Tag: Saudi Arabia

  • सऊदी-पाक-तुर्की के ‘मक्का पैक्ट’ में ईरान की एंट्री? न्योता मिलने की खबर से पश्चिम एशिया में हलचल

    सऊदी-पाक-तुर्की के ‘मक्का पैक्ट’ में ईरान की एंट्री? न्योता मिलने की खबर से पश्चिम एशिया में हलचल


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आने की खबर है। ईरान को सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए ‘मक्का पैक्ट’ में शामिल होने का न्योता मिलने का दावा किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक ईरान इस प्रस्ताव पर विचार कर रहा है। हालांकि, अभी तक ईरान, सऊदी अरब, पाकिस्तान या तुर्की में से किसी भी देश ने इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

    यह दावा शनिवार को अल मयादीन ने ईरानी संसद की समाचार एजेंसी ‘खानेह मेल्लत’ के प्रमुख मेहदी रहीमी के हवाले से किया। रहीमी के मुताबिक ईरान को मक्का समझौते में शामिल होने का प्रस्ताव मिला है और इस पर फिलहाल विचार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा के लिए साझा व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

    अगर यह खबर सही साबित होती है तो इसे पश्चिम एशिया की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव माना जाएगा, क्योंकि सऊदी अरब और ईरान लंबे समय तक एक-दूसरे के क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी रहे हैं।

    क्या है ‘मक्का पैक्ट’?

    सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने 7 अगस्त को मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में उसे सभी तीन देशों पर हमला माना जाएगा।

    समझौते का उद्देश्य आपसी रक्षा सहयोग को मजबूत करना है। इसके तहत सैन्य तालमेल, संयुक्त सैन्य अभ्यास और रक्षा उद्योग में सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम किया जाएगा।

    तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने समझौते के आपसी रक्षा प्रावधान की तुलना NATO के अनुच्छेद 5 से की थी। हालांकि, तीनों देशों ने स्पष्ट किया था कि यह समझौता किसी विशेष देश को निशाना बनाकर नहीं किया गया है।

    ईरान ने पहले नहीं जताई थी आपत्ति

    मक्का पैक्ट के गठन के बाद ईरान ने इस पर खुलकर विरोध नहीं जताया था। 10 अगस्त को ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा था कि तेहरान को समझौते से चिंता की कोई वजह नजर नहीं आती। उन्होंने माना था कि क्षेत्रीय देशों को अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत महसूस हो रही है।

    ऐसे में अब ईरान को इसी सुरक्षा समझौते में शामिल होने का न्योता मिलने की खबर सामने आना चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि, ईरान का इसमें शामिल होना पश्चिम एशिया की रणनीतिक राजनीति में बड़ा बदलाव होगा।

    सऊदी और ईरान की रही है पुरानी प्रतिद्वंद्विता

    सऊदी अरब और ईरान के बीच लंबे समय से क्षेत्रीय वर्चस्व को लेकर खींचतान रही है। इसका असर यमन और खाड़ी क्षेत्र की राजनीति में भी दिखाई देता रहा है। यमन में सऊदी अरब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता रहा है, जबकि ईरान के हूती विद्रोहियों से संबंध बताए जाते हैं।

    हालांकि, 2023 में चीन की मध्यस्थता से दोनों देशों ने राजनयिक रिश्ते बहाल किए थे। इसके बाद संबंधों में कुछ नरमी आई, लेकिन क्षेत्र में जारी तनाव के बीच दोनों देशों के रिश्तों में चुनौतियां बनी हुई हैं।

    ऐसे में यदि ईरान के ‘मक्का पैक्ट’ में शामिल होने की खबर की आधिकारिक पुष्टि होती है, तो यह पश्चिम एशिया के शक्ति समीकरण में महत्वपूर्ण बदलाव साबित हो सकता है। फिलहाल मामला न्योते की रिपोर्ट तक सीमित है और सभी संबंधित देशों की आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है।

  • सऊदी-पाक-तुर्की की डिफेंस डील में बड़ा ट्विस्ट, ईरान पर तुर्की ने साफ किया अपना रुख

    सऊदी-पाक-तुर्की की डिफेंस डील में बड़ा ट्विस्ट, ईरान पर तुर्की ने साफ किया अपना रुख


    नई दिल्ली। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हाल में हुए रक्षा समझौते को लेकर तस्वीर अब कुछ बदलती नजर आ रही है। तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता ईरान या किसी अन्य खास देश को निशाना बनाकर नहीं किया गया है। उनके बयान के बाद इस डिफेंस डील के उद्देश्य और आपसी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को लेकर नए सवाल उठने लगे हैं।

    शुक्रवार को सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते को लेकर यह बात सामने आई थी कि तीनों में से किसी एक देश पर हमला होने की स्थिति में इसे तीनों पर हमला माना जाएगा।

