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  • 100 फीसदी एथनॉल वाले ईंधन को मंजूरी देने पर SC ने सरकार से पूछा-कैसे करेंगे सप्लाई?

    100 फीसदी एथनॉल वाले ईंधन को मंजूरी देने पर SC ने सरकार से पूछा-कैसे करेंगे सप्लाई?


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को सरकार (Government) से पूछा कि अगर 100 प्रतिशत एथनॉल से चलने वाले वाहनों (ई-100) को अनुमति दी गई है, तो ईधन (100% Ethanol Fuel) की सप्लाई कैसे की जाएगी। ‘एथनॉल सप्लाई ईयर’ (ईएसवाई) 2025-26 (‘Ethanol Supply Year’ (ESY) 2025-26) के लिए एथेनॉल आवंटन से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस मुद्दे पर हाल ही में आई मीडिया रिपोर्टों का जिक्र किया।

    इस दौरान जस्टिस एम एम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने कहा कि हाल ही में हमने कुछ अखबारों की रिपोर्ट देखीं, जिनमें कहा गया है कि 100 प्रतिशत एथनॉल से चलने वाले वाहनों को अनुमति दी गई है। पीठ ने पूछा कि हम बस यह जानना चाहते हैं कि अगर 100 प्रतिशत एथनॉल से चलने वाले वाहनों को अनुमति दी गई है, तो आप इनकी सप्लाई कैसे करेंगे?


    ई-100 को मिली है मंजूरी

    इस पर अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कहा है कि इसके लिए बड़े पैमाने पर विनिर्माण व्यवस्था में बदलाव करने होंगे। गौरतलब है कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने 26 अक्टूबर को केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 में संशोधन अधिसूचित किया था। इसके तहत ई100 यानी लगभग शुद्ध एथनॉल से चलने वाले वाहनों को भी नियमों में शामिल किया गया है। इससे पहले ई-85 जैसे अधिक एथनॉल मिश्रण वाले ईंधन से चलने वाले वाहनों का प्रावधान था।


    क्या कह रही सरकार?

    हालांकि, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने 27 अक्टूबर को कहा था कि सरकार की पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण मौजूदा 20 प्रतिशत से तत्काल आगे बढ़ाने की कोई योजना नहीं है। मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने किसानों को सशक्त बनाने की जरूरत पर भी जोर दिया। जस्टिस सुंदरेश ने कहा कि इस मुद्दे को व्यापक जनहित और पर्यावरण के नजरिये से देखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि देश की बड़ी आबादी, खासकर गांवों में रहने वाले किसानों के हितों पर भी ध्यान देना होगा।


    किसानों से की जाएगी बात

    जस्टिस सुंदरेश ने कहा, ”देश की बड़ी आबादी के नजरिये से तीसरा पहलू, जो मुझे सबसे महत्वपूर्ण लगता है, वह किसान हैं। हमें इस पहलू पर ध्यान देना होगा कि किसानों को किस तरह सशक्त बनाया जाए। इस पर कोई भी बात नहीं कर रहा है।” इस पर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि वह मामले में अपनी दलीलों के दौरान किसानों से जुड़े मुद्दे पर भी बात करेंगे। शीर्ष अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई अगले महीने के लिए टाल दी गई। बता दें कि उच्चतम न्यायालय 2025-26 के एथनॉल आपूर्ति वर्ष के लिए आवंटन बढ़ाने से जुड़े मामले की सुनवाई कर रहा है।

  • SC कोर्ट बोला- डिजिटल ठगी के मामलों में तय हो बैंकों की जवाबदेही….गलती पाए जाने पर भरपाई करवाएं

    SC कोर्ट बोला- डिजिटल ठगी के मामलों में तय हो बैंकों की जवाबदेही….गलती पाए जाने पर भरपाई करवाएं


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि डिजिटल अरेस्ट (Digital Arrest) और साइबर धोखाधड़ी (Cyber ​​fraud) के मामलों में यदि वित्तीय संस्थानों (Financial Institutions) की लापरवाही सामने आती है तो पीड़ितों के नुकसान की भरपाई बैंकों को ही करनी होगी। ऐसे मामलों में बैंकों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह ऐसे कड़े निर्देश जारी करने पर विचार कर रही है, जिनके तहत बैंक अधिकारियों की चूक से हुई ठगी में बैंक पीड़ितों को गंवाई गई रकम के बराबर मुआवजा दें और उन पर मुकदमा भी चलाया जाए। अदालत ने जोर देकर कहा कि बैंकों को संभावित शिकार बन सकने वाले खाताधारकों के लिए सुरक्षा कवच की तरह काम करना चाहिए।

    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान सरकार से तीखा सवाल किया कि किसी सेवानिवृत्त व्यक्ति के खाते से असामान्य रूप से भारी रकम निकाले जाने पर समय रहते लेन-देन क्यों नहीं रोका जाता?


