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  • स्टारलिंक विवाद में कमल हासन की एंट्री, मस्क को सुनाई खरी-खरी, कंगना रनौत बोलीं- तीखा और सटीक जवाब

    स्टारलिंक विवाद में कमल हासन की एंट्री, मस्क को सुनाई खरी-खरी, कंगना रनौत बोलीं- तीखा और सटीक जवाब


    नई दिल्ली । भारत में स्टारलिंक की लॉन्चिंग और लाइसेंसिंग प्रक्रिया को लेकर छिड़ी बहस अब राजनीतिक और मनोरंजन जगत तक पहुंच गई है। दुनिया के चर्चित अरबपति एलन मस्क की ओर से भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवा को मंजूरी मिलने में देरी पर सवाल उठाए जाने के बाद अभिनेता और राज्यसभा सांसद कमल हासन ने उन्हें दोटूक जवाब दिया है। हासन ने भारत की नियामक स्वतंत्रता का समर्थन करते हुए साफ कहा कि किसी भी देश की नीतियां किसी अरबपति के दबाव में तय नहीं होनी चाहिए। उनकी इस टिप्पणी को अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनौत का भी समर्थन मिला है। कंगना ने हासन की बातों की तारीफ करते हुए उनके जवाब को तीखा सटीक और व्यंग्यात्मक बताया।
    कंगना रनौत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कमल हासन की पोस्ट पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा कि यह बात चुभने वाली है और किसी भी अरबपति को भारत या अमेरिका जैसे देशों की नीतियां तय नहीं करनी चाहिए। कंगना ने हासन की बातों से सहमति जताते हुए कहा कि उन्होंने अपनी बात बेहद प्रभावशाली तरीके से रखी है। इस प्रतिक्रिया के बाद स्टारलिंक लाइसेंसिंग विवाद में कंगना की एंट्री ने चर्चा को और तेज कर दिया है। आमतौर पर राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखने वाली कंगना ने इस बार भारत के नीतिगत अधिकारों के समर्थन में कमल हासन का साथ दिया है।
    कमल हासन ने अपने बयान में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और राष्ट्रीय स्वायत्तता पर जोर दिया। उन्होंने एलन मस्क को संबोधित करते हुए कहा कि किसी भी अरबपति को किसी देश की नीति तय करने का अधिकार नहीं होना चाहिए फिर चाहे वह भारत हो या अमेरिका। हासन के मुताबिक भारत एक लोकतंत्र है और कोई कॉलोनी नहीं है। देश अपने भविष्य से जुड़े फैसले खुद लेने में सक्षम है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत दुनिया के लिए अपने दरवाजे खुले रखता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि विदेशी कारोबारी हित या दूसरे देशों के दोहरे मापदंड भारत की नीतियों को प्रभावित करें।
    हासन ने सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के मामले में प्रतिस्पर्धा और किफायती कनेक्टिविटी की जरूरत पर भी जोर दिया। उनका मानना है कि अंतरराष्ट्रीय कंपनियों का स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से किसी तरह का समझौता नहीं होना चाहिए। भारत जैसे बड़े देश में दूरदराज के इलाकों तक इंटरनेट पहुंचाना महत्वपूर्ण है जहां पारंपरिक ब्रॉडबैंड सेवाओं का विस्तार सीमित है। ऐसे में नई तकनीक और कंपनियां लोगों के लिए बेहतर विकल्प उपलब्ध करा सकती हैं। हालांकि इसके लिए निर्धारित नियमों और सुरक्षा मानकों का पालन करना भी जरूरी है।
    दरअसल एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक भारत में अपनी सेवाएं शुरू करने के लिए नियामकीय मंजूरी की प्रक्रिया से गुजर रही है। मस्क ने लाइसेंस मिलने में हो रही देरी पर सवाल उठाए थे और दूसरे देशों में सेवा को मिली मंजूरी का हवाला दिया था। भारत में किसी भी दूरसंचार सेवा को शुरू करने के लिए संबंधित नियमों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी शर्तों को पूरा करना आवश्यक है। स्टारलिंक लो अर्थ ऑर्बिट में मौजूद उपग्रहों के जरिए इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराती है और इसका उद्देश्य उन क्षेत्रों तक भी इंटरनेट पहुंचाना है जहां सामान्य नेटवर्क का विस्तार मुश्किल है।
    इस पूरे विवाद ने एक बार फिर तकनीकी निवेश विदेशी कंपनियों की भूमिका राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की नीतिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन की बहस को सामने ला दिया है। कमल हासन के बयान और कंगना रनौत के समर्थन के बाद यह मुद्दा केवल इंटरनेट सेवा तक सीमित नहीं रहा बल्कि इस बात पर भी चर्चा शुरू हो गई है कि वैश्विक कंपनियों के लिए बाजार खोलते समय राष्ट्रीय हितों की रक्षा कैसे की जाए।
  • एलन मस्क ने राहुल गांधी को कहा थैंक्यू, स्टारलिंक लाइसेंस पर उठाए सवाल; भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवा को लेकर बढ़ी चर्चा

