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  • सावन में शिव आराधना के साथ खानपान और पूजा विधि का रखें ध्यान, जानिए महिलाओं के लिए बताए गए जरूरी नियम

    सावन में शिव आराधना के साथ खानपान और पूजा विधि का रखें ध्यान, जानिए महिलाओं के लिए बताए गए जरूरी नियम


    नई दिल्ली । 
    हिंदू धर्म में सावन का महीना भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्रत रखते हैं और शिव मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन में की गई शिव उपासना, सोमवार व्रत और विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का अलग महत्व होता है। सुहागिन महिलाएं भी पति की सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना के साथ इस महीने में विभिन्न व्रत और पूजा करती हैं।

    सावन के दौरान महिलाओं के लिए सुबह जल्दी उठकर स्नान करने और स्वच्छ वस्त्र धारण करने की परंपरा बताई गई है। इसके बाद भगवान शिव की पूजा और अपनी श्रद्धा के अनुसार व्रत या धार्मिक अनुष्ठान किया जाता है। मान्यता है कि दिन की शुरुआत धार्मिक कार्यों और सकारात्मक विचारों के साथ करने से पूजा के प्रति एकाग्रता बनी रहती है।

    धार्मिक मान्यताओं में सावन के दौरान काले वस्त्रों से परहेज करने की बात कही जाती है। इसके स्थान पर हरे रंग को शुभ माना जाता है। सावन में हरा रंग प्रकृति, हरियाली और सौभाग्य से जोड़ा जाता है। हालांकि इन परंपराओं को धार्मिक मान्यता के रूप में ही देखा जाना चाहिए और अलग-अलग क्षेत्रों तथा परिवारों में इनके पालन का तरीका अलग हो सकता है।

    शिव पूजा से जुड़ी सामग्री को लेकर भी कुछ मान्यताएं प्रचलित हैं। सावन में भगवान शिव को बेलपत्र, भांग और धतूरा अर्पित करने की परंपरा है। वहीं तुलसी, हल्दी और केतकी के फूल को शिव पूजा में अर्पित न करने की धार्मिक मान्यता बताई जाती है। पूजा सामग्री का उपयोग करते समय श्रद्धालु अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय धार्मिक विधि का भी ध्यान रखते हैं।

    सावन के व्रत के दौरान सात्विक भोजन करने पर विशेष जोर दिया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में मांसाहार और मदिरा से दूर रहने की परंपरा है। व्रत रखने वाली महिलाएं अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार फलाहार या सात्विक भोजन करती हैं। भोजन को लेकर किसी भी प्रकार का व्रत रखने से पहले अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है।

    सावन के व्रत और पूजा के दिनों में बैंगन, मूली तथा कुछ पत्तेदार सब्जियों से परहेज करने की परंपरा भी बताई जाती है। इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ मौसम संबंधी पारंपरिक कारण भी बताए जाते हैं। बारिश के मौसम में कुछ सब्जियों में कीड़े लगने की संभावना अधिक मानी जाती थी, इसलिए पुराने समय से इनके सेवन को सीमित करने की परंपरा विकसित हुई।

    मासिक धर्म को लेकर भी कुछ पारंपरिक धार्मिक नियम बताए जाते हैं, जिनमें शिवलिंग को स्पर्श न करने की मान्यता शामिल है। हालांकि यह धार्मिक परंपरा का विषय है और अलग-अलग परिवारों तथा समुदायों में इसके पालन के तरीके भिन्न हो सकते हैं। इस दौरान महिलाओं के लिए व्यक्तिगत स्वच्छता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है।

    सुहागिन महिलाओं के लिए सावन में मंगली गौरी, शिवरात्रि और हरियाली तीज जैसे व्रतों का भी विशेष महत्व बताया जाता है। वहीं अविवाहित लड़कियां भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से सावन के सोमवार का व्रत रखने की धार्मिक परंपरा का पालन करती हैं। सावन का मूल उद्देश्य श्रद्धा, संयम और भगवान शिव की भक्ति से जुड़ा माना जाता है। इसलिए पूजा और व्रत करते समय धार्मिक आस्था के साथ स्वास्थ्य, स्वच्छता और अपनी क्षमता का ध्यान रखना भी आवश्यक है।

  • सावन में नॉनवेज क्यों छोड़ते हैं लोग, जानिए धार्मिक मान्यता के साथ मानसून और खाद्य सुरक्षा से जुड़े प्रमुख कारण

    सावन में नॉनवेज क्यों छोड़ते हैं लोग, जानिए धार्मिक मान्यता के साथ मानसून और खाद्य सुरक्षा से जुड़े प्रमुख कारण

    नई दिल्ली ।सावन का महीना शुरू होते ही देश के कई हिस्सों में लोग खानपान में बदलाव करते हैं। बहुत से परिवारों में इस दौरान मांस, मछली, चिकन और अंडे से दूरी बनाई जाती है। कुछ लोग प्याज और लहसुन का सेवन भी छोड़ देते हैं। आमतौर पर इसे धार्मिक आस्था से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसके पीछे जीवनशैली, संयम, जीवदया और मानसून के दौरान खाद्य सुरक्षा जैसे पहलुओं को भी समझा जा सकता है।

    हिंदू परंपरा में सावन भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु व्रत रखते हैं, पूजा करते हैं और ध्यान तथा धार्मिक गतिविधियों में समय देते हैं। धार्मिक दृष्टि से साधना के समय भोजन में सादगी और संयम को महत्व दिया जाता है। इसी सोच के तहत कई लोग मांसाहार छोड़कर हल्का और सात्त्विक भोजन अपनाते हैं।

