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  • सावन के पहले सोमवार काशी शिवमय: बाबा विश्वनाथ धाम में चार लाख श्रद्धालुओं ने किए दर्शन

    सावन के पहले सोमवार काशी शिवमय: बाबा विश्वनाथ धाम में चार लाख श्रद्धालुओं ने किए दर्शन


    वाराणसी। सावन के पहले सोमवार पर काशी पूरी तरह शिवमय नजर आई। श्रीकाशी विश्वनाथ धाम सहित जिले के सभी प्रमुख शिवालयों में तड़के से ही श्रद्धालुओं और कांवड़ियों का जनसैलाब उमड़ पड़ा। बाबा विश्वनाथ के जलाभिषेक और दर्शन के लिए श्रद्धालु रविवार रात से ही कतारों में डटे रहे। सोमवार दोपहर तक करीब चार लाख श्रद्धालुओं ने बाबा विश्वनाथ के दर्शन कर नया रिकॉर्ड बनाया।

    भोर चार बजे से शुरू हुआ जलाभिषेक
    विश्वनाथ धाम में सुबह चार बजे मंगला आरती के बाद जलाभिषेक शुरू हुआ। मंदिर प्रशासन ने कांवड़ियों का पुष्पवर्षा कर स्वागत किया। पूरी काशी में “हर-हर महादेव” और “बम-बम भोले” के जयघोष गूंजते रहे। श्रद्धालु रातभर बैरिकेडिंग में अपनी बारी का इंतजार करते हुए भजन-कीर्तन और शिव आराधना में लीन रहे।

    प्रमुख शिवालयों में भी उमड़ी आस्था
    काशी विश्वनाथ धाम के अलावा मार्कंडेय महादेव, महामृत्युंजय महादेव, तिलभांडेश्वर महादेव, शूलटंकेश्वर और रामेश्वर महादेव सहित अन्य शिवालयों में भी सुबह से जलाभिषेक के लिए लंबी कतारें लगी रहीं। पूर्वांचल के कई जिलों से पहुंचे कांवड़ियों ने गंगा और गोमती संगम में स्नान कर भगवान शिव का जलाभिषेक किया।

    40 हजार यादव बंधुओं की ऐतिहासिक जलाभिषेक यात्रा
    चंद्रवंशी गोप सेवा समिति के बैनर तले करीब 40 हजार यादव बंधुओं ने अपनी पारंपरिक जलाभिषेक यात्रा निकाली। 94वें वर्ष आयोजित इस यात्रा की शुरुआत गौरी केदारेश्वर महादेव मंदिर से हुई। श्रद्धालुओं ने लगभग 17 किलोमीटर की यात्रा के दौरान श्रीकाशी विश्वनाथ समेत नौ प्रमुख शिवालयों में जलाभिषेक किया। परंपरा के अनुसार इस बार भी केवल 21 यादव बंधुओं को गर्भगृह में जलाभिषेक की अनुमति मिली।

    कांवड़ शिविरों में गूंजे भजन-कीर्तन
    शहर के चितरंजन पार्क, लक्सा, मंडुवाडीह, मैदागिन समेत विभिन्न स्थानों पर बने कांवड़ शिविरों में रविवार रात से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु रुके। यहां भजन-कीर्तन, शिव आराधना और विश्राम का सिलसिला चलता रहा। सोमवार सुबह गंगा स्नान के बाद श्रद्धालु जलाभिषेक के लिए विभिन्न मंदिरों की ओर रवाना हुए। सावन के पहले सोमवार पर काशी में उमड़ी यह आस्था और श्रद्धा एक बार फिर भगवान शिव के प्रति भक्तों की अटूट आस्था का सजीव प्रमाण बनी।

  • सावन में इन 5 छिपे हुए पावन शिव धामों में सुकून से होते हैं दर्शन… यहां नहीं मिलती लंबी कतारें…

    सावन में इन 5 छिपे हुए पावन शिव धामों में सुकून से होते हैं दर्शन… यहां नहीं मिलती लंबी कतारें…


    नई दिल्ली।
    सावन (Sawan) का महीना आते ही देशभर के मशहूर शिव मंदिरों (Famous Shiva temples) में भक्तों का तांता लग जाता है. महाकाल, काशी विश्वनाथ और देवघर जैसे धामों में घंटों लंबी लाइनों में खड़ा होना पड़ता है. कई बार बुजुर्गों और बच्चों के लिए इतनी भारी भीड़ में दर्शन करना काफी मुश्किल हो जाता है।

    अगर आप भी इस सावन में शांति से भगवान शिव (Lord Shiva) की पूजा करना चाहते हैं, तो देश में कई ऐसे पावन और खूबसूरत शिव मंदिर हैं जहां भारी भीड़ नहीं मिलती. इन जगहों पर आप परिवार के साथ सुकून से बैठकर भोलेनाथ का ध्यान लगा सकते हैं।


    तुंगनाथ मंदिर, उत्तराखंड

    उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित तुंगनाथ मंदिर दुनिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर माना जाता है. यह मंदिर पंच केदार में से एक है और हिमालय की गोद में बसा है. यहां पहुंचने के लिए चोपता से करीब चार किलोमीटर की पैदल चढ़ाई करनी पड़ती है।

    शांत वादियों, ठंडी हवाओं और घने जंगलों के बीच यहां का माहौल बहुत आध्यात्मिक लगता है. यहां आने वाले भक्तों को शिव भक्ति के साथ साथ प्रकृति का एक अद्भुत नजारा भी देखने को मिलता है।


