिए यादगार अनुभव रहा और टीम के साथ बिताया गया समय हमेशा विशेष रहेगा।

    कोच ने स्वीकार किया कि नॉकआउट मुकाबले में मेक्सिको ने हर विभाग में बेहतर प्रदर्शन किया। उन्होंने कहा कि उनकी टीम अपने स्वाभाविक खेल का स्तर नहीं दिखा सकी और प्रतिद्वंद्वी जीत का हकदार था। उनके अनुसार विश्व कप जैसे बड़े मंच पर छोटी-छोटी गलतियां भी भारी पड़ती हैं और इस मुकाबले में टीम अपेक्षित प्रदर्शन करने में सफल नहीं रही।

    सेबेस्टियन बेकासे ने अगस्त 2024 में इक्वाडोर की जिम्मेदारी संभाली थी। उस समय टीम दक्षिण अमेरिकी क्वालीफाइंग अभियान में कठिन दौर से गुजर रही थी। उनके नेतृत्व में इक्वाडोर ने शानदार वापसी करते हुए क्वालीफाइंग तालिका में अर्जेंटीना के बाद दूसरा स्थान हासिल किया। टीम ने पूरे अभियान में मजबूत रक्षात्मक प्रदर्शन किया और 18 क्वालीफाइंग मुकाबलों में केवल पांच गोल खाए। इस दौरान उसने कोलंबिया, उरुग्वे और ब्राजील जैसी मजबूत टीमों से बेहतर प्रदर्शन कर अपनी क्षमता का परिचय दिया।

    बेकासे के कार्यकाल का रिकॉर्ड भी संतुलित और प्रभावशाली रहा। उनके नेतृत्व में इक्वाडोर ने 24 अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में नौ जीत दर्ज की, 12 मैच ड्रॉ रहे और केवल तीन मुकाबलों में हार मिली। विश्व कप से पहले टीम लगातार 19 मैचों तक अपराजित रही थी, जिससे उससे बेहतर प्रदर्शन की उम्मीदें काफी बढ़ गई थीं।

    विश्व कप अभियान की शुरुआत हालांकि उम्मीद के अनुरूप नहीं रही। शुरुआती मुकाबले में आइवरी कोस्ट से हार और कुराकाओ के खिलाफ ड्रॉ के बाद टीम की आलोचना हुई। इसके बावजूद इक्वाडोर ने अंतिम ग्रुप मैच में जर्मनी को 2-1 से हराकर शानदार वापसी की और सर्वश्रेष्ठ तीसरे स्थान वाली टीमों में शामिल होकर राउंड ऑफ 32 में जगह बनाई। टीम की इस उपलब्धि पर इक्वाडोर सरकार ने राष्ट्रीय अवकाश की घोषणा भी की थी।

    हालांकि नॉकआउट चरण में मेक्सिको के खिलाफ हार के साथ अभियान समाप्त हो गया और इसके तुरंत बाद मुख्य कोच ने पद छोड़ने का फैसला लिया। अब इक्वाडोर फुटबॉल महासंघ के सामने नए मुख्य कोच की नियुक्ति और आगामी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए टीम की नई रणनीति तैयार करने की चुनौती होगी।

  • UP: लखनऊ अग्निकांड के बाद कानपुर में चला विशेष अभियान, फिजिक्स वाला समेत 22 कोचिंग संस्थान सील

    UP: लखनऊ अग्निकांड के बाद कानपुर में चला विशेष अभियान, फिजिक्स वाला समेत 22 कोचिंग संस्थान सील


    कानपुर।
    उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) की राजधानी लखनऊ (Lucknow) में कोचिंग संस्थान (Coaching Institute) से जुड़े हादसे के बाद कानपुर विकास प्राधिकरण (केडीए) ने शहर के प्रमुख कोचिंग हब काकादेव में बड़े पैमाने पर कार्रवाई शुरू कर दी है. सोमवार को चलाए गए विशेष अभियान (Special Campaign) के दौरान फिजिक्स वाला समेत 22 कोचिंग संस्थानों को सील कर दिया गया. जांच में इन संस्थानों में भवन और सुरक्षा संबंधी मानकों के उल्लंघन की बात सामने आने पर यह कार्रवाई की गई।

