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  • कैंसर के 11,000 के इंजेक्शन के लिए वसूले 1.30 लाख…. SC ने दवाओं की कीमतों पर उठाए सवाल…जताई नाराजगी

    कैंसर के 11,000 के इंजेक्शन के लिए वसूले 1.30 लाख…. SC ने दवाओं की कीमतों पर उठाए सवाल…जताई नाराजगी


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने दवाओं की कीमतों (Medicines Prices) को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने पूछा कि क्या पूरा सिस्टम (Entire System) दवा कंपनियों (Pharmaceutical Companies) की मदद करने में जुटा है? दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) और दुकानदारों को मिलने वाली कीमत (PTR) के बीच भारी अंतर पर नाराजगी जताते हुए अदालत ने कहा कि सरकार की नजरों के सामने यह सब हो रहा है। क्या इस तरह की मनमानी की अनुमति दी जा सकती है?

    दवाओं की कीमतों से जुड़े दो मामलों पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। अदालत ने टिप्पणी की कि यह संस्था पूरी तरह निष्क्रिय नजर आती है।


    कैंसर के इंजेक्शन की कीमत 11 हजार से सीधे 1.30 लाख रुपये कैसे?

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाले एक इंजेक्शन का उदाहरण देते हुए दवाओं की कीमतों में भारी अंतर पर सवाल उठाए।

    अदालत ने बताया कि एक दवा कारोबारी की पत्नी का निजी अस्पताल में कैंसर का इलाज चल रहा था। कारोबारी ने अस्पताल को बताया कि वह खुद दवा विक्रेता है और उसे कीमोथेरेपी का इंजेक्शन 11,000 रुपये में मिलता है। इसके बावजूद अस्पताल ने उसी इंजेक्शन को उस कीमत पर देने से इनकार कर दिया और इसके लिए 1.30 लाख रुपये वसूले। अदालत ने सवाल किया कि इतनी बड़ी कीमत का कोई औचित्य कैसे हो सकता है? आखिर इस अंतर की वजह क्या है और यह पैसा कहां जा रहा है?

    केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी कि भारत में दवाओं की कीमतें दुनिया के कई देशों के मुकाबले कम हैं। इस पर अदालत ने कहा कि जब मरीजों और उनकी जिंदगी का सवाल हो, तो क्या इस तरह की पूंजीवादी सोच अपनाई जानी चाहिए?


    दवाओं की कीमतों पर केंद्र की नीति से संतुष्ट नहीं अदालत

    केंद्र की ओर से कहा गया कि सरकार दवाओं की कीमतों से जुड़ी नीतियों में लगातार बदलाव और सुधार कर रही है। हालांकि, अदालत ने इस दलील पर असहमति जताई। पीठ ने कहा कि सरकार जिस प्रक्रिया को कीमतों में संतुलन बनाने की कोशिश बता रही है, वह बेहद असंगत है। एक इंजेक्शन की कीमत 11,000 रुपये से बढ़कर 1.30 लाख रुपये हो जाना किसी भी तरह से संतुलन बनाने की प्रक्रिया नहीं कहा जा सकता।

    अदालत ने दवाओं की कीमतों में भारी अंतर को लेकर मौजूदा व्यवस्था को ‘लूट और डकैती’ करार दिया। पीठ ने कहा कि इस व्यवस्था का खामियाजा उन मरीजों को भुगतना पड़ रहा है, जो पहले से ही मुश्किल परिस्थितियों में हैं।


    कैंसर की दवाओं पर 30 फीसदी ट्रेड मार्जिन की सीमा

    सुप्रीम कोर्ट ने 12 अक्टूबर को भी कैंसर की दवाओं की कीमतों में भारी बढ़ोतरी पर चिंता जताई थी। अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा था कि जब कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन की सीमा तय की जा सकती है, तो दूसरी दवाओं के मामले में ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत की आलोचना के बाद केंद्र सरकार ने कैंसर की दवाओं पर अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के 30 फीसदी तक ट्रेड मार्जिन की सीमा तय करने का फैसला किया था। इस फैसले पर राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) की 8 अक्टूबर को हुई 151वीं बैठक में विचार किया गया था।

    सरकार के इस कदम से मरीजों को हर साल करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत होने की उम्मीद जताई गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट इस कदम से संतुष्ट नहीं था। अदालत ने कहा कि इस फैसले में मरीजों के लिए खुशी की कोई खास बात नहीं है।


    11 रुपये की सलाइन बाजार में 270 रुपये में बिक रही

    अदालत ने दवाओं और चिकित्सा उत्पादों की कीमतों में अंतर के कई अन्य उदाहरण भी दिए।
    – सलाइन ड्रिप: अदालत ने कहा कि एक सलाइन ड्रिप, जिसकी वास्तविक कीमत 11 रुपये है, बाजार में 270 रुपये में बेची जा रही है।
    – हार्ट स्टेंट: भारत में बने एक कार्डियक स्टेंट की कीमत करीब 5,000 रुपये बताई गई, जबकि अस्पताल इसे 25,000 रुपये से अधिक में बेच रहे हैं।
    – एजिथ्रोमाइसिन: आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले इस एंटीबायोटिक की वास्तविक कीमत करीब 28 रुपये है, जबकि इसे 70 रुपये से अधिक में बेचा जा रहा है।
    – अदालत ने इन उदाहरणों के आधार पर दवाओं और चिकित्सा उत्पादों की कीमतों में अंतर को लेकर सरकार की नीति पर सवाल उठाए।


    सरकार ने क्या दी दलील?