    नीलकंठ महादेव मंदिर, ऋषिकेश

    ऋषिकेश के पास मणिकूट पर्वत पर बसा नीलकंठ महादेव मंदिर एक बेहद पवित्र और शांत धाम है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन से निकले विष को पीने के बाद भगवान शिव ने इसी स्थान पर विश्राम किया था।

    चारों ओर ऊंचे पहाड़ों और घने जंगलों से घिरे इस मंदिर में बहुत सुकून मिलता है. सावन के मुख्य दिनों को छोड़ दें, तो यहां आम दिनों में आप बहुत आराम से जल चढ़ा सकते हैं और दर्शन कर सकते हैं।


    भूतनाथ मंदिर, हिमाचल प्रदेश

    हिमाचल प्रदेश के मंडी शहर को छोटी काशी भी कहा जाता है. मंडी के बीचों बीच स्थित भूतनाथ मंदिर सदियों पुराना और ऐतिहासिक स्थल है. यह मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला और शांत वातावरण के लिए जाना जाता है. यहां सावन के दौरान स्थानीय भक्त तो आते हैं, लेकिन बड़े ज्योतिर्लिंगों जैसी दम घोटने वाली भीड़ नहीं होती. यहां आप बिना किसी भागदौड़ के मंदिर प्रांगण में बैठकर भगवान शिव की आराधना कर सकते हैं।


    कोटिलिंगेश्वर मंदिर, कर्नाटक

    दक्षिण भारत के कर्नाटक में स्थित कोटिलिंगेश्वर मंदिर अपनी तरह का एक अनोखा और भव्य शिव धाम है. इस मंदिर परिसर में कोटि यानी करोड़ों की संख्या में छोटे बड़े शिवलिंग स्थापित हैं। इसके साथ ही यहां 108 फीट ऊंचा एक विशाल शिवलिंग भी बना हुआ है, जो देखते ही बनता है. इतने विशाल परिसर में फैला होने की वजह से यहां भीड़ महसूस नहीं होती और भक्त आराम से एक एक शिवलिंग के दर्शन कर सकते हैं।


    यात्रा की योजना और जरूरी सुझाव

    सावन के दौरान इन शांत शिव मंदिरों की यात्रा पर जाने से पहले थोड़ी तैयारी जरूर कर लें. पहाड़ी इलाकों में जाते समय मौसम का हाल पहले ही चेक कर लें और साथ में जरूरी दवाएं जरूर रखें। मंदिरों में दर्शन के समय स्थानीय नियमों और स्वच्छता का पूरा ध्यान रखें. सुबह सुबह या दोपहर की आरती के समय जाने से दर्शन आसानी से हो जाते हैं. इन पावन धामों में बिताया समय आपकी आत्मा को एक नई ऊर्जा और असीम शांति देगा।

  • AI और अनिश्चितता के दौर में मानसिक स्पष्टता बनेगी प्रभावी नेतृत्व की पहचान, सावन में शिव के प्रतीकों से मिलते हैं प्रबंधन के सूत्र

    AI और अनिश्चितता के दौर में मानसिक स्पष्टता बनेगी प्रभावी नेतृत्व की पहचान, सावन में शिव के प्रतीकों से मिलते हैं प्रबंधन के सूत्र

    नई दिल्ली । कृत्रिम बुद्धिमत्ता के तेजी से बढ़ते प्रभाव, लगातार बदलते कारोबारी वातावरण और सूचनाओं की अत्यधिक उपलब्धता के बीच नेतृत्व की परिभाषा भी तेजी से बदल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि आज के समय में केवल अधिक जानकारी या उच्च बौद्धिक क्षमता ही किसी व्यक्ति को सफल नेता नहीं बनाती, बल्कि मानसिक स्पष्टता, संतुलित सोच और दबाव में सही निर्णय लेने की क्षमता उसकी सबसे बड़ी ताकत बनती जा रही है। सावन के अवसर पर भगवान शिव के विभिन्न प्रतीकों को इसी दृष्टि से आधुनिक नेतृत्व और प्रबंधन से जोड़कर देखा जा रहा है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि सावन केवल धार्मिक अनुष्ठानों का महीना नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, संयम और मानसिक अनुशासन का भी समय है। तेज़ी से बदलती तकनीक और एआई आधारित कार्यप्रणाली के बीच निर्णय लेने वाले पदों पर बैठे लोगों के सामने हर दिन नई चुनौतियां आती हैं। ऐसे में मन को स्थिर रखना और परिस्थितियों का शांत होकर विश्लेषण करना प्रभावी नेतृत्व का महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है।

    भगवान शिव के नीलकंठ स्वरूप को तनाव और दबाव प्रबंधन का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन से निकले विष को शिव ने अपने कंठ में धारण किया, लेकिन उसे स्वयं पर हावी नहीं होने दिया। इसी संदेश को आधुनिक कार्यस्थल में इस रूप में देखा जाता है कि एक सक्षम नेता कठिन परिस्थितियों में घबराहट या तनाव को पूरी टीम पर हावी नहीं होने देता, बल्कि शांत रहकर समाधान की दिशा में कार्य करता है।

