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  • महिला ने तलाक के बाद पति से मांगा 170 करोड़ का सोना, भड़का SC…. बोला- ऐसे मामलों को तुरंत रोक देना चाहिए

    महिला ने तलाक के बाद पति से मांगा 170 करोड़ का सोना, भड़का SC…. बोला- ऐसे मामलों को तुरंत रोक देना चाहिए


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान झूठे घरेलू हिंसा के मामलों पर चिंता जताई है। इस दौरान SC ने तलाक (Divorce) के बाद अपने पति से 170 करोड़ रुपये का सोना (Gold worth Rs 170 crore) मांगने वाली महिला को फटकार भी लगाई है। उच्चतम न्यायालय ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि जिन मामलों में यह साफ-साफ दिख रहा है कि कोई ठोस आरोप नहीं हैं, ऐसे घरेलू हिंसा के मामलों को शुरुआत में ही रोक देना चाहिए।

    एक रिपोर्ट के मुताबिक यह मामला उस समय सामने आया जब पति ने दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) के फैसले को SC में चुनौती दी। दोनों पक्षों के बीच समझौता पहले ही हो चुका था, लेकिन पत्नी की मांग पर हाईकोर्ट ने इस केस पर आगे की सुनवाई की इजाजत दी थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया।


    170 करोड़ का सोना!

    महिला का दावा था कि तलाक के समझौते के बदले उसे 120 करोड़ रुपये के सोने के गहने और 50 करोड़ रुपये के सोने के बिस्किट देने का वादा किया गया था, यानी कुल 170 करोड़ रुपये का सोना। लेकिन सुप्रीम कोर्ट को इस दावे का कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला। SC ने पाया कि यह बात न तो लिखित समझौते में थी, न ही पहले के किसी कागज में इसका जिक्र था। यह दावा बाद में अचानक घरेलू हिंसा की शिकायत में सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि टैक्स से बचने के लिए इसे लिखित में नहीं डाला गया था और कहा कि यह कानून की अनदेखी दिखाता है।

    क्या था समझौता?
    दरअसल इस जोड़े की शादी साल 2000 में हुई थी। बाद में दोनों के बीच दूरियां आ गईं और वे 2022-23 से अलग रहने लगे। पति ने 2023 में तलाक की मांग की। इसके बाद मामला सुलह के लिए भेजा गया और 16 मई 2024 को समझौता हुआ, जिसमें 1.5 करोड़ रुपये का पूरा और अंतिम निपटारा तय हुआ। इस समझौते के बाद तलाक की पहली प्रक्रिया भी पूरी हो गई और दोनों पक्षों ने पैसे और गहनों का लेन-देन भी कर लिया। लेकिन बाद में महिला ने तलाक की दूसरी प्रक्रिया से पीछे हटकर घरेलू हिंसा का केस दर्ज कर दिया।

    सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
    हालांकि उच्चतम न्यायालय को घरेलू हिंसा के कोई सबूत नहीं मिले। SC ने अपने फैसले में कहा कि हिंसा को लेकर कोई खास घटना या ठोस विवरण नहीं दिया गया है और बस सामान्य आरोप लगाए गए थे। यह नहीं बताया गया कि पति या उसके परिवार के किस सदस्य ने क्या किया। SC ने यह भी नोट किया कि शादी के इतने लंबे समय तक कभी ऐसे आरोप नहीं लगाए गए थे और शिकायत तब दर्ज की गई जब समझौते का बड़ा हिस्सा पूरा हो चुका था। ऐसे में कोर्ट ने इसे बाद में सोच समझकर उठाया गया कदम बताया।


    अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल

    सुप्रीम कोर्ट ने सख्त शब्दों में कहा कि शादी के विवाद भावनात्मक हो सकते हैं, लेकिन केवल भावनाओं के आधार पर आपराधिक केस नहीं चलाए जा सकते। अगर ऐसा होने दिया गया तो कानून का गलत इस्तेमाल होगा और लोगों को बेवजह परेशान किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब दोनों पक्ष अपनी मर्जी से समझौता करते हैं और उस पर अमल भी करते हैं, तो बिना ठोस कारण के बाद में उससे पीछे नहीं हट सकते। आखिर में अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए शादी को खत्म कर दिया और कहा कि यह रिश्ता पूरी तरह टूट चुका है और अब इसमें कोई उम्मीद नहीं बची है। साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि बाकी बची रकम तय समय में दी जाए, जमा पैसे वापस किए जाएं और दोनों के बीच चल रहे सभी केस खत्म माने जाएं।

  • महिलाओं को संसद-विधानसभाओं में तत्काल 33% आरक्षण देने की मांग… SC में आज होगी सुनवाई

    महिलाओं को संसद-विधानसभाओं में तत्काल 33% आरक्षण देने की मांग… SC में आज होगी सुनवाई