    केंद्र सरकार का कहना है कि दवाओं की कीमतों पर एक सीमा से अधिक नियंत्रण नहीं लगाया जा सकता। सरकार के मुताबिक, कारोबार में पर्याप्त मार्जिन मिलने से दवाओं को दूरदराज के इलाकों तक पहुंचाने में मदद मिलती है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश (DPCO) के तहत आने वाली दवाएं मरीजों तक नहीं पहुंच रही हैं, तो उन्हें उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि असली सवाल यह है कि किन दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे में रखा जाना चाहिए और किन्हें इससे बाहर रखा जाना चाहिए। दवाओं की कीमतों से जुड़े दोनों मामलों में दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

  • रेलवे काउंटर से टिकट लेने वालों को भी मिल सकता है बीमा, सुप्रीम कोर्ट ने 27 अक्टूबर तक कदम उठाने को कहा

    रेलवे काउंटर से टिकट लेने वालों को भी मिल सकता है बीमा, सुप्रीम कोर्ट ने 27 अक्टूबर तक कदम उठाने को कहा


    नई दिल्ली। ट्रेन से सफर करने वाले उन यात्रियों के लिए राहत की उम्मीद है, जो रेलवे स्टेशन के काउंटर से टिकट खरीदते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे को निर्देश दिया है कि काउंटर टिकट पर भी यात्रा बीमा की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए 27 अक्टूबर तक ठोस कदम उठाए जाएं। अदालत ने ऑनलाइन और काउंटर से टिकट खरीदने वाले यात्रियों के बीच बीमा सुविधा को लेकर अंतर पर सवाल उठाए हैं।

    6 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि ऑनलाइन टिकट बुक करते समय यात्रियों को मामूली अतिरिक्त रकम देकर बीमा लेने का विकल्प मिलता है, जबकि काउंटर से टिकट खरीदने वालों के लिए ऐसी व्यवस्था नहीं है। अदालत ने इस अंतर को दूर करने की जरूरत पर जोर दिया।

    पीठ ने कहा कि काउंटर से टिकट लेकर यात्रा करने वाले यात्रियों की संख्या भी काफी है और उनके लिए बीमा की सुविधा महत्वपूर्ण हो सकती है। अदालत के मुताबिक, रेलवे को व्यवस्था तैयार करने के लिए पर्याप्त समय दिया गया था, लेकिन अब तक ठोस प्रगति नहीं हुई। इसी के बाद रेलवे को 27 अक्टूबर तक इस दिशा में कदम उठाने को कहा गया।

    रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था पर भी जताई नाराजगी

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन उनके अनुरूप जमीन पर पर्याप्त बदलाव दिखाई नहीं दे रहे हैं।

    अदालत ने सुरक्षा संबंधी कार्यों के लिए तय बजट का पूरा इस्तेमाल नहीं होने का मुद्दा भी उठाया। इसके साथ ही रेलवे ट्रैक के किनारे बाड़ लगाने के लक्ष्य को पूरा करने में हर साल करीब एक-तिहाई की कमी का जिक्र किया गया। पीठ ने रेलवे से पूछा कि जब सुरक्षा के लिए योजनाएं बनाई जाती हैं, तो उन्हें निर्धारित लक्ष्य के मुताबिक पूरा क्यों नहीं किया जा रहा।

    रेलवे बोर्ड के अधिकारियों से मांगा था जवाब

    सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया था। अदालत चाहती थी कि अधिकारी रेलवे ट्रैक की फेंसिंग के लक्ष्य को पूरा करने में लगातार हो रही देरी के कारणों और सुरक्षा कार्यों की प्रगति के बारे में जवाब दें।

    हालांकि, आदेश लिखवाए जाने के बाद केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी ने अदालत से एक और मौका देने का अनुरोध किया। उन्होंने पिछले साल किए गए काम, फेंसिंग का लक्ष्य पूरा नहीं होने के कारणों और आगे की कार्ययोजना के बारे में हलफनामा दाखिल करने की पेशकश की।

    केंद्र सरकार के इस अनुरोध के बाद रेलवे बोर्ड के अधिकारियों की व्यक्तिगत पेशी के निर्देश पर फिलहाल रोक लगा दी गई। अब रेलवे को हलफनामे के माध्यम से सुरक्षा कार्यों की प्रगति और भविष्य की योजना का विवरण देना होगा।

    यात्रियों को कब मिलेगी सुविधा?

