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  • TET अनिवार्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “नौकरी नहीं, पहले बच्चों की शिक्षा सोचें”, फैसला सुरक्षित

    TET अनिवार्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “नौकरी नहीं, पहले बच्चों की शिक्षा सोचें”, फैसला सुरक्षित



    नई दिल्ली। शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षकों की याचिकाओं पर कड़ा रुख अपनाते हुए अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि शिक्षकों को केवल अपनी नौकरी बचाने की चिंता में नहीं रहना चाहिए, बल्कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की जिम्मेदारी को भी समझना चाहिए।

    यह मामला उन याचिकाओं से जुड़ा है, जो मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल के शिक्षक संघों द्वारा दायर की गई थीं। इन याचिकाओं में 2025 के उस फैसले की समीक्षा की मांग की गई थी, जिसमें कहा गया था कि कक्षा 1 से 8 तक के सभी सेवारत शिक्षकों को दो साल के भीतर TET पास करना अनिवार्य होगा, अन्यथा उन्हें सेवा से हटाया जा सकता है या अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी जा सकती है।

    सुनवाई के दौरान जस्टिस मनमोहन और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने स्पष्ट किया कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act 2009) का उद्देश्य बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है और इसके लिए योग्य शिक्षकों का होना बेहद जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि जब तक बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं मिलेगी, तब तक उनके समग्र विकास की कल्पना नहीं की जा सकती।

    तमिलनाडु सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि इस फैसले से राज्य में लगभग चार लाख शिक्षक प्रभावित हो सकते हैं और कई स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी हो जाएगी। इस पर अदालत ने कहा कि केवल नौकरी बचाने के तर्क से बच्चों के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

    जस्टिस दत्ता ने सुनवाई के दौरान कड़ा शब्दों में कहा कि यह सोच सही नहीं है कि कोई सिर्फ अदालत से आदेश लेकर अपनी नौकरी सुरक्षित करना चाहता है, जबकि बच्चों की शिक्षा के बारे में गंभीरता से विचार न किया जाए।

    वहीं कुछ याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि लंबे समय से सेवा दे रहे अनुभवी शिक्षकों पर TET लागू करना अनुचित है और इससे लाखों शिक्षकों की नौकरी प्रभावित होगी। इस पर अदालत ने कहा कि शिक्षा की गुणवत्ता सर्वोपरि है और कानून के अनुसार न्यूनतम योग्यता का पालन जरूरी है।

    सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले पर विस्तार से सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब देशभर के लगभग 25 लाख से अधिक शिक्षकों की नजर इस फैसले पर टिकी हुई है, क्योंकि इसका सीधा असर उनकी नौकरी और सेवा शर्तों पर पड़ सकता है।

  • सुप्रीम कोर्ट में तीखी टिप्पणी से मचा विवाद, CJI सूर्यकांत ने युवाओं और एक्टिविस्ट्स पर कही बड़ी बात

    सुप्रीम कोर्ट में तीखी टिप्पणी से मचा विवाद, CJI सूर्यकांत ने युवाओं और एक्टिविस्ट्स पर कही बड़ी बात



    नई दिल्ली। सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी करते हुए कुछ युवाओं और एक्टिविस्ट्स को लेकर सख्त शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि समाज में ऐसे लोग भी मौजूद हैं जो न तो किसी पेशे में स्थिर होते हैं और न ही किसी जिम्मेदारी से जुड़े होते हैं, और बाद में वे विभिन्न मंचों से सिस्टम की आलोचना करने लगते हैं।

    यह टिप्पणी उस समय आई जब जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच एक याचिकाकर्ता की सीनियर एडवोकेट बनने की मांग पर सुनवाई कर रही थी। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के आचरण और सोशल मीडिया पर इस्तेमाल की गई भाषा पर भी सवाल उठाए।

    सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि कुछ लोग बिना स्थायी पेशे या जिम्मेदारी के अलग-अलग मंचों पर सक्रिय होकर सिस्टम पर लगातार हमला करते हैं। हालांकि अदालत की टिप्पणी को लेकर अब बहस भी शुरू हो गई है और इसे लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

    कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सीनियर एडवोकेट का दर्जा कोई स्टेटस सिंबल नहीं है, बल्कि यह योग्यता, अनुभव और पेशेवर योगदान के आधार पर दिया जाने वाला सम्मान है। बेंच ने कहा कि इस पद को पाने के लिए प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है और इसे केवल प्रतिष्ठा के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। इस पूरे मामले के बाद न्यायिक भाषा और सार्वजनिक टिप्पणियों की मर्यादा को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।

  • अरावली पर्वतमाला विवाद पर SC की टिप्पणी, पर्यावरण सुरक्षा को बताया सर्वोच्च प्राथमिकता

    अरावली पर्वतमाला विवाद पर SC की टिप्पणी, पर्यावरण सुरक्षा को बताया सर्वोच्च प्राथमिकता


    नई दिल्ली । देश की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली पर्वतमाला को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सख्त और महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने संकेत दिया है कि इस पूरे मामले में पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी और जब तक सभी पहलुओं पर पूरी तरह संतुष्टि नहीं मिलती, तब तक किसी भी प्रकार की खनन गतिविधियों को लेकर कोई राहत देने पर विचार नहीं किया जाएगा।

    सुनवाई के दौरान न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसे अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला क्षेत्र में चल रही खनन गतिविधियों को लेकर लगातार गंभीर और चिंताजनक प्रतिक्रियाएं प्राप्त हो रही हैं। इन प्रतिक्रियाओं को देखते हुए अदालत ने फिलहाल खनन पट्टा धारकों के पक्ष में कोई भी आदेश पारित करने से इनकार कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि यह मामला केवल कानूनी नहीं बल्कि गहरे पारिस्थितिकीय प्रभावों से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसमें अत्यधिक सावधानी आवश्यक है।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस मामले की सुनवाई को टुकड़ों में नहीं करेगा, बल्कि सभी पहलुओं पर एक साथ विचार करेगा। अदालत ने यह संकेत दिया कि जब तक पूरे मामले की व्यापक समीक्षा नहीं हो जाती, तब तक किसी भी नई गतिविधि या निर्णय की अनुमति नहीं दी जाएगी। यह टिप्पणी इस बात को दर्शाती है कि न्यायालय इस पर्यावरणीय मुद्दे को बेहद गंभीरता से देख रहा है।

    इससे पहले भी न्यायालय ने अरावली पर्वतमाला की परिभाषा को लेकर महत्वपूर्ण कदम उठाए थे और विशेषज्ञों की एक समिति से सुझाव मांगे थे। इस समिति ने सुझाव दिया था कि स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली संरचना को अरावली पहाड़ी माना जाए, जबकि 500 मीटर के भीतर स्थित दो या अधिक पहाड़ियों के समूह को अरावली पर्वतमाला के रूप में परिभाषित किया जाए। हालांकि, इस परिभाषा को लेकर कई पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों के बीच चिंता भी जताई गई थी।

    न्यायालय ने यह भी माना कि इस परिभाषा के लागू होने से कुछ क्षेत्रों में पर्यावरणीय संरक्षण की स्थिति प्रभावित हो सकती है, जिस पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। इसी कारण अदालत ने पहले दिए गए आदेशों को अस्थायी रूप से स्थगित भी किया था और सभी खनन गतिविधियों पर रोक लगाने का निर्देश दिया था।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी खनन पट्टे को रद्द किया जाता है, तो संबंधित पक्ष को उसे चुनौती देने का पूरा अधिकार होगा। लेकिन वर्तमान परिस्थिति में किसी भी तरह का पक्षपातपूर्ण आदेश देने से बचा जाएगा। अदालत का यह रुख स्पष्ट करता है कि पर्यावरण और पारिस्थितिकी से जुड़े मामलों में न्यायालय संतुलित और सतर्क दृष्टिकोण अपना रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली पर्वतमाला न केवल पर्यावरणीय संतुलन के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह क्षेत्र भू-जल संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और जैव विविधता के लिए भी अत्यंत आवश्यक भूमिका निभाता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की अनियंत्रित खनन गतिविधि लंबे समय में गंभीर पर्यावरणीय संकट पैदा कर सकती है।

