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  • सपा के साथ आए तो चमकी सहयोगियों की किस्मत? कांग्रेस से बसपा और जयंत-राजभर तक, 4 चुनावों के आंकड़ों से समझिए समीकरण

    सपा के साथ आए तो चमकी सहयोगियों की किस्मत? कांग्रेस से बसपा और जयंत-राजभर तक, 4 चुनावों के आंकड़ों से समझिए समीकरण


    नई दिल्ली। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के चवन्नी को रुपया बनाने वाले बयान के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत में गठबंधन की राजनीति को लेकर नई बहस छिड़ गई है। अखिलेश यादव ने 16 अगस्त को सहयोगी दलों पर तंज कसते हुए कहा था कि उनकी पार्टी ने कई ऐसे गठबंधन किए जिनमें छोटे दलों को साथ लेकर उन्हें राजनीतिक ताकत दी लेकिन बाद में वही सहयोगी उन्हें छोड़कर चले गए। उनके इस बयान पर राष्ट्रीय लोक दल प्रमुख जयंत चौधरी के समर्थकों और बसपा प्रमुख मायावती की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चुनावी आंकड़े भी अखिलेश के दावे को मजबूती देते हैं और सपा के साथ गठबंधन करने वाले दलों को वास्तव में राजनीतिक फायदा मिला।

    अगर 2024 के लोकसभा चुनाव से शुरुआत करें तो तस्वीर काफी दिलचस्प नजर आती है। समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 62 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा और 37 सीटों पर जीत दर्ज की। यह उसके लिए बड़ी वापसी थी क्योंकि इससे पहले लगातार दो लोकसभा चुनाव में पार्टी महज पांच पांच सीटों पर सिमट गई थी। इसी चुनाव में कांग्रेस सपा के साथ गठबंधन में 17 सीटों पर मैदान में उतरी और छह सीटें जीतने में सफल रही। 2019 में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में सिर्फ एक सीट मिली थी। इस लिहाज से सपा के साथ गठबंधन के बाद उसके प्रदर्शन में बड़ा सुधार हुआ।

    2024 में जन अधिकार पार्टी को भी सपा के साथ गठबंधन का फायदा मिला। पार्टी के प्रमुख बाबू सिंह कुशवाहा को जौनपुर सीट से सपा के चुनाव चिह्न पर मैदान में उतारा गया और उन्होंने जीत दर्ज कर पहली बार लोकसभा का रास्ता तय किया। हालांकि तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी ललितेश पति त्रिपाठी भदोही से चुनाव हार गए और पार्टी का खाता नहीं खुल सका।

    अब 2019 के लोकसभा चुनाव पर नजर डालें तो सपा और बसपा ने लंबे अंतराल के बाद साथ चुनाव लड़ा था। बसपा ने 38 और सपा ने 37 सीटों पर चुनाव लड़ा। बसपा ने 10 सीटें जीतीं जबकि सपा के खाते में सिर्फ पांच सीटें आईं। खास बात यह थी कि 2014 में बसपा एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत पाई थी। इस लिहाज से 2019 में उसका प्रदर्शन बड़ी वापसी माना गया। हालांकि चुनाव परिणाम आने के बाद दोनों दलों का गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं चला और बसपा ने सपा से दूरी बना ली।

    2022 के विधानसभा चुनाव में भी सपा ने कई छोटे दलों को अपने साथ जोड़ा। जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोक दल ने 33 सीटों पर चुनाव लड़कर आठ सीटें जीतीं। 2017 में रालोद के खाते में सिर्फ एक सीट आई थी। इसी तरह ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने 19 सीटों पर चुनाव लड़कर छह सीटें जीतीं। हालांकि अपना दल कमेरावादी की पल्लवी पटेल को सिराथू से बड़ी जीत मिली लेकिन पार्टी का प्रदर्शन सीमित रहा। दूसरी ओर महान दल और जनवादी पार्टी समाजवादी गठबंधन के बावजूद कोई सीट नहीं जीत सके।

    2017 में सपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था लेकिन दोनों दलों को बड़ा फायदा नहीं मिला। सपा 298 सीटों पर चुनाव लड़कर सिर्फ 47 सीटें जीत सकी जबकि कांग्रेस 105 सीटों पर लड़कर सात सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस को 2012 की तुलना में 21 सीटों का नुकसान हुआ था।