    सात्त्विक भोजन की अवधारणा ताजे, पौष्टिक और अपेक्षाकृत हल्के भोजन से जुड़ी है। इसका उद्देश्य केवल खानपान को बदलना नहीं, बल्कि इंद्रियों पर नियंत्रण और मन को शांत रखने की साधना से भी जोड़ा जाता है। हालांकि धार्मिक ग्रंथों में सावन के दौरान हर व्यक्ति के लिए मांसाहार पूरी तरह प्रतिबंधित होने का सीधा निर्देश नहीं मिलता। यह परंपरा धार्मिक आचार, स्थानीय मान्यताओं और लंबे समय से चली आ रही जीवनशैली का हिस्सा बनी है।

    सावन चातुर्मास की अवधि में भी आता है। परंपरागत रूप से यह समय तप, व्रत, दान और आत्मसंयम के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। वर्षा ऋतु में साधु-संतों द्वारा यात्राएं सीमित करने की परंपरा भी रही है। इसे मौसम की कठिन परिस्थितियों के साथ-साथ छोटे जीवों को अनजाने में नुकसान से बचाने की भावना से भी जोड़ा जाता है।

    बारिश के मौसम में वातावरण में नमी बढ़ जाती है और कई प्रकार के सूक्ष्मजीवों की गतिविधियां बढ़ सकती हैं। मांस, मछली, चिकन और अंडे जैसे खाद्य पदार्थ जल्दी खराब होने वाले होते हैं। इनके सुरक्षित भंडारण और उचित तापमान पर रखे जाने की जरूरत होती है। कच्चे मांस को गलत तरीके से रखने या संभालने पर उसमें मौजूद हानिकारक सूक्ष्मजीव दूसरे खाद्य पदार्थों तक भी पहुंच सकते हैं।

    मानसून में जलभराव, दूषित पानी, अस्वच्छ बाजार और बिजली आपूर्ति में बाधा जैसी परिस्थितियां खाद्य पदार्थों की स्वच्छता को प्रभावित कर सकती हैं। पुराने समय में रेफ्रिजरेशन और सुरक्षित परिवहन की सुविधाएं सीमित थीं। ऐसे वातावरण में जल्दी खराब होने वाले भोजन से दूरी बनाना व्यावहारिक सावधानी भी रही होगी।

    हालांकि विज्ञान यह नहीं कहता कि सावन के महीने में मांसाहार अपने आप हानिकारक हो जाता है। बीमारी का जोखिम मुख्य रूप से भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता, भंडारण और पकाने की प्रक्रिया पर निर्भर करता है। यदि मांस या मछली ताजा हो, उचित तापमान पर रखी गई हो और पूरी तरह पकाई जाए तो संक्रमण का खतरा कम किया जा सकता है।

    इसी तरह यह दावा भी सही नहीं है कि सावन में हर व्यक्ति की पाचन शक्ति निश्चित रूप से कमजोर हो जाती है। उमस, कम शारीरिक गतिविधि, अनियमित खानपान और बहुत अधिक तला या मसालेदार भोजन कुछ लोगों में अपच और भारीपन बढ़ा सकता है, लेकिन इसका प्रभाव व्यक्ति की स्थिति और खानपान पर निर्भर करता है।

    इसलिए सावन में नॉनवेज खाना या छोड़ना व्यक्तिगत आस्था, पारिवारिक परंपरा और स्वास्थ्य संबंधी प्राथमिकताओं पर निर्भर कर सकता है। धार्मिक दृष्टि से इसे संयम और जीवदया का माध्यम माना जाता है, जबकि स्वास्थ्य की दृष्टि से मानसून में भोजन की स्वच्छता और सुरक्षित रखरखाव पर विशेष ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण है।

    सावन की इस परंपरा को केवल डर या बीमारी से जोड़कर देखने के बजाय इसके व्यापक भाव को समझना जरूरी है। इसमें कुछ समय के लिए स्वाद और इच्छाओं पर नियंत्रण, सादगी अपनाने, प्रकृति के प्रति संवेदनशील रहने और भोजन को लेकर सावधानी बरतने की भावना शामिल है।

  • रक्षाबंधन मेहंदी डिजाइन, भाई के नाम वाली मेहंदी, भाई बहन मेहंदी डिजाइन, राखी मोटिफ मेहंदी, सिंपल अरेबिक मेहंदी

    रक्षाबंधन मेहंदी डिजाइन, भाई के नाम वाली मेहंदी, भाई बहन मेहंदी डिजाइन, राखी मोटिफ मेहंदी, सिंपल अरेबिक मेहंदी


    नई दिल्ली । 
    रक्षाबंधन का त्योहार भाई और बहन के रिश्ते की मिठास, अपनापन और प्रेम को खास तरीके से मनाने का अवसर होता है। इस दिन राखी बांधने के साथ सजने संवरने की भी खास तैयारी की जाती है। सावन के मौसम में मेहंदी का रंग त्योहार की रौनक को और बढ़ा देता है। अगर आप इस रक्षाबंधन पर हाथों में ऐसी मेहंदी लगाना चाहती हैं, जो खूबसूरत होने के साथ त्योहार की भावना को भी दर्शाए, तो कुछ खास डिजाइन आपके लिए बेहतर विकल्प हो सकती हैं।

    भाई के नाम वाली मेहंदी रक्षाबंधन के लिए सबसे खास और भावनात्मक डिजाइन में शामिल की जा सकती है। हथेली के बीच में भाई, भैया या कोई प्यारा संदेश लिखकर उसके चारों ओर फूल और पत्तियों की बेल बनाई जा सकती है। इस डिजाइन को बहुत ज्यादा भरने की जरूरत नहीं होती। हल्की और साफ पैटर्न के साथ यह मेहंदी आकर्षक दिखाई देती है।

