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  • आस्था के आगे मौसम भी बेबस: सुमेरपुर में 45 डिग्री गर्मी के बीच चल रही 41 दिनों की अग्नि तपस्या, श्रद्धा में डूबे भक्त

    आस्था के आगे मौसम भी बेबस: सुमेरपुर में 45 डिग्री गर्मी के बीच चल रही 41 दिनों की अग्नि तपस्या, श्रद्धा में डूबे भक्त



    नई दिल्ली। पाली जिले के सुमेरपुर में इन दिनों आस्था और साधना का एक अनोखा दृश्य देखने को मिल रहा है, जहां बाल योगी गुलाब नाथ जी महाराज भीषण गर्मी और धधकती अग्नि धूणी के बीच 41 दिनों की दिव्य अग्नि तपस्या कर रहे हैं। तपते मौसम में जब तापमान 45 डिग्री तक पहुंच रहा है, तब भी संत अपनी साधना में पूरी तरह लीन हैं। इस तपस्या को लोक कल्याण, गौ-सेवा और धर्म रक्षा के उद्देश्य से किया जा रहा एक विशेष अनुष्ठान बताया जा रहा है।

    चारों ओर जलती अग्नि धूणी और बीच में शांत मुद्रा में बैठे बाल योगी का यह दृश्य हर किसी को हैरान कर रहा है। यह साधना न केवल कठिन मानी जा रही है, बल्कि इसे आध्यात्मिक शक्ति और आत्मसंयम का अद्भुत उदाहरण भी माना जा रहा है। बताया जा रहा है कि यह दिव्य तपस्या लगातार 41 दिनों तक बिना किसी रुकावट के जारी रहेगी।

    लोक कल्याण और धर्म रक्षा के लिए साधना
    इस अग्नि तपस्या का मुख्य उद्देश्य गौ माता की सेवा, सनातन धर्म की रक्षा और समाज में सुख-शांति एवं समृद्धि की कामना बताया जा रहा है। साधक के अनुयायियों का मानना है कि यह तपस्या केवल व्यक्तिगत साधना नहीं बल्कि पूरे विश्व के कल्याण के लिए की जा रही है। अग्नि के बीच बैठकर की जा रही यह साधना लोगों के बीच गहरी आस्था का केंद्र बन गई है।

    सात परिक्रमा के लिए उमड़ रहे श्रद्धालु
    इस पावन स्थल पर दूर-दूर से श्रद्धालुओं की भारी भीड़ पहुंच रही है। भक्तजन अग्नि धूणी के चारों ओर सात परिक्रमा (फेरे) लगाकर अपनी मनोकामनाएं पूरी होने की प्रार्थना कर रहे हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस पवित्र स्थान पर परिक्रमा करने से जीवन के दुख-दर्द, मानसिक तनाव और कष्टों से मुक्ति मिलती है।

    भीषण गर्मी और तपती जमीन के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हो रहा है। लोग आस्था के इस संगम को देखने और उसमें शामिल होने के लिए लगातार सुमेरपुर पहुंच रहे हैं।

    आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बना क्षेत्र
    जिस स्थान पर यह तपस्या चल रही है, वह श्री डूंगलाई मामाधणी उज्जेनी वीर मंदिर क्षेत्र से जुड़ा हुआ है, जो पहले से ही श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था का केंद्र माना जाता है। अब इस 41 दिनों की अग्नि साधना के कारण इस पूरे परिसर की आध्यात्मिक ऊर्जा और महत्व और भी बढ़ गया है।

    भक्तों का कहना है कि यहां आने वाला हर व्यक्ति एक अलग ही शांति और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव करता है। यही वजह है कि यह स्थान अब केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक पर्यटन का भी प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है।

    आस्था और साधना का अनोखा संगम
    45 डिग्री की झुलसा देने वाली गर्मी में भी साधक की अडिग तपस्या और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था इस स्थान को विशेष बना रही है। यह दृश्य आस्था, विश्वास और समर्पण का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो हर किसी को प्रभावित कर रहा है। सुमेरपुर की यह अग्नि तपस्या आज पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है और लोग इसे एक दिव्य और अलौकिक अनुभव के रूप में देख रहे हैं।

  • मंगलवार व्रत के नियम: भूलकर भी न करें ये गलतियां, वरना नहीं मिलेगा हनुमान जी का आशीर्वाद

    मंगलवार व्रत के नियम: भूलकर भी न करें ये गलतियां, वरना नहीं मिलेगा हनुमान जी का आशीर्वाद


    नई दिल्ली।  मंगलवार का दिन भगवान हनुमान को समर्पित माना गया है। इस दिन भक्त व्रत रखकर बजरंगबली की पूजा करते हैं और जीवन के संकटों से मुक्ति की कामना करते हैं। मान्यता है कि विधि-विधान से किया गया व्रत व्यक्ति के जीवन में शक्ति, साहस और सफलता लाता है। लेकिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि व्रत में नियमों का पालन न किया जाए तो उसका पूरा फल नष्ट भी हो सकता है।

