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  • बेंगलुरु में SIR पर जनता की अदालत, ध्रुव राठी और प्रकाश राज होंगे शामिल; महिलाओं के समर्थन में चप्पल प्रदर्शन

    बेंगलुरु में SIR पर जनता की अदालत, ध्रुव राठी और प्रकाश राज होंगे शामिल; महिलाओं के समर्थन में चप्पल प्रदर्शन


    नई दिल्ली ।
    कर्नाटक के बेंगलुरु स्थित फ्रीडम पार्क में 8 अक्टूबर को स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर पीपुल्स ट्रिब्यूनल आयोजित किया गया। कार्यक्रम में सीजेपी संस्थापक अभिजीत दीपके, अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश राज तथा यूट्यूबर ध्रुव राठी शामिल हुए। कर्नाटक के अलग-अलग हिस्सों से SIR से प्रभावित होने का दावा करने वाले लोग भी कार्यक्रम में पहुंचे और मतदाता सूची से जुड़े अपने अनुभव सामने रखे।

    पीपुल्स ट्रिब्यूनल के बाद महिलाओं के समर्थन में चप्पल प्रदर्शन भी आयोजित किया गया। कार्यक्रम से पहले प्रकाश राज ने लोगों से बड़ी संख्या में फ्रीडम पार्क पहुंचने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि यह लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई है और इसमें सभी नागरिकों को साथ आना चाहिए। उन्होंने 8 अक्टूबर को बेंगलुरु पहुंचकर इस अभियान का हिस्सा बनने की अपील की थी।

    प्रकाश राज ने एक वीडियो के जरिए ध्रुव राठी के कार्यक्रम में शामिल होने की जानकारी भी साझा की थी। इसके बाद ध्रुव राठी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर वीडियो जारी कर कार्यक्रम में अपनी मौजूदगी की पुष्टि की। उन्होंने भी कहा कि यह लड़ाई लोकतंत्र को बचाने के लिए है। इसके बाद दोनों की मौजूदगी को लेकर कार्यक्रम से पहले ही चर्चा तेज हो गई थी।

    अभिजीत दीपके ने भी कार्यक्रम को लेकर सरकार पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि सत्ता भले ही सरकार के पास हो, लेकिन सड़कें जनता की हैं और इन्हीं सड़कों के जरिए भारत के लोग अपना लोकतंत्र वापस हासिल करेंगे। उनके इस बयान के बाद कार्यक्रम को लेकर लोगों के बीच और अधिक चर्चा हुई।

    6 अक्टूबर को कार्यक्रम की जानकारी साझा करते हुए सीजेपी के सह-संयोजक आशुतोष रांका ने कहा था कि पीपुल्स ट्रिब्यूनल में उन कन्नड़ नागरिकों से बातचीत की जाएगी, जिनके बारे में आरोप है कि उन्हें गलत तरीके से मतदाता सूची से हटा दिया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य SIR से प्रभावित बताए जा रहे लोगों की बात सुनना और उनके अनुभव सामने रखना बताया गया था।

    रांका ने यह भी कहा था कि पीपुल्स ट्रिब्यूनल के बाद महिलाओं के साथ एकजुटता दिखाने के लिए चप्पल प्रदर्शन किया जाएगा। इस प्रदर्शन के जरिए महिलाओं के समर्थन में अपनी आवाज उठाने का संदेश दिया गया। कार्यक्रम में महिलाओं और छात्रों समेत विभिन्न वर्गों के लोगों की मौजूदगी रही और SIR से संबंधित मुद्दों को लेकर नारे तथा पोस्टर भी दिखाई दिए।

    फ्रीडम पार्क में आयोजित इस कार्यक्रम के दौरान SIR को लेकर मतदाता सूची में नाम हटाए जाने से संबंधित शिकायतों को प्रमुखता से उठाया गया। आयोजकों के अनुसार, कर्नाटक के विभिन्न क्षेत्रों से ऐसे लोग कार्यक्रम में पहुंचे, जो इस प्रक्रिया से प्रभावित होने का दावा करते हैं। पीपुल्स ट्रिब्यूनल और उसके बाद हुए चप्पल प्रदर्शन के जरिए आयोजकों ने मतदाता सूची तथा महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखने की कोशिश की।

  • CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का लंबा आंदोलन, मतदाता सूची विवाद पर देशभर में अभियान की तैयारी

    CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का लंबा आंदोलन, मतदाता सूची विवाद पर देशभर में अभियान की तैयारी


    नई दिल्ली ।
    मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों ने आंदोलन को आगे बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी है। मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विपक्ष का कहना है कि यह अभियान केवल एक-दो दिन का नहीं होगा, बल्कि लंबे समय तक जारी रहेगा। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कांग्रेस के महासचिवों और प्रदेश अध्यक्षों से इस मुद्दे को लगातार उठाने और आंदोलन को व्यापक स्तर तक ले जाने को कहा है। मंगलवार को संसद भवन से चुनाव आयोग तक मार्च और आकाशवाणी भवन में धरने के बाद विपक्ष ने अपने आंदोलन को और तेज करने का संकेत दिया।

