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  • आतंकवादियों की बहन बयान पर विजय शाह को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: अभियोजन मंजूरी का फैसला राज्यपाल के पास, कोर्ट ने कहा रिपोर्ट पेश करें

    आतंकवादियों की बहन बयान पर विजय शाह को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: अभियोजन मंजूरी का फैसला राज्यपाल के पास, कोर्ट ने कहा रिपोर्ट पेश करें


    भोपाल । मध्य प्रदेश के जनजातीय कार्य मंत्री कुंवर विजय शाह से जुड़े विवादित बयान के मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर दिए गए बयान के बाद दर्ज FIR को चुनौती देने वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जांच और अभियोजन मंजूरी की स्थिति पर जानकारी ली। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के सामने सरकार की ओर से बताया गया कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है और जांच रिपोर्ट फिलहाल सीलबंद है। अब चार्जशीट या क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने से पहले सक्षम प्राधिकारी से अभियोजन की मंजूरी लेना जरूरी है। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि इस मामले में कैबिनेट स्तर पर विचार हो चुका है और फाइल अंतिम निर्णय के लिए राज्यपाल के पास भेजी गई है।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने जांच की स्थिति को लेकर स्पष्ट सवाल किया कि जब जांच रिपोर्ट पूरी तरह तैयार है तो क्या अब केवल सरकार की मंजूरी का इंतजार किया जा रहा है। सरकार की ओर से इसकी पुष्टि की गई। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज ने बताया कि कैबिनेट इस विषय पर विचार कर चुकी है और फाइल राज्यपाल के पास भेजी गई है। उन्होंने उम्मीद जताई कि जल्द ही इस पर अंतिम निर्णय हो जाएगा। सरकार की ओर से मंत्री के माफीनामे का भी हवाला दिया गया। अदालत से अनुरोध किया गया कि सक्षम प्राधिकारी जब मामले पर विचार करे तो विजय शाह की ओर से घटना के अगले दिन सार्वजनिक रूप से मांगी गई माफी को भी ध्यान में रखा जाए।

    विजय शाह की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह ने भी अदालत के सामने यही बात रखी कि मंत्री ने बयान के बाद माफी मांग ली थी और इस तथ्य को रिकॉर्ड पर लिया जाना चाहिए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले के गुण दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की। अदालत ने कहा कि जांच पूरी हो चुकी है और रिपोर्ट सीलबंद है। अभियोजन मंजूरी का विषय फिलहाल सक्षम प्राधिकारी के सामने लंबित है। मंजूरी मिलने के बाद सीलबंद रिपोर्ट को संबंधित सक्षम अदालत के सामने पेश किया जाएगा।

    सुनवाई के दौरान कोर्ट ने जांच अधिकारी और DIG इंटेलिजेंस डी कल्याण चक्रवर्ती की भूमिका को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की। अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी अपना काम पूरा कर चुके हैं इसलिए उन्हें बार बार व्यक्तिगत रूप से अदालत में आने की जरूरत नहीं है। अब सक्षम प्राधिकारी के फैसले के बाद नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी। यदि अभियोजन की मंजूरी नहीं मिलती है तो क्लोजर रिपोर्ट दाखिल किए जाने की बात भी अदालत के सामने रखी गई।

    मामला मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री विजय शाह की उस टिप्पणी से जुड़ा है जो उन्होंने 11 मई 2025 को इंदौर के महू के रायकुंडा गांव में हलमा कार्यक्रम के दौरान कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर की थी। ऑपरेशन सिंदूर के संदर्भ में दिए गए बयान में उन्होंने कर्नल सोफिया को आतंकवादियों की बहन कहकर टिप्पणी की थी। बयान सामने आने के बाद इस पर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मामले का स्वत संज्ञान लिया था और बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर जांच के लिए विशेष जांच दल यानी SIT का गठन किया गया।

    इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले भी मध्य प्रदेश सरकार के रुख पर नाराजगी जता चुका है। अभियोजन की मंजूरी में देरी को लेकर अदालत ने सरकार को सख्त चेतावनी दी थी और कहा था कि उसके निर्देशों का पालन किया जाना चाहिए। पिछली सुनवाई में मंत्री की ओर से कई बार माफी मांगे जाने की दलील भी दी गई थी लेकिन अदालत ने इसे पर्याप्त नहीं माना था।

    अब पूरा मामला अभियोजन की मंजूरी पर टिक गया है। मध्य प्रदेश कैबिनेट ने मंत्री के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी नहीं देने का प्रस्ताव राज्यपाल को भेजा है। राज्यपाल के निर्णय के बाद ही यह तय होगा कि सीलबंद जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे अभियोजन की कार्रवाई होगी या मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की जाएगी।