     व्रत की सही विधि क्या है?
    व्रत की शुरुआत ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान से होती है। इसके बाद साफ लाल वस्त्र पहनकर पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध किया जाता है। फिर हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर दीपक जलाया जाता है। उन्हें सिंदूर, चमेली का तेल, लाल फूल और पान के पत्तों की माला अर्पित की जाती है। भोग के रूप में बेसन के लड्डू या बूंदी चढ़ाना शुभ माना जाता है।
    पूजा के दौरान ‘राम’ नाम का जप और मंगलवार व्रत कथा का पाठ करना जरूरी होता है।

     मंगलवार व्रत में जरूर बचें इन गलतियों से
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कुछ नियमों का पालन न करने से व्रत का फल प्रभावित हो सकता है:–

    व्रत में नमक का सेवन पूरी तरह वर्जित माना गया है
    प्याज, लहसुन, मांस और मदिरा से दूर रहना चाहिए
    मानसिक और शारीरिक पवित्रता बनाए रखना जरूरी है
    व्रत के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करना शुभ माना गया है
    दिनभर निराहार रहकर संयम रखना चाहिए

    शाम की पूजा के बाद ही गेहूं और गुड़ से बना सादा भोजन करना उचित माना जाता है, उसमें भी नमक का उपयोग नहीं करना चाहिए।

    आस्था और संयम का प्रतीक है मंगलवार व्रत
    मंगलवार व्रत केवल पूजा नहीं, बल्कि आत्मसंयम और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि जो भक्त पूरी निष्ठा और नियमों के साथ हनुमान जी की आराधना करते हैं, उनके जीवन से भय, संकट और बाधाएं दूर हो जाती हैं।

  • वृंदावन में भक्ति का रंग: ग्लैमर जगत के सितारों की राधा-कृष्ण भक्ति यात्रा ने बढ़ाई रौनक

    वृंदावन में भक्ति का रंग: ग्लैमर जगत के सितारों की राधा-कृष्ण भक्ति यात्रा ने बढ़ाई रौनक


    नई दिल्ली । चमक-दमक और ग्लैमर की दुनिया छोड़कर कई फिल्मी और टीवी सितारे अब वृंदावन की भक्ति और सादगी की ओर आकर्षित हो रहे हैं। ‘राधे-राधे’ के जयकारे के साथ आध्यात्मिक शांति की तलाश में बड़ी संख्या में लोग ब्रज की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे धार्मिक पर्यटन और स्थानीय कारोबार में तेज़ उछाल देखा जा रहा है।

    कभी फिल्मी पर्दे की चकाचौंध, रेड कार्पेट और करोड़ों के सेट जिनकी पहचान हुआ करते थे, आज वही दुनिया कई कलाकारों को आकर्षित नहीं कर पा रही। हाल के वर्षों में वृंदावन और ब्रजभूमि का आध्यात्मिक माहौल कई सेलेब्रिटीज़ को अपनी ओर खींच रहा है। अब ‘राधे-राधे’ का जयघोष और तुलसी की माला कई कलाकारों की नई पहचान बनती दिख रही है।

    वृंदावन बना आस्था और सुकून का केंद्र
    मथुरा-वृंदावन में श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। पर्यटन विभाग के अनुसार रोजाना करीब 1 से 1.5 लाख लोग यहां पहुंच रहे हैं। त्योहारों और वीकेंड पर यह आंकड़ा कई गुना बढ़ जाता है। बरसाना, गोवर्धन और बांके बिहारी मंदिर जैसे स्थान अब सिर्फ धार्मिक ही नहीं बल्कि आत्मिक शांति के प्रमुख केंद्र बन चुके हैं।
    एना जयसिंघानी: टीवी की दुनिया से साध्वी जीवन तक
    ग्वालियर की रहने वाली एना जयसिंघानी ने मुंबई में टीवी इंडस्ट्री में पहचान बनाई थी। ‘देखा एक ख्वाब’ और ‘फियर फाइल्स’ जैसे शोज़ से लोकप्रियता हासिल करने के बाद उन्होंने अचानक ग्लैमर की दुनिया से दूरी बना ली। उनका कहना है कि वृंदावन आने के बाद उन्हें जीवन की नई दिशा मिली। अब वह भक्ति मार्ग पर चल रही हैं और साध्वी जीवन अपना चुकी हैं।
    अनुष्का शर्मा और आध्यात्मिक जुड़ाव की चर्चा
    बॉलीवुड अभिनेत्री अनुष्का शर्मा के भी वृंदावन और प्रेमानंद महाराज से जुड़ाव की चर्चाएं लगातार सुर्खियों में रही हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, वे कई बार आश्रम पहुंची हैं और आध्यात्मिक प्रवचनों से जुड़ी रही हैं।
    अन्य सितारे भी भक्ति में हुए शामिल
    शिल्पा शेट्टी, हेमा मालिनी, मीका सिंह, बादशाह और कुमार सानू जैसे कई कलाकार भी समय-समय पर वृंदावन और संतों के संपर्क में आए हैं। इन मुलाकातों में अधिकांश ने मानसिक शांति और जीवन संतुलन की बात को प्रमुखता दी है।
    प्रेमानंद महाराज का बढ़ता प्रभाव
    वृंदावन के प्रेमानंद महाराज की शिक्षाएं ‘राधा नाम जप’ और सरल जीवन पर आधारित हैं। उनके आश्रम में आने वाले श्रद्धालु बताते हैं कि यहां जीवन की जटिलताओं का समाधान भक्ति और नामस्मरण में बताया जाता है। यही कारण है कि युवा वर्ग भी बड़ी संख्या में यहां आकर्षित हो रहा है।
    ग्लैमर की दुनिया से भक्ति की ओर बढ़ता यह रुझान केवल व्यक्तिगत बदलाव नहीं, बल्कि समाज में आध्यात्मिकता की बढ़ती तलाश को भी दर्शाता है। वृंदावन अब केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि मानसिक शांति और जीवन संतुलन का एक बड़ा केंद्र बनता जा रहा है।
  • मंगलवार व्रत में भूलकर भी न करें ये गलतियां, वरना नहीं मिलेगा पूरा फल