    इंडिया गठबंधन के कई दल करीब एक सप्ताह पहले हुई बैठक में मतदाता सूची से जुड़े मुद्दे पर कई महीने तक अभियान चलाने का ऐलान कर चुके हैं। इसके बाद कांग्रेस ने सोमवार को एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए नामों को फिर से जुड़वाने के लिए एक महीने का अभियान शुरू करने की घोषणा की। विपक्षी दलों की ओर से इसे घर-घर तक पहुंचाने की तैयारी है। मंगलवार के मार्च में इंडिया गठबंधन के कई दलों की मौजूदगी के साथ बीजू जनता दल की भागीदारी भी दिखाई दी। विपक्ष इसे अपने अभियान के लिए व्यापक समर्थन के तौर पर देख रहा है।

    इस मुद्दे को राहुल गांधी पिछले एक साल से उठाते रहे हैं। विपक्ष ने पहली बार 7 अगस्त 2025 को इसे प्रमुखता से सामने रखा था। उस समय राहुल गांधी ने महाराष्ट्र, हरियाणा और कर्नाटक का उदाहरण देते हुए मतदाता सूची से जुड़े सवाल उठाए थे। इसके बाद विपक्षी दल लगातार इस विषय को अलग-अलग मंचों पर उठाते रहे। बाद में पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने की खबरों और चुनाव परिणामों के बाद विपक्ष ने इस मुद्दे पर और ज्यादा जोर दिया।

    विपक्षी रणनीतिकारों के मुताबिक, इस पूरे अभियान में एकजुटता सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। संसद के मानसून सत्र के दौरान भी विपक्षी दलों ने एक साथ कई मुद्दे उठाए थे। अब मतदाता सूची के मुद्दे पर भी अलग-अलग दलों के एक मंच पर आने से आंदोलन को आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। विपक्ष का रुख है कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते हैं तो शीतकालीन सत्र के दौरान भी यह मुद्दा जोर-शोर से उठाया जाएगा और संसद के भीतर विरोध और अधिक तीखा हो सकता है।

    विपक्षी दलों ने केवल संसद और चुनाव आयोग तक सीमित रहने के बजाय आंदोलन को देश के अलग-अलग हिस्सों तक ले जाने की योजना बनाई है। इंडिया गठबंधन की ओर से पांच बड़ी रैलियों का भी ऐलान किया गया है। इसके साथ ही कांग्रेस का एक महीने का अभियान मतदाता सूची से हटाए गए नामों को लेकर लोगों तक पहुंचने पर केंद्रित रहेगा। विपक्षी नेताओं का मानना है कि इस मुद्दे को स्थानीय स्तर तक ले जाने से मतदाताओं की शिकायतों और आपत्तियों को सामने लाने में मदद मिलेगी।

    विपक्ष एसआईआर को लेकर आम मतदाताओं में पैदा हुई कथित असहजता को भी अपने अभियान का आधार बना रहा है। विपक्षी रणनीतिकारों का दावा है कि मतदाता सूची में नाम हटने और जुड़ने से जुड़े सवालों के कारण चुनाव प्रक्रिया को लेकर लोगों के बीच चिंता बनी हुई है। इसी वजह से आंदोलन को लंबे समय तक चलाने की तैयारी की जा रही है। फिलहाल विपक्ष का अभियान संसद, चुनाव आयोग, देशव्यापी कार्यक्रमों और घर-घर संपर्क के जरिए आगे बढ़ाने की योजना पर केंद्रित है।

  • ज्ञानेश कुमार 10 अक्टूबर से पहले दे सकते हैं इस्तीफा? सौरभ भारद्वाज के दावे से चुनाव आयोग और SIR विवाद पर बढ़ी सियासी हलचल

    ज्ञानेश कुमार 10 अक्टूबर से पहले दे सकते हैं इस्तीफा? सौरभ भारद्वाज के दावे से चुनाव आयोग और SIR विवाद पर बढ़ी सियासी हलचल


    नई दिल्ली ।
    मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। आम आदमी पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने दावा किया है कि उनके पास मौजूद जानकारी के अनुसार ज्ञानेश कुमार 10 अक्टूबर से पहले अपने पद से इस्तीफा दे सकते हैं। हालांकि, यह अभी केवल भारद्वाज का दावा है और इस संबंध में चुनाव आयोग की ओर से कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

    सौरभ भारद्वाज ने अपने सूत्रों के हवाले से यह दावा किया है। उनके मुताबिक, उन्हें जानकारी मिली है कि मुख्य चुनाव आयुक्त 10 अक्टूबर से पहले अपने पद से हट सकते हैं। इस दावे के बाद चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर चल रही राजनीतिक चर्चा और तेज हो गई है। भारद्वाज की ओर से अपने दावे के समर्थन में इससे अधिक जानकारी नहीं दी गई है।

