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  • चीनी की बढ़ती कीमतों पर विशेषज्ञों ने साफ किया रुख, एथेनॉल डायवर्जन नहीं बल्कि गन्ने की कमी और कम रिकवरी जिम्मेदार

    चीनी की बढ़ती कीमतों पर विशेषज्ञों ने साफ किया रुख, एथेनॉल डायवर्जन नहीं बल्कि गन्ने की कमी और कम रिकवरी जिम्मेदार

    नई दिल्ली । देश में चीनी की कीमतों में हालिया तेजी को लेकर एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी डायवर्जन को जिम्मेदार ठहराए जाने के बीच कृषि और चीनी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने अलग तस्वीर पेश की है। विशेषज्ञों के मुताबिक मौजूदा तेजी की मुख्य वजह एथेनॉल उत्पादन नहीं, बल्कि गन्ने के उत्पादन, गुणवत्ता और चीनी रिकवरी में आई कमी है। उनका कहना है कि सरकार चीनी की घरेलू जरूरत, एथेनॉल उत्पादन और निर्यात के बीच लगातार संतुलन बनाए रखने की कोशिश करती है।

    नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट, कानपुर के पूर्व निदेशक प्रोफेसर नरेंद्र मोहन के अनुसार देश में हर वर्ष घरेलू खपत के लिए करीब 280 लाख टन चीनी की आवश्यकता होती है। इसके बाद उपलब्ध अतिरिक्त मात्रा में से ही एथेनॉल उत्पादन या निर्यात के लिए चीनी के इस्तेमाल की अनुमति दी जाती है। चालू वर्ष में करीब 31 लाख टन चीनी के बराबर मात्रा एथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल की गई, जबकि लगभग सात लाख टन चीनी का निर्यात हुआ है।

    विशेषज्ञ के मुताबिक चालू वर्ष में देश का चीनी उत्पादन लगभग 306 लाख टन रहा है और इसके साथ पिछले वर्ष का कैरी-ओवर स्टॉक भी उपलब्ध था। सामान्य परिस्थितियों में देश में पर्याप्त बफर स्टॉक रखा जाता है, ताकि उत्पादन या आपूर्ति में अचानक कमी आने की स्थिति में घरेलू बाजार प्रभावित न हो। इसलिए केवल एथेनॉल के लिए चीनी डायवर्जन को मौजूदा कीमत वृद्धि का सीधा कारण मानना उचित नहीं है।

    प्रोफेसर नरेंद्र मोहन ने एथेनॉल को चीनी उद्योग के लिए महत्वपूर्ण बदलाव वाला क्षेत्र बताया। पहले जब देश में चीनी का उत्पादन घरेलू मांग से काफी अधिक हो जाता था, तब अतिरिक्त चीनी की वजह से बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ता था। इससे चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती थी और किसानों को गन्ने का भुगतान मिलने में भी परेशानी पैदा होती थी। निर्यात एक विकल्प जरूर था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों और प्रतिस्पर्धा के कारण यह हमेशा लाभदायक नहीं रहता था।

    ऐसी परिस्थितियों में अतिरिक्त चीनी को एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल करने की नीति ने उद्योग को एक वैकल्पिक बाजार दिया। इससे चीनी की अधिकता को नियंत्रित करने के साथ ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा मिला और पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटाने में भी मदद मिली। विशेषज्ञों के अनुसार सरकार उत्पादन के अनुमान और घरेलू जरूरतों को देखते हुए समय-समय पर एथेनॉल डायवर्जन तथा चीनी निर्यात से जुड़े फैसले ले सकती है।

    बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के गन्ना शोध विभाग के कृषि वैज्ञानिक डॉ. हरिओम ने मौजूदा स्थिति में गुणवत्तापूर्ण गन्ने के उत्पादन और चीनी रिकवरी को महत्वपूर्ण कारक बताया। उनके अनुसार उत्तर भारत में इस समय गन्ना पेराई का अपेक्षाकृत कमजोर दौर चल रहा है। मुख्य पेराई सीजन शुरू होने के बाद बाजार में चीनी की आपूर्ति बढ़ने की संभावना है, जिससे कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।