    शिव के मस्तक पर विराजमान चंद्रमा को मन और विचारों पर नियंत्रण का प्रतीक माना जाता है। वर्तमान समय में वरिष्ठ प्रबंधकों और निर्णय लेने वाले अधिकारियों को प्रतिदिन अनेक जटिल निर्णय लेने पड़ते हैं, जिससे मानसिक थकान और निर्णय संबंधी दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में मानसिक संतुलन, एकाग्रता और भावनात्मक नियंत्रण को प्रभावी नेतृत्व की अनिवार्य विशेषता माना जाता है।

    भगवान शिव के डमरू को संवाद, समन्वय और सामूहिक लय का प्रतीक माना जाता है। किसी भी संगठन में विभिन्न विभागों के बीच स्पष्ट संवाद, साझा उद्देश्य और पारदर्शी कार्यसंस्कृति संगठन की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विशेषज्ञों के अनुसार जब पूरी टीम एक समान दृष्टिकोण और स्पष्ट संचार के साथ कार्य करती है, तब संगठन चुनौतियों का अधिक प्रभावी ढंग से सामना कर सकता है।

    इसी प्रकार शिव के तीसरे नेत्र को दूरदर्शिता और गहन समझ का प्रतीक माना जाता है। आधुनिक कॉर्पोरेट जगत में डेटा और विश्लेषण निर्णय प्रक्रिया का महत्वपूर्ण आधार हैं, लेकिन केवल आंकड़ों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं माना जाता। अनुभव, परिस्थितियों की समझ, मानवीय व्यवहार का आकलन और भविष्य की संभावनाओं को पहचानने की क्षमता भी सफल नेतृत्व का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यही कारण है कि रणनीतिक निर्णयों में विश्लेषण के साथ-साथ संतुलित अंतर्दृष्टि को भी महत्व दिया जाता है।

    विशेषज्ञों ने नेतृत्व के लिए एक पांच सूत्रीय मॉडल भी प्रस्तुत किया है, जिसमें निर्णय से पहले कुछ समय का शांत चिंतन, दबाव को संतुलित तरीके से संभालना, मानसिक स्थिरता बनाए रखना, आंकड़ों के साथ दूरदर्शिता का उपयोग करना और समय के अनुसार परिवर्तन स्वीकार करना प्रमुख सिद्धांत बताए गए हैं। इन सिद्धांतों का उद्देश्य व्यक्तियों को तेजी से बदलती परिस्थितियों में अधिक प्रभावी, संतुलित और जिम्मेदार नेतृत्व के लिए तैयार करना है।

    धार्मिक और प्रबंधन संबंधी विचारों का यह समन्वय इस बात पर बल देता है कि आधुनिक तकनीक के युग में सफलता केवल जानकारी की मात्रा पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उस जानकारी का विवेकपूर्ण उपयोग, मानसिक स्पष्टता और परिस्थितियों के अनुरूप संतुलित निर्णय लेने की क्षमता ही किसी भी नेता को अलग पहचान दिला सकती है। सावन का संदेश भी आत्मसंयम, धैर्य और सकारात्मक दृष्टिकोण के माध्यम से जीवन और कार्यक्षेत्र में संतुलन स्थापित करने की प्रेरणा देता है।

  • सावन में दक्षिण काली पीठ का मध्यरात्रि अनुष्ठान बना आस्था का केंद्र, गंगा स्नान और रुद्राभिषेक के लिए उमड़ रहे श्रद्धालु

    सावन में दक्षिण काली पीठ का मध्यरात्रि अनुष्ठान बना आस्था का केंद्र, गंगा स्नान और रुद्राभिषेक के लिए उमड़ रहे श्रद्धालु

    नई दिल्ली । सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की आराधना, तप और आध्यात्मिक साधना के लिए विशेष महत्व रखता है। इसी दौरान हरिद्वार स्थित दक्षिण काली पीठ श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है। यहां प्रतिदिन मध्यरात्रि से पहले शुरू होने वाला विशेष धार्मिक अनुष्ठान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रहा है। स्थानीय भक्तों के साथ-साथ देश के विभिन्न राज्यों से आने वाले श्रद्धालु भी इस आध्यात्मिक आयोजन में शामिल होकर पूजा-अर्चना और साधना का हिस्सा बन रहे हैं।

    मंदिर परिसर में प्रतिदिन देर रात तक भक्ति और श्रद्धा का वातावरण बना रहता है। आधी रात से पहले पवित्र गंगा में स्नान करने के बाद मौन साधना और भगवान शिव के विशेष पूजन का क्रम प्रारंभ होता है। इसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विधि-विधान से रुद्राभिषेक संपन्न कराया जाता है। इस संपूर्ण धार्मिक प्रक्रिया को देखने और उसमें सहभागी बनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर में उपस्थित रहते हैं।

    धार्मिक परंपरा के अनुसार आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरी महाराज प्रतिदिन निर्धारित समय पर गंगा स्नान कर मौन व्रत धारण करते हैं। इसके बाद भगवान शिव का अभिषेक, पूजन और वैदिक विधियों के अनुसार विशेष अनुष्ठान संपन्न कराया जाता है। अनुष्ठान पूर्ण होने पर उपस्थित श्रद्धालुओं को आशीर्वाद भी प्रदान किया जाता है। मंदिर परिसर में गूंजते मंत्रों और शांत वातावरण के कारण श्रद्धालु इसे आध्यात्मिक अनुभूति का विशेष अवसर मानते हैं।