    जिस 10 अक्टूबर की तारीख का जिक्र सौरभ भारद्वाज ने किया है, उसी दिन कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया है। पार्टी लंबे समय से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज पर सवाल उठाती रही है। सीजेपी की ओर से ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और SIR पर रोक की मांग की जा रही है। पार्टी का कहना है कि इन मुद्दों के समाधान के बिना चुनाव व्यवस्था को लेकर सवाल बने रहेंगे।

    मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर विवाद में SIR यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का मुद्दा भी प्रमुख है। बिहार और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में विपक्षी दल SIR की प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने के दौरान गड़बड़ी की आशंका है। वहीं, आयोग अपनी तय प्रक्रिया का हवाला देता रहा है।

    इसी विवाद के बीच चुनाव आयोग के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद को लेकर भी सवाल उठे हैं। एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि पिछले 10 महीनों के दौरान 14 मौकों पर दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों की राय ज्ञानेश कुमार से अलग रही। इस दावे को लेकर चुनाव आयोग के कामकाज और निर्णय प्रक्रिया पर चर्चा तेज हुई है।

    सीजेपी ने चुनाव आयुक्तों के बीच कथित मतभेद के मुद्दे को भी गंभीर बताया है। पार्टी ने इस मामले में जांच की मांग की है और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग दोहराई है। वहीं, SIR को लेकर विपक्षी दल लगातार सवाल उठा रहे हैं और मतदाता सूची में संभावित गड़बड़ी को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज करा रहे हैं।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच सौरभ भारद्वाज का 10 अक्टूबर से पहले ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे का दावा सामने आया है। हालांकि, अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि मुख्य चुनाव आयुक्त वास्तव में अपने पद से इस्तीफा देंगे या नहीं। चुनाव आयोग की ओर से भी इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। ऐसे में फिलहाल इस्तीफे की बात सौरभ भारद्वाज के दावे तक ही सीमित है।

    10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन और SIR को लेकर जारी विवाद के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे से जुड़ा यह दावा राजनीतिक चर्चा का नया मुद्दा बन गया है। इस मामले में आगे की स्थिति ज्ञानेश कुमार के किसी आधिकारिक निर्णय या चुनाव आयोग की ओर से सामने आने वाली जानकारी से स्पष्ट होगी।

  • राहुल गांधी का ज्ञानेश कुमार पर हमला, बोले- हो गया भाई, अब इस्तीफा देने का समय; चुनाव आयोग के बाहर विपक्ष का धरना

    राहुल गांधी का ज्ञानेश कुमार पर हमला, बोले- हो गया भाई, अब इस्तीफा देने का समय; चुनाव आयोग के बाहर विपक्ष का धरना

    नई दिल्ली। विपक्षी गठबंधन के सांसदों ने मंगलवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे समेत अन्य मांगों को लेकर संसद भवन परिसर से चुनाव आयोग मुख्यालय की ओर मार्च किया। विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी समेत इंडिया ब्लॉक के सांसद चुनाव आयोग मुख्यालय, निर्वाचन सदन की तरफ बढ़े, लेकिन पुलिस ने उन्हें पार्लियामेंट स्ट्रीट पर रोक दिया। इसके बाद सांसद वहीं सड़क पर बैठ गए और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर धरना शुरू कर दिया। सांसदों को नीति आयोग कार्यालय के सामने रोका गया, जो नीति आयोग और आकाशवाणी भवन के बीच चुनाव आयोग मुख्यालय की ओर जाने वाले रास्ते पर स्थित है।

    प्रदर्शन के दौरान विपक्षी सांसदों ने ज्ञानेश कुमार के आरएसएस यूनिफॉर्म वाले कटआउट लिए और नारे लगाए। इनमें ‘बीजेपी है सीईसी है’, ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ और ‘डेमोक्रेसी बिकाऊ नहीं है’ जैसे नारे शामिल थे। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में ज्ञानेश कुमार को संबोधित करते हुए लिखा, ‘ज्ञानेश, यह हो गया भाई। इस्तीफा देने का समय आ गया है।’ मार्च में तृणमूल कांग्रेस नेता अभिषेक बनर्जी और डेरेक ओ ब्रायन, कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और सीपीआई (एम) नेता जॉन ब्रिटास समेत कई सांसद शामिल हुए। सांसदों के पहुंचने से काफी पहले संसद और चुनाव आयोग मुख्यालय के अंदर तथा आसपास भारी सुरक्षा तैनात कर दी गई थी और बैरिकेडिंग की गई थी।

    मार्च से पहले विपक्षी सांसदों ने सुरक्षा इंतजामों पर सवाल उठाए और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तेज की। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने आरोप लगाया कि कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग के प्रति लोगों का भरोसा कम हुआ है। उन्होंने कहा कि जिस संस्था पर पूरा देश भरोसा करता है और गर्व महसूस करता है, उसकी निष्पक्षता पर पहले कभी सवाल नहीं उठाए गए, लेकिन एक व्यक्ति ने उस भरोसे को तोड़ दिया है। उन्होंने एक पूरे नेक्सस के साथ काम करने का भी आरोप लगाया और कहा कि विपक्ष ज्ञानेश कुमार से सवाल करेगा और बीजेपी के मुख्यमंत्री जवाब देना शुरू करेंगे।