    यदि रेलवे निर्धारित समयसीमा के भीतर जरूरी व्यवस्था करता है, तो काउंटर से टिकट खरीदने वाले यात्रियों को भी यात्रा बीमा लेने का विकल्प मिल सकता है। फिलहाल ऑनलाइन टिकट बुकिंग के दौरान अतिरिक्त रकम देकर बीमा चुनने की सुविधा उपलब्ध है।

    हालांकि, काउंटर टिकट पर बीमा किस तरह मिलेगा, इसके लिए कितनी रकम देनी होगी और बीमा के तहत कितना कवरेज मिलेगा, यह रेलवे की ओर से व्यवस्था स्पष्ट किए जाने के बाद ही पता चलेगा। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश सुविधा लागू करने की दिशा में कदम उठाने से जुड़ा है; इसे सभी काउंटरों पर बीमा शुरू हो जाने की घोषणा नहीं माना जाना चाहिए।

    इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 16 नवंबर को होगी। रेलवे को हलफनामे में अब तक किए गए काम और आगे की योजना की जानकारी देनी होगी। अदालत सुरक्षा संबंधी निर्देशों पर हुई प्रगति की भी समीक्षा करेगी।

  • JCB के आगे लेट गए थे पेट्रोल पंप कर्मचारी, अब सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहत, जमीन विवाद में नया मोड़

    JCB के आगे लेट गए थे पेट्रोल पंप कर्मचारी, अब सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहत, जमीन विवाद में नया मोड़


    शिवपुरी । शिवपुरी के झांसी तिराहा स्थित गांधी पेट्रोल पंप की जमीन को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने के बाद एक नए मोड़ पर आ गया है। मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई हुई जहां मैसर्स जय भारत ऑटोमोबाइल्स की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया गया। इस मामले में शिवपुरी नगर पालिका परिषद और मुख्य नगर पालिका अधिकारी को पक्ष बनाया गया था। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट के अनुसार यह मामला 28 सितंबर को दर्ज हुआ था और मंगलवार को जस्टिस एमएम सुंदरेश तथा जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ के सामने सुनवाई हुई।

    दरअसल गांधी पेट्रोल पंप जिस जमीन पर संचालित हो रहा है उसे शिवपुरी नगर पालिका ने वर्ष 1960 में मैसर्स जय भारत ऑटोमोबाइल्स को लीज पर दिया था। यह लीज 25 साल के लिए थी। इसके लिए 4472 रुपए प्रीमियम तय किया गया था जबकि सालाना किराया 279 रुपए 50 पैसे रखा गया था। इसी जमीन पर बाद में पेट्रोल पंप का संचालन शुरू हुआ। निर्धारित 25 साल की लीज अवधि पूरी होने के बाद जमीन की लीज का नवीनीकरण नहीं कराया गया। इसके बाद नगर पालिका ने जमीन वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी और मामला कानूनी विवाद में बदल गया।

    जमीन खाली कराने को लेकर नगर पालिका और पेट्रोल पंप संचालक के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है। इस मामले में हाईकोर्ट का फैसला नगर पालिका के पक्ष में आया था। इसके बाद नगर पालिका की ओर से जमीन खाली कराने के लिए नोटिस भी जारी किया गया। हालांकि इसके बावजूद जमीन को लेकर विवाद समाप्त नहीं हुआ और मामला आगे बढ़ते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।

    सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज होने के एक दिन पहले ही शिवपुरी में इस जमीन को लेकर काफी हंगामा देखने को मिला था। सोमवार को नगर पालिका अध्यक्ष गायत्री शर्मा जेसीबी और डंपर लेकर गांधी पेट्रोल पंप पहुंची थीं। उद्देश्य जमीन को खाली कराने की कार्रवाई शुरू करना था। जैसे ही जेसीबी से कार्रवाई शुरू करने की कोशिश हुई पेट्रोल पंप के कर्मचारियों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। कुछ कर्मचारी जेसीबी के सामने ही लेट गए जिसके बाद मौके पर स्थिति तनावपूर्ण हो गई।
    सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज होने के एक दिन पहले ही शिवपुरी में इस जमीन को लेकर काफी हंगामा देखने को मिला था। सोमवार को नगर पालिका अध्यक्ष गायत्री शर्मा जेसीबी और डंपर लेकर गांधी पेट्रोल पंप पहुंची थीं। उद्देश्य जमीन को खाली कराने की कार्रवाई शुरू करना था। जैसे ही जेसीबी से कार्रवाई शुरू करने की कोशिश हुई पेट्रोल पंप के कर्मचारियों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। कुछ कर्मचारी जेसीबी के सामने ही लेट गए जिसके बाद मौके पर स्थिति तनावपूर्ण हो गई।

    विरोध के कारण नगर पालिका की कार्रवाई रोकनी पड़ी और करीब दो घंटे तक मौके पर हंगामे की स्थिति बनी रही। इस दौरान जमीन खाली कराने की कोशिश और कर्मचारियों के विरोध के चलते मामला काफी चर्चा में रहा। नगर पालिका की ओर से जमीन पर अपने अधिकार और लीज अवधि पूरी होने का हवाला दिया जा रहा है जबकि पेट्रोल पंप संचालक की ओर से मामले को लेकर कानूनी रास्ता अपनाया गया।

    अब सुप्रीम कोर्ट से याचिका खारिज होने के बाद इस जमीन विवाद में नगर पालिका की आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सोमवार को जेसीबी के सामने कर्मचारियों के विरोध के बाद कार्रवाई रुक गई थी लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले के बाद प्रशासनिक स्तर पर अगला कदम क्या होगा इस पर सभी की नजर बनी हुई है। गांधी पेट्रोल पंप की जमीन को लेकर कई वर्षों से चल रहा यह विवाद अब निर्णायक कार्रवाई की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है।

