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  • सऊदी अरब के ड्रीम प्रोजेक्ट NEOM पर संकट, घटते निवेश और आर्थिक दबाव ने बढ़ाई मुश्किलें

    सऊदी अरब के ड्रीम प्रोजेक्ट NEOM पर संकट, घटते निवेश और आर्थिक दबाव ने बढ़ाई मुश्किलें



    नई दिल्ली। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का महत्वाकांक्षी ‘NEOM’ प्रोजेक्ट अब गंभीर आर्थिक चुनौतियों के बीच घिरता नजर आ रहा है। कभी भविष्य के सबसे बड़े और आधुनिक शहर के रूप में पेश किए गए इस मेगा प्रोजेक्ट को लेकर अब खर्चों में कटौती, निर्माण की रफ्तार धीमी करने और योजनाओं को सीमित करने की चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    ‘विजन-2030’ के तहत शुरू किए गए NEOM प्रोजेक्ट का मकसद तेल आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर सऊदी अरब को तकनीक, पर्यटन और वैश्विक निवेश का नया केंद्र बनाना था। इस योजना में रेगिस्तान के बीच करीब 170 किलोमीटर लंबी भविष्यवादी “लाइन सिटी” बनाने की परिकल्पना की गई थी, जिसमें शीशे की दीवारों वाले आधुनिक ढांचे, हाईटेक ट्रांसपोर्ट और लग्जरी सुविधाएं शामिल थीं।

    हालांकि अब वैश्विक आर्थिक दबाव, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और विदेशी निवेश में कमी के कारण प्रोजेक्ट की रफ्तार प्रभावित हुई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई हिस्सों को फिलहाल सीमित किया जा रहा है और शुरुआती चरण में सिर्फ छोटे हिस्से के निर्माण पर फोकस किया जाएगा।

    बताया जा रहा है कि सऊदी सरकार ने कई अंतरराष्ट्रीय कंसल्टेंसी कंपनियों के नए कॉन्ट्रैक्ट रोक दिए हैं और कुछ भुगतान भी होल्ड पर डाल दिए गए हैं। वहीं, कुछ बड़े खेल और मनोरंजन निवेशों की गति भी धीमी पड़ गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यूक्रेन युद्ध, क्षेत्रीय अस्थिरता और वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण विदेशी निवेशकों का भरोसा पहले जैसा नहीं रहा। इसके साथ ही सऊदी अरब को अपने बढ़ते बजट घाटे और भारी खर्चों को संतुलित करने के लिए अब ज्यादा व्यावहारिक रणनीति अपनानी पड़ रही है।

    फिलहाल NEOM पूरी तरह बंद होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इतना साफ है कि सऊदी अरब अब अपने बड़े सपनों को आर्थिक वास्तविकताओं के हिसाब से दोबारा आकार देने की कोशिश कर रहा है।

  • काबा की सुरक्षा के लिए सऊदी हाई अलर्ट पर, मक्का-मदीना में तैनात हुआ एयर डिफेंस सिस्टम

    काबा की सुरक्षा के लिए सऊदी हाई अलर्ट पर, मक्का-मदीना में तैनात हुआ एयर डिफेंस सिस्टम



    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान-इजरायल-अमेरिका के बीच जारी संघर्ष के बीच सऊदी अरब ने हज 2026 को लेकर सुरक्षा व्यवस्था अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ा दी है। मक्का, मदीना और आसपास के पवित्र स्थलों की सुरक्षा के लिए एडवांस एयर डिफेंस सिस्टम, स्पेशल सैन्य यूनिट्स और इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीमें तैनात कर दी गई हैं। सऊदी रक्षा मंत्रालय ने साफ किया है कि हज के दौरान किसी भी मिसाइल, ड्रोन या हवाई खतरे को तुरंत मार गिराया जाएगा।