    रिपोर्ट तैयार करना केवल पोस्टमॉर्टम जैसा

    पीठ ने कहा कि घटना के बाद रिपोर्ट तैयार करना केवल पोस्टमॉर्टम जैसा है। रोकथाम का क्या? जैसे ही संदिग्ध लेन-देन दिखे, उसे फौरन रोका क्यों नहीं जाता? मुख्य न्यायाधीश ने यह भी रेखांकित किया कि इस तरह की धोखाधड़ी के कई मामलों में बैंक अधिकारियों की कथित संलिप्तता ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है।


    केवाईसी के नियमों में संशोधनों की समीक्षा होगी

    सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट किया कि वह भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के प्रस्तावित ‘अपने ग्राहक को जानिए’ (केवाईसी) संशोधन निर्देश, 2026 की समीक्षा करेगी, जिसके 30 नवंबर तक अधिसूचित और 31 दिसंबर तक लागू होने की उम्मीद है। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस नियामक ढांचे में डिजिटल धोखाधड़ी का शिकार हुए लोगों को हर्जाना देने का ठोस प्रावधान होना चाहिए। पीठ ने माना कि बैंकों की जवाबदेही तय करने के साथ ‘म्यूल अकाउंट्स’ (ऐसे फर्जी खाते जिनका इस्तेमाल ठगी की रकम घुमाने के लिए किया जाता है) पर नकेल कसना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।


    मामले घटे, फिर भी हर साल अरबों की चपत

    सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल ने पीठ को बताया कि अदालती हस्तक्षेप, मंत्रालयों के समन्वित प्रयासों और जन-जागरूकता से ‘डिजिटल अरेस्ट’ के मामलों में करीब 50 प्रतिशत की कमी आई है। इस पर सीजेआई ने ध्यान दिलाया कि इसके बावजूद इस साल देश को लगभग 800 करोड़ रुपये का वित्तीय नुकसान झेलना पड़ा है।नागरिकों के लगातार ठगी का शिकार होने पर हैरानी जताते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि व्यापक अभियानों, मीडिया रिपोर्टों और अदालती आदेशों के बाद भी पढ़े-लिखे लोग जालसाजों के झांसे में आ रहे हैं। सीजेआई ने टिप्पणी की कि एक लोकतांत्रिक देश में कोई नागरिक यह कैसे मान लेता है कि उसे मोबाइल पर गिरफ्तार किया जा रहा है? मोबाइल को दीवार पर दे मारिए, गिरफ्तारी खत्म हो जाएगी।


    सीधी देनदारी तय करने का विरोध जताया

    सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने न्यायिक निर्देशों के जरिए बैंकों पर सीधी देनदारी तय करने का विरोध किया और दलील दी कि यह विषय नियामक के रूप में आरबीआई के दायरे में आता है। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत वित्तीय संस्थानों पर कड़े नियम लागू कर सकती है और इसके लिए प्रत्येक बैंक को अलग से पक्षकार बनाने की आवश्यकता नहीं है।

  • SIR से जुड़े प्रमुख फैसले सामूहिक रूप से लिए गए…. SC में चुनाव आयोग ने किया अपना बचाव!

    SIR से जुड़े प्रमुख फैसले सामूहिक रूप से लिए गए…. SC में चुनाव आयोग ने किया अपना बचाव!


    नई दिल्ली।
    चुनाव आयोग ( Election Commission) ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में अपने कामकाज और फैसले लेने की प्रक्रिया का बचाव किया है। आयोग का कहना है कि मतदाता सूची (Electoral Roll) के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special In-depth Review- SIR) से जुड़े प्रमुख फैसले सामूहिक रूप से लिए गए थे। आयोग के तीनों सदस्यों ने हलफनामा दाखिल करने को भी सर्वसम्मति से मंजूरी दी।

    हालांकि, आयोग के इस जवाब से उसके कामकाज को लेकर उठे सभी सवालों का समाधान नहीं हुआ है। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में 14 बार अपनी टिप्पणियां दर्ज की थीं। इनमें कई मामलों में उन्होंने फैसले लिए जाने के बाद इसकी जानकारी मिलने की बात कही थी। यही इस पूरे विवाद का अहम पहलू है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आयोग ने आखिरकार किसी फैसले को मंजूरी दी या नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या उसके दोनों अन्य सदस्यों को आयोग के नाम पर की जा रही कार्रवाई की जानकारी और उसमें अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिला। आरोप ये लग रहे हैं कि सभी फैसले ज्ञानेश कुमार खुद ले रहे थे।


    फॉर्म 6 में बदलाव को लेकर क्या विवाद है?

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 को लेकर भी आयोग के हलफनामे में सफाई दी गई है। मई में चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि मतदाता पंजीकरण के लिए निर्धारित फॉर्म 6 में बदलाव करने के लिए निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 में संशोधन जरूरी है। सुखबीर सिंह संधू ने भी इस बात से सहमति जताई थी।

    इसके बावजूद जुलाई में फॉर्म 6 के ऑनलाइन वर्जन में बदलाव दिखाई दिया। संधू को इसकी जानकारी एक अखबार की रिपोर्ट से मिली। अगस्त में उन्होंने ऑनलाइन फॉर्म में जोड़ी गई घोषणा को अनधिकृत और अवैध बताया था।