    भाई बहन थीम वाली मेहंदी भी इस मौके पर काफी खूबसूरत लगती है। हथेली पर भाई बहन की छोटी सी आकृति या राखी बांधने का दृश्य बनाया जा सकता है। इस तरह की डिजाइन रक्षाबंधन के रिश्ते को सीधे तौर पर प्रदर्शित करती है और सामान्य मेहंदी से अलग दिखाई देती है। जिन लोगों को थीम आधारित डिजाइन पसंद हैं, उनके लिए यह अच्छा विकल्प हो सकता है।

    राखी मोटिफ वाली मेहंदी भी इस बार हाथों पर सजाई जा सकती है। हथेली के बीच में राखी का डिजाइन बनाकर उसके चारों ओर छोटे फूल, पत्तियां और बिंदुओं का इस्तेमाल किया जा सकता है। इस डिजाइन में रक्षाबंधन की पहचान साफ नजर आती है और इसे अपनी पसंद के अनुसार छोटा या बड़ा रखा जा सकता है।

    अगर आपको ज्यादा भरी हुई मेहंदी पसंद नहीं है तो फ्लोरल अरेबिक डिजाइन बेहतर विकल्प हो सकती है। इसमें फूलों और बेलों को तिरछे पैटर्न में सजाया जाता है और हथेली का कुछ हिस्सा खाली रखा जाता है। इससे हाथों को हल्का, आधुनिक और सलीकेदार लुक मिलता है। यह डिजाइन पारंपरिक और आधुनिक अंदाज का संतुलन भी बनाती है।

    मंडला और जाली पैटर्न वाली मेहंदी उन लोगों के लिए उपयोगी है, जो कम समय में सुंदर डिजाइन चाहती हैं। हथेली के बीच में छोटा मंडला बनाकर उंगलियों पर जाली, पत्तियों या डॉट पैटर्न जोड़ा जा सकता है। यह डिजाइन ज्यादा जटिल नहीं होती और साफ-सुथरे तरीके से बनाई जाए तो काफी आकर्षक दिखाई देती है।

    अगर आपके पास मेहंदी लगाने के लिए ज्यादा समय नहीं है तो केवल उंगलियों और कलाई पर डिजाइन बनवाना भी अच्छा विकल्प है। फिंगर टिप मेहंदी में छोटी बेल, फूल, डॉट्स या ज्यामितीय पैटर्न बनाए जा सकते हैं। यह मिनिमल डिजाइन पारंपरिक त्योहार के साथ आधुनिक लुक भी देती है।

    रक्षाबंधन पर मेहंदी का चुनाव करते समय अपने कपड़ों, आभूषणों और पसंद को ध्यान में रखा जा सकता है। भारी पारंपरिक पोशाक के साथ भरी हुई डिजाइन और हल्के या आधुनिक परिधान के साथ अरेबिक या मिनिमल मेहंदी अच्छी लग सकती है। भाई के नाम या राखी मोटिफ वाली डिजाइन त्योहार की थीम को और खास बना सकती है। सबसे जरूरी है कि डिजाइन ऐसी हो जिसे आसानी से संभाला जा सके और आपके पूरे रक्षाबंधन लुक के साथ स्वाभाविक रूप से मेल खाए।

  • सावन व्रत में आलू चोखा की जगह बनाएं स्वादिष्ट टमाटर चोखा, 10 मिनट में तैयार होगी चटपटी और सात्विक डिश

    सावन व्रत में आलू चोखा की जगह बनाएं स्वादिष्ट टमाटर चोखा, 10 मिनट में तैयार होगी चटपटी और सात्विक डिश

    नई दिल्ली । सावन का महीना आते ही घरों में व्रत, पूजा और सात्विक भोजन का महत्व बढ़ जाता है। इस दौरान अधिकांश लोग प्याज और लहसुन से परहेज करते हैं और खाने में आलू आधारित व्यंजनों का उपयोग अधिक करने लगते हैं। हालांकि लगातार आलू से बनी चीजें खाने के कारण कई बार स्वाद में एकरसता आ जाती है। ऐसे में टमाटर का चोखा एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है, जो स्वादिष्ट होने के साथ-साथ हल्का और झटपट बनने वाला व्यंजन भी है।

    टमाटर का चोखा उत्तर भारत के कई हिस्सों में पसंद किया जाता है। इसका खट्टा-तीखा स्वाद साधारण व्रत के भोजन को भी खास बना देता है। इस रेसिपी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे तैयार करने में ज्यादा समय नहीं लगता और बहुत कम सामग्री की आवश्यकता होती है। घर में उपलब्ध कुछ सामान्य चीजों की मदद से इसे आसानी से बनाया जा सकता है।

    इस व्यंजन को बनाने के लिए सबसे पहले तीन से चार पके हुए टमाटर और दो हरी मिर्च लें। इन्हें हल्का सा तेल लगाकर सीधे गैस की आंच पर अच्छी तरह भून लें। जब टमाटर नरम हो जाएं और उनका छिलका काला पड़ने लगे, तब उन्हें निकालकर ठंडा होने दें। इसके बाद टमाटर और मिर्च का छिलका उतार लें। भूनने की प्रक्रिया से इसमें एक विशेष स्मोकी फ्लेवर आता है, जो चोखे के स्वाद को और बेहतर बनाता है।