  • SC की फटकार के बाद FSSAI का बड़ा कदम… खाद्य पदार्थों के पैकेटों पर लिखी होगी चीनी-नमक की मात्रा

    SC की फटकार के बाद FSSAI का बड़ा कदम… खाद्य पदार्थों के पैकेटों पर लिखी होगी चीनी-नमक की मात्रा


    नई दिल्ली।
    सरकार (Government) ने पैक फूड (Packaged food) पर शिंकजे की तैयारी शुरू कर दी है। जिन खाद्य पदार्थों में चीनी (Sugar), फैट और नमक की मात्रा तय मानक से अधिक होगी, उनके पैकेट या डिब्बे के ऊपरी हिस्से पर हाई शुगर, हाई फैट और हाई सॉल्ट के रूप में चेतावनी लाल रंग में अंकित करना अनिवार्य किया जा सकता है।

    भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) (Food Safety and Standards Authority of India – FSSAI) ने जस्टिस जेबी पारदीवाला की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की पीठ के समक्ष दाखिल छह पन्नों के हलफनामे में यह जानकारी दी। कोर्ट को बताया गया कि इससे जुड़ा प्रस्ताव तैयार कर लिया गया है। एफएसएसएआई ने कहा कि यह चेतावनी तस्वीर (षट्भुजाकार) के रूप में अंकित होगी, ताकि ग्राहक आसानी से पहचान सकें कि किन खाद्य पदार्थ में नमक या चीनी जैसे पदार्थ अधिक ‌मात्रा में हैं। इसका फॉन्ट साइज पैकेट के पीछे न्यूट्रिशन की जानकारी देने वाली टेबल में इस्तेमाल होने वाले फॉन्ट साइज से एक पॉइंट बड़ा होगा।


    जनहित याचिका पर सुनवाई

    एफएसएसएआई ने यह हलफनामा सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में लगाई गई फटकार के बाद दाखिल किया है। कोर्ट गैर सरकारी संस्था ‘3एस एंड आवर हेल्थ सोसाइटी’ की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई कर रहा है।


    दो चरणों में लागू होगा

    प्रस्तावित नियम दो चरण में लागू किए जाएंगे, ताकि इंडस्ट्री को उत्पाद दोबारा तैयार करने के लिए पर्याप्त समय मिले। पहले चरण में उन उत्पादों पर नियम लागू होंगे, जिनमें दो या अधिक विशिष्ट पोषक तत्व एडेड फैट, एडेड शुगर या नमक अधिक मात्रा में हों। दूसरे चरण में वे उत्पाद शामिल होंगे, जिनमें एक पोषक तत्व अधिक मात्रा में हो।


    इन उत्पादों को छूट मिलेगी

    हलफनामे में एफएसएसएआई ने कहा है कि सिंगल-इंग्रीडिएंट यानी एक ही चीज से बने खाद्य पदार्थों और उन चीजों को प्रस्तावित नियम से छूट दी जाएगी, जिनमें प्राकृतिक रूप से वसा, चीनी या नमक अधिक होता है। जैसे घी, खाद्य तेल, गुड़ और शहद आदि। हालांकि, खाद्य सुरक्षा, लेबलिंग के बाकी नियमों से छूट नहीं मिलेगी।

  • JPSC Prelims 2025 की परीक्षा पर गंभीर सवाल, सुप्रीम कोर्ट में PIL दाखिल, रद्द करने और स्वतंत्र जांच की मांग

    JPSC Prelims 2025 की परीक्षा पर गंभीर सवाल, सुप्रीम कोर्ट में PIL दाखिल, रद्द करने और स्वतंत्र जांच की मांग


    नई दिल्ली । झारखंड लोक सेवा आयोग की संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा 2025 से जुड़ा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। परीक्षा में कथित अनियमितताओं और गड़बड़ियों को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता हरिश्रन देवगन की ओर से जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में 19 अप्रैल को आयोजित JPSC Prelims 2025 को रद्द करने और कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र तथा निष्पक्ष जांच कराने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI से कराने या सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र समिति गठित करने का अनुरोध किया है। हालांकि अभी यह याचिकाकर्ता की मांग है और इन आरोपों पर अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट को करना है।

    याचिका में कहा गया है कि परीक्षा से जुड़े कथित मामलों की निष्पक्ष तरीके से जांच होना जरूरी है ताकि अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा की जा सके और परीक्षा प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर उठ रहे सवालों का समाधान हो सके। याचिकाकर्ता ने अदालत से यह भी मांग की है कि यदि जांच में अनियमितताएं सामने आती हैं तो 19 अप्रैल को हुई प्रारंभिक परीक्षा को रद्द कर दोबारा परीक्षा आयोजित कराने पर विचार किया जाए। इस मांग के पीछे तर्क दिया गया है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और निष्पक्षता बेहद महत्वपूर्ण होती है क्योंकि हजारों अभ्यर्थी वर्षों की तैयारी के बाद ऐसी परीक्षाओं में शामिल होते हैं।