    अब आयोग ने हलफनामे में कहा है कि SIR के दौरान जोड़ी गई घोषणा फॉर्म 6 में संशोधन नहीं थी, बल्कि एक अलग दस्तावेज था। हालांकि, आयोग ने यह भी स्वीकार किया कि ऑनलाइन आवेदन में घोषणा को जिस तरह दिखाया गया, उससे ऐसा लग सकता था कि फॉर्म 6 में बदलाव किया गया है।

    आयोग ने माना कि अधिकारियों की ओर से उठाए गए कुछ कदमों में सुधार की जरूरत थी। इसके बाद आयोग के निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण प्रभाग ने 21 अक्टूबर को ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में वैधानिक फॉर्म 6 और SIR से जुड़ी घोषणा को अलग-अलग करने का फैसला लिया।

    लेकिन हलफनामे में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि जुलाई में ऑनलाइन फॉर्म में घोषणा जोड़ने की मंजूरी किसने दी थी। यह भी नहीं बताया गया कि दो चुनाव आयुक्तों की ओर से इस संबंध में लिखित आपत्तियां दर्ज किए जाने के बावजूद यह बदलाव कैसे लागू हुआ।


    ECINet के कामकाज पर भी उठे सवाल

    चुनाव आयोग के डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINet को लेकर भी सवाल उठाए गए थे। इस प्लेटफॉर्म के जरिये मतदाता सूची से जुड़े कई काम किए जाते हैं। हलफनामे में आयोग ने कहा कि मतदाता सूची तैयार करने और उसमें बदलाव करने की वैधानिक जिम्मेदारी निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) की होती है। आयोग के मुताबिक, ERO के आदेश के बिना किसी मतदाता का नाम जोड़ा, हटाया या संशोधित नहीं किया जाता। सॉफ्टवेयर का उद्देश्य अधिकारियों को उनके अधिकारों का इस्तेमाल करने में मदद करना है।

    आयोग ने प्लेटफॉर्म की कानूनी अनुपालन प्रक्रिया की समीक्षा और नए आईटी मॉड्यूल की जांच के लिए भी नई व्यवस्था का उल्लेख किया। इसके तहत आईआईटी मुंबई और भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु के विशेषज्ञों वाली समिति का प्रावधान किया गया है।

    हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसी ही व्यवस्था का सुझाव विवेक जोशी ने 29 मई को दिया था। उन्होंने मतदाता सूची के डेटाबेस में अधिकारों के धीरे-धीरे केंद्रीकरण को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने सुझाव दिया था कि आईआईटी के किसी बाहरी विशेषज्ञ की मदद से यह प्रमाणित कराया जाए कि डेटाबेस में बदलाव करने का अधिकार केवल संबंधित वैधानिक अधिकारियों के पास हो।

    सुखबीर सिंह संधू ने भी जुलाई में इस सुझाव का समर्थन किया था। लेकिन 14 अगस्त को दर्ज अपनी टिप्पणी में संधू ने कहा था कि उनके पहले के सुझावों पर क्या हुआ, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। आयोग के हलफनामे में समिति बनाने के फैसले का जिक्र है, लेकिन मई में दिए गए इस सुझाव का उल्लेख नहीं किया गया है।


    गोवा में 97 मतदाताओं के नाम का मामला

    गोवा में मतदाता सूची से जुड़े मामले का भी हलफनामे में उल्लेख है। आयोग के अनुसार, अंतिम मतदाता सूची से बाहर रह गए 97 मतदाताओं में से 88 ने बाद में फॉर्म 6 के जरिए आवेदन किया। हालांकि, इससे पहले फरवरी में सामने आई समस्या का स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा के निर्वाचन अधिकारियों ने सात दिनों के भीतर आठ बार सॉफ्टवेयर में जरूरी बदलाव करने का अनुरोध किया था, ताकि हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने के उनके फैसलों को लागू किया जा सके।

    आयोग के एक उप निर्वाचन आयुक्त ने भी टिप्पणी की थी कि आईटी सिस्टम जरूरी कार्रवाई को नहीं रोक सकता। हलफनामे में बाद में 88 मतदाताओं के आवेदन करने की जानकारी तो दी गई, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि फरवरी में अधिकारियों को अपने फैसले लागू करने में परेशानी क्यों हुई थी।


    पश्चिम बंगाल में अपीलों को लेकर भी सवाल

    पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में नाम बहाल करने के आदेशों के खिलाफ दाखिल अपीलों का मामला भी हलफनामे में उठाया गया है। आयोग ने कहा कि ये अपीलें राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के अधिकारियों ने दाखिल की थीं और इस मामले को आयोग के सामने नहीं लाया गया था। आयोग ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत संबंधित अधिकारियों को अपील दाखिल करने का अधिकार था। हालांकि, इस मामले में भी कुछ सवाल बिना जवाब के ही रहे।

  • सेशन कोर्ट के सुझाव देने के तरीके पर भड़का SC…., मांगा स्पष्टीकरण

    सेशन कोर्ट के सुझाव देने के तरीके पर भड़का SC…., मांगा स्पष्टीकरण


    नई दिल्ली।
    देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) के द्वारा राज्यों के हाईकोर्ट (High Court) और जिला अदालतों (District courts) को आदेश, सलाह या सुझाव देने की बात तो आपने अक्सर सुनी होगी। हालांकि, आज हम जो बताने जा रहे हैं वह थोड़ा अटपटा लग सकता है। सेशन कोर्ट के एक जज ने सुप्रीम कोर्ट को यह सुझाव दे दिया है आपराधिक मामले में आरोपी को कब जमानत देनी चाहिए और कब नहीं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए उस जज से स्पष्टीकरण मांगा है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा कि वह पश्चिम बंगाल के एक अतिरिक्त सत्र जज के सुझाव वाली पत्र लिखने के तरीके से काफी परेशान है।