    केडीए अधिकारियों की टीम ने अलग-अलग क्षेत्रों में निरीक्षण कर उन संस्थानों को चिह्नित किया, जहां आवश्यक नियमों का पालन नहीं किया जा रहा था. कार्रवाई के दौरान संस्थानों को खाली कराया गया और बाद में उन्हें सील कर दिया गया।

    प्राधिकरण के अनुसार, अभियान के तहत विभिन्न जोनों में एक साथ कार्रवाई की गई. पहले चरण में 22 संस्थानों को चिह्नित किया गया है, जबकि अन्य कोचिंग संस्थानों की भी जांच की जा रही है. अधिकारियों का कहना है कि मानकों की अनदेखी पाए जाने पर आगे भी इसी तरह की कार्रवाई जारी रहेगी।

    सील किए गए संस्थानों में फिजिक्स वाला, वर्कस्पेस, महेंद्राज और केमिस्ट्री वाले संजीव राठौर जैसे चर्चित नाम शामिल हैं. कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में अधिकारी और कर्मचारी मौके पर मौजूद रहे। वहीं, इस कार्रवाई के बाद स्थानीय लोगों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल भी उठाए हैं. उनका कहना है कि शहर में लंबे समय से अनेक कोचिंग संस्थान बिना पर्याप्त सुरक्षा इंतजामों और निर्धारित मानकों के संचालित हो रहे हैं, लेकिन नियमित जांच नहीं की जाती।

    लोगों का आरोप है कि किसी बड़े हादसे के बाद ही विभाग सक्रिय होता है और फिर कुछ समय तक अभियान चलाकर कार्रवाई की जाती है। स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यदि समय-समय पर निरीक्षण और नियमों के अनुपालन की समीक्षा होती रहे, तो ऐसी स्थिति पैदा होने से पहले ही कमियों को दूर किया जा सकता है और छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

  • राष्ट्रीय कार्यसमिति में शामिल होने के महज 7 दिन बाद ज्योतिप्रिय मलिक का इस्तीफा, TMC के भीतर बढ़ीं राजनीतिक अटकलें

    राष्ट्रीय कार्यसमिति में शामिल होने के महज 7 दिन बाद ज्योतिप्रिय मलिक का इस्तीफा, TMC के भीतर बढ़ीं राजनीतिक अटकलें


    नई दिल्ली ।
    पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस समय नई हलचल पैदा हो गई जब तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री ज्योतिप्रिय मलिक ने पार्टी के सभी संगठनात्मक पदों से इस्तीफा देने का फैसला कर लिया। यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उन्हें हाल ही में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति में शामिल किया गया था। राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी मिलने के कुछ ही दिनों बाद संगठनात्मक पदों से दूरी बनाने के उनके फैसले ने राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

    ज्योतिप्रिय मलिक ने अपने इस्तीफे के पीछे स्वास्थ्य संबंधी कारणों को मुख्य वजह बताया है। उन्होंने कहा कि लंबे समय से स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे हैं और चिकित्सकों ने उन्हें सक्रिय राजनीतिक और संगठनात्मक गतिविधियों से दूरी बनाए रखने की सलाह दी है। उनका कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में पार्टी संगठन की जिम्मेदारियों का प्रभावी ढंग से निर्वहन करना उनके लिए संभव नहीं रह गया है।