  • उन्नाव रेप केस: कुलदीप सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका, हाईकोर्ट का सजा निलंबन आदेश रद्द, जेल में रहना तय

    उन्नाव रेप केस: कुलदीप सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका, हाईकोर्ट का सजा निलंबन आदेश रद्द, जेल में रहना तय


    नई दिल्ली। उन्नाव रेप केस में दोषी करार दिए गए पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शुक्रवार को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सेंगर की सजा को अस्थायी रूप से निलंबित किया गया था। इस फैसले के बाद अब उनकी सजा बरकरार रहेगी और उन्हें जेल में ही रहना होगा।

    सुप्रीम कोर्ट में यह मामला CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने आया, जहां मामले से जुड़े कई कानूनी पहलुओं पर विस्तार से सुनवाई हुई। अदालत ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट द्वारा सजा निलंबन का आदेश सही नहीं था, इसलिए उसे निरस्त किया जाता है।

    सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि इस मामले में CBI की अपील अभी दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित है। वहीं वरिष्ठ वकील एन. हरिहरन ने दलील दी कि पीड़िता नाबालिग नहीं थी और AIIMS बोर्ड की रिपोर्ट भी आरोपी के पक्ष में संकेत देती है, लेकिन इसके बावजूद सजा जारी है।

    इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वर्तमान में मुख्य मुद्दा सजा निलंबन से जुड़ा है, जबकि मामले में कई गंभीर कानूनी बिंदु हैं जिन पर विस्तार से विचार आवश्यक है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने मेरिट (मामले की गहराई) पर कोई अंतिम राय नहीं दी है।

    सुनवाई के दौरान यह भी चर्चा हुई कि क्या विधायक को POCSO कानून के तहत ‘पब्लिक सर्वेंट’ माना जा सकता है। जस्टिस बागची ने कहा कि यह मामला बच्चों के यौन शोषण से जुड़ा है, इसलिए कानून की व्याख्या अत्यंत सावधानी से होनी चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट ने अंत में हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह मुख्य अपील पर जल्द से जल्द सुनवाई करे। यदि जल्दी सुनवाई संभव न हो, तो सजा निलंबन की अर्जी पर नया निर्णय लिया जाए। साथ ही यह भी कहा गया कि हाईकोर्ट इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना स्वतंत्र रूप से निर्णय ले।

    इस फैसले के बाद कुलदीप सिंह सेंगर की कानूनी मुश्किलें और बढ़ गई हैं और फिलहाल उन्हें जेल में ही रहना होगा।

  • SC की बड़ी टिप्पणी, कहा- आज्ञाकारी पत्नी बनने के लिए महिलाएं क्यों दे अपने करियर की बलि?

    SC की बड़ी टिप्पणी, कहा- आज्ञाकारी पत्नी बनने के लिए महिलाएं क्यों दे अपने करियर की बलि?