  • सुप्रीम कोर्ट ने TMC के चार फ्रीज बैंक खातों को संचालित करने की अनुमति देने से किया इनकार

    सुप्रीम कोर्ट ने TMC के चार फ्रीज बैंक खातों को संचालित करने की अनुमति देने से किया इनकार

    नई दिल्ली, 1 अक्टूबर 2026। सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस गुट को चार डेबिट-फ्रीज बैंक खातों को संचालित करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। इन चार खातों में करीब 804 करोड़ रुपये की राशि मौजूद है। TMC गुट ने पश्चिम बंगाल पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत से इन खातों को संचालित करने की अनुमति मांगी थी। न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी. बी. वराले की पीठ ने तत्काल राहत देने से इनकार करते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से भी मना कर दिया, जिसमें खातों को संचालित करने की अंतरिम अनुमति देने से इनकार किया गया था।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह फिलहाल मामले के गुण-दोष में नहीं जा रहा है, क्योंकि मुख्य मामला कलकत्ता हाई कोर्ट में लंबित है। पीठ ने हाई कोर्ट से मामले की सुनवाई जल्द पूरी करने का अनुरोध किया है। अदालत ने कहा कि निर्वाचन आयोग की ओर से चुनाव चिह्न पर रोक लगाए जाने के बाद इन बैंक खातों में मौजूद राशि पर अधिकार किसका है, यह महत्वपूर्ण सवाल अभी न्यायिक निर्णय के लिए लंबित है। ऐसे में शीर्ष अदालत ने इस स्तर पर खातों को संचालित करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि वह हाई कोर्ट के अंतरिम आदेश में हस्तक्षेप नहीं करना चाहती।

    यह मामला पहले फ्रीज किए गए तीन HDFC बैंक खातों से अलग है। TMC गुट ने जिन चार बैंक खातों को संचालित करने की अनुमति मांगी थी, उन्हें डेबिट लेनदेन के लिए फ्रीज किया गया था। पार्टी ने पश्चिम बंगाल पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देते हुए इन खातों के संचालन की अनुमति मांगी थी। TMC गुट की ओर से कहा गया था कि खातों पर रोक के कारण पार्टी के कामकाज पर असर पड़ रहा है और इसलिए इन्हें संचालित करने की अनुमति दी जानी चाहिए। हालांकि, इस मांग पर तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया गया है।

    इससे पहले 27 अगस्त को कलकत्ता हाई कोर्ट ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले TMC गुट को करीब 804 करोड़ रुपये वाले इन चार बैंक खातों को संचालित करने की अंतरिम अनुमति देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद इस आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया गया। शीर्ष अदालत ने अब हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। साथ ही लंबित मामले की सुनवाई जल्द पूरी करने का अनुरोध किया है। इस दौरान अदालत ने खातों में मौजूद राशि पर अधिकार को लेकर उठे सवाल को भी महत्वपूर्ण माना है।

    सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद चारों फ्रीज बैंक खातों को संचालित करने की मांग पर फिलहाल राहत नहीं मिली है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने मामले के मूल विवाद पर कोई अंतिम राय नहीं दी है। अदालत के अनुसार, खातों में मौजूद धन पर अधिकार किसका है, यह सवाल अभी लंबित है और संबंधित न्यायिक प्रक्रिया के जरिए तय किया जाना बाकी है। 1 अक्टूबर को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केवल हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार किया और मामले की सुनवाई जल्द पूरी करने का अनुरोध किया।

  • आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या पर हाईकोर्ट की सख्ती, सरकार ने बताया 6 महीने में 15 हजार का आंकड़ा, 3 नवंबर को होगी अगली सुनवाई

    आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या पर हाईकोर्ट की सख्ती, सरकार ने बताया 6 महीने में 15 हजार का आंकड़ा, 3 नवंबर को होगी अगली सुनवाई


    जबलपुर। मध्यप्रदेश में आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या और सार्वजनिक स्थानों पर लोगों की सुरक्षा को लेकर हाईकोर्ट ने सरकार से अब तक की गई कार्रवाई का ब्यौरा मांगा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दर्ज की है। सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत के सामने सरकार की ओर से उठाए गए कदमों की जानकारी रखी गई। अब इस मामले में 3 नवंबर को दोपहर 2:30 बजे फिर सुनवाई होगी। इसके बाद हाईकोर्ट की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को भेजी जाएगी जहां मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को प्रस्तावित है।

    मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस अल्पेश यशवंत कोगजे और जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बेंच कर रही है। सुनवाई के दौरान अदालत मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता ब्रायन डिसिल्वा ने सरकार की ओर से पेश की गई कार्रवाई और इंतजामों को संतोषजनक बताया। इसके बाद अदालत ने स्पष्ट किया कि 3 नवंबर को सरकार की रिपोर्ट पर विस्तार से विचार किया जाएगा और जरूरत के अनुसार आगे के निर्देश जारी किए जाएंगे।