    दरअसल, पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना में बतौर अतिरिक्त सत्र जज ने एक आपराधिक मामले में ट्रायल पूरा करने के लिए और समय देने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट को एक पत्र लिखा। पत्र में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को यह सुझाव देने का प्रयास किया कि आपराधिक मामले में आरोपी को कब जमानत दी जानी चाहिए और कब नहीं। इसको लेकर जस्टिस जेबी पारदीवाला और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि ऐसा करना ट्रायल जज का काम नहीं है। पत्र के आखिरी दो पैराग्राफ हमें पसंद नहीं आए।


    ट्रायल पूरा करने के लिए मांगा था समय

    सत्र अदालत ने जज ने गत 11 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के असिस्टेंट रजिस्ट्रार को पत्र लिखकर ट्रायल पूरा करने के लिए और समय देने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया कि गत 11 मई के एक आदेश से उसने सत्र अदालत को निर्देश दिया था कि तीन माह में मामले का ट्रायल पूरा किया जाए।


    लालू समेत नौ पर आरोप तय करने का फैसला टला

    एक अन्य मामले में राउज एवेन्यू अदालत ने शनिवार को पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी, बेटे तेजस्वी यादव और छह अन्य लोगों के खिलाफ कथित आईआरसीटीसी होटल घोटाले से जुड़े धनशोधन मामले में औपचारिक रूप से आरोप तय करने के फैसले को 30 अक्तूबर तक स्थगित कर दिया। विशेष न्यायाधीश प्रशांत कुमार की अदालत में सभी आरोपी पेश हुए। अदालत ने औपचारिक रूप से आरोप तय करने के निर्णय को अगली सुनवाई तक स्थगित कर दिया।

  • US: मध्यावधि चुनाव से पहले ट्रंप को बड़ा झटका…. SC ने मेल मतपत्र प्रतिबंधों को किया खारिज

    US: मध्यावधि चुनाव से पहले ट्रंप को बड़ा झटका…. SC ने मेल मतपत्र प्रतिबंधों को किया खारिज


    न्यूयॉर्क।
    सोमवार को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) के मेल मतपत्र प्रतिबंधों को फिलहाल खारिज कर दिया। इस निर्णय से राज्यों को अपनी पुरानी मेल मतपत्र प्रक्रियाओं को जारी रखने की अनुमति मिल गई है। यह फैसला मध्यावधि चुनावों (Mid-term elections) में मतदान शुरू होने के बीच आया है। ट्रंप प्रशासन कांग्रेस पर नियंत्रण के लिए नवंबर के चुनावों से पहले इन प्रतिबंधों को लागू करना चाहता था।

    डाक मतपत्र के मामले में जजों की राय क्या?
    जस्टिस सैमुअल एलिटो और जस्टिस क्लेरेंस थॉमस ने इस संक्षिप्त आदेश का विरोध किया। जस्टिस ब्रेट कवानुघ ने प्रतिबंधों को मध्यावधि चुनावों के लिए लागू न करने पर सहमति जताई। हालांकि, उन्होंने बाद में ट्रंप प्रशासन के पक्ष में फैसला सुनाने का संकेत दिया। यह मामला महत्वपूर्ण है क्योंकि देश का लगभग एक तिहाई हिस्सा मेल द्वारा मतदान करता है।


    2020 में मिली हार का कारण डाक मतपत्र को मानते हैं ट्रंप

    चुनाव अधिकारियों ने कहा कि मध्यावधि चुनावों से पहले पूर्ण बदलाव करना संभव नहीं था। अलाबामा, उत्तरी कैरोलिना और विस्कॉन्सिन ने पिछले सप्ताह ही मतदाताओं को मेल मतपत्र भेजना शुरू कर दिया था। उस समय भी नई प्रणाली सक्रिय नहीं थी। ट्रंप ने लंबे समय से मेल मतदान का विरोध किया है। उन्होंने 2020 के चुनाव में जो बाइडेन से अपनी हार के लिए इसे गलत तरीके से दोषी ठहराया था। हालांकि, वह खुद अक्सर इसी तरीके से मतदान करते रहे हैं, जिसमें इस साल भी शामिल है।


    ट्रंप प्रशासन की क्या थी योजना?

    ट्रंप प्रशासन की योजना में राज्यों को एक समान लिफाफा शैली अपनानी थी। उन्हें योग्य मतदाताओं की सूची एक ऑनलाइन माध्यम पर जमा करनी होती। पोस्टल सर्विस उन राज्यों को मतपत्र देने से मना कर सकती थी जो नियमों का पालन नहीं करते। एक व्हिसलब्लोअर रिपोर्ट ने इस प्रणाली पर चिंता जताई थी। रिपोर्ट के अनुसार, ऑनलाइन माध्यम ठीक से नहीं बना था। एक बार कोड त्रुटि से लाखों मेल मतपत्रों का पूरा समूह रद्द हो सकता था।


    प्रतिबंधों को क्यों चुनौती दी गई?