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान शादी के बाद महिलाओं (Women) के अधिकारों को लेकर कुछ अहम टिप्पणियां की हैं। SC ने इस बात पर जोर दिया है कि एक पढ़ी-लिखी और कामकाजी महिला (Working Woman) से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह शादी (Marriage) के बाद अपनी पहचान और करियर की बलि दे दे। उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि अगर कोई महिला अपने करियर के लिए पति से अलग रह रही है, तो उसे क्रूरता नहीं माना जा सकता।

    SC में एक डेंटिस्ट पत्नी और एक आर्मी ऑफिसर के बीच चल रहे विवाद पर सुनवाई चल रही थी। इस दौरान जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सिर्फ महिला से त्याग माने जाने की सोच को दकियानूसी बताया। पीठ ने कहा, “यह उम्मीद करना कि महिला हमेशा अपने करियर का त्याग करे और एक ‘आज्ञाकारी पत्नी’ की पारंपरिक छवि में सिमट कर रहे, यह एक पुरानी और दकियानूसी सोच है।” पीठ ने कहा कि महिला अपने पति के घर का महज एक हिस्सा नहीं है। उसकी अपनी बौद्धिक और पेशेवर आकांक्षाएं हैं, जिनका सम्मान होना चाहिए।

    क्या है पूरा मामला?
    बार एंड बेंच की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस जोड़े की शादी 2009 में हुई थी। पति सेना में अधिकारी था। वहीं पत्नी ने अहमदाबाद में अपना डेंटल क्लिनिक शुरू किया था। शादी के बाद पति और ससुराल वालों ने आरोप लगाए कि महिला ने अपने परिवार के बजाय करियर को चुना और पति के साथ रहने से इनकार कर दिया। अर्जी के बाद फैमिली कोर्ट ने पत्नी के इस फैसले को ‘क्रूरता’ माना था।

    कोर्ट ने कहा था कि पत्नी ने पति को बिना बताए अपना क्लिनिक शुरू किया और अहमदाबाद में रहने के दौरान ससुराल के बजाय अपने मायके में रुकना पसंद किया, जो सही नहीं है। वहीं गुजरात हाईकोर्ट ने भी 2024 में फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था।

    तलाक को दे दी मंजूरी
    सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के नजरिए को रूढ़िवादी बताया। SC ने तीखे शब्दों में कहा, “आज की दुनिया में जहां महिलाएं लंबी छलांगे लगा रही हैं। सिर्फ इसलिए कि पति एक आर्मी ऑफिसर है, यह उम्मीद करना कि पत्नी अपने करियर के बारे में सोच भी नहीं सकती, एक सामंती मानसिकता को दर्शाता है।” फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने महिला के खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों को रिकॉर्ड से हटा दिया। हालांकि, पति ने दूसरी शादी कर ली है और दोनों के बीच रिश्ते सुधरने की गुंजाइश नहीं थी, इसलिए कोर्ट ने तलाक को मंजूरी दे दी।

  • सुप्रीम व्याख्या में नया दृष्टिकोण, हिंदुत्व को बताया जीवन जीने का तरीका..

    सुप्रीम व्याख्या में नया दृष्टिकोण, हिंदुत्व को बताया जीवन जीने का तरीका..

    नई दिल्ली । धर्म और आस्था से जुड़े मुद्दों पर चल रही एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान न्यायिक दृष्टिकोण से एक ऐसा विचार सामने आया है, जिसने धार्मिक पहचान और उसके स्वरूप को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है। इस दौरान यह स्पष्ट किया गया कि किसी भी धर्म को केवल बाहरी क्रियाओं या अनुष्ठानों के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता, बल्कि यह व्यक्ति के जीवन जीने के तरीके और उसकी आंतरिक आस्था से भी जुड़ा होता है।

    सुनवाई के दौरान यह कहा गया कि
    Hinduism
    को केवल पूजा-पद्धति या धार्मिक स्थलों पर जाने तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसे एक जीवनशैली के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें व्यक्ति अपने विश्वास को विभिन्न तरीकों से व्यक्त करता है। आस्था किसी एक निश्चित ढांचे में बंधी हुई नहीं होती, बल्कि यह व्यक्ति के व्यवहार, सोच और दैनिक जीवन में भी झलकती है।