    नई दिल्ली।
    देशभर में जहां एक ओर महिलाओं को संसद और विधानसभा (Parliament and Legislative Assemblies) में 33% आरक्षण (33% Women Reservation ) देने के मुद्दे को लेकर सियासत तेज हो गई है। वहीं दूसरी ओर अब इस मामले में अब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में अहम सुनवाई होने जा रही है। सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) आज यानी सोमवार 13 अप्रैल को इस मामले पर सुनवाई करेगा। यह याचिका कांग्रेस नेता जया ठाकुर (Jaya Thakur) ने दाखिल की है। इसमें मांग की गई है कि महिलाओं को आरक्षण देने वाला कानून नारी शक्ति वंदन अधिनियम तुरंत लागू किया जाए और इसे जनगणना व परिसीमन से न जोड़ा जाए।

    फिलहाल इस कानून में यह प्रावधान है कि महिलाओं को 33% आरक्षण तभी मिलेगा, जब अगली जनगणना और उसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। लेकिन याचिका में कहा गया है कि यह शर्त जरूरी नहीं है, क्योंकि सीटों की संख्या पहले से तय है और देश की लगभग आधी आबादी होने के बावजूद महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है।


    जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच करेगी सुनवाई

    इस मामले की सुनवाई जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच करेगी। इससे पहले 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कानून के इस प्रावधान को रद्द करना बहुत मुश्किल होगा। यह सुनवाई इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि 16 अप्रैल से संसद का विशेष सत्र शुरू होने वाला है, जिसमें महिला आरक्षण कानून को लागू करने के लिए संशोधन बिल लाया जा सकता है।


    पीएम मोदी ने सभी नेताओं से की है अपील

    बता दें कि इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को पत्र लिखकर इस कानून को सर्वसम्मति से पास करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि देश को विकसित बनाने के लिए महिलाओं की ज्यादा भागीदारी जरूरी है। हालांकि, कांग्रेस ने इस विशेष सत्र का विरोध किया है। पार्टी का कहना है कि यह कदम चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन हो सकता है, क्योंकि इस समय तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। साथ ही कांग्रेस ने मांग की है कि पहले परिसीमन पर सभी दलों की बैठक होनी चाहिए, उसके बाद ही महिला आरक्षण पर आगे बढ़ना चाहिए।

  • SC ने अनावश्यक मुकदमेबाजी पर केंद्र सरकार को लगाई फटकार, ठोका 25 हजार जुर्माना

    SC ने अनावश्यक मुकदमेबाजी पर केंद्र सरकार को लगाई फटकार, ठोका 25 हजार जुर्माना


    नई दिल्ली।
    केंद्र सरकार (Central Government) को अनावश्यक मुकदमेबाजी में पड़ने के लिए फटकार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सोमवार को उस पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश केंद्र की उस याचिका पर दिया है जिसमें पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट (Punjab and Haryana High Court) द्वारा एक सीआईएसएफ अधिकारी की बर्खास्तगी को रद्द करने के आदेश को चुनौती दी गई थी। उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और उज्जल भुइयां की पीठ ने सजा को असंगत पाते हुए अधिकारी को बकाया वेतन देने का भी आदेश दिया।

    जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “हमें समझ नहीं आ रहा कि भारत सरकार ने उच्च न्यायालय की खंडपीठ के आदेश को चुनौती क्यों दी है। हम बातें सुनते हैं कि मामले लंबित हैं। आखिर सबसे बड़ा मुकदमेबाज कौन है? हर्जाना लगाया जाना चाहिए।” उन्होंने कहा, “ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि अगर उच्च न्यायालय ने इसे अनुचित पाया और सभी आदेशों को रद्द करते हुए राहत प्रदान की, तो हम उच्चतम न्यायालय न जाएं?” उन्होंने कहा कि अधिकारी ने चिकित्सा अवकाश लिया था, लेकिन उन्हें उनके परिवार में एक अप्रिय घटना से भी निपटना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) द्वारा आयोजित एक हालिया सम्मेलन में उन्होंने कहा था कि मामलों के लंबित रहने के लिए सरकार जिम्मेदार है। इस बयान का जिक्र करते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि अदालत ने एससीबीए सम्मेलन को बहुत गंभीरता से लिया है।

    उन्होंने कहा, “यह सिर्फ किसी रिसॉर्ट में जाकर वापस आने की बात नहीं थी। हमने तैयारियां कीं, हमने पूरी जानकारी जुटाई। हमने बात की। महज इसलिये नहीं कि हम भूल जाएं।” सीआईएसएफ अधिकारी के खिलाफ दो आरोप लगाए गए थे – पहला 11 दिनों तक ड्यूटी से अनुपस्थित रहने और दूसरा, एक महिला, जोकि एक सीआईएसएफ कांस्टेबल की बेटी थी, के साथ मिलकर मुंबई से भागने और अपने छोटे भाई के साथ उसकी शादी में शामिल होने की साजिश रचकर अनुशासनहीनता का कार्य करने का।


    स्वीकृत चिकित्सा अवकाश पर थे अधिकारी

    उच्च न्यायालय ने इस बात पर संज्ञान लिया कि 11 दिनों की अनुपस्थिति की अवधि के दौरान अधिकारी स्वीकृत चिकित्सा अवकाश पर थे। अदालत ने कहा, “प्रतिवादी-याचिकाकर्ता के भाई के साथ भाग जाने के दूसरे आरोप के संबंध में, यह रिकॉर्ड पर आया है कि महिला स्वयं अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान उपस्थित हुई और उसने कहा कि उसे प्रतिवादी-याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई शिकायत नहीं है।”