    डेमोक्रेटिक राज्य अधिकारियों और मतदान अधिकार समूहों ने इन प्रतिबंधों को अदालत में चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्रपति के पास चुनाव नियम तय करने का सांविधानिक अधिकार नहीं है। उनके अनुसार, ये नियम एक बड़े चुनाव की पूर्व संध्या पर मेल मतदान को लगभग समाप्त कर देंगे। निचली अदालतों ने ट्रंप की योजना को अवरुद्ध कर दिया था। इसमें राष्ट्रपति द्वारा नामित एक न्यायाधीश द्वारा जारी किया गया प्रारंभिक निषेधाज्ञा भी शामिल था।


    सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

    ट्रंप प्रशासन ने निचली अदालतों के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। प्रशासन ने तर्क दिया कि पोस्टल सर्विस पर संघीय नियंत्रण उन्हें मेल मतपत्रों के लिए नियम तय करने की अनुमति देता है। उन्होंने यह भी कहा कि नियमों का पालन करना संभव था। संघीय सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक प्रारंभिक प्रक्रियात्मक निर्णय जीता था। हालांकि, जस्टिस ने योजना की वैधता पर स्पष्ट रूप से कोई फैसला नहीं सुनाया था।

  • SC का प्रस्ताव- वाहन का बीमा नहीं तो तेल नहीं…, पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू करने की तैयारी

    SC का प्रस्ताव- वाहन का बीमा नहीं तो तेल नहीं…, पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू करने की तैयारी


    नई दिल्ली
    । देश में बिना बीमा (Uninsured) के सड़कों पर फर्राटे भर रहे वाहनों (Vehicles) पर लगाम लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने प्रस्ताव दिया है. इसमें ‘वाहन का बीमा नहीं तो तेल नहीं’ अभियान (‘No vehicle insurance, no fuel’ campaign ) को पायलट प्रोजेक्ट (Pilot project) के रूप में लागू करने का प्रपोजल दिया गया है।

    सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण यानी IRDAI और सड़क परिवहन मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वे एक ऐसा पायलट प्रोजेक्ट तैयार करें जिसके तहत पेट्रोल पंपों पर ईंधन देने से पहले वाहन के वैध इंश्योरेंस की जांच की जा सके और बीमा न होने पर तेल देने से मना किया जा सके।

    सुप्रीम कोर्ट ने सड़क सुरक्षा और बीमा नियमों को सख्त करने के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है. कोर्ट ने सड़क परिवहन मंत्रालय और IRDAI को पेट्रोल पंपों पर ईंधन, ANPR कैमरे, और नई गाड़ियों के बीमा को लेकर बड़े आदेश दिए हैं.कोर्ट ने सड़क परिवहन मंत्रालय और IRDAI को एक ऐसा पायलट प्रोजेक्ट तैयार करने को कहा है, जिसके तहत पेट्रोल पंपों पर वैध वाहन बीमा न होने पर गाड़ियों को ईंधन यानी पेट्रोल डीजल देने पर रोक लगाई जा सके।

    हाईवे और सड़कों पर लगे ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (ANPR) कैमरों को ‘वाहन VAHAN’ पोर्टल और बीमा डेटाबेस से जोड़ा जाएगा. इससे बिना बीमा वाली गाड़ियों के अपने आप ई-चालान कट सकेंगे.नई गाड़ियों के लिए बीमा अवधि बढ़ाते हुए कोर्ट ने नई प्राइवेट कारों के लिए अनिवार्य थर्ड-पार्टी बीमा अवधि 3 साल से बढ़ाकर 4 साल कर दी।

    जबकि नए दोपहिया वाहनों के लिए इसे 5 साल से बढ़ाकर 6 साल कर दिया गया है.पुलिस के लिए मोबाइल ऐप भी होगा. सड़क पर चेकिंग के लिए ट्रैफिक पुलिस को ऐसे मोबाइल ऐप या हैंडहेल्ड डिवाइस दिए जाएंगे, जिससे वे पलभर में गाड़ी के बीमा की जांच कर सकें।

  • MP: राजा रघुवंशी हत्याकांड…. सोनम की जमानत रद्द कराने के लिए SC जाएगा परिवार

    MP: राजा रघुवंशी हत्याकांड…. सोनम की जमानत रद्द कराने के लिए SC जाएगा परिवार


    इंदौर।
    मेघालय हाई कोर्ट (Meghalaya High Court) द्वारा सोनम रघुवंशी (Sonam Raghuvanshi) की जमानत बरकरार रखने के एक दिन बाद राजा रघुवंशी (Raja Raghuvanshi) के परिवार ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का रुख करने का फैसला किया है. राजा के बड़े भाई विपिन रघुवंशी ने मंगलवार को कहा कि परिवार जल्द ही सोनम की जमानत रद्द कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करेगा।