    इन आंकड़ों को देखें तो 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव तथा 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन करने वाले कई बड़े दलों के प्रदर्शन में सुधार जरूर दिखाई देता है। हालांकि हर सहयोगी को समान सफलता नहीं मिली। कुछ दलों को सीटें मिलीं तो कुछ गठबंधन के बावजूद चुनावी जमीन मजबूत नहीं कर सके। यही वजह है कि अखिलेश के बयान को लेकर राजनीतिक बहस आंकड़ों के साथ साथ गठबंधन की रणनीति और सीट बंटवारे तक पहुंच गई है। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सपा और उसके संभावित सहयोगियों के बीच यह सियासी रिश्ता किस दिशा में जाता है।

  • सियासी लड़ाई ने लिया पारिवारिक विवाद का रूप: इमरान मसूद के दामाद पर मारपीट के आरोप, शायान बोले मैदान में आकर लड़ो

    सियासी लड़ाई ने लिया पारिवारिक विवाद का रूप: इमरान मसूद के दामाद पर मारपीट के आरोप, शायान बोले मैदान में आकर लड़ो


    सहारनपुर सहारनपुर में कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के परिवार का राजनीतिक विवाद अब पारिवारिक कलह तक पहुंचता दिखाई दे रहा है। इमरान मसूद के दामाद शायान मसूद के समाजवादी पार्टी में शामिल होने के बाद परिवार के भीतर चल रही तनातनी खुलकर सामने आ गई है। शनिवार को इमरान मसूद के भतीजे हमजा नोमान मसूद ने फेसबुक लाइव के जरिए अपने बहनोई शायान मसूद और उनके परिवार पर गंभीर आरोप लगाए। हमजा ने दावा किया कि उनकी बहन सुबिया मसूद के साथ मारपीट और गाली गलौज की गई तथा उन्हें घर से निकाल दिया गया। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

    हमजा नोमान मसूद का कहना है कि परिवार पिछले करीब पांच वर्षों से कई बातों को रिश्तेदारी और परिवार की प्रतिष्ठा के चलते नजरअंदाज करता रहा। उनका आरोप है कि उनकी बहन के साथ लगातार ज्यादती होती रही और अब हालात ऐसे हो गए हैं कि चुप रहना संभव नहीं है। उन्होंने दावा किया कि उनके पास घर के भीतर हुई बातचीत से जुड़ी कई रिकॉर्डिंग और वीडियो मौजूद हैं। हमजा ने चेतावनी दी कि अगर विवाद आगे बढ़ता रहा तो वह इन रिकॉर्डिंग को सार्वजनिक कर सकते हैं।

    हमजा ने राजनीतिक कारणों से भी अपनी बहन को परेशान किए जाने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि परिवार ने लंबे समय तक रिश्ते बचाने की कोशिश की लेकिन अब उनकी बहन और उसके छोटे बच्चे की जिम्मेदारी उनका परिवार उठा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि शायान ने बच्चे की जरूरतों के लिए भी आर्थिक मदद नहीं की। हमजा ने कहा कि उनकी बहन को किसी के सहारे की जरूरत नहीं है और परिवार उसके साथ मजबूती से खड़ा है।

    हमजा ने अपने बयान में यह भी दावा किया कि उनके पास ऐसी बातचीत और रिकॉर्डिंग हैं जिनमें उन्हें और उनके चाचा इमरान मसूद को राजनीतिक रूप से रास्ते से हटाने जैसी बातें कही गईं। हालांकि उन्होंने इन दावों के समर्थन में सार्वजनिक रूप से कोई रिकॉर्डिंग पेश नहीं की है। उनका कहना है कि वह अब तक परिवार की गरिमा बनाए रखने के लिए चुप रहे लेकिन लगातार हो रही बयानबाजी के बाद उन्हें सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखने के लिए मजबूर होना पड़ा।

    दूसरी तरफ शायान मसूद ने इन आरोपों के जवाब में इसे राजनीतिक विवाद से जोड़ते हुए हमजा को चुनौती दी। उनका कहना है कि अगर राजनीतिक लड़ाई लड़नी है तो राजनीतिक मैदान में आकर मुकाबला किया जाए। शायान ने कहा कि वह परिवार की निजी बातें सार्वजनिक करके विवाद को और बढ़ाना नहीं चाहते। उन्होंने दावा किया कि उनके पास भी बहुत कुछ कहने के लिए है लेकिन वह परिवार के भीतर की बातों को सार्वजनिक करना उचित नहीं समझते।