    याचिका में प्रस्तावित स्वतंत्र जांच समिति की संरचना को लेकर भी विस्तार से मांग रखी गई है। इसके मुताबिक समिति की अध्यक्षता झारखंड से बाहर के किसी सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश या किसी हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश से कराई जा सकती है। इसके अलावा समिति में फोरेंसिक साइंस और आईटी से जुड़े विशेषज्ञों के साथ परीक्षा सुरक्षा विशेषज्ञों को शामिल करने की मांग की गई है। OMR जांच और साइबर सुरक्षा के विशेषज्ञों के अलावा पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन से जुड़े जानकारों को भी समिति का हिस्सा बनाए जाने का सुझाव दिया गया है। इसका उद्देश्य परीक्षा प्रक्रिया से संबंधित प्रत्येक पहलू की तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर जांच करना बताया गया है।

    याचिका में परीक्षा से जुड़े रिकॉर्ड और दस्तावेजों को सुरक्षित रखने की मांग भी की गई है। इसमें मूल OMR शीट से लेकर प्रश्न पत्र और आंसर की तक को संरक्षित रखने की बात कही गई है। इसके साथ ही अभ्यर्थियों से संबंधित बायोमेट्रिक रिकॉर्ड परीक्षा केंद्रों की CCTV फुटेज डिस्पैच रजिस्टर परीक्षा केंद्रों की रिपोर्ट और स्कैनिंग तथा मूल्यांकन से जुड़े रिकॉर्ड भी सुरक्षित रखने का अनुरोध किया गया है। याचिकाकर्ता के मुताबिक ये दस्तावेज किसी भी स्वतंत्र जांच के दौरान महत्वपूर्ण सबूत साबित हो सकते हैं।

    JPSC जैसी प्रतियोगी परीक्षा में पारदर्शिता को लेकर उठने वाले सवाल सीधे तौर पर हजारों अभ्यर्थियों के भविष्य से जुड़े होते हैं। ऐसे में परीक्षा प्रक्रिया में किसी भी तरह की कथित गड़बड़ी की निष्पक्ष जांच की मांग को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल होने के बाद अब इस मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया और अदालत के रुख पर नजर रहेगी। फिलहाल परीक्षा रद्द होगी या नहीं और CBI अथवा किसी स्वतंत्र समिति से जांच कराई जाएगी या नहीं इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। इसलिए याचिका में लगाए गए आरोपों और मांगों को अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जा सकता।

  • महुआ मोइत्रा केस पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर CJP प्रवक्ता ने दी प्रतिक्रिया, उठाए सवाल

    महुआ मोइत्रा केस पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर CJP प्रवक्ता ने दी प्रतिक्रिया, उठाए सवाल


    नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद महुआ मोइत्रा की एक आपराधिक मामले में पुलिस के सामने वर्चुअल पेशी की मांग सुप्रीम कोर्ट ने 7 अगस्त को खारिज कर दी। सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता की टिप्पणी के बाद राजनीतिक हलकों में विवाद खड़ा हो गया है। अब कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रवक्ता सौरव दास ने अदालत की टिप्पणी पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए जज की भूमिका पर सवाल उठाए हैं।

    अंडे फेंके जाने का दिया गया था हवाला

    महुआ मोइत्रा के खिलाफ फेसबुक पोस्ट से जुड़े मामले में एफआईआर दर्ज है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने उन्हें 14 अगस्त को जांच अधिकारी के सामने पेश होने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट में महुआ की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने मांग की थी कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से पुलिस के सामने जाने के बजाय वर्चुअली पेश होने की अनुमति दी जाए।

    वकील ने अदालत को बताया कि पिछली बार अपने निर्वाचन क्षेत्र के पुलिस स्टेशन जाने के दौरान महुआ पर अंडे फेंके गए थे। ऐसे में दोबारा वहां जाने पर भीड़ द्वारा उन्हें निशाना बनाए जाने की आशंका है।

    जस्टिस दीपांकर दत्ता की टिप्पणी पर विवाद

    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने वर्चुअल पेशी की मांग पर राहत देने से इनकार कर दिया। सुनवाई के दौरान जस्टिस दत्ता ने टिप्पणी की कि राजनीति में आने के बाद महुआ को अंडों से डर क्यों लगता है, जबकि स्वतंत्रता सेनानियों ने गोलियां तक अपने सीने पर झेली थीं।

    सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद महुआ मोइत्रा की ओर से दायर याचिका वापस ले ली गई, जिसके बाद अदालत ने उसे खारिज कर दिया।