    उच्च न्यायालय ने कहा, “यह बात निर्विवाद है कि याचिकाकर्ता के भाई ने संबंधित महिला से विवाह किया था। अतः यह पाया गया है कि वास्तव में याचिकाकर्ता की ओर से ऐसा कोई कदाचार नहीं हुआ था जिसके लिए उसे सेवा से हटाया जा सके।”

  • Inter-Religious विवाह में महिलाओं की धार्मिक पहचान के मामले में SC कर रहा सुनवाई

    Inter-Religious विवाह में महिलाओं की धार्मिक पहचान के मामले में SC कर रहा सुनवाई


    नई दिल्ली।
    क्या अंतर-धार्मिक विवाह (Inter-Religious Marriage) करने पर महिलाओं को उनकी धार्मिक पहचान से वंचित किया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) इस मामले पर सुनवाई कर रहा है। ताजा केस पारसी समुदाय से जुड़ा है, जहां याचिकाकर्ता दीना बुढ़राजा ने नागपुर पारसी पंचायत के नियम 5(2) को चुनौती दी है। इस नियम के अनुसार, अगर कोई पारसी महिला गैर-पारसी से विवाह करती है तो उसकी धार्मिक पहचान समाप्त कर दी जाती है और उसे अगियारी जैसे धार्मिक स्थलों में प्रवेश से वंचित कर दिया जाता है। वहीं, पारसी पुरुषों पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है।

    याचिका में दावा किया गया कि यह नियम लिंग आधारित भेदभावपूर्ण है। साथ ही, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता), 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) तथा 25 (धर्म की स्वतंत्रता) का उल्लंघन करता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सोमवार को इस याचिका पर सुनवाई की। इसने केंद्र सरकार, नागपुर पारसी पंचायत, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय, महाराष्ट्र सरकार और चैरिटी कमिश्नर को नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दिवान ने तर्क दिया कि यह नियम असंवैधानिक है क्योंकि यह केवल महिलाओं को लक्षित करता है और समुदाय की परंपराओं के नाम पर लैंगिक असमानता को बढ़ावा देता है।


    कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा

    अदालत ने माना कि यह मामला महत्वपूर्ण कानूनी सवाल उठाता है और पारसी समुदाय में ऐसे मुद्दे पहले भी बार-बार अदालत में आए हैं। यह नियम नागपुर अगियारी के प्रबंधन से संबंधित है, जो पारसी धार्मिक स्थल है। यह मामला पारसी व्यक्तिगत कानूनों से जुड़ा है, जहां समुदाय की परंपराएं विवाह और धार्मिक पहचान को नियंत्रित करती हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि अंतर-धार्मिक विवाह करने वाली महिला को उसकी जन्मजात धार्मिक पहचान से अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा के खिलाफ है।

    विशेष विवाह अधिनियम जैसे कानून अंतर-धार्मिक विवाह की इजाजत देते हैं, जहां दोनों पक्ष अपनी धार्मिक पहचान बनाए रख सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी ऐसे मामलों में कहा है कि विवाह से महिला की धार्मिक पहचान स्वतः पति की धर्म में विलय नहीं होती, जब तक वह स्वेच्छा से परिवर्तन न करे। इस मामले में भी समान सिद्धांत लागू हो सकता है। वर्तमान में मामला प्रारंभिक चरण में है, जहां नोटिस जारी होने के बाद संबंधित पक्षों से जवाब मांगा गया है। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला न केवल पारसी समुदाय बल्कि पूरे देश में अंतर-धार्मिक विवाहों और लैंगिक समानता के मुद्दे पर प्रभाव डालेगा।

  • SC की फटकार से नाराज थे HC जज….510 प्रकरणों में से 508 में आरोपी को दे दी जमानत

    SC की फटकार से नाराज थे HC जज….510 प्रकरणों में से 508 में आरोपी को दे दी जमानत


    इलाहाबाद।
    उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) के जज, जस्टिस भाटिया, ने बीते महीने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से आहत होकर देश के मुख्य न्यायधीश से अनुरोध किया था कि उन्हें जमानत से जुड़े मामलों की सुनवाई का दायित्व ना दिया जाए। दरअसल सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने दहेज हत्या के एक मामले में आरोपी को जमानत देने के जस्टिस भाटिया के फैसले पर नाराजगी जताई थी और इस फैसले को निराशाजनक बताया था। अब जस्टिस भाटिया के फैसलों को लेकर कुछ चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं।

    एक रिपोर्ट के मुताबिक अक्तूबर से दिसंबर 2025 के बीच उन्होंने दहेज हत्या से जुड़े 510 नियमित जमानत मामलों में फैसला सुनाया। इनमें से 508 मामलों में उन्होंने आरोपी को जमानत दे दी। यह कुल मामलों का लगभग 99.61 प्रतिशत है। इतना ही नहीं, रिपोर्ट में इन जमानत आदेशों की भाषा, फैसले की संरचना और जमानत राशि भी लगभग एक जैसी पाई गई, जबकि अलग-अलग मामलों में पीड़ितों की मौत की परिस्थितियां अलग-अलग थीं।


    रिपोर्ट में क्या?