    इस विचार के अनुसार किसी व्यक्ति को अपने धर्म को साबित करने के लिए मंदिर जाना या किसी विशेष धार्मिक अनुष्ठान का पालन करना अनिवार्य नहीं है। धार्मिक पहचान को बाहरी प्रदर्शन से नहीं बल्कि आंतरिक विश्वास से समझा जाना चाहिए। यहां तक कि घर में दीपक जलाना भी आस्था की अभिव्यक्ति का एक सरल और व्यक्तिगत रूप माना जा सकता है।

    सुनवाई के दौरान यह भी चर्चा हुई कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार हर व्यक्ति को अपने तरीके से आस्था व्यक्त करने की अनुमति देता है। किसी भी व्यक्ति पर यह दबाव नहीं डाला जा सकता कि वह केवल एक ही तरीके से अपने धर्म का पालन करे। यह विचार धार्मिक विविधता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मजबूत आधार देता है।

    यह मामला उन कई याचिकाओं से जुड़ा है जिनमें धार्मिक परंपराओं और सामाजिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने की मांग की गई है। इनमें कुछ विवाद ऐसे हैं जो वर्षों से धार्मिक स्थलों में प्रवेश और परंपरागत प्रथाओं को लेकर समाज में चर्चा का विषय बने हुए हैं। इन मामलों ने यह सवाल भी उठाया है कि आधुनिक संवैधानिक मूल्यों और पारंपरिक आस्थाओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

    सुनवाई में यह भी चिंता जताई गई कि यदि हर धार्मिक प्रथा को लगातार कानूनी चुनौती दी जाती रही, तो इससे समाज में अनावश्यक विवाद बढ़ सकते हैं और धार्मिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। इसलिए यह जरूरी माना गया कि धर्म से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता और समझदारी के साथ दृष्टिकोण अपनाया जाए।

    पुराने एक महत्वपूर्ण धार्मिक विवाद का संदर्भ भी इस चर्चा से जुड़ा रहा, जिसने पहले भी देशभर में व्यापक बहस को जन्म दिया था। उस विवाद ने धार्मिक परंपराओं और समानता के अधिकार के बीच संतुलन को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे।

  • संजय कपूर संपत्ति विवाद में नया मोड़: पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ करेंगे मध्यस्थता, सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

    संजय कपूर संपत्ति विवाद में नया मोड़: पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ करेंगे मध्यस्थता, सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

    नई दिल्ली। संजय कपूर की विशाल संपत्ति को लेकर चल रहा पारिवारिक विवाद अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है, जहां कानूनी लड़ाई के साथ-साथ भरोसे और रिश्तों की जटिलता भी सामने आ रही है। लगभग 30 हजार करोड़ की संपत्ति से जुड़े इस मामले ने अब न्यायिक प्रक्रिया के साथ मध्यस्थता का रास्ता पकड़ लिया है, जिससे उम्मीद जताई जा रही है कि लंबे समय से चल रहा यह विवाद किसी समाधान की ओर बढ़ सकेगा।

    सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले को देखते हुए देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को मध्यस्थ के रूप में नियुक्त किया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यह एक पारिवारिक विवाद है और इसे बातचीत और समझौते के जरिए सुलझाने की हर संभव कोशिश होनी चाहिए। साथ ही, सभी संबंधित पक्षों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे इस मामले पर सार्वजनिक बयान देने से बचें ताकि प्रक्रिया प्रभावित न हो।

    यह विवाद तब और गंभीर हो गया जब परिवार के भीतर संपत्ति और ट्रस्ट को लेकर गंभीर आरोप सामने आए। एक पक्ष का कहना है कि कुछ दस्तावेजों पर बिना पूरी जानकारी के हस्ताक्षर कराए गए और इसी आधार पर संपत्ति को एक फैमिली ट्रस्ट में स्थानांतरित कर दिया गया। इस प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता पर सवाल उठाए गए हैं और इसे धोखाधड़ी से जुड़ा मामला बताया जा रहा है।

    वहीं दूसरी ओर, विरोधी पक्ष इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए ट्रस्ट को वैध और कानूनी रूप से स्थापित संस्था बता रहा है। दोनों पक्षों की दलीलों के बीच मामला और उलझता जा रहा है, जिससे अदालत में कई स्तरों पर सुनवाई चल रही है।