    गन्ने की फसल अवधि और रिकवरी में राज्यों के बीच अंतर भी चीनी उत्पादन को प्रभावित करता है। उत्तर भारत में किसान सामान्यतः करीब 10 से 11 महीने में तैयार होने वाली फसल लेते हैं, जबकि महाराष्ट्र में गन्ना लगभग 13 से 14 महीने और तमिलनाडु में कुछ परिस्थितियों में 18 महीने तक खेत में रहता है। लंबी अवधि से गन्ने में चीनी संचय और रिकवरी बेहतर हो सकती है।

    डॉ. हरिओम के अनुसार उत्तर भारत में किसान धान की कटाई के बाद अक्टूबर-नवंबर में गन्ने की खेती शुरू करने के साथ गेहूं, सरसों, मसूर, चना और सब्जियों जैसी अंतरवर्ती फसलों का विकल्प अपना सकते हैं। इससे अतिरिक्त आय के अवसर बढ़ सकते हैं और गन्ने की खेती की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में सुधार की संभावना बन सकती है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि चीनी की कीमतों को समझने के लिए केवल एथेनॉल डायवर्जन पर ध्यान देने के बजाय गन्ने के उत्पादन, रिकवरी, पेराई चक्र और बाजार में उपलब्ध स्टॉक को भी समान रूप से देखना जरूरी है।

  • E20 पेट्रोल पर सियासी बहस तेज, कांग्रेस ने गन्ने से इथेनॉल उत्पादन और चीनी कीमतों पर उठाए सवाल

    E20 पेट्रोल पर सियासी बहस तेज, कांग्रेस ने गन्ने से इथेनॉल उत्पादन और चीनी कीमतों पर उठाए सवाल


    नई दिल्ली । 
    देश में चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण वाली E20 नीति को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस ने केंद्र सरकार की इथेनॉल नीति पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि गन्ने और अनाज के एक हिस्से का इस्तेमाल इथेनॉल उत्पादन में होने से खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता और कीमतों पर असर पड़ रहा है।

    कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने दावा किया कि लोगों को एक तरफ सड़क पर वाहन चलाने के दौरान और दूसरी तरफ रसोई में खाद्य सामग्री खरीदते समय कीमत चुकानी पड़ रही है। उन्होंने E20 नीति की दोबारा समीक्षा करने और उपभोक्ताओं को बिना इथेनॉल वाला पेट्रोल उपलब्ध कराने का विकल्प देने की मांग की है।

    कांग्रेस की ओर से चीनी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी को लेकर गन्ने के इस्तेमाल का मुद्दा उठाया गया है। पार्टी का दावा है कि लगभग 25 लाख टन चीनी बनाने में इस्तेमाल होने वाला गन्ना इथेनॉल उत्पादन की ओर गया। जयराम रमेश ने इसी संदर्भ में चीनी और अन्य खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का मुद्दा उठाया।

    उन्होंने दावा किया कि पिछले तीन महीनों में चीनी की कीमत 48 रुपये से बढ़कर 67 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है। कांग्रेस ने गुड़, चावल और मक्के के आटे जैसी कुछ अन्य खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी का उल्लेख किया है। हालांकि, अलग-अलग बाजारों और क्षेत्रों में इन वस्तुओं की कीमतों में अंतर हो सकता है।

    E20 पेट्रोल को लेकर कांग्रेस ने वाहनों के माइलेज का मुद्दा भी उठाया है। पार्टी का कहना है कि पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बढ़ने से कुछ वाहनों में ईंधन दक्षता प्रभावित हो सकती है। खासकर पुराने वाहनों को लेकर भी कांग्रेस ने संभावित तकनीकी समस्याओं की चिंता जताई है।

    कांग्रेस की मांग है कि उपभोक्ताओं को उनकी जरूरत और वाहन की तकनीकी क्षमता के अनुसार बिना इथेनॉल वाला पेट्रोल खरीदने का विकल्प मिलना चाहिए। पार्टी का तर्क है कि ईंधन संबंधी नीतियों में उपभोक्ता हितों और वाहन मालिकों की अलग-अलग जरूरतों को ध्यान में रखना जरूरी है।