    रिपोर्ट के मुताबिक इन आदेशों में लगभग आधे मामलों में जस्टिस भाटिया ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिससे यह लगे कि मृत्यु से ठीक पहले दहेज के कारण प्रताड़ना हुई थी। जांच में पाया गया कि 340 मामलों में मृत्यु का कारण फांसी बताया गया। 27 मामलों में जहर खाने, 16 में गला घोंटने, 11 में जलने की चोट, 7 में दबाकर मारने और 7 में सिर पर चोट लगने का उल्लेख था। 4 मामलों में डूबने से मृत्यु दर्ज की गई। वहीं केवल 10 मामलों को छोड़कर बाकी सभी में अदालत ने कहा कि आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।


    सुप्रीम कोर्ट ने जताई थी नाराजगी

    इससे पहले बीते 9 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस भाटिया के फैसलों पर नाराजगी जताई थी। याचिका में जस्टिस भाटिया द्वारा 10 अक्टूबर, 2025 को दी गई जमानत को चुनौती दी थी। HC ने उस मामले में दहेज हत्या के आरोपी एक व्यक्ति को जमानत दी थी। आरोपी 27 जुलाई, 2025 से जेल में था और जमानत याचिका के अनुसार उसका कोई पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं था।

    हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए टिप्पणी की, “10 अक्टूबर, 2025 का विवादित आदेश अब तक के सबसे चौंकाने वाले और निराशाजनक आदेशों में से एक है।” शीर्ष न्यायालय ने सवाल उठाया कि दहेज हत्या जैसे गंभीर अपराध में आरोपी के पक्ष में फैसला सुनाते समय उच्च न्यायालय ने किन बातों को आधार बनाया। कोर्ट ने जमानत आदेश को रद्द करने के बाद निर्देश दिया कि जमानत आदेश पारित करने के तरीके के संबंध में समीक्षा के लिए निर्णय की एक प्रति इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भेजी जाए।


    CJI के पास पहुंचे थे जस्टिस भाटिया

    इसके बाद जस्टिस भाटिया ने उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा कि वह भविष्य में जमानत संबंधी मामलों की सुनवाई नहीं करना चाहते और उन्होंने मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि उन्हें ऐसे मामले सुनवाई के लिए आवंटित ना किए जाएं। उन्होंने कहा था कि उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियों का उन पर बहुत निराशाजनक और हतोत्साहित करने वाला प्रभाव पड़ा है।

  • OBC आरक्षण पर SC का बड़ा फैसला… कहा- सिर्फ आय के आधार पर तय नहीं कर सकते क्रीमी लेयर

    OBC आरक्षण पर SC का बड़ा फैसला… कहा- सिर्फ आय के आधार पर तय नहीं कर सकते क्रीमी लेयर

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    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण (OBC Reservation) को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी उम्मीदवार के क्रीमी लेयर (Creamy Layer) में होने या न होने का निर्धारण केवल उसकी पारिवारिक आय के आधार पर नहीं किया जा सकता है। पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा, “पदों की श्रेणियों और स्टेटस मापदंडों का संदर्भ लिए बिना, केवल आय के आधार पर क्रीमी लेयर का दर्जा तय करना कानून की दृष्टि से टिकाऊ नहीं है।” अदालत का मानना है कि आय के साथ-साथ व्यक्ति के सामाजिक और व्यावसायिक पद को भी ध्यान में रखा जाना अनिवार्य है।


    क्या है क्रीमी लेयर की अवधारणा?

    क्रीमी लेयर शब्द का प्रयोग ओबीसी समुदाय के उन लोगों के लिए किया जाता है जो आर्थिक और सामाजिक रूप से काफी समृद्ध हो चुके हैं। आरक्षण का लाभ इस वर्ग को न मिलकर समुदाय के उन गरीब और पिछड़े लोगों तक पहुंचे, जिन्हें इसकी वास्तव में आवश्यकता है। इस अवधारणा की शुरुआत 1992 के प्रसिद्ध इंद्रा सहनी बनाम भारत सरकार मामले के बाद हुई थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण को तो बरकरार रखा था, लेकिन संपन्न तबके को इससे बाहर रखने का आदेश दिया था। इसके बाद 1993 में सरकार ने इसे लागू करने के नियम बनाए थे।

    वर्तमान नियमों के अनुसार, यदि किसी ओबीसी परिवार की वार्षिक आय 8 लाख रुपये से अधिक है तो उसे क्रीमी लेयर में माना जाता है। ऐसे उम्मीदवार सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के हकदार नहीं होते। आय की यह सीमा आखिरी बार 2017 में 6 लाख रुपये से बढ़ाकर 8 लाख रुपये की गई थी।