    ‘इस्लामिक NATO’ के नाम से हो रही चर्चा
    यह समझौता तेल संपन्न सऊदी अरब, परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान और NATO की दूसरी सबसे बड़ी सेना वाले तुर्की को एक सुरक्षा ढांचे में लाता है। तुर्की का रक्षा उद्योग तेजी से विकसित हुआ है और उसके ड्रोन भी दुनियाभर में चर्चा में रहे हैं। इसी वजह से तीनों सुन्नी बहुल देशों के इस गठजोड़ की तुलना NATO से की जा रही है और इसे कई जगह ‘इस्लामिक NATO’ कहा जा रहा है। माना जा रहा था कि क्षेत्र में ईरान से जुड़े सुरक्षा तनाव के बीच यह समझौता सऊदी अरब के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच साबित हो सकता है।

    तुर्की ने कहा- किसी खास देश को दुश्मन नहीं माना
    अब तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने सरकारी समाचार एजेंसी अनादोलु एजेंसी को दिए इंटरव्यू में इस समझौते को लेकर महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है। उन्होंने कहा कि तीनों देश किसी विशेष राष्ट्र को तब तक अपना दुश्मन नहीं मानते, जब तक वह उनके खिलाफ शत्रुतापूर्ण कार्रवाई न करे। फिदान के मुताबिक, समझौते में किसी साझा खतरे को लेकर किसी खास देश का नाम निर्धारित नहीं किया गया है। उनका कहना था कि जो देश तुर्की पर हमला नहीं करता, उसे तुर्की अपना निशाना नहीं मानता।

    NATO के अनुच्छेद 5 से कैसे अलग है व्यवस्था?
    फिदान ने समझौते में आपसी रक्षा से जुड़ी व्यवस्था को तकनीकी तौर पर NATO के अनुच्छेद 5 के समान बताया। NATO के अनुच्छेद 5 के तहत किसी एक सदस्य देश पर हमला होने को सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाता है। हालांकि, तुर्की के विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि इस नए समझौते में सैन्य मदद अपने आप सक्रिय नहीं होगी। यदि किसी सदस्य देश पर हमला होता है, तो उसे औपचारिक तौर पर अन्य दो देशों से सहायता मांगनी होगी। इसके बाद खतरे की स्थिति और उसके स्तर के आधार पर सहायता का स्वरूप तय किया जा सकता है। इसमें खुफिया जानकारी साझा करना, लॉजिस्टिक सहायता देना या जरूरत पड़ने पर सैन्य टुकड़ियां भेजना शामिल हो सकता है।

    दूसरे देशों को भी जोड़ने की तैयारी
    फिदान ने यह भी बताया कि कुछ अन्य देशों ने इस समझौते का हिस्सा बनने में रुचि दिखाई है। हालांकि उन्होंने किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन उम्मीद जताई कि मिस्र अगले चरण में इस व्यवस्था से जुड़ सकता है।

    समझौते के तहत तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री तथा उनके सैन्य प्रमुख नियमित रूप से समिति की बैठक करेंगे। इसके अलावा तीनों देशों के बीच समन्वय के लिए एक सचिवालय स्थापित किया जाएगा, जिसका मुख्यालय सऊदी अरब में होगा। इस तरह मक्का में हुआ यह रक्षा समझौता भले ही तीन देशों के बीच सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है, लेकिन तुर्की के ताजा बयान से यह साफ हो गया है कि इसका लक्ष्य किसी एक देश, खासकर ईरान के खिलाफ मोर्चा बनाना नहीं है।

  • हूती नाकेबंदी के बीच भारत के लिए राहत, सऊदी तेल लेकर लाल सागर से सुरक्षित निकले दो टैंकर

    हूती नाकेबंदी के बीच भारत के लिए राहत, सऊदी तेल लेकर लाल सागर से सुरक्षित निकले दो टैंकर


    नई दिल्ली । यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब की तेल आपूर्ति पर नाकेबंदी की घोषणा के बीच भारत के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। सऊदी अरब से कच्चा तेल लेकर भारत आ रहे दो बड़े तेल टैंकर लाल सागर के संवेदनशील क्षेत्र से सुरक्षित बाहर निकल गए हैं। इससे फिलहाल भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर तत्काल किसी बड़े असर की आशंका कम हो गई है, हालांकि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल बाजार और समुद्री व्यापार को लेकर चिंता जरूर बढ़ा दी है।