    CJP प्रवक्ता ने जज पर उठाए सवाल

    अदालत की टिप्पणी के बाद CJP प्रवक्ता सौरव दास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सुप्रीम कोर्ट के जज चाहते हैं कि महुआ मोइत्रा गोलियां खाएं। उन्होंने न्यायाधीशों की नियुक्ति और न्यायिक जवाबदेही को लेकर भी सवाल खड़े किए।

    सौरव दास ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में यह टिप्पणी निंदनीय है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर महुआ मोइत्रा को कुछ होता है तो इसके लिए जस्टिस दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली पीठ जिम्मेदार होगी। उन्होंने न्यायिक जवाबदेही की जरूरत बताते हुए यहां तक कहा कि ऐसे मामलों में जजों को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए या महाभियोग चलना चाहिए।

    CJP संस्थापक ने भी जताई आपत्ति

    CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने भी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर आपत्ति जताई। उन्होंने सवाल किया कि क्या अब अदालत चाहती है कि हर कोई गोलियां खाए। उन्होंने कहा कि यदि संवैधानिक अदालत के न्यायाधीश विपक्षी नेताओं के खिलाफ इस तरह की टिप्पणी करते हैं, तो आम नागरिक के लिए क्या उम्मीद बचती है।

    मोइत्रा को पहले भी मिल चुकी है अंतरिम राहत

    इस मामले से जुड़े एक अन्य प्रकरण में कलकत्ता हाई कोर्ट ने 21 जुलाई को महुआ मोइत्रा को पांच अक्टूबर तक किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई से अंतरिम राहत दी थी। यह मामला कथित तौर पर नफरत फैलाने वाले भाषण से जुड़ा है। महुआ मोइत्रा ने आरोपों को मनगढ़ंत बताया है।

  • रेसीडेंशियल भवनों में कमर्शियल गतिविधियों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आज, भोपाल में बढ़ी हलचल

    रेसीडेंशियल भवनों में कमर्शियल गतिविधियों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आज, भोपाल में बढ़ी हलचल


    भोपाल । भोपाल में आवासीय भवनों के व्यावसायिक उपयोग और अवैध निर्माण का मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। बुधवार को इस महत्वपूर्ण प्रकरण पर सुनवाई होनी है जिसमें याचिकाकर्ता रेसीडेंशियल भूखंडों पर किए गए अवैध निर्माण और उनके व्यावसायिक उपयोग को लेकर अपना पक्ष रखेंगे। मंगलवार को इस मामले में सुनवाई प्रस्तावित थी लेकिन भोपाल से जुड़ी याचिका पर कोई फैसला नहीं हो सका। अब आज होने वाली सुनवाई पर व्यापारियों रहवासियों और प्रशासन की नजरें टिकी हुई हैं।

    याचिकाकर्ता विवेक त्रिपाठी के अनुसार मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने देश की विभिन्न राजधानियों के नगर निगम अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर नाराजगी जताई। अदालत ने अवैध निर्माण के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं करने वाले राज्यों को कड़ी फटकार लगाई और कई राज्यों को स्पष्ट चेतावनी भी दी। हालांकि भोपाल से संबंधित याचिका पर विस्तृत सुनवाई नहीं हो सकी थी इसलिए अब बुधवार को इस मामले पर सुनवाई होने की संभावना है।

    भोपाल में यह पूरा विवाद तब तेज हुआ जब सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद नगर निगम ने आवासीय भवनों में संचालित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की। कई दुकानों और प्रतिष्ठानों को सील किया गया जबकि अनेक व्यापारियों ने कार्रवाई के डर से स्वयं अपने प्रतिष्ठान बंद कर दिए थे। शहर के कई प्रमुख इलाकों में इस कार्रवाई का व्यापक असर देखने को मिला।

    हालांकि बाद में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद सरकार ने व्यापारियों को अंतरिम राहत देने का निर्णय लिया। बैठक में मंत्रियों जनप्रतिनिधियों और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने पूरे मामले की समीक्षा की। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का विस्तृत अध्ययन करने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की एक समिति गठित की जाए। यह समिति पूरे प्रकरण की जांच कर अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपेगी। तब तक व्यापारियों को अनावश्यक रूप से परेशान नहीं किया जाएगा। सरकार के इस निर्णय के बाद शहर के कई इलाकों में बंद दुकानें दोबारा खुल गईं।

    दूसरी ओर इस फैसले का शहर के कई रहवासी संगठनों ने विरोध किया है। अरेरा कॉलोनी रोहित नगर बावड़ियाकलां और अन्य क्षेत्रों के लोगों का कहना है कि आवासीय इलाकों में लगातार बढ़ रही व्यावसायिक गतिविधियों से ट्रैफिक पार्किंग शोर और सुरक्षा जैसी समस्याएं गंभीर होती जा रही हैं। संयुक्त रहवासी संघर्ष समिति के नेतृत्व में लोगों ने पैदल मार्च निकालकर नगर निगम की कार्रवाई को अधूरा बताते हुए अवैध निर्माणों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की मांग की थी।