    मलिक ने बताया कि वे लंबे समय से मधुमेह की बीमारी से जूझ रहे हैं। स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं के कारण उनकी किडनी भी प्रभावित हुई है, जिसके चलते नियमित चिकित्सा निगरानी और उपचार की आवश्यकता बनी हुई है। इसी कारण उन्होंने संगठनात्मक जिम्मेदारियों से मुक्त होने का निर्णय लिया ताकि स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान दिया जा सके। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका पार्टी से वैचारिक संबंध और निष्ठा पहले की तरह बनी रहेगी।

    पश्चिम बंगाल की राजनीति में ज्योतिप्रिय मलिक का लंबा राजनीतिक अनुभव रहा है। उन्होंने विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हुए राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर सक्रिय रहने वाले नेताओं में उनकी पहचान रही है। लंबे समय तक विधायक रहने के साथ-साथ उन्होंने राज्य सरकार में महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारियां भी संभाली थीं।

    पिछले कुछ वर्षों में उनका नाम उस समय व्यापक चर्चा में आया था जब राशन वितरण से जुड़े कथित घोटाले की जांच के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद उन्होंने लंबा समय हिरासत और न्यायिक प्रक्रिया के बीच बिताया। बाद में उन्हें जमानत मिली और वे सक्रिय राजनीति में लौटे। हालांकि जमानत मिलने के बाद उन्हें सरकार में कोई नई प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई थी।

    हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में उन्हें राजनीतिक झटका भी लगा, जब उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्र में हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद पार्टी नेतृत्व ने उन पर भरोसा जताते हुए राष्ट्रीय कार्यसमिति में स्थान दिया था। यही कारण है कि कार्यसमिति में शामिल होने के कुछ दिनों के भीतर उनका इस्तीफा राजनीतिक विश्लेषकों के लिए चर्चा का विषय बन गया है।

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मलिक का इस्तीफा फिलहाल स्वास्थ्य कारणों से जुड़ा निर्णय बताया जा रहा है, लेकिन इसका संगठनात्मक और राजनीतिक प्रभाव भी देखने को मिल सकता है। तृणमूल कांग्रेस के लिए यह एक ऐसे नेता का संगठनात्मक स्तर पर पीछे हटना है, जिसने लंबे समय तक पार्टी के विस्तार और चुनावी अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई है।

    फिलहाल पार्टी की ओर से इस इस्तीफे को व्यक्तिगत और स्वास्थ्य संबंधी निर्णय के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि ज्योतिप्रिय मलिक संगठनात्मक राजनीति से कितनी दूरी बनाए रखते हैं और भविष्य में उनकी राजनीतिक भूमिका किस दिशा में आगे बढ़ती है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में उनके इस कदम पर सभी की नजर बनी हुई है।

  • भाजपा से अलग हुए के. अन्नामलाई, गठबंधन राजनीति से नाराजगी बनी वजह; नई राजनीतिक पारी की अटकलें तेज

    भाजपा से अलग हुए के. अन्नामलाई, गठबंधन राजनीति से नाराजगी बनी वजह; नई राजनीतिक पारी की अटकलें तेज

    नई दिल्ली । तमिलनाडु की राजनीति में शुक्रवार को उस समय बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया जब भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे के. अन्नामलाई ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने उनका इस्तीफा औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया है। इसके साथ ही पार्टी में अन्नामलाई का कई वर्षों का राजनीतिक सफर समाप्त हो गया है और राज्य की राजनीति में नए समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    भाजपा की ओर से जारी आधिकारिक बयान में बताया गया कि के. अन्नामलाई ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी इस्तीफा सौंप दिया था। राष्ट्रीय नेतृत्व ने उनके निर्णय पर विचार करने के बाद उसे स्वीकार कर लिया। पार्टी की ओर से जारी संक्षिप्त बयान में उनके योगदान की सराहना भी की गई है।

    अन्नामलाई का इस्तीफा ऐसे समय में सामने आया है जब उन्होंने हाल ही में नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात की थी। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पार्टी नेतृत्व ने उन्हें अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए मनाने की कोशिश की थी। हालांकि बातचीत के बावजूद कोई सहमति नहीं बन सकी और अंततः उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया।