    दरअसल यह विवाद उस समय और बढ़ गया जब शायान मसूद ने 20 अगस्त को कांग्रेस छोड़कर समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। लखनऊ में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाई। सपा में शामिल होने के बाद शायान ने इमरान मसूद की राजनीतिक रणनीति पर भी सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि भाजपा को हराने के लिए भाजपा के खिलाफ राजनीतिक लड़ाई जरूरी है और अखिलेश यादव के खिलाफ बोलने से भाजपा को फायदा पहुंचता है।

    अब शायान के सपा में जाने के बाद शुरू हुआ राजनीतिक मतभेद परिवार के निजी विवाद तक पहुंच गया है। एक तरफ शायान इसे राजनीतिक मुकाबला बता रहे हैं तो दूसरी तरफ हमजा परिवार के भीतर गंभीर आरोपों को सार्वजनिक कर रहे हैं। फिलहाल दोनों पक्षों के आरोप और दावे सामने हैं और मामले में लगाए गए पारिवारिक आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है।

  • निलंबन के बाद धरने पर बैठे सपा विधायक सचिन यादव, वही पोस्टर दिखाकर बोले- सरकार चर्चा से भाग रही है

    निलंबन के बाद धरने पर बैठे सपा विधायक सचिन यादव, वही पोस्टर दिखाकर बोले- सरकार चर्चा से भाग रही है

    लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र से निलंबित किए गए समाजवादी पार्टी (सपा) के विधायक सचिन यादव बुधवार को विधानसभा परिसर में चौधरी चरण सिंह की प्रतिमा के पास धरने पर बैठ गए। इस दौरान उनके हाथ में वही पोस्टर था, जिसे सदन के भीतर दिखाने पर उनके खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की गई थी।

    धरने के दौरान सचिन यादव ने आरोप लगाया कि राम मंदिर चढ़ावा चोरी का मामला करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा है और जनता इस पर सरकार से जवाब चाहती है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहले कहा था कि “दूध का दूध और पानी का पानी” हो जाएगा, लेकिन अब तक आरोपियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। उनके अनुसार विपक्ष इस मुद्दे पर सदन में चर्चा चाहता है, जबकि सरकार इससे बच रही है।

    सचिन यादव के पास मौजूद पोस्टर में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तस्वीर के साथ उनके पुराने बयान का उल्लेख करते हुए सवाल किया गया था कि मामले में कार्रवाई का क्या हुआ।

    पोस्टर दिखाने पर हुआ था निलंबन
    मंगलवार को विधानसभा की कार्यवाही के दौरान सपा विधायक राम मंदिर चढ़ावा प्रकरण पर चर्चा कराने की मांग को लेकर नारेबाजी कर रहे थे। दोपहर बाद जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपना वक्तव्य दे रहे थे, तभी सचिन यादव ने मुख्यमंत्री की तस्वीर वाला पोस्टर सदन में लहराया।

    इस पर विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने कड़ी आपत्ति जताई और पहले चेतावनी दी। पोस्टर हटाने से इनकार करने पर सचिन यादव को सदन से निलंबित कर दिया गया। इसके बाद सदन में हंगामा बढ़ गया और कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी।

    बुधवार को भी नहीं चल सकी कार्यवाही
    बुधवार को भी विधानसभा में विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच गतिरोध बना रहा। हंगामे के कारण कार्यवाही पहले आधे घंटे के लिए और बाद में दोपहर एक बजे तक स्थगित करनी पड़ी। विपक्ष लगातार राम मंदिर चढ़ावा मामले पर चर्चा की मांग करता रहा, जबकि सदन की कार्यवाही बाधित होती रही।

  • मेरठ दक्षिण सीट पर सपा में टिकट की जंग तेज, कई दावेदारों के बीच किस पर लगेगी मुहर?

    मेरठ दक्षिण सीट पर सपा में टिकट की जंग तेज, कई दावेदारों के बीच किस पर लगेगी मुहर?