    याचिकाकर्ता विवेक त्रिपाठी का कहना है कि नगर निगम ने जिन प्रतिष्ठानों को नोटिस जारी किए थे उनके खिलाफ अपेक्षित कार्रवाई पूरी नहीं की गई और बाद में कई प्रतिष्ठान फिर से खुल गए जो सुप्रीम कोर्ट की भावना के अनुरूप नहीं है। उनका मानना है कि नियमों का समान रूप से पालन होना चाहिए और अवैध निर्माण पर किसी भी तरह की ढील नहीं दी जानी चाहिए।

    वहीं भोपाल चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज व्यापारियों के पक्ष में खड़ा है। संगठन का कहना है कि वर्ष 2005 के बाद नया मास्टर प्लान लागू नहीं होने के कारण व्यापारियों के सामने व्यावसायिक भूखंडों की भारी कमी है। ऐसे में कई लोग मजबूरी में आवासीय परिसरों से व्यवसाय संचालित कर रहे हैं। चैंबर ने सरकार से मिक्स लैंड यूज नीति लागू करने और व्यापारियों के लिए स्थायी समाधान निकालने की मांग की है।

    अब सुप्रीम कोर्ट की आज होने वाली सुनवाई से यह तय होगा कि भोपाल में आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों और अवैध निर्माण के मामले में आगे की दिशा क्या होगी। अदालत के फैसले का असर हजारों व्यापारियों रहवासियों और प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ना तय माना जा रहा है।

  • भोपाल के मिक्स लैंड यूज विवाद पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, हजारों भूखंड मालिकों की निगाहें फैसले पर

    भोपाल के मिक्स लैंड यूज विवाद पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, हजारों भूखंड मालिकों की निगाहें फैसले पर


    भोपाल । भोपाल में आवासीय भवनों में वर्षों से संचालित हो रही व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर आज सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होने जा रही है। इस मामले पर शहर के हजारों व्यापारी और बड़ी संख्या में रहवासी नजर बनाए हुए हैं क्योंकि अदालत का फैसला आगे की कार्रवाई की दिशा तय कर सकता है। रहवासियों का कहना है कि वे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई में शामिल होंगे और हाल ही में नगर निगम द्वारा की गई कार्रवाई के फोटो और वीडियो भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत करेंगे।

    दरअसल राजधानी के अरेरा कॉलोनी रोहित नगर बावड़ियाकलां 10 नंबर 11 नंबर और 12 नंबर मार्केट सहित कई इलाकों में लंबे समय से आवासीय भवनों से व्यवसाय संचालित किए जा रहे हैं। इसको लेकर स्थानीय रहवासियों ने लगातार आपत्ति जताई और हाईकोर्ट में याचिका भी दायर की थी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा जहां से सख्त रुख अपनाए जाने के बाद नगर निगम ने कई प्रतिष्ठानों को नोटिस जारी कर कार्रवाई शुरू की। कुछ दुकानों को सील किया गया जबकि कई व्यापारियों ने स्वेच्छा से अपने प्रतिष्ठान बंद कर दिए थे।

    हालांकि इसके बाद मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव की अध्यक्षता में जनप्रतिनिधियों और वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक हुई जिसमें व्यापारियों की समस्याओं पर भी चर्चा की गई। बैठक में निर्णय लिया गया कि पूरे मामले की समीक्षा के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की एक उच्च स्तरीय समिति बनाई जाएगी। यह समिति सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का अध्ययन कर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगी। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि समिति की रिपोर्ट आने तक व्यापारियों को अनावश्यक घबराने की जरूरत नहीं है। इसी निर्णय के बाद सोमवार को अधिकांश बंद दुकानें दोबारा खुल गईं।

    रहवासी संगठन इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद नगर निगम ने अपेक्षित कार्रवाई पूरी नहीं की और जिन प्रतिष्ठानों को बंद किया गया था उनके दोबारा खुलने से अदालत के आदेशों की भावना प्रभावित हुई है। उनका मानना है कि आवासीय क्षेत्रों में लगातार बढ़ती व्यावसायिक गतिविधियों से ट्रैफिक जाम पार्किंग की समस्या शोर प्रदूषण और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां बढ़ रही हैं जिससे लोगों का सामान्य जीवन प्रभावित हो रहा है।

    दूसरी ओर व्यापारी संगठन इस पूरे मामले को व्यावहारिक नजरिए से देखने की मांग कर रहे हैं। भोपाल चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज का कहना है कि वर्ष 2005 के बाद नया मास्टर प्लान लागू नहीं होने के कारण शहर में पर्याप्त व्यावसायिक भूखंड उपलब्ध नहीं हो सके। ऐसी स्थिति में हजारों व्यापारियों ने मजबूरी में आवासीय परिसरों से अपना कारोबार शुरू किया। संगठन का कहना है कि व्यापारी नियमित रूप से व्यावसायिक दर पर संपत्ति कर बिजली बिल और अन्य सभी सरकारी शुल्क का भुगतान कर रहे हैं जिससे शासन को करोड़ों रुपए का राजस्व भी प्राप्त हो रहा है।