    सीपीआई सांसद पी संदोष कुमार ने कहा कि सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से वोटर रोल के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर के दौरान फॉर्म 6 से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा को लेकर विपक्ष की आपत्तियां मजबूत हुई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि 26 सितंबर को चुनाव आयोग की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि फॉर्म 6 से जुड़ी पूरी प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी है, जबकि उनके मुताबिक यह बयान गुमराह करने वाला साबित हुआ है। सीपीआई नेता ने सीईसी को ‘धोखेबाज चुनाव कमिश्नर’ कहा और दावा किया कि विपक्षी पार्टियां 2025 से इन नियमों के खिलाफ आंदोलन कर रही हैं तथा अपना आंदोलन और तेज करेंगी।

    शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने भी मार्च से पहले बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि सांसद शांतिपूर्वक आगे बढ़ना चाहते थे और वे देश के नागरिक होने के साथ संसद के सदस्य भी हैं। राउत ने सवाल किया कि उन्हें रोकने के लिए इतनी बड़ी फोर्स की क्या जरूरत है और कहा कि उनके पास हथियार नहीं हैं। उन्होंने बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स और सीआईएसएफ के जवानों की तैनाती तथा मंत्रियों के घरों के बाहर सुरक्षा बढ़ाए जाने का दावा किया। राउत ने फॉर्म 6 पर सुप्रीम कोर्ट की स्थिति को लेकर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए कहा कि सीईसी को पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा था कि उसने फॉर्म 6 के किसी भी बदले हुए वर्जन को मंजूरी नहीं दी है। अदालत ने यह पता लगाने के लिए चुनाव आयोग के रिकॉर्ड की जांच करने की बात कही कि क्या बदलाव किए गए थे और उन्हें किसने मंजूरी दी थी। यह टिप्पणी ज्ञानेश कुमार के कथित एकतरफा फैसलों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान हुई। 26 सितंबर के बयान में आयोग ने कहा था कि एसआईआर के लिए फॉर्म 6 के साथ जुड़ी घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है। यह विरोध एसआईआर प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों और तीन सदस्यों वाले आयोग के भीतर मतभेदों की खबरों को लेकर विपक्ष के अभियान के बीच हुआ। चुनाव आयोग ने आयोग में बंटवारे के सुझावों को खारिज करते हुए कहा है कि एसआईआर से जुड़े फैसले एकमत से लिए गए थे।

  • सीएम मोहन यादव ने SIR को बताया जरूरी, मतदाता सूची को विश्वसनीय बनाने नागरिकों से प्रक्रिया में भाग लेने की अपील

    सीएम मोहन यादव ने SIR को बताया जरूरी, मतदाता सूची को विश्वसनीय बनाने नागरिकों से प्रक्रिया में भाग लेने की अपील

    मध्यप्रदेश। के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भारत निर्वाचन आयोग की ओर से संचालित विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को जरूरी प्रक्रिया बताया है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने में प्रत्येक जागरूक मतदाता की भूमिका महत्वपूर्ण है। मुख्यमंत्री के अनुसार, लोकतंत्र की मजबूती के लिए मतदाता सूची का अद्यतन, पारदर्शी और विश्वसनीय होना आवश्यक है। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे मतदाता सूची के सत्यापन की इस प्रक्रिया में अपनी जिम्मेदारी निभाएं और विश्वसनीय मतदाता सूची के निर्माण में सहभागी बनें।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत मतदाता सूची का सत्यापन किया जा रहा है। उन्होंने नागरिकों से इस प्रक्रिया को समझने और निर्धारित नियमों के अनुसार अपनी जानकारी उपलब्ध कराने की अपील की। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता की भागीदारी केवल मतदान तक सीमित नहीं है, बल्कि सही और विश्वसनीय मतदाता सूची के निर्माण में भी नागरिकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। उन्होंने विशेष रूप से युवाओं से इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल होने का आग्रह किया।

    SIR को लेकर मुख्यमंत्री ने नागरिकों से किसी भी तरह के भ्रम या अफवाह पर ध्यान नहीं देने को कहा है। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़ी प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार संचालित की जा रही है। फॉर्म 6 और घोषणा पत्र सहित प्रक्रिया से जुड़े प्रावधान निर्धारित हैं। मुख्यमंत्री ने लोगों से कहा कि वे इस संबंध में केवल निर्वाचन आयोग की आधिकारिक जानकारी और तय प्रक्रिया पर ही भरोसा करें। उनका कहना है कि सही जानकारी के आधार पर प्रक्रिया में भाग लेना आवश्यक है।