    मेरठ। मेरठ दक्षिण विधानसभा सीट समाजवादी पार्टी के लिए इस बार सबसे चुनौतीपूर्ण सीटों में शामिल हो गई है। जिले की सात विधानसभा सीटों में सबसे अधिक टिकट दावेदार इसी सीट से सामने आए हैं। ऐसे में पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसा उम्मीदवार चुनने की है, जो संगठन और चुनावी समीकरण-दोनों पर खरा उतर सके। टिकट की दौड़ में शामिल नेता लगातार लखनऊ का रुख कर रहे हैं और अपनी-अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं। इससे पार्टी के भीतर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है।

    इन नेताओं के नाम सबसे आगे
    मेरठ दक्षिण से टिकट के प्रमुख दावेदारों में सपा महानगर अध्यक्ष आदिल चौधरी का नाम सबसे प्रमुख माना जा रहा है। वह इस सीट से दो बार चुनाव लड़ चुके हैं। हालांकि दोनों बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा प्रत्याशी सोमेंद्र तोमर को कड़ी टक्कर दी थी। उस चुनाव में आदिल को 1,21,725 वोट मिले थे और वे केवल 7,942 मतों से चुनाव हारे थे।

    इसके अलावा जिलाध्यक्ष कर्मवीर सिंह गुमी, डॉ. किशन पाल गुर्जर, मुखिया गुर्जर और जितेंद्र गुर्जर भी टिकट के लिए प्रयासरत बताए जा रहे हैं। वहीं, यदि पूर्व विधायक योगेश वर्मा को हस्तिनापुर सीट से टिकट नहीं मिलता है, तो मेरठ दक्षिण से उनकी दावेदारी भी मजबूत मानी जा रही है।

    गठबंधन की स्थिति भी बनेगी अहम
    राजनीतिक चर्चाओं के बीच कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के संभावित गठबंधन की भी चर्चा है। यदि गठबंधन होता है तो कांग्रेस भी इस सीट पर अपनी दावेदारी पेश कर सकती है। हाल ही में पूर्व सांसद अवतार सिंह भड़ाना की मौजूदगी को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

    गुटबाजी का खतरा भी बरकरार
    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टिकट के लिए बड़ी संख्या में दावेदार होना संगठन की मजबूती का संकेत जरूर है, लेकिन इससे अंदरूनी खींचतान और गुटबाजी का खतरा भी बढ़ सकता है। यदि टिकट वितरण के बाद असंतोष उभरता है तो चुनावी मुकाबले में इसका नुकसान पार्टी को उठाना पड़ सकता है।

    किसके पक्ष में जा सकते हैं समीकरण?
    जानकारों के मुताबिक, टिकट उसी उम्मीदवार को मिलने की संभावना अधिक है, जो जातीय और सामाजिक समीकरणों के साथ संगठन में भी मजबूत पकड़ रखता हो। मेरठ दक्षिण में मुस्लिम, दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के मतदाता चुनाव परिणाम तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    इसी वजह से ऐसे चेहरे को प्राथमिकता मिल सकती है, जो विभिन्न वर्गों में स्वीकार्यता रखता हो, संगठन के भीतर मजबूत समर्थन हो और विवादों से दूर रहा हो। मौजूदा चर्चाओं में आदिल चौधरी और योगेश वर्मा को मजबूत दावेदारों के रूप में देखा जा रहा है, हालांकि अंतिम फैसला पार्टी हाईकमान के हाथ में है।

  • अखिलेश के CM बनने की कामना, 201 लीटर गंगाजल की कांवड़ लेकर पैदल निकले बॉबी यादव

    अखिलेश के CM बनने की कामना, 201 लीटर गंगाजल की कांवड़ लेकर पैदल निकले बॉबी यादव

    गाजियाबाद। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने की मनोकामना को लेकर रेसलिंग खिलाड़ी बॉबी यादव हरिद्वार से 201 लीटर गंगाजल की कांवड़ लेकर पैदल यात्रा पर निकले हैं। शुक्रवार को वह अपने साथियों के साथ मुरादनगर पहुंचे, जहां कांवड़ियों ने स्थानीय थाने में विश्राम किया और उनका स्वागत किया गया।

    नोएडा के सर्फाबाद निवासी बॉबी यादव ने बताया कि उन्होंने एक जुलाई को अखिलेश यादव के जन्मदिन के अवसर पर हरिद्वार से गंगाजल उठाया था। उन्होंने विशेष संकल्प के साथ यह कांवड़ यात्रा शुरू की है और पैदल चलते हुए अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे हैं।

    साथियों के साथ जारी है यात्रा
    बॉबी यादव के साथ इस यात्रा में रिंकू, मोनू, हर्ष, राज, लविश समेत कई साथी भी शामिल हैं। यात्रा के दौरान यह दल विभिन्न स्थानों पर पड़ाव डालते हुए आगे बढ़ रहा है। रास्ते में स्थानीय लोगों और समर्थकों की ओर से उनका स्वागत और सत्कार भी किया जा रहा है।