    एलन मस्क ने राहुल गांधी को कहा थैंक्यू, स्टारलिंक लाइसेंस पर उठाए सवाल; भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवा को लेकर बढ़ी चर्चा

    नई दिल्ली: अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के बीच भारत में स्टारलिंक की सेवाओं को लेकर सोशल मीडिया पर बातचीत हुई है। राहुल गांधी के जवाब पर मस्क ने प्रतिक्रिया देते हुए उन्हें धन्यवाद कहा और मामले को चिंताजनक बताया। मस्क ने इससे पहले सवाल उठाया था कि उनकी कंपनी स्टारलिंक को 165 से अधिक देशों में लाइसेंस मिल चुका है और वह पिछले पांच वर्षों से भारत सरकार के कानूनों तथा आवश्यकताओं का पालन करने की बात कह रही है, इसके बावजूद भारत में उसे अब तक लाइसेंस क्यों नहीं मिला है। राहुल गांधी ने जवाब में लिखा था कि एलन मस्क का भारत में स्वागत है और दूसरे व्यक्ति से मिलने पर उन्हें इस मामले के बारे में और जानकारी मिलेगी। हालांकि, राहुल गांधी ने अपने संदेश में किसी व्यक्ति का नाम नहीं लिया। इस बातचीत के बाद भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं की शुरुआत और कंपनियों के लिए लागू नियमों को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

    मस्क ने राहुल गांधी के संदेश के जवाब में कहा कि यह स्थिति वास्तव में चिंताजनक है। इससे पहले भी वह भारत में स्टारलिंक की सेवाओं को लेकर सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने आरोप लगाया था कि कुछ प्रभावशाली समूह भारतीय बाजार में अपनी एकाधिकार वाली स्थिति बनाए रखने के लिए उनकी कंपनी को रोक रहे हैं। मस्क ने इस कथित रोक को भारतीय लोगों के हितों के खिलाफ बताया था। हालांकि, भारत सरकार ने इन आरोपों पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि देश में दूरसंचार सेवाओं के लिए निष्पक्ष और बिना भेदभाव वाली नियामकीय व्यवस्था लागू है। स्टारलिंक, स्पेसएक्स की उपग्रह आधारित इंटरनेट सेवा है, जो सैटेलाइट के माध्यम से इंटरनेट उपलब्ध कराने की योजना पर काम कर रही है। कंपनी भारतीय बाजार में सेवाएं शुरू करने के लिए जरूरी प्रक्रियाएं पूरी कर रही है। इस बीच लाइसेंस, स्पेक्ट्रम आवंटन और सुरक्षा संबंधी मंजूरियों को लेकर अलग-अलग पक्षों के बयान सामने आए हैं।

    स्टारलिंक की ओर से भारतीय बाजार में प्रवेश की तैयारियों को लेकर भी जानकारी दी गई है। कंपनी की अधिकारी लॉरेन ड्रेयर ने कहा था कि भारत में सेवा शुरू करने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे की तैयारी में निवेश किया गया है। कंपनी भारत में अपनी उपग्रह आधारित इंटरनेट सेवा उपलब्ध कराने के लिए तैयार होने की बात कह चुकी है। हालांकि, सेवा शुरू करने के लिए केवल लाइसेंस मिलना पर्याप्त नहीं है। संबंधित कंपनियों को स्पेक्ट्रम आवंटन और सुरक्षा मंजूरी जैसी आवश्यक प्रक्रियाएं भी पूरी करनी होंगी। भारत में उपग्रह संचार सेवाओं के क्षेत्र में स्टारलिंक के अलावा जियो सैटकॉम और यूटेलसैट वनवेब भी मौजूद हैं। इन कंपनियों को देश में सेवाएं शुरू करने के लिए लाइसेंस दिए जा चुके हैं। इसके बावजूद व्यावसायिक स्तर पर सेवा शुरू करने से पहले निर्धारित नियामकीय और सुरक्षा शर्तों का पालन करना जरूरी है। इसी वजह से लाइसेंस मिलने और सेवाओं के वास्तविक संचालन के बीच अंतर बना हुआ है।