    सूत्रों के अनुसार, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) द्वारा किराए पर लिया गया सुएजमैक्स श्रेणी का टैंकर अमेजन सऊदी अरब के यनबू बंदरगाह से करीब 10 लाख बैरल कच्चा तेल लेकर रवाना हुआ था। वहीं मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (MRPL) के लिए अफ्रामैक्स श्रेणी का टैंकर रोडोस लगभग 7 लाख बैरल कच्चा तेल लेकर भारत की ओर बढ़ रहा है। दोनों जहाज 20 जुलाई के आसपास यनबू बंदरगाह से निकले थे और शुरुआत में स्वेज नहर की दिशा में आगे बढ़े।

    हूती विद्रोहियों की ओर से सऊदी तेल आपूर्ति को निशाना बनाने की चेतावनी के बाद दोनों टैंकरों ने सुरक्षा कारणों से अपनी लोकेशन बताने वाला ट्रैकिंग सिस्टम बंद कर दिया और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के रास्ते लाल सागर से बाहर निकल गए। यह कदम समुद्री सुरक्षा के लिहाज से एहतियात के तौर पर उठाया गया, क्योंकि हाल के महीनों में इस क्षेत्र में कई व्यापारिक जहाजों पर हमलों की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।

    लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माने जाते हैं। एशिया और यूरोप के बीच बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और अन्य सामान इसी रास्ते से भेजा जाता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह का सैन्य तनाव या नाकेबंदी अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर सीधा असर डाल सकती है।

    भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है और सऊदी अरब उसके प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। इसलिए इस मार्ग में किसी भी तरह की बाधा भारतीय अर्थव्यवस्था, ईंधन कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बन सकती है। फिलहाल दोनों टैंकरों के सुरक्षित आगे बढ़ने से तत्काल आपूर्ति बाधित होने का खतरा टल गया है।

    हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है या लाल सागर के समुद्री मार्ग पर लंबे समय तक खतरा बना रहता है, तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी आ सकती है। इससे भारत जैसे आयातक देशों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ सकता है। ऐसे में सरकार और तेल कंपनियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं ताकि जरूरत पड़ने पर वैकल्पिक आपूर्ति और समुद्री मार्गों का उपयोग किया जा सके।

  • मिडिल ईस्ट में युद्ध का नया मोर्चा: अमेरिका-सऊदी की संयुक्त कार्रवाई, ईरान समर्थक ठिकानों पर हमला, तनाव चरम पर

    मिडिल ईस्ट में युद्ध का नया मोर्चा: अमेरिका-सऊदी की संयुक्त कार्रवाई, ईरान समर्थक ठिकानों पर हमला, तनाव चरम पर


    नई दिल्ली । मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष अब एक नए और अधिक संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिका और सऊदी अरब ने संयुक्त सैन्य अभियान चलाते हुए इराक में ईरान समर्थित पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्स यानी पीएमएफ के ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए। शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक इन हमलों में कम से कम 20 लड़ाकों की मौत हुई है जबकि 32 अन्य घायल बताए जा रहे हैं। इस कार्रवाई के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है तथा युद्ध के व्यापक रूप लेने की आशंका गहरा गई है।

    अमेरिकी सेना का दावा है कि जिन ठिकानों को निशाना बनाया गया वहां से अमेरिकी सैनिकों और सऊदी अरब के महत्वपूर्ण ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमलों की तैयारी की जा रही थी। सुरक्षा एजेंसियों को मिली खुफिया जानकारी के आधार पर यह संयुक्त कार्रवाई की गई। हमलों के कुछ ही घंटों बाद ईरान की ओर से जवाबी कदम उठाया गया और जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकाने की दिशा में कई बैलिस्टिक मिसाइलें दागी गईं। हालांकि अमेरिकी रक्षा प्रणाली ने सभी मिसाइलों को लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही हवा में नष्ट कर दिया।

    इस घटनाक्रम के बीच व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की महत्वपूर्ण बैठक भी चर्चा का केंद्र रही। बैठक के बाद नेतन्याहू ने कहा कि दोनों देशों के बीच इस बात पर स्पष्ट सहमति बनी है कि ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाएंगे। माना जा रहा है कि यह बैठक मिडिल ईस्ट की भविष्य की रणनीति तय करने के लिहाज से बेहद अहम रही।

    इसी दौरान यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने भी ट्रंप से मुलाकात कर एयर डिफेंस सिस्टम रक्षा सहयोग और रूस यूक्रेन युद्ध पर विस्तार से चर्चा की। दूसरी ओर ओमान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के नियंत्रण को लेकर नया प्रस्ताव रखा है जिसमें इस रणनीतिक समुद्री मार्ग का संचालन क्षेत्र के सभी देशों की साझेदारी से करने की बात कही गई है। इस प्रस्ताव को खाड़ी क्षेत्र के कई देशों का समर्थन मिलने की खबर है।

    बढ़ते तनाव के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच संभावित बातचीत की खबरों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कुछ नरमी देखने को मिली है। हालांकि सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा हालात और बिगड़ते हैं तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है।