    अब भुने हुए टमाटर और मिर्च को सिलबट्टे या किसी बर्तन में डालकर हल्का दरदरा कूट लें। इसके साथ दो बड़े चम्मच भूनी हुई मूंगफली, एक छोटा चम्मच भूना जीरा, आधा छोटा चम्मच काली मिर्च पाउडर और स्वादानुसार सेंधा नमक मिलाएं। इन सभी सामग्रियों को अच्छी तरह मिलाएं, लेकिन ध्यान रखें कि मिश्रण पूरी तरह पेस्ट न बने। हल्का दरदरा टेक्सचर ही इस रेसिपी की पहचान माना जाता है।

    इसके बाद इसमें बारीक कटा हुआ हरा धनिया और एक छोटा चम्मच ताजा नींबू का रस मिलाएं। सभी सामग्री को अच्छी तरह मिलाने के बाद टमाटर का चोखा तैयार हो जाता है। नींबू का रस इसमें अतिरिक्त ताजगी और स्वाद जोड़ता है, जबकि मूंगफली हल्का कुरकुरापन प्रदान करती है।

    टमाटर का यह चोखा व्रत में खाए जाने वाले कई व्यंजनों के साथ परोसा जा सकता है। इसे कुट्टू या सिंहाड़े की पूरी, साबूदाना टिक्की, राजगीरा पराठा और सामक के चावल के साथ खाया जा सकता है। इसका तीखा और खट्टा स्वाद साधारण भोजन को भी स्वादिष्ट बना देता है। यही कारण है कि यह तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

    पोषण के दृष्टिकोण से भी यह व्यंजन अच्छा माना जाता है। टमाटर में विटामिन सी, एंटीऑक्सीडेंट और कई आवश्यक पोषक तत्व पाए जाते हैं। वहीं मूंगफली प्रोटीन और हेल्दी फैट का अच्छा स्रोत है। इस वजह से यह केवल स्वाद ही नहीं बल्कि पोषण भी प्रदान करता है।

    अगर आप सावन के व्रत या सात्विक भोजन के दौरान कुछ नया, हल्का और स्वादिष्ट बनाना चाहते हैं, तो टमाटर का चोखा एक शानदार विकल्प हो सकता है। कम समय, कम सामग्री और बेहतरीन स्वाद की वजह से यह रेसिपी हर उम्र के लोगों को पसंद आ सकती है और व्रत के भोजन में एक नया स्वाद जोड़ सकती है।

  • सावन के अंतिम सोमवार पर नाग पंचमी का दुर्लभ संयोग, 17 अगस्त को इस शुभ मुहूर्त में होगी पूजा

    सावन के अंतिम सोमवार पर नाग पंचमी का दुर्लभ संयोग, 17 अगस्त को इस शुभ मुहूर्त में होगी पूजा

    नई दिल्ली : सनातन परंपरा में सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का विशेष महत्व माना गया है। इस वर्ष नाग पंचमी का पावन पर्व 17 अगस्त को बेहद शुभ संयोग में मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार पंचमी तिथि का प्रारंभ 16 अगस्त की शाम से हो रहा है, लेकिन शास्त्रों में उदयातिथि की मान्यता के कारण यह पर्व 17 अगस्त को ही देशभर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा।

    धार्मिक विद्वानों के अनुसार इस बार नाग पंचमी पर सावन सोमवार का विशेष संयोग बन रहा है, जिससे इस दिन का आध्यात्मिक महत्व और अधिक बढ़ गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नाग देवता भगवान शिव के अत्यंत प्रिय हैं और उनके गले का आभूषण हैं। यही कारण है कि इस दिन शिवजी के साथ-साथ नाग देव की उपासना करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और साधक को भय से मुक्ति मिलती है।

    इस साल पूजन के लिए सुबह का समय अत्यंत फलदायी बताया गया है। 17 अगस्त की सुबह 5 बजकर 51 मिनट से 8 बजकर 29 मिनट तक पूजा का सबसे उत्तम मुहूर्त रहेगा। इस अवधि में श्रद्धालु शिव मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर स्थापित नाग देव का जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक, रोली, अक्षत और पुष्प अर्पित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर सकते हैं।

    धार्मिक ग्रंथों और भविष्य पुराण में नाग पंचमी के महत्व का विस्तार से वर्णन मिलता है। मान्यता है कि इस तिथि पर नाग लोक में विशेष उत्सव मनाया जाता है, इसलिए पृथ्वी लोक पर भी नाग देव की पूजा का विधान है। महाभारतकालीन राजा जनमेजय के नाग यज्ञ और आस्तिक मुनि द्वारा नागों की रक्षा की कथा भी इस पर्व से गहराई से जुड़ी हुई है, जो जीवों के प्रति दया और संरक्षण का संदेश देती है।

    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिनकी कुंडली में कालसर्प दोष या राहु-केतु से जुड़े कष्ट होते हैं, उनके लिए इस दिन पूजा-पाठ और दान करना विशेष लाभप्रद माना जाता है। उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में, जिनमें मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्य शामिल हैं, घर के मुख्य द्वार पर गोबर से नाग देव की आकृति बनाकर पूजन करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि धार्मिक आस्था के साथ-साथ व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना भी आवश्यक है। कई स्थानों पर जीवित सर्पों को दूध पिलाने का प्रयास किया जाता है, जो वैज्ञानिक रूप से अनुचित है। इसलिए श्रद्धालुओं को सलाह दी जाती है कि वे किसी जीव को कष्ट दिए बिना केवल मंदिर में स्थापित प्रतिमा या चित्र की ही शास्त्रीय विधि से पूजा करें।