    दरअसल आवारा कुत्तों की समस्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई निर्देश जारी कर चुका है। 22 अगस्त 2025 और 7 नवंबर 2025 को शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे से जुड़े दिशा निर्देश दिए थे। इसके बाद 19 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाईकोर्ट को इस विषय पर स्वतः संज्ञान लेकर जनहित याचिका दर्ज करने को कहा था। शीर्ष अदालत ने इस समस्या के समाधान तक मामले की लगातार निगरानी करने के निर्देश भी दिए थे। इसी क्रम में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने भी मामले को संज्ञान में लेकर राज्य सरकार से जवाब मांगा।

    हाईकोर्ट के सामने सरकार की ओर से पेश जवाब में बताया गया कि प्रदेश में आवारा कुत्तों की संख्या और उनसे जुड़ी समस्याओं को नियंत्रित करने के लिए नसबंदी और टीकाकरण का अभियान चलाया जा रहा है। सरकार के अनुसार पिछले छह महीनों के दौरान 15 हजार से अधिक आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण किया गया है। सरकार ने सार्वजनिक स्थलों की सुरक्षा और कुत्तों के नियंत्रण से जुड़े दूसरे उपायों की जानकारी भी अदालत के सामने रखी।

    सरकार ने कचरा प्रबंधन और आवारा कुत्तों को सार्वजनिक स्थानों पर भोजन मिलने की समस्या को लेकर भी कदम उठाने की बात कही है। खाद्य सामग्री बेचने वाले वेंडरों को खाद्य अपशिष्ट का उचित निपटान करने के लिए जागरूक किया जा रहा है। उन्हें कचरा बंद डस्टबिन में रखने की सलाह दी जा रही है। इसके साथ ही खान-पान के स्टॉल के आसपास आवारा कुत्तों को भोजन नहीं कराने के लिए भी कहा जा रहा है।

    अब हाईकोर्ट 3 नवंबर को सरकार की ओर से पेश आंकड़ों और उठाए गए कदमों की समीक्षा करेगा। इसके बाद अदालत की ओर से जरूरी निर्देश जारी किए जा सकते हैं। हाईकोर्ट की रिपोर्ट आगे सुप्रीम कोर्ट को भेजी जाएगी और 17 नवंबर को शीर्ष अदालत में इस मामले पर आगे की सुनवाई होगी।

  • कैंसर की दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ₹3,000 की दवा ₹27,000 में मिलने पर उठे सवाल

    कैंसर की दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ₹3,000 की दवा ₹27,000 में मिलने पर उठे सवाल

    नई दिल्ली: में कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की ऊंची कीमतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने दवाओं के प्राइस टू रिटेलर यानी PTR और अधिकतम खुदरा मूल्य यानी MRP के बीच बड़े अंतर पर चिंता जताई। सुनवाई के दौरान कैंसर की एक दवा का उदाहरण देते हुए बताया गया कि करीब 3,000 रुपये की PTR वाली दवा का MRP 27,000 रुपये है। अदालत ने सवाल किया कि जब दवा की कीमत रिटेलर के लिए करीब 3,000 रुपये है, तो उसका अधिकतम खुदरा मूल्य 27,000 रुपये क्यों रखा गया है। अदालत ने यह भी पूछा कि आवश्यक दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे से बाहर क्यों रखा गया है।

    सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर यानी DPCO के तहत आवश्यक और गैर-आवश्यक दवाओं के बीच अंतर पर भी सवाल उठाए। पीठ ने पूछा कि जरूरी दवाओं के लिए एक समान मूल्य निर्धारण मानदंड क्यों नहीं अपनाया जा सकता। अदालत ने कॉरपोरेट अस्पतालों में दवाओं की बिक्री की व्यवस्था का मुद्दा भी उठाया। पीठ ने कहा कि मरीजों को अक्सर अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसी से ही दवाएं खरीदने के लिए कहा जाता है। अदालत ने सरकारी योजनाओं के तहत इलाज करा रहे मरीजों की दवाओं के खर्च को लेकर भी सवाल किया और कहा कि अंततः इसका बोझ करदाताओं पर पड़ता है।

    केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुनवाई के दौरान कहा कि ऐसा समाधान तलाशने की जरूरत है, जिसमें सभी पक्षों के हितों के बीच संतुलन बना रहे। अदालत ने दवाओं की कीमतों में अंतर और आवश्यक दवाओं के मूल्य नियंत्रण से जुड़े मुद्दों पर सुनवाई जारी रखी। कैंसर की दवा के PTR और MRP के बीच सामने आए भारी अंतर को लेकर अदालत ने यह जानने की कोशिश की कि दवाओं की कीमत तय करने की मौजूदा व्यवस्था में इतना बड़ा अंतर क्यों मौजूद है। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को निर्धारित की गई है।

    दूसरी ओर, केरल हाई कोर्ट ने भी सस्ती जीवनरक्षक कैंसर दवाओं की उपलब्धता को लेकर केंद्र सरकार की शक्तियों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने पेटेंट अधिनियम, 1970 का उल्लेख करते हुए कहा कि सार्वजनिक हित में केंद्र सरकार के पास जीवनरक्षक दवाओं के निर्माण और आपूर्ति की व्यवस्था करने की शक्ति है। जरूरत पड़ने पर सरकार किसी कंपनी को दवा बनाने के लिए निर्देश दे सकती है। यह मामला महंगी कैंसर दवाओं को लेकर जून 2022 में दाखिल याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ता की सुनवाई पूरी होने से पहले ही मृत्यु हो गई थी। अदालत ने कहा कि सरकार को सस्ती दवाओं की जरूरत, मरीजों की संख्या और सब्सिडी से होने वाले लाभ का आकलन करना चाहिए। हालांकि, हाई कोर्ट ने तत्काल दवाओं का उत्पादन शुरू करने का आदेश नहीं दिया।