    मुख्यमंत्री ने 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके युवाओं से अपना नाम मतदाता सूची में दर्ज कराने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि जिन युवाओं की उम्र 18 वर्ष पूरी हो चुकी है, उन्हें मतदाता सूची में अपना नाम अवश्य दर्ज कराना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने प्रत्येक नागरिक से अपनी जानकारी और मतदाता सूची में दर्ज नाम की पुष्टि करने की अपील की। मुख्यमंत्री के अनुसार, मतदाता सूची में नाम की जांच और आवश्यक प्रक्रिया पूरी करना नागरिक की जिम्मेदारी का हिस्सा है।

    डॉ. मोहन यादव ने कहा कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए हर जागरूक मतदाता की भागीदारी जरूरी है। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए मतदाता सूची के सत्यापन की प्रक्रिया में सहयोग करें। उन्होंने विशेष गहन पुनरीक्षण को ऐसी प्रक्रिया बताया, जिसके माध्यम से मतदाता सूची को अद्यतन, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने का प्रयास किया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने नागरिकों से आग्रह किया कि वे भ्रम या अफवाहों से प्रभावित हुए बिना निर्धारित प्रक्रिया का पालन करें और अपनी मतदाता संबंधी जानकारी की पुष्टि करें। साथ ही, उन्होंने युवाओं से भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने की अपील की।

  • SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का CEC ज्ञानेश कुमार को नोटिस, निलंबन से इनकार; कानून टूटा तो फैसलों पर रोक संभव

    SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का CEC ज्ञानेश कुमार को नोटिस, निलंबन से इनकार; कानून टूटा तो फैसलों पर रोक संभव

    नई दिल्ली ।स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR से जुड़े फैसलों में कथित एकतरफा कार्रवाई के आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को नोटिस जारी किया है। हालांकि, अदालत ने उन्हें निलंबित करने की मांग पर फिलहाल तत्काल अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया। अदालत ने चुनाव आयोग से यह स्पष्ट करने को कहा है कि SIR और मतदाता सूची से जुड़े फैसले संवैधानिक प्रक्रिया के तहत सर्वसम्मति या बहुमत से लिए गए थे या नहीं।

    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि केवल किसी समाचार रिपोर्ट के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि चुनाव आयोग में फैसले एकतरफा तरीके से लिए गए। अदालत ने कहा कि इस मामले में उसे चुनाव आयोग से प्रमाणित जानकारी और संबंधित रिकॉर्ड की आवश्यकता है। पीठ ने चुनाव आयोग के फैसलों की प्रक्रिया को लेकर उसके जवाब को महत्वपूर्ण माना।

    मामला चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से कथित तौर पर उठाई गई आपत्तियों से जुड़ा है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि पिछले 10 महीनों में मतदाता सूची, मतदाता पंजीकरण और आयोग की तकनीकी प्रणालियों से संबंधित मामलों में कम से कम 14 मौकों पर आपत्तियां दर्ज की गईं। हालांकि, चुनाव आयोग ने कहा है कि मसौदा चरण में सवाल, सुझाव और आपत्तियां उठना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग के अनुसार, SIR की समय-सारणी से जुड़े अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।

    सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग के फैसले पूरी संस्था की संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार लिए गए या मुख्य चुनाव आयुक्त ने अकेले उन शक्तियों का इस्तेमाल किया, जो आयोग के सामूहिक निर्णय से संबंधित हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि आयोग के फैसले सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर होने चाहिए। अदालत ने कहा कि यदि रिकॉर्ड से पता चलता है कि संबंधित फैसले न तो सर्वसम्मति से और न ही बहुमत से लिए गए, तो वह उन फैसलों पर रोक लगाने या उन्हें प्रभावित करने वाला आदेश दे सकती है।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता से यह भी पूछा कि क्या वह अपनी मांग के समर्थन में समाचार रिपोर्ट पर निर्भर कर रहा है। पीठ ने कहा कि किसी रिपोर्ट के सही, आंशिक रूप से सही या गलत होने की संभावना हो सकती है। इसलिए केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर तत्काल आदेश जारी नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि वह चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया और संबंधित रिकॉर्ड देखना चाहेगी। यदि रिकॉर्ड से कानून या निर्धारित प्रक्रिया के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो अदालत उचित कार्रवाई पर विचार कर सकती है।

    यह मामला पटना निवासी राकेश कुमार सिंह की ओर से दायर जनहित याचिका के बाद सामने आया। याचिका में सवाल उठाया गया है कि क्या CEC ज्ञानेश कुमार व्यक्तिगत रूप से उन शक्तियों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो कानून और संविधान के तहत पूरे चुनाव आयोग से संबंधित हैं। इसमें Form 6 में कथित तौर पर बिना अनुमति बदलाव, मतदाता सूची के डेटाबेस को केंद्रीकृत करने और ECINet सिस्टम के जरिए नाम बहाल नहीं किए जाने जैसे आरोप भी लगाए गए हैं। याचिकाकर्ता ने जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है। इन आरोपों पर अंतिम स्थिति चुनाव आयोग के जवाब और अदालत के सामने पेश किए जाने वाले रिकॉर्ड के बाद स्पष्ट होगी। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने CEC के निलंबन की मांग पर अंतरिम राहत नहीं दी है।