    मंगलवार व्रत में भूलकर भी न करें ये गलतियां, वरना नहीं मिलेगा पूरा फल

    ई दिल्ली। हिंदू धर्म में मंगलवार का दिन बेहद पवित्र माना गया है और यह दिन हनुमान जी को समर्पित होता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा और व्रत करने पर बजरंगबली प्रसन्न होते हैं और भक्तों के सभी संकट दूर कर देते हैं। लेकिन कई बार छोटी-छोटी गलतियां व्रत के पूरे फल को नष्ट कर सकती हैं। ऐसे में जरूरी है कि मंगलवार व्रत करते समय कुछ खास सावधानियों का ध्यान रखा जाए।

    मंगलवार व्रत की शुरुआत ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करने से होती है। इसके बाद लाल वस्त्र पहनकर पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध किया जाता है। हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित कर घी का दीपक जलाया जाता है और उन्हें सिंदूर, चमेली का तेल, लाल फूल और पान के पत्तों की माला अर्पित की जाती है। भोग के रूप में बेसन के लड्डू या बूंदी चढ़ाना शुभ माना जाता है। पूजा के दौरान ‘राम’ नाम का जाप करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि हनुमान जी Lord Rama के परम भक्त हैं।

    इन सावधानियों का रखें खास ध्यान

    मंगलवार व्रत के दौरान साधारण नमक का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके साथ ही प्याज, लहसुन, मांस और मदिरा से पूरी तरह दूरी बनाए रखना जरूरी है। व्रत के समय मन और शरीर दोनों की पवित्रता बनाए रखना बेहद महत्वपूर्ण होता है, इसलिए ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

    व्रत रखने वाले भक्तों को पूरे दिन निराहार रहना चाहिए। हालांकि यदि यह संभव न हो, तो शाम की पूजा के बाद गेहूं और गुड़ से बना भोजन किया जा सकता है, लेकिन उसमें नमक का प्रयोग नहीं होना चाहिए।

    इसके अलावा क्रोध, झगड़ा, अपशब्द और नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए। माना जाता है कि इस दिन मन की शुद्धता ही पूजा का सबसे बड़ा आधार होती है।

    दान-पुण्य का भी इस दिन विशेष महत्व होता है। जरूरतमंदों को अन्न और वस्त्र दान करने से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

    क्यों जरूरी है नियमों का पालन?

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, व्रत केवल भोजन त्यागने का नाम नहीं है, बल्कि यह अनुशासन, संयम और श्रद्धा का प्रतीक है। अगर नियमों का सही तरीके से पालन किया जाए, तो व्यक्ति को मानसिक शांति, आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।

    इसलिए अगर आप मंगलवार का व्रत रखते हैं, तो इन सावधानियों को जरूर अपनाएं। तभी Lord Hanuman की कृपा से आपके जीवन के सभी कष्ट दूर हो सकते हैं।

  • नॉनवेज छोड़ने और तुलसी माला धारण करने के बाद अभिनेता ने साझा किए अनुभव…

    नॉनवेज छोड़ने और तुलसी माला धारण करने के बाद अभिनेता ने साझा किए अनुभव…


    नई दिल्ली: मनोरंजन जगत से जुड़े अभिनेता करण वाही इन दिनों अपने निजी जीवन में आए बदलावों को लेकर चर्चा में हैं। हाल ही में उन्होंने अपनी जीवनशैली और सोच में आए परिवर्तन के बारे में विस्तार से बात की, जिसमें उन्होंने खानपान से लेकर आध्यात्मिक दृष्टिकोण तक कई बदलावों का उल्लेख किया।

    करण वाही ने बताया कि पिछले कुछ महीनों में उन्होंने अपने आहार में बड़ा बदलाव किया है और नॉनवेज का सेवन पूरी तरह से छोड़ दिया है। उनके अनुसार, इस निर्णय के बाद उन्हें मानसिक रूप से अधिक स्थिरता और शांति का अनुभव हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अब उनका ध्यान अधिक संतुलित और सकारात्मक जीवनशैली अपनाने पर है।