    दूसरी ओर, चीनी की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए केंद्र सरकार ने कदम उठाया है। सरकार ने 20 अगस्त को 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी को बिना आयात शुल्क के देश में लाने की मंजूरी दी। इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखना और कीमतों पर दबाव कम करना है।

    दिल्ली में 21 अगस्त को चीनी की कीमत करीब 65 रुपये प्रति किलोग्राम बताई गई। कीमतों में बढ़ोतरी और सरकार के आयात फैसले के बाद E20 नीति को लेकर राजनीतिक चर्चा और तेज हो गई है। कांग्रेस इसे खाद्य महंगाई और वाहन माइलेज से जोड़ रही है, जबकि सरकार का चीनी आयात का कदम बाजार में आपूर्ति बढ़ाने की दिशा में है।

    इथेनॉल मिश्रण नीति का उद्देश्य पेट्रोल में वैकल्पिक ईंधन की हिस्सेदारी बढ़ाना, आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना और किसानों के लिए गन्ने तथा अन्य फीडस्टॉक से अतिरिक्त बाजार तैयार करना रहा है। हालांकि, खाद्य वस्तुओं की कीमतों और वाहन ईंधन दक्षता पर इसके प्रभाव को लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस जारी है।

    आने वाले समय में चीनी की कीमतों, घरेलू आपूर्ति और E20 ईंधन के वास्तविक प्रभाव के आंकड़े इस बहस की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगे। फिलहाल कांग्रेस ने नीति की समीक्षा और उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प देने की मांग को केंद्र में रखा है, जबकि सरकार का ताजा कदम चीनी की उपलब्धता बढ़ाकर बाजार कीमतों को नियंत्रित करने पर केंद्रित है।

  • अतिरिक्त चीनी से सेहत को नुकसान का खतरा, पैक्ड जूस और सॉस में छिपी शुगर के प्रति विशेषज्ञों ने किया आगाह

    अतिरिक्त चीनी से सेहत को नुकसान का खतरा, पैक्ड जूस और सॉस में छिपी शुगर के प्रति विशेषज्ञों ने किया आगाह

    नई दिल्ली ।उत्तम स्वास्थ्य और बेहतर जीवन शैली बनाए रखने के लिए सही खानपान को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ रहने के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि किन चीजों के सेवन से बचा जाना चाहिए। जिन खाद्य पदार्थों को सेहत के लिए सबसे अधिक हानिकारक माना जाता है, उनमें अतिरिक्त चीनी प्रमुख है। अत्यधिक मात्रा में चीनी का सेवन मोटापे, मधुमेह और शरीर में अंदरूनी सूजन जैसी कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकता है।

    आमतौर पर लोग चीनी छोड़ने का अर्थ केवल चाय, कॉफी या मिठाइयों का त्याग करना समझते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल इन चीजों को बंद कर देना ही पर्याप्त नहीं है। रसोई में उपयोग होने वाली और बाजार में मिलने वाली कई अन्य सामान्य चीजों में भी चीनी की भारी मात्रा छिपी हो सकती है। सॉस, टोमैटो केचप, डिब्बाबंद ड्रिंक्स और फ्लेवर्ड दही जैसे पदार्थों में शर्करा की अदृश्य मौजूदगी होती है, जो रोजमर्रा के खानपान में मिठास बढ़ा देती है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, हर मीठी वस्तु का स्वाद मिठाई जैसा तेज होना आवश्यक नहीं है। कई ऐसे प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ हैं जिनका स्वाद नमकीन या सामान्य लगता है, लेकिन उनमें एडेड शुगर मिलाई जाती है। इसलिए, यदि कोई व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से चीनी का सेवन बंद भी कर देता है, तब भी इन प्रसंस्कृत पदार्थों के माध्यम से चीनी शरीर में पहुंचती रहती है। विशेषज्ञों की सलाह है कि दैनिक कुल कैलोरी में एडेड शुगर का हिस्सा 10 प्रतिशत से कम होना चाहिए।