    सावन के दौरान दक्षिण काली पीठ में केवल हरिद्वार और आसपास के क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कई अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। भक्तों का कहना है कि यहां की पूजा-पद्धति, अनुशासित व्यवस्था और आध्यात्मिक वातावरण उन्हें हर वर्ष इस सिद्धपीठ तक आने के लिए प्रेरित करता है। कई श्रद्धालु गंगा स्नान और रुद्राभिषेक में भाग लेने को अपने धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण अनुभव बताते हैं।

    मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं का मानना है कि रात्रिकालीन साधना और भगवान शिव की आराधना से उन्हें मानसिक शांति, आत्मिक संतोष और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है। कुछ श्रद्धालुओं ने धार्मिक अनुष्ठान के दौरान नाग देवता के दर्शन होने की बात भी साझा की। हालांकि ऐसे अनुभव व्यक्तिगत आस्था और धार्मिक विश्वास से जुड़े हैं, जिन्हें श्रद्धालु दिव्य अनुभूति के रूप में देखते हैं। मंदिर प्रशासन की ओर से भी श्रद्धालुओं को श्रद्धा और अनुशासन के साथ पूजा में भाग लेने की सलाह दी जाती है।

    मंदिर के सेवादारों के अनुसार दक्षिण काली पीठ को एक सिद्ध धार्मिक स्थल माना जाता है, जहां सावन के महीने में विशेष धार्मिक आयोजन नियमित रूप से संपन्न होते हैं। प्रतिदिन होने वाले रुद्राभिषेक, वैदिक मंत्रोच्चार और सामूहिक आराधना से पूरे परिसर में भक्ति का वातावरण बना रहता है। यही कारण है कि हर वर्ष सावन के दौरान यहां श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार वृद्धि देखने को मिलती है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन भगवान शिव की उपासना के लिए सबसे शुभ समय माना जाता है। इस अवधि में रुद्राभिषेक, जलाभिषेक, महामृत्युंजय जाप और मौन साधना का विशेष महत्व बताया गया है। दक्षिण काली पीठ में इन परंपराओं का नियमित पालन होने से यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए विशेष धार्मिक आकर्षण का केंद्र बन गया है। शांत रात्रिकालीन वातावरण, गंगा स्नान और वैदिक अनुष्ठानों का समन्वय भक्तों को आध्यात्मिक साधना का विशिष्ट अनुभव प्रदान करता है।

  • सावन में व्रत रखने वाले जरूर जानें, सेंधा नमक खाने की धार्मिक परंपरा और वैज्ञानिक कारण

    सावन में व्रत रखने वाले जरूर जानें, सेंधा नमक खाने की धार्मिक परंपरा और वैज्ञानिक कारण


    नई दिल्ली । सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की आराधना, उपवास और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु सावन सोमवार, शिवरात्रि, तीज और अन्य व्रत रखते हैं। व्रत के दौरान भोजन को लेकर विशेष नियमों का पालन किया जाता है और इन्हीं नियमों में एक महत्वपूर्ण परंपरा है कि सामान्य नमक की जगह केवल सेंधा नमक का ही सेवन किया जाए। यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी कारण भी बताए जाते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्रत का उद्देश्य केवल भोजन का त्याग करना नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि करना भी होता है। इसलिए व्रत में ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन करने की सलाह दी जाती है जो प्राकृतिक, सात्विक और कम से कम प्रसंस्कृत हों। सेंधा नमक प्राकृतिक रूप से चट्टानों से प्राप्त होता है और इसे बड़े स्तर की रासायनिक प्रक्रिया से नहीं गुजारा जाता। इसी कारण इसे शुद्ध और सात्विक माना जाता है, जबकि सामान्य नमक फैक्ट्रियों में प्रसंस्करण के बाद तैयार होता है और उसमें आयोडीन सहित अन्य तत्व मिलाए जाते हैं। धार्मिक परंपराओं में इसी वजह से सामान्य नमक की बजाय सेंधा नमक को व्रत के लिए उपयुक्त माना गया है।

    वैज्ञानिक दृष्टि से भी सेंधा नमक कई मामलों में लाभकारी माना जाता है। उपवास के दौरान लंबे समय तक सामान्य भोजन न लेने से शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन प्रभावित हो सकता है। सेंधा नमक इस संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है और थकान तथा कमजोरी को कम करने में सहायक माना जाता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार सेंधा नमक में सामान्य नमक की तुलना में सोडियम अपेक्षाकृत कम और पोटेशियम, मैग्नीशियम जैसे खनिज अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। यही कारण है कि इसे पाचन तंत्र के लिए अपेक्षाकृत हल्का माना जाता है। व्रत के दौरान साबूदाना, कुट्टू, सिंघाड़े का आटा, दही, फल और अन्य फलाहारी व्यंजनों में सेंधा नमक का उपयोग इसलिए किया जाता है ताकि शरीर को आवश्यक खनिज भी मिलते रहें।

    सेंधा नमक की तासीर भी अपेक्षाकृत ठंडी मानी जाती है। मान्यता है कि यह शरीर में पानी का संतुलन बनाए रखने, पाचन को बेहतर रखने और लंबे समय तक उपवास के दौरान होने वाली थकान को कम करने में मदद कर सकता है। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि सेंधा नमक हो या सामान्य नमक, दोनों का सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिए।

    विशेष परिस्थितियों जैसे गर्भावस्था, अधिक उम्र या किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए लंबे समय तक खाली पेट रहना उचित नहीं माना जाता। ऐसे लोगों को डॉक्टर की सलाह के अनुसार संतुलित फलाहार और आवश्यक मात्रा में सेंधा नमक का सेवन करना चाहिए, ताकि शरीर में कमजोरी या इलेक्ट्रोलाइट की कमी न हो।