    उधर यमन के हूती विद्रोहियों की चेतावनी के बाद रेड सी में जहाजों की सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा बन गई है। रिपोर्टों के अनुसार चीन ने अपने तेल टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए हूती प्रतिनिधियों से सीधे संपर्क किया है ताकि समुद्री व्यापार प्रभावित न हो।

    संयुक्त राष्ट्र में भी इस पूरे घटनाक्रम पर चिंता जताई गई है। पाकिस्तान ने कहा कि सऊदी अरब को इस संघर्ष में घसीटने की कोशिश हो रही है और सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। वहीं गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल ने सऊदी अरब पर हुए हमलों की कड़ी निंदा करते हुए उसकी सुरक्षा और संप्रभुता के समर्थन का भरोसा दोहराया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं हुए तो यह संघर्ष केवल ईरान और इजरायल तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर असर डाल सकता है।

  • ट्रंप का मास्टरप्लान! सऊदी परमाणु समझौते के बदले इजरायल से दोस्ती की शर्त, मध्य पूर्व की राजनीति में हलचल

    ट्रंप का मास्टरप्लान! सऊदी परमाणु समझौते के बदले इजरायल से दोस्ती की शर्त, मध्य पूर्व की राजनीति में हलचल


    नई दिल्ली। अमेरिका ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि सऊदी अरब के साथ प्रस्तावित नागरिक परमाणु समझौता केवल ऊर्जा सहयोग तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि इसके साथ इजरायल के साथ रिश्तों को सामान्य बनाने की बड़ी कूटनीतिक शर्त भी जुड़ी हुई है। व्हाइट हाउस ने संकेत दिए हैं कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मध्य पूर्व नीति का सबसे अहम उद्देश्य सऊदी अरब को अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल कराना और इजरायल के साथ उसके संबंधों को औपचारिक रूप से सामान्य बनाना है। इस बयान ने एक बार फिर पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीतिक तस्वीर को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।

    व्हाइट हाउस के डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ स्टीफन मिलर ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने सऊदी नेतृत्व के सामने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि इजरायल के साथ संबंध सामान्य करना उनकी प्राथमिक अपेक्षाओं में शामिल है। उन्होंने कहा कि यह केवल वर्तमान कार्यकाल की नीति नहीं बल्कि लंबे समय से ट्रंप प्रशासन की रणनीतिक सोच का हिस्सा रही है। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि परमाणु समझौता पहले होगा या इजरायल से रिश्तों का सामान्यीकरण लेकिन इतना जरूर कहा कि दोनों मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

    मिलर ने ट्रंप की सऊदी अरब के साथ वर्षों पुरानी कूटनीतिक भागीदारी का जिक्र करते हुए कहा कि 2017 में रियाद में दिए गए ऐतिहासिक भाषण के बाद से ही अमेरिका ने सऊदी अरब को क्षेत्रीय स्थिरता का मजबूत साझेदार बनाने की दिशा में लगातार काम किया है। उनके अनुसार राष्ट्रपति ट्रंप सऊदी नेतृत्व की रणनीतिक सोच और भविष्य की योजनाओं को अच्छी तरह समझते हैं और उन्हें भरोसा है कि आने वाले समय में यह साझेदारी मध्य पूर्व में ऐतिहासिक बदलाव का कारण बनेगी।

    व्हाइट हाउस का मानना है कि यदि सऊदी अरब इजरायल के साथ औपचारिक संबंध स्थापित करता है तो इससे पूरे क्षेत्र में स्थिरता बढ़ेगी और अब्राहम अकॉर्ड्स को नई मजबूती मिलेगी। ट्रंप के पहले कार्यकाल में संयुक्त अरब अमीरात बहरीन मोरक्को और सूडान ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए थे। अब अमेरिकी प्रशासन चाहता है कि सऊदी अरब भी इस पहल का हिस्सा बने क्योंकि उसे क्षेत्र का सबसे प्रभावशाली अरब देश माना जाता है।

    इस दौरान स्टीफन मिलर ने निकारागुआ की राजनीति पर भी तीखी टिप्पणी की। उन्होंने आरोप लगाया कि वहां की सरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रही है और समाजवादी शासन चुनावी प्रक्रिया का उपयोग सत्ता हासिल करने के बाद राजनीतिक स्वतंत्रताओं को सीमित करने के लिए करता है। उन्होंने कहा कि विदेश मंत्री मार्को रुबियो पहले ही इस मुद्दे पर अमेरिकी नीति स्पष्ट कर चुके हैं।