    आहार विशेषज्ञों के मुताबिक एक सामान्य वयस्क के लिए प्रतिदिन 2,000 कैलोरी की डाइट में चीनी की मात्रा लगभग 50 ग्राम यानी 6 से 9 चम्मच से अधिक नहीं होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, महज एक टेबलस्पून टोमैटो केचप में लगभग 4 ग्राम एडेड शुगर हो सकती है। सैंडविच, बर्गर या नाश्ते के साथ नियमित रूप से सॉस का उपयोग करने की आदत कुल चीनी की खपत को चुपचाप बढ़ा देती है। इसी तरह, पैकेज्ड फ्रूट जूस को भी पूरी तरह से स्वास्थ्यवर्धक मानना एक भूल हो सकती है।

    पैकेज्ड जूस में प्राकृतिक फाइबर की कमी होती है और उन्हें संरक्षित रखने के लिए अतिरिक्त चीनी मिलाई जाती है। मध्य प्रदेश सहित देश भर के स्वास्थ्य विशेषज्ञों का सुझाव है कि बाजार से कोई भी पैकेज्ड खाद्य पदार्थ खरीदते समय केवल कैलोरी ही नहीं, बल्कि उसमें मौजूद एडेड शुगर की मात्रा की जांच अवश्य करनी चाहिए। स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने के लिए प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के बजाय प्राकृतिक और ताजा आहार को प्राथमिकता देना ही सबसे बेहतर विकल्प है।

  • 1 अगस्त से चीनी कारोबार पर सख्ती, जमाखोरी रोकने के लिए सरकार ने तय की नई स्टॉक सीमा

    1 अगस्त से चीनी कारोबार पर सख्ती, जमाखोरी रोकने के लिए सरकार ने तय की नई स्टॉक सीमा

    नई दिल्ली । देशभर में चीनी की उपलब्धता बनाए रखने और बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। सरकार ने 1 अगस्त 2026 से 30 नवंबर 2026 तक चीनी के थोक और खुदरा कारोबारियों के लिए स्टॉक सीमा लागू करने का निर्णय लिया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य जमाखोरी और सट्टेबाजी जैसी गतिविधियों पर रोक लगाना है, ताकि त्योहारी सीजन के दौरान उपभोक्ताओं को उचित कीमत पर पर्याप्त मात्रा में चीनी उपलब्ध हो सके।

    नए नियम के अनुसार थोक व्यापारी, खुदरा विक्रेता और बड़े रिटेल स्टोर अधिकतम 4,000 क्विंटल तक ही चीनी का स्टॉक अपने पास रख सकेंगे। इसके साथ ही कारोबारियों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि मिलों से खरीदी गई चीनी को 30 दिनों के भीतर बाजार में बेच दिया जाए। निर्धारित अवधि से अधिक समय तक स्टॉक रोककर रखने की अनुमति नहीं होगी। सरकार का मानना है कि इससे बाजार में कृत्रिम कमी पैदा करने की कोशिशों पर प्रभावी रोक लगाई जा सकेगी।

    सरकार ने कारोबारियों के लिए पारदर्शिता बढ़ाने के उद्देश्य से साप्ताहिक स्टॉक विवरण देना भी अनिवार्य किया है। सभी संबंधित व्यापारियों को प्रत्येक सप्ताह सरकारी पोर्टल पर उपलब्ध चीनी के स्टॉक की जानकारी दर्ज करनी होगी। इससे प्रशासन को बाजार की स्थिति पर लगातार नजर रखने और आवश्यक होने पर त्वरित कार्रवाई करने में सुविधा मिलेगी।

    यह निर्णय ऐसे समय लिया गया है जब त्योहारों के मौसम में चीनी की मांग बढ़ने की संभावना रहती है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मांग बढ़ने के बावजूद बाजार में कृत्रिम संकट उत्पन्न न हो और उपभोक्ताओं को आवश्यक वस्तु उचित मूल्य पर मिलती रहे। साथ ही, चीनी की आपूर्ति श्रृंखला भी सुचारु रूप से संचालित होती रहे।

    सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह आदेश आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत लागू किया जाएगा। यदि कोई व्यापारी निर्धारित स्टॉक सीमा या समयसीमा का उल्लंघन करता पाया जाता है तो उसके विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाएगी। खाद्य विभाग के अधिकारी जांच के दौरान गोदामों का निरीक्षण कर सकेंगे और नियमों के विरुद्ध पाए गए पुराने स्टॉक को जब्त भी किया जा सकता है।