    इन दोनों मामलों में कैंसर के इलाज की बढ़ती लागत, दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता और आम मरीजों के लिए सस्ती जीवनरक्षक दवाओं की उपलब्धता से जुड़े मुद्दे सामने आए हैं। सुप्रीम कोर्ट में दवाओं के PTR और MRP के बीच बड़े अंतर पर सवाल उठे हैं, जबकि केरल हाई कोर्ट ने सार्वजनिक हित में सरकार के पास मौजूद कानूनी शक्तियों पर टिप्पणी की है। दोनों सुनवाइयों में दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था और मरीजों पर पड़ने वाले खर्च से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा हुई है।

  • CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते करेगा सुनवाई, आयोग के फैसलों की प्रक्रिया पर उठे सवाल

    CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते करेगा सुनवाई, आयोग के फैसलों की प्रक्रिया पर उठे सवाल


    नई दिल्ली।
    मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते सुनवाई करेगा। मामले को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के सामने उठाया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने मामले में जल्द सुनवाई की मांग रखी, जिसके बाद अदालत ने याचिका को अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति दी। याचिका में यह सवाल उठाया गया है कि क्या चुनाव आयोग जैसे बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्थान से जुड़े फैसले अकेले मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा लिए जा सकते हैं।

    याचिका में आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग के नाम पर कुछ फैसले चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की मंजूरी के बिना लिए गए। इसमें कहा गया है कि आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 और 2023 के संबंधित कानून की धारा 18 के तहत सामूहिक रूप से फैसले लेने की प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। याचिका में चुनाव आयोग के बहुसदस्यीय स्वरूप, निर्णय लेने की प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियों से जुड़े कई मुद्दे उठाए गए हैं। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने समेत कई मांगें भी की गई हैं।

    मामले में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से सवाल उठाया गया है कि SIR से जुड़े फैसले पूरे आयोग की सहमति या बहुमत से लिए गए थे या नहीं। याचिका में दावा किया गया है कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कम से कम 14 मामलों में आपत्ति दर्ज की। इन आपत्तियों को चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया से जोड़कर देखा गया है और इसी आधार पर याचिका में आयोग के सामूहिक निर्णय लेने के अधिकार तथा प्रक्रिया की जांच की मांग की गई है।

    याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई से जुड़ी मांगों के साथ यह भी कहा गया है कि आयोग में निहित सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप होना चाहिए। याचिकाकर्ता ने अदालत से यह स्पष्ट करने की मांग की है कि आयोग के नाम पर लिए गए फैसलों में सभी सदस्यों की भूमिका और सहमति किस तरह रही। इस मामले का एक प्रमुख हिस्सा SIR से जुड़े निर्णय हैं, जिनको लेकर याचिका में यह जानने की मांग की गई है कि संबंधित फैसले सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर लिए गए थे या नहीं।

    वहीं, चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज किया है। आयोग का कहना है कि दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से कैबिनेट सचिव को भेजे गए पत्र प्रशासनिक मुद्दों से जुड़े थे और उनका SIR या आयोग के नीतिगत फैसलों से संबंध नहीं था। ऐसे में अब सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की निर्णय लेने की प्रक्रिया, मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियों और SIR से जुड़े फैसलों को लेकर उठाए गए सवालों पर सुनवाई होगी। अदालत अगले सप्ताह इस मामले में याचिका में की गई मांगों और उठाए गए मुद्दों पर विचार करेगी।

  • ‘अरे! कम से कम एक साल का समय दीजिए’; TMC के चुनाव चिह्न विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी का तंज

    ‘अरे! कम से कम एक साल का समय दीजिए’; TMC के चुनाव चिह्न विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी का तंज


    नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को समयसीमा में फैसला लेने का निर्देश दिया है। इस आदेश पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ ने तंज कसा है। पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास ने व्यंग्य करते हुए कहा कि चुनाव आयोग को इस मामले में कम से कम एक साल का समय दिया जाना चाहिए था।

    दरअसल, TMC के दो प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच पार्टी के नाम और ‘फूल और घास’ वाले चुनाव चिह्न को लेकर विवाद चल रहा है। चुनाव आयोग ने 18 सितंबर को अंतरिम व्यवस्था के तहत मूल पार्टी के नाम और आरक्षित चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। इसके बाद दोनों गुटों को उपचुनाव के लिए अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए गए।

    सुप्रीम कोर्ट ने चार हफ्ते में दलीलें पूरी करने को कहा

    सोमवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने दोनों गुटों को चुनाव आयोग के समक्ष अपनी दलीलें और जरूरी दस्तावेज दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया। इसके बाद चुनाव आयोग को दोनों पक्षों की दलीलें पूरी होने के तीन महीने के भीतर विवाद पर फैसला करने का निर्देश दिया गया है। इस तरह पूरी प्रक्रिया के लिए प्रभावी तौर पर करीब चार महीने की समयसीमा तय हुई है।