  • सावन में आगर-मालवा बना शिवमय, विशाल कलश यात्रा में उमड़ा श्रद्धालुओं का जनसैलाब, वर्चुअली जुड़े मुख्यमंत्री मोहन यादव

    सावन में आगर-मालवा बना शिवमय, विशाल कलश यात्रा में उमड़ा श्रद्धालुओं का जनसैलाब, वर्चुअली जुड़े मुख्यमंत्री मोहन यादव

    मध्य प्रदेश :  के आगर-मालवा में सावन माह के अवसर पर आयोजित विशाल कलश यात्रा में आस्था और श्रद्धा का बड़ा जनसमागम देखने को मिला। विधायक मधु गेहलोत के आह्वान पर आयोजित इस यात्रा में हजारों महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में सिर पर कलश धारण कर हिस्सा लिया। यात्रा के दौरान हर-हर महादेव और जय भोलेनाथ के जयघोष से शहर का वातावरण भक्तिमय हो गया।

    विशाल कलश यात्रा की शुरुआत पुरानी कृषि उपज मंडी परिसर से हुई। यात्रा रवाना होने से पहले यहां धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद महिलाओं और श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या के साथ यात्रा शहर के प्रमुख मार्गों की ओर रवाना हुई। सावन के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में महिलाओं की बड़ी भागीदारी मुख्य आकर्षण रही।

    यात्रा के दौरान आगर-मालवा के प्रमुख मार्गों पर श्रद्धालुओं की लंबी कतारें दिखाई दीं। कई स्थानों पर लोगों ने पुष्पवर्षा कर कलश यात्रा का स्वागत किया। पूरे मार्ग में भक्ति गीतों और धार्मिक जयघोषों से वातावरण शिवमय बना रहा। बड़ी संख्या में महिलाओं के सिर पर सजे कलशों ने यात्रा की भव्यता को और बढ़ाया।

    इस धार्मिक आयोजन में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी भोपाल से वर्चुअल माध्यम से जुड़े। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उन्होंने कार्यक्रम में शामिल महिलाओं और श्रद्धालुओं को संबोधित किया। मुख्यमंत्री ने सावन के दौरान आयोजित इस धार्मिक आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि प्रदेश सरकार महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्ध है।

    मुख्यमंत्री ने धार्मिक आयोजनों को सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का माध्यम बताते हुए कार्यक्रम से जुड़े श्रद्धालुओं को शुभकामनाएं दीं। वर्चुअल संबोधन के दौरान उन्होंने महिलाओं की बड़ी भागीदारी को भी महत्वपूर्ण बताया। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री की ऑनलाइन मौजूदगी से आयोजन को अतिरिक्त महत्व मिला।

    कलश यात्रा शहर के विभिन्न प्रमुख मार्गों से होकर बाबा बैजनाथ महादेव मंदिर पहुंची। मंदिर पहुंचने के बाद श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से भगवान शिव का जलाभिषेक किया और पूजा-अर्चना की। इस दौरान प्रदेश और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की गई।

    बाबा बैजनाथ महादेव मंदिर परिसर में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। सावन के धार्मिक माहौल में भगवान शिव के दर्शन और जलाभिषेक के लिए लोगों में उत्साह दिखाई दिया। यात्रा के दौरान धार्मिक अनुशासन और सामूहिक भागीदारी के साथ कार्यक्रम को आगे बढ़ाया गया।

    आयोजन में जनप्रतिनिधियों के साथ सामाजिक संगठनों और धार्मिक संस्थाओं से जुड़े लोगों की भी सहभागिता रही। महिलाओं और युवतियों की बड़ी संख्या में मौजूदगी ने कलश यात्रा को व्यापक स्वरूप दिया। स्थानीय स्तर पर आयोजित इस धार्मिक कार्यक्रम में विभिन्न वर्गों के लोगों ने भाग लेकर सामूहिक आस्था का प्रदर्शन किया।

    सावन के दौरान निकाली गई इस विशाल कलश यात्रा ने आगर-मालवा में धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को एक साथ जोड़ा। यात्रा के माध्यम से श्रद्धालुओं ने भगवान शिव के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की। वहीं बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी ने आयोजन को विशेष स्वरूप दिया।

    कार्यक्रम के दौरान शहर में धार्मिक उत्साह का माहौल बना रहा। पुरानी कृषि उपज मंडी से बाबा बैजनाथ महादेव मंदिर तक निकली यात्रा में श्रद्धालुओं की सहभागिता और जयघोष लगातार सुनाई देते रहे। आयोजन ने सावन की धार्मिक परंपराओं के साथ सामाजिक सहभागिता और सामूहिक एकता का संदेश भी प्रस्तुत किया।

  • सावन के दूसरे सोमवार पर फलाहार में बनाएं कुरकुरी कुट्टू की पकौड़ी, आसान है इसकी रेसिपी

    सावन के दूसरे सोमवार पर फलाहार में बनाएं कुरकुरी कुट्टू की पकौड़ी, आसान है इसकी रेसिपी


    नई दिल्ली । 
    सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान आने वाले सोमवार को श्रद्धालु व्रत रखते हैं और पूरे दिन फलाहार करते हुए भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते हैं। इस साल सावन का दूसरा सोमवार 10 अगस्त को पड़ रहा है। ऐसे में व्रत रखने वाले लोगों के सामने अक्सर यह सवाल रहता है कि फलाहार में ऐसा क्या बनाया जाए जो स्वादिष्ट होने के साथ आसानी से तैयार भी हो जाए।