    स्थिति तब और जटिल हो गई जब संजय कपूर के निधन के बाद संपत्ति और कंपनियों के नियंत्रण को लेकर नए विवाद उभर आए। आरोप है कि उनके जाने के बाद कुछ लोगों ने तेजी से निर्णय लेते हुए प्रमुख संपत्तियों और कारोबारी इकाइयों पर नियंत्रण हासिल कर लिया, जिससे परिवार में असंतोष और टकराव बढ़ गया।

    इस पूरे मामले में एक और कानूनी पहलू भी जुड़ा है, जिसमें बच्चों के अधिकारों और संपत्ति में उनके हिस्से को लेकर अलग से दावे किए जा रहे हैं। इससे यह विवाद केवल संपत्ति तक सीमित न रहकर कई कानूनी और पारिवारिक आयामों में बंट गया है।

    सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि यह मामला केवल कानूनी नहीं बल्कि भावनात्मक और पारिवारिक भी है, इसलिए इसका समाधान संवाद के माध्यम से निकलना अधिक उपयुक्त होगा। इसी सोच के तहत पूर्व CJI की मध्यस्थता को एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिससे दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाकर समाधान खोजने की कोशिश की जाएगी।

    अदालत ने यह भी कहा है कि मध्यस्थता प्रक्रिया की शुरुआती रिपोर्ट देखने के बाद ही आगे की कानूनी दिशा तय की जाएगी। फिलहाल सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या यह प्रयास लंबे समय से चले आ रहे इस विवाद को किसी निष्कर्ष तक पहुंचा पाएगा या यह मामला आगे भी कानूनी लड़ाई के रूप में चलता रहेगा।

  • AI और सामाजिक न्याय पर CJI का बड़ा बयान, बोले- गरीबों के प्रति दिख रहा पूर्वाग्रह

    AI और सामाजिक न्याय पर CJI का बड़ा बयान, बोले- गरीबों के प्रति दिख रहा पूर्वाग्रह


    नई दिल्ली। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई को लेकर एक महत्वपूर्ण चिंता जाहिर की है। उन्होंने कहा कि तेजी से विकसित हो रही एआई तकनीक गरीबों और वंचित वर्गों के प्रति अंतर्निहित पूर्वाग्रह प्रदर्शित कर रही है, जो भविष्य में सामाजिक असमानता को और गहरा कर सकती है।
    नई दिल्ली में ‘रिस्पेक्ट इंडिया’ द्वारा आयोजित आठवें दिनकर स्मृति व्याख्यान में बोलते हुए सीजेआई ने कहा कि सामाजिक न्याय किसी भी मानवीय और न्यायपूर्ण समाज की आधारशिला है। उन्होंने महान कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के महाकाव्य रश्मिरथी का उल्लेख करते हुए कहा कि समानता, गरिमा और सामाजिक समरसता जैसे आदर्श भारतीय संविधान से पहले ही साहित्य में मजबूत रूप से व्यक्त किए जा चुके थे।
    सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है।
    जब तक समाज के हर व्यक्ति को सम्मान और गरिमा नहीं मिलेगी, तब तक वास्तविक लोकतंत्र और सामाजिक न्याय संभव नहीं हो सकता। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि आज भी समाज में आर्थिक और सामाजिक विषमताएं बनी हुई हैं और दिनकर की रचनाओं में जिन असमानताओं का उल्लेख किया गया था, वे आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।
    उन्होंने कहा कि नई तकनीकों, विशेष रूप से एआई आधारित सिस्टम, को यदि संवैधानिक मूल्यों और मानवीय संवेदनशीलता के साथ विकसित नहीं किया गया तो वे सामाजिक बहिष्कार और भेदभाव को बढ़ावा दे सकते हैं। उनके अनुसार तकनीक का उद्देश्य केवल सुविधा प्रदान करना नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना भी होना चाहिए।
    सीजेआई ने साहित्य और संवैधानिक नैतिकता के संबंध पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि साहित्य समाज को संवेदनशील बनाता है, जबकि संविधान उसे न्याय और समानता की दिशा देता है। दोनों मिलकर एक ऐसे समाज का निर्माण कर सकते हैं जहां हर व्यक्ति को समान सम्मान और अवसर मिले।
    कार्यक्रम के दौरान भाजपा सांसद मनोज तिवारी को ‘दिनकर संस्कृति सम्मान 2026’ से सम्मानित किया गया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि दिनकर की कविताएं आज भी समाज को प्रेरित करती हैं और भारतीय सांस्कृतिक चेतना को मजबूत बनाती हैं।
    सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह ने भी अपने संबोधन में कहा कि दिनकर के साहित्य में न्याय और समानता के वे मूल सिद्धांत दिखाई देते हैं, जो भारतीय सभ्यता की आत्मा से जुड़े हुए हैं। वहीं ‘रिस्पेक्ट इंडिया’ के संस्थापक मनीष कुमार चौधरी ने कहा कि यह मंच साहित्य, संस्कृति और सामाजिक दायित्वों को एक साथ लाने का प्रयास है।
    सीजेआई सूर्यकांत का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब दुनिया भर में एआई के नैतिक उपयोग और उसके सामाजिक प्रभावों को लेकर गंभीर बहस चल रही है। उनके विचार इस दिशा में भारत की संवैधानिक सोच और सामाजिक दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से सामने रखते हैं।
  • बड़ा फैसला…. छह साल बाद सुप्रीम कोर्ट में बढ़ेगी जजों की संख्या…. कैबिनेट ने दी मंजूरी