    सऊदी रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी वीडियो में पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम और काउंटर ड्रोन सिस्टम ‘स्काईगार्ड’ की तैनाती दिखाई गई है। अधिकारियों के मुताबिक एयर डिफेंस फोर्स को हाई अलर्ट पर रखा गया है और मक्का-मदीना के एयरस्पेस पर 24 घंटे कड़ी निगरानी की जा रही है। सऊदी सरकार नहीं चाहती कि क्षेत्रीय तनाव का असर हज यात्रियों की सुरक्षा पर पड़े।

    दरअसल 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद पूरे खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ गया था। इसके जवाब में ईरान ने सऊदी अरब, यूएई और कतर की दिशा में ड्रोन और मिसाइल हमले किए थे। हालांकि अब अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की चर्चा चल रही है, लेकिन खतरा पूरी तरह टला नहीं माना जा रहा।

    तनावपूर्ण माहौल के बावजूद इस बार हज यात्रियों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सऊदी हज पासपोर्ट फोर्स के कमांडर सालेह अल-मुरब्बा के अनुसार अब तक 15 लाख 18 हजार से ज्यादा विदेशी जायरीन सऊदी पहुंच चुके हैं, जो पिछले साल के मुकाबले अधिक हैं। माना जा रहा है कि अगले कुछ दिनों में यह आंकड़ा और बढ़ सकता है। हज की मुख्य रस्में 25 मई से 29 मई के बीच पूरी होंगी।

    सुरक्षा के साथ-साथ भीषण गर्मी भी इस बार बड़ी चुनौती बनी हुई है। मक्का और आसपास के इलाकों में तापमान 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने का अनुमान है। इसे देखते हुए सऊदी स्वास्थ्य मंत्रालय ने जायरीनों को छाता इस्तेमाल करने, ज्यादा पानी पीने और तेज धूप से बचने की सलाह दी है। मेडिकल टीमों, एंबुलेंस और अस्थायी क्लीनिकों को भी अलर्ट मोड पर रखा गया है ताकि किसी भी आपात स्थिति से तुरंत निपटा जा सके।

  • मध्यस्थता के बीच बड़ा खुलासा: पाकिस्तान ने सऊदी अरब में तैनात किए 8000 सैनिक, जंग जैसी तैयारी पर सवाल

    मध्यस्थता के बीच बड़ा खुलासा: पाकिस्तान ने सऊदी अरब में तैनात किए 8000 सैनिक, जंग जैसी तैयारी पर सवाल



    नई दिल्ली(New Delhi)। 
    मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और शांति प्रयासों के बीच पाकिस्तान की सैन्य रणनीति को लेकर बड़े दावे सामने आए हैं। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते के तहत लगभग 8000 सैनिकों की तैनाती की है, जिसमें लड़ाकू विमान, ड्रोन स्क्वाड्रन और वायु रक्षा प्रणाली शामिल हैं।

    सूत्रों के अनुसार इस तैनाती में चीन के सहयोग से विकसित JF-17 Thunder लड़ाकू विमान शामिल हैं, जिनकी संख्या लगभग 16 बताई जा रही है। इसके साथ ही दो ड्रोन स्क्वाड्रन और चीनी मूल की HQ-9 Air Defense System भी तैनात की गई है, जिसे पाकिस्तानी कर्मी संचालित कर रहे हैं।

    रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि यह पूरी तैनाती सऊदी अरब के खर्च पर की जा रही है और इसे “युद्ध-सक्षम समर्थन बल” के रूप में देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि जरूरत पड़ने पर और सैनिकों की तैनाती का भी प्रावधान है, जिससे यह संख्या आगे और बढ़ सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम उस समय उठाया गया है जब पाकिस्तान खुद को अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है और क्षेत्रीय शांति वार्ताओं में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। हालांकि अब तक पाकिस्तान और सऊदी अरब की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

    रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यह तैनाती पश्चिम एशिया में बदलते सुरक्षा समीकरणों और संभावित संघर्ष की आशंकाओं से जुड़ी हो सकती है।

  • ब्रह्मोस की बराबरी का दावा, लेकिन ‘फेल’ निकली फतह-3! खाड़ी देशों को चीनी मिसाइल बेचने में जुटा पाकिस्तान