    व्यापारियों ने गुजरात की तर्ज पर मिक्स लैंड यूज व्यवस्था लागू करने की मांग दोहराई है ताकि आवासीय क्षेत्रों में नियंत्रित और नियमानुसार व्यवसाय संचालित किए जा सकें। उनका कहना है कि इससे व्यापार भी प्रभावित नहीं होगा और आम नागरिकों को आवश्यक सेवाएं भी अपने क्षेत्र में मिलती रहेंगी।

    अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत के निर्देश न केवल भोपाल बल्कि प्रदेश के अन्य शहरों में भी आवासीय और व्यावसायिक उपयोग से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण आधार साबित हो सकते हैं। सरकार की समीक्षा समिति की रिपोर्ट और न्यायालय के निर्देशों के बाद ही इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद का स्थायी समाधान निकलने की उम्मीद है।

  • सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद भोजशाला के समीप तय स्थल पर अदा हुई जुमे की नमाज, सुरक्षा के रहे कड़े इंतजाम

    सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद भोजशाला के समीप तय स्थल पर अदा हुई जुमे की नमाज, सुरक्षा के रहे कड़े इंतजाम


    धार। मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर के पीछे बाउंड्रीवॉल से सटी खसरा नंबर 612 की भूमि पर शुक्रवार को मुस्लिम समाज के लोगों ने जुमे की नमाज अदा की। यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और जिला प्रशासन व मुस्लिम पक्ष के बीच बनी सहमति के बाद की गई।

    नमाज से पहले प्रशासन ने बारिश के कारण गीली जमीन पर तिरपाल बिछवाए और पूरे क्षेत्र की बैरिकेडिंग कर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की। मौके पर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी लगातार मौजूद रहे।

    निजी जमीन बताकर हिंदू पक्ष ने जताई आपत्ति
    नमाज शुरू होने से पहले स्थानीय हिंदू समाज के कुछ लोगों ने संबंधित भूमि को निजी बताते हुए वहां नमाज की अनुमति का विरोध किया। उनका कहना था कि वे लंबे समय से इस जमीन पर खेती करते आ रहे हैं और यदि आवश्यकता पड़ी तो अपने अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय का रुख करेंगे।

    सूचना मिलने पर एसडीएम राजकुमार हलदर मौके पर पहुंचे और प्रदर्शन कर रहे लोगों से चर्चा कर आश्वासन दिया कि उनकी आपत्तियों पर नियमानुसार सुनवाई की जाएगी। इसके बाद स्थिति सामान्य हो गई।

    मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट के आदेश का पालन करने की बात कही
    कमाल मौला वेलफेयर सोसायटी के प्रतिनिधि अब्दुल समद ने बताया कि खसरा नंबर 611 और 612 से कमाल मौला मस्जिद सीधे दिखाई देती है, इसलिए इस स्थान पर नमाज पढ़ने पर सहमति बनी। उन्होंने कहा कि यदि अगले शुक्रवार तक अदालत का कोई नया अंतरिम या अंतिम आदेश आता है, तो उसका पूरी तरह पालन किया जाएगा।

    सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बनी व्यवस्था
    गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद से जुड़े अपने अंतरिम आदेश को स्पष्ट करते हुए मुस्लिम समाज के लिए भोजशाला के समीप दरगाह परिसर की निर्धारित भूमि पर प्रत्येक शुक्रवार दोपहर 1 से 3 बजे के बीच नमाज की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश राज्य सरकार को दिए थे।

    आदेश के बाद धार कलेक्टर राजीव रंजन मीणा और एसपी सचिन शर्मा ने प्रशासनिक अधिकारियों के साथ स्थल का निरीक्षण किया। देर शाम मुस्लिम समाज के प्रतिनिधियों और जिला प्रशासन के बीच हुई बैठक में खसरा नंबर 611 और 612 की भूमि पर नमाज अदा कराने को लेकर सहमति बनी।
    आदेश के बाद धार कलेक्टर राजीव रंजन मीणा और एसपी सचिन शर्मा ने प्रशासनिक अधिकारियों के साथ स्थल का निरीक्षण किया। देर शाम मुस्लिम समाज के प्रतिनिधियों और जिला प्रशासन के बीच हुई बैठक में खसरा नंबर 611 और 612 की भूमि पर नमाज अदा कराने को लेकर सहमति बनी।