    आय के अलावा उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों, वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, सशस्त्र बलों के उच्च अधिकारियों और बड़े व्यवसायियों के बच्चों को भी क्रीमी लेयर की श्रेणी में रखा जाता है।

    सुप्रीम कोर्ट के इस नए फैसले से सरकार पर क्रीमी लेयर की पहचान करने वाले 1993 के नियमों की समीक्षा करने का दबाव बढ़ सकता है। अदालत ने संकेत दिया है कि केवल पैसे को पैमाना मान लेना सामाजिक न्याय के व्यापक उद्देश्यों के खिलाफ हो सकता है। उदाहरण के लिए एक कम वेतन पाने वाला व्यक्ति भी अगर ऊंचे प्रशासनिक पद पर है तो उसकी सामाजिक स्थिति एक अमीर व्यापारी से भिन्न हो सकती है।

  • दरगाह परिसर में महाशिवरात्रि पूजा और हिंदू रिवाज रोकने की गुहार …SC ने किया सुनवाई से इनकार

    दरगाह परिसर में महाशिवरात्रि पूजा और हिंदू रिवाज रोकने की गुहार …SC ने किया सुनवाई से इनकार


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार (12 फरवरी) को कर्नाटक (Karnataka) स्थित अलंद लाडले मशाइक दरगाह (Aland Ladle Mashaikh Dargah) प्रबंधन की उस अर्जी पर सुनवाई करने से मना कर दिया जिसमें जिसमें दरगाह परिसर में हिंदू महाशिवरात्रि पूजा (Mahashivratri Puja) और दूसरे हिंदू रीति-रिवाजों पर रोक लगाने के लिए निर्देश देने की मांग की गई थी।

    दरगाह मैनेजमेंट ने भारत के संविधान के आर्टिकल 32 के तहत अर्जी दी थी, जो उन पार्टियों को राहत के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने की इजाज़त देता है जिनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। दरगाह प्रबंधन याचिका में दावा किया था कि दरगाह के धार्मिक स्वरूप को बदलने के लिए हर साल रणनीतिक तरीके से पूजा की अनुमति लेने की कोशिश की जा रही है। प्रबंधन ने सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप कर दरगाह के मूल धार्मिक चरित्र को बनाए रखने की भी मांग की थी।

    हालांकि, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की पीठ ने कहा कि इस तरह के मामलों में पहले हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए। इससे पहले मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने भी टिप्पणी की थी कि हर मामला सीधे अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट लाना उचित नहीं है, क्योंकि इससे यह संदेश जाता है कि हाई कोर्ट प्रभावी नहीं हैं। जब कल चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची के सामने यह मामला आया, तो इस बेंच ने यह भी सवाल उठाया था कि पहले हाई कोर्ट जाने के बजाय आर्टिकल 32 की पिटीशन क्यों फाइल की गई।


    क्या है विवाद?

    यह विवाद उस दरगाह से जुड़ा है जो 14वीं सदी के सूफी संत हजरत शेख अलाउद्दीन अंसारी (लाडले मशाइक) और 15वीं सदी के हिंदू संत राघव चैतन्य से संबंधित मानी जाती है। दरगाह परिसर में राघव चैतन्य शिवलिंग नाम से पहचानी जाने वाली एक संरचना भी मौजूद बताई जाती है। ऐतिहासिक रूप से इस स्थल पर हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय पूजा-अर्चना करते रहे हैं, हालांकि 2022 में यहां पूजा अधिकार को लेकर तनाव की स्थिति बनी थी।


    पिछले साल हाई कोर्ट ने दी थी पूजा की इजाजत

    गौरतलब है कि कर्नाटक हाई कोर्ट ने 2025 में 15 हिंदू श्रद्धालुओं को महाशिवरात्रि पर पूजा की अनुमति दी थी, जो भारी सुरक्षा के बीच सम्पन्न हुई थी। इससे पहले भी कोर्ट के आदेश पर सीमित संख्या में पूजा कराई गई थी। दरगाह प्रबंधन का कहना था कि बार-बार अंतरिम आदेश लेकर धार्मिक स्थल के स्वरूप को बदलने की कोशिश की जा रही है, जो Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991 के खिलाफ हो सकता है। इस कानून के तहत 15 अगस्त 1947 को किसी धार्मिक स्थल की जो स्थिति थी, उसे बनाए रखना जरूरी माना गया है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद इस मामले में आगे की कानूनी लड़ाई हाई कोर्ट में होने की संभावना जताई जा रही है। यह मामला धार्मिक अधिकार, ऐतिहासिक दावों और कानून के संतुलन के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

  • वॉट्सऐप की प्राइवेसी नीति पर छिड़ा विवाद… SC ने लगाई कड़ी फटकार… कहा- नागरिकों की निजता सर्वोपरि

    वॉट्सऐप की प्राइवेसी नीति पर छिड़ा विवाद… SC ने लगाई कड़ी फटकार… कहा- नागरिकों की निजता सर्वोपरि