    आस्था और संकल्प का प्रतीक
    बॉबी यादव का कहना है कि यह कांवड़ यात्रा उनकी धार्मिक आस्था और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है। उनका विश्वास है कि भगवान शिव की कृपा से उनकी मनोकामना पूरी होगी और वे इसी भावना के साथ गंगाजल अर्पित करने की यात्रा पूरी कर रहे हैं।
  • यूपी चुनाव से पहले 'जयंती राजनीति' तेज, भाजपा-सपा महापुरुषों के जरिए साध रहीं जातीय समीकरण

    यूपी चुनाव से पहले 'जयंती राजनीति' तेज, भाजपा-सपा महापुरुषों के जरिए साध रहीं जातीय समीकरण

    मुरादाबाद। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दलों ने जातीय और सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है। भाजपा और समाजवादी पार्टी (सपा) अपने-अपने परंपरागत वोट बैंक को साधने के लिए संतों, समाज सुधारकों और महापुरुषों की जयंती व पुण्यतिथि पर बड़े पैमाने पर कार्यक्रम आयोजित कर रही हैं। इसके लिए दोनों दलों ने प्रदेशभर में लंबे अभियान और आयोजनों की रूपरेखा तैयार की है।

    भाजपा ने संत रविदास महाराज की जयंती को केंद्र में रखकर करीब सात महीने तक चलने वाला ‘समरसता संकल्प अभियान’ शुरू करने का फैसला किया है। वहीं, पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति पर आगे बढ़ रही सपा बुधवार को पूरे प्रदेश में महाराजा दक्ष प्रजापति की जयंती पर जिला और महानगर स्तर पर कार्यक्रम आयोजित कर रही है।

    महापुरुषों के जरिए सामाजिक संदेश देने की तैयारी
    हाल के महीनों में डॉ. भीमराव आंबेडकर और लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की जयंती पर भी सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने व्यापक स्तर पर आयोजन किए थे। अब भाजपा ने संत रविदास महाराज के जीवन और विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से 29 जुलाई (गुरु पूर्णिमा) से 20 फरवरी 2027 (संत रविदास जयंती) तक विशेष अभियान चलाने की घोषणा की है।

    इस अभियान के दौरान धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ जनसंपर्क गतिविधियों के माध्यम से समता, सामाजिक न्याय, सेवा और मानवता के संदेश का प्रचार किया जाएगा।

    सपा भी जयंती आयोजनों पर दे रही जोर
    समाजवादी पार्टी भी विभिन्न समाजों के महापुरुषों की जयंती और पुण्यतिथि पर कार्यक्रम आयोजित कर अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश में जुटी है। इसी क्रम में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर महाराजा दक्ष प्रजापति जयंती मनाई जा रही है। इसके बाद 5 अगस्त को पार्टी संस्थापक नेताओं में शामिल जनेश्वर मिश्र की जयंती पर भी परंपरागत कार्यक्रम होंगे।

    भाजपा करेगी पुजारियों का सम्मान
    गुरु पूर्णिमा के अवसर पर भाजपा महानगर इकाई शहर के सभी दस मंडलों में कार्यक्रम आयोजित करेगी। महानगर अध्यक्ष गिरीश भंडूला के अनुसार, इस दौरान शहर के 100 मंदिरों के पुजारियों का सम्मान किया जाएगा। इसके लिए पार्टी पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं।

    पांच महीनों में सपा के कई आयोजन
    मार्च से जुलाई के बीच सपा ने विभिन्न महापुरुषों की जयंती और पुण्यतिथि पर करीब 11 कार्यक्रम आयोजित किए। इनमें कांशीराम, सम्राट अशोक, महर्षि कश्यप, महाराजा निषादराज गुहा, महात्मा ज्योतिराव फुले, डॉ. भीमराव आंबेडकर, अहिल्याबाई होल्कर, महारानी दुर्गावती, छत्रपति साहूजी महाराज, बाबा लक्खी शाह बंजारा और फूलन देवी से जुड़े आयोजन शामिल रहे।

    भाजपा के प्रमुख आयोजन
    भाजपा ने भी इस वर्ष नेताजी सुभाष चंद्र बोस, डॉ. भीमराव आंबेडकर, अहिल्याबाई होल्कर और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सहित कई महापुरुषों की जयंती और स्मृति कार्यक्रमों का आयोजन किया। आंबेडकर जयंती के अवसर पर दीपोत्सव, प्रतिमा स्वच्छता अभियान और सम्मान कार्यक्रम भी आयोजित किए गए।