    अभिनेता ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने तुलसी माला धारण की है और इसे अपने जीवन में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखते हैं। उनका कहना है कि इस कदम के बाद उन्हें आत्मिक स्तर पर एक अलग प्रकार की शांति महसूस हो रही है, जो पहले की तुलना में अधिक गहरी है।

    करण वाही ने यह भी बताया कि हाल के समय में उन्होंने आध्यात्मिक विचारों और प्रेरक सामग्री पर ध्यान देना शुरू किया, जिससे उनके दृष्टिकोण में बदलाव आया। उनके अनुसार, इस प्रक्रिया ने उन्हें जीवन को अधिक सरल और सकारात्मक तरीके से देखने में मदद की है।

    उन्होंने अपने स्वास्थ्य से जुड़ी एक पुरानी समस्या का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्हें त्वचा संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ा था। उनका कहना है कि जीवनशैली में सुधार और खानपान में बदलाव के बाद उनकी स्थिति में काफी सुधार हुआ है और उन्हें राहत महसूस हुई है।

    करण वाही ने यह स्पष्ट किया कि उनके जीवन में आए ये बदलाव किसी एक घटना का परिणाम नहीं हैं, बल्कि धीरे-धीरे आए अनुभवों और सोच में बदलाव का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि अब वे अपने जीवन में अधिक शांति और संतुलन महसूस करते हैं और इसे बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं।

    उन्होंने अपने निजी जीवन से जुड़ी कुछ चर्चाओं पर भी प्रतिक्रिया दी और कहा कि उनके बारे में कई तरह की बातें बिना आधार के सामने आई हैं, जिनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।

    करण वाही ने अपने करियर की शुरुआत टेलीविजन से की थी और धीरे-धीरे उन्होंने मनोरंजन जगत में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने कई लोकप्रिय धारावाहिकों और डिजिटल प्रोजेक्ट्स में काम किया है और आज भी विभिन्न माध्यमों पर सक्रिय हैं।

    उनके हालिया बदलावों को लेकर प्रशंसकों में भी चर्चा बनी हुई है। कुछ लोग इसे व्यक्तिगत विकास और आत्मिक जागरूकता की दिशा में एक सकारात्मक कदम मान रहे हैं, जबकि अन्य इसे जीवनशैली में स्वाभाविक परिवर्तन के रूप में देख रहे हैं।

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    SHORT DESCRIPTION: करण वाही ने अपनी जीवनशैली में बदलाव करते हुए नॉनवेज छोड़ने और आध्यात्मिकता की ओर झुकाव की बात साझा की, जिससे उन्हें मानसिक शांति का अनुभव हो रहा है।

  • ओंकारेश्वर में एकात्म पर्व का भव्य शुभारंभ मध्यप्रदेश की आध्यात्मिक विरासत पर सीएम का संदेश

    ओंकारेश्वर में एकात्म पर्व का भव्य शुभारंभ मध्यप्रदेश की आध्यात्मिक विरासत पर सीएम का संदेश


    खंडवा। ओंकारेश्वर में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के प्रकटोत्सव पर आयोजित भव्य एकात्म पर्व का शुभारंभ आज वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच किया गया। खंडवा जिले के पवित्र ओंकारेश्वर स्थित एकात्म धाम में पांच दिवसीय इस आयोजन का उद्घाटन मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती के सान्निध्य में दीप प्रज्वलित कर किया। इस अवसर पर पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया और संतों तथा विद्वानों की उपस्थिति ने आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की।

    मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने अपने संबोधन में कहा कि मध्यप्रदेश एक अद्भुत धरती है जहां हर युग में दिव्य सानिध्य की अनुभूति होती रही है। उन्होंने कहा कि वनवास काल में भगवान श्रीराम के आगमन से लेकर श्रीकृष्ण के शिक्षा ग्रहण तक इस भूमि का इतिहास दिव्यता से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि ओंकारेश्वर का एकात्म धाम जगद्गुरु आदि शंकराचार्य की महान परंपरा का जीवंत प्रतीक है और यह स्थान अद्वैत वेदांत की शाश्वत शिक्षाओं को विश्व पटल पर स्थापित करने की क्षमता रखता है।

    कार्यक्रम के दौरान अद्वैत लोक और अक्षर ब्रह्म प्रदर्शनी का लोकार्पण भी किया गया। मुख्यमंत्री ने यज्ञ में आहुतियां देकर धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया। यह आयोजन आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास और मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा वैशाख शुक्ल पंचमी के अवसर पर आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम में विवेकानंद केंद्र की उपाध्यक्ष पद्मश्री निवेदिता भिड़े सहित कई संत और विद्वान उपस्थित रहे जिन्होंने अद्वैत दर्शन और आधुनिक युवा पीढ़ी के संबंधों पर विचार साझा किए।

    आयोजन के अंतर्गत द्वैत लोक संग्रहालय के निर्माण की भी योजना है जो दूसरे चरण में विकसित किया जाएगा। इसके लिए राज्य सरकार ने बड़ी राशि की स्वीकृति प्रदान की है। इस मंच पर अद्वैत वेदांत की प्रासंगिकता पर विशेष विमर्श भी शुरू हुआ जिसमें संतों ने आत्मा ब्रह्म और भगवान की एकता पर प्रकाश डाला। शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने कहा कि यह तीनों तत्व वास्तव में एक ही सत्य के विभिन्न रूप हैं और इन्हीं के समागम से भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक चेतना का विस्तार होता है।