    100 से अधिक नमाजी पहुंचे
    शुक्रवार दोपहर करीब डेढ़ बजे से निर्धारित स्थल पर नमाजी पहुंचने लगे। शुरुआत में 10 से 15 लोग मौजूद थे, लेकिन धीरे-धीरे संख्या बढ़कर 100 से अधिक हो गई। इस दौरान कमाल मौला वेलफेयर सोसायटी के पदाधिकारी और याचिकाकर्ता भी उपस्थित रहे। पूरे आयोजन के दौरान शहर में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए और संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात रहा।

  • सोनम ने किया सरेंडर, अब छह महीने में ट्रायल पूरा करने की चुनौती, जनवरी तक आ सकता है फैसला

    सोनम ने किया सरेंडर, अब छह महीने में ट्रायल पूरा करने की चुनौती, जनवरी तक आ सकता है फैसला


    इंदौर  इंदौर के चर्चित राजा रघुवंशी हत्याकांड में मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी के ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने के बाद अब मामले की सुनवाई निर्णायक चरण में पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के पालन में सोनम ने 29 जुलाई को मेघालय के शिलॉन्ग स्थित ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण किया। इसके साथ ही अब कानूनी प्रक्रिया तेज होने की संभावना जताई जा रही है। विधि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अदालत में सुनवाई तय समय-सीमा के भीतर पूरी होती है तो इस बहुचर्चित मामले में जनवरी 2027 तक फैसला आ सकता है।

    सोनम के सरेंडर के बाद सबसे बड़ा सवाल यह सामने आया है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रायल छह महीने में पूरा करने की जो समय-सीमा तय की गई है, उसकी गणना किस तारीख से होगी। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह अवधि सरेंडर की तारीख से नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट के 23 जुलाई 2026 के आदेश की तारीख से मानी जाएगी। अदालत ने अपने आदेश में कहीं भी यह उल्लेख नहीं किया कि छह महीने की अवधि सरेंडर के दिन से प्रभावी होगी। इसलिए आदेश जारी होने की तारीख ही कानूनी रूप से समय-सीमा का आधार मानी जाएगी।

    कानूनी विशेषज्ञ एडवोकेट आशीष एस. शर्मा के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने 23 जुलाई को सोनम को अंतरिम राहत देते हुए दो महत्वपूर्ण शर्तें रखी थीं। पहली, तीन सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करना और दूसरी, यदि छह महीने के भीतर ट्रायल अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ता या पूरा नहीं होता तो आरोपी को दोबारा जमानत याचिका दाखिल करने की स्वतंत्रता होगी।

    हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि छह महीने की शर्त केवल ट्रायल में देरी के आधार पर दोबारा जमानत मांगने से जुड़ी है। यदि इस दौरान कोई नया कानूनी आधार सामने आता है, जैसे गंभीर स्वास्थ्य समस्या, गवाहों की जिरह में कोई महत्वपूर्ण नया तथ्य या ऐसा कोई कानूनी पहलू जो मामले की दिशा बदल सकता हो, तो आरोपी छह महीने पूरे होने का इंतजार किए बिना भी नई जमानत याचिका दायर कर सकती है।

    अभियोजन पक्ष से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में परिस्थितिजन्य साक्ष्य, इलेक्ट्रॉनिक सबूत, सीसीटीवी फुटेज, डिजिटल रिकॉर्ड और फॉरेंसिक रिपोर्ट अदालत में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। अभियोजन को यह साबित करना होगा कि सभी साक्ष्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और उनकी पूरी श्रृंखला केवल आरोपियों की संलिप्तता की ओर ही संकेत करती है। यदि यह वैज्ञानिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी संदेह से परे सिद्ध हो जाती है, तो इन्हीं के आधार पर दोष सिद्ध होने की संभावना मजबूत होगी।

    विशेषज्ञों के अनुसार सोनम द्वारा तय समय से पहले सरेंडर करना भी कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। इससे यह संदेश जाता है कि उसने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान किया और न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग किया। भविष्य में यदि वह जमानत की मांग करती है तो उसका पक्ष यह तर्क रख सकता है कि उसने अदालत के सभी निर्देशों का समय पर पालन किया और जांच व ट्रायल में पूरा सहयोग दिया। हालांकि केवल समय पर सरेंडर करना जमानत मिलने का स्वतः आधार नहीं बनता।

    अब इस हाई-प्रोफाइल हत्याकांड में अदालत की कार्यवाही, आरोप तय होने की प्रक्रिया, गवाहों की गवाही और वैज्ञानिक साक्ष्यों की जांच पर सभी की नजरें टिकी हैं। यदि सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की अपेक्षित समय-सीमा के अनुसार आगे बढ़ती है तो अगले वर्ष जनवरी तक इस बहुचर्चित मामले में फैसला आने की संभावना जताई जा रही है।