    धार्मिक आस्था और वैज्ञानिक दृष्टिकोण दोनों ही यह बताते हैं कि व्रत के दौरान सेंधा नमक का उपयोग केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि शरीर की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर अपनाई गई एक संतुलित व्यवस्था भी है। हालांकि किसी भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या की स्थिति में उपवास और खानपान से जुड़ा निर्णय चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही लेना चाहिए।

  • सावन का महीना आज से शुरू, जानें जलाभिषेक के शुभ मुहूर्त, पूजा-विधि और पूरे महीने के जरूरी नियम

    सावन का महीना आज से शुरू, जानें जलाभिषेक के शुभ मुहूर्त, पूजा-विधि और पूरे महीने के जरूरी नियम


    नई दिल्ली । भगवान शिव को समर्पित पवित्र सावन मास का शुभारंभ आज से हो गया है, जो 28 अगस्त तक चलेगा। हिंदू धर्म में इस पूरे महीने को शिव आराधना, तप, व्रत और भक्ति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि सावन में विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा और जलाभिषेक करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस वर्ष सावन के पहले दिन कई शुभ योग भी बन रहे हैं, जिससे इसका धार्मिक महत्व और बढ़ गया है।

    आज जलाभिषेक के शुभ मुहूर्त
    सावन के पहले दिन भगवान शिव के जलाभिषेक के लिए कई शुभ समय निर्धारित हैं—
    ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:36 बजे से 5:24 बजे तक
    प्रातः संध्या: सुबह 4:39 बजे से 5:41 बजे तक
    अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:20 बजे से 1:12 बजे तक
    विजय मुहूर्त: शाम 4:28 बजे से 5:29 बजे तक
    प्रदोष काल: शाम 5:32 बजे से रात 8:30 बजे तक

    पहले दिन बन रहे हैं कई शुभ योग
    सावन के आरंभ पर श्रवण नक्षत्र, आयुष्मान योग, शश महापुरुष राजयोग, हंस राजयोग और गुरु-आदित्य राजयोग का विशेष संयोग बन रहा है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार इन योगों में शिव पूजा और जलाभिषेक करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।

    सावन सोमवार की तिथियां
    3 अगस्त – पहला सावन सोमवार
    10 अगस्त – दूसरा सावन सोमवार
    17 अगस्त – तीसरा सावन सोमवार
    24 अगस्त – चौथा सावन सोमवार

    ऐसे करें भगवान शिव की पूजा
    सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद शिवलिंग पर तांबे के पात्र से शुद्ध जल, गंगाजल और कच्चा दूध अर्पित करें। बेलपत्र, धतूरा, भांग, आंकड़े के फूल, शमी के पत्ते, सफेद चंदन, अक्षत और शहद चढ़ाकर धूप-दीप करें। फिर शिव चालीसा, रुद्राष्टकम का पाठ तथा ‘ॐ नमः शिवाय’ या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। अंत में फल, मिठाई या पंचामृत का भोग लगाकर आरती करें।

    सावन में क्या करें
    – प्रतिदिन शिवलिंग पर जल और बेलपत्र अर्पित करें।
    – सात्विक भोजन का पालन करें।
    – जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और जल का दान करें।
    – ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का नियमित जाप करें।

    किन बातों से करें परहेज
    – मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन और बासी भोजन का सेवन न करें।
    – बाल, नाखून और दाढ़ी कटवाने से बचें।
    – घर में कलह और किसी का अपमान करने से परहेज करें।
    – मन, वचन और कर्म से पवित्रता बनाए रखें।

    सावन का धार्मिक महत्व
    हिंदू मान्यता के अनुसार सावन भगवान शिव की आराधना का सबसे पवित्र महीना माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए अपने कंठ में धारण किया था, जिसके कारण उनका कंठ नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए। विष की ज्वाला शांत करने के लिए देवताओं ने उन पर जल अर्पित किया था। तभी से सावन में शिवलिंग पर जलाभिषेक की परंपरा चली आ रही है।

  • सावन व्रत में रोज-रोज साबूदाना खिचड़ी से हो गए हैं बोर? इस बार बनाएं साबूदाने की 5 स्वादिष्ट और आसान रेसिपी

    सावन व्रत में रोज-रोज साबूदाना खिचड़ी से हो गए हैं बोर? इस बार बनाएं साबूदाने की 5 स्वादिष्ट और आसान रेसिपी

    नई दिल्ली । सावन का पवित्र महीना शुरू होते ही देशभर के शिव भक्त भगवान भोलेनाथ की आराधना के साथ व्रत और पूजा-पाठ में जुट जाते हैं। इस दौरान अधिकतर घरों में व्रत के भोजन के रूप में साबूदाना सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, कई दिनों तक लगातार साबूदाना खिचड़ी खाने से लोग एक जैसा स्वाद महसूस करने लगते हैं। ऐसे में यदि आप व्रत के दौरान अपने भोजन में कुछ नया और स्वादिष्ट शामिल करना चाहते हैं, तो साबूदाने से कई आसान और लाजवाब व्यंजन तैयार किए जा सकते हैं। ये रेसिपी स्वाद बढ़ाने के साथ व्रत के भोजन में विविधता भी लाती हैं।