    पांच दिवसीय एकात्म पर्व के दौरान ओंकारेश्वर में विभिन्न धार्मिक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। श्रद्धालुओं और आगंतुकों के लिए विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बन रहा है बल्कि यह अद्वैत दर्शन को आधुनिक समाज से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण प्रयास भी माना जा रहा है। यहां आने वाले लोग भारतीय संस्कृति की गहराई और उसकी एकात्म दृष्टि का अनुभव कर रहे हैं।

    इस आयोजन के माध्यम से सरकार और संत परंपरा मिलकर भारतीय दर्शन की गहराई को जन जन तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। ओंकारेश्वर में बढ़ती श्रद्धालुओं की उपस्थिति से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति मिल रही है और पर्यटन को नई पहचान मिल रही है। यहां आने वाले युवा और विद्यार्थी अद्वैत वेदांत के मूल सिद्धांतों को समझकर जीवन में संतुलन और सकारात्मकता की प्रेरणा ले रहे हैं। यह आयोजन आने वाले समय में मध्यप्रदेश को आध्यात्मिक पर्यटन के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

  • उज्जैन वह स्थान है जहां अध्यात्म और विज्ञान के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है : केंद्रीय मंत्री प्रधान

    उज्जैन वह स्थान है जहां अध्यात्म और विज्ञान के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है : केंद्रीय मंत्री प्रधान


    भोपाल । केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि उज्जैन वह स्थान है जहाँ अध्यात्म और विज्ञान के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है और एक नई दृष्टि का जन्म होता है। भारत के जितने भी प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र हैं चाहे वह उज्जैन हो काशी हो कांची हो या पुरी धाम सभी भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित ऐसी जीती-जागती प्रयोगशालाएं हैं जहाँ विज्ञान कला संस्कृति साहित्य और आध्यात्मिकता का अद्भुत समन्वय मिलता है।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव शुक्रवार को उज्जैन में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन महाकाल द मास्टर ऑफ टाइम के शुभारंभ सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने महाकाल द मास्टर ऑफ टाइम अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में पधारे विद्वानों और विशेषज्ञों का स्वागत अभिनंदन किया। केंद्रीय मंत्री प्रधान ने विज्ञान और आध्यात्मिकता के अटूट संबंध पर विशेष बल दिया।

    उन्होंने कहा कि विज्ञान आध्यात्मिकता के बिना अधूरा है और इसका सबसे सटीक उदाहरण स्वयं उज्जैन नगरी और महाकाल मंदिर की व्यवस्थाओं में दिखाई देता है। केंद्रीय मंत्री प्रधान ने महाकाल मंदिर के एक वैज्ञानिक अनुष्ठान का उल्लेख करते हुए बताया कि वैशाख मास के पहले दिन से भगवान शिव के ऊपर मटके से निरंतर जल की धारा प्रवाहित करने की व्यवस्था केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि ग्रीष्मकाल की चुनौतियों का एक वैज्ञानिक समाधान और पर्यावरणीय प्रबंधन है। यह दर्शाता है कि हमारा समाज सदियों से काल गणना और प्रकृति के बदलावों के अनुसार अपनी जीवनशैली को ढालने की वैज्ञानिक समझ रखता था। भारतीय ज्ञान परंपरा में पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व और संतुलित जीवन प्रवाह हमेशा से केंद्र में रहा है।

    केंद्रीय मंत्री प्रधान ने शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे बड़े बदलावों का जिक्र करते हुए ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने जोर दिया कि हमें अपनी शिक्षा पद्धति को केवल रटने की पुरानी परिपाटी से निकालकर सृजनशीलता डिजाइन थिंकिंग और क्रिटिकल थिंकिंग की ओर ले जाना होगा। आज का युग एआई और कंप्यूटेशनल थिंकिंग का है भारत के विद्यार्थी वैश्विक स्तर पर इस दौड़ में पीछे न रहें इसके लिए स्कूली स्तर पर ही एआई जैसे नए पाठ्यक्रम शुरू किए जा रहे हैं। केंद्रीय मंत्री प्रधान ने स्पष्ट किया कि ज्ञान पर किसी भाषा का एकाधिकार नहीं हो सकता इसलिए शिक्षा को भारतीय भाषाओं और लोक-संस्कृतियों के साथ जोड़ा जा रहा है जिससे हर विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में जटिल वैज्ञानिक विषयों को सरलता से समझ सके।

    केंद्रीय मंत्री प्रधान ने कहा कि उज्जैन वह स्थान है जहाँ से कर्क रेखा गुजरती है और यहीं से प्राचीन काल में दुनिया की काल गणना होती थी इसलिए अब समय आ गया है कि हम ‘ग्रीनविच मीन टाइम के स्थान पर ‘महाकाल स्टैंडर्ड टाइम की तार्किक स्थापना करें। उन्होंने कहा कि आधुनिक एआई उपकरण भी यह स्वीकार करते हैं कि काल गणना का मूल केंद्र उज्जैन के आसपास का क्षेत्र है अतः हमें अपने वैज्ञानिक स्वाभिमान को वैश्विक स्तर पर पुनः स्थापित करना होगा और यह इस विमर्श का मुख्य उद्देश्य है।