    मिलर ने यह भी दावा किया कि ट्रंप प्रशासन की व्यापक रणनीति पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिका के प्रभाव को मजबूत करने और सहयोगी देशों के साथ रिश्तों को नई दिशा देने पर केंद्रित है। उनके अनुसार कई देशों की सरकारें अमेरिका की सुरक्षा और समृद्धि आधारित नीति के साथ खड़ी हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब के साथ नागरिक परमाणु समझौते और इजरायल से संबंध सामान्य करने की अमेरिकी कोशिशें आने वाले समय में मध्य पूर्व की राजनीति को नई दिशा दे सकती हैं। यदि यह पहल सफल होती है तो क्षेत्रीय कूटनीति में एक और बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

  • हूती संकट के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर फोकस, सऊदी दौरे पर NSA डोवल ने तेज की रणनीतिक कवायद

    हूती संकट के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर फोकस, सऊदी दौरे पर NSA डोवल ने तेज की रणनीतिक कवायद


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और तेल आपूर्ति को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा और समुद्री सुरक्षा को लेकर सक्रिय रणनीति अपनाई है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोवल ने सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन रहमान से मुलाकात कर दोनों देशों के बीच रणनीतिक सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री मार्गों की सुरक्षा को मजबूत बनाने पर चर्चा की।

    ईरान से जुड़े तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट की आशंकाओं के बीच भारत के लिए कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति अहम मुद्दा बन गई है। इसी कारण डोवल की सऊदी यात्रा में ऊर्जा सुरक्षा प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल रही।

    सऊदी से बढ़ी भारत की तेल निर्भरता
    वर्तमान में भारत के कुल कच्चे तेल आयात का करीब 17 प्रतिशत हिस्सा सऊदी अरब से आता है। होर्मुज मार्ग प्रभावित होने के बाद सऊदी अरब ने बाब-अल-मंदेब मार्ग के जरिए भारत को तेल भेजना जारी रखा। हालांकि अब यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा इस समुद्री मार्ग को भी बाधित करने की चेतावनी दिए जाने से नई चुनौती सामने आ गई है। इसी संभावित संकट से निपटने के लिए भारत कूटनीतिक और रणनीतिक स्तर पर सक्रिय हो गया है।

    क्या है ‘डोवल डॉक्ट्रिन’?
    राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े जटिल मामलों में अजित डोवल की कार्यशैली को अक्सर ‘डोवल डॉक्ट्रिन’ के रूप में देखा जाता है। डोवल कई बार कह चुके हैं कि चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में केवल निर्णय लेना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उन फैसलों को सही साबित करना अधिक महत्वपूर्ण होता है। इसी सोच के तहत भारत पश्चिम एशिया में अपने रणनीतिक संबंधों को लगातार मजबूत कर रहा है।

    ऑपरेशन राहत बना था मिसाल
    साल 2015 में यमन गृहयुद्ध के दौरान भारत ने ‘ऑपरेशन राहत’ चलाकर लगभग 4,741 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाला था। इसके साथ ही करीब 2 हजार विदेशी नागरिकों को भी वहां से बाहर निकालने में मदद की गई थी। उस समय हूती गुट से भारत के औपचारिक संबंध नहीं थे, लेकिन अजित डोवल के नेतृत्व में भारतीय खुफिया एजेंसियों ने बैक-चैनल संवाद स्थापित किया। खुफिया तंत्र ने भारतीय नागरिकों के ठिकानों और सुरक्षित निकासी मार्गों की जानकारी जुटाई, जबकि नौसेना और वायुसेना ने अभियान को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई।

    हूती गुट से संवाद की रणनीति
    ऑपरेशन राहत के बाद भी भारत ने हूती गुट को आधिकारिक मान्यता नहीं दी, लेकिन यमन को भेजी जाने वाली मानवीय सहायता जारी रखी। खाद्य सामग्री और दवाओं के रूप में भेजी जाने वाली राहत का एक हिस्सा हूती प्रभाव वाले क्षेत्रों तक भी पहुंचता रहा है। माना जाता है कि यही मानवीय पहल भविष्य में संवाद की संभावनाओं को बनाए रखने में सहायक हो सकती है।

    भारतीय नौसेना भी सतर्क
    भारत की नौसेना के 2 से 4 युद्धपोत लगातार यमन के आसपास के समुद्री क्षेत्र में गश्त करते रहते हैं। ऐसे में यदि समुद्री मार्गों पर कोई खतरा पैदा होता है, तो भारत तेल आपूर्ति की सुरक्षा के लिए नौसैनिक सहयोग भी बढ़ा सकता है।