    ब्रह्मोस की बराबरी का दावा, लेकिन ‘फेल’ निकली फतह-3! खाड़ी देशों को चीनी मिसाइल बेचने में जुटा पाकिस्तान




    नई दिल्ली। पाकिस्तान अब चीन में बनी फतह-3 मिसाइल को खाड़ी देशों में बेचने की तैयारी में जुट गया है। पाकिस्तान इसे भारत की सुपरसोनिक ब्रह्मोस मिसाइल का जवाब बताकर सऊदी अरब, कतर और दूसरे अरब देशों को लुभाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का दावा है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान फतह मिसाइल भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम के सामने पूरी तरह विफल साबित हुई थी। इसके बावजूद पाकिस्तान इसे अपनी बड़ी सैन्य ताकत के तौर पर पेश कर रहा है।

    ईरान-अमेरिका तनाव के बाद पाकिस्तान खुद को खाड़ी देशों का सुरक्षा साझेदार दिखाने में लगा है। इसी रणनीति के तहत वह चीनी हथियारों को अरब बाजार में उतारना चाहता है। इससे पहले पाकिस्तान JF-17 फाइटर जेट को लेकर भी बड़े दावे कर चुका है और अब फतह-3 मिसाइल को ब्रह्मोस की टक्कर की मिसाइल बताकर प्रचार किया जा रहा है।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक फतह-3 असल में चीन की HD-1 सुपरसोनिक मिसाइल का मॉडिफाइड वर्जन मानी जा रही है, जिसे चीन की कंपनी Guangdong Hongda ने विकसित किया है। पाकिस्तान का दावा है कि यह मिसाइल 2.5 से 4 मैक की स्पीड से उड़ सकती है और 450 किलो तक वारहेड ले जाने में सक्षम है। इसकी रेंज करीब 290 से 450 किलोमीटर बताई जा रही है।

    पाकिस्तानी मीडिया इसे जमीन और समुद्री लक्ष्यों पर हमला करने वाली आधुनिक मिसाइल बता रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी क्षमता ब्रह्मोस के मुकाबले काफी सीमित है। ब्रह्मोस जहां लंबी दूरी, सटीक निशाने और भारी विनाशक क्षमता के लिए जानी जाती है, वहीं फतह-3 अभी तक खुद को युद्धक्षेत्र में साबित नहीं कर पाई है।

    ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत की ब्रह्मोस मिसाइलों ने पाकिस्तान के कई अहम सैन्य ठिकानों और एयरबेस को निशाना बनाया था। रिपोर्ट्स के अनुसार नूर खान एयरबेस के आसपास हुए हमलों ने पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। इसके बाद पाकिस्तान ने अपनी मिसाइल ताकत को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना शुरू किया।

    विशेषज्ञों का कहना है कि चीन पाकिस्तान के जरिए खाड़ी देशों के हथियार बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है, जहां अब तक अमेरिका और पश्चिमी देशों का दबदबा रहा है। माना जा रहा है कि सऊदी अरब भविष्य में फतह-3 मिसाइल या JF-17 लड़ाकू विमान खरीदने पर विचार कर सकता है, क्योंकि वह ईरान के खतरे को देखते हुए अपनी सैन्य क्षमता लगातार बढ़ा रहा है

  • ब्रह्मोस की बराबरी का दावा, लेकिन ‘फेल’ रही फतह-3! चीन की मिसाइल बेचने में जुटा पाकिस्तान, खाड़ी देशों को साधने की कोशिश

    ब्रह्मोस की बराबरी का दावा, लेकिन ‘फेल’ रही फतह-3! चीन की मिसाइल बेचने में जुटा पाकिस्तान, खाड़ी देशों को साधने की कोशिश