    साबूदाना वड़ा व्रत के दौरान सबसे लोकप्रिय विकल्पों में से एक माना जाता है। इसे बनाने के लिए भीगे हुए साबूदाने में उबले आलू, भुनी मूंगफली का चूरा, सेंधा नमक और हरी मिर्च मिलाकर छोटे-छोटे वड़े तैयार किए जाते हैं। इन्हें हल्का तलकर या कम तेल में सेंककर दही अथवा व्रत वाली चटनी के साथ परोसा जा सकता है। यह बाहर से कुरकुरा और अंदर से मुलायम होता है।

    अगर व्रत में मीठा खाने की इच्छा हो तो साबूदाना खीर एक बेहतरीन विकल्प है। दूध में साबूदाना अच्छी तरह पकाकर उसमें चीनी या स्वादानुसार मिठास, इलायची और कटे हुए मेवे मिलाए जाते हैं। यह रेसिपी स्वादिष्ट होने के साथ ऊर्जा भी प्रदान करती है और परिवार के सभी सदस्यों को पसंद आती है।

    कुरकुरे स्नैक पसंद करने वालों के लिए साबूदाना पापड़ भी अच्छा विकल्प है। इसे पहले से तैयार करके सुरक्षित रखा जा सकता है। जरूरत पड़ने पर इसे हल्का सेंककर या तलकर तुरंत परोसा जा सकता है। यह चाय या व्रत के हल्के नाश्ते के साथ भी अच्छा लगता है।

    साबूदाना थालीपीठ भी व्रत के भोजन में स्वाद बढ़ाने वाला व्यंजन है। इसमें साबूदाने के साथ उबले आलू, मूंगफली और सेंधा नमक मिलाकर आटे जैसा मिश्रण तैयार किया जाता है। इसके बाद इसे तवे पर हल्के तेल या घी के साथ दोनों तरफ से सुनहरा होने तक सेंका जाता है। दही के साथ इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है।

    हल्का और जल्दी बनने वाला विकल्प चाहने वालों के लिए साबूदाना चिवड़ा भी अच्छा चुनाव हो सकता है। इसमें साबूदाने को भूनकर मूंगफली और सेंधा नमक मिलाया जाता है। यह कम समय में तैयार हो जाता है और हल्की भूख मिटाने के लिए उपयुक्त माना जाता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार साबूदाने में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक होती है, इसलिए इसका संतुलित मात्रा में सेवन करना चाहिए। व्रत के दौरान केवल साबूदाने पर निर्भर रहने के बजाय फल, दूध, दही और मेवों को भी भोजन में शामिल करना बेहतर माना जाता है। यदि किसी व्यक्ति को मधुमेह या अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्या है, तो व्रत का भोजन तय करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उचित रहेगा। सही संतुलन और विविधता के साथ तैयार किए गए ये व्यंजन सावन के व्रत को स्वादिष्ट, पौष्टिक और यादगार बना सकते हैं।

  • पीरियड्स में सावन और सोलह सोमवार का व्रत रखा जा सकता है या नहीं, धार्मिक मान्यताओं में क्या कहा गया

    पीरियड्स में सावन और सोलह सोमवार का व्रत रखा जा सकता है या नहीं, धार्मिक मान्यताओं में क्या कहा गया


    नई दिल्ली । सावन मास भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष महत्व रखता है। इस वर्ष सावन की शुरुआत 30 जुलाई से हो रही है, जबकि पहला सावन सोमवार 2 अगस्त को पड़ेगा। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव की पूजा-अर्चना और सोमवार व्रत का पालन करते हैं। विशेष रूप से महिलाएं सावन सोमवार और सोलह सोमवार व्रत पूरे श्रद्धाभाव से रखती हैं। ऐसे में हर वर्ष एक सामान्य प्रश्न सामने आता है कि यदि व्रत के दिन मासिक धर्म यानी पीरियड्स शुरू हो जाएं, तो क्या व्रत जारी रखा जा सकता है और पूजा किस प्रकार करनी चाहिए। इस विषय पर धार्मिक मान्यताओं और धर्माचार्यों के विचार महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

    धार्मिक परंपराओं के अनुसार, मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को मंदिर में प्रवेश, शिवलिंग का स्पर्श और प्रत्यक्ष पूजन से परहेज करने की सलाह दी जाती है। हालांकि, अनेक धर्माचार्यों का मत है कि यदि किसी महिला ने पहले से सावन सोमवार या सोलह सोमवार व्रत का संकल्प लिया है, तो केवल पीरियड्स आने की वजह से व्रत छोड़ना आवश्यक नहीं माना जाता। ऐसी स्थिति में मानसिक रूप से भगवान शिव का स्मरण, मंत्र जाप और ध्यान के माध्यम से भी उपासना की जा सकती है।

    धर्मशास्त्रों में मानसिक पूजा को भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। मान्यता है कि ईश्वर के प्रति श्रद्धा, विश्वास और मन की पवित्रता बाहरी विधियों से अधिक महत्व रखती है। यदि किसी कारणवश प्रत्यक्ष पूजा संभव न हो, तो भक्त मन ही मन भगवान शिव का स्मरण कर सकते हैं। इसे भी भक्ति और आराधना का स्वीकार्य स्वरूप माना जाता है।