    रक्षा सहयोग भी बढ़ सकता है
    ऊर्जा सहयोग के साथ-साथ भारत और सऊदी अरब रक्षा क्षेत्र में भी साझेदारी मजबूत करने पर विचार कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब उन छह देशों में शामिल है जिन्होंने भारत की ‘अस्त्र’ मिसाइल में रुचि दिखाई है। भारतीय वायुसेना के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अस्त्र मिसाइल का सफल इस्तेमाल किया गया था। इसके बाद इंडोनेशिया ने भी इस स्वदेशी मिसाइल की खरीद का समझौता किया है और अब सऊदी अरब भी इसमें दिलचस्पी दिखा रहा है।

    चाणक्य नीति से जोड़कर देखा जा रहा सहयोग
    विशेषज्ञ इस रणनीतिक सहयोग की तुलना आचार्य चाणक्य की ‘समाश्रय नीति’ से भी करते हैं। इस नीति के अनुसार मित्र देशों के साथ केवल कूटनीतिक और आर्थिक ही नहीं, बल्कि सैन्य सहयोग भी विकसित किया जाना चाहिए, ताकि दोनों देशों के हित सुरक्षित रह सकें।

    डोवल को मिलेगा राष्ट्रीय सम्मान
    राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए अजित डोवल को लोकमान्य तिलक राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। 1 अगस्त को पुणे में आयोजित समारोह में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह उन्हें यह सम्मान प्रदान करेंगे।

    1983 में शुरू हुए इस प्रतिष्ठित पुरस्कार से देश और समाज के लिए उल्लेखनीय योगदान देने वाली हस्तियों को सम्मानित किया जाता है। इससे पहले पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और समाजवादी चिंतक एस. एम. जोशी जैसी हस्तियों को भी यह सम्मान मिल चुका है।

  • सऊदी अरब की ऐतिहासिक तेल कटौती, 20 साल की सबसे बड़ी कीमत गिरावट से भारत को मिल सकती है बड़ी राहत

    सऊदी अरब की ऐतिहासिक तेल कटौती, 20 साल की सबसे बड़ी कीमत गिरावट से भारत को मिल सकती है बड़ी राहत


    नई दिल्ली । सऊदी अरब ने वैश्विक तेल बाजार में बड़ा कदम उठाते हुए एशियाई ग्राहकों के लिए अपने प्रमुख अरब लाइट क्रूड की कीमत में अगस्त 2026 से प्रभावी ऐतिहासिक कटौती का ऐलान किया है। सरकारी तेल कंपनी सऊदी अरामको ने कीमत में 11 डॉलर प्रति बैरल की कमी की है, जिसे पिछले दो दशकों की सबसे बड़ी कटौती माना जा रहा है। इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय ऑयल मार्केट में हलचल मचा दी है और भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए राहत की उम्मीद बढ़ा दी है।

    क्यों घटाई गई कीमत?

    तेल बाजार में हाल के दिनों में वैश्विक मांग कमजोर हुई है, जबकि आपूर्ति लगातार बढ़ रही है। इजरायल-ईरान तनाव कम होने और हॉर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति सामान्य होने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई है। इसी बीच ओपेक प्लस देशों ने भी उत्पादन बढ़ाने पर सहमति बनाई है, जिससे बाजार में सप्लाई और बढ़ गई है। इन परिस्थितियों को देखते हुए सऊदी अरब ने एशियाई बाजार में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत करने के लिए कीमतों में बड़ी कटौती की है।

    भारत को क्या होगा फायदा?

    भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है और सऊदी अरब उसके प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। ऐसे में सऊदी की इस कीमत कटौती का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है।

    सबसे पहले, भारत का तेल आयात बिल कम हो सकता है, जिससे चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) पर दबाव घटेगा। विदेशी मुद्रा भंडार पर बोझ कम होने और रुपये को मजबूती मिलने की भी संभावना है।

    यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक नीचे रहती हैं, तो इसका लाभ घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी के रूप में भी मिल सकता है। हालांकि, खुदरा ईंधन कीमतों में बदलाव सरकार की कर नीति और तेल विपणन कंपनियों के मूल्य निर्धारण पर भी निर्भर करेगा।

    महंगाई पर भी पड़ सकता है असर

    कच्चा तेल सस्ता होने से परिवहन लागत घट सकती है, जिसका असर खाद्य पदार्थों, औद्योगिक उत्पादों और लॉजिस्टिक्स पर पड़ता है। इससे महंगाई नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है। साथ ही तेल विपणन कंपनियों के मुनाफे में भी सुधार होने की संभावना जताई जा रही है।

    एशियाई बाजार में बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा

    विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब के इस फैसले के बाद अन्य तेल निर्यातक देशों पर भी कीमतों में प्रतिस्पर्धी बदलाव का दबाव बढ़ सकता है। इससे एशियाई बाजार में खरीदारों को बेहतर शर्तों पर कच्चा तेल मिलने की संभावना बनेगी। अगर वैश्विक परिस्थितियां स्थिर रहती हैं और कच्चे तेल की कीमतें इसी स्तर पर बनी रहती हैं, तो भारत सहित कई आयातक देशों को आने वाले महीनों में आर्थिक राहत मिल सकती है।