    विपिन रघुवंशी ने कहा कि उन्हें अभियोजन पक्ष की पैरवी से संतुष्टि नहीं है. इसलिए अब उनका परिवार न्याय की लड़ाई अपने दम पर लड़ेगा और इसके लिए निजी वकील नियुक्त करेगा. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि मेघालय पुलिस ने गिरफ्तारी के समय सोनम को गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी क्यों नहीं दी. उनके मुताबिक, इसी कानूनी चूक का फायदा सोनम को जमानत मिलने में मिला।

    दरअसल, सोमवार को मेघालय हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें निचली अदालत द्वारा 27 अप्रैल को दी गई सोनम की जमानत रद्द करने की मांग की गई थी. हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि गिरफ्तारी के दौरान पुलिस ने कानूनी प्रक्रिया का सही ढंग से पालन नहीं किया और सोनम को प्रभावी तरीके से गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए गए. अदालत ने इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22(1) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 47(1) का उल्लंघन माना।


    क्या है पूरा मामला?

    गौरतलब है कि राजा रघुवंशी और सोनम की शादी 11 मई 2025 को इंदौर में हुई थी. दोनों 20 मई को हनीमून मनाने मेघालय गए थे. 23 मई को सोनम के लापता होने की खबर सामने आई, जबकि 2 जून को राजा का शव पूर्वी खासी हिल्स जिले के सोहरा (चेरापूंजी) स्थित एक झरने के पास गहरी खाई में मिला था.


    किसे हई थी सजा?

    इस मामले में पुलिस ने सोनम रघुवंशी, उसके कथित प्रेमी राज कुशवाहा और उसके तीन दोस्तों को हत्या की साजिश और हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया था. सोनम करीब 10 महीने न्यायिक हिरासत में रहने के बाद जमानत पर रिहा हुई है।

  • शिवसेना चुनाव चिन्ह विवाद पर बयानबाजी से भड़का SC…. नेताओं को लगाई फटकार

    शिवसेना चुनाव चिन्ह विवाद पर बयानबाजी से भड़का SC…. नेताओं को लगाई फटकार


    नई दिल्ली।
    शिवसेना (Shiv Sena) के चुनाव चिह्न (Election Symbol Dispute) को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने बहुत सख्त रुख अपनाया है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने नेताओं द्वारा कोर्ट के खिलाफ की जा रही बयानबाजी पर गहरी नाराजगी जताई। शुक्रवार को इस अहम मामले की सुनवाई करते हुए जजों ने साफ कहा कि नेता मीडिया में अदालत के खिलाफ कोई भी गैरजिम्मेदार बातें न कहें। अदालत ने सख्त चेतावनी दी है कि इस तरह का व्यवहार बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

    असल में, शिवसेना के दोनों गुटों (उद्धव और शिंदे) के बीच चुनाव चिह्न को लेकर सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत इस बात से बहुत नाराज थी कि नेता अदालत के अंदर तो खुद सुनवाई टालने के लिए नई तारीखें मांगते हैं, लेकिन बाहर जाकर मीडिया में यह गलत बात फैलाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट कोई फैसला नहीं कर रहा है। अदालत ने नेताओं के इस काम को बहुत ही गलत आचरण माना है।


    सुप्रीम कोर्ट ने उद्धव ठाकरे गुट के वकील को क्या चेतावनी दी?

    सुनवाई के दौरान अदालत ने सीधे तौर पर उद्धव ठाकरे गुट के वकील को कड़े निर्देश दिए। पीठ ने कहा कि सबसे पहले अपने लोगों को मीडिया में ऐसे गैरजिम्मेदार बयान देने से रोकें। जज ने सख्त लहजे में कहा कि आप लोग अदालत के अंदर हमसे तारीख मांगते हैं और बाहर जाकर कहते हैं कि अदालत सुनवाई नहीं कर रही है। अदालत ने साफ किया कि अगर किसी को लगता है कि जज यहां खाली बैठे हैं, तो यह बात बिल्कुल भी स्वीकार नहीं की जाएगी।


    मुख्य न्यायाधीश और शिंदे गुट के वकील ने क्या कहा?

    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कड़े शब्दों में कहा कि हम यहां शाम चार बजे तक बैठकर काम करते हैं, इसलिए नेताओं को अपने शब्दों का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर करना चाहिए। वहीं, एकनाथ शिंदे गुट की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने भी अदालत की बात का पूरा समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अदालत के खिलाफ इस तरह की बयानबाजी नहीं होनी चाहिए क्योंकि अदालत ने हमेशा सभी पक्षों की बातों को बहुत ही शांति और धैर्य के साथ सुना है।


    मामले की अगली सुनवाई कब होगी और ठाकरे गुट के वकील ने क्या सफाई दी?