    व्रत के दौरान कुट्टू का आटा कई घरों में इस्तेमाल किया जाता है। इससे पूरी, चीला, पराठा और पकौड़ी जैसे कई व्यंजन बनाए जा सकते हैं। अगर सोमवार के व्रत में कुछ अलग और स्वादिष्ट खाने का मन है, तो कुट्टू के आटे से बनने वाली आलू की पकौड़ी एक अच्छा विकल्प हो सकती है।

    कुट्टू की पकौड़ी बनाने के लिए मुख्य रूप से कुट्टू का आटा और आलू की जरूरत होती है। इसके साथ स्वाद के लिए सेंधा नमक, हरी मिर्च, अदरक, धनिया और काली मिर्च का इस्तेमाल किया जा सकता है। व्रत के दौरान सामान्य नमक की जगह सेंधा नमक का ही प्रयोग किया जाता है।

    इस रेसिपी के लिए करीब एक कटोरी कुट्टू का आटा लिया जा सकता है। इसके साथ छह आलू, एक हरी मिर्च, एक चम्मच अदरक, धनिया, काली मिर्च और सेंधा नमक की जरूरत होगी। सामग्री की मात्रा स्वाद और जरूरत के अनुसार कम या ज्यादा की जा सकती है।

    सबसे पहले आलू को उबालकर ठंडा कर लें और फिर उन्हें अच्छी तरह मैश कर लें। इसके बाद इसमें बारीक कटी हरी मिर्च, अदरक, धनिया, काली मिर्च और सेंधा नमक मिलाएं। सभी चीजों को अच्छी तरह मिलाने के बाद इसमें कुट्टू का आटा डालकर मिश्रण तैयार किया जा सकता है।

    कुट्टू का आटा मिलाते समय मिश्रण की स्थिरता का ध्यान रखना जरूरी है। इसे इस तरह तैयार किया जाना चाहिए कि पकौड़ी आसानी से आकार ले सके। जरूरत के अनुसार थोड़ा पानी डालकर मिश्रण को तैयार किया जा सकता है। इसके बाद तैयार मिश्रण से छोटे-छोटे हिस्से लेकर पकौड़ी का आकार दिया जा सकता है।

    अब एक कड़ाही में तेल गर्म करें। तेल पर्याप्त गर्म होने के बाद तैयार पकौड़ियों को सावधानी से डालें और उन्हें मध्यम आंच पर सुनहरा और कुरकुरा होने तक पकाएं। पकौड़ियों को बीच-बीच में पलटते रहें, ताकि वे सभी तरफ से अच्छी तरह पक जाएं।

    तैयार होने के बाद पकौड़ियों को कड़ाही से निकालकर कुछ देर के लिए अतिरिक्त तेल निकलने दें। इसके बाद इन्हें व्रत में खाई जाने वाली चटनी या दही के साथ परोसा जा सकता है। अगर आप व्रत के दौरान तेल कम इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो पकौड़ी तैयार करने की अपनी पसंदीदा कम तेल वाली विधि भी अपना सकते हैं।

    कुट्टू की पकौड़ी सावन सोमवार के फलाहार में स्वाद में बदलाव लाने का आसान तरीका है। आलू और कुट्टू के आटे से तैयार यह व्यंजन कम सामग्री में बनाया जा सकता है और परिवार के अन्य सदस्य भी इसे पसंद कर सकते हैं। हालांकि व्रत में भोजन को लेकर अलग-अलग परिवारों और परंपराओं में नियम अलग हो सकते हैं, इसलिए अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार ही सामग्री का इस्तेमाल करना उचित है।

  • सावन का दूसरा सोमवार 10 अगस्त को, 6 साल बाद बन रहे शुभ संयोग में जानें पूजा विधि और शिव आराधना का सही तरीका

    सावन का दूसरा सोमवार 10 अगस्त को, 6 साल बाद बन रहे शुभ संयोग में जानें पूजा विधि और शिव आराधना का सही तरीका

    नई दिल्ली ।सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान आने वाले सोमवार को शिव भक्तों के लिए खास महत्व प्राप्त होता है। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं, भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं और बेलपत्र, फूल, धतूरा, फल तथा प्रसाद अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इस वर्ष सावन का दूसरा सोमवार 10 अगस्त को पड़ रहा है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस बार सावन के दूसरे सोमवार का महत्व इसलिए और बढ़ गया है क्योंकि सोमवार के साथ प्रदोष व्रत का संयोग बन रहा है। उपलब्ध धार्मिक जानकारी के अनुसार, ऐसा शुभ संयोग करीब छह साल बाद बन रहा है। शिव भक्तों के लिए सोमवार और प्रदोष दोनों ही भगवान शिव की उपासना से जुड़े महत्वपूर्ण अवसर माने जाते हैं।

    सावन सोमवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद व्रत का संकल्प लेने की परंपरा है। इसके बाद भगवान शिव का ध्यान करके शिवलिंग पर जल अर्पित किया जाता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दूध या अन्य पूजन सामग्री से अभिषेक भी कर सकते हैं।

    पूजा के दौरान भगवान शिव को बेलपत्र, शमी, कनेर, धतूरा, चावल और फूल अर्पित किए जाते हैं। इसके साथ धूप और दीप जलाकर भगवान शिव की आराधना की जाती है। फल, पान, सुपारी और प्रसाद भी पूजा में शामिल किए जा सकते हैं। श्रद्धालु पूरे दिन व्रत रखते हुए भगवान शिव का स्मरण और मंत्र जाप करते हैं।