    नई दिल्ली।
    क्या वाकई आपकी चैट पूरी तरह सुरक्षित है? इस सवाल के बीच भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court.) ने मेटा (Meta) के स्वामित्व वाले इंस्टेंट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म वॉट्सऐप (Instant messaging platform WhatsApp.) को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि डेटा साझा करने के नाम पर देश के नागरिकों की निजता से कोई समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने वॉट्सऐप और उसकी पैरेंट कंपनी मेटा की डेटा-शेयरिंग व्यवस्था और प्राइवेसी पॉलिसी पर गंभीर नाराजगी जाहिर की है।

    कोर्ट ने दो टूक कहा कि भारतीय नागरिकों के प्राइवेसी अधिकारों में किसी भी तरह का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं होगा। वॉट्सऐप डेटा साझा करने की आड़ में निजी जानकारी का गलत इस्तेमाल नहीं कर सकता। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ तीन फरवरी को मेटा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। गौरतलब है कि भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) ने वर्ष 2024 में वॉट्सऐप की 2021 की प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर 213.14 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था, जिसे नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) ने भी सही ठहराया।

    सुप्रीम कोर्ट ने वॉट्सऐप की तथाकथित “टेक इट ऑर लीव इट” प्राइवेसी नीति पर भी सवाल उठाए। अदालत का कहना है कि आम यूजर्स इन जटिल शर्तों को ठीक से समझ ही नहीं पाते। कोर्ट ने चेतावनी देते हुए कहा कि कंपनी को भारतीय कानून और संविधान का पालन करना ही होगा, अन्यथा उसे देश छोड़ने तक का विकल्प चुनना पड़ सकता है। मामले की गंभीरता को देखते हुए इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भी याचिका में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया गया है। अगली सुनवाई 9 फरवरी को तय की गई है।


    क्या है वॉट्सऐप की 2021 की प्राइवेसी पॉलिसी?

    वॉट्सऐप ने 8 फरवरी 2021 को अपनी नई प्राइवेसी पॉलिसी लागू की थी। कंपनी का दावा है कि उसका एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन पूरी तरह सुरक्षित है, यानी यूजर की चैट, वॉइस कॉल और तस्वीरें मेटा नहीं देख सकता। अगर रिसीवर का फोन अस्थायी रूप से बंद हो या वह ऑफलाइन हो, तो संदेश अधिकतम 30 दिनों तक वॉट्सऐप के सर्वर पर एन्क्रिप्टेड रूप में सुरक्षित रखे जाते हैं ताकि बाद में डिलीवरी हो सके।

    हालांकि चैट कंटेंट निजी रहता है, लेकिन वॉट्सऐप यूजर के “मेटाडाटा” तक पहुंच रखता है। यूजर्स के सामने केवल दो ही विकल्प होते हैं—इन शर्तों को स्वीकार करना या ऐप का इस्तेमाल बंद कर देना।

    एआई आधारित साइबर सुरक्षा और डेटा एनालिटिक्स कंपनी इनेफ्यू लैब्स के को-फाउंडर और सीईओ तरुण विज के मुताबिक, वॉट्सऐप मेटाडाटा और व्यवहारिक संकेतों का उपयोग करता है। इसमें यह जानकारी शामिल होती है कि यूजर किससे, कितनी बार और किस समय बात करता है, उसका डिवाइस, लोकेशन, प्रोफाइल फोटो, ग्रुप मेंबरशिप और कॉन्टैक्ट लिस्ट। इसी आधार पर यूजर प्रोफाइलिंग की जाती है। मेटा इस डेटा को इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब जैसे अन्य प्लेटफॉर्म्स के साथ साझा कर सकता है, जिससे डेटा लीक और संवेदनशील जानकारी के दुरुपयोग का खतरा बढ़ जाता है।

    हालांकि यूरोप में यूरोपीय डेटा संरक्षण नियम (जीडीपीआर) के चलते ऐसी डेटा शेयरिंग पर सख्त सीमाएं हैं। तरुण विज बताते हैं कि वॉट्सऐप पर की गई गतिविधियां अन्य प्लेटफॉर्म्स पर दिखने वाले विज्ञापनों को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में सुरक्षा इस बात पर निर्भर करती है कि यूजर अपनी कितनी जानकारी साझा करना चाहता है।


    पहले भी घिर चुका है वॉट्सऐप

    वॉट्सऐप ने अपनी सफाई में कहा है कि उसकी मैसेजिंग सेवा मुफ्त है और दो लोगों के बीच की निजी चैट्स को कंपनी नहीं पढ़ती। वॉट्सऐप और मेटा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि डेटा केवल यूजर की सहमति से ही साझा किया जाता है और प्राइवेसी पॉलिसी में बदलाव अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हैं।

    यह पहला मौका नहीं है जब वॉट्सऐप की नीतियों पर सवाल उठे हों। वर्ष 2021 में आयरलैंड के डेटा रेगुलेटर ने डेटा पारदर्शिता के नियमों के उल्लंघन पर वॉट्सऐप पर 225 मिलियन यूरो का जुर्माना लगाया था। जर्मनी की लाइपजिग रीजनल कोर्ट भी मेटा को दंडित कर चुकी है। अदालत ने कहा था कि मेटा के पास ऐसे टूल्स हैं जिनके जरिए वह यूजर्स के ऑनलाइन व्यवहार को ट्रैक कर टार्गेटेड विज्ञापनों से अरबों डॉलर कमाता है।