    केंद्रीय मंत्री प्रधान ने कहा कि भारत आज अंतरिक्ष ड्रोन और सूचना प्रौद्योगिकी में तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आने वाले दो दशकों में भारत न केवल अपनी आवश्यकताओं को पूरा करेगा बल्कि ‘वसुधैव कुटुंबकम की भावना के साथ पूरे विश्व की पर्यावरणीय और आर्थिक चुनौतियों का वैज्ञानिक समाधान भी प्रदान करेगा। उज्जैन में ‘विज्ञान केंद्र और ‘तारामंडल का सुदृढ़ीकरण इसी दिशा में एक बड़ा कदम है जिससे आने वाली पीढ़ी वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ सके।

    प्रख्यात चिंतक एवं लेखक सुरेश सोनी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में काल (समय) की अवधारणा अत्यंत गहन और वैज्ञानिक है। भारतीय कालगणना खगोलीय पिंडों की गति ऋतु चक्र और प्रकृति के नियमों से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि भविष्य की समग्र प्रगति के लिए विज्ञान एवं तकनीक कला अध्यात्म सामाजिकता और सामाजिक अर्थशास्त्र के बीच संतुलित समन्वय आवश्यक है। उज्जैन में स्थापित कालयंत्र इस प्राचीन वैज्ञानिक परंपरा और आधुनिक तकनीक के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने युवाओं से भारतीय वैज्ञानिक विरासत को समझने प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने और विज्ञान को मानवीय मूल्यों से जोड़ने का आह्वान किया।

    नीति आयोग के सदस्य एवं प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ. वी. के. सारस्वत ने कहा कि उज्जैन प्राचीन काल से कालगणना और खगोल विज्ञान का प्रमुख केंद्र रहा है। उन्होंने वैदिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय को विकसित भारत@2047 के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन स्वच्छ ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा जैसी चुनौतियों का समाधान नवाचार और स्वदेशी अनुसंधान से ही संभव है। उन्होंने आत्मनिर्भर भारत की आवश्यकता पर बल देते हुए एआई क्वांटम तकनीक और सेमीकंडक्टर जैसे डीप टेक क्षेत्रों में अनुसंधान बढ़ाने R&D में निवेश विश्वविद्यालयों और उद्योगों के बेहतर समन्वय की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि भारतीय युवाओं की क्षमता से भारत 2047 तक तकनीकी रूप से सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनेगा।

    विज्ञान भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री शिव कुमार शर्मा ने कहा कि यह आयोजन विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा में नए प्रतिमान स्थापित कर रहा है। शिक्षा केवल जानकारी का माध्यम नहीं बल्कि समाज को परिवर्तनकारी दृष्टि देने का साधन है। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के लर्निंग बाइ डूइंग सिद्धांत के तहत विद्यार्थी विज्ञान मंथन 2026-27 का शुभारंभ किया गया जिसका उद्देश्य विद्यार्थियों में भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति गौरव भाव जगाते हुए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नवाचार क्षमता का विकास करना है।

    राष्ट्रीय समन्वयक आईकेएस नई दिल्ली डॉ. गांती एस. मूर्ति ने कहा कि यह सम्मेलन अतीत के ज्ञान के संरक्षण नवाचार के सृजन और ज्ञान के निरंतर प्रवाह पर आधारित है। सम्मेलन में बच्चों के लिए भौतिकी प्रशिक्षण विशेष सत्र और प्रदर्शनी के माध्यम से खगोल विज्ञान एवं आधुनिक नवाचारों को प्रस्तुत किया गया है।

    महाकाल द मास्टर ऑफ टाइम

    अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का मूल ध्येय भारत की उस समृद्ध वैज्ञानिक थाती को आधुनिक जगत के साथ एकाकार करना है जो सदियों से हमारी पहचान रही है। इस युगांतरकारी आयोजन का सबसे प्रमुख संकल्प उज्जैन को ‘विश्व के मेरिडियन शून्य रेखा के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करना है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव के विजन के अनुरूप यह सम्मेलन ‘विकसित भारत के स्वप्न को साकार करने की दिशा में ‘स्पेस इकोनॉमी अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के नए द्वार खोलेगा। यहाँ खगोल विज्ञान और ब्रह्मांड विज्ञान की आधुनिक प्रगति का प्राचीन भारतीय काल-ज्ञान के साथ अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। सम्मेलन का एक अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य वेदांग और सिद्धांत ज्योतिष के कालजयी सूत्रों को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर कसकर पंचांग पद्धतियों में आने वाली सूक्ष्म त्रुटियों का वैज्ञानिक परिमार्जन करना है।