    बड़ा फैसला…. छह साल बाद सुप्रीम कोर्ट में बढ़ेगी जजों की संख्या…. कैबिनेट ने दी मंजूरी


    नई दिल्ली।
    केंद्रीय मंत्रिमंडल (Union Cabinet) ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में जजों की संख्या को लेकर मंगलवार को अहम फैसला लिया। कैबिनेट ने SC में न्यायाधीशों की कुल संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने की मंजूरी दे दी। यह फैसला छह साल बाद लिया गया है, जब 2019 में इसे 31 से बढ़ाकर 33 किया गया था। सरकार का कहना है कि इस कदम का मकसद सुप्रीम कोर्ट को और मजबूत करना व न्याय प्रक्रिया को तेज (Justice Process Speeding up) करना है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में 92 हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं।

    केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव (Ashwini Vaishnav) ने बताया कि फिलहाल अदालत में 33 न्यायाधीश और एक मुख्य न्यायाधीश हैं। संसद के आगामी सत्र में इस संबंध में एक विधेयक पेश किया जाएगा। विधेयक के पारित होने के बाद मुख्य न्यायाधीश सहित सुप्रीम कोर्ट के जजों की कुल संख्या 38 हो जाएगी। यह फैसला न्यायालय में लंबित मामलों के बोझ को कम करने और न्याय प्रक्रिया को तेज करने के उद्देश्य से लिया गया है।


    SC में कुछ इस तरह बढ़ती गई जजों की संख्या

    सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम 1956 में मूल रूप से मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर 10 न्यायाधीशों का प्रावधान था। 1960 में इसे 13 और बाद में 17 किया गया। 1986 के संशोधन से संख्या 25 हो गई और 2009 में इसे 30 कर दिया गया। फिलहाल ताजा प्रस्ताव के बाद न्यायपालिका को मजबूत करने की दिशा में एक अहम उठाया गया है, जो देश के न्यायिक ढांचे को और अधिक प्रभावी बनाने में सहायक साबित होगा।