  • सऊदी अरब को रोककर चमका केप वर्डे, वर्ल्ड कप डेब्यू में नॉकआउट का ऐतिहासिक सफर

    सऊदी अरब को रोककर चमका केप वर्डे, वर्ल्ड कप डेब्यू में नॉकआउट का ऐतिहासिक सफर


    नई दिल्ली । फीफा वर्ल्ड कप 2026 में केप वर्डे ने अपने पहले ही विश्व कप अभियान में इतिहास रच दिया है। ग्रुप एच के आखिरी मुकाबले में सऊदी अरब के खिलाफ गोलरहित ड्रॉ खेलकर टीम ने राउंड ऑफ 32 में जगह बना ली। इस उपलब्धि के साथ केप वर्डे अपने वर्ल्ड कप डेब्यू में बिना कोई मैच गंवाए नॉकआउट चरण में पहुंचने वाली तीसरी अफ्रीकी टीम बन गई है। टीम के शानदार प्रदर्शन ने दुनिया भर के फुटबॉल प्रशंसकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

    ग्रुप चरण में केप वर्डे ने तीन अंक हासिल कर दूसरा स्थान अपने नाम किया। इस प्रदर्शन के दम पर उसने दो बार की विश्व चैंपियन उरुग्वे और 2034 विश्व कप के मेजबान सऊदी अरब को पीछे छोड़ दिया। अब राउंड ऑफ 32 में उसका मुकाबला गत चैंपियन अर्जेंटीना से होगा। यह मैच 3 जुलाई को मियामी में खेला जाएगा और इसे केप वर्डे के फुटबॉल इतिहास का सबसे बड़ा मुकाबला माना जा रहा है।

    सऊदी अरब के खिलाफ खेले गए मुकाबले में केप वर्डे ने शुरुआत से ही आक्रामक रणनीति अपनाई। टीम ने लगातार हमले किए और कई बार गोल करने के करीब पहुंची। विली सेमेडो ने विपक्षी गोलपोस्ट पर कई खतरनाक प्रयास किए लेकिन सऊदी गोलकीपर मोहम्मद अल ओवैस ने शानदार बचाव करते हुए अपनी टीम को बढ़त लेने से रोक दिया। पहले हाफ में केप वर्डे का एक लंबी दूरी का दमदार शॉट भी गोलपोस्ट के बेहद करीब से बाहर निकल गया।

    दूसरी ओर सऊदी अरब को मैच के दौरान बड़ा झटका तब लगा जब डिफेंडर हसन अल तंबकती बिना किसी टक्कर के मैदान पर गिर पड़े। चोट गंभीर होने के कारण उन्हें स्ट्रेचर के जरिए मैदान से बाहर ले जाना पड़ा। उनके बाहर होने के बाद सऊदी रक्षा पंक्ति कमजोर नजर आई लेकिन टीम ने संयम बनाए रखा और केप वर्डे को गोल करने का मौका नहीं दिया।

    मैच के अंतिम मिनटों में दोनों टीमों ने जीत के लिए प्रयास किए लेकिन कोई भी गोल नहीं कर सकी। सऊदी गोलकीपर अल ओवैस ने कई महत्वपूर्ण सेव कर अपनी टीम को हार से बचाया जबकि केप वर्डे का मजबूत डिफेंस भी पूरे मुकाबले में अडिग रहा। आखिरकार मैच 0-0 की बराबरी पर समाप्त हुआ।

    अंतिम सीटी बजते ही केप वर्डे के खिलाड़ियों और समर्थकों में जश्न का माहौल बन गया। एक अंक ने टीम को ऐतिहासिक सफलता दिला दी और पहली बार विश्व कप के नॉकआउट चरण में पहुंचने का सपना साकार हो गया। अब पूरी दुनिया की नजरें अर्जेंटीना के खिलाफ होने वाले मुकाबले पर होंगी जहां केप वर्डे अपने सुनहरे सफर को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगा।

  • ट्रंप को पाकिस्तान का बड़ा झटका, रक्षा मंत्री बोले- इजरायल से समझौता हमारी विचारधारा के खिलाफ

    ट्रंप को पाकिस्तान का बड़ा झटका, रक्षा मंत्री बोले- इजरायल से समझौता हमारी विचारधारा के खिलाफ