  • साईं बाबा के प्रेरक उपदेश जीवन में शांति और संतुलन लाने का मार्ग

    साईं बाबा के प्रेरक उपदेश जीवन में शांति और संतुलन लाने का मार्ग

    नई दिल्ली: भारत के महान संत साईं बाबा की शिक्षाएं आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं उनके विचार केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन ही नहीं बल्कि एक संतुलित और शांतिपूर्ण जीवन जीने का रास्ता भी दिखाते हैं उनके अनुसार जीवन का असली सार प्रेम करुणा सत्य और सेवा में छिपा है और यही गुण इंसान को एक बेहतर व्यक्ति बनाते हैं

    साईं बाबा का सबसे प्रसिद्ध संदेश है श्रद्धा और सबुरी जीवन में ये दो गुण व्यक्ति को हर परिस्थिति में मजबूत बनाए रखते हैं श्रद्धा का अर्थ है ईश्वर और स्वयं पर विश्वास रखना जबकि सबुरी का मतलब है धैर्य रखना और हर स्थिति का शांतिपूर्वक सामना करना बाबा कहते थे कि जो व्यक्ति इन दोनों को अपने जीवन में अपनाता है वह कभी निराश नहीं होता

    उनकी एक और महत्वपूर्ण सीख थी कि सबका मालिक एक है चाहे हम किसी भी धर्म या पंथ से जुड़े हों ईश्वर एक ही है और हर जगह उपस्थित है इस विचार के माध्यम से उन्होंने समाज में एकता और भाईचारे का संदेश दिया उनका मानना था कि सच्ची भक्ति वही है जो बिना किसी स्वार्थ के की जाए और जो व्यक्ति सच्चे मन से ईश्वर को पुकारता है उसकी हर प्रार्थना अवश्य सुनी जाती है

    साईं बाबा ने दान और सेवा को जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया उन्होंने कहा कि दान करने से कभी धन कम नहीं होता बल्कि यह और बढ़ता है यह विचार आज भी लोगों को जरूरतमंदों की मदद करने के लिए प्रेरित करता है इसके साथ ही उन्होंने सत्य बोलने और दूसरों का सम्मान करने पर जोर दिया उनका मानना था कि हर व्यक्ति में ईश्वर का वास है इसलिए सभी के साथ समान और आदरपूर्ण व्यवहार करना चाहिए

    उनकी शिक्षाओं में प्रेम को सबसे बड़ा धर्म माना गया है साईं बाबा कहते थे कि प्रेम से ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है और यही भावना समाज में शांति और सद्भाव को बढ़ाती है उन्होंने कर्म के सिद्धांत पर भी जोर दिया उनके अनुसार जैसा कर्म करेंगे वैसा ही फल मिलेगा इसलिए हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए

    साईं बाबा ने ध्यान और भक्ति के माध्यम से आंतरिक शांति प्राप्त करने की शिक्षा दी उनका कहना था कि सच्ची शांति बाहर नहीं बल्कि हमारे अंदर होती है यदि मन शांत और स्थिर है तो जीवन की हर चुनौती को आसानी से पार किया जा सकता है

     साईं बाबा की शिक्षाएं आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी पहले थीं उनके विचार हमें सिखाते हैं कि यदि हम अपने जीवन में श्रद्धा सबुरी प्रेम और सेवा को अपनाएं तो न केवल हमारा जीवन बेहतर बन सकता है बल्कि समाज में भी सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है

  • आस्था, आध्यात्म और प्रकृति का अद्भुत समागम होगा सिंहस्थ-2028 का आयोजन: मुख्यमंत्री डॉ. यादव

    आस्था, आध्यात्म और प्रकृति का अद्भुत समागम होगा सिंहस्थ-2028 का आयोजन: मुख्यमंत्री डॉ. यादव


    भोपाल।
    मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि सिंहस्थ-2028 का आयोजन आस्था, आध्यात्म और प्रकृति का अद्भुत समागम होगा। सिंहस्थ 2028 के मुख्य राजसी स्नान और अन्य स्नान शिप्रा के जल से ही हो, यह सुनिश्चित करने के लिए सिलारखेड़ी सेवरखेड़ी परियोजना प्रगतिरत है।

    मुख्यंत्री डॉ. यादव गुरुवार को उज्जैन में मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा सिंहस्थ-2028 के कार्यों की जानकारी प्रदान करने के लिए आयोजित सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर्स की कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वर्तमान दौर में सोशल मीडिया बहुत महत्वपूर्ण है, जो सुशासन और समाज को सकारात्मक दिशा प्रदान करने का सशक्त मार्ग है।

    कार्यशाला में कलेक्टर रौशन कुमार सिंह ने सिंहस्थ-2028 के लिए कान्ह क्लोज डक्ट, सेवरखेड़ी सिलारखेड़ी परियोजना, शहर के आंतरिक मार्गों का चौड़ीकरण, सीवरेज कार्य, मेला क्षेत्र विकास, जिले की कनेक्टविटी को देश से जोड़ने के लिए बनाए जा रहे 6 लेन और 4 लेन मार्गों, रेलवे लाइन, एयरपोर्ट आदि विकास कार्यों की जानकारी दी।