    भारत के संविधान में सुप्रीम कोर्ट की कुल संख्या तय नहीं है। अनुच्छेद 124(1) के तहत चीफ जस्टिस के अलावा अन्य जजों की संख्या संसद तय करती है। समय-समय पर बढ़ती मुकदमों की संख्या को देखते हुए इसमें बदलाव किया जाता है। इस बढ़ोतरी का मकसद लंबित मामलों के बोझ को कम करना है। हालांकि, कई विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ जजों की संख्या बढ़ाने से ही न्याय में देरी पूरी तरह दूर नहीं हो सकती।

  • कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम जमानत, विदेश यात्रा पर रोक सहित कई शर्तें लागू

    कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम जमानत, विदेश यात्रा पर रोक सहित कई शर्तें लागू

    नई दिल्ली। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। मानहानि और कथित गलत आरोपों से जुड़े एक मामले में अदालत ने उन्हें अग्रिम जमानत प्रदान कर दी है, हालांकि इसके साथ कई सख्त शर्तें भी लगाई गई हैं। यह मामला असम के मुख्यमंत्री की पत्नी पर लगाए गए आरोपों से जुड़ा हुआ है, जिसमें कथित रूप से विदेशी संपत्तियों और पासपोर्ट को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था।

    सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए पवन खेड़ा को राहत दी जा सकती है, लेकिन जांच प्रक्रिया में किसी भी तरह की बाधा न आए, इसके लिए कुछ आवश्यक शर्तें लागू करना जरूरी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी को जांच में पूरा सहयोग करना होगा और आवश्यकता पड़ने पर जांच अधिकारियों के समक्ष उपस्थित होना होगा।

    अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि पवन खेड़ा किसी भी तरह से साक्ष्यों को प्रभावित करने या जांच में हस्तक्षेप करने का प्रयास नहीं करेंगे। इसके साथ ही उन्हें यह अनुमति नहीं होगी कि वे बिना संबंधित अदालत की अनुमति के देश से बाहर यात्रा करें। यह शर्त इस उद्देश्य से लगाई गई है ताकि जांच प्रक्रिया निष्पक्ष और बिना किसी दबाव के पूरी हो सके।

    सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निचली अदालत की कुछ टिप्पणियों पर भी सवाल उठाए। अदालत का मानना था कि उपलब्ध तथ्यों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया गया और कुछ टिप्पणियां ऐसी थीं जो आरोपी पर अनावश्यक रूप से भार डालती प्रतीत होती हैं। अदालत ने यह भी कहा कि किसी स्पष्ट कानूनी आधार के बिना निष्कर्ष निकालना उचित नहीं माना जा सकता।

    यह मामला उस समय शुरू हुआ था जब मुख्यमंत्री की पत्नी ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को लेकर शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया था कि उनके खिलाफ सार्वजनिक रूप से गलत और भ्रामक जानकारी फैलाई गई है, जिससे उनकी छवि को नुकसान पहुंचा है। इसके बाद यह मामला कानूनी प्रक्रिया में चला गया और विभिन्न स्तरों पर इसकी सुनवाई होती रही।

    इससे पहले पवन खेड़ा को कुछ समय के लिए ट्रांजिट अग्रिम जमानत भी मिली थी, लेकिन बाद में उस पर रोक से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया सामने आई। इसके बाद मामला उच्च न्यायालय और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां अंतिम रूप से अग्रिम जमानत पर फैसला सुनाया गया।

    सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद अब पवन खेड़ा को राहत तो मिल गई है, लेकिन जांच प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। उन्हें आगे भी जांच एजेंसियों के साथ सहयोग करना होगा और अदालत द्वारा तय की गई शर्तों का पालन करना अनिवार्य रहेगा।

    यह मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है, जहां एक तरफ इसे अभिव्यक्ति और आरोपों के संदर्भ में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे कानूनी प्रक्रिया और जांच की निष्पक्षता से जोड़ा जा रहा है। अब आगे की कार्रवाई जांच के निष्कर्षों और अदालत की आगामी सुनवाई पर निर्भर करेगी।