    नई दिल्ली। भारत के खिलाफ सैन्य संतुलन बनाने की कोशिश में पाकिस्तान अब चीन निर्मित हथियारों को खाड़ी देशों तक पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रहा है। पाकिस्तानी सेना अपनी ‘फतह-3’ मिसाइल को भारत की ब्रह्मोस मिसाइल का जवाब बताकर सऊदी अरब और कतर जैसे देशों को आकर्षित करने में जुटी है। हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह मिसाइल भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम के सामने प्रभावी साबित नहीं हो सकी थी।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान खुद को खाड़ी देशों का सुरक्षा साझेदार दिखाने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका-ईरान तनाव के बाद इस्लामाबाद ने रक्षा सहयोग को बढ़ाने के लिए चीन के हथियारों को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है। पहले जेएफ-17 फाइटर जेट और अब फतह-3 मिसाइल को लेकर पाकिस्तान बड़े दावे कर रहा है।

    पाकिस्तानी मीडिया फतह-3 को सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल बताते हुए इसे ब्रह्मोस की टक्कर का हथियार बता रहा है। दावा किया जा रहा है कि यह जमीन और समुद्री दोनों लक्ष्यों पर हमला करने में सक्षम है और कम ऊंचाई पर तेज रफ्तार से उड़ान भरने के कारण इसे रोकना मुश्किल है। लेकिन रक्षा जानकारों का कहना है कि इसकी तकनीक काफी हद तक चीन की HD-1 मिसाइल पर आधारित है, जिसे Guangdong Hongda कंपनी ने विकसित किया था।

    बताया जा रहा है कि फतह-3 की रेंज करीब 290 से 450 किलोमीटर तक है और यह 240 से 450 किलोग्राम तक का वारहेड ले जा सकती है। इसकी गति 2.5 से 4 मैक तक बताई जाती है। वहीं दूसरी ओर भारत की ब्रह्मोस मिसाइल लंबी रेंज, अधिक सटीकता और भारी मारक क्षमता के लिए जानी जाती है।

    ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने ब्रह्मोस मिसाइलों के जरिए पाकिस्तान के कई अहम सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। रिपोर्ट्स के अनुसार नूर खान एयरबेस के पास हुए हमलों ने पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था को झटका दिया था। इसके बाद पाकिस्तान ने अपनी मिसाइल क्षमता को बढ़ाने और नए खरीदार तलाशने की कोशिशें तेज कर दी हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि चीन पाकिस्तान के जरिए खाड़ी देशों के हथियार बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है, जहां अब तक अमेरिका और पश्चिमी देशों का दबदबा रहा है। इसी रणनीति के तहत पाकिस्तान खुद को रक्षा साझेदार के रूप में पेश कर रहा है और चीनी तकनीक वाले हथियारों को “कम लागत वाला विकल्प” बताकर प्रचारित कर रहा है।

    रिपोर्ट्स में यह भी कहा जा रहा है कि सऊदी अरब भविष्य में फतह-3 मिसाइल या जेएफ-17 फाइटर जेट में रुचि दिखा सकता है, क्योंकि वह क्षेत्रीय खतरों को देखते हुए अपनी सैन्य ताकत को तेजी से बढ़ा रहा है। हालांकि रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि ब्रह्मोस जैसी उन्नत मिसाइल प्रणाली की बराबरी करना पाकिस्तान और चीन दोनों के लिए अभी बड़ी चुनौती बना हुआ है।

  • इजरायल, ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव पर बड़ा दावा: ‘युद्ध भड़काने की थी साजिश, लेकिन MBS ने रोका बड़ा संकट’

    इजरायल, ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव पर बड़ा दावा: ‘युद्ध भड़काने की थी साजिश, लेकिन MBS ने रोका बड़ा संकट’



    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया की राजनीति एक बार फिर बड़े दावों और आरोपों को लेकर सुर्खियों में है। सऊदी अरब के पूर्व खुफिया प्रमुख और पूर्व राजदूत प्रिंस तुर्की अल-फैसल ने दावा किया है कि यदि इजरायल की कथित रणनीति सफल हो जाती, तो ईरान और सऊदी अरब के बीच सीधा सैन्य संघर्ष भड़क सकता था, जिससे पूरा क्षेत्र विनाशकारी युद्ध की चपेट में आ जाता। हालांकि उन्होंने कहा कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) की सूझबूझ और संयम की नीति के चलते सऊदी अरब इस बड़े संकट से बच गया।

    पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ते आरोप
    तुर्की अल-फैसल ने अपने लेख में दावा किया कि हाल के वर्षों में क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच कुछ बाहरी ताकतें चाहती थीं कि सऊदी अरब और ईरान सीधे टकराव में आ जाएं। उनके अनुसार, यदि यह स्थिति बनती तो खाड़ी देशों की तेल अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और नागरिक ढांचे को भारी नुकसान पहुंच सकता था।

    हालांकि यह सभी दावे उनके व्यक्तिगत विश्लेषण और राय पर आधारित हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसके बावजूद यह बयान क्षेत्रीय भू-राजनीति की जटिलता को उजागर करता है।

    सऊदी अरब की ‘संयम नीति’ का दावा
    तुर्की अल-फैसल का कहना है कि सऊदी नेतृत्व ने इस पूरे तनाव के दौरान आक्रामक प्रतिक्रिया देने के बजाय कूटनीति और संयम का रास्ता अपनाया। उनके मुताबिक, अगर सऊदी अरब ईरान के हमलों का सैन्य जवाब देता, तो हालात तेजी से युद्ध में बदल सकते थे और खाड़ी क्षेत्र की तेल सुविधाएं गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती थीं।

    उन्होंने दावा किया कि सऊदी अरब ने पर्दे के पीछे रहकर तनाव को कम करने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश की।

    ‘युद्ध में धकेलने की कोशिश’ का आरोप
    पूर्व खुफिया प्रमुख ने यह भी आरोप लगाया कि सोशल मीडिया और कुछ राजनीतिक समूहों के जरिए सऊदी अरब पर दबाव बनाने और उसे संघर्ष में खींचने की कोशिश की गई। लेकिन नेतृत्व ने सार्वजनिक बयानबाजी से दूरी बनाकर स्थिति को बिगड़ने से रोका। उनके अनुसार, यदि उस समय स्थिति नियंत्रण से बाहर जाती तो क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था और सुरक्षा ढांचे को भारी नुकसान पहुंच सकता था।

    MBS की रणनीति पर फोकस
    तुर्की अल-फैसल ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की नीति को “दूरदर्शी और व्यावहारिक” बताया। उनके अनुसार, सऊदी अरब ने सीधे टकराव से बचकर क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता दी, जिससे एक बड़े युद्ध की आशंका टल गई।

    क्षेत्रीय राजनीति पर असर
    यह बयान ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और खाड़ी देशों के बीच तनाव पहले से ही उच्च स्तर पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के दावे भले ही राजनीतिक दृष्टिकोण हों, लेकिन ये क्षेत्र में जारी शक्ति संतुलन और कूटनीतिक संघर्ष को दर्शाते हैं।

    तुर्की अल-फैसल का यह दावा एक बार फिर दिखाता है कि पश्चिम एशिया की राजनीति कितनी जटिल और संवेदनशील है। जहां एक ओर सैन्य तनाव की आशंकाएं बनी रहती हैं, वहीं दूसरी ओर कूटनीति और संयम कई बार बड़े युद्धों को टालने में अहम भूमिका निभाते हैं।

  • ईरान ने खाड़ी में बढ़ाया तनाव, UAE को लेकर सऊदी अरब को दी कथित चेतावनी; अबू धाबी पर हमले की रणनीति का दावा

    ईरान ने खाड़ी में बढ़ाया तनाव, UAE को लेकर सऊदी अरब को दी कथित चेतावनी; अबू धाबी पर हमले की रणनीति का दावा


    नई दिल्ली। तेहरान और खाड़ी देशों के बीच तनाव एक बार फिर तेज होता दिख रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान ने सऊदी अरब और ओमान के साथ बातचीत के दौरान संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को लेकर सख्त और आक्रामक रुख अपनाया है, जिससे पूरे क्षेत्र में कूटनीतिक हलचल बढ़ गई है।

    रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिमी मीडिया में दावा किया गया है कि ईरानी अधिकारियों ने बातचीत के दौरान संकेत दिया कि यदि क्षेत्रीय संघर्ष और बढ़ता है तो UAE को “कड़े जवाब” का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, इस बातचीत का आधिकारिक समय और पूरा विवरण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है, लेकिन इसे खाड़ी देशों के बीच बढ़ते अविश्वास के रूप में देखा जा रहा है।

    सूत्रों के मुताबिक, ईरान ने सऊदी अरब के सामने यह भी इशारा किया कि वह खाड़ी क्षेत्र में मौजूदा शक्ति संतुलन को अच्छी तरह समझता है और जरूरत पड़ने पर रणनीतिक जवाब देने की क्षमता रखता है। इस बयानबाजी को रियाद और अबू धाबी के बीच पहले से मौजूद मतभेदों को और गहरा करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।

    खाड़ी क्षेत्र में पहले से ही कई मोर्चों पर तनाव बना हुआ है। यमन संघर्ष में सऊदी अरब और UAE अलग-अलग पक्षों का समर्थन करते रहे हैं, जबकि सूडान और लीबिया जैसे देशों में भी दोनों देशों की नीतियां अक्सर एक-दूसरे के विपरीत रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में ईरान की हालिया बयानबाजी ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान का यह कड़ा संदेश सिर्फ सैन्य चेतावनी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय कूटनीति में दबाव बनाने की रणनीति भी हो सकता है। वहीं सऊदी अरब और UAE दोनों ही अपनी सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारियों को लेकर सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। फिलहाल, इस पूरे मामले पर आधिकारिक स्तर पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन खाड़ी की राजनीति में हलचल साफ महसूस की जा रही है।

  • UAE ने मांगा अरबों का कर्ज, पाकिस्तान पर बढ़ा दबाव; सऊदी अरब से बढ़ी उम्मीदें

    UAE ने मांगा अरबों का कर्ज, पाकिस्तान पर बढ़ा दबाव; सऊदी अरब से बढ़ी उम्मीदें

    इस्लामाबाद। आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए नया संकट खड़ा हो गया है। संयुक्त अरब अमीरात द्वारा अरबों डॉलर का कर्ज वापस मांगे जाने के बीच अब सऊदी अरब एक बार फिर उसके लिए ‘संकटमोचक’ के रूप में उभरता नजर आ रहा है।

    इसी कड़ी में सऊदी वित्त मंत्री मोहम्मद अल-जदान का इस्लामाबाद दौरा काफी अहम माना जा रहा है। इसे पाकिस्तान को संभावित आर्थिक राहत के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

    पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सऊदी नेतृत्व के प्रति आभार जताते हुए कहा कि सऊदी सहयोग ने देश की आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    UAE का कर्ज लौटाने से बढ़ेगी मुश्किलें
    जानकारी के मुताबिक, पाकिस्तान 2018 में लिए गए 3 अरब डॉलर से अधिक के कर्ज को UAE को लौटाने की प्रक्रिया में है। यह राशि उसके विदेशी मुद्रा भंडार का करीब 18 प्रतिशत है। ऐसे में भुगतान से देश की आर्थिक स्थिति पर सीधा दबाव पड़ना तय माना जा रहा है।

    स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के अनुसार, मार्च के अंत तक देश के पास करीब 16.4 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था, जो लगभग तीन महीने के आयात के लिए पर्याप्त माना जाता है।

    खाड़ी देशों के बदलते समीकरण
    विशेषज्ञों का मानना है कि UAE द्वारा कर्ज रोलओवर से इनकार केवल आर्थिक नहीं, बल्कि बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों का भी संकेत हो सकता है। खासकर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े हालात के बीच यह कदम अहम माना जा रहा है। हालांकि पाकिस्तान ने इसे सामान्य वित्तीय प्रक्रिया बताया है।

    सऊदी-पाकिस्तान रक्षा सहयोग भी मजबूत
    इस बीच सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रणनीतिक साझेदारी भी गहरी होती दिख रही है। सऊदी रक्षा मंत्रालय के अनुसार, पाकिस्तानी वायुसेना का एक दल पूर्वी क्षेत्र स्थित किंग अब्दुलअजीज एयर बेस पर तैनात किया गया है। इसमें लड़ाकू और सहायक विमान शामिल हैं, जिनका उद्देश्य सैन्य समन्वय और ऑपरेशनल तैयारियों को मजबूत करना है।