    भगवान शिव की पूजा में ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप विशेष रूप से किया जाता है। इसे शिव का सरल और प्रमुख मंत्र माना जाता है। श्रद्धालु पूजा के दौरान इस मंत्र का जाप अपनी श्रद्धा के अनुसार कर सकते हैं।

    सावन सोमवार के साथ प्रदोष व्रत का संयोग होने के कारण इस दिन शिव आराधना का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है। प्रदोष व्रत भी भगवान शिव को समर्पित होता है और प्रदोष काल में शिव पूजा करने की परंपरा है। ऐसे में भक्त सोमवार की पूजा के साथ प्रदोष काल में भी भगवान शिव की आराधना कर सकते हैं।

    इस दिन महामृत्युंजय मंत्र का जाप भी किया जाता है। मंत्र है, “ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥” धार्मिक मान्यताओं में इस मंत्र को भगवान शिव की उपासना से जुड़ा महत्वपूर्ण मंत्र माना गया है।

    सावन सोमवार के अवसर पर देशभर के शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। भक्त शिवलिंग पर जल चढ़ाकर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति और परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। कई श्रद्धालु इस दिन उपवास रखते हैं और पूरे दिन सात्विक जीवनशैली का पालन करते हैं।

    धार्मिक परंपराओं के अनुसार, भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए पूजा में दिखावे के बजाय श्रद्धा और भक्ति को महत्व दिया जाता है। इसलिए श्रद्धालु अपनी सुविधा और सामर्थ्य के अनुसार पूजा सामग्री का उपयोग कर सकते हैं। व्रत रखने वाले लोगों को अपनी स्वास्थ्य स्थिति का भी ध्यान रखना चाहिए।

    10 अगस्त का दूसरा सावन सोमवार इसलिए विशेष माना जा रहा है क्योंकि इस दिन सोमवार और प्रदोष व्रत का संयोग बताया जा रहा है। श्रद्धालु सुबह से शिव पूजा के साथ दिनभर भगवान शिव का स्मरण कर सकते हैं और प्रदोष काल में भी विधिपूर्वक आराधना कर सकते हैं।

  • 10 अगस्त को सावन सोमवार के साथ प्रदोष व्रत, जानें शिवलिंग पर किन चीजों से अभिषेक करना माना जाता है शुभ

    10 अगस्त को सावन सोमवार के साथ प्रदोष व्रत, जानें शिवलिंग पर किन चीजों से अभिषेक करना माना जाता है शुभ

    नई दिल्ली । सावन का दूसरा सोमवार इस बार 10 अगस्त को पड़ रहा है और इसी दिन श्रावण कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि होने से प्रदोष व्रत का संयोग भी बन रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सोमवार भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है, जबकि प्रदोष काल में शिव पूजा का अपना महत्व बताया गया है। ऐसे में दोनों अवसरों के एक साथ आने से शिवभक्तों के लिए यह दिन खास माना जा रहा है।

    मान्यता है कि सावन सोमवार के दिन व्रत रखने और भगवान शिव का विधिपूर्वक पूजन करने से भक्तों को आध्यात्मिक शांति और सकारात्मकता की अनुभूति हो सकती है। इस दिन शिवलिंग पर अलग-अलग सामग्री से अभिषेक करने की परंपरा भी रही है। ज्योतिषीय मान्यताओं में कुछ विशेष सामग्रियों को अलग-अलग ग्रहों से जोड़ा जाता है और उनके माध्यम से ग्रहों की अनुकूलता की कामना की जाती है।

    सबसे सरल और व्यापक रूप से प्रचलित उपाय शुद्ध जल से शिवलिंग का अभिषेक करना है। पूजा के दौरान स्नान और स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद श्रद्धापूर्वक व्रत का संकल्प लिया जा सकता है। इसके बाद शिवलिंग पर शुद्ध जल अर्पित किया जाता है। धार्मिक परंपरा में जलाभिषेक को शांति और शिव आराधना का सहज माध्यम माना गया है।

    चंद्रमा से संबंधित मानसिक शांति और भावनात्मक संतुलन की कामना के लिए दूध से शिवलिंग का अभिषेक करने की परंपरा भी बताई जाती है। सावन सोमवार पर शुद्ध दूध अर्पित करते समय भक्त भगवान शिव से मन की स्थिरता और जीवन में सौम्यता बनाए रखने की प्रार्थना कर सकते हैं। यह पूरी तरह धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यता पर आधारित उपाय है।

    गुरु और शुक्र की अनुकूलता की कामना के लिए शहद से अभिषेक करने का भी उल्लेख मिलता है। धार्मिक मान्यताओं में शहद को मधुरता और शुभता से जोड़ा जाता है। इसी वजह से इसे वाणी में मधुरता, संबंधों में सौहार्द और पारिवारिक जीवन में सुख की कामना के साथ भगवान शिव को अर्पित किया जाता है।

    शनि तथा राहु-केतु से जुड़ी बाधाओं की शांति की कामना के लिए काले तिल से अभिषेक करने की परंपरा भी बताई जाती है। ज्योतिषीय मान्यताओं में काले तिल का संबंध शनि से माना गया है। हालांकि किसी भी ग्रह की स्थिति और उसके प्रभाव को लेकर व्यक्तिगत कुंडली के आधार पर उपाय अलग हो सकते हैं।

    सावन में गन्ने के रस से शिवलिंग का अभिषेक भी धार्मिक परंपराओं में शुभ माना गया है। इसे सुख, समृद्धि और मनोकामना की पूर्ति की धार्मिक भावना से जोड़ा जाता है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार इस अभिषेक को पूजा का हिस्सा बना सकते हैं।