    सुरक्षा खामियों के आरोप

    पिछले वर्ष वॉट्सऐप के पूर्व सुरक्षा प्रमुख अत्ताउल्लाह बैग ने अमेरिका में मेटा के खिलाफ मुकदमा दायर किया था। उन्होंने आरोप लगाया कि प्लेटफॉर्म पर रोजाना लाखों अकाउंट हैक हो रहे थे और सुरक्षा खामियों के चलते कर्मचारी यूजर्स का निजी डेटा देख सकते थे। बैग के अनुसार, बार-बार चेतावनी देने के बावजूद मेटा ने ठोस कदम नहीं उठाए।

    साल 2025 में शोधकर्ताओं ने “जीरो-क्लिक” हमलों का खुलासा किया, जिनमें बिना किसी क्लिक के वॉट्सऐप के जरिए आईफोन और मैक डिवाइस हैक कर लिए गए। इन हमलों में मैकओएस और आईओएस में इमेज प्रोसेसिंग की खामी और वॉट्सऐप के डिवाइस लिंकिंग फीचर की कमजोरी सामने आई।

    ऑस्ट्रिया के स्वतंत्र शोधकर्ताओं के एक समूह ने भी वॉट्सऐप में ऐसी कमी खोजी, जिसके जरिये 350 करोड़ फोन नंबर, प्रोफाइल फोटो, डिवाइस जानकारी, टाइमस्टैम्प और बिजनेस डिटेल्स तक पहुंच संभव हो गई थी।


    भारत में कानूनी स्थिति

    राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ अमित दुबे बताते हैं कि वर्ष 2019 में वॉट्सऐप के जरिए पेगासस स्पायवेयर ने केवल एक मिस्ड कॉल से कई भारतीयों के फोन हैक कर लिए थे। यह स्पायवेयर इजरायली कंपनी एनएसओ ग्रुप ने विकसित किया था। इस मामले में वॉट्सऐप ने एनएसओ ग्रुप के खिलाफ मुकदमा दायर किया था।

    अमित दुबे के अनुसार, हाल के वर्षों में वॉट्सऐप ने चैट समरी और ऑटो-रिप्लाई जैसे एआई आधारित फीचर्स भी जोड़े हैं, जो यूजर की सहमति से सीमित परिस्थितियों में काम करते हैं। ऐसे में खासकर निजी, चिकित्सकीय या कानूनी बातचीत के दौरान सतर्क रहना जरूरी है।

    भारत में अभी बड़ी टेक कंपनियों को नियंत्रित करने के लिए सख्त और प्रभावी कानूनों की कमी है। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) अधिनियम मौजूद है, लेकिन यह पूरी तरह 13 मई 2027 से लागू होगा। ऐसे में नागरिकों के पास अदालत का रास्ता ही मुख्य विकल्प बचता है। पुट्टस्वामी फैसले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही निजता को मौलिक अधिकार घोषित कर चुका है।


    यूजर क्या करें?

    वरिष्ठ सुप्रीम कोर्ट वकील पवन दुग्गल के अनुसार, आज कई सरकारी और निजी संस्थानों के आधिकारिक ग्रुप्स वॉट्सऐप पर चल रहे हैं, जो चिंता का विषय है। स्पष्ट कानूनी ढांचे के अभाव में डेटा सुरक्षा की जिम्मेदारी काफी हद तक यूजर पर ही है। वे सलाह देते हैं कि ऐप इस्तेमाल करने से पहले उसकी शर्तें और नीतियां ध्यान से पढ़ी जाएं।

    टेकयुगो के सीईओ अभिनव सिंह का कहना है कि प्राइवेसी को लेकर चिंतित यूजर्स सिग्नल, टेलीग्राम या आईफोन पर आईमैसेज जैसे विकल्पों पर विचार कर सकते हैं। सिग्नल विज्ञापनों के लिए डेटा का इस्तेमाल नहीं करता और टेलीग्राम में “सीक्रेट चैट” का विकल्प मिलता है। हालांकि, लोकप्रियता के मामले में ये प्लेटफॉर्म अभी भी वॉट्सऐप से पीछे हैं।

  • राष्ट्रपति के 14 सवालों पर चर्चा.. अरावली से लेकर आवारा कुत्ते तक… 2025 में SC ऐतिहासिक फैसले

    राष्ट्रपति के 14 सवालों पर चर्चा.. अरावली से लेकर आवारा कुत्ते तक… 2025 में SC ऐतिहासिक फैसले


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के कुछ ऐतिहासिक फैसलों (Historic decisions) के साथ 2025 का अंत होने जा रहा है। इन फैसलों में अरावली की परिभाषा (Definition of Aravalli) तय करने से लेकर आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां, निठारी कांड में चौंकाने वाला फैसला, राष्ट्रपति के 14 सवालों पर बेहद जरूरी चर्चा के अलावा बहुत कुछ शामिल है।