    IMF और कर्ज भुगतान की दोहरी चुनौती
    पाकिस्तान पर इस महीने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को 1.3 अरब डॉलर के बॉन्ड का भुगतान भी करना है। साथ ही वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 1.2 अरब डॉलर की अगली किस्त का इंतजार कर रहा है।

    आर्थिक जानकारों का कहना है कि UAE के अचानक रुख ने पाकिस्तान की वित्तीय योजना को झटका दिया है। अब देश को विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट से बचने और आर्थिक संतुलन बनाए रखने के लिए सऊदी अरब सहित अन्य सहयोगी देशों पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है।

    कुल मिलाकर, मौजूदा हालात में पाकिस्तान के लिए आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ती दिख रही हैं, और उसकी नजरें एक बार फिर सऊदी समर्थन पर टिकी हैं।

  • सऊदी भागा आकिब, एटीएस जांच में बड़ा खुलासा; 2025 से लापता, लुकआउट नोटिस जारी

    सऊदी भागा आकिब, एटीएस जांच में बड़ा खुलासा; 2025 से लापता, लुकआउट नोटिस जारी


    लखनऊ। संदिग्ध आतंकी कनेक्शन की जांच में घिरे आकिब के खिलाफ अब एजेंसियों ने शिकंजा कसना तेज कर दिया है। एटीएस की पड़ताल में सामने आया है कि वह चार बार सऊदी अरब जा चुका है और अगस्त 2025 में चौथी बार विदेश जाने के बाद से अब तक भारत नहीं लौटा है। उसके खिलाफ लुकआउट सर्कुलर जारी कर दिया गया है, वहीं पासपोर्ट निरस्त करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है।

    जांच में सामने आई ट्रैवल हिस्ट्री के मुताबिक, आकिब का पासपोर्ट 9 अप्रैल 2018 को बना था। वह पहली बार 4 अगस्त 2019 को सऊदी अरब गया और 8 फरवरी 2022 को भारत लौटा। इसके बाद 8 अप्रैल 2022 को दोबारा सऊदी गया और 11 अप्रैल 2023 को वापस आया। तीसरी बार वह 20 जून 2023 को गया और 22 जुलाई 2025 को भारत लौटा। हालांकि, महज 10 दिन बाद ही 1 अगस्त 2025 को वह फिर सऊदी चला गया और तब से वहीं पर है।

    एटीएस ने उसकी पूरी यात्रा का ब्योरा खंगाल लिया है और अब उसे भारत वापस लाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। अधिकारियों का कहना है कि आकिब के हिरासत में आने के बाद आतंकी मॉड्यूल और संभावित साजिश से जुड़े कई अहम खुलासे हो सकते हैं।

    वीडियो जारी कर दी सफाई, कहा—अगर गलत हूं तो गोली मार देना

    इधर, मामले में तीन दिन पहले मॉड्यूल से जुड़े उवैद और जलाल हैदर की गिरफ्तारी के बाद यह प्रकरण और चर्चा में आया। इसी बीच आकिब ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर एक वीडियो जारी कर अपनी सफाई दी है।

    वीडियो में उसने पुलिस अधिकारियों के प्रति सम्मान जताते हुए कहा कि वह देश की सुरक्षा करने वालों की इज्जत करता है। उसने यह भी दावा किया कि उसने अपने साथी को पुलिस के सामने सरेंडर कर सच्चाई बताने की सलाह दी थी। आकिब ने अपने ऊपर लगे आतंकी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसने कोई आपराधिक गतिविधि नहीं की, केवल गुस्से में अपशब्द कहे थे।

    वीडियो के अंत में उसने भावुक अपील करते हुए कहा, “मैं अपने ऊपर आतंकवादी का ठप्पा नहीं लगने दूंगा। अगर मैं गलत हूं, तो मेरे माथे पर गोली मार देना।”