    अदालत की इस कड़ी फटकार के बाद उद्धव ठाकरे गुट के वरिष्ठ वकील देवदत्त कामत ने अपनी सफाई पेश की। उन्होंने अदालत को बताया कि वकील ऐसे किसी भी बयान का बिल्कुल समर्थन नहीं करते हैं और वे अदालत की सुविधा के अनुसार किसी भी समय बहस करने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। इन सभी दलीलों को सुनने के बाद, अब इस पूरे मामले की अगली सुनवाई के लिए 30 जुलाई की तारीख तय की गई है।

  • पब्लिक वाहनों को पैनिक बटन के बगैर न दिया जाए फिटनेस सर्टिफिकेट…SC का सख्त निर्देश

    पब्लिक वाहनों को पैनिक बटन के बगैर न दिया जाए फिटनेस सर्टिफिकेट…SC का सख्त निर्देश


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सड़क सुरक्षा से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान बड़ा निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि टैक्सी, बस और अन्य पब्लिक सर्विस वाहनों (Public Transport Vehicle) को तब तक फिटनेस सर्टिफिकेट न दिया जाए जब तक उनमें पैनिक बटन और व्हीकल ट्रैकिंग डिवाइस (Vehicle Tracking Device:) यानी की वीएलटीडी न लगाए जाएं। कोर्ट के अनुसार यह कदम यात्रियों खासकर बच्चें, महिला और बुजुर्ग के लिए उठाए जा रहे हैं।


    Panic Button आखिर क्या होता है?

    पैनिक बटन एक इमरजेंसी सेफ्टी फीचर होता है, जिसे खतरे या आपातकालीन स्थिति में इस्तेमाल किया जाता है। जैसे मान लीजिए अगर कोई यात्री खतरा महसूस करे, हादसे का शिकार हो जाए या फिर कोई मेडिकल इमरजेंसी आ जाए। यानी किसी भी प्रकार का संकट हो, तो इस बटन को दबाकर तुरंत मदद मांगी जा सकती है। यह बटन दबाते ही वाहन की GPS लोकेशन कंट्रोल रूम, पुलिस या इमरजेंसी सिस्टम तक पहुंच जाती है।


    गाड़ियों में कहां लगाया जाता है यह बटन?

    आमतौर पर यह बटन वाहन के सीट के पास, दरवाजे के आसपास या वाहन के पिलर पर लगाया जाता है, ताकि जरूरत पड़ने पर यात्री इसे तुरंत इस्तेमाल कर सके। अधिकतर मामलों में यह लाल रंग का छोटा बटन होता है, जिसे आसानी से पहचाना जा सके।


    किन परिस्थितियों में इस्तेमाल करें ?

    हमेशा याद रखें कि इस बटन का इस्तेमान किसी गंभीर और वास्तविक स्थिति में करें। जैसे:
    दुर्घटना होने पर: अगर गाड़ी किसी सुनसान इलाके में दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है और फोन का नेटवर्क नहीं है, तो फौरन इस बटन का इस्तेमाल करें, इससे समय रहते आप तक मदद पहुंच सकती है।
    खतरा महसूस होने पर: अगर सफर के दौरान कोई अजनबी पीछा करे, ड्राइवर बदतमीजी करे या कोई वाहन में जबरन घुसने की कोशिश करे, तो यात्री इसे दबाकर मदद मांग सकते हैं। यह महिलाओं के लिए काफी सुरक्षित विकल्प हो सकता है।
    मेडिकल इमरजेंसी: अगर ड्राइविंग के दौरान चालक या यात्री की अचानक तबीयत खराब हो जाए, तो इस बटन के जरिए एम्बुलेंस या मेडिकल टीम को तुरंत बुलाया जा सकता है।
    सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश सड़क सुरक्षा के क्षेत्र के लिए एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जो डिजिटल निगरानी के जरिए अपराध और हादसों पर लगाम लगाने में मदद कर सकता है।


    Vehicle Tracking Device कैसे करता है काम?

    सुप्रीम कोर्ट ने व्हीकल ट्रैकिंग डिवाइस को लेकर भी निर्देश दिए हैं। आपको बता दें यह एक स्मार्ट ट्रैकिंग सिस्टम होता है, जो वाहन की लाइव लोकेशन लगातार मॉनिटर करता रहता है। यह सिस्टम सीधे कंट्रोल रूम और इमरजेंसी नेटवर्क से जुड़ा होता है। जैसे ही कोई यात्री पैनिक बटन दबाता है, वाहन की सटीक लोकेशन तुरंत संबंधित कंट्रोल सेंटर तक पहुंच जाती है। इससे पुलिस, एम्बुलेंस या सुरक्षा एजेंसियों को वाहन तक जल्दी पहुंचने में मदद मिलती है। खासकर टैक्सी, बस और कैब जैसी पब्लिक गाड़ियों में यह फीचर यात्रियों की सुरक्षा को मजबूत बनाता है।


    क्या इससे सच में सुरक्षा बढ़ेगी?

    अभी इसपर कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर सभी पब्लिक सर्विस वाहनों में पैनिक बटन या व्हीकल ट्रैकिंग सिस्टम को सख्ती से लगा दिया जाए, तो काफी हद तक सुधार देखने को मिल सकता है। हो सकता है कि इससे महिलाओं, बच्चों और बुजुर्ग यात्रियों को ज्यादा सुरक्षा मिले। साथ ही अपराध और छेड़छाड़ जैसी घटनाओं पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है। सड़क हादसों या मेडिकल इमरजेंसी के दौरान भी राहत और मदद तेजी से पहुंचाई जा सकेगी, जिससे कई जानें बचाई जा सकती हैं।

  • सबरीमाता मंदिर में महिलाओं की एंट्री मामले में SC ने कहा- आप किसी धर्म को खोखला नहीं कर सकते