    पीठ ने कहा कि दोनों पक्ष चार सप्ताह के भीतर अपने हलफनामे, अतिरिक्त हलफनामे और अन्य जरूरी सामग्री रिकॉर्ड पर रखें। इसके बाद चुनाव आयोग मामले पर निर्णय लेगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई असाधारण कठिनाई सामने आती है तो आयोग दोबारा अदालत का रुख कर सकता है।

    चुनाव आयोग ने मांगा था छह महीने का समय

    सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि ऐसे विवादों में बड़ी संख्या में दस्तावेज और हलफनामे जमा होते हैं, जिनकी जांच में समय लगता है। आयोग की ओर से मामले का फैसला करने के लिए छह महीने का समय मांगा गया था।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने छह महीने की मांग स्वीकार नहीं की। पीठ ने तीन महीने की अवधि को पर्याप्त माना।

    क्या है पूरा विवाद?

    TMC में संगठनात्मक विवाद के बाद दो गुट पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर अपना दावा कर रहे हैं। चुनाव आयोग ने विवाद का अंतिम निपटारा होने तक दोनों गुटों को मूल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल और घास’ चिह्न के इस्तेमाल से रोकते हुए अंतरिम तौर पर अलग-अलग नाम और प्रतीक दिए हैं।

    सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश इसी विवाद के अंतिम निपटारे की समयसीमा से जुड़ा है। अब दोनों पक्षों को चार सप्ताह में चुनाव आयोग के समक्ष अपना पक्ष पूरा करना होगा और उसके बाद आयोग को तीन महीने के भीतर अपना फैसला देना होगा।

  • मरीज इलाज के लिए घर गहने बेचते हैं फिर दवा पर इतनी बड़ी कीमत क्यों सुप्रीम कोर्ट ने अफसरों से पूछा सवाल

    मरीज इलाज के लिए घर गहने बेचते हैं फिर दवा पर इतनी बड़ी कीमत क्यों सुप्रीम कोर्ट ने अफसरों से पूछा सवाल


    नई दिल्ली । कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का इलाज करा रहे मरीजों को महंगी दवाओं से राहत दिलाने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान दवाओं की कीमतों में भारी अंतर पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने एक ऐसी दवा का उदाहरण सामने आने पर हैरानी जताई जिसकी रिटेल कीमत और एमआरपी में करीब दस गुना का अंतर बताया गया। कोर्ट के सामने कहा गया कि जिस दवा की कीमत रिटेलर्स को करीब 2700 रुपये में मिल रही है उसकी एमआरपी 27000 रुपये तक रखी गई है। इस पर पीठ ने सवाल उठाया कि मरीजों से इस तरह की कीमत कैसे वसूली जा सकती है।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ जरूरी कैंसर दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने की मांग से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि कैंसर के मरीज पहले ही बीमारी और इलाज के खर्च का सामना कर रहे हैं। ऐसे में जरूरी दवाओं की कीमतों में इस तरह का अंतर बेहद गंभीर विषय है। कोर्ट ने यह भी कहा कि कई परिवार इलाज का खर्च जुटाने के लिए अपनी संपत्ति और गहने तक बेच देते हैं। ऐसे हालात में दवाओं की कीमत में अत्यधिक बढ़ोतरी मरीजों और उनके परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालती है।

    सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में उन अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाया जिनकी जिम्मेदारी दवाओं की कीमतों पर नजर रखने और अनुचित मूल्य वृद्धि के खिलाफ कार्रवाई करने की है। अदालत ने पूछा कि जब संबंधित अधिकारियों के पास दवाओं की कीमतों को लेकर निगरानी और कार्रवाई की जिम्मेदारी है तो फिर इस तरह का अंतर कैसे बना हुआ है। पीठ ने अधिकारियों की निष्क्रियता पर भी नाराजगी जाहिर की।

    याचिका में केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों से जरूरी दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कदम उठाने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि दवा कंपनियों और खुदरा विक्रेताओं की ओर से आवश्यक दवाओं के लिए अत्यधिक कीमत वसूले जाने पर रोक लगनी चाहिए। उनका उद्देश्य यह है कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को जरूरी दवाएं ऐसी कीमत पर उपलब्ध हों जिसे वे वहन कर सकें।

    सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा कि सरकार इस मामले को केवल दो पक्षों के बीच सामान्य मुकदमेबाजी के तौर पर नहीं देख रही है। इससे संकेत मिलता है कि केंद्र भी मामले से जुड़े व्यापक पहलुओं पर विचार कर रहा है। अदालत ने दवाओं की कीमत तय करने और मरीजों को उचित कीमत पर दवा उपलब्ध कराने के मुद्दे को महत्वपूर्ण माना है।

    मामले में जेनेरिक दवाओं का मुद्दा भी सामने आया। एक याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि पंजीकृत चिकित्सा पेशेवरों द्वारा जेनेरिक दवाएं नहीं लिखे जाने की समस्या के कारण भी गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को परेशानी होती है। अगर समान चिकित्सकीय उपयोग वाली कम कीमत की दवाएं उपलब्ध हैं तो उनके इस्तेमाल को लेकर भी व्यवस्था पर सवाल उठाए गए हैं।

    सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि जरूरी दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता और उचित मूल्य निर्धारण महत्वपूर्ण मुद्दा है। अदालत की सख्त टिप्पणियों के बाद अब नजर इस बात पर रहेगी कि केंद्र सरकार और संबंधित नियामक एजेंसियां दवाओं की कीमतों को लेकर क्या कदम उठाती हैं। मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को होनी है। उस सुनवाई में दवाओं की कीमतों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका को लेकर आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

  • सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी पर उठाए सवाल….600 से ज्यादा मौतों का जिक्र कर गिनाए 5 बड़े नुकसान

    सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी पर उठाए सवाल….600 से ज्यादा मौतों का जिक्र कर गिनाए 5 बड़े नुकसान


    नई दिल्ली।
    शराबबंदी (Alcohol Prohibition) के असर पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने इससे जुड़ी पांच प्रमुख ‘बुराइयां’ गिनाई हैं। कोर्ट ने कहा कि शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने से राजस्व का नुकसान, प्रतिबंध लागू कराने पर खर्च, पुलिस में भ्रष्टाचार, अवैध शराब बनाने और नशीली दवाओं (Narcotic drugs) से जुड़ी समस्या जैसे खतरे पैदा हो सकते हैं।

    जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने यह टिप्पणी महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स के नियम 18A और 18B को रद्द करते हुए की। इन नियमों के तहत मेथनॉल की खरीद को नियंत्रित किया गया था और गैर-दवा निर्माताओं को इसकी बिक्री से पहले उसमें कड़वा पदार्थ और रंग मिलाना अनिवार्य किया गया था।


    कोर्ट ने शराबबंदी से जुड़े 5 ‘नुकसान’ गिनाए

    सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी से जुड़े जिन पांच पहलुओं की ओर इशारा किया, वे हैं-
    – राजस्व का नुकसान
    – शराबबंदी लागू कराने पर होने वाला खर्च
    – पुलिस में भ्रष्टाचार
    – अवैध तरीके से शराब बनाने का बढ़ता कारोबार
    – नशीली दवाओं से जुड़ी समस्या
    पीठ ने गुजरात और दूसरे राज्यों में जहरीली शराब से हुई घटनाओं का भी जिक्र किया।


    गुजरात में 600 से ज्यादा लोगों की मौत का जिक्र

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने कहा कि हाल में गुजरात के भावनगर और मध्य प्रदेश के सागर में हुई जहरीली शराब की घटनाएं अधिकारियों के लिए चेतावनी हैं। इन दोनों घटनाओं में क्रमशः 13 और 15 लोगों की जान गई थी। पीठ ने कहा कि इतिहास बताता है कि पूरी तरह शराबबंदी कई बार शराब के कारोबार को भूमिगत कर देती है। इससे बिना नियमन वाली और जानलेवा शराब के चलन का खतरा बढ़ जाता है।

    कोर्ट ने गुजरात का उदाहरण देते हुए कहा कि राज्य में सख्त शराबबंदी नीति है। पीठ के मुताबिक, राज्य के गठन और देश की आजादी के बाद से वहां कम से कम 10 बड़ी जहरीली शराब त्रासदियां हो चुकी हैं, जिनमें 600 से अधिक लोगों की मौत हुई है।


    1991 में मेथनॉल वाली जहरीली शराब से 93 मौतें

    सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में बनाए गए नियमों की पृष्ठभूमि का भी उल्लेख किया। ये नियम 1991 में मुंबई में मेथनॉल मिली नकली शराब पीने से 93 लोगों की मौत के बाद बनाए गए थे। इन नियमों में मेथनॉल की खरीद पर रोक-टोक और गैर-दवा निर्माताओं को इसकी बिक्री से पहले उसमें कड़वा पदार्थ और रंग मिलाने की शर्त रखी गई थी।

    महाराष्ट्र सरकार की दलील खारिज
    सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की याचिका को स्वीकार नहीं किया और कहा कि संबंधित नियमों का जहरीली शराब की घटनाओं को रोकने के उद्देश्य से कोई तार्किक संबंध दिखाई नहीं देता। पीठ ने स्पष्ट किया कि वह राज्य की मंशा पर सवाल नहीं उठा रही है। हालांकि, केवल अच्छी मंशा किसी नियम को मनमानेपन की कसौटी पर सही साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

    कोर्ट ने कहा कि राज्य यह बताने में असफल रहा कि मेथनॉल में कड़वा पदार्थ और रंग मिलाने की प्रक्रिया लगातार उसके इस्तेमाल को रोकने या हतोत्साहित करने में कैसे प्रभावी होगी।


    ‘दूसरे मिलावटी पदार्थों से नकली शराब बनाने से कैसे रोकेंगे?’

    पीठ ने यह सवाल भी उठाया कि इन पदार्थों को मिलाने से जहरीली शराब पीने से होने वाली मौतों को निश्चित तौर पर कैसे रोका जा सकेगा। कोर्ट के मुताबिक, एक और अहम सवाल का जवाब भी नहीं दिया गया है- अगर मेथनॉल में कुछ पदार्थ मिलाए जाते हैं, तो दूसरे मिलावटी पदार्थों का इस्तेमाल करके नकली शराब बनाने पर रोक कैसे लगेगी। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के संबंधित नियमों को रद्द कर दिया।