    सूत्रों के अनुसार अन्नामलाई आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर सकते हैं, जिसमें वह अपने राजनीतिक भविष्य और आगे की रणनीति पर विस्तार से चर्चा करेंगे। उनके अगले कदम को लेकर राजनीतिक हलकों में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि अभी तक उन्होंने किसी नई पार्टी के गठन या किसी अन्य दल में शामिल होने को लेकर कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया है।

    पूर्व आईपीएस अधिकारी के. अन्नामलाई ने वर्ष 2020 में अपनी सरकारी सेवा छोड़कर भाजपा का दामन थामा था। अपनी तेजतर्रार छवि, आक्रामक राजनीतिक शैली और जमीनी सक्रियता के कारण वह बहुत कम समय में तमिलनाडु भाजपा के सबसे लोकप्रिय नेताओं में शामिल हो गए। वर्ष 2021 में उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, जिसके बाद उन्होंने संगठन विस्तार और कार्यकर्ता आधार मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया।

    उनके नेतृत्व में भाजपा ने राज्य में अपनी राजनीतिक उपस्थिति बढ़ाने के लिए कई अभियान चलाए। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़ने को भी उनकी रणनीति और मेहनत का परिणाम माना गया था। हालांकि सीटों में इसका सीधा लाभ नहीं मिल सका। इसके बावजूद अन्नामलाई को भाजपा के उभरते राष्ट्रीय चेहरों में गिना जाने लगा था।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एआईएडीएमके के साथ गठबंधन को लेकर अन्नामलाई और पार्टी नेतृत्व के बीच मतभेद समय के साथ गहराते गए। माना जा रहा है कि वह गठबंधन की रणनीति से पूरी तरह सहमत नहीं थे। उनके समर्थकों का तर्क है कि भाजपा ने स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने की दिशा में जो प्रगति की थी, गठबंधन की राजनीति के कारण उसे अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया।

    हाल के महीनों में चेन्नई और कोयंबटूर सहित कई शहरों में अन्नामलाई के समर्थन में पोस्टर लगाए गए थे, जिनमें उन्हें भविष्य के बड़े नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया था। इससे उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं और तेज हो गई थीं। विधानसभा चुनाव में सक्रिय भूमिका न निभाने के बाद से ही उनके अगले कदम को लेकर अटकलों का दौर जारी था।

    के. अन्नामलाई का इस्तीफा केवल एक नेता के पार्टी छोड़ने की घटना नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे तमिलनाडु में भाजपा की भविष्य की रणनीति और संगठनात्मक दिशा से जोड़कर भी देखा जा रहा है। अब सभी की नजरें उनकी प्रस्तावित प्रेस कॉन्फ्रेंस और आने वाले राजनीतिक फैसलों पर टिकी हैं, जो राज्य की राजनीति में नए समीकरणों को जन्म दे सकते हैं।

  • LS में AAP को लग सकता है बड़ा झटका…. मजीठिया का दावा- इस्तीफा देने को तैयार 2 MP

    LS में AAP को लग सकता है बड़ा झटका…. मजीठिया का दावा- इस्तीफा देने को तैयार 2 MP


    चंडीगढ़।
    आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party- AAP) के लिए पंजाब में सियासी संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। राज्यसभा (Rajya Sabha) में अपने सांसदों की बड़ी बगावत का सामना कर रही पार्टी को अब निचले सदन (लोकसभा) में भी बड़े झटके का सामना करना पड़ सकता है। शिरोमणि अकाली दल (Shiromani Akali Dal- SAD) के वरिष्ठ नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने एक सनसनीखेज दावा करते हुए कहा है कि पंजाब से AAP के 2 लोकसभा सांसद भी पार्टी से इस्तीफा देने की तैयारी में हैं।