    नई दिल्ली। पाकिस्तान ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि वह इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य बनाने वाले अब्राहम समझौते का हिस्सा बनने के पक्ष में नहीं है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री Khawaja Asif ने कहा कि इस तरह का समझौता देश की बुनियादी विचारधारा से मेल नहीं खाता और पाकिस्तान फिलहाल इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाएगा।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब Donald Trump ने मध्य-पूर्व में चल रही कूटनीतिक कोशिशों के बीच कई मुस्लिम देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने की अपील की है। अमेरिका चाहता है कि Saudi Arabia, Qatar, पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र जैसे देश भी इजरायल के साथ संबंध सामान्य करें।

    सोमवार रात एक टीवी कार्यक्रम में ख्वाजा आसिफ ने कहा कि व्यक्तिगत तौर पर उन्हें नहीं लगता कि पाकिस्तान को ऐसे किसी समझौते का हिस्सा बनना चाहिए जो उसकी वैचारिक और राजनीतिक नीति के खिलाफ हो। उन्होंने दोहराया कि पाकिस्तान का पुराना रुख आज भी कायम है और जब तक 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाकर स्वतंत्र फिलिस्तीनी राष्ट्र की स्थापना नहीं होती, तब तक पाकिस्तान इजरायल को मान्यता नहीं देगा।

    पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने इजरायल पर भरोसे का सवाल भी उठाया। उन्होंने कहा कि जिन देशों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, उनके साथ स्थायी समझौता करना मुश्किल है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पाकिस्तान के पासपोर्ट पर आज भी साफ लिखा होता है कि यह इजरायल की यात्रा के लिए मान्य नहीं है।

    गौरतलब है कि अब्राहम अकॉर्ड 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता से शुरू हुआ था। इसके तहत United Arab Emirates और Bahrain समेत कई अरब देशों ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए थे। बाद में मोरक्को और सूडान भी इस समझौते का हिस्सा बने।

    ख्वाजा आसिफ पहले भी इजरायल के खिलाफ कड़े बयान दे चुके हैं। हाल ही में उन्होंने इजरायल को “इंसानियत के लिए अभिशाप” बताते हुए गाजा में कथित नरसंहार का आरोप लगाया था। पाकिस्तान सरकार का यह ताजा बयान संकेत देता है कि फिलहाल इस्लामाबाद अमेरिका के दबाव के बावजूद अपने पारंपरिक फिलिस्तीन समर्थक रुख से पीछे हटने को तैयार नहीं है।

  • सऊदी-इजरायल संबंध: MBS के रुख को लेकर दावे तेज, अब्राहम अकॉर्ड पर फिर बढ़ी हलचल

    सऊदी-इजरायल संबंध: MBS के रुख को लेकर दावे तेज, अब्राहम अकॉर्ड पर फिर बढ़ी हलचल




    नई दिल्ली। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) को लेकर इजरायल को मान्यता देने के दावों ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सहयोगी माइक इवांस के बयान के बाद यह मुद्दा चर्चा में आ गया है, जिसमें उन्होंने दावा किया है कि MBS निजी बातचीत में इजरायल को मान्यता देने की इच्छा जता चुके हैं।

    इवांस के अनुसार, क्राउन प्रिंस ने कहा था कि वह इजरायल को मान्यता देने के पक्ष में हैं, लेकिन उनके पिता यानी सऊदी किंग सलमान के कारण यह निर्णय आगे नहीं बढ़ पा रहा है। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

    अब्राहम अकॉर्ड पर ट्रंप की सक्रियता
    पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अब्राहम अकॉर्ड को विस्तार देने की कोशिशों में जुटे हैं। उन्होंने सऊदी अरब समेत कई मुस्लिम देशों पर इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने का दबाव बढ़ाया है। ट्रंप का कहना है कि इससे मध्य-पूर्व में शांति की दिशा में बड़ा बदलाव संभव है।

    अब्राहम अकॉर्ड की शुरुआत 2020 में हुई थी, जब यूएई और बहरीन ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने पर सहमति जताई थी। बाद में मोरक्को, सूडान और कुछ अन्य देश भी इसमें शामिल हुए।

    सऊदी अरब का आधिकारिक रुख
    हालांकि सऊदी अरब की ओर से अब तक साफ कर दिया गया है कि जब तक फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं मिलती, तब तक वह इजरायल को मान्यता नहीं देगा। रियाद का कहना है कि फिलिस्तीन मुद्दे का समाधान ही किसी भी सामान्यीकरण की पहली शर्त है।

    राजनीतिक बयान और कूटनीतिक दबाव
    माइक इवांस ने दावा किया कि उन्होंने क्राउन प्रिंस के साथ लंबी बातचीत की थी, जिसमें इजरायल को लेकर सकारात्मक संकेत मिले थे। हालांकि इन दावों को लेकर कोई आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आया है।दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन और उनके सहयोगी लगातार यह तर्क दे रहे हैं कि अब्राहम अकॉर्ड का विस्तार क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक सहयोग के लिए जरूरी है।