    सबरीमाता मंदिर में महिलाओं की एंट्री मामले में SC ने कहा- आप किसी धर्म को खोखला नहीं कर सकते


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के 9 जज की संविधान पीठ ने बुधवार को कहा कि सामाजिक कल्याण और सुधार के नाम पर किसी धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता। संविधान पीठ ने यह भी कहा कि किसी भी अदालत के लिए लाखों लोगों की आस्था को गलत ठहराना मुश्किल है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (Chief Justice Surya Kant) की अगुवाई वाली 9 जजों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी सबरीमाला मंदिर (Sabarimala Temple) सहित विभिन्न संप्रदायों के धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की।

    मंदिर का प्रबंधन कर रहे त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (टीडीबी) की ओर वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने बहस के चौथे दिन धार्मिक मामलों में जनहित याचिका की स्वीकार्यता के मुद्दे को उठाया। उन्होंने कहा कि क्या अदालत किसी ऐसे व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर सकता है जो उस धर्म से संबंधित नहीं है, लेकिन उस धर्म की किसी धार्मिक प्रथा पर सवाल उठा रहा हो? इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि किसी अदालत के लिए सबसे मुश्किल काम शायद यह घोषणा करना हो सकता है कि लाखों लोगों की आस्था गलत या भ्रामक है।

    जस्टिस नागरत्ना ने भी इसी तरह की चिंताएं जाहिर की और कहा कि ऐसी जहनित याचिकाओं पर तब तक विचार नहीं करना चाहिए, जब तक कि याचिकाकर्ता का उस मामले से कोई सीधा संबंध न हो। उन्होंने कहा कि ‘सामाजिक सुधार के नाम पर किसी भी धर्म के मूल स्वरूप को बदला नहीं जा सकता।

    9 जजों की पीठ कर रही सुनवाई
    वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि 9 जजों की इस संविधान पीठ को इस मामले की पेचीदगियों को सुलझाना होगा, लेकिन ऐसा करते समय उन्हें आवश्यकता के सिद्धांत को इस मामले में हावी नहीं होने देना चाहिए। टीडीबी की ओर से संविधान पीठ को तर्क दिया कि संवैधानिक सुरक्षा केवल जरूरी धार्मिक प्रथाओं तक ही सीमित नहीं रख सकते, और यह तय करना अदालतों का काम नहीं है कि कोई धार्मिक प्रथा ‘जरूरी’ है या नहीं।

    वरिष्ठ अधिवक्ता सिंघवी ने कहा कि संविधान पीठ को यह भी बताया गया कि किसी समुदाय की मान्यताओं और प्रथाओं का मूल्यांकन उस समुदाय की अपनी मान्यताओं के आधार पर करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अदालत समुदाय की मान्यता स्वीकार करने के लिए बाध्य है, और उस मान्यता पर फैसला सुनाना अदालत का काम नहीं है।

    सिंघवी ने पीठ से कहा कि आप किसी ‘खिलौने की दुकान’ या किसी रेस्टोरेंट से नहीं निपट रहे हैं। आप एक ऐसे देवता से निपट रहे हैं जो शाश्वत ब्रह्मचारी हैं, जो गृहस्थ आश्रम के सभी रूपों से दूर रहते हैं। इसलिए, यह तर्क दिया जा सकता है कि 11 साल क्यों नहीं, 49 साल क्यों नहीं।

    अनुच्छेद में ‘सामाजिक सुधार’ शब्द का इस्तेमाल क्यों?
    जस्टिस सुंदरेश ने सवाल किया कि अनुच्छेद 25(2)(बी) में ‘सामाजिक सुधार’ वाक्यांश का इस्तेमाल क्यों किया गया, जबकि अनुच्छेद 25 की शुरुआत में ‘सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य’ शब्दों का इस्तेमाल किया गया। इसके जवाब में वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि ऐसा शायद कुछ ऐसी प्रथाओं से निपटने के लिए किया गया हो, जिन्हें किसी भी निष्पक्ष मापदंड पर सही नहीं ठहराया जा सकता।

    नैतिकता के आधार पर कानून रद्द नहीं कर सकते
    जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि कानून को संवैधानिक नैतिकता के आधार पर रद्द नहीं कर सकते। इसे संविधान के भाग-3 का उल्लंघन करने के आधार पर या विधायी अक्षमता के आधार पर रद्द कर सकते हैं। अधिवक्ता सिंघवी ने कहा कि संवैधानिक नैतिकता जैसा कोई भी सिद्धांत एक बाहरी मानक लेकर आता है, जिसे संभालना बहुत खतरनाक हो जाता है।

    संवैधानिक नैतिकता के खतरे को संभाल नहीं सकते
    सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि संवैधानिक नैतिकता का खतरा इसे आंकने के उन मानकों से है, जिन्हें संभाला नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि इसके लिए पूरी तरह से व्यक्तिपरकता और व्यक्तिगत राय की जरूरत होती है। इस पर सिंघवी ने कहा कि यह एक बेकाबू घोड़ा है, एक डायनासोर है, जिस पर मेरे लॉर्ड्स (जजों) सवारी नहीं कर सकते।