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  • INDIA ब्लॉक की बैठक कल, SIR और चुनाव आयोग पर विपक्ष बनाएगा संयुक्त रणनीति, अखिलेश यादव नहीं होंगे शामिल

    INDIA ब्लॉक की बैठक कल, SIR और चुनाव आयोग पर विपक्ष बनाएगा संयुक्त रणनीति, अखिलेश यादव नहीं होंगे शामिल


    नई दिल्ली। विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. ब्लॉक की बैठक 30 सितंबर को दिल्ली में होगी। बैठक में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR, चुनाव आयोग के भीतर सामने आए मतभेद और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। विपक्षी दल संसद में प्रस्ताव लाने और इन मुद्दों पर संयुक्त रूप से आगे की रणनीति तैयार करने पर भी विचार कर सकते हैं। करीब साढ़े तीन महीने बाद होने वाली इस बैठक में चुनाव आयोग और SIR से जुड़े मुद्दों पर विपक्षी दलों के बीच समन्वय को लेकर भी चर्चा हो सकती है।

    समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव बैठक में शामिल नहीं होंगे। उनकी जगह पार्टी का एक अन्य नेता प्रतिनिधित्व करेगा। वहीं, शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बैठक में जुड़ेंगे। शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत के मुताबिक, पार्टी 2 अक्टूबर को ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित प्रदर्शन की तैयारियों में व्यस्त है। पार्टी ने संबंधित प्रदर्शन को समर्थन देने की बात भी कही है। ऐसे में बैठक में उद्धव ठाकरे की भागीदारी ऑनलाइन होगी, जबकि समाजवादी पार्टी की ओर से अखिलेश यादव के स्थान पर दूसरा नेता मौजूद रहेगा।

    बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी के शामिल होने की संभावना है। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी, सांसद अभिषेक बनर्जी, राजद नेता तेजस्वी यादव, जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और CPI(M) महासचिव एमए बेबी के भी पहुंचने की उम्मीद है। एमए बेबी ने अरविंद केजरीवाल से मुलाकात के बाद बताया था कि कांग्रेस बैठक के लिए विपक्षी दलों के बीच समन्वय कर रही है। उनके मुताबिक, केजरीवाल ने चुनाव आयोग के खिलाफ अभियान की जरूरत पर जोर दिया और इस मुद्दे पर अपनी पार्टी में चर्चा करने की बात कही।

    I.N.D.I.A. ब्लॉक की पिछली बैठक 8 जून को हुई थी, जिसमें 23 विपक्षी दल शामिल हुए थे। उस बैठक में SIR और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई थी। हालांकि, आम आदमी पार्टी और DMK उस बैठक में शामिल नहीं हुई थीं। इसके बावजूद 28 जून को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को भेजे गए विपक्षी दलों के संयुक्त पत्र पर AAP और DMK ने भी हस्ताक्षर किए थे। पत्र में चुनाव आयोग और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे उठाए गए थे। पिछली बैठक के बाद अब विपक्षी दल एक बार फिर इन विषयों पर साथ बैठने जा रहे हैं।

    30 सितंबर की बैठक में विपक्षी दलों के बीच समन्वय, SIR के खिलाफ संभावित संयुक्त कार्रवाई और चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दों पर आगे की दिशा तय करने पर चर्चा होने की संभावना है। इसके अलावा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग और संसद में प्रस्ताव लाने से जुड़े विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है। बैठक में अलग-अलग विपक्षी दलों के रुख और आगे की संयुक्त रणनीति को लेकर चर्चा होने की उम्मीद है।

  • CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते करेगा सुनवाई, आयोग के फैसलों की प्रक्रिया पर उठे सवाल

    CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते करेगा सुनवाई, आयोग के फैसलों की प्रक्रिया पर उठे सवाल


    नई दिल्ली।
    मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते सुनवाई करेगा। मामले को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के सामने उठाया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने मामले में जल्द सुनवाई की मांग रखी, जिसके बाद अदालत ने याचिका को अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति दी। याचिका में यह सवाल उठाया गया है कि क्या चुनाव आयोग जैसे बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्थान से जुड़े फैसले अकेले मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा लिए जा सकते हैं।

    याचिका में आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग के नाम पर कुछ फैसले चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की मंजूरी के बिना लिए गए। इसमें कहा गया है कि आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 और 2023 के संबंधित कानून की धारा 18 के तहत सामूहिक रूप से फैसले लेने की प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। याचिका में चुनाव आयोग के बहुसदस्यीय स्वरूप, निर्णय लेने की प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियों से जुड़े कई मुद्दे उठाए गए हैं। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने समेत कई मांगें भी की गई हैं।