  • भोजशाला विवाद: चालीस पीर वाले प्रस्ताव पर आपत्ति के बाद प्रशासन ने तलाशे दो नए स्थान, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई अहम

    भोजशाला विवाद: चालीस पीर वाले प्रस्ताव पर आपत्ति के बाद प्रशासन ने तलाशे दो नए स्थान, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई अहम


    धार । धार स्थित भोजशाला परिसर में जुम्मे की नमाज के लिए वैकल्पिक स्थान तय करने को लेकर प्रशासन ने अपनी कवायद तेज कर दी है। मुस्लिम समाज की ओर से पहले प्रस्तावित स्थान पर आपत्ति दर्ज कराए जाने के बाद अब जिला प्रशासन ने नए विकल्पों की तलाश शुरू कर दी है। इसी क्रम में सोमवार को अधिकारियों ने डिसलरी रोड क्षेत्र में दो अलग-अलग भूखंडों का निरीक्षण किया, जिन्हें संभावित वैकल्पिक स्थल के रूप में देखा जा रहा है।

    प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार डिसलरी रोड स्थित सर्वे नंबर 509 और सर्वे नंबर 639 की लगभग एक-एक एकड़ जमीन का निरीक्षण किया गया है। इन स्थानों को इसलिए देखा जा रहा है ताकि भविष्य में जुम्मे की नमाज के लिए एक उपयुक्त और व्यवस्थित वैकल्पिक व्यवस्था की जा सके। दोनों स्थल भोजशाला परिसर से लगभग 500 मीटर की दूरी पर बताए जा रहे हैं।

    इससे पहले चालीस पीर के समीप प्रस्तावित स्थान को लेकर मुस्लिम समाज ने आपत्ति जताई थी। इसके बाद मामला न्यायिक प्रक्रिया तक पहुंच गया और अब इस संबंध में दायर याचिका पर 29 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। माना जा रहा है कि शीर्ष अदालत के निर्देशों के बाद ही जुम्मे की नमाज के लिए अंतिम वैकल्पिक स्थान तय किया जाएगा।

    कमाल मौलाना सोसायटी के सदर अब्दुल समद का कहना है कि प्रशासन द्वारा जिन नए स्थानों का निरीक्षण किया गया है, उनकी जानकारी अभी समाज को औपचारिक रूप से नहीं दी गई है। उन्होंने कहा कि मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, इसलिए अदालत के निर्णय का इंतजार किया जा रहा है।

    वहीं जिला प्रशासन का कहना है कि संभावित विकल्पों का निरीक्षण केवल वैकल्पिक व्यवस्था की तैयारियों के तहत किया गया है। अधिकारियों के अनुसार डिसलरी रोड स्थित सर्वे नंबर 509 और 639 की जमीन का मौके पर जाकर निरीक्षण किया गया है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर प्रशासन के पास उपयुक्त विकल्प उपलब्ध रहे।

    अब पूरे मामले में 29 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई अहम मानी जा रही है। अदालत के निर्देशों के बाद ही आगे की प्रशासनिक प्रक्रिया और जुम्मे की नमाज के लिए अंतिम स्थान को लेकर निर्णय लिया जाएगा।

  • राम मंदिर चढ़ावा मामला: SC ने SIT में CA और फोरेंसिक ऑडिटर जोड़ने के दिए निर्देश, दो हफ्ते में मांगी प्रगति रिपोर्ट

    राम मंदिर चढ़ावा मामला: SC ने SIT में CA और फोरेंसिक ऑडिटर जोड़ने के दिए निर्देश, दो हफ्ते में मांगी प्रगति रिपोर्ट


    लखनऊ। अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने जांच को लेकर अहम निर्देश जारी किए। मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि जांच को अधिक निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए विशेष जांच दल (SIT) में एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) और एक फोरेंसिक ऑडिटर को भी शामिल किया जाए।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी प्राथमिकता फिलहाल मामले की निष्पक्ष और प्रभावी जांच सुनिश्चित करना है। CJI ने कहा कि अभी ध्यान केवल जांच की गुणवत्ता पर है और अन्य मुद्दों पर बाद में विचार किया जाएगा।

    सुप्रीम कोर्ट ने विस्तारित SIT को जांच जारी रखने का निर्देश देते हुए तय समय सीमा के भीतर अपनी रिपोर्ट अदालत में पेश करने को कहा। अदालत का मानना है कि वित्तीय विशेषज्ञों के जुड़ने से चढ़ावे और उससे संबंधित लेनदेन की बारीकी से जांच हो सकेगी और यदि किसी प्रकार की वित्तीय गड़बड़ी हुई है तो उसके तथ्य स्पष्ट रूप से सामने आएंगे।

    कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद तय की है। साथ ही निर्देश दिया है कि तब तक SIT जांच की प्रगति रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत करे।