    धार्मिक विद्वानों का यह भी कहना है कि मासिक धर्म महिलाओं के जीवन की एक प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रिया है। इसे अपवित्रता से जोड़कर देखने के बजाय स्वास्थ्य और विश्राम की आवश्यकता के रूप में समझा जाना चाहिए। इसी कारण कई परंपराओं में इस अवधि के दौरान महिलाओं को अधिक आराम करने की सलाह दी जाती है। यदि स्वास्थ्य सामान्य हो और व्रत रखने में कोई कठिनाई न हो, तो संकल्पित व्रत जारी रखा जा सकता है। वहीं यदि अत्यधिक कमजोरी, दर्द या अन्य स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो, तो स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना भी उचित माना जाता है।

    यदि पीरियड्स के कारण मंदिर जाना या शिवलिंग पर जलाभिषेक करना संभव न हो, तो घर पर बैठकर भगवान शिव के मंत्रों का जाप, शिव चालीसा, शिव स्तुति या अन्य स्तोत्रों का पाठ किया जा सकता है। कई परिवारों में पूजा की सामग्री किसी अन्य सदस्य के माध्यम से अर्पित कराई जाती है, जबकि व्रत रखने वाली महिला स्वयं मानसिक रूप से पूजा में सहभागी रहती है। इस प्रकार श्रद्धा और संकल्प दोनों का पालन किया जा सकता है।

    सोलह सोमवार व्रत के संबंध में भी यही मान्यता प्रचलित है कि एक बार संकल्प लेने के बाद बिना उचित कारण व्रत को बीच में छोड़ना उचित नहीं माना जाता। हालांकि धर्माचार्य यह भी स्पष्ट करते हैं कि प्रत्येक परिवार की धार्मिक परंपराएं और रीति-रिवाज अलग हो सकते हैं। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने परिवार की परंपरा, गुरु या स्थानीय धर्माचार्य के मार्गदर्शन का भी सम्मान करना चाहिए। यदि किसी परंपरा में अलग नियम अपनाए जाते हैं, तो उनका पालन करना भी उचित माना जाता है।

    सावन सोमवार व्रत का मूल उद्देश्य भगवान शिव के प्रति श्रद्धा, संयम और भक्ति व्यक्त करना है। इसलिए धार्मिक मान्यताओं के अनुसार परिस्थितियों के अनुरूप मानसिक पूजा, मंत्र जाप और ईश्वर का स्मरण भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है। साथ ही यह भी सलाह दी जाती है कि व्रत और पूजा के दौरान स्वास्थ्य की अनदेखी न की जाए तथा आवश्यकता पड़ने पर विश्राम को प्राथमिकता दी जाए।

  • एक गिलास दूध से घर पर बनाएं हलवाई जैसी मिल्क रोल बर्फी, सावन व्रत के लिए रहेगी बेहतरीन मिठाई

    एक गिलास दूध से घर पर बनाएं हलवाई जैसी मिल्क रोल बर्फी, सावन व्रत के लिए रहेगी बेहतरीन मिठाई

    नई दिल्ली । सावन का महीना आते ही घरों में व्रत और पूजा के लिए विशेष व्यंजनों की तैयारी शुरू हो जाती है। ऐसे समय में यदि कम सामग्री और कम समय में स्वादिष्ट मिठाई तैयार करनी हो, तो मिल्क रोल बर्फी एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकती है। इस मिठाई की खास बात यह है कि इसे केवल एक गिलास दूध और कुछ सामान्य रसोई सामग्री से आसानी से बनाया जा सकता है। इसका स्वाद हलवाई की मिठाइयों जैसा होता है और इसे पहले से बनाकर कई दिनों तक सुरक्षित भी रखा जा सकता है।

    मिल्क रोल बर्फी बनाने के लिए सबसे पहले एक भारी तले की कड़ाही में एक गिलास फुल क्रीम दूध डालकर धीमी आंच पर गर्म करें। इसमें दो छोटे चम्मच देसी घी मिलाएं और दूध को लगातार चलाते हुए पकाएं। जब दूध में हल्का उबाल आने लगे, तब इसमें स्वादानुसार चीनी डालें और मिश्रण को अच्छी तरह घुलने दें। लगातार चलाते रहने से दूध तले में नहीं लगेगा और स्वाद भी बेहतर रहेगा।

    इसके बाद मिश्रण में आधा छोटा चम्मच इलायची पाउडर मिलाएं, जिससे बर्फी में खुशबू और स्वाद दोनों बढ़ जाएंगे। यदि चाहें तो इसमें केसर या गुलाब जल की कुछ बूंदें भी मिला सकते हैं। अब दूध को तब तक पकाएं जब तक वह थोड़ा गाढ़ा न हो जाए। इसके बाद इसमें लगभग डेढ़ सौ ग्राम नारियल का बुरादा डालकर अच्छी तरह मिलाएं। मिश्रण को लगातार चलाते हुए तब तक पकाएं, जब तक वह कड़ाही छोड़ने न लगे और आटे जैसी लोई का रूप न ले ले।

    यदि मिल्क रोल को हल्का पिस्ता फ्लेवर देना चाहते हैं, तो इसमें थोड़ा पिस्ता एसेंस, पिसा हुआ पिस्ता या एक-दो बूंद प्राकृतिक फूड कलर मिला सकते हैं। हालांकि यह पूरी तरह वैकल्पिक है और इसके बिना भी मिठाई का स्वाद शानदार रहता है। मिश्रण तैयार होने के बाद गैस बंद कर दें और इसे कुछ मिनट ठंडा होने दें।