    बिक्रम सिंह मजीठिया ने दावा किया है कि आम आदमी पार्टी में मची भगदड़ केवल उच्च सदन (राज्यसभा) तक सीमित नहीं रहने वाली है। उनके अनुसार, पंजाब में AAP सरकार की कार्यप्रणाली, नेतृत्व की अनदेखी और अंदरूनी कलह से नाराज होकर अब लोकसभा के 2 सांसद भी जल्द ही इस्तीफा दे सकते हैं।

    2024 के लोकसभा चुनावों में पंजाब से आम आदमी पार्टी के केवल 3 सांसद ही जीतकर संसद पहुंचे थे। ये सांसद गुरमीत सिंह मीत हेयर, मलविंदर सिंह कंग और राज कुमार चब्बेवाल हैं। अगर मजीठिया का यह दावा सच साबित होता है और 2 सांसद इस्तीफा दे देते हैं, तो यह लोकसभा में आम आदमी पार्टी के लगभग सफाए के बराबर होगा।

    मजीठिया ने एक पोस्ट में लिखा, ‘एक और दिन, एक और विदाई की तैयारी… सूत्रों के मुताबिक, आम आदमी पार्टी के 2 लोकसभा सांसद जल्द ही पार्टी छोड़कर जा सकते हैं। ‘बार-बार सफर करने वालों’ की यह सूची बस बढ़ती ही जा रही है।’


    राज्यसभा में लगा करारा झटका

    अकाली दल के नेता का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पंजाब AAP इतिहास के अपने सबसे बड़े संकट से गुजर रही है। हाल ही में पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों ने एक साथ बगावत कर दी है। प्रमुख बागी नेता: इनमें पार्टी के मुख्य रणनीतिकार रहे राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल और पूर्व क्रिकेटर हरभजन सिंह जैसे बड़े चेहरे शामिल हैं, जिन्होंने भाजपा (BJP) का दामन थाम लिया है।


    पंजाब की भगवंत मान सरकार पर मंडराता खतरा?

    बिक्रम सिंह मजीठिया और अन्य विपक्षी दल इस स्थिति का पूरा राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं। मजीठिया ने इस भगदड़ को AAP सरकार के पतन की शुरुआत बताया है। हाल ही में मजीठिया ने कहा है कि सांसदों के बाद अब बड़ी संख्या में AAP के विधायक भी पार्टी छोड़ने की कतार में हैं, जो जल्द ही भाजपा या अन्य दलों में शामिल हो सकते हैं।


    फ्लोर टेस्ट की मांग

    अकाली दल ने दावा किया है कि पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार जल्द ही अल्पमत में आ सकती है। इसके मद्देनजर उन्होंने मुख्यमंत्री भगवंत मान से विधानसभा में ‘फ्लोर टेस्ट’ (बहुमत परीक्षण) कर अपना बहुमत साबित करने की मांग की है। विपक्ष का आरोप है कि ‘बदलाव’ का नारा देकर सत्ता में आई AAP की सरकार अब भ्रष्टाचार, लचर कानून-व्यवस्था और गुटबाजी का शिकार हो चुकी है, जिसके चलते उनके अपने ही संस्थापक सदस्य और नेता “डूबते जहाज” से कूद रहे हैं।

    मुख्यमंत्री भगवंत मान और आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने इस बगावत को सिरे से खारिज करते हुए बागी नेताओं को ‘गद्दार’ करार दिया है। उनका कहना है कि जो लोग छोड़कर गए हैं उनका अपना कोई जनाधार नहीं था और पंजाब सरकार को विधायकों का पूर्ण समर्थन प्राप्त है। हालांकि, 2027 के पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले यह राजनीतिक अस्थिरता आम आदमी पार्टी के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। यदि लोकसभा सांसदों के इस्तीफे की खबर हकीकत में बदलती है, तो यह पार्टी के लिए मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक रूप से एक बहुत बड़ा नुकसान साबित होगा।