    कार्यकर्ताओं से जुड़ाव पर भी जोर
    चुनावी तैयारियों के बीच जनप्रतिनिधि और पार्टी पदाधिकारी संगठन के कार्यकर्ताओं से व्यक्तिगत स्तर पर जुड़ाव बढ़ाने की भी कोशिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर कार्यकर्ताओं के जन्मदिन और वैवाहिक वर्षगांठ की शुभकामनाओं के साथ-साथ उनके कार्यक्रमों में व्यक्तिगत उपस्थिति दर्ज कराकर संगठनात्मक संबंध मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

  • चढ़ावा गबन मामले पर गरमाई सियासत, पवन पांडेय बोले- 'बुलडोजर नहीं चला, न्याय में भी दो आंख'

    चढ़ावा गबन मामले पर गरमाई सियासत, पवन पांडेय बोले- 'बुलडोजर नहीं चला, न्याय में भी दो आंख'


    अयोध्या। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़े कथित चढ़ावा गबन मामले को लेकर राजनीतिक बयानबाजी लगातार जारी है। समाजवादी पार्टी के पूर्व मंत्री पवन पांडेय ने एक बार फिर इस मुद्दे पर भाजपा सरकार और ट्रस्ट के पदाधिकारियों पर निशाना साधते हुए तीखी टिप्पणी की। उन्होंने आरोप लगाया कि मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे में कथित अनियमितताओं ने करोड़ों लोगों की आस्था को ठेस पहुंचाई है।

    पवन पांडेय ने कहा कि इतिहास में महमूद गजनवी पर कई बार मंदिरों को लूटने के आरोप लगाए जाते हैं, लेकिन उनके अनुसार राम मंदिर चढ़ावा मामले में जिस तरह की कथित घटनाएं सामने आई हैं, वे उससे भी अधिक गंभीर हैं। उन्होंने कहा, “40 दिनों में 70 बार लूटा, इन्होंने तो लूटने में गजनवी को भी पीछे छोड़ दिया।”

    उन्होंने आगे आरोप लगाया कि जिन लोगों पर राम मंदिर की व्यवस्था, सुरक्षा और श्रद्धालुओं के चढ़ावे की जिम्मेदारी थी, वही लोग कथित तौर पर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में विफल रहे। उनके अनुसार यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल आर्थिक अनियमितता नहीं बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास के साथ विश्वासघात है।

    पूर्व मंत्री ने उत्तर प्रदेश सरकार पर भी निशाना साधते हुए कहा कि सरकार अपराधों पर सख्त कार्रवाई का दावा करती है, लेकिन इस मामले में वैसी कठोर कार्रवाई दिखाई नहीं दी। उन्होंने कहा कि यदि यह इतना बड़ा मामला है तो निष्पक्ष और तेज जांच होनी चाहिए तथा दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।

    पवन पांडेय ने कहा कि भगवान श्रीराम का मंदिर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और करोड़ों लोगों की आस्था के आधार पर बना है। ऐसे में यदि मंदिर के चढ़ावे से जुड़े किसी भी प्रकार के आरोप सामने आते हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होना बेहद आवश्यक है, ताकि श्रद्धालुओं का विश्वास कायम रह सके।

    राम मंदिर चढ़ावा मामले को लेकर पहले भी विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की ओर से जांच की मांग उठाई जा चुकी है। मामले में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद जांच एजेंसियां अपनी कार्रवाई कर रही हैं। हालांकि आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही होगी।

  • सपा में जल्द हो सकता है बड़ा राजनीतिक बदलाव, ओपी राजभर के दावों ने अटकलों को दी हवा

    सपा में जल्द हो सकता है बड़ा राजनीतिक बदलाव, ओपी राजभर के दावों ने अटकलों को दी हवा

    लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी (सपा) के भीतर संभावित टूट को लेकर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) प्रमुख और एनडीए सहयोगी ओमप्रकाश राजभर के लगातार दावों ने इस चर्चा को और हवा दे दी है कि सपा में जल्द बड़ा राजनीतिक बदलाव देखने को मिल सकता है।

    राजभर ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए दावा किया कि सपा के भीतर असंतोष बढ़ रहा है और इसका असर जल्द सामने आएगा। उनके अनुसार, सपा के ‘बागी सांसदों’ के समूह का नेतृत्व उत्तर प्रदेश के उस क्षेत्र का एक नेता करेगा, जिसे वह ‘बागी भूमि’ कहते हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हाल ही में सपा कार्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम को लेकर कुछ वर्गों में नाराजगी बढ़ी है, जिससे पार्टी के अंदर असंतोष और गहरा गया है।