    नियमों का उल्लंघन करने वाले कारोबारियों के खिलाफ व्यापारिक लाइसेंस रद्द करने, संबंधित सरकारी पोर्टल पर पंजीकरण समाप्त करने और अन्य कानूनी कार्रवाई का भी प्रावधान रखा गया है। गंभीर मामलों में दोष सिद्ध होने पर जुर्माना लगाने के साथ-साथ कारावास की सजा भी दी जा सकती है। सरकार का मानना है कि कड़े प्रावधानों से जमाखोरी की प्रवृत्ति पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकेगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि व्यापारियों को अब अपनी खरीद और बिक्री की योजना मांग के अनुरूप बनानी होगी। उन्हें उतनी ही मात्रा में चीनी का स्टॉक रखना होगा, जिसे स्थानीय बाजार में लगभग 20 से 25 दिनों के भीतर आसानी से बेचा जा सके। इससे गोदामों में अनावश्यक भंडारण कम होगा और बाजार में नियमित आपूर्ति बनी रहेगी।

    सरकार को उम्मीद है कि इस व्यवस्था से चीनी की उपलब्धता बेहतर होगी, कीमतों में अनावश्यक उतार-चढ़ाव पर नियंत्रण रहेगा और त्योहारी सीजन के दौरान उपभोक्ताओं को किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा। साथ ही, बाजार में पारदर्शिता बढ़ेगी और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति व्यवस्था अधिक संतुलित बनेगी।

  • गुड़ और चीनी में कौन ज्यादा हेल्दी? जानिए शरीर पर दोनों का असर और एक्सपर्ट राय

    गुड़ और चीनी में कौन ज्यादा हेल्दी? जानिए शरीर पर दोनों का असर और एक्सपर्ट राय

    नई दिल्ली। मीठा खाने की चाहत हर किसी में होती है, लेकिन जब बात सेहत की आती है तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि चीनी और गुड़ में से कौन ज्यादा बेहतर विकल्प है। दोनों ही खाने में मिठास जोड़ते हैं, लेकिन शरीर पर इनका असर अलग-अलग होता है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि रोजमर्रा की जिंदगी में किसका सेवन ज्यादा सुरक्षित और फायदेमंद माना जाता है।

    चीनी को आमतौर पर रिफाइंड प्रक्रिया से तैयार किया जाता है, जिसमें इसके प्राकृतिक पोषक तत्व लगभग खत्म हो जाते हैं और केवल शुद्ध कैलोरी बचती है। यही कारण है कि इसे खाली कैलोरी का स्रोत भी कहा जाता है। दूसरी ओर गुड़ कम प्रोसेस्ड होता है और इसमें कुछ प्राकृतिक खनिज जैसे आयरन, पोटैशियम और कैल्शियम मौजूद रहते हैं, जो शरीर के लिए कुछ हद तक लाभकारी माने जाते हैं।

    गुड़ को पारंपरिक रूप से एक प्राकृतिक मिठास के रूप में देखा जाता है। कई लोग इसे सर्दी-जुकाम में राहत पाने, पाचन सुधारने और शरीर को ऊर्जा देने के लिए उपयोग करते हैं। भोजन के बाद थोड़ी मात्रा में गुड़ खाने की परंपरा भी इसलिए रही है क्योंकि यह डाइजेशन को बेहतर करने में मदद करता है। इसके अलावा महिलाओं में आयरन की कमी को पूरा करने में भी इसे उपयोगी माना जाता है।

    हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि गुड़ पूरी तरह से बिना नुकसान वाला विकल्प है। किसी भी चीज का अत्यधिक सेवन शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है। गुड़ में भी प्राकृतिक शुगर मौजूद होती है, जो अधिक मात्रा में लेने पर कैलोरी बढ़ा सकती है और वजन बढ़ने का कारण बन सकती है। इसलिए संतुलन बेहद जरूरी है।