    मामले में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से सवाल उठाया गया है कि SIR से जुड़े फैसले पूरे आयोग की सहमति या बहुमत से लिए गए थे या नहीं। याचिका में दावा किया गया है कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कम से कम 14 मामलों में आपत्ति दर्ज की। इन आपत्तियों को चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया से जोड़कर देखा गया है और इसी आधार पर याचिका में आयोग के सामूहिक निर्णय लेने के अधिकार तथा प्रक्रिया की जांच की मांग की गई है।

    याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई से जुड़ी मांगों के साथ यह भी कहा गया है कि आयोग में निहित सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप होना चाहिए। याचिकाकर्ता ने अदालत से यह स्पष्ट करने की मांग की है कि आयोग के नाम पर लिए गए फैसलों में सभी सदस्यों की भूमिका और सहमति किस तरह रही। इस मामले का एक प्रमुख हिस्सा SIR से जुड़े निर्णय हैं, जिनको लेकर याचिका में यह जानने की मांग की गई है कि संबंधित फैसले सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर लिए गए थे या नहीं।

    वहीं, चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज किया है। आयोग का कहना है कि दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से कैबिनेट सचिव को भेजे गए पत्र प्रशासनिक मुद्दों से जुड़े थे और उनका SIR या आयोग के नीतिगत फैसलों से संबंध नहीं था। ऐसे में अब सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की निर्णय लेने की प्रक्रिया, मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियों और SIR से जुड़े फैसलों को लेकर उठाए गए सवालों पर सुनवाई होगी। अदालत अगले सप्ताह इस मामले में याचिका में की गई मांगों और उठाए गए मुद्दों पर विचार करेगी।

  • ममता बनर्जी की पार्टी में बड़ी टूट, 100 से ज्यादा नेता और कार्यकर्ता कांग्रेस में शामिल, उपचुनाव से पहले बढ़ी राजनीतिक हलचल

    ममता बनर्जी की पार्टी में बड़ी टूट, 100 से ज्यादा नेता और कार्यकर्ता कांग्रेस में शामिल, उपचुनाव से पहले बढ़ी राजनीतिक हलचल

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के लिए उपचुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। मालदा के महीष बाथानी क्षेत्र में तृणमूल कांग्रेस से जुड़े 100 से अधिक नेता और कार्यकर्ता कांग्रेस में शामिल हो गए। इनमें 13 पंचायत सदस्य, एक पंचायत समिति सदस्य, पार्टी के क्षेत्रीय अध्यक्ष, ब्लॉक उपाध्यक्ष और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता शामिल बताए गए हैं।

    यह दल-बदल ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने वाले हैं। महीष बाथानी क्षेत्र में रविवार को आयोजित कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में तृणमूल समर्थकों ने कांग्रेस का दामन थामा। इस दौरान कांग्रेस के जिला और प्रदेश स्तर के नेता तथा एक पूर्व विधायक भी मौजूद रहे।

    महीष बाथानी क्षेत्र को पहले कांग्रेस का मजबूत इलाका माना जाता था। हालांकि, ममता बनर्जी के राजनीतिक प्रभाव के बढ़ने के बाद यहां तृणमूल कांग्रेस का प्रभाव मजबूत हुआ। अब बड़ी संख्या में तृणमूल नेताओं और कार्यकर्ताओं के कांग्रेस में जाने से क्षेत्र में राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

    तृणमूल कांग्रेस छोड़कर कांग्रेस में शामिल होने वाले शराफत अली ने कहा कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में भाजपा के खिलाफ लड़ाई के लिए कांग्रेस के साथ आना जरूरी है। उन्होंने क्षेत्रीय दल के तौर पर तृणमूल की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए और कांग्रेस के साथ मिलकर भाजपा के खिलाफ संघर्ष करने की बात कही।

    पश्चिम बंगाल में 6 अक्टूबर को नंदीग्राम और रेजीनगर सीटों पर उपचुनाव होना है, जबकि मतगणना 9 अक्टूबर को होगी। नंदीग्राम सीट मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के सीट छोड़ने के बाद खाली हुई है। दूसरी ओर रेजीनगर सीट आम जनता उन्नयन पार्टी के हुमायूं कबीर के नौदा सीट बरकरार रखने के कारण खाली हुई। रेजीनगर से उनके बेटे चुनाव मैदान में हैं।

    ममता बनर्जी के गुट ने रेजीनगर से रबीउल आलम चौधरी को उम्मीदवार बनाया है। वहीं, नंदीग्राम को लेकर भी राजनीतिक गतिविधियां तेज रही हैं। ममता बनर्जी के गुट की ओर से यह सीट कांग्रेस के लिए छोड़ने की पेशकश किए जाने की बात सामने आई थी, जबकि रेजीनगर में समर्थन मांगे जाने का भी जिक्र हुआ। कांग्रेस ने दोनों सीटों पर समर्थन देने की मांग को स्वीकार नहीं किया।

    नंदीग्राम सीट पर ममता गुट के उम्मीदवार के तौर पर नामित संचिता प्रधान डे ने नाम वापस ले लिया है। इसके चलते इस सीट पर ममता गुट के पास फिलहाल कोई उम्मीदवार नहीं है।