    दूसरी ओर विधि मंत्रालय ने लगभग 50 पुराने कानूनों को इतिहास के पन्नों में समेट दिया, जिससे रोजमर्रा का कानूनी प्रशासन और सरल और जन-केंद्रित बन गया। मंत्रालय ने वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्रों (एडीआर) को तेज करके लंबित मामलों को कम करने के लिए भी सराहनीय कोशिशें कीं। मंत्रालय ने इस साल न्यायपालिका के प्रति उदार रुख अपनाते हुए खुद सरकार द्वारा दायर किए गए बड़ी संख्या में लंबित मामलों को वापस ले लिया। ज्ञात हो कि अदालतों में सरकार सबसे बड़ी वादी है।


    राष्ट्रपति के अहम सवाल

    कार्यपालिका बनाम न्यायपालिका का एक पेचीदा मामला भी इस साल उच्चतम न्यायालय के सामने आया। इसमें मुख्य मुद्दा यह था कि क्या सुप्रीम कोर्ट किसी राज्यपाल को किसी विधेयक (बिल) पर निर्णय लेने का आदेश दे सकती है, जिसे राज्यपाल ने अपने विवेक से रोक कर रखा हो। इस मामले में अनुच्छेद 200 और 201 पर ‘राष्ट्रपति संदर्भ’ के माध्यम से भी राय मांगी गई थी। राष्ट्रपति यह जानना चाहते थीं कि क्या अदालतें राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिये विधेयक पर अपनी सहमति देने की समय-सीमा तय कर सकती हैं। SC ने फैसला सुनाया कि संवैधानिक अधिकारियों को उचित रूप से कार्य करना चाहिए, लेकिन अदालतें उन पर समय-सीमा नहीं थोप सकतीं। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि ने यह भी कहा कि राज्यपाल के पास ‘पूर्ण वीटो’ की शक्ति नहीं है और वे अनिश्चितकाल तक विधेयकों को रोक कर नहीं रख सकते। यह फैसला शक्तियों के पृथक्करण और संवैधानिक संतुलन की पुष्टि करता है।


    जब दिल्लीवासी थे परेशान..

    प्रदूषण की मार झेल रहे दिल्लीवासियों की नाराजगी और बेबसी के बीच, चौतरफा आलोचनाओं का सामना कर रही दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई कि बीएस-4 से पुराने वाहनों पर की जाने वाली कार्रवाई पर लगी रोक हटायी जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इसकी अनुमति दे दी। वहीं इसी तरह के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से परहेज किया, लेकिन दिवाली पर निर्धारित घंटों के दौरान प्रमाणित ‘ग्रीन पटाखों’ के सीमित उपयोग की अनुमति दी।


    निठारी कांड में नया मोड़

    कुख्यात निठारी कांड में एक और नया मोड़ आया जब SC ने मुख्य आरोपी सुरेंद्र कोली को हत्या और कथित तौर पर बच्चों का मांस खाने के आरोप के मामले में किसी विश्वसनीय साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। इससे पहले सह-आरोपी मोनिंदर पंढेर को भी बरी कर दिया गया था।


    आवारा कुत्तों पर क्या बोला SC?

    आवारा कुत्तों के काटने और हमले के शिकार पीड़ितों के परिवारों और पशु प्रेमियों के बीच चल रही कानूनी जंग भी सुप्रीम कोर्ट पहुंची। SC ने स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक स्थानों पर होने वाले आवारा कुत्तों के हमलों पर चिंता जताई। कोर्ट ने आवारा कुत्तों को शिविरों में स्थानांतरित करने के साथ-साथ उनके नसबंदी और टीकाकरण के निर्देश दिए। जब न्यायालय ने पशु प्रेमियों से पूछा कि अगर वे इतने चिंतित हैं तो वे इन कुत्तों को गोद क्यों नहीं ले लेते, तो पशु प्रेमी रक्षात्मक मुद्रा में नजर आए।


    वक्फ मामला पहुंचा SC

    वक्फ बोर्ड से संबंधित मामले में, वक्फ संशोधन अधिनियम, 2025 के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी, जिसमें धार्मिक बंदोबस्ती पर अत्यधिक सरकारी नियंत्रण का आरोप लगाया गया था। SC ने अधिनियम के कुछ चुनिंदा प्रावधानों पर रोक लगा दी, जबकि शेष अधिनियम को बहाल कर दिया।


    अरावली पर हुआ खूब विवाद

    अरावली के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरणविदों की उस चिंता पर ध्यान दिया जिसमें आरोप लगाया गया था कि सरकार ने चतुराई से नियमों में बदलाव किया है ताकि खनन कंपनियां इस पर्वत श्रृंखला में खनन कर सकें। SC ने अपने पुराने आदेश को पलट दिया जिसमें पिछली समिति की रिपोर्ट को स्वीकार किया गया था और इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को वैसी पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता नहीं है जैसी उच्च पहाड़ियों को है। कोर्ट ने इस विषय पर विशेषज्ञों की अपनी एक नयी समिति बनाने का निर्देश दिया है।