    फिलहाल, एजेंसियां उसके ठिकाने और नेटवर्क की गहन जांच में जुटी हैं।

  • ईरान संघर्ष के बीच सऊदी अरब को दोहरा झटका, तेल सप्लाई के वैकल्पिक मार्ग पर हमला

    ईरान संघर्ष के बीच सऊदी अरब को दोहरा झटका, तेल सप्लाई के वैकल्पिक मार्ग पर हमला

    तेहरान। पश्चिम एशिया में जारी जंग ट्रंप के सीजफायर के ऐलान के बाद थम गई है। लेकिन इसकी वजह से होने वाले नुकसान की भरपाई करने में कई वर्ष लग जाएंगे। इस युद्ध के दौरान ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया था, जिसकी वजह से पूरी दुनिया में कच्चे तेल के दामों में उछाल आ गया था। सऊदी अरब ने तेल सप्लाई के अपने दूसरे रास्ते (ईस्ट-वेस्ट तेल पाइपलाइन) का उपयोग करना शुरू कर दिया था। हालांकि, अब सामने आईं रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरानी हमले में इस पाइपलाइन को भी नुकसान पहुंचा है।

    रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भले ही ट्रंप के सीजफायर ऐलान के बाद होर्मुज का रास्ता खुल गया हो, लेकिन इसके बाद भी लाखों बैरल तेल कच्चे बाजार से बाहर होने की आशंका है।

    सऊदी अरब में मौजूद एक स्त्रोत के मुताबिक ईरान ने अपने हमलों के दौरान सऊदी अरब के कई तेल प्रतिष्ठानों और तेल सप्लाई प्वाइंट्स को निशाना बनाया था। इसमें ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन और उसके एक केंद्र (यानबू बंदरगाह) को भी निशाना बनाया गया है। इस पाइपलाइन के जरिए सऊदी अरब होर्मुज को बायपास करके तेल की सप्लाई को चालू रखता है।

    बता दें, ईरान के साथ बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए ही सऊदी अरब ने ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का निर्माण किया था। इसके जरिए तेल सप्लाई को यानबू पर ले जाकर लाल सागर के जरिए आगे बढ़ाया जाता है।

    इस पाइपलाइन के जरिए प्रतिदिन लगभग 70 लाख बैरल तेल सप्लाई होता था। 28 फरवरी के बाद सामने आए शिपिंग डेटा के मुताबिक यानबू की क्षमता करीब 4.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन है। पिछले कुछ दिनों से यह लगातार अपनी पूरी क्षमता के साथ काम कर रही थी। लेकिन अब इस पर भी हमला करके ईरान ने सऊदी के इस कदम पर भी पानी फेर दिया है।

    तेल प्रतष्ठानों पर हुए इन हमलों की जिम्मेदारी आईआरजीसी ने ली है।

    बुधवार को जारी एक बयान में आईआरजीसी की तरफ से कहा गया कि फारस की खाड़ी में कई लक्ष्यों के ऊपर मिसाइलों और ड्रोन्स के जरिए हमला किया गया है। इसमें यानबू में मौजूद अमेरिकी कंपनियों के ठिकानों को भी निशाना बनाया। यह पहली बार नहीं है कि जब इस संघर्ष के दौरान ईरान ने यानबू बंदरगाह को निशाना बनाने की कोशिश की है। इससे पहले भी ईरान ने खाड़ी क्षेत्र के तमाम ऊर्जा केंद्रों को निशाना बनाया था। होर्मुज के ऊपर तेहरान ने पहले से ही पाबंदी लगा रखी थी। इसकी वजह से पूरी दुनिया में तेल के दाम आसमान छू रहे थे। हालांकि, अब सीजफायर के ऐलान के साथ ही होर्मुज को खोलने पर भी सहमति बनी है। विशेषज्ञों के मुताबिक अगर कल से होर्मुज अपनी पूरी क्षमता के साथ शुरू भी हो जाता है, तब भी स्थिति को सामान्य होने में कई महीनों का वक्त लग जाएगा।