    राजभर ने अपने बयान में यह भी कहा कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव को अब “सांसद बचाओ अभियान” शुरू करना चाहिए और नाराज सांसदों से मिलकर स्थिति संभालनी चाहिए। उन्होंने दावा किया कि पार्टी के भीतर कई सांसद असंतुष्ट हैं और समय के साथ बड़ा बदलाव सामने आ सकता है।

    अखिलेश यादव का पलटवार
    राजभर के इन बयानों पर समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि भविष्य की भविष्यवाणी करने वालों को पहले अपनी पार्टी की स्थिति देखनी चाहिए। अखिलेश ने एनडीए सहयोगियों पर सीट बंटवारे को लेकर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया और कहा कि भाजपा गठबंधन के भीतर असंतोष की वास्तविकता को छिपाने की कोशिश की जा रही है।

    राजभर का जवाब और तीखी बयानबाजी
    अखिलेश की प्रतिक्रिया के बाद ओमप्रकाश राजभर ने एक और पोस्ट में अपने हमले और तेज कर दिए। उन्होंने कहा कि पहले उन्हें लगता था कि अखिलेश यादव राजनीतिक रूप से अधिक समझदार हैं, लेकिन अब उनकी यह धारणा बदल गई है। राजभर ने दावा किया कि सपा के अंदरूनी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और आने वाले समय में कई चौंकाने वाले घटनाक्रम सामने आ सकते हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वे भविष्य में कुछ और राजनीतिक खुलासे कर सकते हैं।

    पुराने मुद्दों का भी जिक्र
    अपने बयान में राजभर ने 2008 के चर्चित ‘वोट के बदले नोट’ प्रकरण का भी उल्लेख किया और उस दौर की राजनीति पर सवाल उठाए। हालांकि उन्होंने अपने आरोपों के समर्थन में कोई नया प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया।

  • मैनपुरी में बड़ा राजनीतिक-सांस्कृतिक दृश्य: डिंपल यादव ने शंकराचार्य के सामने टेका माथा, मांगी माफी

    मैनपुरी में बड़ा राजनीतिक-सांस्कृतिक दृश्य: डिंपल यादव ने शंकराचार्य के सामने टेका माथा, मांगी माफी


    उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में शुक्रवार को एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने राजनीतिक और धार्मिक दोनों ही हलकों में चर्चा तेज कर दी। बद्रीनाथ स्थित ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपनी गौ रक्षा यात्रा के तहत जिले में पहुंचे थे। इसी दौरान समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव उनसे मिलने पहुंचीं और उनके चरणों में नतमस्तक होकर आशीर्वाद प्राप्त किया।

    कार्यक्रम के दौरान डिंपल यादव ने शंकराचार्य को शॉल भेंट की और जमीन पर बैठकर उनसे बातचीत की। इस मुलाकात में उन्होंने सबसे पहले कन्नौज की उस घटना का जिक्र किया, जिसमें शंकराचार्य को कथित तौर पर रात सड़क पर गुजारनी पड़ी थी। डिंपल यादव ने इस घटना को लेकर खेद जताते हुए माफी भी मांगी और कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उन्हें ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा।

    डिंपल यादव ने शंकराचार्य के गौ माता को राष्ट्रमाता घोषित करने के अभियान का समर्थन करते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव इस मुद्दे पर उनके साथ हैं और आगे भी सहयोग करते रहेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि जिस तरह से शंकराचार्य का अपमान हुआ है, वह पूरे देश के लिए चिंता का विषय है। अपने बयान में डिंपल यादव ने कहा कि “प्रकृति ऐसे अपमान का जवाब जरूर देती है।”

    मुलाकात के दौरान शंकराचार्य ने भी अपनी यात्रा और गौ रक्षा आंदोलन की बात दोहराई। उन्होंने कहा कि उनका संकल्प गौ माता को राष्ट्रमाता का दर्जा दिलाने का है और जब तक इसे संवैधानिक मान्यता नहीं मिलती, उनका आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने यह भी बताया कि यात्रा के दौरान कई स्थानों पर प्रशासनिक परेशानियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उनका अभियान नहीं रुकेगा।