    वहीं दूसरी ओर सफेद चीनी का अधिक सेवन कई स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा हुआ है। यह शरीर में ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ाती है, जिससे तुरंत ऊर्जा तो मिलती है लेकिन वह जल्दी खत्म भी हो जाती है। लंबे समय तक अधिक चीनी का सेवन मोटापा, डायबिटीज, हृदय रोग और दांतों की समस्याओं का कारण बन सकता है। इसके अलावा यह त्वचा की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को भी तेज कर सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार अगर मीठे का सेवन सीमित मात्रा में किया जाए तो गुड़ चीनी की तुलना में बेहतर विकल्प हो सकता है। रोजाना लगभग 10 से 15 ग्राम गुड़ को सुरक्षित मात्रा माना जाता है, लेकिन यह व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति पर भी निर्भर करता है। सुबह गुनगुने पानी के साथ थोड़ा गुड़ लेना या चाय में चीनी की जगह सीमित मात्रा में गुड़ का उपयोग करना एक बेहतर विकल्प हो सकता है।

    डायबिटीज से पीड़ित लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि गुड़ और चीनी दोनों में प्राकृतिक शुगर होती है जो ब्लड शुगर को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में किसी भी मीठे पदार्थ का सेवन डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही करना चाहिए।

  • चीनी के दाम नियंत्रित करने के लिए सरकार का बड़ा ऐलान… निर्यात पर लगाया प्रतिबंध

    चीनी के दाम नियंत्रित करने के लिए सरकार का बड़ा ऐलान… निर्यात पर लगाया प्रतिबंध


    नई दिल्ली।
    केंद्र सरकार (Central Government) ने बुधवार को बड़ा ऐलान किया. इसमें चीनी के निर्यात (Sugar Export) पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध (Ban Immediate Effect) लगाया गया है. कच्ची, सफेद और रिफाइंड चीनी के निर्यात (एक्सपोर्ट) पर सितंबर 2026 तक रोक रहेगी. इस रोक को आगे भी बढ़ाया जा सकता है. ये फैसला देश में चीनी की कीमतों को कंट्रोल में रखने के लिए किया गया है।

    बता दें कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है. केंद्र सरकार ने बुधवार को एक अधिसूचना में कहा कि उसने 30 सितंबर, 2026 तक या अगले आदेश तक तत्काल प्रभाव से चीनी निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है. बताया गया कि ये स्थानीय कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश है।


    उत्पादन खपत से कम रहने की आशंका

    भारत, ब्राजील के बाद दुनिया का सबसे बड़ा चीनी निर्यातक देश है. भारत ने घरेलू मांग से अधिक उत्पादन की उम्मीद में मिलों को 15 लाख मीट्रिक टन चीनी निर्यात करने की अनुमति दी थी. लेकिन अब आशंका है कि प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में गन्ने की पैदावार कमजोर होने की वजह से उत्पादन लगातार दूसरे वर्ष खपत से कम रहेगा।

    अल नीनो वेदर कंडीशन की वजह से मानसून में रुकावट होने की आशंका है. इसने पैदावार के प्रारंभिक अनुमानों से कम होने के जोखिम को भी बढ़ा दिया है। एक खबर के मुताबिक, डीलरों ने बताया कि निर्यात के लिए स्वीकृत 15 लाख मीट्रिक टन में से व्यापारियों ने लगभग 8 लाख टन के लिए अनुबंध पर हस्ताक्षर किए, जिसमें से 6 लाख टन से अधिक पहले ही भेजा जा चुका है।

    सरकार ने भी कहा है कि जो माल पहले से निर्यात प्रक्रिया में है उनको नहीं रोका जाएगा. अधिसूचना में कहा गया है कि पहले ही माल की लोडिंग शुरू हो चुकी हो तो माल की ढुलाई की अनुमति दी जाएगी. ये अनुमति उन मामलों में भी दी जाएगी जहां शिपिंग बिल दाखिल किया गया हो और जहाज पहले ही किसी भारतीय बंदरगाह पर लंगर डाल चुका हो। भारत द्वारा निर्यात पर प्रतिबंध के ऐलान के बाद न्यूयॉर्क में कच्चे चीनी के वायदा भाव में 2% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि लंदन में सफेद चीनी के वायदा भाव में 3% की उछाल आया।