    इसी बीच तृणमूल कांग्रेस के मूल नाम और चुनाव चिह्न को लेकर भी मामला चल रहा है। चुनाव आयोग ने तृणमूल नाम और ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न को फ्रीज किया हुआ है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को अंतिम फैसला लेने के लिए समयसीमा तय की है।

    अदालत ने संबंधित पक्षों को हलफनामे और अतिरिक्त दस्तावेज दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। इसके बाद चुनाव आयोग को तीन महीने के भीतर नाम और चुनाव चिह्न से जुड़े विवाद पर फैसला लेने को कहा गया है। सुनवाई के दौरान आयोग की ओर से समय लगने की दलील दी गई, जिस पर अदालत ने निर्धारित अवधि में फैसला लेने को कहा। अदालत ने इस प्रक्रिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद लेने का सुझाव भी दिया है।

  • केजरीवाल का मोदी सरकार पर हमला, अडानी को ‘भाई’ और जय शाह को ‘भतीजा’ बताते हुए लगाए कई गंभीर आरोप

    केजरीवाल का मोदी सरकार पर हमला, अडानी को ‘भाई’ और जय शाह को ‘भतीजा’ बताते हुए लगाए कई गंभीर आरोप

    नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर एक बार फिर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि लोगों को उम्मीद थी कि नई सरकार के आने के बाद भाई-भतीजावाद खत्म होगा और देश में बदलाव आएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। केजरीवाल ने दावा किया कि पिछले 12 वर्षों में भाई-भतीजावाद का सबसे बड़ा उदाहरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद हैं।

    केजरीवाल ने कहा कि मोदी का एक ‘भाई’ है, जिसका नाम अडानी है। उनके मुताबिक, पिछले 12 वर्षों में अगर किसी एक व्यक्ति ने सबसे ज्यादा आर्थिक तरक्की की है तो वह अडानी हैं। इसी तरह उन्होंने जय शाह को प्रधानमंत्री का ‘भतीजा’ बताते हुए कहा कि इस अवधि में किसी युवा ने सबसे ज्यादा तरक्की की है तो वह जय शाह हैं। केजरीवाल ने इन उदाहरणों के आधार पर मोदी सरकार पर भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया।

    उन्होंने कहा कि 12 साल के शासन के बाद जनता को यह देखना चाहिए कि उसे क्या हासिल हुआ। केजरीवाल ने दावा किया कि इस दौरान मीडिया और चुनाव व्यवस्था पर भी असर पड़ा है। उन्होंने राजनीतिक दल बदलने की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि पहले विधायक या नेता के पार्टी बदलने को अनैतिक माना जाता था, लेकिन अब बड़े पैमाने पर दल-बदल और सरकारें गिराने की घटनाओं को राजनीतिक रणनीति के रूप में पेश किया जाता है।

    केजरीवाल ने कहा कि विधायकों और सांसदों के दल बदलने तथा सरकारों को गिराने की घटनाओं को ‘चाणक्य नीति’ बताना गलत है। उन्होंने दावा किया कि पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में विधायकों की खरीद-फरोख्त हुई और इसके लिए पैसे तथा केंद्रीय जांच एजेंसियों के इस्तेमाल के आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यों को रणनीति नहीं बल्कि देश के साथ विश्वासघात के रूप में देखा जाना चाहिए।

    उन्होंने अपने राजनीतिक सफर का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने आयकर विभाग में संयुक्त आयुक्त की नौकरी छोड़कर झुग्गियों में काम किया और करीब 10 साल वहां लोगों के बीच बिताए। केजरीवाल ने कहा कि उनका उद्देश्य व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं बल्कि देश में बदलाव लाना था। उन्होंने कहा कि अगर लोकपाल आंदोलन के समय ही लोकपाल कानून बना दिया जाता तो राजनीतिक दल बनाने की जरूरत नहीं पड़ती।

    एसआईआर और मतदाता सूची के मुद्दे पर भी केजरीवाल ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि दिल्ली में बैठे अधिकारी पूरे देश की मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की शक्ति रखते हैं और बिना पर्याप्त जांच के किसी मतदाता का नाम हटाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

    केजरीवाल ने कहा कि 12 साल किसी भी देश के इतिहास में कम अवधि नहीं होती। उन्होंने 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को मिली सीटों का उल्लेख करते हुए कहा कि इतने लंबे समय में देश को विकास के अलग स्तर पर पहुंचाया जा सकता था। उन्होंने अर्थव्यवस्था, बैंकिंग, रेलवे और विमानन क्षेत्र को लेकर भी सरकार पर सवाल उठाए और दावा किया कि कई क्षेत्रों की स्थिति खराब हुई है।

    अंत में केजरीवाल ने कहा कि देश के सामने मौजूद मुद्दों पर जनता को सवाल पूछने चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 12 वर्षों में सरकार ने विभिन्न क्षेत्रों में अपेक्षित काम नहीं किया और लोकतांत्रिक संस्थाओं को भी नुकसान पहुंचा है।