    10 अगस्त को प्रदोष काल में पंचाक्षरी मंत्र ओम नमः शिवाय का जाप, बिल्वपत्र अर्पित करना और दीपदान करना भी शिव आराधना का हिस्सा बनाया जा सकता है। सुबह जलाभिषेक और शाम को प्रदोष काल में शिव-पार्वती की पूजा करने की परंपरा का पालन किया जा सकता है।

    हालांकि नवग्रह शांति के लिए एक ही उपाय हर व्यक्ति के लिए समान रूप से उपयुक्त हो, यह जरूरी नहीं है। ज्योतिषीय दृष्टि से किसी विशेष ग्रह से जुड़ी परेशानी के लिए जन्मकुंडली में ग्रह की स्थिति, भाव, राशि, दशा और गोचर को देखकर उपाय तय करने की बात कही जाती है। इसलिए धार्मिक उपायों को श्रद्धा और व्यक्तिगत परिस्थिति के अनुसार अपनाना अधिक उचित माना जाता है।

  • कोटेश्वर महादेव मंदिर में सावन पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़, लेटे शिवलिंग की अनूठी मान्यता बनी आकर्षण

    कोटेश्वर महादेव मंदिर में सावन पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़, लेटे शिवलिंग की अनूठी मान्यता बनी आकर्षण

    नई दिल्ली । देवभूमि उत्तराखंड में स्थित कोटेश्वर महादेव मंदिर अपनी अनूठी परंपराओं, पौराणिक मान्यताओं और अलौकिक वातावरण के कारण देशभर के शिव भक्तों के लिए अगाध श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। सावन के पवित्र महीने के दौरान मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का विशाल जनसैलाब उमड़ रहा है। दूर-दूर से पहुंचने वाले श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ का जल से अभिषेक, रुद्राभिषेक और विशेष अनुष्ठान संपन्न कर अपने परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्य की प्रार्थना कर रहे हैं। पूरे सावन मास में यह पावन क्षेत्र भक्तिमय भजनों और धार्मिक उल्लास से पूरी तरह से सराबोर दिखाई दे रहा है।

    इस प्राचीन मंदिर की सबसे मुख्य विशेषता यहां विराजित शिवलिंग का स्वरूप है। प्रचलित पौराणिक कथाओं और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यहां भगवान शिव विश्राम की स्थिति में यानी लेटी हुई मुद्रा में स्थापित हैं। यह दुर्लभ स्वरूप इसे देश के अन्य तमाम पारंपरिक शिव धामों से बिल्कुल अलग और विशिष्ट पहचान प्रदान करता है। श्रद्धालुओं के बीच यह अटूट विश्वास है कि भगवान आशुतोष का यह लेटा हुआ स्वरूप अत्यंत चमत्कारिक और फलदायी है, जहां केवल दर्शन मात्र से ही भक्तों की मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

    मंदिर से जुड़ी एक और बेहद चर्चित और गहरी मान्यता यह है कि यहां मौजूद शिवलिंग प्रतिवर्ष जौ के एक दाने के बराबर स्वयं बढ़ता जाता है। स्थानीय निवासियों और मंदिर के पुजारियों का मानना है कि यह वृद्धि भगवान शिव की प्रत्यक्ष दिव्य शक्ति का ही एक रूप है। यद्यपि यह पूर्ण रूप से जनआस्था और धार्मिक विश्वास का विषय है, लेकिन इसी कौतूहल और श्रद्धा के कारण सावन के अलावा वर्ष भर यहां श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला अनवरत जारी रहता है।

    मंदिर परंपरा के अनुसार कोटेश्वर शब्द का शाब्दिक अर्थ एक करोड़ देवी-देवताओं के निवास स्थल से जोड़ा जाता है। मंदिर प्रांगण में शिव कुंड, पार्वती कुंड और सूर्य कुंड भी निर्मित हैं, जिन्हें अत्यंत पवित्र माना जाता है। ऐसी लोकमान्यता है कि इन कुंडों के सान्निध्य में सच्चे भाव से रुद्राभिषेक, जलार्पण और रुद्री पाठ करने से शिव जी प्रसन्न होते हैं। संतान प्राप्ति की कामना रखने वाले दंपतियों के लिए भी यह स्थान विशेष रूप से मंगलकारी माना गया है।

    सावन के दौरान मंदिर में रोजाना विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों का भव्य संचालन किया जा रहा है। श्रद्धालु कतारों में लगकर भगवान शिव को प्रिय बेलपत्र, गंगाजल, कच्चा दूध, धतूरा और अन्य पूजन सामग्री समर्पित कर रहे हैं। तड़के मंगला आरती से लेकर देर शाम तक संपूर्ण परिसर हर-हर महादेव और बम-बम भोले के जयकारों से गुंजायमान रहता है। श्रद्धालुओं की सहूलियत और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्थानीय प्रशासन तथा मंदिर प्रबंधन समिति ने कड़े और सुचारू इंतजाम किए हैं।

    आध्यात्मिक महत्व के अलावा कोटेश्वर महादेव मंदिर अपने अद्भुत प्राकृतिक परिवेश के लिए भी जाना जाता है। भागीरथी नदी के पावन तट पर स्थित यह धाम प्राकृतिक सुंदरता और आत्मिक शांति का एक दुर्लभ समन्वय प्रस्तुत करता है। सावन के महीने में यहां आने वाले भक्त न केवल धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं, बल्कि आसपास के मनोरम प्राकृतिक वातावरण से भी अभिभूत होते हैं। यही कारण है कि यह स्थल धार्मिक आस्था के साथ-साथ पर्यटन के दृष्टिकोण से भी बेहद खास पहचान रखता है।