    अब एक साफ बटर पेपर, प्लास्टिक शीट या घी लगी ट्रे तैयार करें। मिश्रण को उस पर फैलाकर बेलनाकार रोल का आकार दें या चाहें तो ट्रे में जमाकर पारंपरिक बर्फी की तरह सेट करें। ऊपर से कटे हुए बादाम, पिस्ता या अन्य सूखे मेवे हल्के हाथ से दबाकर लगा दें। इसके बाद इसे लगभग आधे घंटे के लिए फ्रिज में रख दें ताकि मिठाई अच्छी तरह जम जाए।

    जब रोल पूरी तरह सेट हो जाए तो इसे मनचाहे आकार में काट लें। तैयार मिल्क रोल बर्फी का स्वाद बेहद मुलायम, हल्का और समृद्ध होता है। यह बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को पसंद आती है और व्रत, पूजा, त्योहार या मेहमानों के स्वागत के लिए भी उपयुक्त रहती है। यदि इसे एयरटाइट डिब्बे में रखकर फ्रिज में रखा जाए, तो यह लगभग एक सप्ताह तक ताजा बनी रह सकती है। इसलिए सावन के सोमवार, पूजा-पाठ या अन्य धार्मिक अवसरों के लिए इसे पहले से तैयार करके आसानी से उपयोग किया जा सकता है।

  • व्रत में कमजोरी से बचना है तो अपनाएं ये पौष्टिक स्नैक्स, दिनभर बनी रहेगी एनर्जी.

    व्रत में कमजोरी से बचना है तो अपनाएं ये पौष्टिक स्नैक्स, दिनभर बनी रहेगी एनर्जी.


    नई दिल्ली । सावन सोमवार का व्रत भगवान शिव की आराधना के साथ-साथ संयम और सात्विक जीवनशैली का भी प्रतीक माना जाता है। इस दौरान लंबे समय तक उपवास रखने से शरीर में ऊर्जा की कमी महसूस हो सकती है। ऐसे में संतुलित और पौष्टिक आहार का चयन करना आवश्यक हो जाता है, ताकि दिनभर शरीर सक्रिय रहे और आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति भी होती रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि हल्के, सुपाच्य और पोषण से भरपूर स्नैक्स व्रत के दौरान बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं।

    साबूदाना से तैयार टिक्की व्रत के सबसे लोकप्रिय व्यंजनों में शामिल है। उबले आलू के साथ तैयार यह स्नैक लंबे समय तक ऊर्जा बनाए रखने में मदद करता है। इसे कम घी या हल्के तेल में सेंककर दही अथवा व्रत वाली हरी चटनी के साथ खाया जा सकता है। इसी तरह कुट्टू के आटे से बना चीला भी प्रोटीन और फाइबर का अच्छा स्रोत माना जाता है। इसमें पनीर या उबले आलू का उपयोग करने से इसका पोषण मूल्य और बढ़ जाता है।

    मखाना चिवड़ा भी व्रत के लिए एक हल्का और पौष्टिक विकल्प है। घी में हल्का भुना मखाना, मूंगफली और सेंधा नमक के साथ तैयार यह स्नैक कैल्शियम, प्रोटीन और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है। हल्की भूख लगने पर यह शरीर को ऊर्जा देने के साथ पेट भी भरा हुआ महसूस कराता है। वहीं उबले आलू, सेंधा नमक, काली मिर्च, नींबू का रस और हरा धनिया मिलाकर तैयार आलू चाट स्वाद और पोषण का संतुलित विकल्प माना जाता है।

    सिंघाड़े के आटे से बने पकौड़े भी व्रत के दौरान पसंद किए जाने वाले व्यंजनों में शामिल हैं। इन्हें पनीर या आलू के साथ तैयार कर दही के साथ परोसा जा सकता है। यदि तली हुई चीजों से बचना चाहते हैं तो इन्हें कम तेल में भी बनाया जा सकता है। इसके अलावा दही, केला, सेब और भीगे हुए बादाम से तैयार फ्रूट एंड नट लस्सी शरीर को हाइड्रेट रखने के साथ लंबे समय तक ऊर्जा बनाए रखने में मदद करती है।

    शकरकंद से बने चिप्स भी सामान्य तले हुए स्नैक्स की तुलना में अधिक पौष्टिक विकल्प माने जाते हैं। इन्हें घी में हल्का सेंककर या बेक करके तैयार किया जा सकता है। इनमें मौजूद फाइबर और जटिल कार्बोहाइड्रेट धीरे-धीरे ऊर्जा प्रदान करते हैं। वहीं राजगिरा और गुड़ से बने लड्डू तुरंत ऊर्जा देने वाले स्नैक्स के रूप में उपयोग किए जा सकते हैं। इन्हें पहले से तैयार कर पूरे सावन में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि व्रत के दौरान तले हुए खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए। दिनभर पर्याप्त पानी, नारियल पानी या छाछ का सेवन शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करता है। इसके साथ ही मौसमी फल, दही और सूखे मेवों को भोजन का हिस्सा बनाना लाभकारी माना जाता है। एक बार में अधिक भोजन करने की बजाय थोड़ी-थोड़ी मात्रा में संतुलित स्नैक्स लेना बेहतर रहता है। सही खानपान अपनाकर सावन सोमवार का व्रत श्रद्धा के साथ-साथ स्वस्थ और ऊर्जावान तरीके से भी पूरा किया जा सकता है।