    पुलिस अधीक्षक प्रदीप शर्मा ने सिंहस्थ 2028 के लिए किए जा रहे भीड़ प्रबंधन के उपाय, सुरक्षा व्यवस्था ,एआई टेक्नोलॉजी का क्रॉउड मैनेजमेंट, श्रद्धालुओं को जानकारी प्रदान करने, पार्किंग आदि में उपयोग संबंधी जानकारी दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर सेंसिटव जानकारी पोस्ट करने से पहले उसकी सत्यता की जांच करना और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग करने के बारे में चर्चा की।

  • राधा रानी का दिव्य स्वरूप: शब्दों से परे सौंदर्य, जिसे केवल भक्ति से ही पाया जा सकता है

    राधा रानी का दिव्य स्वरूप: शब्दों से परे सौंदर्य, जिसे केवल भक्ति से ही पाया जा सकता है


    नई दिल्ली । भक्ति मार्ग में एक प्रश्न सदियों से लोगों के मन में उठता रहा है आखिर राधा रानी कैसी दिखती हैं? भक्त साधक और जिज्ञासु अक्सर संतों से इस रहस्य को जानने की इच्छा रखते हैं लेकिन संतों का स्पष्ट कहना है कि राधा रानी के वास्तविक स्वरूप को शब्दों में बांध पाना संभव नहीं है। उनका दिव्य रूप सामान्य दृष्टि से परे है और उसे देखने के लिए केवल भौतिक आंखें पर्याप्त नहीं हैं बल्कि इसके लिए दिव्य अनुभूति और गहन भक्ति की आवश्यकता होती है।

    संत प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार मनुष्य जो कुछ भी इस संसार में देखता है वह उसकी भौतिक दृष्टि तक सीमित होता है जो माया से प्रभावित है। यही कारण है कि हम केवल भौतिक जगत को ही देख पाते हैं। जिस प्रकार महाभारत में अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण के विराट स्वरूप के दर्शन के लिए दिव्य चक्षु प्रदान किए गए थे उसी प्रकार राधा रानी के वास्तविक स्वरूप को देखने के लिए भी दिव्य दृष्टि की आवश्यकता होती है। बिना इस आध्यात्मिक दृष्टि के उनके स्वरूप को समझ पाना असंभव है।

    संतों का कहना है कि राधा रानी सौंदर्य की पराकाष्ठा हैं। उनके रूप का वर्णन करना इतना कठिन है कि यदि किसी व्यक्ति के शरीर के प्रत्येक रोम में करोड़ों जिह्वाएं भी उत्पन्न हो जाएं तब भी उनके सौंदर्य की पूर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती। यह भी कहा जाता है कि जिन भगवान श्री कृष्ण के सौंदर्य से करोड़ों कामदेव भी मोहित हो जाते हैं वही श्री कृष्ण स्वयं राधा रानी की रूप माधुरी के सामने आकर्षित हो जाते हैं। उनकी महिमा इतनी अद्भुत है कि वेद भी उनके वर्णन में असमर्थ होकर नेति-नेति कहकर मौन हो जाते हैं।

    ब्रज की गोपियों का सौंदर्य भी अद्वितीय बताया गया है। कहा जाता है कि ब्रज की प्रत्येक गोपी इतनी सुंदर है कि करोड़ों लक्ष्मी भी उनके सामने फीकी पड़ जाएं। लेकिन जब यही सखियां अपनी आराध्य राधा रानी के दर्शन करती हैं तो वे भी उनके सामने नतमस्तक हो जाती हैं। राधा रानी के प्रत्येक अंग में ऐसी मधुरता और दिव्यता विद्यमान है जिसकी तुलना तीनों लोकों में कहीं नहीं मिलती।

    संतों के अनुसार राधा रानी के स्वरूप का अनुभव करने का सबसे सरल और प्रभावी मार्ग भक्ति और नाम जप है। यदि कोई व्यक्ति सच्चे मन से राधा नाम का निरंतर जप करता है तो धीरे-धीरे उसके हृदय में राधा रानी का दिव्य स्वरूप प्रकट होने लगता है। इसके साथ ही वृंदावन की पवित्र रज को माथे पर धारण करना और संतों का संग करना भी इस आध्यात्मिक यात्रा में सहायक माना जाता है।

    भक्ति परंपरा में राधा और कृष्ण के प्रेम को अद्वितीय बताया गया है। उनका संबंध मछली और जल के समान है अलग होते ही अस्तित्व समाप्त हो जाता है। जब राधा और कृष्ण एक साथ होते हैं तो वृंदावन की पूरी प्रकृति उस दिव्य प्रेम में डूब जाती है। पशु-पक्षी तक शांत होकर उस अलौकिक आनंद का अनुभव करने लगते हैं।

    अंततः संतों का संदेश स्पष्ट है कि राधा रानी का स्वरूप देखने के लिए बाहरी नहीं बल्कि आंतरिक दृष्टि की आवश्यकता है। सच्ची भक्ति समर्पण और नाम जप के माध्यम से ही वह क्षण आता है जब भक्त इस दिव्य प्रेम और स्वरूप का अनुभव कर पाता है।