    करीब एक घंटे चली इस मुलाकात के बाद शंकराचार्य किशनी के लिए रवाना हो गए। इससे पहले वे सपा नेता और पूर्व विधायक राजकुमार यादव के मैरिज हॉल में ठहरे हुए थे। बातचीत के दौरान डिंपल यादव ने यह भी कहा कि अखिलेश यादव को इस पूरे घटनाक्रम का दुख है और यदि उन्हें जानकारी होती तो बेहतर व्यवस्थाएं की जातीं।

    इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस को जन्म दे दिया है। एक ओर इसे धार्मिक संत के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे राजनीतिक संदेश के तौर पर भी समझा जा रहा है।

    कुछ महीने पहले ही लखनऊ में अखिलेश यादव ने भी शंकराचार्य से मुलाकात की थी, जहां वह उनके सामने जमीन पर बैठे नजर आए थे। उसी मुलाकात के बाद से दोनों के बीच संवाद और धार्मिक मुद्दों पर चर्चा लगातार सुर्खियों में बनी हुई है।

    मैनपुरी की यह मुलाकात अब सिर्फ एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत के रूप में भी देखी जा रही है, जिस पर आगे भी चर्चाएं तेज रहने की संभावना है।

  • रामचरितमानस पर सपा का बदला रुख: अखिलेश यादव ने इसे बताया ‘सांस्कृतिक संविधान’, यूपी की राजनीति में फिर गरमाई बहस

    रामचरितमानस पर सपा का बदला रुख: अखिलेश यादव ने इसे बताया ‘सांस्कृतिक संविधान’, यूपी की राजनीति में फिर गरमाई बहस




    लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर रामचरितमानस को लेकर समाजवादी पार्टी का रुख चर्चा में है। लोकसभा चुनाव से पहले जिस मुद्दे पर सपा के भीतर विवाद और राजनीतिक टकराव देखने को मिला था, अब उसी पर पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव का रुख काफी नरम और अलग नजर आ रहा है।

    हाल ही में लखनऊ में अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान एक वकील के साथ हुई मारपीट की घटना के बाद मामला फिर सुर्खियों में आया। बताया गया कि वकील के हाथ में रामचरितमानस की प्रति थी। इसी घटना के बाद अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए रामचरितमानस को “सांस्कृतिक संविधान का एक रूप” और “नैतिक आचार संहिता” बताया, जिससे राजनीतिक हलकों में नई बहस छिड़ गई है।

    पहले विवाद, अब नया रुख
    लोकसभा चुनाव 2024 से पहले समाजवादी पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्य ने रामचरितमानस के कुछ दोहों को लेकर विवादित बयान दिया था। उन्होंने इन दोहों को महिलाओं, दलितों और पिछड़ों के प्रति अपमानजनक बताते हुए उन्हें हटाने की मांग की थी। इस बयान के बाद बीजेपी ने सपा पर तीखा हमला बोला था और मामला राजनीतिक रूप से काफी गरमा गया था।

    बाद में यह विवाद इतना बढ़ा कि स्वामी प्रसाद मौर्य ने समाजवादी पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। उस समय अखिलेश यादव ने इस पूरे विवाद पर खुलकर कोई सख्त रुख नहीं अपनाया था, लेकिन अब उनका बदला हुआ स्टैंड राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।

    चुनावी रणनीति या जनभावना का असर?
    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगले विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी अपनी छवि को व्यापक जनसमर्थन के अनुरूप ढालने की कोशिश कर रही है। रामचरितमानस जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर नरम रुख अपनाकर सपा आम मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है।

    वहीं बीजेपी का आरोप है कि सपा राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए अब धार्मिक प्रतीकों का सहारा ले रही है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि जो लोग पहले भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल उठाते रहे हैं, वे अब धार्मिक ग्रंथों का सम्मान दिखा रहे हैं।

    विपक्ष और सहयोगी दलों की प्रतिक्रिया
    इस मुद्दे पर कांग्रेस ने अखिलेश यादव के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि रामचरितमानस भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का हिस्सा है और इसे राजनीति से अलग रखकर देखा जाना चाहिए। वहीं बसपा ने इस पूरे मामले पर टिप्पणी से दूरी बनाए रखी है।

    यूपी की सियासत में नया मोड़
    रामचरितमानस को लेकर सपा के बदले सुर ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सांस्कृतिक और धार्मिक विमर्श को केंद्र में ला दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले चुनावों में यह मुद्दा सियासी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।फिलहाल यह साफ है कि यूपी की राजनीति में धर्म और संस्कृति एक बार फिर रणनीतिक बहस का बड़ा हिस्सा बनते जा रहे हैं।