    भारत सरकार ने मस्क के आरोपों के जवाब में कहा है कि देश में सैटेलाइट संचार समेत सभी दूरसंचार सेवाओं के लिए निष्पक्ष व्यवस्था लागू है। सरकार के अनुसार, नियामकीय नियमों या उन्हें लागू करने की प्रक्रिया को अनुचित बताना सही नहीं है। दूरसंचार सेवाओं के लिए निर्धारित लाइसेंस शर्तों के तहत प्रत्येक उपग्रह संचार कंपनी को सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं के पालन की पुष्टि करनी होती है। इन शर्तों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सेवाएं निर्धारित नियमों के अनुसार संचालित हों। सरकार ने स्पष्ट किया है कि नियम किसी एक कंपनी को ध्यान में रखकर नहीं बनाए गए हैं, बल्कि सभी संबंधित कंपनियों पर लागू होते हैं।

    संचार राज्यमंत्री चंद्रशेखर पेम्मासानी ने भी इस मामले पर जानकारी देते हुए कहा कि सैटेलाइट संचार सेवाओं से जुड़े सुरक्षा मुद्दों पर गृह मंत्रालय विचार कर रहा है। आवश्यक मंजूरी मिलने के बाद कंपनियों को सेवाएं शुरू करने की अनुमति दी जाएगी। उन्होंने बताया कि दूरसंचार विभाग ने सैटेलाइट संचार कंपनियों को लाइसेंस देने के साथ अस्थायी स्पेक्ट्रम भी आवंटित किया है। उनके अनुसार, इस प्रक्रिया का संबंध किसी एक कंपनी से नहीं है। ऐसे में स्टारलिंक की भारत में शुरुआत का मामला कंपनी की तैयारियों के साथ सुरक्षा मंजूरी और अन्य नियामकीय आवश्यकताओं पर भी निर्भर करता है।

  • डिजिटल दुनिया में नया धमाका करने की तैयारी, सैटेलाइट इंटरनेट सेक्टर में उतर सकती है रिलायंस

    डिजिटल दुनिया में नया धमाका करने की तैयारी, सैटेलाइट इंटरनेट सेक्टर में उतर सकती है रिलायंस

    नई दिल्ली। भारत में इंटरनेट सेवाओं के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। टेलीकॉम सेक्टर में मजबूत पकड़ बनाने के बाद अब रिलायंस सैटेलाइट इंटरनेट की दुनिया में भी बड़ी तैयारी करती दिखाई दे रही है। माना जा रहा है कि कंपनी लो अर्थ ऑर्बिट यानी LEO सैटेलाइट तकनीक के जरिए देशभर में हाई-स्पीड इंटरनेट पहुंचाने की दिशा में काम कर रही है।

    सैटेलाइट इंटरनेट ऐसी तकनीक है जिसमें इंटरनेट सेवा के लिए मोबाइल टावर या फाइबर केबल की जरूरत नहीं पड़ती। इंटरनेट सीधे अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट्स के जरिए यूजर्स तक पहुंचाया जाता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि जिन इलाकों में नेटवर्क पहुंचाना मुश्किल होता है, वहां भी आसानी से इंटरनेट सेवा उपलब्ध कराई जा सकती है।

    पहाड़ी क्षेत्रों, गांवों, जंगलों और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए यह तकनीक काफी उपयोगी साबित हो सकती है। जहां आज भी कमजोर नेटवर्क या इंटरनेट की समस्या बनी रहती है, वहां हाई-स्पीड कनेक्टिविटी पहुंचने की संभावना बढ़ जाएगी। इससे ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल पेमेंट, वीडियो कॉलिंग और छोटे कारोबारों को भी मजबूती मिलेगी।

    LEO सैटेलाइट धरती के अपेक्षाकृत करीब रहते हैं, जिससे इंटरनेट सिग्नल तेजी से ट्रांसफर होता है और नेटवर्क में देरी काफी कम हो जाती है। यही कारण है कि इसे भविष्य की इंटरनेट तकनीक माना जा रहा है। वीडियो स्ट्रीमिंग, गेमिंग और लाइव कम्युनिकेशन जैसी सेवाएं भी इससे ज्यादा बेहतर तरीके से काम कर सकती हैं।

    बताया जा रहा है कि इस प्रोजेक्ट के लिए कई स्तरों पर तैयारियां शुरू हो चुकी हैं और कंपनी इसे अपने डिजिटल कारोबार के अगले बड़े कदम के रूप में देख रही है। आने वाले समय में यह तकनीक भारत के इंटरनेट सेक्टर में नई प्रतिस्पर्धा भी पैदा कर सकती है।

    फिलहाल सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं शुरुआती चरण में हैं और इससे जुड़े कई नियम व प्रक्रियाएं अभी पूरी की जानी बाकी हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने के बाद इसकी कीमतें धीरे-धीरे आम लोगों की पहुंच में आ सकती हैं।